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समस्या
संरचनावादक सबसे कठिन दार्शनिक प्रश्नसभमे एक अछि—यदि भाषा, नातेदारी, संस्था, वर्गीकरण, सामाजिक नियम आ सांस्कृतिक संकेत पहिनेसँ व्यक्ति केँ उपलब्ध ढाँचा प्रदान करैत अछि, तँ व्यक्तिक स्वतन्त्रता, रचनात्मकता आ नैतिक जिम्मेदारीक स्थान कहाँ अछि? व्यक्ति संरचनाक भीतर केवल ‘स्थान’ अछि की स्वयं निर्णय लऽ सकयवला सक्रिय कर्ता? सस्यूरक भाषा-प्रणाली व्यक्तिक वाणी सँ व्यापक सामाजिक व्यवस्था अछि; लेवी-स्ट्रॉस नातेदारी आ मिथकमे व्यक्ति-सचेतनतासँ परे सम्बन्धात्मक प्रतिरूप खोजैत छथि। एहि प्रकार संरचनावाद दार्शनिक केन्द्रकेँ ‘स्वायत्त चेतन व्यक्ति’ सँ ‘पूर्वस्थित सम्बन्धक व्यवस्था’ दिस मोड़ैत अछि। मुदा एहि मोड़सँ अतिशय निष्कर्ष निकलि सकैत अछि—मानो व्यक्ति केवल भाषा, जाति, लिंग, परिवार, संस्था अथवा संस्कृति द्वारा निर्मित कठपुतली हो। एहन संरचनात्मक नियतिवाद व्यक्तिगत जिम्मेदारी, प्रतिरोध, नवाचार, शिक्षा, सामाजिक आन्दोलन आ संस्थागत परिवर्तन बुझबामे असमर्थ हो सकैत अछि। उलटा छोरपर पूर्ण स्वायत्त व्यक्तिवाद सेहो कठिन अछि। कोनो व्यक्ति भाषा बिना विचार व्यक्त नहि करैत, सामाजिक नियम बिना भूमिका ग्रहण नहि करैत, इतिहास बिना पहचान नहि बनबैत, संस्था बिना अनेक अधिकार/कर्तव्य प्राप्त नहि करैत। व्यक्ति पूर्ण शून्य सँ स्वयंकेँ निर्माण नहि करैत। एहि अध्यायक समस्या तेँ ई अछि—संरचना आ व्यक्तिक सम्बन्धकेँ नियतिवाद आ परम व्यक्तिवादक बीच कोना बुझी? व्यक्ति संरचना द्वारा गठित होइतहुँ ओकरा बदलि कोना सकैत अछि? आ सामाजिक संरचना जिम्मेदारीकेँ सीमित करैत अछि की समाप्त?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे संरचना आ व्यक्ति परस्पर विरोधी पदार्थ नहि, बल्कि परस्पर निर्भर विश्लेषणात्मक स्तर छथि। संरचना व्यक्तिक सम्भावना, भाषा, भूमिका, संसाधन, बाधा आ अपेक्षा बनबैत अछि; व्यक्ति अपन क्रिया, पुनरावृत्ति, विचलन, प्रतिरोध आ संगठनद्वारा संरचनाकेँ टिकबैत अथवा बदलैत अछि। व्यक्ति संरचना सँ बाहर जन्मैत नहि; मुदा संरचना व्यक्तिक प्रत्येक निर्णय पूर्वनिर्धारित सेहो नहि करैत। समान संरचनात्मक स्थितिमे अलग व्यक्ति अलग प्रतिक्रिया दे सकैत छथि, आ सामूहिक क्रिया स्वयं नियम बदलि सकैत अछि। नैतिक जिम्मेदारी एहि कारण द्विस्तरीय होयत: व्यक्तिक क्रियाक जिम्मेदारी तथा ओहि संस्थागत/संरचनात्मक व्यवस्थाक जिम्मेदारी जे विकल्प असमान बनबैत, सूचना सीमित करैत, दबाव उत्पन्न करैत अथवा अवसर वितरित करैत अछि। समानान्तर सूत्र—‘संरचना अवसर आ बाधा बनबैत अछि; व्यक्ति क्रिया करैत अछि; क्रियाक पुनरावृत्ति संरचनाकेँ पुनरुत्पादित अथवा परिवर्तित करैत अछि।’
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—व्यक्ति भाषा-प्रणाली सँ बाहर नहि। नाम, सर्वनाम, भूमिका, मूल्य, पहचान आ सार्वजनिक तर्क सभ सामाजिक भाषिक संसाधन द्वारा सम्भव होइत अछि। मुदा व्यक्ति एहि संसाधनक नव प्रयोग करि भाषा बदलि सेहो सकैत अछि। दोसर तर्क—संस्था विकल्पक वितरण करैत अछि। एक विद्यालय, न्यायालय, परिवार, बाजार वा राज्य केवल व्यक्तिसभक जोड़ नहि; नियम, पद, अधिकार, प्रक्रिया आ संसाधन-वितरण व्यक्तिगत क्रियाक सम्भावना बदलैत अछि। तेसर तर्क—संरचना बाधा मात्र नहि, क्षमता सेहो दैत अछि। व्याकरण बिना बोलब कठिन; कानून बिना किछु अधिकार असुरक्षित; संस्था बिना सामूहिक समन्वय कठिन। नियम व्यक्तिक क्रिया सीमित करैतहुँ क्रियाक सम्भावना सेहो बनबैत अछि। चारिम तर्क—संरचना ‘बाहर’ मात्र नहि। दीर्घ सामाजिक अभ्यास आदत, अपेक्षा, स्वाद, शरीर-भंगिमा, भाषा-शैली आ सहज निर्णयमे अन्तर्निहित भऽ सकैत अछि। पियरे बुरदियूक अभ्यास-स्वभाव (habitus) एहि प्रकारक ऐतिहासिक शरीरबद्धता बुझबाक एक प्रभावशाली आधुनिक प्रयास अछि। पाँचम तर्क—मुदा अन्तर्निहित संरचना अपरिवर्तनीय नहि। नूतन शिक्षा, प्रवास, संघर्ष, अन्तरसमुदायिक सम्पर्क, तकनीक, कानून, राजनीतिक आन्दोलन वा व्यक्तिगत अनुभव पुरान आदत बदलि सकैत अछि। छठम तर्क—एन्थनी गिडेन्सक संरचनाक द्वैत (duality of structure) उपयोगी मध्यवर्ती विचार अछि: सामाजिक नियम आ संसाधन मानव क्रियाक माध्यम सेहो छथि आ मानव क्रियाद्वारा पुनरुत्पादित परिणाम सेहो। समानान्तर दर्शन एहि विचारकेँ समस्या-संवाद रूपमे ग्रहण करैत अछि, अन्तिम सिद्धान्त रूपमे नहि। सातम तर्क—जिम्मेदारी संरचनात्मक कारणक कारण समाप्त नहि होइत। गरीबी, दबाव, भेदभाव अथवा संस्थागत बाधा व्यक्तिक विकल्प सीमित करि सकैत अछि; नैतिक मूल्यांकनमे परिस्थिति महत्त्वपूर्ण अछि। मुदा ‘संरचना कारण छल’ कहि सभ व्यक्तिगत क्रियाक जवाबदेही शून्य नहि कएल जा सकैत। आठम तर्क—उलटा रूपमे व्यक्तिगत दोषारोपण द्वारा संरचनात्मक समस्या छिपाओल नहि जाए। यदि समान संस्था बारम्बार समान प्रकारक अन्याय उत्पन्न करैत अछि, तँ केवल एक कर्मचारी अथवा एक नागरिकक चरित्रक दोष पर्याप्त व्याख्या नहि। नवम तर्क—पहचान संरचनात्मक श्रेणी आ व्यक्तिगत अनुभवक संयुक्त क्षेत्र अछि। जाति, वर्ग, लिंग, भाषा, धर्म, क्षेत्र, पेशा आदि सामाजिक श्रेणी अनुभव प्रभावित करैत अछि; मुदा व्यक्ति केँ एहि श्रेणीसभक योग मात्र मानब गरिमा-विरोधी हो सकैत अछि। दसम तर्क—संरचना पुनरावृत्ति द्वारा टिकैत अछि। नियम लिखल हो अथवा अनलिखल, जँ लोक रोज ओकरा पालन करैत अछि तँ संस्था स्थिर होइत अछि। सामूहिक रूपेँ अलग व्यवहार शुरू भेलासँ संरचनात्मक परिवर्तन सम्भव होइत अछि। एगारहम तर्क—प्रतिरोध सेहो संरचनासँ पूर्णतः बाहर नहि। विरोधक भाषा, संगठन, अधिकार-दाबी, सभा, याचिका, हड़ताल, मतदान, न्यायिक अपील—ई सभ उपलब्ध संस्थागत/सांस्कृतिक साधनक नव प्रयोग हो सकैत अछि।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कठोर संरचनावादी अछि—व्यक्तिक ‘स्वतन्त्रता’ स्वयं संरचनाद्वारा उत्पन्न विचार अछि। व्यक्ति जे विकल्प मानैत अछि, ओ भाषा, वर्गीकरण, संस्था आ सामाजिक नियम पहिनेसँ निर्धारित करैत अछि; अतः सक्रियता (agency) अतिशयोक्त अवधारणा अछि। दोसर पूर्वपक्ष अस्तित्ववादी/व्यक्तिवादी अछि—संरचना पर अधिक बल व्यक्ति केँ नैतिक रूपेँ मुक्त करि दैत अछि। अन्ततः निर्णय व्यक्ति लैत अछि; सामाजिक कारण जिम्मेदारीक स्थानापन्न नहि। तेसर पूर्वपक्ष सत्ता-समीक्षासँ अछि—‘संरचना आ व्यक्ति दुनू’ कहब कखनो सुविधाजनक समझौता (convenient compromise) बनि सकैत अछि जे वास्तविक असमानता मापे बिना दुनू पक्ष मानि लैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष मनोविज्ञानसँ अछि—संरचनात्मक सिद्धान्त व्यक्तिगत संज्ञान (individual cognition), भाव (emotion), आघात (trauma), व्यक्तित्व (personality) आ विकासगत भिन्नता (developmental differences) पर्याप्त नहि समेटैत। पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय सामाजिक इतिहाससँ अछि—आधुनिक सक्रियता/संरचना (agency/structure) भाषा भारतीय जाति, परिवार, धर्म, ग्राम, राज्य वा पंजी-परम्परापर सीधे थोपलासँ स्थानीय श्रेणी आ कालगत अन्तर मिटि सकैत अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—यदि संरचना पूर्ण निर्धारक होइत, तँ समान नियमक भीतर भिन्न व्यवहार, नवाचार, विचलन, विद्रोह आ परिवर्तन बुझाब कठिन होइत। संरचना सम्भावनात्मक सीमा बनबैत अछि, एकरेखीय भविष्यवाणी नहि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—व्यक्तिगत जिम्मेदारी स्वीकारित रहय, मुदा विकल्पक वास्तविक परिस्थिति जाँचल जाए। दबाव/बलप्रयोग (coercion), सूचना (information), संसाधन (resource), विधिक स्थिति (legal status), सामाजिक दण्ड/मान्यता (social sanction) आ असुरक्षा (vulnerability) नैतिक जिम्मेदारीक डिग्री प्रभावित करि सकैत अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—‘दुनू’ कहब पर्याप्त नहि; प्रमाण आवश्यक। कोन परिणाम व्यक्तिक निर्णयसँ कतेक जुड़ल, कोन संस्था-नियमसँ, कोन संसाधन-वितरणसँ—विशिष्ट अध्ययन द्वारा अलग करब पड़त। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—मनोवैज्ञानिक स्तरकेँ संरचनात्मक विश्लेषणमे विलीन नहि करब। मन, शरीर, भाव, स्मृति आ व्यक्तित्व स्वतंत्र व्याख्यात्मक स्तर (explanatory level) रखैत अछि; सामाजिक संरचना ओकर प्रसंग बदलैत अछि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय/मिथिला सामग्रीमे आधुनिक श्रेणी विश्लेषणात्मक सहायक (analytic aid) मात्र हो। मूल ऐतिहासिक पद, संस्था, कालक्रम (chronology), क्षेत्रीय विविधता (regional variation) आ स्रोत-साक्ष्य (source evidence) पहिने स्थापित कएल जाए।
भारतीय संवाद
भारतीय दर्शनमे ‘व्यक्ति’क आधुनिक liberal individual स्वरूप स्वतः उपस्थित मानब अनुचित। न्याय आत्मा, इच्छा, प्रयत्न, कर्म आ ज्ञानक प्रश्न अपन तत्त्वमीमांसक ढाँचामे उठबैत अछि; बौद्ध परम्परा स्थायी आत्मा पर प्रश्न उठबैत अछि; मीमांसा कर्ता, कर्तव्य आ विधिक सम्बन्ध अलग रूपमे विश्लेषित करैत अछि। बौद्ध अनात्मवादकेँ ‘व्यक्ति संरचनाक प्रभाव मात्र’ कहब गलत होयत। अनात्म, प्रतीत्यसमुत्पाद, स्कन्ध, कर्म आ मुक्ति सम्बन्धी प्रश्न आधुनिक संरचनात्मक व्यक्ति-सिद्धान्त (structural subject theory) सँ ऐतिहासिक आ दार्शनिक रूपेँ भिन्न छथि। न्यायीय आत्मवाद सेहो आधुनिक परम व्यक्तिवाद नहि। ज्ञान, इच्छा, प्रयत्न, शरीर, इन्द्रिय, मन, वस्तु आ कर्मक सम्बन्ध विस्तृत तत्त्वमीमांसक प्रणालीमे जुड़ल अछि। गीता, धर्मशास्त्र, महाभारत वा स्मृति-साहित्यक ‘भूमिका’ सम्बन्धी विचारकेँ आधुनिक सामाजिक भूमिका-सिद्धान्त (social role theory) क प्रत्यक्ष पूर्वरूप मानब अनुचित। प्रत्येक पाठक धर्म, कर्म, वर्ण, आश्रम, राजधर्म वा व्यक्तिगत दुविधाक अपना ऐतिहासिक संदर्भ अछि। आधुनिक भारतीय सामाजिक आलोचनामे डॉ. भीमराव आंबेडकर जाति केँ व्यक्तिगत पूर्वाग्रह मात्र नहि, संस्थागत–सामाजिक व्यवस्था रूपमे विश्लेषित करैत छथि। एहि कारण संरचना आ व्यक्तिगत गरिमा/अधिकारक तनाव पर आधुनिक भारतीय संवाद विशेष महत्त्वपूर्ण अछि। भारतीय संवादक निष्कर्ष—कर्तृत्व, जिम्मेदारी, सामाजिक स्थान आ निर्भरता प्रश्न प्राचीन आ आधुनिक दुनू परम्परामे उपस्थित छथि; ओकरा एकहि अवधारणात्मक शब्दावली (conceptual vocabulary) मे समतल नहि कएल जाए।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक सामाजिक इतिहास पढ़ैत काल व्यक्ति केँ केवल वंश, जाति, परिवार, ग्राम, राजकीय पद, पाण्डित्य-परम्परा अथवा धार्मिक पहचानक प्रतिनिधि नहि मानल जाए। संरचनात्मक स्थान महत्त्वपूर्ण, मुदा व्यक्तिगत लेखन, निर्णय, संघर्ष, प्रवास, पेशा, शिक्षा आ सम्बन्ध स्वतंत्र साक्ष्य दैत अछि। पंजी, वंशावली, अभिलेख, भूमि-दस्तावेज, न्यायिक कागज, साहित्य, लोकगीत आ मौखिक इतिहास सामाजिक संरचना सम्बन्धी अलग-अलग प्रकारक साक्ष्य दैत अछि। कोनो एक स्रोत सम्पूर्ण व्यक्ति अथवा समाजक पूर्ण प्रतिरूप नहि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि श्रेणीसभक कालगत परिवर्तन जाँचैत अछि। आधुनिक सामाजिक पद अथवा स्थिर जातिगत वर्गीकरणकेँ मध्यकाल अथवा प्राचीन कालपर बिना स्रोत स्वतः आरोपित नहि करू। मैथिली भाषिक संरचना व्यक्ति केँ उपलब्ध अभिव्यक्ति दैत अछि; मुदा लेखक, कवि, नाटककार, लोकगायक आ डिजिटल उपयोगकर्ता नूतन रूप, शब्द, शैली आ विधा बना कऽ भाषाकेँ बदलैत छथि। गरिमा-आधारित नैतिकता एहि अध्यायक निर्णायक सीमा अछि—पहिचानकेँ देखू; व्यक्तिकेँ पहिचानमे कैद नहि करू। सामाजिक स्थान विश्लेषणक साक्ष्य अछि, व्यक्ति केर सम्पूर्ण नैतिक मूल्य नहि। बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्र संरचनात्मक शक्ति विभाजित करबाक प्रयास अछि। परिवार, समुदाय, राज्य, बाजार, धर्म-संस्था, विद्यालय, मंच, अल्गोरिदम—ककरो एक केन्द्र व्यक्तिक सभ विकल्प नियंत्रित नहि करय। आत्मसमीक्षा—यदि व्यक्तिगत साक्ष्य संरचनात्मक सामान्यीकरणक विरोध करैत अछि, अपवाद कहि दाबू नहि; जाँचू कि मॉडल अत्यधिक कठोर अछि की स्रोत विशिष्ट। संरचना परिकल्पना (hypothesis) अछि, व्यक्ति-साक्ष्य (evidence) केँ बाधित करबाक नियम नहि।
समकालीन प्रयोग
कृत्रिम बुद्धि (AI) आ कलनविधीय निर्णय-प्रणाली (algorithmic decision systems) मे व्यक्ति अक्सर प्रोफ़ाइल (profile), श्रेणी (category), अंक (score) वा जोखिम-वर्ग (risk class) रूपमे प्रस्तुत होइत अछि। संरचनात्मक मॉडल उपयोगी हो सकैत अछि, मुदा व्यक्ति केँ आँकड़ा-बिन्दु (data-point) मात्र मानलासँ प्रसंग (context), व्याख्या (explanation) आ अपील (appeal) क अधिकार कमजोर भऽ सकैत अछि। नियुक्ति प्रणालीमे यदि ऐतिहासिक आँकड़ा (historical data) पुरान असमानता वहन करैत अछि, तँ ‘तटस्थ कलनविधि (neutral algorithm)’ ओहि संरचना (structure) केँ पुनरुत्पादित करि सकैत अछि। एतय व्यक्तिगत पूर्वाग्रह (bias) सँ अधिक संस्थागत रचना (institutional design), आँकड़ा-चयन (data selection) आ मूल्यांकन-नियम (evaluation rule) जाँचल जाए। शिक्षामे छात्रक उपलब्धि केवल ‘मेहनत’ अथवा ‘प्रतिभा’ सँ नहि, विद्यालय-संसाधन, भाषा, घरक आर्थिक स्थिति, शिक्षक-अपेक्षा, पहुँच आ सामाजिक वातावरणसँ प्रभावित हो सकैत अछि। मुदा संरचनात्मक व्याख्या (structural explanation) छात्रक सक्रियता (agency) केँ नष्ट नहि करय। कानूनमे व्यक्तिगत अपराध आ संरचनात्मक अन्याय (structural injustice) अलग स्तरक प्रश्न छथि। एक व्यक्ति अपराध लेल उत्तरदायी हो सकैत अछि; साथे पुलिस-व्यवस्था (policing), विधिक पहुँच (legal access), गरीबी (poverty) अथवा भेदभाव (discrimination) जकाँ संरचनात्मक कारक (structural factors) न्यायिक परिणाम प्रभावित करि सकैत अछि। स्वास्थ्य नीति मे व्यक्तिगत जीवनशैली-सुझाव (lifestyle recommendation) उपयोगी, मुदा स्वच्छ जल (clean water), प्रदूषण (pollution), रोजगार-परिस्थिति (employment conditions), स्वास्थ्यसेवा-पहुँच (healthcare access) आ पोषण-उपलब्धता (nutrition availability) जकाँ संरचना नजरअन्दाज कएलासँ जिम्मेदारी गलत रूपेँ व्यक्तिक माथ पर पड़ि सकैत अछि। सामाजिक माध्यममे उपयोगकर्ता-चयन (user choice), मंच-वास्तु (platform architecture), अनुशंसा-प्रणाली (recommendation system), सूचना-रचना (notification design) आ संजाल-प्रभाव (network effects) द्वारा आकार पबैत अछि। उपयोगकर्ता स्वतन्त्र छथि, मुदा चयन-वास्तु (choice architecture) निष्पक्ष खाली पृष्ठ नहि। राजनीतिक लोकतन्त्रमे मतदाता व्यक्तिगत निर्णय लैत छथि; साथे माध्यम-प्रणाली (media system), चुनाव-अर्थपोषण (campaign finance), निर्वाचन-क्षेत्र रचना (constituency design), दल-संगठन (party organization) आ सूचना-परिवेश (information environment) विकल्पक संरचना बनबैत अछि। इतिहासलेखनमे ‘महान व्यक्ति’ आ ‘संरचनात्मक कारण’क द्वैत छोड़ि, व्यक्ति निर्णयक प्रभाव आ दीर्घकालिक संस्था/अर्थव्यवस्था/ज्ञान-संरचनाक संयुक्त विश्लेषण अधिक उचित हो सकैत अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
संरचना आ व्यक्ति विरोधी पदार्थ नहि; व्यक्ति संरचनात्मक जगतमे जन्मैत, भाषा सीखैत, भूमिका ग्रहण करैत आ संसाधन/बाधाक बीच क्रिया करैत अछि। कठोर संरचनावाद व्यक्तिक सक्रियता, नवाचार आ जिम्मेदारी कम आँकैत अछि; कठोर व्यक्तिवाद इतिहास, संस्था, असमानता आ उपलब्ध विकल्पक संरचना कम आँकैत अछि। समानान्तर दर्शन संरचनाकेँ अवसर–बाधा, व्यक्ति केँ गरिमायुक्त कर्ता, आ सामाजिक परिवर्तनकेँ पुनरावृत्ति–विचलन–सामूहिक क्रियाक परिणाम रूपमे पढ़ैत अछि। भारतीय दर्शनक आत्मा, अनात्मा, कर्ता, कर्म वा सामाजिक भूमिका सम्बन्धी विचार आधुनिक सक्रियता/संरचना विवाद (agency/structure debate) क पूर्वरूप नहि; समस्या-संवाद मात्र सम्भव अछि। मिथिलाक सामाजिक इतिहासमे व्यक्ति केँ श्रेणीमे कैद नहि करब, आ संरचनाकेँ व्यक्तिगत कथा सँ अदृश्य सेहो नहि करब—दुनू स्तरक प्रमाण आवश्यक अछि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘संरचना अवसर आ बाधा बनबैत अछि; मनुष्यक सक्रियता संरचनाकेँ बदलि सेहो सकैत अछि। पहिचानकेँ देखू; व्यक्तिकेँ पहिचानमे कैद नहि करू।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• क्लोद लेवी-स्ट्रॉस — ‘संरचनात्मक मानवविज्ञान’ (Structural Anthropology)। • जाँ पियाजे — ‘संरचनावाद’ (Structuralism)। • पियरे बुरदियू — ‘अभ्यास-सिद्धान्तक रूपरेखा’ (Outline of a Theory of Practice)। • पियरे बुरदियू — ‘अभ्यासक तर्क’ (The Logic of Practice)। • एन्थनी गिडेन्स — ‘समाजक गठन’ (The Constitution of Society)। • मार्शल सालिन्स — ‘संस्कृति आ व्यावहारिक विवेक’ (Culture and Practical Reason)। • डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर — ‘जातिक विनाश’ (Annihilation of Caste)। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • नागार्जुन — मूलमध्यमककारिका। • वसुबन्धु — अभिधर्मकोशभाष्य। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • बी. के. मतिलाल — ‘महाभारतमे नैतिक दुविधा’ (Moral Dilemmas in the Mahābhārata)। • जोनार्डन गणेरी — ‘आत्मक छिपायल कला’ (The Concealed Art of the Soul)।