Full chapter text
समस्या
‘संरचना’ शब्द दैनिक भाषामे भवनक ढाँचा, संस्थाक संगठन, वाक्यक विन्यास अथवा समाजक रूपरेखा लेल प्रयुक्त होइत अछि। दार्शनिक आ मानविकी विमर्शमे मुदा संरचनावाद (structuralism) एहि शब्दकेँ अधिक कठोर अर्थ दैत अछि: कोनो वस्तु वा प्रथाकेँ ओकर पृथक् तत्वसभक योग मात्र नहि, बल्कि तत्वसभक परस्पर सम्बन्ध, भेद, नियम आ रूपान्तरणक प्रणाली रूपमे बुझब। यदि एक भाषा केवल शब्दक सूची होइत, तँ समान शब्द अलग वाक्य आ सामाजिक प्रसंगमे अलग अर्थ किएक देत? यदि समाज व्यक्तिसभक जोड़ मात्र होइत, तँ संस्था, नातेदारी, नियम, वर्गीकरण आ भूमिका व्यक्तिसँ दीर्घजीवी संरचना कोना बनबैत? यदि मिथक केवल कथासभक ढेर होइत, तँ अलग कथामे आवर्ती सम्बन्धात्मक प्रतिरूप किएक देखाइत? संरचनावादी प्रश्न एहि ठाम उठैत अछि—किसी तत्वक अर्थ वा कार्य ओकर अपने गुणसँ अधिक ओकर प्रणालीगत स्थान द्वारा निर्धारित होइत अछि की? ‘माता’ शब्द ‘सन्तान’, ‘पिता’, ‘परिवार’ आदि सम्बन्ध बिना पूरा अर्थ राखि सकैत अछि की? ‘खरीद’ ‘बिक्री’सँ अलग बुझल जा सकैत अछि की? ‘दिन’ ‘राति’क भेद बिना समान अर्थ राखत की? मुदा संरचना पर अत्यधिक बल देलासँ दोसर खतरा अछि। व्यक्ति, इतिहास, आकस्मिकता, शरीर, सत्ता, संघर्ष आ परिवर्तनकेँ स्थिर प्रणालीक भीतर कैद कएल जा सकैत अछि। संरचना जँ सभ किछु निर्धारित करैत अछि, तँ नवाचार आ जिम्मेदारीक स्थान कहाँ? एहि अध्यायक समस्या तेँ दूहरा अछि—संरचना वास्तवमे की स्पष्ट करैत अछि, आ ओकर सीमा की? संरचनावाद (structuralism) केँ ‘सभ किछु संरचना अछि’ नारा बनौने बिना, सम्बन्धात्मक विश्लेषणक एक उपयोगी पद्धति रूपमे कोना बुझल जाए?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे संरचना कोनो लुकायल पदार्थ नहि; ई तत्वसभक एहन नियमबद्ध सम्बन्ध-व्यवस्था अछि जाहिमे प्रत्येक तत्वक अर्थ वा कार्य बहुत हद तक ओकर स्थान, भेद आ अन्य तत्वसँ सम्बन्धद्वारा निर्धारित होइत अछि। संरचना बुझबाक लेल चार बिन्दु केन्द्रीय छथि—समग्रता: तत्वसभ अलग नहि, प्रणालीमे कार्य करैत; सम्बन्ध: महत्व वस्तु सँ अधिक स्थान/सम्बन्ध (position/relationship) मे हो सकैत; रूपान्तरण: संरचना बदलितहुँ नियमबद्ध रूप राखि सकैत; आत्म-नियमन: किछु प्रणाली अपन नियमक भीतर नूतन संयोजन उत्पन्न करैत अछि। एहि प्रतिपादनक अर्थ नियतिवाद नहि। संरचना व्यवहारक अवसर आ बाधा बनबैत अछि; व्यक्ति ओकर भीतर कार्य करैत, नियम बदलैत, नव अर्थ बनबैत आ कखनो संस्था पुनर्गठित करैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि कारण सूत्र प्रस्तावित करैत अछि—‘संरचना देखू, मुदा संरचनाकेँ नियति नहि मानू; सम्बन्ध जाँचू, मुदा वस्तु, इतिहास आ सक्रियताकेँ नहि मिटाउ।’
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—समग्रता तत्वक साधारण योग नहि। वाक्यक अर्थ शब्दसभक शब्दकोशीय अर्थ जोड़ि मात्र नहि बनैत; क्रम, व्याकरणिक भूमिका, अपेक्षा आ प्रसंग संयुक्त रूपेँ अर्थ बनबैत अछि। एहि कारण समग्रक गुण कखनो भागसभ (parts) केर साधारण जोड़सँ अधिक होइत अछि। दोसर तर्क—भेद अर्थ उत्पन्न करैत अछि। भाषिक संकेतक मूल्य अनेक बेर एहि कारण होइत अछि जे ओ अन्य संकेतसँ अलग अछि। ‘काला’क अर्थ ‘सफेद’, ‘धूसर’, ‘रंग’ आदि संबंधी क्षेत्रमे अधिक स्पष्ट होइत अछि। तेसर तर्क—संरचना स्थानक अर्थ बदलि सकैत अछि। शतरंजक एक मोहरा ओकर भौतिक पदार्थक कारण राजा वा घोड़ा नहि; खेलक नियम आ प्रणालीगत स्थान ओकर कार्य निर्धारित करैत अछि। चारिम तर्क—संरचनावाद प्रायः समकालिक विश्लेषण (synchronic analysis) पर बल दैत अछि: कोनो निश्चित समयपर प्रणाली कोना काम करैत अछि? ई कालक्रमिक विश्लेषण (diachronic analysis) सँ अलग प्रश्न अछि। दुनू परस्पर विरोधी होयबाक आवश्यकता नहि। पाँचम तर्क—रूपान्तरण संरचनाक स्थिरता आ परिवर्तनकेँ जोड़ैत अछि। कोनो नियमबद्ध प्रणाली अनेक सतही रूप उत्पन्न करि सकैत अछि; बदलाब पूर्ण अराजकता नहि, कखनो संरचनात्मक सम्भावनासभक भीतर होइत अछि। छठम तर्क—जाँ पियाजेक सूत्र ग्रहण करी, संरचना तीन विशेषता द्वारा बुझल जा सकैत अछि: समग्रता, रूपान्तरण आ आत्म-नियमन। मुदा ई संरचनावादक सभ शाखाक सार्वभौम परिभाषा नहि; एक प्रभावशाली व्याख्या मात्र अछि। सातम तर्क—संरचनात्मक विश्लेषणक शक्ति अदृश्य सम्बन्ध स्पष्ट करबामे अछि। नातेदारीमे ‘व्यक्ति के?’ सँ अधिक ‘ककरा संग कोन वैवाहिक/वंशीय/निषेधात्मक सम्बन्ध?’ प्रश्न सामाजिक नियम खोलि सकैत अछि। आठम तर्क—संरचना स्वतन्त्र वस्तु जकाँ वस्तुकरण (reification) कएल जाए तऽ भ्रम होइत अछि। ‘समाज चाहैत अछि’, ‘भाषा स्वयं निर्णय करैत अछि’, ‘संरचना मनुष्यकेँ चलबैत अछि’ जकाँ वाक्य विश्लेषणात्मक रूपक हो सकैत अछि, शाब्दिक अर्थमे सक्रिय अभिकर्ता (acting agent) नहि। नवम तर्क—संरचना आ सत्ता अलग प्रश्न नहि। वर्गीकरण, भूमिका, भाषा-मानक, संस्थागत पद, विवाह-नियम, शिक्षा-प्रवेश—ई सभ संरचनात्मक होइतहुँ शक्ति-वितरण करि सकैत अछि। बादक उत्तर-संरचनावादी आलोचना एहि बिन्दुकेँ तीक्ष्ण करैत अछि। दसम तर्क—संरचना आ इतिहासकेँ जोड़ब आवश्यक अछि। कोनो संरचना कखन बनल, कोना बदलल, कोन संघर्षसँ टिकि रहल, ककर हितमे कार्य कएल—ई प्रश्न बिना संरचनात्मक स्थिर-चित्र (structural snapshot) अधूरा रहैत अछि। एगारहम तर्क—संरचना आ सक्रियता (agency) सहअस्तित्वमे रहि सकैत अछि। व्यक्ति नियमक भीतर सीखैत अछि, मुदा नियमक नूतन प्रयोग, विरोध, संशोधन आ संस्थागत परिवर्तन सेहो करैत अछि। बारहम तर्क—संरचना एक विश्लेषणात्मक मॉडल अछि, यथार्थक पूर्ण प्रतिलिपि नहि। मॉडल उपयोगी होइत अछि जँ ओ सम्बन्ध स्पष्ट करय, तुलना सम्भव बनाबय, आ परीक्षणयोग्य प्रश्न उत्पन्न करय; अनुपयोगी होइत अछि जँ ओ इतिहास, अनुभव वा प्रमाणक विरोधक बावजूद स्वयंकेँ अन्तिम सत्य घोषित करय।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे संरचनावाद व्यक्तिकेँ गौण करैत अछि। भाषा, मिथक, नातेदारी वा संस्था केन्द्रीय बनैत अछि; चेतना, चुनाव, रचनात्मकता आ नैतिक जिम्मेदारी कमजोर होइत अछि। दोसर पूर्वपक्ष इतिहाससँ अछि। समकालिक संरचना पर बल देलासँ परिवर्तनक प्रक्रिया, संघर्ष, आकस्मिक घटना आ कालगत कारण छूटि सकैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष यथार्थवादसँ अछि। यदि अर्थ केवल भेदक प्रणालीमे बनैत अछि, तँ भाषा बाह्य जगतसँ कोना जुड़त? शब्दसभ आपसमे भेद करितेँ रहल, वस्तु आ घटना कहाँ गेल? चारिम पूर्वपक्ष सत्ता-समीक्षासँ अछि। ‘संरचना’ तटस्थ जकाँ प्रस्तुत हो सकैत अछि, जबकि वास्तविक सामाजिक संरचना असमान अधिकार, जाति, लिंग, वर्ग, औपनिवेशिकता वा संस्थागत हिंसा वहन करि सकैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष तुलनात्मक दर्शनसँ अछि। पाणिनि, भर्तृहरि, नव्य-न्याय अथवा बौद्ध सम्बन्ध-विचारकेँ संरचनावाद (structuralism) क पूर्वरूप कहब ऐतिहासिक काल-विस्थापन होयत।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—संरचनात्मक विश्लेषण व्यक्तिक निषेध नहि, विश्लेषणक स्तर बदलैत अछि। व्यक्ति-केंद्रित आ संरचना-केंद्रित व्याख्या दुनू आवश्यक हो सकैत अछि। समानान्तर दर्शन सक्रियताकेँ संरचनाक भीतर आ विरुद्ध दुनू देखैत अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—समकालिक विश्लेषण इतिहासक विकल्प नहि। एक समय-बिन्दुपर प्रणाली बुझलासँ ऐतिहासिक परिवर्तनक तुलना अधिक स्पष्ट हो सकैत अछि; शर्त ई कि संरचनात्मक स्थिर-चित्र (snapshot) केँ स्थायी सार नहि मानल जाए। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—भाषिक भेद अर्थक एक स्रोत अछि, पूर्ण स्रोत नहि। सामाजिक प्रयोग, शरीर, वस्तु, परिवेश आ प्रमाण बाह्य यथार्थसँ सम्बन्ध बनाए रखैत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—संरचना तटस्थ मानबाक आवश्यकता नहि। संरचना कोना शक्ति वितरित करैत अछि, ककर भूमिका स्वीकृत/निषिद्ध करैत अछि, आ बदलाबक लागत ककरा पर पड़ैत अछि—ई विश्लेषण संरचनावादक लोकतान्त्रिक विस्तार हो सकैत अछि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय परम्परासँ तुलना समस्या-साम्य धरि सीमित रहय। ‘सम्बन्ध महत्त्वपूर्ण अछि’ अथवा ‘व्याकरण नियमबद्ध प्रणाली अछि’ जकाँ संवाद सम्भव; ऐतिहासिक पहचान वा ‘पहिनेसँ संरचनावादी (structuralist)’ दाबी अनुचित।
भारतीय संवाद
पाणिनीय व्याकरण नियमबद्ध भाषिक प्रणालीक अत्यन्त विकसित भारतीय उदाहरण अछि। धातु, प्रत्यय, संधि, रूप-निर्माण आ क्रमबद्ध नियम भाषा-रूप उत्पन्न करैत अछि। मुदा पाणिनि ‘संरचनावादी’ आधुनिक अर्थमे नहि; हुनकर परियोजना, ऐतिहासिक सन्दर्भ आ तकनीकी लक्ष्य अलग। भर्तृहरि भाषिक बोधक समग्रता आ शब्द–वाक्य सम्बन्धपर बल दैत छथि। एहि विचारसँ समग्र/भाग (whole/part) प्रश्नपर संवाद सम्भव अछि, मुदा स्फोट = संरचनात्मक समग्रता (structural totality) कहब अनुचित सरलीकरण। न्याय–नव्य-न्याय सम्बन्ध, विशेषणता, विषयता, अवच्छेदकता आ अभावक सूक्ष्म विश्लेषण विकसित करैत अछि। संरचनात्मक सम्बन्धात्मकता (structural relationality) संग कार्यगत संवाद सम्भव, मुदा नव्य-न्याय यथार्थवादी प्रमाणमीमांसा अछि; संकेत-प्रणालीक सिद्धान्त नहि। बौद्ध प्रतीत्यसमुत्पाद वस्तु आ घटनाक निर्भरता पर बल दैत अछि। एहि कारण सम्बन्ध-प्रथम (relation-first) प्रकारक तुलना आकर्षक अछि, मुदा प्रतीत्यसमुत्पाद नैतिक–सोतिरियोलॉजिकल–तत्त्वमीमांसक व्यापक परियोजना अछि; संरचनावाद (structuralism) केर समानार्थी नहि। भारतीय संवादक शिक्षा—सम्बन्ध, नियम, समग्रता आ निर्भरता अनेक परम्परामे उठल प्रश्न छथि; समान शब्दावलीक अभाव ऐतिहासिक भिन्नता अछि, कमी नहि।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि संरचनात्मक विश्लेषणकेँ नव्य-न्यायीय सम्बन्ध-सूक्ष्मता संग संवादमे रखैत अछि। कोनो दाबीमे केवल तत्व नहि, तत्वक भूमिका, सम्बन्धक प्रकार, सीमा आ अवच्छेदन स्पष्ट कएल जाए। इतिहासलेखनमे संरचना उपयोगी अछि जखन भूमि-अधिकार, शिक्षा, नातेदारी, प्रशासन, भाषा-मानक वा ज्ञान-संस्था जकाँ परस्पर सम्बन्धित क्षेत्रक मानचित्र बनाओल जाए। मुदा संरचना विश्लेषण प्रत्येक व्यक्ति वा कालपर समान रूपेँ थोपल नहि जाए। मैथिली भाषिक संसारमे मानक, क्षेत्रीय रूप, लिपि, साहित्यिक शैली, मौखिकता, डिजिटल प्रयोग आ संस्थागत भाषा परस्पर सम्बन्धित संरचना बनबैत छथि। कोनो एक रूपकेँ ‘पूर्ण भाषा’ आ शेषकेँ विचलन मानब वर्णनात्मक रूपेँ कमजोर हो सकैत अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि संरचना आ अभिलेखक सम्बन्ध जाँचैत अछि। जे संस्था अधिक दस्तावेज बनबैत अछि, ओकर उपस्थिति इतिहासमे अधिक दृश्य हो सकैत अछि; अभिलेखीय दृश्यता (visibility) स्वयं सामाजिक संरचनाक परिणाम हो सकैत अछि। गरिमा-आधारित नैतिकता संरचनाक आलोचनात्मक कसौटी दैत अछि। यदि कोनो सामाजिक संरचना जन्मक आधारपर अधिकार सीमित करैत अछि, तँ ओकर ऐतिहासिक वास्तविकता स्वीकारल जाए, नैतिक वैधता नहि। आत्मसमीक्षा अन्तिम नियम अछि—संरचनात्मक मॉडल जँ प्रमाणसँ मेल नहि खाइत, मॉडल बदलू; प्रमाणकेँ मॉडलमे जबरन नहि घुसाउ।
समकालीन प्रयोग
कृत्रिम बुद्धि (AI) मे आँकड़ा-रूपरेखा (data schema), लक्षण-सम्बन्ध (feature relation), मॉडल-वास्तु (model architecture) आ वर्गीकरण-रूपरेखा (taxonomy) संरचनात्मक निर्णय छथि। प्रणालीक निर्गत (output) केवल एक निवेश (input) क गुण नहि; सम्बन्धित चर (variables), प्रशिक्षण-वितरण (training distribution), मॉडल-सीमा (model constraints) आ वर्गीकरण-नियम (classification rules) मिलि परिणाम बनबैत अछि। मुदा कृत्रिम-बुद्धि संरचना यथार्थ नहि। गलत वर्गीकरण-रूपरेखा (taxonomy) सामाजिक श्रेणी विकृत करि सकैत अछि; मॉडल-वास्तु (model architecture) मानवीय मूल्य-निर्णयसँ मुक्त नहि। संरचना जाँचबाक संग स्रोत, पूर्वाग्रह (bias), त्रुटि आ उत्तरदायित्व (accountability) सेहो जाँचल जाए। कानूनमे अधिकार, कर्तव्य, संस्था, प्रक्रिया आ अपील परस्पर जुड़ल संरचना बनबैत अछि। एक धारा पढ़ि पूरा न्यायिक प्रणाली बुझल नहि जा सकैत; तथापि ‘प्रणालीए ई करा देलक (system made it happen)’ कहि व्यक्तिगत जिम्मेदारी समाप्त नहि करब। सामाजिक विश्लेषणमे जाति, वर्ग, लिंग, भाषा, क्षेत्र आ शिक्षा एक-दोसरासँ परस्पर प्रभावकारी संरचना बनि सकैत अछि। अन्तर्सम्बद्ध पहिचान-विमर्श (intersectionality) बादक अध्यायसभमे एहि जटिलता केँ अलग भाषा दैत; संरचनात्मक विश्लेषण (structural analysis) प्रारम्भिक सम्बन्ध-मानचित्र (relational map) दे सकैत अछि। भाषाविज्ञानमे स्वनिम (phoneme), रूपविज्ञान (morphology), वाक्यविन्यास (syntax), अर्थ-क्षेत्र (semantic field) आदि प्रणालीगत सम्बन्धद्वारा विश्लेषित कएल जाइत अछि। मुदा जीवित वक्ता, प्रयोग-विज्ञान (pragmatics), भाषा-परिवर्तन (language change) आ सामाजिक विविधता (social variation) संरचनात्मक मॉडलसँ बाहर नहि छोड़ल जाए। डिजिटल संजाल (network) मे एक गाँठ (node) क महत्व ओकर सम्बन्ध (connections), केन्द्रिकता (centrality), प्रवाह (flow) आ नियम (rules) पर निर्भर हो सकैत अछि। ई संरचनात्मक दृष्टिक समकालीन उदाहरण अछि, मुदा मानवीय संस्था संजाल-आलेख (network graph) मात्र नहि। इतिहासमे कर-व्यवस्था, अभिलेख, शिक्षा, धर्म-संस्था, व्यापार, परिवहन आ भाषा-प्रशासनक परस्पर सम्बन्ध बदललासँ सामाजिक जीवनमे दूरगामी परिवर्तन हो सकैत अछि। संरचना एतय कारणात्मक परिकल्पना (causal hypothesis) बनि सकैत अछि, स्वतः सिद्ध तथ्य नहि।
अध्याय-निष्कर्ष
संरचना तत्वसभक साधारण जोड़ नहि; नियमबद्ध सम्बन्ध, भेद, स्थान आ रूपान्तरणक प्रणाली अछि। संरचनात्मक दृष्टि एहि कारण पृथक् वस्तुसँ अधिक प्रणालीगत सम्बन्ध देखबैत अछि। संरचनावादक शक्ति समग्रता, सम्बन्धात्मकता, समकालिक संगठन आ रूपान्तरणक नियम स्पष्ट करबामे अछि। ओकर सीमा इतिहास, सक्रियता, सत्ता, शरीर, आकस्मिकता आ बाह्य यथार्थकेँ कम आँकबाक जोखिममे अछि। भारतीय पाणिनीय व्याकरण, भर्तृहरि, नव्य-न्याय वा प्रतीत्यसमुत्पादसँ समस्या-संवाद सम्भव अछि; ऐतिहासिक पहचान नहि। पाणिनि संरचनावादी (structuralist) नहि, स्फोट संरचनावाद (structuralism) नहि, नव्य-न्याय संरचनात्मक अर्थविज्ञान (structural semantics) नहि। समानान्तर दर्शन संरचनावादकेँ नियतिवाद रूपमे नहि अपनबैत। मूल सूत्र—‘संरचना अवसर आ बाधा बनबैत अछि; मनुष्यक सक्रियता संरचनाकेँ बदलि सेहो सकैत अछि।’ अध्यायक अन्तिम सूत्र—तत्व देखू, मुदा सम्बन्ध नहि भूलू; संरचना देखू, मुदा इतिहास आ व्यक्ति नहि मिटाउ; मॉडल बनाउ, मुदा प्रमाणक सामने ओकर संशोधन सम्भव राखू।
अध्याय-ग्रन्थसूची
• फर्डिनाँ द सस्यूर — ‘सामान्य भाषाविज्ञानक पाठ्यक्रम’ (Course in General Linguistics)। • क्लोद लेवी-स्ट्रॉस — ‘संरचनात्मक मानवविज्ञान’ (Structural Anthropology)। • क्लोद लेवी-स्ट्रॉस — ‘नातेदारीक प्राथमिक संरचना’ (The Elementary Structures of Kinship)। • जाँ पियाजे — ‘संरचनावाद’ (Structuralism)। • रोलाँ बार्थ — ‘संरचनात्मक क्रियाकलाप’ (The Structuralist Activity) तथा संकेत-विज्ञान सम्बन्धी चयनित निबन्ध। • टेरेन्स हॉक्स — ‘संरचनावाद आ संकेत-विज्ञान’ (Structuralism and Semiotics)। • पाणिनि — अष्टाध्यायी। • पतञ्जलि — महाभाष्य। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • गौतम — न्यायसूत्र। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • नागार्जुन — मूलमध्यमककारिका, निर्भरता-विमर्शक तुलनात्मक संदर्भ लेल। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।