समस्या देरिदाक ‘différance’ शब्द जानि-बुझि सामान्य फ्रांसीसी शब्द ‘différence’ सँ भिन्न लिखल गेल अछि। उच्चारणमे दुनू लगभग समान सुनाइत छथि; भेद लेखनमे देखाइत अछि। एहि कारण ई पद स्वयं वाणीकेन्द्रवादक आलोचनाक उदाहरण बनैत अछि—जे भेद लेखन देखबैत अछि, वाणी छिपा सकैत अछि। ‘différance’ एकटा स्थिर परिभाषायोग्य वस्तु नहि, बल्कि अर्थ बनबाक दू परस्पर जुड़ल क्रिया सूचित करैत अछि: भिन्नता—एक संकेत दोसरासँ अलग होइत अछि; स्थगन—अर्थ पूर्णतः तत्काल उपस्थित नहि, अन्य संकेत, प्रसंग आ समयक सम्बन्धमे आगे सरैत रहैत अछि। यदि ‘गाछ’ शब्द ‘घर’, ‘वन’, ‘पौधा’, ‘लकड़ी’, ‘जीवित’, ‘छाया’ आदि अनेक भाषिक सम्बन्धद्वारा अर्थ पबैत अछि, तँ अर्थ एक पृथक् सार (isolated essence) नहि। मुदा एहि सम्बन्धक जालक अर्थ ई नहि जे ‘गाछ’ शब्द कखनो ‘समुद्र’ सेहो हो सकैत अछि। भाषा-समाज, इतिहास, प्रयोग आ जगत अर्थक सीमा बनबैत छथि। स्थगनक अर्थ ‘अर्थ कखनो मिलैत नहि’ नहि। व्यावहारिक भाषा सफलतापूर्वक संप्रेषण करैत अछि; अनुबन्ध, विज्ञान, दैनन्दिन आदेश, साहित्य, गणितीय परिभाषा सभ अर्थपूर्ण होइत अछि। प्रश्न ई अछि जे ई अर्थ पूर्ण, आत्मनिर्भर, अन्तिम उपस्थित वस्तु जकाँ रहैत अछि की सम्बन्धात्मक आ प्रसंगाधारित स्थिरता रूपमे? एहि अध्यायक समस्या ई अछि—différance केँ रहस्यमय शब्द, पूर्ण सापेक्षतावाद वा ‘कोनो अर्थ नहि’ दाबी बनौने बिना कोना समझी? आ भिन्नता–स्थगन, चिह्न-छाप (trace), समयगतता (temporality), पुनरावृत्तिक्षमता (iterability) आ प्रसंगसापेक्षता (contextuality) क सम्बन्ध कोना स्पष्ट करी? मूल प्रतिपादन एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे différance अर्थक उत्पादनक एक गतिशील शर्त सूचित करैत अछि: संकेत जे अछि ओ अन्य संकेतसभसँ भिन्न होइत अछि, आ ओकर अर्थ पूर्णतः एक क्षणमे बन्द नहि, बल्कि अन्य सम्बन्ध आ संभावित पुनरावृत्तिमे स्थगित/विस्तारित होइत अछि। भिन्नता स्थानगत पक्ष अछि—संकेत एक-दोसरासँ भेद द्वारा मूल्य पबैत अछि। स्थगन समयगत पक्ष अछि—अर्थक पूर्णता एकहि वर्तमान क्षणमे आत्म-उपस्थित नहि; पूर्व प्रयोग, वर्तमान प्रसंग आ भविष्यक पुनरावृत्ति ओकरा प्रभावित करैत अछि। différance ‘कारण’ जकाँ कोनो मूल तत्त्व नहि; ओ स्वयं स्थिर केन्द्र बनि जाए तखन देरिदाक आलोचना विफल भऽ जाएत। ई केन्द्रहीन सम्बन्धात्मक प्रक्रिया सूचित करैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि पदसँ अर्थक विनम्रता ग्रहण करैत अछि: अर्थकेँ तुरन्त बन्द नहि करू; भिन्नता, इतिहास आ प्रसंग जाँचू। मुदा ऐतिहासिक/वैज्ञानिक/विधिक दाबी लेल प्रमाणक कसौटी कायम राखू। प्रमुख तर्क पहिल तर्क—différance स्वयं लिखित भेद द्वारा कार्य करैत अछि। ‘différence’ आ ‘différance’ उच्चारणमे लगभग समान, लिखित रूपमे भिन्न। एहि कारण पद देखबैत अछि जे लेखन वाणीकेँ केवल प्रतिलिपि नहि करैत; कखनो अतिरिक्त भेद संरक्षित करैत अछि। दोसर तर्क—भिन्नता बिना पहचान सम्भव नहि। कोनो संकेत ‘स्वयं’ ओतबे अछि जतबा ओ अन्य संकेत नहि। पहचान सकारात्मक सार मात्र नहि; सीमांकन आ अन्तर सेहो ओकर भाग। तेसर तर्क—स्थगन समयगत अछि। एक शब्दक अर्थ बुझैत काल हम अन्य शब्द, परिभाषा, प्रसंग वा स्मृति दिस जाइत छी। प्रत्येक व्याख्या नूतन संकेतसभक उपयोग करैत अछि; अतः पूर्ण अधिभाषा (meta-language) केर अन्तिम बिन्दु कठिन। चारिम तर्क—ई अनन्त शब्दकोशीय चक्रक साधारण सिद्धान्त नहि। वास्तविक भाषिक व्यवहार संस्थागत बन्दी/स्थिरता (institutional closure) उत्पन्न करैत अछि—अदालत परिभाषा तय करैत, विज्ञान कार्यगत परिभाषा (operational definition) बनबैत, शिक्षक संदर्भ स्पष्ट करैत। मुदा ई बन्दी/स्थिरता (closure) कार्यगत, ऐतिहासिक आ संशोध्य हो सकैत अछि। पाँचम तर्क—चिह्न-छाप (trace) भिन्नता आ स्थगनक सहायक अवधारणा अछि। वर्तमान संकेतमे अनुपस्थित अन्य विकल्पसभक छाप रहैत अछि; जे चुनल गेल ओकर अर्थ जे नहि चुनल गेल ओकर सीमासँ सेहो बनैत अछि। छठम तर्क—समयगत संरचना अर्थक आत्म-उपस्थिति कठिन बनबैत अछि। स्मृति बिना वाक्यक पहिल शब्द अन्तिम शब्द धरि टिकि नहि सकैत; अपेक्षा बिना वाक्यक दिशा बुझब कठिन। अर्थ वर्तमान क्षणमे समयक अनेक स्तर समेटैत अछि। सातम तर्क—पुनरावृत्तिक्षमता (iterability) différance सँ जुड़ल अछि। चिह्न अलग प्रसंगमे दोहरायल जा सकैत अछि; एहि कारण अर्थक निरन्तरता आ परिवर्तन दुनू सम्भव। आठम तर्क—प्रसंग महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा कोनो प्रसंग पूर्णतः बन्द नहि। उद्धरण, भाषान्तर, व्यंग्य, पुनर्प्रकाशन, न्यायिक पुनर्व्याख्या, ऐतिहासिक पुनर्पाठ नूतन सम्बन्ध जोड़ि सकैत अछि। नवम तर्क—‘प्रसंग पूर्ण नहि’ सँ ‘प्रसंग अप्रासंगिक’ निष्कर्ष गलत। उलटे, différance-सचेत पठन अधिक प्रसंग माँगैत अछि—शब्दक इतिहास, पाठीय स्थान, पूर्व प्रयोग, विधा, वक्ता/लेखक, संस्था आ पाठक परिस्थिति। दसम तर्क—भिन्नता सामाजिक सत्ता सँ जुड़ि सकैत अछि। ‘मानक/अमानक’, ‘सामान्य/असामान्य’, ‘नागरिक/विदेशी’, ‘शुद्ध/अशुद्ध’ जकाँ श्रेणी भेद द्वारा संस्थागत प्रभाव उत्पन्न करैत अछि। एगारहम तर्क—मुदा प्रत्येक भेद अन्याय नहि। चिकित्सा, विज्ञान, कानून आ दैनिक जीवनमे भिन्नता पहिचान आवश्यक। आलोचनाक प्रश्न ई अछि—भेद तथ्य/कार्यपर आधारित की मनमाना पदानुक्रम बनबैत? बारहम तर्क—différance वस्तुगत यथार्थकेँ नकारैत नहि। ‘विषाक्त’ आ ‘अविषाक्त’ शब्द सांस्कृतिक भेद होइतहुँ वास्तविक रासायनिक परिणामक फरक सूचित करि सकैत अछि। तेरहम तर्क—सत्य-वाक्यक अर्थ मध्यस्थित होइत अछि, मुदा सत्य-मूल्य यथार्थक साक्ष्यसँ नियंत्रित भऽ सकैत अछि। ‘आज वर्षा भेल’क शब्दार्थ प्रसंग-सापेक्ष, मुदा मौसमीय घटना मनमाना नहि। पूर्वपक्ष पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे différance स्पष्ट अर्थक सम्भावना कमजोर करैत अछि। यदि अर्थ लगातार स्थगित, तँ सफल संप्रेषणक तथ्य कोना समझाओल जाए? दोसर पूर्वपक्ष विश्लेषणात्मक दर्शनसँ अछि—‘भिन्नता’ आ ‘स्थगन’ बहुत व्यापक रूपक छथि; सटीक अर्थ-सिद्धान्त (precise semantic theory) बिना ओ दार्शनिक रूपेँ अस्पष्ट रहि सकैत छथि। तेसर पूर्वपक्ष विज्ञानसँ अछि—वैज्ञानिक शब्दक कार्यगत परिभाषा (operational definition) प्रायः पर्याप्त स्पष्ट होइत अछि; अर्थक अनन्त स्थगन वैज्ञानिक अभ्यासक वास्तविकता नहि देखबैत। चारिम पूर्वपक्ष इतिहाससँ अछि—यदि प्रत्येक पाठक नूतन अर्थक सम्भावना अछि, तँ मूल ऐतिहासिक अर्थ आ बादक ग्रहण-इतिहास (reception) अलग कोना राखब? पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय तुलना सँ अछि—अपोह, शून्यता, अनेकान्तवाद वा स्फोटकेँ différance संग जोड़ैत काल सतही समानता ऐतिहासिक भिन्नता दबा सकैत अछि। उत्तरपक्ष पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—स्थगन संप्रेषण-असम्भवता नहि। भाषा कार्यगत स्थिरता पबैत अछि; प्रश्न पूर्ण अन्तिम आत्म-उपस्थिति पर अछि, स्थानीय पर्याप्त अर्थपर नहि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—différance औपचारिक अर्थ-सिद्धान्त (formal semantic theory) नहि, तत्त्वमीमांसक/पाठीय आलोचना (metaphysical/textual critique) क औजार अछि। ताहि कारण समानान्तर दर्शन ओकरा दाबी-विशिष्ट विश्लेषणसँ जोड़ैत अछि, तर्क/प्रमाणक विकल्प नहि बनबैत। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—वैज्ञानिक कार्यगत परिभाषा (operational definition) कार्यगत बन्दी/स्थिरता (closure) क उत्कृष्ट उदाहरण अछि। नूतन खोज परिभाषा संशोधित करि सकैत अछि; संशोध्यता अर्थ-अराजकता नहि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—ऐतिहासिक अर्थ आ ग्रहण-इतिहास (reception) अलग स्तर छथि। मूल पाठक शब्दावली, काल, संस्था आ उपलब्ध साक्ष्य द्वारा ऐतिहासिक अर्थ (historical meaning) अनुमानित कएल जाए; बादक पुनर्पाठक इतिहास अलग दर्ज हो। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय सिद्धान्तसभ स्वतंत्र रहय: अपोह ≠ différance; शून्यता ≠ différance; अनेकान्तवाद ≠ différance; स्फोट ≠ différance। साझा प्रश्न केवल भेद, निर्भरता, भाषिक बोध वा सीमा धरि। भारतीय संवाद दिङ्नाग–धर्मकीर्तिक अपोह सिद्धान्त वर्गीय अर्थक अन्यक अपवर्जनसँ सम्बन्धित अछि। भेदक दार्शनिक महत्त्व दुनू ठाम देखाइत अछि, मुदा अपोह बौद्ध ज्ञानमीमांसा/अर्थमीमांसाक विशिष्ट सिद्धान्त, différance उत्तर-संरचनात्मक पाठ–तत्त्वमीमांसा आलोचनाक पद। मध्यमक शून्यता सब वस्तुक स्वभाव-सिद्ध स्वतन्त्र अस्तित्व पर प्रश्न उठबैत अछि; ई प्रतीत्यसमुत्पादक तत्त्वमीमांसा आ मुक्तिक परियोजना सँ जुड़ल। différance भाषिक चिह्न, समय, लेखन आ उपस्थिति-विमर्शक अलग पृष्ठभूमि रखैत अछि। जैन अनेकान्तवाद बहुपक्षीय वस्तु-वर्णनक अनुशासन दैत अछि। ई ‘अर्थ स्थगित’ दाबी नहि; वस्तु/दृष्टिक सम्बन्ध आ कथनक सापेक्ष सीमाक अलग तत्त्वमीमांसक–ज्ञानमीमांसक सिद्धान्त अछि। भर्तृहरिक स्फोट भाषिक बोधक समग्रता पर बल दैत अछि; différance अर्थक भिन्नता–स्थगन पर। दुनूकेँ एकहि प्रणाली बनाबयब ठीक विपरीत दार्शनिक केन्द्रसभकेँ मिला देत। नव्य-न्याय différance लेल फलदायी प्रतिपक्ष अछि। नव्य-न्याय दाबीक अवच्छेदन, सम्बन्ध आ परिभाषाक सीमा अधिकाधिक स्पष्ट करैत अछि; différance हर बन्दी/स्थिरता (closure) क ऐतिहासिक/भिन्नतागत शर्तपर प्रश्न उठबैत अछि। संवादक प्रश्न—कतेक बन्दी/स्थिरता (closure) पर्याप्त, कतेक अस्थिरता स्वीकार्य? मीमांसा तात्पर्य, वाक्यार्थ आ प्रसंगद्वारा स्थिर अर्थक शर्त विश्लेषित करैत अछि। एहि कारण différance संग तुलना ‘अर्थ अस्थिर’ बनाम ‘अर्थ स्थिर’ नहि, बल्कि अर्थक सामाजिक/पाठीय निर्धारणक अलग सिद्धान्तसभक संवाद अछि। भारतीय संवादक सूत्र—समान शब्द नहि, समान प्रश्न सेहो सावधानीसँ; ऐतिहासिक प्रभाव केवल प्रमाणसँ। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मिथिलाक समानान्तर दृष्टि différance केँ ऐतिहासिक शब्द-अर्थ जाँचबाक चेतावनी रूपमे उपयोग करैत अछि। ‘मिथिला’, ‘मैथिली’, ‘जाति’, ‘समुदाय’, ‘पण्डित’, ‘शास्त्र’, ‘लोक’ जकाँ पद अलग कालमे अलग भेद-जालमे अर्थ पबैत छथि। एहि कारण आधुनिक शब्दार्थ अतीतपर स्वतः आरोपित नहि करू। स्रोत-काल, लेखक, संस्था, भाषा, लिपि, उद्देश्य आ समकालीन अन्य पदसभक सम्बन्ध जाँचू। पंजी वा शाखा-पुस्तकमे कोनो सामाजिक पद उपस्थित होयबाक तिथि महत्त्वपूर्ण अछि। बादक स्थिर श्रेणीकेँ पहिनेक कालपर पश्चदृष्टिसँ (retrospectively) थोपब संरचनात्मक भ्रम उत्पन्न करि सकैत अछि। मैथिली भाषाक क्षेत्रीय रूपसभ भिन्नता द्वारा अर्थ/पहचान बनबैत छथि; मानक रूप संप्रेषणक कार्यगत बन्दी/स्थिरता (closure) दैत अछि। मानकीकरण उपयोगी हो सकैत अछि, मुदा इतिहास/विविधताकेँ मिटाबय नहि। लोकभाषा आ शास्त्रीय पदावलीक सम्बन्ध एकदिश नहि। लोकप्रयोग नव शब्द शास्त्रमे दे सकैत अछि; विशेषज्ञीय शब्द लोकभाषामे अर्थ बदलि सकैत अछि। अर्थक प्रवाह इतिहासक साक्ष्य अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि ‘अभिलेखीय मौन’ केँ स्थगित निष्कर्ष मानैत अछि—न प्रमाण होय तऽ ‘अज्ञात’ लिखू; कल्पित अर्थसँ रिक्ति (gap) भरू नहि। गरिमा-आधारित नैतिकता भिन्नता स्वीकारैत अछि, पदानुक्रमित मानव-मूल्य नहि। सामाजिक भिन्नता वास्तविक; समान नैतिक गरिमा आधारभूत। आत्मसमीक्षा—समानान्तर दर्शनक अपने सूत्रसभ सेहो भविष्यक प्रमाण, भाषा-परिवर्तन आ आलोचना द्वारा पुनर्पाठ योग्य रहत। समकालीन प्रयोग कृत्रिम बुद्धि (AI) भाषा-मॉडल शब्दक अर्थ सहप्रयोग-संरचनासँ अनुमानित करैत अछि। भिन्नता-जाल अर्थ उत्पन्न करैत अछि, मुदा मॉडल भीतरक सम्बन्ध बाह्य तथ्यक सत्यापन नहि। अर्थ-समावेशन (semantic embedding) मे शब्द/वाक्य सदिश-संबंध (vector relations) द्वारा निकट/दूर देखाओल जाइत अछि। ई différance केर तकनीकी प्रतिरूप नहि, मुदा सम्बन्ध-आधारित अर्थ (relation-based meaning) क आधुनिक उदाहरण अछि। डिजिटल मंचपर हैशटैग (hashtag), मीम (meme), इमोजी (emoji) आ पुनःअधिगृहीत अपमानजनक पद (reclaimed slur) जकाँ संकेत सामाजिक पुनरावृत्तिद्वारा अर्थ बदलि सकैत अछि। प्रसंग बदललासँ शब्दक नैतिक/राजनीतिक प्रभाव बदलि सकैत अछि। कानूनमे ‘युक्तिसंगत (reasonable)’, ‘हानि (harm)’, ‘सहमति (consent)’, ‘सार्वजनिक हित (public interest)’ जकाँ पद स्थिर शब्दकोशीय अर्थ नहि, पूर्वनिर्णय (precedent) आ संस्थागत व्याख्या (institutional interpretation) सँ विकसित होइत अछि। तथापि न्यायालयी निर्णय (court decision) कार्यगत बन्दी/स्थिरता (closure) दैत अछि। विज्ञानमे ‘ग्रह (planet)’, ‘जीन (gene)’, ‘प्रजाति (species)’, ‘बुद्धि (intelligence)’ जकाँ पदक परिभाषा शोधक इतिहाससँ बदलल अछि। संशोधित अर्थ वैज्ञानिक विफलता नहि, ज्ञान-वृद्धिक संकेत हो सकैत अछि। इतिहासमे शब्दक अर्थ कालगत रूपेँ बदलैत अछि; आधुनिक श्रेणी (modern category) द्वारा पुरान दस्तावेज पढ़लासँ काल-विस्थापन (anachronism) उत्पन्न हो सकैत अछि। différance-सचेत इतिहास शब्द-इतिहास (lexical history) क महत्त्व बढ़बैत अछि। सार्वजनिक विमर्शमे एक शब्दक अनेक राजनीतिक अर्थ हो सकैत अछि। समाधान ‘सभ अर्थ सही’ नहि; वक्ता, संस्था, विधिक परिभाषा, ऐतिहासिक प्रयोग आ दाबी-परिणाम स्पष्ट करब। अध्याय-निष्कर्ष différance देरिदाक दर्शनमे भिन्नता आ स्थगनक संयुक्त संकेत अछि। अर्थ अन्य संकेतसभसँ भेदद्वारा बनैत अछि आ पूर्ण आत्म-उपस्थित वस्तु रूपमे एक क्षणमे समाप्त नहि होइत। ई पद अर्थ-असम्भवता वा सापेक्षतावादक घोषणापत्र नहि। सामाजिक प्रयोग, व्याकरण, इतिहास, संस्था आ प्रसंग पर्याप्त कार्यगत स्थिरता दैत छथि। चिह्न-छाप, पुनरावृत्तिक्षमता, समयगत स्मृति/अपेक्षा आ प्रसंग-परिवर्तन différance क अर्थ विस्तृत करैत अछि। भारतीय अपोह, शून्यता, अनेकान्तवाद, स्फोट अथवा नव्य-न्यायसँ समस्या-संवाद सम्भव, ऐतिहासिक पहचान नहि। समानान्तर सूत्र—‘अर्थ पूर्णतः बन्द नहि; पूर्णतः मुक्त सेहो नहि। भिन्नता देखू, स्थगन स्वीकारू, प्रसंग जाँचू, प्रमाणसँ दाबी सीमित करू।’ अध्याय-ग्रन्थसूची • जाक देरिदा — ‘Différance’ निबन्ध, ‘दर्शनक हाशिया’ (Margins of Philosophy) मे। • जाक देरिदा — ‘व्याकरणशास्त्र पर’ (Of Grammatology)। • जाक देरिदा — ‘वाणी आ घटना’ (Speech and Phenomena)। • जाक देरिदा — ‘लेखन आ भिन्नता’ (Writing and Difference)। • जाक देरिदा — ‘स्थितियाँ’ (Positions)। • जाक देरिदा — ‘सीमित इन्क.’ (Limited Inc)। • जोनाथन कलर — ‘विखण्डन पर’ (On Deconstruction)। • क्रिस्टोफर नॉरिस — ‘विखण्डन: सिद्धान्त आ अभ्यास’ (Deconstruction: Theory and Practice)। • रॉडॉल्फ गाशे — ‘दर्पणक टाँका’ (The Tain of the Mirror)। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • नागार्जुन — मूलमध्यमककारिका। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • गौतम — न्यायसूत्र। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • बी. के. मतिलाल — ‘शब्द आ जगत’ (The Word and the World); ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)।