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समस्या
‘विखण्डन’ शब्द सुनितेँ अक्सर तीन गलत धारणा सामने अबैत अछि—पहिल, ई कोनो पाठ अथवा सिद्धान्तकेँ नष्ट करबाक पद्धति अछि; दोसर, ई कहैत अछि जे कोनो निश्चित अर्थ सम्भव नहि; तेसर, ई मानैत अछि जे सत्य, प्रमाण आ तर्क सभ केवल सत्ता अथवा भाषा-क्रीड़ा छथि। देरिदाक दार्शनिक परियोजना एहि तीनू सरलीकरणसँ अलग अछि। विखण्डन (deconstruction) कोनो तैयार सूत्र नहि जे प्रत्येक पाठपर एकहि क्रममे लागू हो। ई पाठक भीतरक संरचना, विशेषाधिकार, दबायल निर्भरता, अनुपस्थित शर्त, अपवाद, रूपक, विरोधाभास आ सीमा जाँचबाक आलोचनात्मक अभ्यास अछि। एहि अभ्यासमे आलोचक बाहरसँ ‘अर्थ थोपैत’ नहि; पाठक अपने दाबी, उदाहरण, पदावली आ तर्ककेँ एतेक नजदीकसँ पढ़ैत अछि जे ओ देखय—जे बात केन्द्रमे कहल गेल अछि, ओ कखनो हाशियाक पदपर निर्भर अछि; जे भेद स्थिर मानल गेल, ओ पाठक भीतरएँ डगमगा सकैत अछि। मुदा जँ विखण्डन केवल विघटन रहि जाए, तखन दार्शनिक काज अधूरा रहत। सामाजिक निर्णय, इतिहास, विज्ञान, कानून, नैतिकता आ सार्वजनिक तर्क लेल पुनर्निर्माण आवश्यक अछि—कौन दाबी पर्याप्त प्रमाणपर टिकैत अछि, कौन परिभाषा संशोधन चाहैत अछि, कौन पदानुक्रम नैतिक रूपेँ अस्वीकार्य अछि? एहि अध्यायक समस्या तेँ दूहरा अछि—विखण्डन वास्तवमे की करैत अछि? आ की नहि करैत अछि? समानान्तर दर्शन एहि प्रश्नकेँ ‘पढ़ू → प्रश्न करू → विखण्डित करू → प्रमाण जाँचू → पुनर्निर्माण करू’ क्रममे विकसित करैत अछि।
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे विखण्डन पाठक भीतरक दार्शनिक तनाव खोलबाक पद्धति अछि; ई नष्टिकरण नहि, बल्कि अवधारणा, भेद, पदानुक्रम आ अर्थक शर्तक सूक्ष्म परीक्षण अछि। विखण्डनक पहिल लक्ष्य कोनो पदानुक्रमकेँ उलटि दोसर पदकेँ स्थायी विजेता बनाबयब नहि। यदि वाणी/लेखनमे लेखनकेँ गौण मानल गेल, तँ विखण्डन केवल ‘लेखन श्रेष्ठ’ नहि कहत; ओ देखत जे दुनू पद कतेक परस्पर निर्भर छथि। विखण्डनक दोसर लक्ष्य दाबीकेँ असम्भव सिद्ध करब नहि। ओ दाबी कतेक सीमा धरि टिकैत अछि, कोन शर्तपर, कोन अपवादक संग, कोन दबायल धारणा पर—ई स्पष्ट करैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि पद्धतिकेँ पुनर्निर्माणक संग जोड़ैत अछि: ‘विखण्डनक बाद जे बचैत अछि, ओकरा प्रमाण, यथार्थ, गरिमा आ सार्वजनिक तर्कक कसौटी पर फेर बनाउ।’
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—विखण्डन पाठक निकट-पठन अछि। दाबीक मुख्य शब्द, परिभाषा, उदाहरण, रूपक, निषेध, अपवाद आ मौनकेँ ध्यानसँ पढ़ल जाए; आलोचना पाठीय आधार बिना नहि। दोसर तर्क—पदानुक्रम पहचानब जरूरी अछि। अनेक द्वैध-विरोध सममित नहि: मूल/प्रतिलिपि, वाणी/लेखन, केन्द्र/हाशिया, सामान्य/असामान्य, शुद्ध/मिश्रित। प्रश्न ई अछि—कौन पद सामान्य मानल गेल, कौन अपवाद? तेसर तर्क—विखण्डन केवल उलटब नहि। जँ हाशियाकेँ केन्द्र बनाओल गेल आ पुरान केन्द्रकेँ नूतन हाशिया, तँ संरचना मात्र उलटि गेल; आलोचनात्मक समस्या समाप्त नहि भेल। चारिम तर्क—पाठक स्वयं अपन दाबीक विरुद्ध साक्ष्य दे सकैत अछि। उदाहरणार्थ ‘शुद्ध मूल’क रक्षा करैत पाठ यदि लगातार पूरक, अनुवाद, टिप्पणी वा बाहरी मान्यतापर निर्भर हो, तँ ‘मूलक पूर्णता’ प्रश्नांकित होइत अछि। पाँचम तर्क—अपवाद दाबीक सीमा खोलैत अछि। एक अपवाद प्रत्येक नियम नष्ट नहि करैत, मुदा नियम कतेक व्यापक अछि, एहि प्रश्नकेँ पुनः खोलि सकैत अछि। छठम तर्क—विखण्डनक पद्धति अवधारणात्मक ऋण देखबैत अछि। कोनो पद जेकरा नकारैत अछि, कखनो ओकरा बिना स्वयं परिभाषित नहि भऽ सकैत। ‘शुद्ध’ ‘अशुद्ध’ बिना, ‘केन्द्र’ ‘हाशिया’ बिना, ‘मूल’ ‘प्रतिलिपि’ बिना अर्थपूर्ण नहि। सातम तर्क—भाषिक अस्थिरता वस्तुगत अनिश्चितताक समान नहि। पाठक भीतर अर्थ-विवाद हो सकैत अछि; एहि सँ बाहरी घटना स्वतः अनिश्चित नहि भऽ जाइत। आठम तर्क—विखण्डन ऐतिहासिक पठनकेँ तीक्ष्ण करि सकैत अछि। कोन पद कखन सामान्य बनल, कोन संस्थाद्वारा, ककर प्रतिरोधक बावजूद—ई प्रश्न अवधारणाक इतिहास खोलैत अछि। नवम तर्क—विखण्डन सत्ता-विमर्शक साधन हो सकैत अछि, मुदा ‘सत्ता = असत्य’ सूत्र नहि। शक्तिशाली संस्था सही तथ्य सेहो कहि सकैत अछि; हाशियागत स्रोत गलत सेहो हो सकैत अछि। प्रमाण समान राखू। दसम तर्क—विखण्डन नैतिक आलोचनामे उपयोगी तखन अछि जखन श्रेणी व्यक्तिक गरिमा घटबैत अछि, जन्माधारित पदानुक्रमकेँ प्राकृतिक मानैत अछि, अथवा अपमानजनक भेदकेँ सामान्यीकृत करैत अछि। एगारहम तर्क—प्रत्येक भेद विखण्डनीय होइतहुँ प्रत्येक भेद समाप्त करबाक नहि। विज्ञान, कानून, चिकित्सा, भाषा आ प्रशासनमे कार्यगत भेद (distinction) आवश्यक हो सकैत अछि; प्रश्न ओकर आधार, सीमा आ परिणामक अछि। बारहम तर्क—विखण्डनक बाद निर्णय सम्भव अछि। अदालत निर्णय दैत अछि, वैज्ञानिक निष्कर्ष प्रकाशित होइत अछि, शब्दकोश अर्थ प्रस्तावित करैत अछि, इतिहासकार तिथि निश्चित करैत अछि—सभ निर्णय संशोध्य हो सकैत अछि, असम्भव नहि। तेरहम तर्क—आत्मसमीक्षा विखण्डनक नैतिक शर्त अछि। आलोचक अपन शब्दावली, केन्द्र, स्रोत-चयन आ नैतिक मानक सेहो प्रश्नक दायरेमे राखय। चौदहम तर्क—विखण्डन अपन सफल रूपमे बौद्धिक विनम्रता उत्पन्न करैत अछि: ‘हमरा जे स्पष्ट लगैत अछि, ओकर शर्त की? हमर दाबी कहाँ कमजोर? प्रतिपक्ष हमरा की देखबैत अछि?’ पन्द्रहम तर्क—समानान्तर दर्शन विखण्डनकेँ पाँच-चरणीय पद्धति बनबैत अछि: पढ़ू → प्रश्न करू → विखण्डित करू → प्रमाण जाँचू → पुनर्निर्माण करू। एहि अंतिम चरण बिना आलोचना सार्वजनिक दर्शन नहि बनि सकैत।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे विखण्डन अन्ततः निर्णय-विरोधी अछि। यदि प्रत्येक पदानुक्रम, परिभाषा आ केन्द्र प्रश्नयोग्य, तखन कखन निर्णय लेब? दोसर पूर्वपक्ष विश्लेषणात्मक दर्शनसँ अछि—विखण्डनक भाषा अस्पष्ट अछि; औपचारिक तर्क (formal argument), पूर्वधारणा–निष्कर्ष संरचना (premise-conclusion structure) आ स्पष्ट वैधता-परीक्षण (validity test) बिना आलोचना साहित्यिक प्रभावपर निर्भर भऽ सकैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष इतिहाससँ अछि—पाठक आन्तरिक तनाव पर अधिक बल देलासँ लेखकक वास्तविक ऐतिहासिक आशय, संस्था आ घटना छूटि सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष नैतिकता सँ अछि—यदि गरिमा, न्याय, समानता आदि अवधारणा सेहो विखण्डनीय, तखन नैतिक प्रतिरोधक स्थिर आधार कोना? पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय तुलना सँ अछि—शून्यता, अपोह, अनेकान्तवाद, नेति-नेति वा अनिर्वचनीयताकेँ विखण्डनक ‘भारतीय संस्करण’ कहब सरल मुदा भ्रामक अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—प्रश्नयोग्यता निर्णय-असम्भवता नहि। निर्णय लेल पर्याप्त कारण, उपलब्ध प्रमाण, समयसीमा आ उत्तरदायित्व तय कएल जाए; भविष्यक सुधारक द्वार खुलल रहय। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—विखण्डन औपचारिक तर्कशास्त्र (formal logic) क विकल्प नहि। जहाँ तर्कीय वैधता (validity) महत्त्वपूर्ण, औपचारिक विश्लेषण करू; जहाँ पदानुक्रम, रूपक, बहिष्कार आ पाठीय तनाव (tension) महत्त्वपूर्ण, विखण्डनात्मक पठन जोड़ू। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—ऐतिहासिक पठनमे लेखकक आशय, पाठक संस्करण, संस्था, तिथि आ ग्रहण-इतिहास अलग साक्ष्य छथि। विखण्डन एहि सभक स्थानापन्न नहि; अतिरिक्त प्रश्न-पद्धति अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—नैतिक सिद्धान्त आलोचना-सापेक्ष होइतहुँ कार्यगत आधार बनि सकैत अछि। समान गरिमा एहन त्रुटिसंशोध्य सार्वभौम प्रतिबद्धता अछि जे प्रभावित व्यक्तिक अनुभव, सार्वजनिक तर्क आ मानव-हितद्वारा निरन्तर जाँचल जाए। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय सिद्धान्तसभक स्वतंत्र इतिहास सुरक्षित रहय: शून्यता ≠ विखण्डन; अपोह ≠ विखण्डन; अनेकान्तवाद ≠ विखण्डन; नेति-नेति ≠ विखण्डन।
भारतीय संवाद
मध्यमक शून्यता स्थिर स्वभावक आलोचना करैत अछि; विखण्डन पाठक अवधारणात्मक पदानुक्रम आ उपस्थितिक विशेषाधिकार खोलैत अछि। समानता केवल ‘स्थिर आधारपर प्रश्न’ धरि; दार्शनिक लक्ष्य, पद्धति आ मुक्ति-सन्दर्भ अलग। बौद्ध अपोह अर्थक अन्यक अपवर्जनसँ सम्बन्धित सिद्धान्त अछि। विखण्डनात्मक भेद/चिह्न-छाप (difference/trace) संग ऐतिहासिक पहचान नहि। जैन अनेकान्तवाद बहुपक्षीय प्रतिपादनक अनुशासन दैत अछि। ई ‘अर्थक अन्तहीन स्थगन’ नहि, बल्कि वस्तु/दृष्टिक अनेक पक्षक शर्तबद्ध कथन अछि। उपनिषदक ‘नेति-नेति’ विशिष्ट ब्रह्म-विमर्शक सन्दर्भमे निषेधात्मक पद्धति अछि; ओकरा विखण्डन (deconstruction) कहब श्रेणी-दोष। न्याय–नव्य-न्याय विखण्डनक सबल प्रतिपक्ष प्रस्तुत करैत अछि। परिभाषा, अवच्छेदक, सम्बन्ध, अभाव आ प्रमाण द्वारा ओ अस्पष्टता कम करैत अछि; विखण्डन पूछैत अछि—ई बन्दी/स्थिरता (closure) कहाँ धरि टिकैत अछि? मीमांसा पाठ, विधि, तात्पर्य, प्रसंग आ भाष्यद्वारा अर्थक अनुशासित व्याख्या दैत अछि। एहि कारण भारतीय संवादक महत्त्वपूर्ण प्रश्न—अर्थक सीमा कतेक खुलल, कतेक निर्धारित? शास्त्रार्थीय पूर्वपक्ष–उत्तरपक्ष विखण्डनसँ एक नहि, मुदा एक साझा बौद्धिक नैतिकता अछि—प्रतिपक्षक सबल रूप प्रस्तुत करू, अपन दाबीकेँ प्रतिरोधक सामने राखू। भारतीय संवादक निष्कर्ष—विखण्डनकेँ भारतीय मूल खोजबाक आवश्यकता नहि; भारतीय दर्शन ओकर सबल संवाद-सहचर आ आलोचक दुनू हो सकैत अछि।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि विखण्डनकेँ शास्त्रार्थक आत्मसमीक्षात्मक विस्तार रूपमे उपयोग करैत अछि। कोनो अवधारणा पहिने परिभाषित हो, ओकर प्रतिपक्ष सबल रूपमे प्रस्तुत हो, फेर दाबीक भीतरक सीमा जाँचल जाए। इतिहासलेखनमे ‘मिथिला’, ‘मैथिली’, ‘ब्राह्मण’, ‘जाति’, ‘राज्य’, ‘परम्परा’, ‘शास्त्र’ जकाँ पद स्वतः शाश्वत अर्थ नहि रखैत। प्रत्येक कालमे स्रोत-आधारित अर्थ जाँचू। अभिलेखमे केन्द्र–हाशिया सम्बन्ध जाँचू। दरबारी/संस्थागत स्रोत अधिक बाँचल हो सकैत अछि; लोक, स्त्री, श्रम, निम्नसत्ता वा मौखिक सामग्री कम। मुदा हाशिया स्वतः तथ्यिक सत्य नहि। पंजी अथवा वंशावलीक श्रेणी इतिहासमे बादमे स्थिर भेल हो सकैत अछि; ओकरा पूर्वकालपर थोपब ऐतिहासिक काल-विस्थापन बनि सकैत अछि। मैथिली मानक वर्तनी उपयोगी कार्यगत केन्द्र अछि; क्षेत्रीय रूपसभ ओकर ‘गलत प्रतिलिपि’ नहि। विखण्डनात्मक प्रश्न मानकक इतिहास खोलैत अछि, मुदा संप्रेषणक मानक आवश्यकता नकारैत नहि। गरिमा-आधारित नैतिकता विखण्डनक बाद पुनर्निर्माणक कसौटी अछि। जन्माधारित श्रेष्ठता विखण्डित करू; व्यक्ति केर समान गरिमा पुनःस्थापित करू। बहुप्रमाणीय विवेकवाद आलोचना केँ प्रमाणसँ जोड़ैत अछि। पाठक अस्पष्टता (ambiguity) देखलासँ ऐतिहासिक तथ्य नष्ट नहि; उलटे अतिरिक्त स्रोतक आवश्यकता स्पष्ट होइत अछि। आत्मसमीक्षा—समानान्तर दर्शन स्वयं ‘समानान्तर’ शब्द, मिथिला-पद्धतिगत गृहभूमि, सात सिद्धान्त आ अपन ग्रन्थ-संरचनाकेँ आलोचनासँ मुक्त अन्तिम केन्द्र नहि मानत।
समकालीन प्रयोग
कृत्रिम बुद्धि (AI) वर्गीकरणमे विखण्डनात्मक प्रश्न उपयोगी अछि—कोन श्रेणी पूर्वनिर्धारित (category default)? कोन सीमांत मामला (edge case)? कोन प्रशिक्षण-लेबल (training label) ‘सामान्य (normal)’ मानल गेल? मुदा लेखापरीक्षण (audit) क लक्ष्य प्रणाली (system) नष्ट करब नहि, बेहतर वर्गीकरण (classification) आ उत्तरदायित्व (accountability) बनाबयब। भाषा-मॉडल निर्गत (output) क ‘सुसंगतता’ स्वयं प्राधिकार (authority) बनि सकैत अछि। विखण्डन पूछैत अछि—कौन स्रोत अनुपस्थित? कोन पूर्वधारणा (premise) छिपल? कौन वैकल्पिक पठन (alternative reading)? समानान्तर चरणमे फेर बाह्य सत्यापन (external verification) कएल जाए। कानूनमे द्वैध श्रेणियाँ (binary categories)—वयस्क/अल्पवयस्क (adult/minor), नागरिक/अनागरिक (citizen/non-citizen), सार्वजनिक/निजी (public/private)—कार्यगत आवश्यक हो सकैत अछि। विखण्डन सीमांत मामला (boundary case) आ असमान परिणाम (unequal consequence) खोलैत अछि; विधिक पुनर्निर्माण अधिक स्पष्ट परिभाषा/अपील-प्रक्रिया (clearer definition/appeal mechanism) देत। चिकित्सामे सामान्य/असामान्य भेद (normal/abnormal distinction) उपयोगी, मुदा सांख्यिकीय मानक (statistical norm) = नैतिक मूल्य (moral worth) नहि। रोग-वर्गीकरण सुधारू, व्यक्ति गरिमा अक्षुण्ण राखू। इतिहासमे आधिकारिक अभिलेख (official archive) क श्रेणी (category) व्यवस्था नूतन प्रश्न दबा सकैत अछि। ‘विविध (miscellaneous)’, ‘जनजातीय (tribal)’, ‘देशज/लोकभाषीय (vernacular)’, ‘घरेलू (domestic)’ जकाँ पुरान लेबल (labels) शोधक दृष्टि प्रभावित करि सकैत अछि। साहित्यिक आलोचनामे विखण्डन पाठक भीतर विरोधाभास (contradiction), रूपक (metaphor), मौन (silence) आ पदानुक्रम (hierarchy) खोलि सकैत अछि; मुदा पाठक जे चाहय से अर्थ नहि। पाठीय साक्ष्य (text evidence) अनिवार्य। शिक्षामे आलोचनात्मक पठन (critical reading) क अर्थ विद्यार्थीकेँ ‘सभ गलत’ सिखाबयब नहि; दाबी, स्रोत, शब्द, अपवाद, पूर्वाग्रह (bias) आ प्रतिप्रमाण (counter-evidence) जाँचबाक अनुशासन सिखाबयब अछि। सार्वजनिक विमर्शमे पहिचान-श्रेणियाँ (identity categories) विखण्डनीय हो सकैत छथि, मुदा भेदभाव-आँकड़ा (discrimination data) सङ्कलन लेल कखनो ओही श्रेणीक (categories) कार्यगत उपयोग कार्यगत उपयोग आवश्यक। नीति मे आलोचना आ प्रशासन दुनू संतुलित हो।
अध्याय-निष्कर्ष
विखण्डन नष्टिकरण नहि; पाठक भीतरक पदानुक्रम, निर्भरता, अपवाद, मौन, सीमा आ आत्म-विरोधक सूक्ष्म पठन अछि। विखण्डन मनमाना अर्थ नहि; पाठीय संरचना, भाषा, प्रसंग, इतिहास आ प्रमाण आलोचनाकेँ नियंत्रित करैत अछि। विखण्डन सत्य-विरोधी नहि; अर्थक मध्यस्थता आ दाबीक शर्त स्पष्ट करैत अछि। तथ्यात्मक दाबी फेरो प्रमाणसँ जाँचल जाए। विखण्डन केवल उलटब नहि; हाशियाकेँ नूतन केन्द्र बना देब पुरान पदानुक्रमक पुनरावृत्ति हो सकैत अछि। भारतीय शून्यता, अपोह, अनेकान्तवाद, नेति-नेति अथवा अनिर्वचनीयताकेँ विखण्डनक पूर्वरूप कहल जाए तऽ ऐतिहासिक भिन्नता नष्ट होयत। समानान्तर दर्शनक निर्णायक सूत्र—‘पढ़ू → प्रश्न करू → विखण्डित करू → प्रमाण जाँचू → पुनर्निर्माण करू।’ आलोचनाक लक्ष्य शून्यता नहि, अधिक स्पष्ट, अधिक न्यायपूर्ण आ अधिक त्रुटिसंशोध्य प्रतिपादन अछि।
अध्याय-ग्रन्थसूची
• जाक देरिदा — ‘व्याकरणशास्त्र पर’ (Of Grammatology)। • जाक देरिदा — ‘लेखन आ भिन्नता’ (Writing and Difference)। • जाक देरिदा — ‘दर्शनक हाशिया’ (Margins of Philosophy)। • जाक देरिदा — ‘वितरण/प्रसरण’ (Dissemination)। • जाक देरिदा — ‘स्थितियाँ’ (Positions)। • जाक देरिदा — ‘सीमित इन्क.’ (Limited Inc)। • जोनाथन कलर — ‘विखण्डन पर’ (On Deconstruction)। • क्रिस्टोफर नॉरिस — ‘विखण्डन: सिद्धान्त आ अभ्यास’ (Deconstruction: Theory and Practice)। • रॉडॉल्फ गाशे — ‘दर्पणक टाँका’ (The Tain of the Mirror)। • पॉल द मान — ‘अंधता आ अन्तर्दृष्टि’ (Blindness and Insight)। • नागार्जुन — मूलमध्यमककारिका। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)।