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समस्या
मिथककेँ सामान्यतः कथा, देवकथा, उत्पत्ति-वृत्तान्त, धार्मिक स्मृति अथवा सांस्कृतिक आख्यान रूपमे पढ़ल जाइत अछि। क्लोद लेवी-स्ट्रॉस एहि परिचित पठनकेँ एक अलग प्रश्नसँ चुनौती दैत छथि—यदि मिथकक अनेक संस्करण एक-दोसरासँ कथानक, पात्र, क्रम आ विवरणमे अलग होइतहुँ किछु गहिर सम्बन्धात्मक प्रतिरूप दोहरबैत अछि, तँ मिथकक अर्थ केवल ओकर सतही कथासूत्रमे अछि की ओकर संरचनात्मक सम्बन्धमे? हुनकर पद्धति मिथककेँ पृथक् कथनसभक क्रम मात्र नहि, बल्कि सम्बन्धक बण्डल, द्वैध-विरोध, रूपान्तरण आ विरोधाभासक मध्यस्थता रूपमे पढ़बाक प्रयास करैत अछि। मिथकीय न्यूनतम इकाई (mytheme) स्वयं स्वतंत्र अर्थपूर्ण ‘शब्द’ नहि; ओकर विश्लेषणात्मक महत्व अन्य इकाइसभसँ सम्बन्धमे खुलैत अछि। एहि दृष्टिमे ‘प्रकृति/संस्कृति’, ‘कच्चा/पाकल’, ‘जीवन/मृत्यु’, ‘अपना/पराया’ जकाँ द्वैध-विरोध (binary oppositions) अनेक मिथकीय संरचनाक विश्लेषणात्मक औजार बनि सकैत अछि। मुदा सभ मिथककेँ जबरन दू विरोधमे काटि देब लेवी-स्ट्रॉसक पद्धतिक अनुचित सरलीकरण होयत। मिथकक संरचनात्मक विश्लेषण एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न खोलैत अछि—कथा बदलैत किएक अछि, मुदा किछु सम्बन्धात्मक तनाव टिकि किएक रहैत अछि? अलग संस्करण एक-दोसराक रूपान्तरण (transformation) रूपमे पढ़ल जा सकैत अछि की? आ मिथक सामाजिक विरोधाभासकेँ ‘समाधान’ नहि, बल्कि प्रतीकात्मक रूपेँ मध्यस्थित करैत अछि की? मुदा एहि पद्धतिक सीमा सेहो गंभीर अछि। इतिहास, अनुष्ठान, स्थानीय धार्मिक अनुभव, कथावाचकक सत्ता, लिंग, जाति, उपनिवेशवाद, स्मृति आ विशिष्ट राजनीतिक परिस्थिति संरचनात्मक मॉडलमे कम दृश्य भऽ सकैत अछि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—मिथकक संरचनात्मक पठनक वास्तविक शक्ति की, ओकर सीमा की, आ भारतीय/मिथिलाक आख्यानपर ओकरा कोना सावधानीसँ लागू कएल जाए?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे लेवी-स्ट्रॉस मिथककेँ कथा-सामग्रीक संग्रह नहि, सम्बन्धात्मक प्रणाली रूपमे पढ़ैत छथि। मिथकीय इकाइसभक अर्थ ओकरा अलग-अलग पढ़लासँ कम, परस्पर संयोजन, विरोध, पुनरावृत्ति आ रूपान्तरणमे अधिक स्पष्ट होइत अछि। मिथकीय न्यूनतम इकाई (mytheme) के अर्थ एक स्थिर शब्दार्थ नहि; ई कथाक संरचनात्मक सम्बन्धक विश्लेषणात्मक एकक अछि। अनेक संस्करणमे एहि सम्बन्धसभक पुनर्संयोजन मिथकक गहिर संरचना देखाबयक प्रयास करैत अछि। द्वैध-विरोध (binary opposition) संरचनात्मक विश्लेषणक उपयोगी औजार अछि, अन्तिम सत्य नहि। कच्चा/पाकल जकाँ विरोध सामाजिक वर्गीकरण, प्रकृति/संस्कृति सम्बन्ध आ रूपान्तरणक प्रश्न खोलि सकैत अछि; मुदा वास्तविक संस्कृति बहुधा बहुस्तरीय, असममित आ ऐतिहासिक होइत अछि। समानान्तर दर्शन लेवी-स्ट्रॉससँ सम्बन्ध, रूपान्तरण आ बहुविकल्पीय पाठक अनुशासन ग्रहण करैत अछि; मुदा मिथककेँ इतिहास वा सामाजिक यथार्थक प्रत्यक्ष दर्पण सेहो नहि मानैत, आ संरचनाकेँ विशिष्ट समुदायक जीवित अनुभवक स्थानापन्न नहि बनबैत।
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—मिथकक अर्थ केवल कालक्रमिक कथा-क्रममे नहि। घटनासभकेँ सम्बन्धक समूहमे पुनर्व्यवस्थित केलासँ एहन प्रतिरूप देखाइत अछि जे साधारण रेखीय पठनमे स्पष्ट नहि होइत। दोसर तर्क—मिथकीय न्यूनतम इकाई (mytheme) अकेला अर्थ नहि दैत। ओकर महत्व ‘कौन सम्बन्ध दोहराइत अछि?’, ‘कौन विरोधक संग जुड़ैत अछि?’, ‘कौन संस्करणमे कोना बदलैत अछि?’ प्रश्नसँ बनैत अछि। तेसर तर्क—मिथक विरोधाभासक बौद्धिक कार्य करि सकैत अछि। सामाजिक जीवनमे जे तनाव सीधे समाधानयोग्य नहि, मिथक ओकरा रूपक, पात्र, रूपान्तरण अथवा मध्यवर्ती श्रेणीद्वारा सोचबाक सम्भावना बनबैत अछि। चारिम तर्क—द्वैध-विरोध विश्लेषणक प्रवेश-द्वार अछि, न कि सभ मिथकक अन्तिम व्याकरण। प्रकृति/संस्कृति, कच्चा/पाकल, जीवन/मृत्यु, भूमि/जल जकाँ विरोध कखनो बहुस्तरीय मध्यवर्ती रूपसभ द्वारा जुड़ैत अछि। पाँचम तर्क—रूपान्तरण (transformation) मिथक-विश्लेषणक केन्द्रीय शक्ति अछि। एक कथा-रूप दोसर संस्करणमे पात्र बदलि, सम्बन्ध उलटि, घटना स्थानान्तरित कऽ वा विरोधक दिशा बदलि नव रूप ग्रहण करि सकैत अछि। छठम तर्क—‘मूल’ संस्करणक खोज हमेशा आवश्यक नहि। लेवी-स्ट्रॉस लेल मिथक अपन संस्करणसभक समूहमे जीवित रहि सकैत अछि; भिन्नतासभ संरचनात्मक विश्लेषणक सामग्री छथि, दूषण मात्र नहि। सातम तर्क—मिथक सामूहिक वर्गीकरणक प्रणाली खुलि सकैत अछि। खाद्य, पशु, विवाह, जंगल, गाँव, देवता, नातेदारी जकाँ क्षेत्रसभक सम्बन्ध सामाजिक विचारक रूपक बनि सकैत अछि। आठम तर्क—मिथककेँ केवल अतार्किक विश्वास (irrational belief) मानब कमजोर अछि। संरचनात्मक दृष्टि मिथकीय चिंतनमे वर्गीकरण, विरोध-संयोजन, सादृश्यात्मक तर्क (analogical reasoning) आ प्रतीकात्मक रूपान्तरण (symbolic transformation) क जटिल बुद्धि देखबैत अछि। नवम तर्क—लेवी-स्ट्रॉसक ‘जंगली मन’ (savage mind) सम्बन्धी परियोजना तथाकथित ‘आदिम’ समाजकेँ तर्कहीन मानयवला विकासवादी पूर्वाग्रहक आलोचना करैत अछि। वर्गीकरणक रूप अलग हो सकैत अछि; बौद्धिक क्षमता कम मानब उचित नहि। दसम तर्क—मिथकक संरचना व्यक्ति-लेखकक अभिप्राय सँ अधिक व्यापक हो सकैत अछि। कथावाचक हर सम्बन्ध सचेत रूपेँ ‘रचना (design)’ नहि करैत; सांस्कृतिक प्रतिरूप परम्परागत रूपान्तरणद्वारा टिकि सकैत अछि। एगारहम तर्क—एहि बिन्दुपर संरचनावादक सीमा शुरू होइत अछि। कथावाचक, श्रोता, अनुष्ठानिक अवसर, सामाजिक सत्ता, ऐतिहासिक संकट, स्त्री-पुरुष अनुभव, जातिगत स्थिति, उपनिवेशिक संदर्भ—ई सभ सम्बन्ध-मानचित्र (relation-map) क बाहर छूटि सकैत अछि। बारहम तर्क—संरचनात्मक विश्लेषण परिकल्पना (hypothesis) होयबाक चाही, उद्घाटन-सत्य (revelation) नहि। जँ चयनित सम्बन्ध मनमाना अछि, विरोध स्रोतसँ समर्थित नहि, वा अपवाद दाबि देल गेल, तँ मॉडल कमजोर अछि। प्रमाण, पाठ-विविधता आ वैकल्पिक पठन खुलल रहय।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे संरचनात्मक मिथक-विश्लेषण (structural myth analysis) कथाक जीवित धार्मिक आ भावात्मक अर्थकेँ अमूर्त सम्बन्ध (abstract relation) मे बदलि दैत अछि। भक्त, कथावाचक वा समुदाय जे अर्थ अनुभव करैत अछि, ओ आलेख (diagram) मे नष्ट भऽ सकैत अछि। दोसर पूर्वपक्ष इतिहाससँ अछि। मिथकक संस्करण अलग कालमे राजनीतिक, धार्मिक वा सामाजिक कारणसँ बदलि सकैत अछि; ओकरा केवल रूपान्तरण (transformation) कहलासँ वास्तविक इतिहास छूटि सकैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष सत्ता-समीक्षासँ अछि। मिथकीय विरोधसभ तटस्थ वर्गीकरण (neutral classification) नहि हो सकैत; किछु वर्गीकरण पदानुक्रम (hierarchy), लैंगिक असमानता (gender inequality), जातिगत बहिष्कार (caste exclusion) अथवा औपनिवेशिक निरूपण (colonial representation) सुदृढ़ करि सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष व्याख्याशास्त्र (hermeneutics) सँ अछि। मिथकक अर्थ पाठक, अनुष्ठान, परम्परा आ ऐतिहासिक ग्रहण (historical reception) सँ बदलैत अछि; स्थिर गहिर संरचना (fixed deep structure) अत्यधिक कठोर धारणा हो सकैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय तुलना पर अछि। रामायण, महाभारत, पुराण, लोककथा, व्रत-कथा, लोकगीत आ क्षेत्रीय आख्यानसभक अपने शास्त्रीय/अनुष्ठानिक/ऐतिहासिक संदर्भ अछि; ओकरा लेवी-स्ट्रॉसवादी द्वैध-सारिणी (Lévi-Straussian binary chart) मे घटाबयब उपनिवेशोत्तर रूपेँ सेहो समस्याग्रस्त हो सकैत अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—संरचनात्मक पठन पूर्ण व्याख्या नहि, एक विश्लेषणात्मक स्तर हो। धार्मिक अनुभूति, प्रदर्शन, इतिहास, काव्यशास्त्र आ सामाजिक अर्थक संग सह-अस्तित्वमे राखल जाए। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—रूपान्तरणक मानचित्रक संग कालक्रम (chronology) जोड़ू। कौन संस्करण पुरान/नव, कौन स्रोत, कौन संस्था, कौन ऐतिहासिक परिस्थिति—ई साक्ष्य संरचनात्मक सम्बन्ध (structural relation)क साथि जाँचू। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—वर्गीकरणक सत्ता-प्रभाव स्पष्ट रूपेँ जाँचल जाए। ‘विरोध’ केवल मानसिक प्रतिरूप (pattern) नहि; सामाजिक पदानुक्रम (hierarchy) बनाबय वा चुनौती देबयक साधन सेहो हो सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—गहिर संरचना (deep structure) केँ परिकल्पना (hypothesis) रूपमे सीमित करू। अलग व्याख्या, प्रदर्शन, पाठकीय अर्थ आ ऐतिहासिक ग्रहण (reception) मॉडलक बाहरी शोर (noise) नहि, अतिरिक्त प्रमाण छथि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय सामग्री पर पद्धति आयात नहि, प्रश्न आयात करू: कौन सम्बन्ध दोहराइत? कौन विरोध रूपान्तरित होइत? फेर भारतीय स्रोतक अपने विधा (genre), धर्ममीमांसक सन्दर्भ (theology), अनुष्ठान (ritual), भाषा, कालक्रम (chronology) आ क्षेत्रीय प्रसंग (regional context) द्वारा उत्तर सीमित करू।
भारतीय संवाद
भारतीय मिथकीय साहित्य अत्यन्त बहुस्तरीय अछि—वैदिक आख्यान, महाकाव्य, पुराण, बौद्ध-जैन कथा, क्षेत्रीय आख्यान, लोककथा, व्रत-कथा, प्रदर्शन-परम्परा। एहि विविधताकेँ एक ‘भारतीय मिथकीय संरचना (Indian mythology structure)’ मे समेटलासँ पहिने स्रोत-प्रकार अलग करब आवश्यक अछि। पुराणिक वा महाकाव्यीय आख्यानक अनेक संस्करण संरचनात्मक रूपान्तरण (structural transformation) क प्रश्न खोलि सकैत अछि, मुदा पाठ-इतिहास, सम्प्रदाय, भाषान्तर, प्रदर्शन आ राजनीतिक संदर्भक अध्ययन अनिवार्य रहत। भारतीय दार्शनिक परम्पराक द्वन्द्व—धर्म/अधर्म, ज्ञान/अज्ञान, शाश्वत/क्षणिक आदि—के सीधे लेवी-स्ट्रॉसवादी द्वैध-विरोध (Lévi-Straussian binary opposition) मानब अनुचित; शास्त्रीय तर्क, तत्त्वमीमांसक प्रतिबद्धता (metaphysical commitment) आ मोक्ष-सापेक्ष लक्ष्य (soteriological aim) अलग छथि। मीमांसा आख्यानकेँ विधि, अर्थवाद, प्रसंग आ शास्त्रीय प्रयोजनसँ पढ़ैत अछि; पुराणिक व्याख्या धर्ममीमांसा/अनुष्ठान-इतिहास (theology/ritual history) सँ जुड़ैत अछि; काव्यशास्त्र रस, ध्वनि, अलंकार, औचित्य जकाँ अलग अर्थ-आयाम दैत अछि। संरचनावाद (Structuralism) एहि सभक विकल्प नहि। बौद्ध जातक अथवा जैन कथा-परम्पराक संरचनात्मक तुलना सम्भव हो सकैत अछि, मुदा नैतिक, कर्मवादी आ संप्रदायगत प्रयोजन जाँचने बिना सम्बन्ध-प्रतिरूप (relation-pattern) अधूरा रहत। भारतीय संवादक निष्कर्ष—मिथकक संरचना उपयोगी प्रश्न अछि; भारतीय आख्यानक अर्थ केवल संरचना नहि।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि क्षेत्रीय आख्यान, लोकगीत, विवाह-गीत, व्रत-कथा, देवी-देवता सम्बन्धी कथा, पाण्डुलिपि आ साहित्यिक पुनर्लेखनसभकेँ एकहि स्तरक ‘मिथकीय आँकड़ा (myth data)’ नहि मानैत। प्रत्येक स्रोतक विधा, वक्ता, अवसर, तिथि आ सामाजिक स्थान अलग जाँचल जाए। संरचनात्मक प्रश्न उपयोगी हो सकैत अछि—कौन नातेदारी-विरोध दोहराइत? घर/वन, मायका/ससुराल, भूमि/जल, लोक/शास्त्र, स्त्री/पुरुष, स्थानीय/राजकीय जकाँ श्रेणियाँ (categories) कखन आ कोना कथामे बदलैत? मुदा विरोध स्रोत-समर्थित (source-derived) होय, विश्लेषक-आरोपित (analyst-imposed) नहि। लोकगीत आ स्त्रीक मौखिक परम्परा संरचनात्मक अभिलेख (structural archive) मे अतिरिक्त ‘रूपान्तर (variant)’ मात्र नहि। ई सामाजिक अनुभव, भाव, श्रम (labour), नातेदारी (kinship) आ लैंगिक दृष्टिकोण (gendered perspective) केर स्वतंत्र प्रमाण हो सकैत अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि अभिलेखीय मौन (archive silence) पर सेहो सावधान अछि। जे मौखिक रूप लिखल नहि गेल, ओकर अभावकेँ अनस्तित्व नहि मानू; मुदा अनुमानक आधारपर मनगढ़न्त कथा सेहो नहि बनाउ। बहुप्रमाणीय विवेकवाद मिथक-अध्ययनमे पाठ, मौखिक संस्करण, प्रदर्शन, अभिलेख, पुरातत्त्व, सामाजिक इतिहास, भाषाविज्ञान आ स्थानीय स्मृतिक अलग प्रमाण-भार निर्धारित करैत अछि। अन्तिम नियम—संरचना जँ उपयोगी प्रतिरूप देखबैत अछि, स्वीकारू; जँ स्थानीय इतिहास वा अनुभव ओकरा तोड़ैत अछि, मॉडल संशोधित करू। मिथिला सिद्धान्तक उदाहरण बनबाक लेल नहि; सिद्धान्त मिथिलाक सामग्रीक सामने परीक्षित होयबाक लेल अछि।
समकालीन प्रयोग
चलचित्र, धारावाहिक, कॉमिक, खेल आ डिजिटल कथा पुरान मिथकीय प्रतिरूपकेँ नूतन पात्र, समय आ माध्यममे रूपान्तरित करैत अछि। संरचनात्मक रूपान्तरण (structural transformation) केर प्रश्न एतय उपयोगी अछि—कौन सम्बन्ध टिकैत, कौन उलटैत, कौन नूतन सामाजिक तनाव जोड़ल जाइत? राजनीतिक विमर्शमे राष्ट्र, शत्रु, शहीद, स्वर्णयुग, पतन, पुनर्जन्म जकाँ मिथकीय साँचा (mythic templates) सार्वजनिक कथा बनि सकैत अछि। संरचनात्मक विश्लेषण दोहराइत विरोध (repeating opposition) खोलि सकैत अछि; मुदा तथ्य-जाँच आ प्रचार-विश्लेषण (propaganda analysis) अलग अनिवार्य अछि। कृत्रिम बुद्धि (AI) कहानी-उत्पादन प्रणाली प्रशिक्षण-आँकड़ा (training data) सँ आवर्ती आख्यान-प्रतिरूप (recurring narrative patterns) सीखि सकैत अछि। ई संरचनात्मक समानता उत्पन्न करि सकैत अछि; मुदा सांस्कृतिक अर्थ, अनुष्ठानिक प्रामाण्य (ritual authority) वा ऐतिहासिक सत्य (historical truth) स्वतः नहि बनबैत। सामाजिक माध्यममे मीम-रूप (meme formats) एक संरचना (structure) भीतर पात्र/वाक्य बदलि नूतन अर्थ उत्पन्न करैत अछि। ई रूपान्तरण (transformation) क रोचक आधुनिक उदाहरण अछि, मुदा मिथकक मानवविज्ञान (anthropology) संग पूर्ण समानता नहि। शिक्षामे अलग संस्करणक तुलना (comparison) विद्यार्थीकें कथाक ‘सही संस्करण’ खोजबाक बदला पाठ-इतिहास, सम्बन्ध (relation), रूपान्तरण (transformation) आ प्रसंग (context) जाँचबाक अभ्यास दे सकैत अछि। डिजिटल मानविकी (digital humanities) मे अभिप्रेरक-सूचीकरण (motif indexing), संजाल-विश्लेषण (network analysis) आ रूपान्तर-तुलना (variant comparison) संरचनात्मक प्रश्नकेँ संगणकीय सहायता (computational support) दऽ सकैत अछि; यन्त्र-पहिचानल प्रतिरूप (machine-detected pattern) केँ विद्वत्तापूर्ण व्याख्या (scholarly interpretation) आ स्रोत-समीक्षा (source criticism) सँ सत्यापित करब आवश्यक अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
लेवी-स्ट्रॉस मिथककेँ सम्बन्धात्मक संरचना रूपमे पढ़बाक शक्तिशाली पद्धति विकसित करैत छथि। मिथकीय इकाई, द्वैध-विरोध, पुनरावृत्ति आ रूपान्तरण द्वारा सतही कथानकक नीचे सम्बन्ध-प्रतिरूप (relation-pattern) जाँचल जाइत अछि। मिथकक अनेक संस्करण ‘दूषण’ नहि, विश्लेषणक सामग्री हो सकैत अछि; रूपान्तरणक माध्यमेँ विरोधाभासक अलग रूप देखल जा सकैत अछि। मुदा गहिर संरचना (deep structure) इतिहास, अनुष्ठान (ritual), विधा (genre), सत्ता, भाव (emotion), लिंग (gender), जाति (caste), औपनिवेशिकता (coloniality) आ स्थानीय सक्रियता (local agency) क स्थानापन्न नहि। संरचनात्मक पठन पूर्ण व्याख्या नहि, एक विश्लेषणात्मक स्तर अछि। भारतीय आ मिथिलाक आख्यानपर पद्धति लागू करैत काल मूल स्रोतक भाषा, तिथि, सम्प्रदाय, प्रदर्शन, सामाजिक स्थान आ ऐतिहासिक प्रसंग सुरक्षित रहय। ‘भारतीय मिथक = द्वैध संरचना (Indian myth = binary structure)’ जकाँ निष्कर्ष अस्वीकार्य सरलीकरण होयत। समानान्तर सूत्र—‘प्रतिरूप खोजू, मुदा प्रतिरूप बनाउ नहि; संस्करण तुलना करू, मुदा इतिहास नहि मिटाउ; संरचना देखू, मुदा जीवित समुदायक अर्थक ऊपर ओकर अधिकार नहि मानू।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• क्लोद लेवी-स्ट्रॉस — ‘मिथकक संरचनात्मक अध्ययन’ (The Structural Study of Myth)। • क्लोद लेवी-स्ट्रॉस — ‘संरचनात्मक मानवविज्ञान’ (Structural Anthropology)। • क्लोद लेवी-स्ट्रॉस — ‘नातेदारीक प्राथमिक संरचना’ (The Elementary Structures of Kinship)। • क्लोद लेवी-स्ट्रॉस — ‘जंगली मन’ (The Savage Mind)। • क्लोद लेवी-स्ट्रॉस — ‘कच्चा आ पाकल’ (The Raw and the Cooked)। • क्लोद लेवी-स्ट्रॉस — ‘मिथक आ अर्थ’ (Myth and Meaning)। • एडमंड लीच — ‘क्लोद लेवी-स्ट्रॉस’ (Claude Lévi-Strauss)। • एडमंड लीच — ‘संस्कृति आ संचार’ (Culture and Communication: The Logic by Which Symbols Are Connected)। • व्यास-परम्परा — महाभारत, पाठ-विविधता आ आख्यानक भारतीय संदर्भ लेल। • वाल्मीकि-परम्परा — रामायण, पाठ-विविधता आ पुनर्पाठक भारतीय संदर्भ लेल। • पुराणिक साहित्य — मिथकीय संस्करण, वंश, देवकथा आ अनुष्ठानिक प्रसंगक तुलनात्मक स्रोत। • बी. के. मतिलाल — ‘महाभारतमे नैतिक दुविधा’ सम्बन्धी चयनित निबन्ध। • ए. के. रामानुजन — ‘तीन सय रामायण: पाँच उदाहरण आ अनुवादपर तीन विचार’ (Three Hundred Ramayanas: Five Examples and Three Thoughts on Translation)।