Full chapter text
समस्या
संरचनावादक उपलब्धि महत्त्वपूर्ण अछि: ओ भाषा, मिथक, नातेदारी, पाठ आ सामाजिक संस्थाकेँ पृथक् तत्वक जोड़ नहि, सम्बन्धात्मक प्रणाली रूपमे पढ़बाक अनुशासन विकसित करैत अछि। मुदा जखन ई पद्धति एक सर्वव्यापक दार्शनिक दाबी बनि जाइत अछि—मानो संरचना हर अर्थ, हर व्यक्ति, हर इतिहास आ हर परिवर्तनक अन्तिम व्याख्या अछि—तखन ओकर सीमा स्पष्ट होइत अछि। पहिल समस्या इतिहासक अछि। समकालिक संरचना कोनो समय-बिन्दुपर प्रणालीक सम्बन्ध स्पष्ट करि सकैत अछि, मुदा ई संरचना कखन बनल, ककर संघर्षसँ बदलल, कोन दुर्घटना वा नवाचार ओकर दिशा बदललक—ई प्रश्न अलग ऐतिहासिक विश्लेषण माँगैत अछि। दोसर समस्या व्यक्तिक अछि। यदि व्यक्ति केवल संरचनाक ‘स्थान’ वा ‘वाहक’ बनि जाए, तँ नवाचार, विरोध, नैतिक जिम्मेदारी, रचनात्मकता, त्रुटि आ परिवर्तन बुझब कठिन होइत अछि। तेसर समस्या सत्ता आ असमानताक अछि। भाषिक अथवा सांस्कृतिक संरचना ‘तटस्थ’ संबंध-जाल जकाँ देखाइत अछि, मुदा वास्तविक संस्थामे किछु वर्गीकरण अधिकार दैत, किछु बहिष्कृत करैत, किछु आवाजकेँ मान्यता दैत, किछु दबा दैत अछि। चारिम समस्या अर्थक खुलापनक अछि। यदि प्रणालीगत भेद अर्थ निर्धारित करैत अछि, तँ नूतन प्रसंग, पाठकीय पुनर्पठन, व्यंग्य, रूपक, बहुअर्थकता, भाषिक विचलन आ ऐतिहासिक परिवर्तनक स्थान कोना बुझल जाए? पाँचम समस्या बाह्य यथार्थक अछि। भाषा आ संकेत-प्रणाली अनुभवक वर्गीकरण करैत अछि; मुदा एतयसँ ई निष्कर्ष नहि निकलैत जे यथार्थ स्वयं केवल भाषिक संरचना अछि। सत्य, वस्तु, शरीर, पदार्थ, घटना आ अनुभव भाषिक मॉडलसँ स्वतंत्र प्रतिरोध रखैत छथि। एहि अध्यायक समस्या तेँ संरचनावाद (structuralism) केँ खारिज करब नहि, ओकर कार्य-क्षेत्र सीमित करब अछि—कहाँ संरचनात्मक विश्लेषण शक्तिशाली अछि, कहाँ अतिरिक्त इतिहास, सत्ता, शरीर, सक्रियता, अनुभव आ प्रमाण जोड़बाक आवश्यकता अछि?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे संरचनावाद एक शक्तिशाली विश्लेषणात्मक पद्धति अछि, पूर्ण दार्शनिक विश्वदृष्टि नहि। सम्बन्ध, भेद, प्रणाली, नियम आ रूपान्तरण विश्लेषणमे उपयोगी छथि; मुदा ओ सभ ऐतिहासिक कारण, नैतिक मूल्य, जीवित अनुभव, सत्ता, पदार्थ आ व्यक्तिगत सक्रियताक स्थानापन्न नहि। संरचनात्मक मॉडल के परिकल्पना मानल जाए—एहन नक्सा जे जटिल सम्बन्ध स्पष्ट करैत अछि, न कि यथार्थक पूर्ण प्रतिलिपि। मॉडल जँ उपयोगी भविष्यवाणी, तुलना, स्पष्टीकरण वा नूतन प्रश्न दैत अछि तँ राखू; जँ प्रमाण ओकरा तोड़ैत अछि तँ संशोधित करू। संरचनावादक सीमा मुख्यतः छह क्षेत्रमे देखाइत अछि: इतिहास, व्यक्ति/सक्रियता, सत्ता/असमानता, शरीर/अनुभव, अर्थक खुलापन, आ बाह्य यथार्थ। समानान्तर दर्शनक सूत्र—‘संरचना देखू; ओकर उत्पत्ति सेहो देखू। नियम देखू; ककर हितमे अछि पूछू। भेद देखू; अनुभव नहि मिटाउ। मॉडल बनाउ; प्रमाणक सामने ओकर संशोधन सम्भव राखू।’
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—समकालिक संरचना इतिहासक विकल्प नहि। भाषा-प्रणाली आज कोना काम करैत अछि ई प्रश्न उपयोगी; मुदा वर्तमान रूपक कारण बुझबाक लेल कालक्रम, संस्थागत परिवर्तन, युद्ध, प्रवास, तकनीक, शिक्षा, कानून आ सामाजिक संघर्षक इतिहास आवश्यक अछि। दोसर तर्क—संरचना ‘समय रोकि देल चित्र’ जकाँ उपयोगी हो सकैत अछि; मुदा जीवित प्रणाली लगातार बदलैत अछि। स्थिर-चित्रकेँ शाश्वत सार मानलासँ परिवर्तनक वास्तविक प्रक्रिया अदृश्य होइत अछि। तेसर तर्क—व्यक्ति केवल संरचना-वाहक नहि। समान भाषा, संस्था वा वर्गीकरणक भीतर व्यक्ति नूतन वाक्य, नव शैली, नियम-विचलन, नैतिक आपत्ति आ सामूहिक आन्दोलन पैदा करि सकैत अछि। चारिम तर्क—व्यक्तिगत सक्रियता स्वीकारलासँ पूर्ण व्यक्तिवाद अनिवार्य नहि। व्यक्ति संरचनात्मक संसाधनक भीतर क्रिया करैत अछि; प्रश्न ‘संरचना कि व्यक्ति?’ नहि, ‘कौन स्तरपर कतेक कारणात्मक योगदान?’ अछि। पाँचम तर्क—सत्ता संरचनाक भीतर समाहित हो सकैत अछि। विद्यालयक नियम, भाषा-मानक, नागरिकता-श्रेणी, विवाह-नियम, श्रम-विभाजन वा डिजिटल वर्गीकरण केवल सम्बन्ध नहि; अधिकार आ संसाधन वितरित करैत अछि। छठम तर्क—एतयसँ उत्तर-संरचनावादी प्रश्न जन्म लैत अछि: संरचना के बनबैत? ककर आवाज ओकर नियम रूपमे स्थिर होइत? ककर अनुभव ‘अपवाद’ कहल जाइत? ककर वर्गीकरण सामान्य मानल जाइत? सातम तर्क—शरीर आ अनुभव संरचनात्मक मॉडलसँ पूर्णतः घटैत नहि। दर्द, भूख, थकान, लैंगिक अनुभव, हिंसा, रोग, श्रम, संवेदना आ देहगत स्मृति भाषिक वर्गीकरणद्वारा व्यक्त होइतहुँ वास्तविक जीवनक भौतिक आयाम रखैत अछि। आठम तर्क—अर्थक प्रणालीगत भेद उपयोगी अछि, मुदा अर्थ पूर्णतः बन्द नहि। रूपक, व्यंग्य, कविता, परिहास, नूतन तकनीकी प्रयोग, सामाजिक आन्दोलन आ भाषिक पुनरुद्धार संकेतकक पूर्व मूल्य बदलि सकैत अछि। नवम तर्क—पाठक आ प्रसंग संरचनात्मक अर्थक अतिरिक्त स्तर छथि। एक पाठ अलग ऐतिहासिक कालमे अलग प्रश्नक उत्तर बनि सकैत अछि; मूल संरचना स्थिर रहितहुँ ग्रहणक क्षितिज बदलि सकैत अछि। दसम तर्क—संरचना आ यथार्थक भेद स्पष्ट रहय। शब्द ‘जल’ भाषिक प्रणालीमे भेदात्मक मूल्य रखैत अछि, मुदा जलक रासायनिक गुण भाषिक सहमतिसँ बदलैत नहि। भाषा तथ्य बतबैत अछि; तथ्य भाषा मात्र नहि। एगारहम तर्क—संरचनात्मक वर्गीकरण नैतिक रूपेँ तटस्थ नहि मानल जाए। ‘सामान्य/असामान्य’, ‘शुद्ध/अशुद्ध’, ‘केन्द्र/हाशिया’, ‘मानक/अमानक’ जकाँ द्वैध-विभाजन सामाजिक परिणाम पैदा करि सकैत अछि। बारहम तर्क—आकस्मिकता संरचनावादक कठोरता तोड़ैत अछि। महामारी, आविष्कार, दुर्घटना, प्राकृतिक आपदा, अप्रत्याशित राजनीतिक गठबन्धन अथवा एक नूतन माध्यम संरचनाक अपेक्षित क्रम बदलि सकैत अछि। तेरहम तर्क—संरचना-विश्लेषणक चयन स्वयं विश्लेषकक निर्णय पर निर्भर होइत अछि। कौन तत्व चुनल, कौन विरोध प्रमुख मानल, कौन सम्बन्ध अनदेखा कएल—ई सभ पद्धतिगत निर्णय पारदर्शी होयबाक चाही। चौदहम तर्क—संरचनावादक सीमा देखब स्वयं संरचनावादक उपलब्धि नकारब नहि। उलटे, ओकर सर्वोत्तम उपयोग तखन होइत अछि जखन संबंध-मॉडल इतिहास, सत्ता, अनुभव आ प्रमाणक अन्य पद्धतिसँ संवाद करैत अछि।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे संरचनावादपर ‘इतिहास-विरोधी’ आरोप अतिशयोक्ति अछि। सस्यूर समकालिक/कालक्रमिक भेद करैत छथि, आ लेवी-स्ट्रॉस रूपान्तरण स्वीकारैत छथि; अतः परिवर्तन पूर्णतः अनुपस्थित नहि। दोसर पूर्वपक्ष कहैत अछि जे ‘व्यक्ति’ पर लौटब संरचनात्मक विश्लेषण (structural analysis) केर आलोचनात्मक उपलब्धि कमजोर करैत अछि। आधुनिक चेतन व्यक्ति स्वयं ऐतिहासिक–भाषिक निर्माण हो सकैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष यथार्थवाद पर अछि—‘बाह्य यथार्थ’ कहब स्वयं भाषा द्वारा व्यक्त दाबी अछि; भाषा-पार यथार्थक सीधा पहुँच सम्भव नहि। चारिम पूर्वपक्ष सत्ता-विमर्शपर अछि—संरचनावाद स्वयं सत्ता-तटस्थ (power-neutral) होयबाक आवश्यकता नहि; संरचनात्मक मार्क्सवाद (structural Marxism) जकाँ परियोजना संरचना आ सत्ता जोड़बाक प्रयास करैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष तुलनात्मक दर्शनसँ अछि—भारतीय परम्परासँ संरचनावाद (structuralism) क सीमा जाँचैत काल ‘भारतीय परम्परा अधिक समग्र/आध्यात्मिक’ जकाँ सांस्कृतिक सारवाद (essentialism) उत्पन्न हो सकैत अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—आरोप पूर्ण इतिहास-अभावक नहि, प्राथमिकताक अछि। समकालिक प्रणालीक विश्लेषण जखन प्रधान पद्धति बनैत अछि, विशिष्ट ऐतिहासिक कारण द्वितीयक पड़ि सकैत अछि। पूरक इतिहास आवश्यक रहैत अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—व्यक्ति केँ पूर्ण स्वायत्त आत्मा रूपमे पुनर्स्थापित करब आवश्यक नहि। सक्रियता, निर्णय आ जिम्मेदारीक अनुभवजन्य रूपेँ अवलोकनीय (empirically observable) रूप स्वीकारल जाए, चाहे ओ भाषिक–सामाजिक संरचनामे स्थित हो। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—हम यथार्थकेँ भाषा बिना वर्णित नहि करि सकैत छी, मुदा एतयसँ यथार्थ भाषा मात्र अछि ई निष्कर्ष नहि निकलैत। गलत भविष्यवाणी, विफल प्रयोग, शरीरक रोग, भौतिक प्रतिरोध आदि भाषा-पार बाधा प्रकट करैत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—संरचना आ सत्ता जोड़ब सम्भव, मुदा तब सत्ता-वितरण (power distribution), संस्था (institution), बलप्रयोग (coercion), प्रतिरोध (resistance) आ इतिहास (history) क अलग प्रमाण समाविष्ट करबाक पड़त; संरचनात्मक सम्बन्ध (structural relation) अकेला पर्याप्त नहि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय परम्पराकेँ प्रतिरोधी ‘उच्चतर विकल्प’ नहि बनाओल जाए। प्रत्येक भारतीय सिद्धान्तक अपन सीमा, ऐतिहासिक संस्था, बहिष्कार आ प्रतिपक्ष जाँचल जाए। तुलना बराबरीक आलोचना हो, सांस्कृतिक महिमामण्डन नहि।
भारतीय संवाद
पाणिनीय व्याकरण नियमबद्ध प्रणालीक शक्ति देखबैत अछि; मुदा भाषा-इतिहास, सामाजिक प्रयोग आ अर्थक पूरा दर्शन अष्टाध्यायी अकेला नहि दैत। अतः पाणिनीय संरचनात्मक अनुशासनक अपन कार्य-क्षेत्र अछि। भर्तृहरि भाषिक समग्रता, वाक्य आ बोधक गहिर प्रश्न उठबैत छथि; मुदा हुनकर भाषा-दर्शन सामाजिक सत्ता, आधुनिक ऐतिहासिकता अथवा डिजिटल वर्गीकरणक तैयार सिद्धान्त नहि। नव्य-न्याय सम्बन्ध, अवच्छेदक, विशेषणता आ अभावक अत्यन्त सूक्ष्म विश्लेषण दैत अछि; मुदा तकनीकी स्पष्टता सामाजिक इतिहासक विकल्प नहि। ‘कौन सम्बन्ध?’क साथे ‘ई सम्बन्ध कखन/ककर संस्था द्वारा?’ प्रश्न आधुनिक समानान्तर विस्तार अछि। मीमांसा तात्पर्य, वाक्यार्थ, विधि आ प्रसंगक सूक्ष्मता दैत अछि; तथापि आधुनिक लोकतान्त्रिक सत्ता-समीक्षा वा लेखक-पाठक बहुलताक प्रश्न अलग ऐतिहासिक विकास माँगैत अछि। बौद्ध अपोह भेद/अपवर्जनक संरचनात्मक प्रश्नसँ संवाद करि सकैत अछि, मुदा अपोह = उत्तर-संरचनावाद नहि। अपोहक ज्ञानमीमांसक (epistemological) आ तत्त्वमीमांसक (metaphysical) संदर्भ स्वतंत्र अछि। भारतीय संवादक निष्कर्ष—संरचना, सम्बन्ध, समग्रता, भाषा आ भेदक अनेक भारतीय विश्लेषण संरचनावाद (structuralism) क सीमासँ संवाद करि सकैत अछि; मुदा कोनो भारतीय परम्परा स्वतः एहि सीमासभक ‘समाधान’ नहि।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि संरचना-विवेक केँ इतिहास-विवेकसँ जोड़ैत अछि। पंजी, शाखा, भूमि-दस्तावेज, शिक्षा-संस्था, भाषा-मानक, नातेदारी वा धार्मिक संस्था संबंध-जाल बनबैत छथि; मुदा हुनकर कालगत विकास अलग जाँचल जाए। सामाजिक श्रेणी ऐतिहासिक रूपेँ बदलैत अछि। आजुक जाति, उपजाति, भाषा, पद, संस्था अथवा क्षेत्रीय पहचानकेँ अतीतपर बिना स्रोत स्थिर संरचना रूपमे आरोपित करब अनुचित। लोक-मैथिली, स्त्री-गीत, श्रम-भाषा, प्रवासी प्रयोग, पाण्डुलिपि, मुद्रित साहित्य आ डिजिटल लेखन एकहि संरचनाक ‘रूपान्तर (variant)’ नहि; अलग सामाजिक स्थान आ प्रमाण-मूल्य रखैत अछि। गरिमा-आधारित नैतिकता वर्गीकरणक सीमा तय करैत अछि। कोनो सांस्कृतिक संरचना यदि व्यक्तिक समान गरिमा नकारैत अछि, तखन ऐतिहासिक वास्तविकता मानल जा सकैत अछि, नैतिक वैधता नहि। बहुप्रमाणीय विवेकवाद संरचनात्मक मॉडल केँ बाहरी साक्ष्यसँ जाँचैत अछि—अभिलेख, मौखिक इतिहास, सांख्यिकीय प्रतिरूप, शरीरगत अनुभव, विधिक दस्तावेज, साहित्य, पुरातत्त्व, डिजिटल सामग्री। आत्मसमीक्षा एहि अध्यायक निर्णायक सूत्र अछि। संरचना जँ प्रमाणक हिस्सा स्पष्ट करैत अछि, उपयोग करू; जँ ओ अपवाद, इतिहास वा पीड़ित अनुभव दबबैत अछि, मॉडल विस्तृत अथवा त्यागू।
समकालीन प्रयोग
कृत्रिम बुद्धि (AI) प्रणाली स्वयं संरचनात्मक मॉडल बनबैत अछि—श्रेणी, विशेषता, वजन, सम्बन्ध, प्रशिक्षण-वितरण आ निर्णय-नियमक व्यवस्था। मुदा मॉडल व्यक्ति, समाज वा यथार्थक पूर्ण प्रतिलिपि नहि। स्वचालित नियुक्ति, ऋण, बीमा अथवा पुलिस-जोखिम प्रणालीमे वर्गीकरण-संरचना (classification structure) पुरान असमानता पुनरुत्पादित करि सकैत अछि। एतय मॉडल-शुद्धता (model accuracy) क संग निष्पक्षता (fairness), पारदर्शिता (transparency), अपील (appeal) आ उत्तरदायित्व (accountability) जाँचबाक चाही। सामाजिक माध्यमक अनुशंसा-वास्तु (recommendation architecture) उपयोगकर्ता केँ नूतन सामग्री चुनबाक अवसर दैत अछि, मुदा दृश्यता (visibility), पुनरावृत्ति (repetition), आक्रोश-प्रोत्साहन (outrage incentives) आ संजाल-प्रभाव (network effects) द्वारा ध्यानक संरचना सेहो बनबैत अछि। भाषा-मॉडल शब्दसभक सहप्रयोग-संरचना सीखैत अछि; एहि कारण प्रवाहपूर्ण पाठ (fluent text) उत्पन्न करि सकैत अछि। मुदा सुसंगति (coherence) = सत्य नहि, आ संरचनात्मक प्रतिरूप (structural pattern) = सत्यापित ज्ञान (verified knowledge) नहि। कानूनमे नियम-प्रणाली (rule system) आवश्यक, मुदा अपवादगत मामला (exceptional case), आनुपातिकता (proportionality), विधिसम्मत प्रक्रिया (due process) आ मानवीय निर्णय (human judgment) क स्थान सेहो आवश्यक अछि। संरचना न्याय सम्भव बनबैत अछि; कठोर संरचना अन्याय सेहो बना सकैत अछि। शिक्षामे पाठ्यक्रम-संरचना (curriculum structure) ज्ञान व्यवस्थित करैत अछि; मुदा विद्यार्थी अनुभव, स्थानीय भाषा, नूतन शोध आ अन्तर्विषयी प्रश्न (interdisciplinary question) लेल खुलापन (openness) आवश्यक अछि। इतिहासमे संजाल-विश्लेषण (network analysis), व्यक्तिसमूह-इतिहास (prosopography), आँकड़ा-रूपरेखा (database schema) आ सामाजिक संरचना-मानचित्रण (social structure mapping) शक्तिशाली उपकरण छथि; मुदा स्रोत-जीविता (source survival), अभिलेखीय मौन (archival silence), जीवनी (biography) आ आकस्मिकता (contingency) अलग जाँचल जाए। सार्वजनिक नीति मे जनसंख्या-श्रेणियाँ (population categories) प्रशासन लेल आवश्यक हो सकैत अछि; मुदा श्रेणी (category) केँ प्राकृतिक, शाश्वत आ पूर्ण पहचान मानब व्यक्ति गरिमा आ सामाजिक जटिलता केँ नुकसान पहुँचा सकैत अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
संरचनावादक सीमा ओकर विफलता नहि; ओकर उचित कार्य-क्षेत्रक सीमा अछि। सम्बन्ध, भेद, नियम आ प्रणाली समझबामे ओ शक्तिशाली अछि; इतिहास, सत्ता, व्यक्ति, शरीर, अनुभव आ बाह्य यथार्थ लेल पूरक पद्धति आवश्यक अछि। समकालिक संरचना कालक्रमिक इतिहासक स्थानापन्न नहि; वर्गीकरण नैतिक वैधताक प्रमाण नहि; भाषिक भेद सत्यक अन्तिम कसौटी नहि; व्यक्ति संरचनाक कठपुतली नहि। एहि सीमा-बोधसँ उत्तर-संरचनावादक प्रश्न जन्म लैत अछि—केन्द्र किएक स्थिर मानल जाए? अर्थ पूर्णतः बन्द किएक मानल जाए? सत्ता आ बहिष्कार संरचनामे कहाँ अछि? पाठक/इतिहास/अन्तर क भूमिका की? मुदा उत्तर-संरचनावाद दिस बढ़ैत संरचनावाद (structuralism) क उपयोगी अनुशासन फेंकि नहि देल जाए। स्पष्ट सम्बन्ध-विश्लेषण, प्रणालीगत सोच, तुलनात्मक मॉडल आ रूपान्तरणक अध्ययन एखन सेहो आवश्यक छथि। समानान्तर सूत्र—‘संरचना अछि, मुदा संरचना नियति नहि। भाषा अर्थ बनबैत अछि, मुदा जगत भाषा मात्र नहि। वर्गीकरण आवश्यक हो सकैत अछि, मुदा व्यक्ति वर्गीकरणसँ अधिक अछि। मॉडल उपयोगी अछि, मुदा प्रमाणक ऊपर नहि।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• फर्डिनाँ द सस्यूर — ‘सामान्य भाषाविज्ञानक पाठ्यक्रम’ (Course in General Linguistics)। • क्लोद लेवी-स्ट्रॉस — ‘संरचनात्मक मानवविज्ञान’ (Structural Anthropology)। • जाँ पियाजे — ‘संरचनावाद’ (Structuralism)। • जोनाथन कलर — ‘संरचनावादी काव्यशास्त्र’ (Structuralist Poetics)। • रोलाँ बार्थ — ‘कृतिसँ पाठ धरि’ (From Work to Text)। • रोलाँ बार्थ — ‘लेखकक मृत्यु’ (The Death of the Author)। • जाक देरिदा — ‘मानव विज्ञानक विमर्शमे संरचना, संकेत आ खेल’ (Structure, Sign, and Play in the Discourse of the Human Sciences)। • फ्रांस्वा दोस — ‘संरचनावादक इतिहास’ (History of Structuralism), खण्ड 1–2। • पियरे बुरदियू — ‘अभ्यासक तर्क’ (The Logic of Practice)। • एन्थनी गिडेन्स — ‘समाजक गठन’ (The Constitution of Society)। • पाणिनि — अष्टाध्यायी। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • गौतम — न्यायसूत्र। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)।