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समस्या
संरचनावाद भाषा, मिथक, नातेदारी आ संस्कृति केँ सम्बन्ध, भेद आ नियमक प्रणाली रूपमे पढ़बाक शक्तिशाली पद्धति दैत अछि। मुदा जखन संरचना स्वयं स्थिर केन्द्र, बन्द प्रणाली वा अन्तिम अर्थ-व्यवस्था जकाँ मानल जाइत अछि, तखन प्रश्न उठैत अछि—ई केन्द्र कोना बनल? ओकर सीमा के तय कएलक? अर्थ वास्तवमे एतेक बन्द अछि की? आ जे किछु संरचनाक बाहर, हाशियापर वा अपवाद रूपमे रहि जाइत अछि, ओकर दार्शनिक स्थिति की? उत्तर-संरचनावाद (post-structuralism) एकरूप विद्यालय नहि। देरिदा, फूको, बार्थ, देल्यूज़ तथा अन्य विचारकसभक परियोजना अलग-अलग अछि। साझा प्रवृत्ति मात्र एतबा अछि जे स्थिर संरचना, केन्द्र, एकल अर्थ, सार्वभौम विषय आ तटस्थ ज्ञानक दाबी पर नूतन प्रश्न उठाओल जाए। संरचनावादक भीतरएँ एहि संकटक बीज उपस्थित छल। यदि अर्थ भेदसँ बनैत अछि, तँ भेदक शृंखला कहाँ थमैत? यदि प्रणाली सम्बन्धसँ बनैत अछि, तँ कोन केन्द्र ओकरा स्थिर करैत? यदि पाठक अर्थ-संरचना ग्रहण करैत अछि, तँ पुनर्पाठक सम्भावना किएक समाप्त हो? देरिदाक 1966 क प्रसिद्ध व्याख्यान ‘मानव विज्ञानक विमर्शमे संरचना, संकेत आ खेल’ संरचना-विचारक भीतर केन्द्रक भूमिका पर प्रश्न उठबैत अछि। केन्द्र संरचनाकेँ व्यवस्थित करैत अछि, मुदा स्वयं संरचनात्मक खेलक बाहर मानल जाए तखन विरोधाभास उत्पन्न होइत अछि। ई बिन्दु उत्तर-संरचनात्मक मोड़क एक प्रमुख संकेत बनल। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—संरचनासँ उत्तर-संरचना धरि संक्रमणकेँ ‘पुरान सिद्धान्त गलत, नूतन सिद्धान्त सही’ रूपमे नहि, बल्कि संरचनावादक आन्तरिक सीमासभक दार्शनिक विस्तार रूपमे कोना बुझी?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे उत्तर-संरचनावाद संरचनाक अस्तित्व नकारैत नहि; ओ संरचनाक स्थिरता, केन्द्र, सीमा, उत्पत्ति, बहिष्कार आ अर्थ-नियन्त्रणक दाबीपर प्रश्न उठबैत अछि। संरचनावाद ‘सम्बन्ध’ खोजैत अछि; उत्तर-संरचनावाद पूछैत अछि—ई सम्बन्ध स्थिर केना? कोन भेद दबाओल गेल? कोन केन्द्र सामान्य मानल गेल? कोन अर्थक विकल्प बाहर राखल गेल? संरचनावाद प्रणालीक नियम स्पष्ट करैत अछि; उत्तर-संरचनावाद नियमक ऐतिहासिकता, पुनरावृत्ति, विचलन आ अस्थिरता जाँचैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि मोड़केँ पूर्ण अर्थ-अराजकता नहि मानैत। अर्थ खुलल हो सकैत अछि, मुदा पाठ, प्रसंग, भाषा, इतिहास आ प्रमाण ओकर सीमा बनबैत अछि। उत्तर-संरचनात्मक प्रश्न आवश्यक, मनमाना निष्कर्ष स्वीकार्य नहि।
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—संरचनावादक केन्द्र-समस्या। कोनो प्रणाली जँ एक केन्द्र द्वारा व्यवस्थित अछि, तँ केन्द्र अन्य तत्व जकाँ सम्बन्धक भीतर अछि की संरचनाक बाहर? यदि भीतर, तँ स्वयं परिवर्तनशील; यदि बाहर, तँ संरचनात्मक सिद्धान्तक अपवाद। दोसर तर्क—भेद अर्थ बनबैत अछि तखन अर्थक पूर्ण बन्दी कठिन। एक संकेत अन्य संकेतसभसँ सम्बन्धित अछि; नूतन प्रसंग सम्बन्धक नूतन मार्ग खोलि सकैत अछि। तेसर तर्क—द्वैध-विरोध प्रायः सममित नहि। वाणी/लेखन, पुरुष/स्त्री, केन्द्र/हाशिया, सामान्य/असामान्य जकाँ जोड़ीमे इतिहासतः एक पक्ष विशेषाधिकारित भऽ सकैत अछि। उत्तर-संरचनात्मक पठन एहि असममिति केँ उजागर करैत अछि। चारिम तर्क—पाठक आ पुनरावृत्ति अर्थमे भूमिका रखैत अछि। एक वाक्य अलग प्रसंगमे उद्धृत, दोहरायल वा व्यंग्यार्थमे प्रयुक्त भऽ कऽ मूल परिस्थितिसँ अलग प्रभाव उत्पन्न करि सकैत अछि। पाँचम तर्क—बार्थक ‘लेखकक मृत्यु’क प्रसिद्ध तर्क लेखकीय अभिप्रायकेँ अर्थक एकमात्र अन्तिम स्रोत मानबाक विरोध करैत अछि। एहि सँ लेखकक इतिहास अप्रासंगिक भऽ जाइत अछि—एहन अति-निष्कर्ष निकालब आवश्यक नहि। छठम तर्क—फूको लेखक-कार्य (author-function)क प्रश्न द्वारा ‘लेखक’ केँ जैविक व्यक्ति मात्र नहि, पाठक वर्गीकरण, अधिकार आ विमर्शक संस्थागत कार्य रूपमे जाँचैत छथि। सातम तर्क—उत्तर-संरचनावाद इतिहासक नूतन रूप खोलैत अछि। स्थिर संरचनाक बदला नियम, श्रेणी, ज्ञान-प्रणाली आ संस्थागत भाषा कखन/कोना बदलल—ई प्रश्न महत्त्वपूर्ण होइत अछि। आठम तर्क—‘हाशिया’ केवल भौगोलिक किनार नहि; संरचना द्वारा गौण मानल पद, आवाज, अर्थ, अनुभव वा पाठ-भिन्नता सेहो हो सकैत अछि। मुदा हाशियापर होयब स्वतः सत्यक प्रमाण नहि। नवम तर्क—उत्तर-संरचनात्मक आलोचना प्रतिपादनक असम्भवता सिद्ध नहि करैत। दाबी कएल जा सकैत अछि; बस ओकर भाषा, सीमा, बहिष्कार, इतिहास आ प्रतिपक्ष स्पष्ट राखबाक चाही। दसम तर्क—विखण्डन (deconstruction) ‘किछु नष्ट करब’ नहि। ई पाठक भीतरक तनाव, पदानुक्रम, निर्भरता आ आत्म-विरोध खोलबाक पद्धति अछि; विस्तृत विवेचन अगिला अध्यायसभमे होयत। एगारहम तर्क—उत्तर-संरचनावाद आ उत्तर-आधुनिकता समानार्थी नहि। पहिल मुख्यतः संरचना, भाषा, पाठ, विषय आ विमर्शक आलोचना सँ जुड़ल; दोसर व्यापक सांस्कृतिक–ज्ञानमीमांसक प्रवृत्ति, जे बादक खण्डमे अलग विवेचित होयत। बारहम तर्क—यदि अर्थ खुलल अछि, तखन प्रमाणक भूमिका आरो जरूरी अछि। ऐतिहासिक दाबी, वैज्ञानिक तथ्य, विधिक निर्णय वा सामाजिक आँकड़ा केँ ‘एक पठन’ कहि समान स्तर पर नहि राखल जा सकैत। तेरहम तर्क—उत्तर-संरचनात्मक प्रश्न स्वयं आत्मसमीक्षा माँगैत अछि। यदि हर केन्द्र संशयास्पद, तँ ‘हाशिया’ केँ नूतन अपरिवर्तनीय केन्द्र नहि बनाओल जाए; यदि हर अर्थ प्रश्नयोग्य, तँ अपन आलोचना सेहो प्रश्नयोग्य रहय।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे उत्तर-संरचनावाद अर्थक स्थिरता नष्ट करि सापेक्षतावाद दिस लऽ जाइत अछि। यदि पाठक अनेक अर्थ बना सकैत अछि, तखन गलत पठन की? दोसर पूर्वपक्ष यथार्थवादसँ अछि—भाषा, पाठ आ विमर्शपर अत्यधिक बल भौतिक जगत, शरीर आ कारणात्मक तथ्य केँ गौण करि सकैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष इतिहासकारक अछि—यदि अभिलेख स्वयं सत्ता-निर्मित पाठ अछि, तखन वास्तविक इतिहास पुनर्निर्माण सम्भव कोना? चारिम पूर्वपक्ष नैतिकता सँ अछि—यदि सार्वभौम श्रेणी, विषय आ मूल्यसभ विखण्डनीय, तखन गरिमा, न्याय, समानता आ अधिकारक आधार की? पाँचम पूर्वपक्ष तुलनात्मक दर्शनसँ अछि—भारतीय शून्यता, अपोह, अनेकान्तवाद वा अनिर्वचनीयताकेँ उत्तर-संरचनावादक पूर्वरूप बनाबयक प्रलोभन अत्यधिक अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—अर्थक बहुलता अर्थक अराजकता नहि। व्याकरण, पाठ, विधा, प्रसंग, ऐतिहासिक उपयोग आ तथ्यात्मक साक्ष्य गलत/कमजोर पठन केँ सीमित करैत अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—भाषिक मध्यस्थता स्वीकारलासँ भौतिक यथार्थ नष्ट नहि होइत। शरीर रोगी हो सकैत अछि, पुल टूटि सकैत अछि, प्रयोग असफल भऽ सकैत अछि—यथार्थ भाषिक दाबीकेँ प्रतिरोध करैत अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—अभिलेख सत्ता-सापेक्ष हो सकैत अछि, मुदा एहि कारण इतिहास असम्भव नहि। स्रोत-तुलना, कालक्रम, पुरातत्त्व, भौतिक साक्ष्य, मौखिक परम्परा आ स्वतंत्र पुष्टि द्वारा सम्भावनात्मक ऐतिहासिक निष्कर्ष बनाओल जा सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—गरिमा-आधारित नैतिकता ऐतिहासिक पहचानसँ ऊपर व्यक्तिक समान नैतिक मूल्य मानैत अछि। एहि सार्वभौमिकताकेँ आलोचनासँ मुक्त अपरिवर्तनीय मत (dogma) नहि, त्रुटिसंशोध्य नैतिक प्रतिबद्धता रूपमे राखल जाए। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय सिद्धान्तसभक स्वतंत्र इतिहास सुरक्षित रहय: शून्यता ≠ विखण्डन; अपोह ≠ उत्तर-संरचनात्मक भेद; अनेकान्तवाद ≠ सापेक्षतावाद; अनिर्वचनीयता ≠ अनिश्चित अर्थ।
भारतीय संवाद
बौद्ध मध्यमक स्थिर स्वभावक आलोचना करैत अछि, मुदा ओकर लक्ष्य प्रतीत्यसमुत्पाद, शून्यता, दुःख-मुक्ति आ तत्त्वमीमांसक आसक्तिक आलोचना सँ जुड़ल अछि। देरिदाक विखण्डन (deconstruction) संग ऐतिहासिक पहचान अस्वीकार्य। दिङ्नाग–धर्मकीर्तिक अपोह अर्थक वर्गीय सीमांकनपर नकारात्मक विश्लेषण करैत अछि। सस्यूरियन भेद वा उत्तर-संरचनात्मक भेद (difference) संग समस्या-साम्य सम्भव, सिद्धान्तगत समानता नहि। जैन अनेकान्तवाद बहुपक्षीय प्रतिपादनक अनुशासन दैत अछि; ई ‘सभ सत्य समान’ नहि। प्रत्येक नय/दृष्टि सापेक्ष सीमा रखैत अछि, मुदा प्रमाण-विवेक समाप्त नहि होइत। अद्वैतक अनिर्वचनीयता विशिष्ट तत्त्वमीमांसक प्रसंगमे अछि; ओकरा भाषिक अर्थ-अस्थिरता कहब गम्भीर श्रेणी-दोष होयत। नव्य-न्याय उत्तर-संरचनावादक प्रतिपक्षीय संवाद लेल विशेष उपयोगी अछि, किएक तँ ओ अर्थक सीमा, सम्बन्ध, अवच्छेदक आ प्रमाणक कठोर स्पष्टता पर बल दैत अछि। एतय संवाद ‘स्थिरता बनाम अस्थिरता’क सरल विरोध नहि, बल्कि दाबीक सीमा कसरी निश्चित हो—एहि प्रश्नपर अछि। भारतीय संवादक नियम—साम्य समस्या स्तरपर; पहचान नहि।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि उत्तर-संरचनात्मक प्रश्नकेँ शास्त्रार्थीय पद्धतिसँ जोड़ैत अछि। प्रतिपक्ष केवल बाहरी आलोचक नहि; दाबीक भीतरक सीमा, अपवाद, अस्पष्टता आ बहिष्कार खोजबाक साधन सेहो अछि। नव्य-न्यायीय स्पष्टता उत्तर-संरचनात्मक खुलापनक विरोधी मात्र नहि। स्पष्ट परिभाषा स्वयं देखाबैत अछि जे दाबी कहाँ धरि लागू, कहाँ नहि; सीमा स्वीकारब अर्थक विनाश नहि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि अभिलेखक केन्द्र/हाशिया जाँचैत अछि। दरबारी, प्रशासनिक वा शास्त्रीय स्रोत अधिक संरक्षित हो सकैत अछि; लोक, स्त्री, श्रम, निम्नसत्ता वा मौखिक परम्परा कम दृश्य। मुदा कम दृश्य स्रोतक दाबी सेहो समान प्रमाण-कसौटी पर जाँचल जाए। मैथिली भाषिक इतिहासमे ‘मानक’ आ ‘अमानक’क भेद संस्थागत हो सकैत अछि। क्षेत्रीय रूप, लोकप्रयोग वा डिजिटल नवाचारक अध्ययन भाषिक केन्द्रक इतिहास खोलि सकैत अछि, मुदा मानकीकरणक व्यावहारिक उपयोग स्वतः अन्यायपूर्ण नहि। गरिमा-आधारित नैतिकता उत्तर-संरचनात्मक आलोचनाक सीमा दैत अछि: पहचानक विखण्डन व्यक्ति केर समान गरिमा विखण्डित नहि करय। आत्मसमीक्षा—समानान्तर दर्शन स्वयं अपन केन्द्र, शब्दावली, मिथिला-आधार, प्रमाण-श्रेणी आ नैतिक सूत्रसभकेँ आलोचनासँ मुक्त नहि मानत।
समकालीन प्रयोग
कृत्रिम बुद्धि (AI) वर्गीकरण प्रणाली स्थिर श्रेणियाँ (categories) बनबैत अछि, मुदा वास्तविक व्यक्ति अनेक अतिव्यापी पहिचान (overlapping identities) रखि सकैत छथि। उत्तर-संरचनात्मक प्रश्न—कोन श्रेणी पूर्वनिर्धारित (default) बनल? कोन सीमांत मामला (edge case) बाहर पड़ल?—कृत्रिम-बुद्धि लेखापरीक्षण (AI audit) लेल उपयोगी अछि। मुदा श्रेणी-अस्थिरता (category instability) कहि वर्गीकरण (classification) समाप्त नहि कएल जा सकैत। चिकित्सा, कानून, सांख्यिकी वा प्रशासन लेल कार्यगत श्रेणी आवश्यक हो सकैत अछि; शर्त पारदर्शी परिभाषा, संशोधन आ अपील (appeal)। भाषा-मॉडल प्रशिक्षण-पाठसंग्रह (training corpus) सँ प्रभुत्वशाली प्रतिरूप (dominant patterns) सीखैत अछि। कम प्रतिनिधित्ववला भाषा/समुदायक प्रयोग हाशियागत आँकड़ा (peripheral data) बनि सकैत अछि। एतय केन्द्र/हाशिया रूपक (centre/margin metaphor) आँकड़ा-वितरण (data distribution) जाँचबाक उपयोगी प्रश्न दे सकैत अछि। सामाजिक माध्यममे मंच-नियम (platform rules) ‘सामान्य भाषण (normal speech)’, ‘हानिकारक सामग्री (harmful content)’, ‘अनचाहा संदेश (spam)’, ‘भ्रामक सूचना (misinformation)’ जकाँ श्रेणियाँ (categories) बनबैत अछि। एहि श्रेणीसभक सीमा ऐतिहासिक, विवादित आ संस्थागत शक्ति-सापेक्ष हो सकैत अछि। कानूनमे पाठ-व्याख्या (text interpretation) एकल शाब्दिक पठन (literal reading) धरि सीमित नहि; पूर्वनिर्णय (precedent), उद्देश्य (purpose), प्रसंग (context), अधिकार (rights) आ संस्थागत इतिहास (institutional history) अर्थ प्रभावित करैत अछि। मुदा बहुव्याख्या विधिक निर्णयक असम्भवता नहि। इतिहासमे अभिलेखीय श्रेणियाँ (archival categories) शोधक दृष्टि प्रभावित करैत अछि। जे सामग्री ‘विविध (miscellaneous)’ वा ‘देशज/लोकभाषीय (vernacular)’ नामेँ वर्गीकृत भेल, ओ बादमे नूतन ऐतिहासिक प्रश्नक केन्द्र बनि सकैत अछि। साहित्यिक आलोचनामे पाठक नूतन अर्थ खोलि सकैत अछि, मुदा पाठक जे चाहय से अर्थ नहि। पाठीय संरचना, भाषा, विधा, अन्तरपाठीयता आ इतिहास व्याख्यात्मक सीमा (interpretive constraints) दैत अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
संरचनासँ उत्तर-संरचना धरि संक्रमण संरचनावादक विनाश नहि, ओकर स्थिरता-दाबी पर आत्मालोचनात्मक दबाव अछि। केन्द्र, भेद, सीमा, पुनरावृत्ति, इतिहास, सत्ता आ पाठकीय पुनर्पाठ नूतन प्रश्न बनैत छथि। उत्तर-संरचनावाद एक विद्यालय नहि; देरिदा, फूको, बार्थ आदि अलग परियोजनासँ स्थिर अर्थ, स्थिर विषय आ तटस्थ संरचनापर प्रश्न उठबैत छथि। एहि प्रश्नसभसँ सापेक्षतावाद अनिवार्य नहि। अर्थ बहुल हो सकैत अछि, मुदा प्रमाण मनमाना नहि; पाठ खुलल हो सकैत अछि, मुदा असीम नहि; केन्द्र आलोच्य हो सकैत अछि, मुदा प्रत्येक कार्यगत केन्द्र अवैध नहि। भारतीय शून्यता, अपोह, अनेकान्तवाद अथवा अनिर्वचनीयताकेँ उत्तर-संरचनावादक ऐतिहासिक पूर्वरूप बनाबयब अनुचित। संवाद केवल समस्या-साम्य, भिन्नता आ सीमा पर हो। समानान्तर सूत्र—‘केन्द्र जाँचू, मुदा दिशा नष्ट नहि करू; अर्थ खोलू, मुदा प्रमाण छोड़ू नहि; हाशिया सुनू, मुदा ओकरा स्वतः सत्य घोषित नहि करू; आलोचना अपन ऊपर सेहो लागू करू।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• जाक देरिदा — ‘मानव विज्ञानक विमर्शमे संरचना, संकेत आ खेल’ (Structure, Sign, and Play in the Discourse of the Human Sciences)। • जाक देरिदा — ‘लेखन आ भिन्नता’ (Writing and Difference)। • जाक देरिदा — ‘व्याकरणशास्त्र पर’ (Of Grammatology)। • रोलाँ बार्थ — ‘लेखकक मृत्यु’ (The Death of the Author)। • रोलाँ बार्थ — ‘कृतिसँ पाठ धरि’ (From Work to Text)। • मिशेल फूको — ‘लेखक की अछि?’ (What Is an Author?)। • मिशेल फूको — ‘ज्ञानक पुरातत्त्व’ (The Archaeology of Knowledge)। • जोनाथन कलर — ‘विखण्डन पर’ (On Deconstruction)। • क्रिस्टोफर नॉरिस — ‘विखण्डन: सिद्धान्त आ अभ्यास’ (Deconstruction: Theory and Practice)। • फर्डिनाँ द सस्यूर — ‘सामान्य भाषाविज्ञानक पाठ्यक्रम’ (Course in General Linguistics)। • क्लोद लेवी-स्ट्रॉस — ‘संरचनात्मक मानवविज्ञान’ (Structural Anthropology)। • नागार्जुन — मूलमध्यमककारिका। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)।