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समस्या
भाषा-दर्शनक सबसे पुरान आ कठिन प्रश्नसभमे एक अछि—शब्दक अर्थ आखिर की? ‘गाछ’ शब्दक अर्थ सामनेक गाछ अछि? गाछक कोनो सामान्य अवधारणा? ‘गाछ’ शब्दक सामाजिक प्रयोग? कि ‘गाछ’क अर्थ ओ सम्बन्धक जाल अछि जाहिमे ‘पौधा’, ‘वन’, ‘फल’, ‘लकड़ी’, ‘जीवित’, ‘जड़’ आदि शब्द जुड़ल छथि? यदि अर्थ केवल वस्तु हो, तँ ‘यूनिकॉर्न’, ‘न्याय’, ‘लोकतन्त्र’, ‘दर्द’, ‘शून्यता’, ‘संख्या’ जकाँ पदक अर्थ कोना सम्भव? यदि अर्थ केवल प्रयोग हो, तँ गलत प्रयोग, झूठ कथन आ बाह्य जगतसँ सम्बन्धक प्रश्न कहाँ बचल? यदि अर्थ केवल सम्बन्ध हो, तँ सम्बन्धक जाल आखिर जगत, वक्ता आ सामाजिक व्यवहारसँ कोना जुड़त? फ्रेगे अर्थ-बोध आ सन्दर्भक भेद द्वारा देखबैत छथि जे समान वस्तु दिस संकेत करयवला दू अभिव्यक्ति अलग संज्ञानात्मक मूल्य राखि सकैत अछि। रसेल वर्णनक तार्किक रूप खोलैत छथि। उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइन अर्थकेँ प्रयोगमे देखबाक निर्देश दैत छथि। आधुनिक बाह्यतावादी दृष्टि देखबैत अछि जे अर्थ केवल वक्ताक मस्तिष्कमे बन्द नहि रहैत; भाषिक समुदाय आ वास्तविक परिवेश सेहो भूमिका निभबैत अछि। भारतीय शब्दमीमांसा एहि प्रश्नकेँ अलग-अलग ढंगसँ उठबैत अछि—न्याय पद–पदार्थ सम्बन्ध, जाति–व्यक्ति, लक्षणा आ शब्दप्रमाण; मीमांसा वाक्यार्थ, तात्पर्य आ शब्दशक्ति; व्याकरण परम्परा वाक्यक एकता; बौद्ध अपोह अर्थक नकारात्मक सीमांकन। एहि अध्यायक समस्या तेँ ‘कौन सिद्धान्त सही?’ सरल प्रश्न नहि। लक्ष्य अछि—अर्थक विभिन्न आयाम अलग करू: सन्दर्भ, अवधारणात्मक प्रस्तुति, प्रयोग, सामाजिक नियम, सम्बन्धात्मक भेद, वाक्य-प्रसंग, वास्तविक परिवेश। फेर देखू कोन दाबी लेल कोन आयाम आवश्यक अछि।
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे शब्दक अर्थकेँ एकहि तत्त्वमे घटाबयब कठिन अछि। अर्थ बहुस्तरीय अछि: कखनो वस्तुगत सन्दर्भ आवश्यक, कखनो संज्ञानात्मक प्रस्तुति, कखनो सामाजिक प्रयोग, कखनो भाषिक सम्बन्ध, कखनो वाक्य-प्रसंग, कखनो समुदाय आ परिवेश। समानान्तर दर्शन एहि बहुलताकेँ मनमाना अर्थवाद नहि बनबैत। शब्दक अर्थ पूर्णतः निजी इच्छा पर निर्भर नहि; सार्वजनिक भाषा-व्यवहार, ऐतिहासिक प्रयोग, वस्तुगत सन्दर्भ, परिभाषा, पाठ-प्रसंग आ प्रमाण मिलि ओकर सीमा बनबैत अछि। एहि कारण सूत्र होयत—‘अर्थ एक वस्तु मात्र नहि; प्रयोग मात्र नहि; सम्बन्ध मात्र नहि। अर्थ भाषिक रूप, सामाजिक प्रयोग आ यथार्थसँ सम्बन्धक बहुस्तरीय संरचना अछि।’ एहि बहुस्तरीय मॉडलमे अलग शब्दक अर्थ अलग अनुपातमे बनि सकैत अछि। ‘गङ्गा’ जकाँ नाममे सन्दर्भ प्रमुख; ‘खेल’ जकाँ पदमे प्रयोग आ पारिवारिक समानता; ‘न्याय’मे अवधारणात्मक–संस्थागत विवाद; ‘दर्द’मे निजी अनुभव आ सार्वजनिक भाषा दुनू; ‘इलेक्ट्रॉन’मे वैज्ञानिक सिद्धान्त, उपकरण आ यथार्थ-सन्दर्भ। रंगीन सारिणी — अर्थक पाँच प्रमुख आयाम
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—सन्दर्भ अर्थक महत्त्वपूर्ण भाग अछि। ‘पटना’ शब्द वास्तविक स्थान दिस संकेत करैत अछि; यदि सन्दर्भ गलत, कथनक तथ्यात्मक मूल्य बदलि सकैत अछि। मुदा सन्दर्भ अकेला पर्याप्त नहि—एके वस्तु अलग अभिव्यक्तिद्वारा अलग ढंगसँ प्रस्तुत हो सकैत अछि। दोसर तर्क—फ्रेगेक अर्थ-बोध–सन्दर्भ भेद देखबैत अछि जे ‘भोरक तारा’ आ ‘साँझक तारा’ समान ग्रह दिस संकेत करैतहुँ एकहि संज्ञानात्मक अर्थ नहि। एहि कारण अर्थमे प्रस्तुति-भाव आवश्यक। तेसर तर्क—रसेलक वर्णन-सिद्धान्त देखबैत अछि जे नाम-जकाँ देखाइत अभिव्यक्ति कखनो जटिल अस्तित्व, एकत्व आ गुण-दाबी हो सकैत अछि। अतः सतही शब्द–वस्तु सम्बन्ध पर्याप्त नहि। चारिम तर्क—उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइनक प्रयोग-विचार शब्दकेँ जीवनमे वापस आनैत अछि। ‘खेल’क अर्थ एक साझा सारमे नहि, विविध प्रयोगक ओवरलैपमे बुझल जा सकैत अछि। पाँचम तर्क—अर्थ केवल प्रयोग मानलासँ तथ्यात्मक सन्दर्भ कमजोर पड़ि सकैत अछि। समुदाय ‘सूर्य पृथ्वीक चारू दिस घूमैत अछि’ वाक्य दीर्घ समय तक अर्थपूर्ण ढंगसँ प्रयोग कऽ सकैत अछि, मुदा तथ्यात्मक रूपेँ गलत। अर्थ आ सत्य अलग। छठम तर्क—सम्बन्धात्मक दृष्टि देखबैत अछि जे शब्दक अर्थ अन्य शब्दसँ भेद आ सम्बन्धद्वारा बनैत अछि। ‘गरम’ ‘ठंढा’सँ, ‘माता’ ‘सन्तान’सँ, ‘खरीद’ ‘बिक्री’सँ सम्बन्धित अर्थ-क्षेत्र बनबैत अछि। सातम तर्क—मुदा केवल सम्बन्धक जाल पर्याप्त नहि। यदि पूरा शब्द-जाल जगतसँ काटल हो, तँ कोनो काल्पनिक भाषा अंदरसँ सुसंगत रहितहुँ बाह्य सन्दर्भ न रखि सकैत अछि। अर्थक किछु रूप वास्तविक वस्तु, क्रिया आ सामाजिक संस्थासँ जुड़ल होयबाक चाही। आठम तर्क—बाह्यतावादी विचार एक महत्त्वपूर्ण सुधार दैत अछि: अर्थ केवल वक्ताक मानसिक अवस्था नहि। ‘जल’ जकाँ प्राकृतिक-प्रकार पदक अर्थ वास्तविक पदार्थ आ विशेषज्ञीय–सामुदायिक ज्ञानद्वारा प्रभावित हो सकैत अछि। नवम तर्क—शब्दक अर्थ वाक्यसँ पूर्णतः अलग नहि। ‘बैंक’ नदीक किनार हो सकैत अछि, वित्तीय संस्था सेहो; वाक्य-प्रसंग अर्थ चयन करैत अछि। भारतीय मीमांसक आकांक्षा–योग्यता–सन्निधि–तात्पर्य एहि समस्या पर स्वतंत्र प्रकाश दैत अछि। दसम तर्क—अर्थ ऐतिहासिक सेहो अछि। ‘कम्प्यूटर’, ‘नेटवर्क’, ‘जाति’, ‘राष्ट्र’, ‘नागरिकता’ जकाँ पदक प्रयोग कालक संग बदलैत अछि। शब्दकोश स्थिर तस्वीर दे सकैत अछि; जीवित अर्थ इतिहास, संस्था आ प्रयोगमे विकसित होइत अछि। एगारहम तर्क—अर्थक बहुलता अनुवादमे विशेष महत्त्वपूर्ण अछि। अंग्रेजी तकनीकी पदक मात्र ध्वन्यन्तरण कएलासँ अर्थ नहि पहुँचैत। मैथिली रूप, प्रयोगक क्षेत्र, परिभाषा, उदाहरण आ जहाँ आवश्यक अंग्रेजी मूल—सभ मिलि दार्शनिक अनुवाद बनबैत अछि। बारहम तर्क—‘एक शब्द = एक अर्थ’ मॉडल डिजिटल खोज आ कृत्रिम बुद्धि (AI) लेल सेहो अपर्याप्त अछि। प्रणालीकेँ सन्दर्भ, सहप्रयोग, विश्वज्ञान, वक्ता-अभिप्राय आ दस्तावेज-प्रसंग जोड़बाक पड़ैत अछि; तथापि भाषा-मॉडल द्वारा सम्बन्ध सीखलासँ वास्तविक सन्दर्भ स्वतः प्रमाणित नहि होइत।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे बहुस्तरीय अर्थ-मॉडल अत्यधिक ढीला अछि। यदि सन्दर्भ, प्रयोग, सम्बन्ध, समुदाय, प्रसंग सभ अर्थक भाग, तँ स्पष्ट सिद्धान्त कहाँ रहल? दोसर पूर्वपक्ष सन्दर्भवादी अछि—भाषाक मुख्य काम जगतकेँ निर्दिष्ट करब; शेष तत्व मनोवैज्ञानिक वा व्यवहारिक विवरण अछि। अधिक स्तर जोड़लासँ अनावश्यक जटिलता बढ़ैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष प्रयोगवादी अछि—वस्तुगत सन्दर्भक बात अन्ततः भाषिक प्रयोगसँ बाहर नहि जा सकैत। हम ‘वस्तु’क चर्चा सेहो भाषा-खेलमे करैत छी; अतः प्रयोग प्राथमिक अछि। चारिम पूर्वपक्ष सम्बन्धवादी अछि—शब्दक मूल्य तंत्रक भीतर भेदसँ बनैत अछि; बाह्य वस्तु मात्रसँ भाषा कोनो संरचना नहि पबैत। पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय दृष्टिसँ अछि। यदि आधुनिक ‘सन्दर्भ/प्रयोग/सम्बन्ध (reference/use/relation)’ ढाँचा द्वारा न्याय, मीमांसा, भर्तृहरि वा अपोहकेँ पढ़ल जाए, तँ मूल भारतीय अवधारणा आधुनिक श्रेणीमे जबरन ढालल जा सकैत अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—बहुस्तरीय मॉडल ढीलापन नहि, कार्य-विभाजन अछि। प्रत्येक दाबी लेल पूछल जाए कोन आयाम निर्णायक: नाम-सन्दर्भ? वाक्य-प्रसंग? सामाजिक प्रयोग? वर्गीय सम्बन्ध? वैज्ञानिक यथार्थ? एहि प्रश्नसँ विश्लेषण अधिक स्पष्ट बनैत अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—सन्दर्भ आवश्यक, मुदा ‘अर्थ = वस्तु’ मॉडल अस्तित्वहीन पद, अमूर्त संज्ञा, समान सन्दर्भक अलग संज्ञानात्मक मूल्य आ भाषिक क्रियाकेँ पर्याप्त नहि समझबैत। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—प्रयोग अर्थ बुझबामे मूलभूत अछि, मुदा प्रयोग द्वारा बनेल अर्थक आधारपर कएल तथ्यात्मक दाबी जगतसँ जाँचल जा सकैत अछि। भाषा-खेल यथार्थक प्रतिरोध समाप्त नहि करैत। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—सम्बन्धात्मकता शक्तिशाली अछि, मुदा सम्बन्धक जालक उपयोग वास्तविक व्यवहार, शरीर, वस्तु, संस्था आ परिवेशमे होइत अछि। पूर्ण आन्तरिकतावाद अर्थकेँ बंद प्रणाली बना सकैत अछि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय परम्पराकेँ आधुनिक श्रेणीमे नहि घुसाओल जाए। पहले प्रत्येक परम्पराक अपन पद, तर्क आ लक्ष्य स्पष्ट करू; आधुनिक तुलना केवल समस्या-संवादक स्तरपर हो।
भारतीय संवाद
न्याय पद–पदार्थ सम्बन्ध, जाति–व्यक्ति, विशेषण–विशेष्य, लक्षणा, स्मृति आ शब्दप्रमाण द्वारा अर्थकेँ वस्तु, वर्ग, सम्बन्ध आ ज्ञानोत्पत्तिसँ जोड़ैत अछि। एहि कारण न्याय शब्द–वस्तु सम्बन्धक एक सशक्त यथार्थवादी मॉडल प्रस्तुत करैत अछि। मीमांसा शब्दशक्ति आ वाक्यार्थक प्रश्नमे प्रसंग, तात्पर्य, आकांक्षा, योग्यता आ सन्निधिक महत्त्व देखबैत अछि। एहि दृष्टिसँ शब्द अर्थपूर्ण होइतहुँ वाक्यगत बोध बिना पूर्ण संप्रेषण नहि करि सकैत। भर्तृहरि वाक्यक एकता आ भाषिक अनुभूतिक समग्रता पर बल दैत छथि। शब्दक पृथक् अर्थ बादक विश्लेषण हो सकैत अछि; भाषिक बोध मूल रूपेँ अधिक समग्र हो सकैत अछि। ई आधुनिक प्रयोगवाद वा समग्रतावाद (holism) क समान नहि, स्वतंत्र भाषा-दर्शन अछि। बौद्ध अपोह सिद्धान्त अर्थकेँ ‘अन्यक अपवर्जन’ द्वारा समझबैत अछि। ‘गाय’क अर्थ कोनो शाश्वत सार्वभौम वस्तु नहि, बल्कि गैर-गाय सँ सीमांकनक प्रक्रियासँ जुड़ल अछि। ई सम्बन्धात्मक/भेदात्मक प्रश्नसँ संवादयोग्य अछि, मुदा आधुनिक संरचनावाद अथवा विखण्डन (deconstruction) क पूर्वरूप नहि। भारतीय संवाद एहि निष्कर्षक समर्थन करैत अछि जे ‘अर्थ’ एकरेखीय विषय नहि। वस्तु, जाति, वाक्य, प्रसंग, तात्पर्य, अपवर्जन, वक्ता आ ज्ञान—अलग परम्परा अलग केन्द्र चुनैत छथि।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक नव्य-न्याय परम्परा अर्थक प्रश्नमे दाबीक सम्बन्धात्मक सीमा अत्यन्त सूक्ष्म बनबैत अछि। ‘कौन गुण किस वस्तुमे, कोन सम्बन्धसँ, कोन अवच्छेदकद्वारा?’ जकाँ विश्लेषण शब्द–वस्तु सम्बन्धकेँ साधारण नामकरणसँ अधिक जटिल बनबैत अछि। समानान्तर मिथिला एहि सूक्ष्मताकेँ उत्तरकालीन प्रयोग-विवेकसँ जोड़ैत अछि: तकनीकी परिभाषा स्पष्ट हो, मुदा जीवित मैथिली प्रयोग सेहो देखल जाए। शब्दकोशीय अर्थ आ लोकप्रयोगक अन्तर स्वतः त्रुटि नहि; कखनो इतिहास, क्षेत्र वा सामाजिक अनुभवक संकेत हो सकैत अछि। ‘मिथिला’, ‘मैथिली’, ‘लोक’, ‘परम्परा’, ‘शास्त्र’, ‘आधुनिक’, ‘जाति’, ‘समुदाय’ जकाँ पद ऐतिहासिक लेखनमे अत्यधिक भार वहन करैत अछि। एहि सभक अर्थ काल, स्रोत आ संस्थागत प्रयोग निर्दिष्ट केने बिना विशाल निष्कर्ष निकालब खतरनाक अछि। समानान्तर पद्धति एहि कारण प्रत्येक महत्त्वपूर्ण पद लेल पाँच प्रश्न प्रस्तावित करैत अछि—सन्दर्भ की? प्रयोग कहाँ? अन्य पदसँ सम्बन्ध की? ऐतिहासिक काल की? प्रमाण कोन? मैथिली दार्शनिक लेखनक लक्ष्य केवल अंग्रेजी पदक समानार्थक खोजब नहि, बल्कि दार्शनिक प्रयोगक्षमता बनायब अछि। शब्द पाठकक भाषा-जीवनमे अर्थपूर्ण हो, तर्कीय सीमा स्पष्ट हो, आ आवश्यक ठाम मूल विदेशी पद सहायक रूपेँ कोष्ठकमे रहय। एहि दृष्टिसँ भाषा लोकतान्त्रिक सेहो बनैत अछि। विशेषज्ञीय स्पष्टता आवश्यक, मुदा ज्ञान केवल विशेषज्ञक गुप्त पदावलीमे कैद नहि रहय; सार्वजनिक भाषिक रूपान्तरण दर्शनक बौद्धिक जिम्मेदारी अछि। रंगीन प्रक्रिया-चित्र — शब्दक अर्थक बहुस्तरीय परीक्षण
समकालीन प्रयोग
कृत्रिम बुद्धि (AI) भाषा-मॉडल शब्दक सहप्रयोग आ सम्बन्धक विशाल जाल सीखैत अछि। एहि कारण ओ प्रसंगानुसार अर्थपूर्ण उत्तर दे सकैत अछि; मुदा सहप्रयोग-सम्बन्ध वास्तविक सन्दर्भक स्वतः गारंटी नहि। काल्पनिक उद्धरण वा अस्तित्वहीन स्रोत एहि सीमाक उदाहरण छथि। खोज-प्रणालीमे ‘जगन्नाथ मिश्र’ जकाँ नाम अनेक व्यक्तिक सन्दर्भ हो सकैत अछि। सही अर्थ लेल नाम, पेशा, काल, स्थान, दस्तावेज आ उपयोगकर्ता-अभिप्राय जोड़बाक पड़ैत अछि। कानूनमे एक शब्दक अलग संस्थागत अर्थ हो सकैत अछि। ‘व्यक्ति’, ‘सहमति’, ‘हानि’, ‘मालिकाना’ दैनिक प्रयोगसँ अलग विधिक परिभाषा ग्रहण करैत अछि; तथापि अदालत सामाजिक प्रयोग आ उद्देश्य सेहो देखैत अछि। इतिहासमे आधुनिक शब्दकेँ अतीतपर आरोपित करब खतरनाक अछि। ‘राष्ट्र’, ‘जाति’, ‘भाषा’क आजुक अर्थ मध्यकालीन स्रोतमे स्वतः लागू नहि। ऐतिहासिक अर्थ-निर्धारण स्रोत-प्रयोग पर आधारित होयबाक चाही। चिकित्सामे ‘दर्द’ निजी अनुभूति, सार्वजनिक भाषा, नैदानिक मापदण्ड आ सामाजिक विश्वास—चारू स्तर पर अर्थ रखैत अछि। एकहि स्तरक आधिपत्य रोगीक अनुभव वा चिकित्सा-निर्णय विकृत करि सकैत अछि। राजनीतिक विमर्शमे ‘स्वतन्त्रता’, ‘सुरक्षा’, ‘परम्परा’, ‘धर्म’, ‘अल्पसंख्यक’, ‘जनता’ जकाँ शब्द भावनात्मक, संस्थागत आ वैधानिक अर्थक जाल बनबैत अछि। तर्क शुरू होयबाक पहिने शब्दक प्रयोगक्षेत्र स्पष्ट करब आवश्यक अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
शब्दक अर्थकेँ वस्तु, प्रयोग अथवा सम्बन्धमे एकरेखीय रूपेँ घटाबयब कठिन अछि। सन्दर्भ, प्रस्तुति-भाव, प्रयोग, सम्बन्ध, प्रसंग, समुदाय, इतिहास आ वास्तविक परिवेश—सभ अर्थक अलग आयाम हो सकैत अछि। फ्रेगे सन्दर्भ आ संज्ञानात्मक प्रस्तुति अलग करैत छथि; रसेल सतही वर्णनक तार्किक रूप खोलैत छथि; उत्तरकालीन विट्गेन्स्टाइन अर्थक सामाजिक प्रयोग देखबैत छथि; बाह्यतावाद वास्तविक परिवेश आ समुदायक भूमिका जोड़ैत अछि। भारतीय न्याय, मीमांसा, भर्तृहरि आ बौद्ध अपोह स्वतंत्र अर्थ-सिद्धान्त प्रस्तुत करैत छथि। हुनका आधुनिक पदावलीक पूर्वरूप बनाबयब अनुचित; समस्या-संवाद अधिक फलदायी अछि। समानान्तर दर्शनक सूत्र—अर्थ पूर्णतः बन्द नहि, पूर्णतः मुक्त सेहो नहि। शब्दक सार्वजनिक प्रयोग ओकर सीमा बनबैत अछि; जगत आ प्रमाण तथ्यात्मक दाबीकेँ नियंत्रित करैत अछि; इतिहास अर्थकेँ बदलि सकैत अछि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘शब्द की मतलब?’ पूछब पर्याप्त नहि। पूछू: ‘ककरा दिस? कोन प्रसंगमे? की काम करैत? कोन शब्दसँ सम्बन्धित? कोन इतिहाससँ आयल? आ एहि अर्थपर आधारित तथ्यक प्रमाण की?’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• गोटलोब फ्रेगे — ‘अर्थ-बोध आ सन्दर्भ पर’ (On Sense and Reference)। • बर्ट्रैण्ड रसेल — ‘वर्णन पर’ (On Denoting)। • लुडविग विट्गेन्स्टाइन — ‘दार्शनिक अन्वेषण’ (Philosophical Investigations)। • हिलरी पटनम — ‘अर्थक अर्थ’ (The Meaning of ‘Meaning’)। • सॉल क्रिप्के — ‘नामकरण आ आवश्यकता’ (Naming and Necessity)। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • बी. के. मतिलाल — ‘शब्द आ जगत’ (The Word and the World); ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।