समस्या भारतीय भाषिक दर्शनक अनेक परम्परामे नियम, सम्बन्ध, वाक्य, वर्ग, तात्पर्य, निषेध, शब्दशक्ति आ ज्ञानोत्पत्तिक प्रश्न अत्यन्त विकसित रूपमे उपस्थित छथि। एहि कारण आधुनिक संरचनावादक बाद पाठककेँ सहज आकर्षण होइत अछि—की पाणिनीय व्याकरण, भर्तृहरिक वाक्य-दर्शन, मीमांसा, न्याय–नव्य-न्याय अथवा बौद्ध अपोह वास्तवमे कोनो भारतीय संरचनावाद छल? एहि प्रश्नक सरल “हाँ” ऐतिहासिक रूपेँ भ्रामक अछि। पाणिनि नियमबद्ध रूप-निर्माणक अत्यन्त सूक्ष्म व्याकरण प्रस्तुत करैत छथि; भर्तृहरि भाषिक बोधक समग्रता आ वाक्यक प्राथमिकता प्रश्नमे आनैत छथि; मीमांसा शब्द–वाक्य–तात्पर्य–विधिक सम्बन्ध खोलैत अछि; न्याय शब्द–पदार्थ–जाति–वक्ता–प्रमाणक यथार्थवादी संरचना बनबैत अछि; बौद्ध अपोह वर्गीय अर्थक नकारात्मक सीमांकन प्रस्तुत करैत अछि। ई सभ एक-दोसरासँ सेहो समान नहि। आधुनिक संरचनावाद सस्यूरक संकेतक–संकेतित, भाषिक मूल्य, भेद आ प्रणालीगत सम्बन्धसँ विकसित होइत अछि। भारतीय परम्परासभक ऐतिहासिक उत्पत्ति, दार्शनिक लक्ष्य, तत्त्वमीमांसा आ प्रमाण-व्यवस्था एकदम अलग अछि। अतः समानता देखबाक पहिले भिन्नता सुरक्षित करब आवश्यक अछि। तथापि तुलना निरर्थक नहि। यदि प्रश्न ई राखी—“तत्वक अर्थ सम्बन्धसँ कोना बनैत अछि?”, “नियम प्रणाली कोना उत्पन्न करैत अछि?”, “वाक्य भागसभक जोड़ मात्र अछि की अधिक?”, “वर्ग भेदसँ बनैत अछि की सकारात्मक सार्वभौमसँ?”, “प्रसंग अर्थ बदलैत अछि की?”—तँ स्वतंत्र परम्परासभक बीच फलदायी समस्या-संवाद सम्भव अछि। एहि अध्यायक समस्या तेँ ई अछि—भारतीय भाषिक परम्परासभमे संरचनात्मक प्रश्नक वास्तविक रूप की? आधुनिक संरचनावादसँ तुलना कतेक धरि उचित? आ समानान्तर दर्शन एहि विविध परम्परासँ कोन पद्धतिगत शिक्षा ग्रहण करि सकैत अछि बिना “भारतमे सभ पहिनेसँ छल” प्रकारक पूर्वगामिता-दाबी कएने? मूल प्रतिपादन एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे भारतीय भाषिक परम्परासभमे “संरचना” एक साझा सिद्धान्त रूपमे नहि, बल्कि अलग-अलग प्रश्न-रूपमे उपस्थित अछि—रूप-निर्माणक नियम, वाक्यीय समग्रता, पदार्थीय सम्बन्ध, वाक्यार्थक शर्त, वर्गीय सीमांकन, प्रमाणिक संप्रेषण आ अवधारणात्मक अवच्छेदन। पाणिनीय प्रणाली नियमक उत्पादक अनुशासन देखबैत अछि; भर्तृहरि भाषिक एकता पर बल दैत छथि; मीमांसा वाक्यार्थक पारस्परिक अपेक्षा आ तात्पर्य स्पष्ट करैत अछि; न्याय–नव्य-न्याय सम्बन्धक प्रकार आ ज्ञानोत्पत्तिक कसौटी सूक्ष्म बनबैत अछि; बौद्ध अपोह वर्गीय अर्थमे भेदात्मक सीमांकनक भूमिका देखबैत अछि। एहि परम्परासभकेँ आधुनिक संरचनावाद (structuralism) क पूर्वरूप नहि मानल जाए। संरचनावादक “संरचना (structure)” आ भारतीय “व्यवस्था/सम्बन्ध/वाक्य/शब्दशक्ति/अपोह” ऐतिहासिक रूपेँ स्वतंत्र अवधारणा छथि। तुलना केवल समस्या, तर्क-रूप, विश्लेषणात्मक कार्य आ सीमा पर हो। समानान्तर सूत्र—“साम्य जतए, ततेक मात्र; भिन्नता जतए, ओतए स्पष्ट; ऐतिहासिक प्रभाव केवल प्रमाणसँ। भारतीय भाषिक परम्परा आधुनिक संरचनावादक छाया नहि, स्वतंत्र दार्शनिक संवाद-संसार अछि।” प्रमुख तर्क पहिल तर्क—पाणिनीय अष्टाध्यायी नियमक क्रमबद्ध प्रणाली अछि। सूत्र, अनुवृत्ति, अधिकार, परिभाषा, अपवाद आ संचालन-क्रम द्वारा भाषिक रूप उत्पन्न होइत अछि। एक रूपक विश्लेषण पृथक् शब्दक गुण मात्र नहि, पूरा नियम-व्यवस्थाक भीतर ओकर निर्माण देखबैत अछि। दोसर तर्क—पाणिनीय नियम-प्रणाली आधुनिक संरचनावाद वा उत्पादक व्याकरण (generative grammar) नहि। औपचारिकता, नियमबद्धता आ उत्पादनक साम्य हो सकैत अछि; ऐतिहासिक प्रभाव, अवधारणात्मक पहचान आ समान लक्ष्य सिद्ध नहि। तेसर तर्क—भर्तृहरिक वाक्यपदीय भाषिक बोधक समग्रता प्रश्नमे आनैत अछि। वाक्यक अर्थ शब्दसभक पृथक् अर्थ जोड़ि मात्र बनैत अछि की भाषिक बोध मूलतः एकीकृत अछि—ई समस्या संरचनात्मक समग्र/भाग (whole/part) प्रश्नसँ संवादयोग्य अछि। चारिम तर्क—स्फोटकेँ “गहिर संरचना (deep structure)” अथवा “संकेत-प्रणाली (sign-system)” कहब अनुचित। स्फोट-विमर्श भाषिक अभिव्यक्ति, बोध, ध्वनि आ अर्थक तत्त्वमीमांसक प्रश्नसँ जुड़ल अछि; आधुनिक संरचनावाद (structuralism) क संकेत-विज्ञानात्मक संरचना अलग। पाँचम तर्क—मीमांसा वाक्यार्थक शर्तसभ—आकांक्षा, योग्यता, सन्निधि, तात्पर्य—द्वारा देखबैत अछि जे पदसभ स्वतंत्र सूची जकाँ अर्थ नहि दैत; पारस्परिक अपेक्षा, संगति, निकटता आ प्रयोजन संयुक्त बोध बनबैत अछि। छठम तर्क—अभिहितान्वयवाद आ अन्विताभिधानवादक विवाद भाग–समग्र सम्बन्धक सूक्ष्म भारतीय रूप अछि। प्रश्न ई कि शब्द पहिने पृथक् अर्थ बोध करैत अछि आ बादमे सम्बन्ध जुड़ैत, कि शब्द आरम्भसँ सम्बन्धित अर्थक भीतर कार्य करैत अछि। सातम तर्क—न्याय शब्द–पदार्थ सम्बन्धकेँ वस्तुगत यथार्थ, जाति, गुण, क्रिया, सम्बन्ध, वक्ता आ प्रमाणसँ जोड़ैत अछि। एहि कारण न्यायीय अर्थ-दर्शन शुद्ध भेदात्मक प्रणाली (differential system) नहि; बाह्य जगत आ ज्ञानक सत्य-मूल्य केन्द्रीय अछि। आठम तर्क—नव्य-न्याय विश्लेषण सम्बन्धक सूक्ष्म अवच्छेदन करैत अछि। कोन धर्म कोन विषयमे, कोन सम्बन्धसँ, कोन सीमा/अवच्छेदकद्वारा उपस्थित—एहि प्रकारक तकनीकी भाषा अस्पष्टता घटबैत अछि। मुदा ई आधुनिक विधेय-तर्क (predicate logic) अथवा औपचारिक अर्थविज्ञान (formal semantics) क ऐतिहासिक संस्करण नहि। नवम तर्क—बौद्ध अपोह वर्गीय अर्थक सकारात्मक सार्वभौम सत्ता पर प्रश्न उठबैत अछि। “गाय”क अर्थ गैर-गाय सँ अपवर्जनद्वारा सीमित होइत—एहि विचारमे भेदात्मकता अछि; मुदा सस्यूरियन भेद (difference) अथवा देरिदीय विखण्डन (deconstruction) सँ ऐतिहासिक पहचान नहि। दसम तर्क—अपोहक संरचनात्मक उपयोग बुझबाक लेल ओकर ज्ञानमीमांसक पृष्ठभूमि आवश्यक अछि: प्रत्यक्ष स्वलक्षणक, विकल्प सामान्यीकरणक, आ भाषा अवधारणात्मक भेदक क्षेत्र। ई आधुनिक भाषा-प्रणाली सिद्धान्त (language system theory) क सरल समानता नहि। एगारहम तर्क—भारतीय परम्परासभमे “सम्बन्ध” बारम्बार केन्द्रीय होइतहुँ सम्बन्धक स्वरूप एक नहि। पाणिनीय नियम-संबंध, मीमांसक वाक्य-संबंध, न्यायीय पदार्थ-संबंध, भर्तृहरिक भाषिक एकता आ अपोहक भेदात्मक सीमांकन अलग दार्शनिक वस्तु छथि। पूर्वपक्ष पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे आधुनिक “संरचना (structure)” शब्दक आधारपर प्राचीन भारतीय परम्पराक पुनर्पाठ स्वयं अनिवार्य रूपेँ अनाकालिक अछि। जखन मूल ग्रन्थमे संरचनावाद (structuralism) नहि, तखन तुलना किएक? दोसर पूर्वपक्ष राष्ट्रवादी अछि—पाणिनि, भर्तृहरि आ नव्य-न्याय आधुनिक पश्चिमी भाषाविज्ञानसँ शताब्दी पहिने अधिक उन्नत छल; अतः “पूर्वरूप” कहब उचित अछि। तेसर पूर्वपक्ष पश्चिम-केंद्रित अछि—भारतीय परम्परासभ धार्मिक/शास्त्रीय छथि, आधुनिक भाषा-विज्ञानक वैज्ञानिक संरचनात्मक विश्लेषण (scientific structural analysis) सँ तुलना अनुचित। चारिम पूर्वपक्ष आन्तरिक भारतीय भिन्नतासँ अछि—पाणिनि, भर्तृहरि, मीमांसा, न्याय आ बौद्धकेँ एक अध्यायमे राखलासँ “भारतीय” नामक कृत्रिम समग्रता बनि सकैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष सामाजिक आलोचनासँ अछि—शास्त्रीय भाषिक परम्परा अत्यन्त तकनीकी आ विशिष्ट शिक्षित वर्गक भीतर विकसित भेल; लोकभाषा, स्त्री, जातिगत बहिष्कार आ सार्वजनिक भाषिक जीवनक संरचना पर्याप्त केन्द्रमे नहि छल। उत्तरपक्ष पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—तुलना तखन अनाकालिक बनैत अछि जखन अवधारणा समान घोषित कएल जाए। समस्या-संवाद अनिवार्यतः अनाकालिक नहि: आधुनिक प्रश्नक रोशनीमे पुरान तर्क पढ़ल जा सकैत अछि, यदि ऐतिहासिक भिन्नता स्पष्ट राखल जाए। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—कालगत प्राथमिकता दार्शनिक पहचान सिद्ध नहि करैत। पाणिनिक औपचारिकता अद्वितीय अछि, मुदा “पाणिनि पहिनहि संरचनावादी/उत्पादक भाषावैज्ञानिक (structuralist/generative linguist) छलाह” कहब इतिहास, लक्ष्य आ अवधारणा समतल करैत अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—“वैज्ञानिक” बनाम “शास्त्रीय” सरल विभाजन सेहो भ्रामक। भारतीय परम्परासभ तर्क, नियम, प्रमाण, प्रतिपक्ष आ विश्लेषणक अत्यन्त कठोर पद्धति विकसित करैत छथि; हुनकर धार्मिक/दार्शनिक प्रसंगक कारण तकनीकी मूल्य समाप्त नहि होइत। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—“भारतीय” शब्द केवल भौगोलिक/बौद्धिक क्षेत्रक छतरी हो; प्रत्येक परम्पराक स्वायत्तता, असहमति आ ऐतिहासिक विकास अलग राखल जाए। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—सामाजिक सीमा स्वीकारल जाए। समानान्तर दर्शन शास्त्रीय तकनीकी सामग्रीक संग लोकभाषा, मौखिकता, स्त्री-अनुभव, बहुजातीय भाषा-प्रयोग, शिक्षा आ आधुनिक सार्वजनिकता जोड़ि ओकर दायरा विस्तृत करैत अछि। भारतीय संवाद पाणिनि आ भर्तृहरि बीच स्वयं निरन्तरता आ भिन्नता अछि। व्याकरणिक रूप-निर्माणक सूत्र-प्रणाली तथा भाषिक बोधक तत्त्वमीमांसा एकहि प्रश्न नहि; व्याकरण-परम्पराक भीतर सेहो “संरचना” बहुस्तरीय अछि। मीमांसा आ न्याय वाक्यार्थ/शब्दप्रमाणक प्रश्नमे प्रतिपक्षीय सम्बन्ध रखैत छथि। मीमांसा शास्त्रीय वाक्य, विधि आ तात्पर्यपर विशेष बल दैत; न्याय वक्ता, पदार्थ, सम्बन्ध आ ज्ञानोत्पत्तिक विश्वसनीयता अधिक स्पष्ट करैत अछि। न्याय–बौद्ध विवाद वर्गीय अर्थक संरचना पर गहिर मतभेद प्रस्तुत करैत अछि। न्याय वास्तविक जाति/सामान्य स्वीकारैत; बौद्ध अपोह सार्वभौम सत्ता अस्वीकारि नकारात्मक सीमांकनद्वारा अर्थ समझबैत। नव्य-न्याय आ भर्तृहरिक तुलना सेहो सरल नहि। नव्य-न्याय सम्बन्धात्मक अवच्छेदन आ प्रमाण-विवेकक तकनीकी विश्लेषण विकसित करैत; भर्तृहरि भाषिक अनुभूतिक एकता आ शब्द–वाक्य विभाजनक मूलभूतता प्रश्नमे आनैत छथि। अतः भारतीय भाषिक दर्शनक बौद्धिक शक्ति “एक भारतीय सिद्धान्त”मे नहि, परस्पर असहमत स्वतंत्र प्रणालिसभक दीर्घ शास्त्रार्थमे अछि। संरचनात्मक प्रश्न एहि बहसकेँ एक नूतन तुलनात्मक कोण दैत अछि, प्रतिस्थापन नहि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मिथिलाक समानान्तर दृष्टि न्याय–नव्य-न्याय आ मीमांसा विरासतकेँ भाषिक संरचना बुझबाक तकनीकी संसाधन मानैत अछि, सांस्कृतिक श्रेष्ठताक प्रमाण नहि। मिथिला पद्धतिगत गृहभूमि अछि, विश्व-दर्शनक एकमात्र केन्द्र नहि। नव्य-न्यायीय सम्बन्ध-सूक्ष्मता आधुनिक मैथिली दार्शनिक गद्य लेल एक अनुशासन दे सकैत अछि: दाबीमे विषय, गुण, सम्बन्ध, सीमा आ निषेध स्पष्ट करू; मुदा मूल संस्कृत पदावली पाठकपर बिना व्याख्या नहि थोपु। मैथिली लोकभाषा संरचनात्मक विविधता स्वयं देखबैत अछि—क्षेत्रीय रूप, शैली, नातेदारी-पद, कृषि-शब्द, स्त्री-गीत, पेशागत भाषा, भारत–नेपालक प्रयोग, लिपि-भेद, डिजिटल नवशब्द। मानक भाषा एहि सभक ऊपर अंतिम सत्ता नहि, एक संस्थागत रूप अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि शब्दक कालगत संरचना जाँचैत अछि। कोनो सामाजिक/जातिगत/धार्मिक पदक आजुक अर्थ अतीतपर स्वतः आरोपित नहि करू; पाण्डुलिपि, अभिलेख, साहित्य, शब्दकोश आ जीवित प्रयोग अलग-अलग प्रमाण दैत अछि। बहुप्रमाणीय विवेकवाद एहि अध्यायसँ एक मूल नियम ग्रहण करैत अछि—भाषिक संरचना अर्थक व्याख्या करि सकैत अछि, मुदा तथ्यात्मक दाबी सत्यापित करबाक लेल बाह्य प्रमाण चाही। “पाठमे संरचना अछि” ≠ “इतिहासमे घटना भेल।” गरिमा-आधारित नैतिकता भाषिक वर्गीकरणक आलोचना करैत अछि। कोनो संरचनात्मक श्रेणी यदि व्यक्तिकेँ जन्म, लिंग, जाति, धर्म वा भाषा-रूपक आधारपर निम्न/अमान्य ठहरबैत अछि, तँ ऐतिहासिक अस्तित्व दर्ज हो, नैतिक वैधता नहि। अन्तिम समानान्तर नियम—भारतीय परम्परासँ तुलना बराबरीपर हो: न अनुकरण, न पूर्वगामिता-दर्प; समस्या, तर्क, प्रमाण, सीमा आ आत्मसमीक्षा आधारित संवाद। समकालीन प्रयोग कृत्रिम बुद्धि (AI) भाषा-मॉडलमे नियम, सांख्यिकीय सहप्रयोग, अर्थ-समावेशन (semantic embedding) आ टोकन-सम्बन्ध (token relations) अलग स्तरक संरचना बनबैत अछि। पाणिनीय नियम-व्यवस्था वा अपोहक भेदात्मक अर्थक संग समस्या-संवाद रोचक हो सकैत अछि; तकनीकी पहचान (technical identity) नहि। संगणकीय भाषाविज्ञानमे रूपात्मक विश्लेषण (morphological parsing), निर्भरता-सम्बन्ध (dependency relations), व्याकरण-नियम (grammar rules) आ अर्थगत भूमिकासभ (semantic roles) द्वारा भाषा संरचनात्मक रूपेँ विश्लेषित होइत अछि। भारतीय व्याकरण परम्पराक तकनीकी अंतर्दृष्टि (technical insights) प्रेरक हो सकैत अछि, मुदा आधुनिक कलनविधीय कार्यान्वयन (algorithmic implementation) स्वतंत्र तकनीकी इतिहास रखैत अछि। मशीन अनुवादमे शब्द-दर-शब्द समतुल्यता पर्याप्त नहि। वाक्यगत अपेक्षा, प्रसंग, तात्पर्य, सम्बन्ध आ क्षेत्र-विशिष्ट अर्थ (domain-specific meaning) जाँचबाक आवश्यकता मीमांसक वाक्यार्थ-विमर्शक समस्या-साम्य देखबैत अछि। कानूनमे वाक्यक व्याख्या केवल शब्दकोशीय अर्थसँ नहि; उपवाक्य-सम्बन्ध (clause relation), विस्तार-सीमा (scope), अपवाद (exception), प्रयोजन (purpose) आ प्रसंग (context) महत्त्वपूर्ण। नव्य-न्यायीय सीमा-निर्धारण आ मीमांसक तात्पर्य आधुनिक विधिक व्याख्या लेल प्रत्यक्ष “समाधान (solution)” नहि, अनुशासनात्मक तुलना अछि। डिजिटल शब्दकोश आ ज्ञान-जालमे इकाई (entity), सम्बन्ध (relation), वर्ग (class), गुण (attribute) आ उत्तराधिकार (inheritance) जकाँ संरचना उपयोग होइत अछि। न्यायीय पदार्थ–सम्बन्धक तुलना अवधारणात्मक मॉडल-निर्माण (conceptual modeling) लेल विचारोत्तेजक हो सकैत अछि; तत्त्व-रूपरेखा अभियांत्रिकी (ontology engineering) = न्याय नहि। भाषा-नीतिमे मानकीकरणक नियम उपयोगी, मुदा जीवित विविधता मिटाबयक औजार नहि। पाणिनीय नियम-प्रणालीक सम्मानक अर्थ ई नहि जे आधुनिक भाषा केवल निर्देशात्मक व्याकरण (prescriptive grammar) द्वारा जीवित रहैत। शिक्षामे भारतीय भाषिक परम्पराकेँ “भारत पहिने खोजलक” कथा रूपमे नहि, वास्तविक समस्या-संचय (problem sets) रूपमे पढ़ाओल जाए—रूप-निर्माण, वाक्यार्थ, वर्ग, भेद, लक्षणा, तात्पर्य, सम्बन्ध आ प्रमाण। एहि सँ तुलनात्मक दर्शन अधिक कठोर बनत। अध्याय-निष्कर्ष भारतीय भाषिक परम्परासभमे संरचनात्मक प्रश्न अत्यन्त समृद्ध अछि, मुदा एकल “भारतीय संरचनावाद” नहि। पाणिनि नियम-व्यवस्था, भर्तृहरि भाषिक समग्रता, मीमांसा वाक्यार्थ-शर्त, न्याय–नव्य-न्याय पदार्थ/सम्बन्ध, आ बौद्ध अपोह भेदात्मक सीमांकनक अलग परियोजना प्रस्तुत करैत छथि। आधुनिक संरचनावाद (structuralism) सस्यूरियन संकेत-प्रणाली, भेदात्मक मूल्य (differential value) आ सम्बन्धात्मक विश्लेषण (relational analysis) क ऐतिहासिक परियोजना अछि। भारतीय परम्परासभ ओकर पूर्वरूप (precursor) नहि; तुलना केवल सीमित समस्या-साम्य आ कार्यगत साम्य पर उचित। भारतीय संवाद आधुनिक संरचनावाद (structuralism) क सीमा सेहो देखबैत अछि—न्याय बाह्य यथार्थ आ प्रमाण माँगैत अछि; मीमांसा प्रसंग/तात्पर्य जोड़ैत अछि; भर्तृहरि इकाईक प्रश्न खोलैत छथि; अपोह वर्गीय सारवाद चुनौती दैत अछि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि एहि विरासतकेँ पद्धतिगत अनुशासन रूपमे ग्रहण करैत अछि: पद स्पष्ट, सम्बन्ध निर्दिष्ट, वाक्य-प्रसंग जाँचल, प्रमाण अलग, प्रतिपक्ष सबल, ऐतिहासिक प्रभाव केवल साक्ष्यसँ। अध्यायक अन्तिम सूत्र—“पाणिनि संरचनावादी (structuralist) नहि; भर्तृहरि संरचनावादी नहि; नव्य-न्याय विश्लेषणात्मक/संरचनात्मक अर्थविज्ञान (analytic/structural semantics) नहि; अपोह विखण्डन (deconstruction) नहि। मुदा एहि सभक संग संरचना, सम्बन्ध आ अर्थक प्रश्नपर बराबरीक दार्शनिक संवाद अत्यन्त फलदायी अछि।” अध्याय-ग्रन्थसूची • पाणिनि — अष्टाध्यायी। • पतञ्जलि — महाभाष्य। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • प्रभाकर परम्परा — बृहती तथा वाक्यार्थ-विमर्श सम्बन्धी मूल सामग्री। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • रघुनाथ शिरोमणि — पदार्थतत्त्वनिरूपण। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • के. कुञ्जुन्नि राजा — ‘भारतीय अर्थ-सिद्धान्त’ (Indian Theories of Meaning)। • बी. के. मतिलाल — ‘शब्द आ जगत’ (The Word and the World); ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • हैरोल्ड जी. कावर्ड — ‘भाषाक स्फोट-सिद्धान्त: एक दार्शनिक विश्लेषण’ (The Sphota Theory of Language: A Philosophical Analysis)। • जॉर्ज कार्डोना — ‘पाणिनि: शोध-सर्वेक्षण’ (Pāṇini: A Survey of Research)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)। • फर्डिनाँ द सस्यूर — ‘सामान्य भाषाविज्ञानक पाठ्यक्रम’ (Course in General Linguistics), आधुनिक तुलनात्मक संदर्भ लेल।