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समस्या
लेखन आ वाणीकेँ बहुत काल धरि एहन पदानुक्रममे सोचल गेल जाहिमे वाणीकेँ जीवित चेतना, वक्ताक उपस्थित अभिप्राय आ तत्काल अर्थक निकट मानल गेल, जबकि लेखनकेँ अनुपस्थित वक्ताक बादक प्रतिलिपि, सहायक स्मृति वा द्वितीयक अभिव्यक्ति मानल गेल। देरिदा एहि पदानुक्रम पर प्रश्न उठबैत छथि। यदि वाणी वास्तवमे विचारक सीधा उपस्थित रूप होइत, तँ बोलल शब्दकेँ पहिचानयोग्य, दोहरायल जा सकयवला, सामाजिक नियमबद्ध चिह्न किएक होयबाक चाही? प्रत्येक बोलल शब्द अन्य लोक द्वारा, अन्य समयमे, अन्य प्रसंगमे पुनः पहिचानल जा सकैत अछि—यही पुनरावृत्तिक्षमता ओकर भाषिक स्वरूपक शर्त अछि। लेखन एहि दूरी, पुनरावृत्ति आ अनुपस्थितिक संरचनाकेँ अधिक स्पष्ट करैत अछि। मुदा देरिदाक व्यापक ‘लेखन’ अवधारणा कागजपर अक्षर मात्र नहि; ई चिह्नक एहन संरचना सूचित करैत अछि जे मूल वक्ता, मूल प्रसंग अथवा तत्काल उपस्थित चेतना सँ परे सेहो काम करि सकैत अछि। एतयसँ ‘केन्द्र’क प्रश्न उठैत अछि। कोनो व्यवस्था स्थिर राखबाक लेल केन्द्र उपयोगी हो सकैत अछि—संविधानक मूल सिद्धान्त, शब्दकोशीय मानक, संस्थागत परिभाषा, पाठक मुख्य प्रतिपादन। मुदा जँ केन्द्रकेँ परिवर्तन, आलोचना, इतिहास आ सम्बन्धक बाहर राखल जाए, तखन ओ संरचनाक विशेषाधिकारित अपवाद बनि जाइत अछि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—वाणी आ लेखनक वास्तविक भिन्नता मानैतहुँ पदानुक्रमक दार्शनिक विशेषाधिकार कोना जाँचल जाए? केन्द्रक व्यावहारिक आवश्यकता आ केन्द्रवादक आलोचना बीच भेद कोना राखल जाए? आ लेखन, अभिलेख, डिजिटल पाठ तथा संस्थागत स्मृति समानान्तर दर्शनमे कोन भूमिका निभबैत अछि?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे वाणी आ लेखन अलग माध्यम छथि, मुदा वाणी ‘शुद्ध उपस्थित अर्थ’ आ लेखन ‘द्वितीयक प्रतिलिपि’—एहन कठोर पदानुक्रम दार्शनिक रूपेँ टिकैत नहि। दुनू चिह्न, पुनरावृत्ति, सामाजिक नियम आ प्रसंगक संरचनामे कार्य करैत छथि। लेखनक महत्त्व एहि तथ्यकेँ उजागर करबामे अछि जे अर्थ वक्ताक जीवित उपस्थिति पर पूर्ण निर्भर नहि। पाठ अनुपस्थित लेखक, दूरस्थ पाठक, नूतन काल आ नूतन संस्था भीतर पुनः सक्रिय हो सकैत अछि। केन्द्र उपयोगी हो सकैत अछि, मुदा आलोचनासँ मुक्त नहि। कार्यगत केन्द्र (operational centre) व्यवस्था, मानकीकरण वा निर्णय लेल आवश्यक हो सकैत अछि; तत्त्वमीमांसक केन्द्र (metaphysical centre) केँ अन्तिम, स्वयं-सिद्ध आ अपरिवर्तनीय मानब अलग दाबी अछि। समानान्तर सूत्र—‘वाणी सुनू, लेखन पढ़ू, दुनूक प्रसंग जाँचू; केन्द्र बनाउ तऽ ओकर सीमा लिखू; अभिलेख राखू, मुदा अभिलेखकेँ सम्पूर्ण सत्य नहि मानू।’
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—वाणी स्वयं चिह्नात्मक अछि। बोलल ध्वनि तखन भाषिक अछि जखन सामाजिक रूपेँ पहिचानल जा सकय, अन्य अवसरपर दोहरायल जा सकय आ अन्य वक्ता द्वारा प्रयुक्त हो सकय। अतः वाणी पूर्ण निजी उपस्थित अर्थ नहि। दोसर तर्क—लेखन अनुपस्थितिक संग काम करैत अछि। लेखक उपस्थित नहि रहितहुँ लिखित वाक्य पढ़ल जा सकैत अछि; पाठक प्रश्न पूछि सकैत अछि; संस्था निर्णय ले सकैत अछि। ई दूरी लेखनक दोष नहि, ओकर कार्यक्षमता अछि। तेसर तर्क—दूरी अर्थक जोखिम सेहो बनबैत अछि। पाठ गलत उद्धृत, प्रसंगहीन, अनुवादित, विडम्बनात्मक अथवा संस्थागत रूपेँ पुनर्वर्गीकृत भऽ सकैत अछि। एहि कारण लेखन स्थिरता आ अस्थिरता दुनू बढ़बैत अछि। चारिम तर्क—लेखन स्मृति संस्थागत करैत अछि। कानून, करार, इतिहास, विज्ञान, वंशावली, प्रशासन, साहित्य आ शिक्षा दीर्घकालिक समन्वय लिखित अभिलेखद्वारा सम्भव करैत अछि। वाणी मात्र पर निर्भर व्यवस्था एहन विस्तार कठिन पाएत। पाँचम तर्क—मुदा लिखित अभिलेख स्वतः अधिक सत्य नहि। झूठ, त्रुटि, प्रचार, जाली दस्तावेज, चयनात्मक रिकॉर्ड आ सत्ता-निर्मित मौन लिखित रूपमे सेहो रहि सकैत अछि। माध्यमक स्थायित्व = सत्यता नहि। छठम तर्क—केन्द्र व्यवस्था बनबैत अछि। शब्दकोश मानक अर्थ, न्यायालय प्रामाणिक/अधिकृत व्याख्या (authoritative interpretation), विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम, राज्य विधिक परिभाषा, शोध परियोजना कार्यगत परिभाषा (operational definition) तय करि सकैत अछि। केन्द्र बिना अनेक जटिल संस्था काम नहि करि सकैत। सातम तर्क—मुदा केन्द्रक अधिकारक स्रोत स्पष्ट हो। ‘ई मानक किएक?’, ‘ककर संस्थागत अधिकारसँ?’, ‘संशोधन प्रक्रिया की?’, ‘अपील सम्भव अछि की?’—ई प्रश्न केन्द्रवादक आलोचना बनैत अछि। आठम तर्क—लेखक अर्थक महत्त्वपूर्ण स्रोत अछि, अन्तिम स्रोत नहि। लेखकक अभिप्राय, काल, पत्राचार, संस्करण आ शब्दावली ऐतिहासिक व्याख्या लेल महत्त्वपूर्ण; मुदा पाठक वास्तविक भाषिक संरचना, विरोधाभास, अनपेक्षित अर्थ आ बादक ग्रहण लेखकक घोषित अभिप्रायसँ अधिक हो सकैत अछि। नवम तर्क—‘लेखन’क व्यापक अर्थ संस्था, स्मृति आ कोड धरि फैलि सकैत अछि, मुदा सावधानी चाही। डीएनए (DNA), संगणकीय कोड (computer code), वास्तु, अनुष्ठान सभकेँ सहज रूपेँ ‘लेखन (writing)’ कहब रूपकक अति-विस्तार हो सकैत अछि। विश्लेषणमे माध्यम-विशिष्ट भिन्नता सुरक्षित रहय। दसम तर्क—केन्द्र/हाशिया द्वैध स्वयं गतिशील अछि। जे भाषा-रूप एक समय ‘हाशिया’ छल, मानकीकरण वा डिजिटल प्रसार बाद केन्द्र बनि सकैत अछि; जे संस्था केन्द्र छल, राजनीतिक परिवर्तन बाद गौण भऽ सकैत अछि। एगारहम तर्क—लेखन सत्ता वितरित करैत अछि। साक्षरता, अभिलेख पहुँच, प्रमाणपत्र, हस्ताक्षर, भूमि-दस्तावेज, नागरिकता-पत्र, परीक्षा-उत्तर, न्यायिक याचिका—ई सभ लिखित प्रणाली व्यक्तिक अधिकारक वास्तविक परिणाम बदलैत अछि।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे वाणी आ लेखनक समानता अतिशयोक्ति अछि। आमने-सामने वाणीमे प्रश्न, स्वर, देह-भाषा, तुरन्त सुधार आ प्रसंग उपलब्ध; लेखनमे ई सभ नहि। दोसर पूर्वपक्ष कहैत अछि जे लेखकक अभिप्राय कमजोर कएलासँ ऐतिहासिक व्याख्या मनमानी भऽ सकैत अछि। लेखक जे कहय चाहैत छलाह, ओ केंद्रीय प्रमाण रहबाक चाही। तेसर पूर्वपक्ष संस्थागत व्यवहारसँ अछि—केन्द्र निरन्तर आलोचनासँ अस्थिर होय तऽ कानून, शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन आ भाषा-मानक कार्यक्षमता गमा सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष डिजिटल संसारसँ अछि—विकेन्द्रीकरणक रोमानीकरण साइबर-अराजकता, गलत सूचना, पहचान-चोरी आ जवाबदेहीक अभाव बढ़ा सकैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय तुलना सँ अछि—श्रुति/स्मृति, मौखिक वेदपरम्परा, लिपि, भाष्य आ शास्त्रार्थक भारतीय इतिहासकेँ वाणी/लेखनक यूरोपीय पदानुक्रमक भीतर रखब ऐतिहासिक रूपेँ गलत हो सकैत अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—वाणी आ लेखन समान माध्यम नहि; दार्शनिक प्रश्न प्राथमिकता पर अछि। वाणी अधिक तत्काल संवाद दे सकैत अछि, लेखन अधिक स्थायी दूरी। एहि कार्यगत भिन्नतासँ वाणी = शुद्ध अर्थ आ लेखन = भ्रष्ट प्रतिलिपि निष्कर्ष नहि निकलैत। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—लेखकीय अभिप्राय ऐतिहासिक प्रमाण अछि। समानान्तर पद्धति ओकरा नकारैत नहि; पाठक भाषिक संरचना, सम्पादन-इतिहास, पाठक ग्रहण आ संस्थागत उपयोगक संग एक प्रमाण-स्तर रूपमे रखैत अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—कार्यगत केन्द्र आवश्यक अछि। आलोचनाक उद्देश्य निरन्तर निर्णय-असम्भवता नहि, बल्कि निर्णयक कारण, अवधि, संशोधन प्रक्रिया आ जवाबदेही स्पष्ट करब। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—विकेन्द्रीकरण स्वतः मूल्य नहि। बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्रक अर्थ शक्ति विभाजन, पारदर्शिता, अपील, अधिकार-सुरक्षा आ परस्पर नियंत्रण; केन्द्रहीन अराजकता नहि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय इतिहास अपन पदावलीसँ पढ़ल जाए। श्रुति, पाठ, स्मृति, लेखन, भाष्य, पाण्डुलिपि, मौखिक शिक्षणक वास्तविक इतिहास पहिले; देरिदीय तुलना बादमे समस्या-संवाद रूपमे।
भारतीय संवाद
वैदिक मौखिक परम्परामे ध्वनि, उच्चारण, क्रम आ स्मृति अत्यन्त सूक्ष्म तकनीकद्वारा संरक्षित भेल। एहि इतिहासकेँ ‘वाणी लेखनसँ श्रेष्ठ’क सामान्य तत्त्वमीमांसक प्रतिपादन (metaphysical thesis) मे घटाबयब उचित नहि; अनुष्ठानिक, शिक्षणीय आ ध्वन्यात्मक कारण अलग जाँचबाक चाही। मीमांसा शब्दक प्रामाण्य, वाक्यार्थ, विधि आ परम्परा पर जटिल सिद्धान्त विकसित करैत अछि। लिखित/मौखिक माध्यमक भेदसँ अधिक शब्दप्रमाण आ धर्मज्ञानक प्रश्न केन्द्रीय अछि। भर्तृहरि वाणी/भाषिक बोधक समग्रता पर विचार करैत छथि, मुदा ‘वाणी-केन्द्रित दार्शनिक (speech-centred philosopher)’ कहब आधुनिक श्रेणी आरोपित करब होयत। न्याय शब्दप्रमाणमे वक्ता, वाक्य, अर्थ आ विश्वसनीयता जाँचैत अछि। माध्यम मात्र नहि, स्रोतक योग्यता आ ज्ञानोत्पत्ति निर्णायक अछि—एहि कारण लिखित दस्तावेज हो वा वाणी, प्रमाणिकता अलग जाँचल जाए। नव्य-न्याय स्पष्ट परिभाषा आ सम्बन्धक माध्यमेँ कार्यगत केन्द्र बनबैत अछि: तकनीकी शब्दावली (technical vocabulary) विश्लेषणक स्थिरता दैत अछि। मुदा परम्परामे परवर्ती संशोधन देखबैत अछि जे तकनीकी केन्द्र सेहो ऐतिहासिक आ विकसित हो सकैत अछि। बौद्ध आ जैन ग्रन्थ-परम्परासभ मौखिकता, संहिताकरण, भाषान्तर, पाण्डुलिपि आ भाष्यक जटिल इतिहास रखैत छथि। एहि इतिहासक तथ्यात्मक अध्ययन बिना ‘उपस्थिति/अनुपस्थिति (presence/absence)’क रूपक लागू नहि कएल जाए। भारतीय संवादक सूत्र—माध्यमक इतिहास पहिने, तत्त्वमीमांसक तुलना (metaphysical comparison) बादमे।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक बौद्धिक इतिहासमे पाण्डुलिपि, मौखिक शिक्षण, शास्त्रार्थ, पंजी, प्रशासनिक लेखन, मैथिली साहित्य, संस्कृत टीका आ आधुनिक मुद्रण परस्पर जुड़ल माध्यम-संसार बनबैत छथि। कोनो एक माध्यम सम्पूर्ण परम्पराक केन्द्र नहि। पंजी वा शाखा-पुस्तक लिखित प्रमाण होइतहुँ स्वतः त्रुटिरहित नहि; नकल, तिथि, अन्तःक्षेप (interpolation), बादक टिप्पणी, शाखागत भिन्नता आ संरक्षित/असंरक्षित सामग्री जाँचल जाए। लोकगीत, मौखिक कथा, स्त्रीक गीत, श्रम-संस्कृति आ प्रदर्शन लिखित स्रोतक ‘कमतर संस्करण’ नहि। मुदा मौखिक स्मृति सेहो समय, पुनरावृत्ति, सामाजिक प्रतिष्ठा आ वर्तमान अपेक्षासँ बदलि सकैत अछि। मैथिली मानकीकरण संप्रेषण, शिक्षा आ प्रकाशन लेल कार्यगत केन्द्र दैत अछि। समानान्तर दृष्टि मानक रूप उपयोगी मानैत अछि, मुदा क्षेत्रीय रूप, तिरहुता, देवनागरी, मौखिक भिन्नता वा डिजिटल प्रयोगकेँ ‘अवैध’ नहि मानैत। विदेह जकाँ डिजिटल अभिलेखीकरण परियोजनामे लेखनक नूतन स्वरूप देखाइत अछि—एचटीएमएल (HTML), पीडीएफ (PDF), श्रव्य-प्रतिलिपि (audio transcript), अधितथ्य (metadata), खोज (search), आरएसएस (RSS), अभिलेख (archive)। ई सभ सामग्रीक उपस्थितिक अलग-अलग शर्त बनबैत अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि अभिलेखक अनुपस्थिति स्पष्ट लिखैत अछि। स्रोत उपलब्ध नहि तऽ ‘अज्ञात’; आंशिक साक्ष्य तऽ ‘सम्भाव्य’; परस्पर विरोधी तऽ ‘विवादित’। बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्रक भाषिक रूप—कोनो एक अकादमी, विश्वविद्यालय, राज्य, सम्पादक अथवा डिजिटल मंच मैथिली अर्थक अन्तिम स्वामी नहि; मुदा संस्थागत मानक, सम्पादन आ प्रमाण-प्रक्रिया आवश्यक रहैत अछि। आत्मसमीक्षा—समानान्तर दर्शनक अपना शब्दकोश, अध्याय-संरचना आ सिद्धान्तसभ सेहो कार्यगत केन्द्र छथि; भविष्यक आलोचना, नूतन प्रमाण आ बेहतर परिभाषाद्वारा संशोध्य रहबाक चाही।
समकालीन प्रयोग
डिजिटल संचारमे ‘लिखित’ पाठ स्थिर नहि रहि सकैत—पोस्ट सम्पादित, हटाओल, स्क्रीनशॉट कएल, उद्धृत, अनुवादित वा कलनविधीय रूपेँ पुनःउद्भासित (algorithmically resurfaced) भऽ सकैत अछि। लेखनक स्थायित्व आब संस्करण-इतिहासक प्रश्न बनि गेल अछि। कृत्रिम बुद्धि (AI) द्वारा उत्पन्न पाठमे लेखक-उपस्थिति जटिल अछि। प्रणाली भाषा उत्पन्न करैत अछि, मुदा जिम्मेदार अभिकर्ता, प्रशिक्षण-स्रोत, उद्देश्य आ संस्थागत उत्तरदायित्व (institutional accountability) अलग मानवीय/संस्थागत स्तर पर रहैत अछि। ई-मेल, डिजिटल हस्ताक्षर, क्लिक-सहमति आ स्मार्ट अनुबन्ध लिखित भाषिक क्रियाक नूतन रूप छथि। ‘क्लिक भेल’ = ‘सूचित सहमति’ स्वतः नहि; अधिकार, सूचना, दबाव आ प्रक्रिया जाँचल जाए। सामाजिक माध्यमक केन्द्र दृश्य रूपेँ उपयोगकर्ता-समुदाय हो सकैत अछि, मुदा अनुशंसा-क्रमांकन (recommendation ranking), सामग्री-संयमन (moderation), विज्ञापन-अवसंरचना (advertising infrastructure) आ स्वामित्व (ownership) वास्तविक शक्ति-केन्द्र बना सकैत अछि। ज्ञानकोश, खोज-इंजन (search engine) आ कृत्रिम-बुद्धि सहायक (AI assistant) नूतन ज्ञानमीमांसक केन्द्र (epistemic centres) बनि सकैत छथि। उपयोगकर्ता जे पहिने देखैत अछि, ओकरा ‘सामान्य ज्ञान’ मानि सकैत अछि; एहि कारण स्रोत-पारदर्शिता आ बहुविध पहुँच (plural access) महत्त्वपूर्ण अछि। कानूनमे संविधान (constitution) वा पूर्वनिर्णय (precedent) कार्यगत केन्द्र दैत अछि। मुदा संशोधन, न्यायिक पुनरावलोकन (judicial review), अधिकार-आक्षेप (rights challenge) आ लोकतान्त्रिक प्रक्रिया देखबैत अछि जे केन्द्र स्थिर होइतहुँ आलोचनासँ मुक्त नहि। भाषा-नीतिमे मानक वर्तनी (standard orthography) शिक्षा लेल उपयोगी केन्द्र दैत अछि; डिजिटल इनपुट (digital input), अभिगम्यता (accessibility), क्षेत्रीय रूप (regional forms) आ ऐतिहासिक लिपि (historical scripts) लेल लचीला समर्थन (flexible support) आवश्यक हो सकैत अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
वाणी आ लेखन अलग माध्यम छथि, मुदा वाणी शुद्ध उपस्थित अर्थ आ लेखन मात्र द्वितीयक प्रतिलिपि—एहन पदानुक्रम टिकैत नहि। दुनू पुनरावृत्ति, सामाजिक नियम, प्रसंग आ चिह्नक संरचनामे कार्य करैत छथि। लेखन दूरी, स्मृति, अभिलेख आ संस्थागत स्थायित्व सम्भव बनबैत अछि; साथे प्रसंग-वियोग, गलत उद्धरण आ सत्ता-नियन्त्रित अभिलेखक जोखिम सेहो बढ़बैत अछि। केन्द्र व्यवस्था लेल आवश्यक हो सकैत अछि, मुदा केन्द्रक वैधता, सीमा, अवधि, संशोधन आ अपील स्पष्ट रहय। कार्यगत केन्द्र ≠ तत्त्वमीमांसक अन्तिम आधार। भारतीय मौखिक/लिखित परम्पराक इतिहास अपन तथ्य, संस्था आ पदावलीसँ पढ़ल जाए; श्रुति = वाणी-विशेषाधिकार (speech privilege) अथवा पाण्डुलिपि = देरिदीय लेखन (Derridean writing) जकाँ समानता अस्वीकार्य। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मौखिक, पाण्डुलिपीय, मुद्रित आ डिजिटल सभ माध्यमक प्रमाण-मूल्य अलग जाँचैत अछि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘केन्द्र चाही तऽ ओकर कारण लिखू; लेखन राखू तऽ स्रोत जाँचू; वाणी सुनू तऽ प्रसंग जाँचू; हाशिया खोलू तऽ प्रमाण समान राखू।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• जाक देरिदा — ‘व्याकरणशास्त्र पर’ (Of Grammatology)। • जाक देरिदा — ‘लेखन आ भिन्नता’ (Writing and Difference)। • जाक देरिदा — ‘वाणी आ घटना’ (Speech and Phenomena)। • जाक देरिदा — ‘मानव विज्ञानक विमर्शमे संरचना, संकेत आ खेल’ (Structure, Sign, and Play in the Discourse of the Human Sciences)। • जाक देरिदा — ‘सीमित इन्क.’ (Limited Inc)। • रोलाँ बार्थ — ‘लेखकक मृत्यु’ (The Death of the Author)। • मिशेल फूको — ‘लेखक की अछि?’ (What Is an Author?)। • जोनाथन कलर — ‘विखण्डन पर’ (On Deconstruction)। • क्रिस्टोफर नॉरिस — ‘विखण्डन: सिद्धान्त आ अभ्यास’ (Deconstruction: Theory and Practice)। • पाणिनि — अष्टाध्यायी। • पतञ्जलि — महाभाष्य। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • बी. के. मतिलाल — ‘शब्द आ जगत’ (The Word and the World)।