समस्या जाक देरिदाक दर्शनक एक केन्द्रीय प्रश्न अछि—पाश्चात्य तत्त्वमीमांसामे ‘उपस्थिति’ केँ एतेक विशेषाधिकार किएक देल गेल? सत्यकेँ प्रायः एहन रूपमे सोचल गेल जे मानो मूल अर्थ, आत्म-उपस्थिति, तत्काल चेतना, शुद्ध आरम्भ, प्रत्यक्ष वाणी अथवा स्थिर केन्द्र कोनो मध्यस्थता बिना स्वयं उपस्थित भऽ सकैत अछि। देरिदा एहि प्रवृत्तिकेँ ‘उपस्थितिक तत्त्वमीमांसा’ (metaphysics of presence) नामेँ आलोचनात्मक रूपेँ पढ़ैत छथि। उपस्थिति स्वयं समस्या नहि। समस्या तखन शुरू होइत अछि जखन उपस्थितिकेँ अर्थ, सत्य वा पहचानक पूर्ण आधार मानल जाए, आ अनुपस्थिति, अन्तर, पुनरावृत्ति, लेखन, स्मृति, चिह्न, समय अथवा मध्यस्थताकेँ गौण/द्वितीयक मानल जाए। वाणी–लेखनक पारम्परिक पदानुक्रम एहि आलोचनाक प्रसिद्ध उदाहरण अछि। अनेक दार्शनिक परम्परामे बोलल वाणीकेँ वक्ताक विचारक निकट, जीवित आ तत्काल रूप मानल गेल; लेखनकेँ अनुपस्थित वक्ताक बाहरी प्रतिलिपि, सहायक वा पूरक। देरिदा पूछैत छथि—वाणी स्वयं चिह्न, पुनरावृत्ति, अन्तर आ समयक बिना अर्थपूर्ण हो सकैत अछि की? यदि बोलल शब्दकेँ दोहरायल, पहिचानल आ अलग प्रसंगमे पुनः प्रयुक्त नहि कएल जा सकय, तँ भाषा सम्भव नहि। एहि पुनरावृत्तिक्षमतामे अर्थ अपन मूल प्रसंगसँ आंशिक दूरी बनबैत अछि। अतः पूर्ण आत्म-उपस्थिति स्वयं भाषिक चिह्नक संरचनासँ अस्थिर होइत अछि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—देरिदाक उपस्थितिक तत्त्वमीमांसा-आलोचनाकेँ ‘सत्य नहि अछि’, ‘किछु स्थिर नहि’, ‘सभ अर्थ मनमाना’ जकाँ लोकप्रिय सरलीकरणसँ बचा कऽ कोना बुझल जाए? आ एहि आलोचनाक सीमा, भारतीय संवाद तथा समानान्तर दर्शनक उत्तर की? मूल प्रतिपादन एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे देरिदा उपस्थितिकेँ नकारैत नहि; ओ उपस्थितिक आत्मनिर्भरता पर प्रश्न उठबैत छथि। जे किछु ‘पूर्णतः उपस्थित’ मानल जाइत अछि, ओकर अर्थ प्रायः अनुपस्थित संकेत, पूर्व चिह्न, भविष्यक पुनरावृत्ति, भेद आ प्रसंगपर निर्भर रहैत अछि। अर्थक प्रत्येक उपस्थित रूपमे अनुपस्थित सम्बन्धसभक छाप रहैत अछि। एहि छापकेँ देरिदा ‘चिह्न-छाप’ (trace) जकाँ पदद्वारा सोचैत छथि। कोनो संकेत केवल जे अछि ताहिसँ नहि, जे नहि अछि आ जकरा सँ ओ भिन्न अछि ताहिसँ सेहो अर्थ पबैत अछि। वाणी/लेखन, मूल/पूरक, उपस्थिति/अनुपस्थिति, भीतर/बाहर जकाँ द्वैध-विरोधमे देरिदा देखबैत छथि जे विशेषाधिकारित पहिल पद प्रायः ओहि गौण मानल दोसर पदपर निर्भर अछि। एहि निर्भरताकेँ खोलब विखण्डनक आरम्भिक क्रिया अछि। समानान्तर दर्शन एहि आलोचनासँ आत्मसमीक्षा, पदानुक्रम-जाँच आ मध्यस्थताक चेतना ग्रहण करैत अछि; मुदा यथार्थ, प्रमाण, इतिहास आ नैतिक गरिमाकेँ पूर्ण अर्थ-अस्थिरतामे विलीन नहि करैत। प्रमुख तर्क पहिल तर्क—उपस्थिति समयसँ मुक्त नहि। ‘एखन’ कहल क्षण अपन तुरन्त बीतल क्षणक स्मृति आ आबयवला क्षणक अपेक्षा बिना पहिचानयोग्य नहि। चेतनाक वर्तमान स्वयं समयगत अन्तरद्वारा गठित अछि। दोसर तर्क—हुसर्लक संकेत, चेतना आ समय-विमर्श पढ़ैत देरिदा देखबैत छथि जे पूर्ण आत्म-उपस्थित चेतना सेहो पुनरावृत्ति, स्मृति आ अन्तरसँ मुक्त नहि। ‘तत्कालता’ स्वयं संरचित अछि। तेसर तर्क—वाणी लेखनपर सरल प्राथमिकता नहि रखैत। बोलल शब्द अर्थपूर्ण होयबाक लेल पहिचानयोग्य चिह्न होय, अर्थात दोहरायल जा सकय। पुनरावृत्ति ओकरा मूल वक्ता आ मूल प्रसंगसँ अलग प्रयुक्त होयबाक सम्भावना दैत अछि। चारिम तर्क—लेखन देरिदाक ठाम कागजपर अक्षर मात्र नहि। व्यापक अर्थमे लेखन चिह्नक एहन संरचना अछि जे अनुपस्थिति, दूरी, पुनरावृत्ति आ प्रसंग-परिवर्तन सम्भव बनबैत अछि। पाँचम तर्क—वाणीकेन्द्रवाद (phonocentrism) वाणीकेँ विचारक निकट आ लेखनकेँ द्वितीयक मानयवला प्रवृत्ति अछि। देरिदा एहि पदानुक्रमक ऐतिहासिक–दार्शनिक आधार जाँचैत छथि। छठम तर्क—वचन/तर्क-केन्द्रवाद (logocentrism) स्थिर मूल, अन्तिम अर्थ, पूर्ण आधार अथवा आत्म-उपस्थित सत्यक खोजक व्यापक प्रवृत्ति सूचित करैत अछि। ई शब्द ‘तर्क खराब’ कहबाक नाम नहि; ओ मूल-अर्थक विशेषाधिकारक आलोचना अछि। सातम तर्क—पूरक (supplement) केवल बाहरी जोड़ नहि। रूसो-पठनमे देरिदा देखबैत छथि जे जे वस्तु ‘मूलक पूरक’ कहल जाइत अछि, ओ कई बेर मूलक अपूर्णताकेँ उजागर करैत अछि। जँ मूल पूर्ण होइत, पूरकक आवश्यकता किएक? आठम तर्क—चिह्न-छाप (trace) अर्थक भीतर अनुपस्थित अन्य संकेतसभक प्रभाव सूचित करैत अछि। वर्तमान संकेत अपन भिन्नताक इतिहास वहन करैत अछि। नवम तर्क—पुनरावृत्तिक्षमता (iterability) चिह्नक मूल गुण अछि। कोनो चिह्न तखन चिह्न अछि जखन ओकरा अलग अवसरपर पुनः पहिचानल जा सकय; एहि कारण प्रसंग महत्त्वपूर्ण होइतहुँ एकदम बन्द नहि। दसम तर्क—देरिदाक आलोचना ‘कोनो प्रसंग नहि’ नहि, बल्कि ‘कोनो प्रसंग पूर्णतः अन्तिम नहि’। प्रसंग अर्थ सीमित करैत अछि, मुदा नूतन उद्धरण, पुनरावृत्ति वा संस्थागत उपयोग नूतन अर्थ-सम्बन्ध खोलि सकैत अछि। एगारहम तर्क—द्वैध-विरोधक विखण्डन केवल उलटब नहि। यदि वाणी/लेखनमे लेखनकेँ पहिने गौण मानल गेल, तँ केवल ‘लेखन श्रेष्ठ’ कहब पदानुक्रमक पुनरावृत्ति होयत। लक्ष्य परस्पर निर्भरता आ भेदक संरचना खोलब अछि। बारहम तर्क—विखण्डन पाठक बाहरसँ मनमाना अर्थ आरोपित करब नहि। पाठक अपने अवधारणा, उदाहरण, रूपक, अपवाद आ तर्कक भीतर जे तनाव उत्पन्न होइत अछि, ओतयसँ आलोचना विकसित होइत अछि। तेरहम तर्क—उपस्थितिक आलोचना सत्यक अन्त नहि। ‘ई दस्तावेज 1950 मे लिखल गेल’ जकाँ ऐतिहासिक दाबी प्रमाणसँ जाँचल जा सकैत अछि, भले दस्तावेजक अर्थ, वर्गीकरण आ भाषा मध्यस्थित हो। चौदहम तर्क—अर्थक मध्यस्थता आ वस्तुगत सत्यक संगति सम्भव अछि। भाषा द्वारा सत्य व्यक्त होइत अछि; यथार्थक कारणे गलत वाक्य असफल होइत अछि। पूर्वपक्ष पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे उपस्थितिक आलोचना अन्ततः अर्थक अस्थिरता बढ़बैत अछि। यदि हर उपस्थिति अनुपस्थित चिह्नपर निर्भर, तँ स्पष्ट अर्थ कखन सम्भव? दोसर पूर्वपक्ष विश्लेषणात्मक दर्शनसँ अछि—देरिदाक पदावली अत्यधिक रूपकात्मक अछि; ‘चिह्न-छाप (trace)’, ‘पूरक (supplement)’, ‘लेखन (writing)’ जकाँ शब्द अनेक स्तरपर चलैत छथि, जाहिसँ तर्कीय सीमा अस्पष्ट भऽ सकैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष इतिहाससँ अछि—वाणी/लेखन पदानुक्रम सभ संस्कृति, काल आ परम्परामे समान नहि; पश्चिमी तत्त्वमीमांसाक आलोचनाकेँ विश्वव्यापी इतिहास बनाबयब अतिशयोक्ति होयत। चारिम पूर्वपक्ष यथार्थवादसँ अछि—यदि प्रत्यक्ष उपस्थिति संशयास्पद, तँ ज्ञानक आधार कोना बनत? अनुभव, निरीक्षण आ मापनक प्रमाणिक मूल्य कम होयबाक खतरा अछि। पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय तुलना सँ अछि—शून्यता, अनात्मा, अपोह, माया वा अनिर्वचनीयताकेँ देरिदाक उपस्थिति-आलोचनाक ऐतिहासिक पूर्वरूप कहल जाए तऽ भिन्न परम्पराक दार्शनिक उद्देश्य मिटि जाएत। उत्तरपक्ष पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—निर्भरता स्थिर अर्थक पूर्ण निषेध नहि। शब्दकोश, व्याकरण, प्रसंग, संस्था, विधा आ ऐतिहासिक उपयोग पर्याप्त स्थानीय स्थिरता दैत अछि। प्रश्न ‘अर्थ अछि की नहि?’ नहि, ‘अर्थक स्थिरता कतेक आ कोन शर्तपर?’ अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—देरिदाक पदावली सावधानीसँ परिभाषित करब आवश्यक अछि। समानान्तर दर्शन रूपकात्मक विस्तारकेँ प्रमाण-दाबीपर स्वतः लागू नहि करैत; प्रत्येक दाबी लेल स्पष्ट तार्किक सीमा माँगैत अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—उपस्थितिक तत्त्वमीमांसा एक आलोचनात्मक ऐतिहासिक प्रतिरूप अछि, सार्वभौम मानव-स्वभाव नहि। भारतीय, चीनी, इस्लामी अथवा अन्य परम्पराकेँ स्वतः एहि ढाँचामे नहि घुसाओल जाए। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—निरीक्षण मध्यस्थित होइतहुँ प्रमाण हो सकैत अछि। उपकरण, भाषा आ सिद्धान्त निरीक्षणकेँ आकार दैत छथि; स्वतंत्र पुनरावृत्ति, मापन, त्रुटि-संशोधन आ पारस्परिक परीक्षण ओकर विश्वसनीयता बढ़बैत अछि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय संवाद केवल समस्या-साम्य धरि सीमित रहय। शून्यता ≠ विखण्डन; अपोह ≠ चिह्न-छाप; माया ≠ प्रतिरूप-जगत (simulation); अनिर्वचनीयता ≠ अर्थ-अस्थिरता। भारतीय संवाद मध्यमक शून्यता स्थिर स्वभावक आलोचना करैत अछि, मुदा ओकर आधार प्रतीत्यसमुत्पाद आ मुक्तिक दार्शनिक परियोजना अछि। देरिदाक उपस्थितिक आलोचना भाषिक–तत्त्वमीमांसक पाठ-विश्लेषणक अलग परम्परा अछि। एहि दुनूकेँ समान कहब ऐतिहासिक रूपेँ असिद्ध। बौद्ध अपोह वर्गीय अर्थमे अन्यक अपवर्जनक भूमिका देखबैत अछि। ‘अर्थ भेदसँ बनैत अछि’ प्रकारक समस्या-साम्य आकर्षक हो सकैत अछि, मुदा अपोहक ज्ञानमीमांसक ढाँचा देरिदाक चिह्न-छाप/भिन्नता-स्थगन (trace/différance) सँ अलग। अद्वैतक माया/अनिर्वचनीयता ब्रह्म, जगत आ अविद्याक तत्त्वमीमांसक सन्दर्भमे अछि। उपस्थितिक तत्त्वमीमांसाक आलोचनासँ ओकर ऐतिहासिक पहचान नहि। न्याय–नव्य-न्याय स्पष्ट प्रतिपक्ष प्रस्तुत करैत अछि। वस्तु, गुण, सम्बन्ध, अभाव, ज्ञान, प्रमाण आ वाक्यार्थक विश्लेषण यथार्थवादी प्रतिबद्धता रखैत अछि। देरिदाक मध्यस्थता-आलोचनासँ संवाद एहि प्रश्नपर हो सकैत अछि—दाबीक सीमा कोना निश्चित कएल जाए? नव्य-न्यायक अभाव-विचार ‘अनुपस्थिति’क दार्शनिक विश्लेषण दैत अछि, मुदा अभाव = देरिदीय अनुपस्थिति (Derridean absence) नहि। न्यायीय अभाव वस्तुगत श्रेणी/ज्ञानक प्रश्न, देरिदाक अनुपस्थिति चिह्न, समय आ उपस्थितिक विशेषाधिकारक आलोचना सँ जुड़ल। मीमांसा वाक्यार्थ, तात्पर्य, प्रसंग आ शब्दशक्ति द्वारा देखबैत अछि जे अर्थ केवल तत्काल शब्द-उपस्थिति नहि; तथापि ई व्याख्याशास्त्रीय/शास्त्रीय ढाँचा (hermeneutic framework) विखण्डन (deconstruction) क पूर्वरूप नहि। भारतीय संवादक नियम—समान प्रश्न खोजू, समान इतिहास नहि गढ़ू। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मिथिलाक समानान्तर दृष्टि उपस्थितिक आलोचनाकेँ अभिलेखीय इतिहासमे उपयोगी बनबैत अछि। जे दस्तावेज उपस्थित अछि, ओ सम्पूर्ण अतीत नहि; संरक्षण, संस्था, साक्षरता, सत्ता आ संयोग तय करैत अछि कि की बचल। मुदा अभिलेखीय अनुपस्थिति मनगढ़न्त कथा बनाबयक अनुमति नहि। ‘स्रोत नहि’ केँ ‘घटना अवश्य भेल’ वा ‘कदापि नहि भेल’ दुनू रूपमे स्वतः नहि पढ़ू। प्रमाण-स्थिति स्पष्ट करू—समर्थित, सम्भाव्य, विवादित, अज्ञात। शास्त्रार्थमे प्रतिपक्षक कथन उपस्थित पाठ मात्र नहि; ओकर सम्भावित आपत्ति, परिभाषाक सीमा आ निहित धारणा सेहो जाँचल जाइत अछि। ई आत्मसमीक्षात्मक अनुशासन विखण्डनात्मक प्रश्नसँ संवाद करि सकैत अछि। मैथिली भाषिक परम्परामे वाणी आ लेखन दुनू महत्त्वपूर्ण छथि। मौखिक गीत, कथा, अनुष्ठान, लोक-प्रयोग लिखित साहित्यसँ निम्नतर स्वतः नहि; मुदा मौखिकता केँ ‘शुद्ध मूल’ मानब सेहो रोमानीकरण होयत। पाण्डुलिपि, मुद्रण, डिजिटल पाठ आ ध्वनि-संग्रह प्रत्येक माध्यम अर्थक प्रसार, स्थायित्व आ पुनरावृत्तिक्षमता बदलैत अछि। माध्यम अर्थक बाहरी पात्र मात्र नहि, संप्रेषणक शर्त सेहो अछि। गरिमा-आधारित नैतिकता पदानुक्रमक आलोचना स्वीकारैत अछि, मुदा नैतिक केन्द्रहीनता नहि। व्यक्ति केर समान गरिमा आलोचनासँ मुक्त अपरिवर्तनीय मत (dogma) नहि, सार्वजनिक तर्क आ मानव-हितद्वारा निरन्तर परीक्षित मूल प्रतिबद्धता अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि केन्द्र/हाशिया पढ़ैत अछि; मुदा हाशिया स्वतः सत्य नहि। केन्द्रक स्रोत जाँचू, हाशियाक स्रोत सेहो समान कठोरता सँ जाँचू। आत्मसमीक्षा—‘मिथिला’ शब्द स्वयं कतेक स्थिर? कोन काल, भूगोल, भाषा, संस्था, स्मृति आ राजनीतिक उपयोग ओकर अर्थ बदलैत अछि? समानान्तर दर्शन अपन आधार-पदसभकेँ विखण्डनात्मक परीक्षणसँ मुक्त नहि रखत। समकालीन प्रयोग कृत्रिम बुद्धि (AI) क प्रवाहपूर्ण उत्तर ‘ज्ञानक उपस्थिति’ जकाँ देखाइत अछि, मुदा स्रोत, प्रशिक्षण-आँकड़ा, उद्धरणक उत्पत्ति, सत्यापन आ जिम्मेदार वक्ता अनुपस्थित हो सकैत छथि। उपस्थित पाठकेँ प्रमाण मानब एहि कारण खतरनाक अछि। डिजिटल चित्र, ध्वनि आ भिडियो मे दृश्य/श्रव्य उपस्थिति प्रामाणिक उत्पत्तिक गारंटी नहि। कृत्रिम-जाली दृश्य/ध्वनि (deepfake) युगमे ‘देखलहुँ/सुनलहुँ’ स्वयं उत्पत्ति-पथ (provenance), अधितथ्य (metadata) आ स्वतंत्र सत्यापन (independent verification) माँगैत अछि। सामाजिक माध्यममे उद्धृत वाक्य मूल प्रसंगसँ अलग पुनरावृत्त भऽ सकैत अछि। पुनरावृत्तिक्षमता अर्थक सम्भावना खोलैत अछि; साथे गलत प्रसंग, कट-पेस्ट आ भ्रामक सूचना (misinformation) क जोखिम बढ़बैत अछि। कानूनमे लिखित पाठकेँ ‘स्वयं उपस्थित स्पष्ट अर्थ’ मानब कठिन; विधिक परिभाषा, पूर्वनिर्णय (precedent), उद्देश्य (purpose), प्रसंग (context) आ संस्थागत व्यवहार (institutional practice) अर्थ प्रभावित करैत अछि। तथापि व्याख्यात्मक बहुलता (interpretive plurality) निर्णयक असम्भवता नहि। विज्ञानमे प्रत्यक्ष अवलोकन (observation) उपकरण-मध्यस्थित (instrument-mediated) होइत अछि। उपकरण, अंशांकन (calibration), मॉडल (model) आ सिद्धान्त (theory) डेटा उत्पन्न/व्याख्यायित करैत अछि; मुदा पुनरुत्पाद्यता (reproducibility) आ स्वतंत्र मापन (independent measurement) वस्तुगत नियंत्रण प्रदान करैत अछि। इतिहासमे उपलब्ध अभिलेख (archive) सत्ता आ संयोगद्वारा चयनित हो सकैत अछि। अनुपस्थित स्वर (absent voices) खोजब आवश्यक; मुदा कल्पित स्वर (imagined voice) केँ साक्ष्य (evidence) रूपमे प्रस्तुत करब अनुचित। शिक्षामे पाठ्यपुस्तक (textbook) ‘ज्ञान उपस्थित’ करैत अछि, मुदा चयन (selection), विलोपन (omission), प्रस्तुति-ढाँचा (framing) आ उद्धरण-स्रोत (citation) जाँचबाक चाही। आलोचनात्मक पठन (critical reading) क अर्थ सभ पाठ नकारब नहि, स्रोत-पारदर्शिता बढ़ाबयब अछि। अध्याय-निष्कर्ष देरिदाक उपस्थितिक तत्त्वमीमांसाक आलोचना ‘उपस्थिति नहि’ कहब नहि; ई देखबैत अछि जे उपस्थिति प्रायः भेद, समय, अनुपस्थिति, पुनरावृत्ति आ मध्यस्थतासँ निर्भर अछि। वाणी/लेखन, मूल/पूरक, केन्द्र/हाशिया जकाँ पदानुक्रममे गौण मानल पद कई बेर विशेषाधिकारित पदक सम्भावनाक शर्त होइत अछि। विखण्डन एहि निर्भरता केँ खोलैत अछि, केवल उलटैत नहि। चिह्न-छाप (trace), पूरक (supplement), पुनरावृत्तिक्षमता (iterability) आ वाणीकेन्द्रवाद/वचनकेन्द्रवाद उपस्थितिक आत्मनिर्भरता पर अलग-अलग कोणसँ प्रश्न उठबैत अछि। मुदा एहि आलोचनासँ तथ्य, इतिहास वा सत्य समाप्त नहि। मध्यस्थित ज्ञान सेहो प्रमाण, पुनरावृत्ति, स्वतंत्र पुष्टि आ यथार्थक प्रतिरोधद्वारा अधिक/कम विश्वसनीय हो सकैत अछि। भारतीय शून्यता, अपोह, माया, अनिर्वचनीयता अथवा अभावकेँ देरिदाक अवधारणाक ऐतिहासिक पूर्वरूप बनाबयब अनुचित। समस्या-संवाद राखू; सिद्धान्तगत पहचान नहि। समानान्तर सूत्र—‘उपस्थिति जाँचू, अनुपस्थिति नोट करू; पदानुक्रम खोलू, मुदा प्रमाण नहि छोड़ू; विखण्डनक बाद पुनर्निर्माण करू।’ अध्याय-ग्रन्थसूची • जाक देरिदा — ‘व्याकरणशास्त्र पर’ (Of Grammatology)। • जाक देरिदा — ‘वाणी आ घटना’ (Speech and Phenomena)। • जाक देरिदा — ‘लेखन आ भिन्नता’ (Writing and Difference)। • जाक देरिदा — ‘वितरण/प्रसरण’ (Dissemination)। • जाक देरिदा — ‘दर्शनक हाशिया’ (Margins of Philosophy)। • जाक देरिदा — ‘स्थितियाँ’ (Positions)। • जाक देरिदा — ‘सीमित इन्क.’ (Limited Inc), पुनरावृत्तिक्षमता आ प्रसंग-विमर्श लेल। • एडमंड हुसर्ल — ‘आन्तरिक काल-चेतनाक प्रतीयमानविज्ञान’ (The Phenomenology of Internal Time-Consciousness), देरिदाक आलोचनात्मक संदर्भ लेल। • जाँ-जाक रूसो — ‘भाषाक उत्पत्ति पर निबन्ध’ (Essay on the Origin of Languages), देरिदाक पूरक-विमर्शक संदर्भ लेल। • फर्डिनाँ द सस्यूर — ‘सामान्य भाषाविज्ञानक पाठ्यक्रम’ (Course in General Linguistics), वाणी/लेखन पदानुक्रमक संदर्भ लेल। • जोनाथन कलर — ‘विखण्डन पर’ (On Deconstruction)। • क्रिस्टोफर नॉरिस — ‘विखण्डन: सिद्धान्त आ अभ्यास’ (Deconstruction: Theory and Practice)। • नागार्जुन — मूलमध्यमककारिका। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • गौतम — न्यायसूत्र। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)।