Full chapter text
समस्या
भारतीय दर्शन आ विखण्डनक तुलना अत्यन्त आकर्षक, मुदा अत्यन्त जोखिमपूर्ण क्षेत्र अछि। शून्यता, अपोह, अनेकान्तवाद, अनिर्वचनीयता, नेति-नेति, अभाव, भाष्य-परम्परा आ शास्त्रार्थ—ई सभमें एहन बिन्दु भेटि सकैत अछि जे स्थिर अर्थ, स्थिर स्वभाव, एकल दृष्टि वा प्रतिपादनक सीमा पर प्रश्न उठबैत अछि। मुदा समान प्रश्न = समान सिद्धान्त नहि। सबसे सामान्य त्रुटि ई अछि जे नागार्जुनकेँ ‘देरिदा सँ बहुत पहिने विखण्डनवादी’, अपोहकेँ ‘भारतीय भिन्नता-स्थगन (différance)’, अनेकान्तवादकेँ ‘भारतीय सापेक्षतावाद (relativism)’, अथवा अद्वैतक अनिर्वचनीयताकेँ ‘अर्थक स्थगन’ घोषित कएल जाए। एहन तुलना ऐतिहासिक प्रभावक प्रमाण बिना दार्शनिक भिन्नता मिटा दैत अछि। दोसरो खतरा उलटा अछि—भारतीय परम्पराकेँ केवल स्थिर, तत्त्वमीमांसक, परम्परावादी आ पश्चिमी उत्तर-संरचनावादकेँ मात्र आलोचनात्मक मानब। भारतीय शास्त्रार्थ, भाष्य, खण्डन, पूर्वपक्ष–उत्तरपक्ष, नय, अपोह, स्वभाव-आलोचना आ अभाव-विचार स्वयं अत्यन्त जटिल आलोचनात्मक पद्धति विकसित करैत छथि। तेसर समस्या तुलना-कसौटीक अछि। की तुलना ऐतिहासिक प्रभावपर हो? समान शब्दपर? समान समस्या पर? समान कार्यपर? समान निष्कर्षपर? यदि एहि स्तरसभकेँ अलग नहि कएल जाए, तखन साम्य अतिशयोक्ति बनि जाइत अछि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—भारतीय दर्शन आ विखण्डनक बीच फलदायी संवाद कोना बनाओल जाए जे न पूर्वरूपवाद (precursorism) हो, न सांस्कृतिक आत्ममुग्धता, न भिन्नता-अस्वीकार? समानान्तर दर्शनक उत्तर अछि: समस्या-साम्य, अवधारणात्मक संरचना, तर्क, भिन्नता, सीमा आ प्रमाण अलग-अलग दर्ज करू।
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे भारतीय दर्शन आ विखण्डनक बीच ऐतिहासिक पहचान नहि, मुदा अनेक गम्भीर समस्या-संवाद सम्भव अछि। तुलनाक सही स्तर ‘कौन प्रश्न उठैत अछि?’ आ ‘कौन पद्धतिसँ उत्तर देल जाइत अछि?’ अछि। नागार्जुन स्थिर स्वभाव (svabhāva)क आलोचना करैत छथि; देरिदा उपस्थितिक तत्त्वमीमांसा, पदानुक्रम आ स्थिर केन्द्र पर प्रश्न उठबैत छथि। दुनू स्थिर आधारक आलोचना करैत छथि, मुदा लक्ष्य, तर्क, भाषा, ऐतिहासिक परम्परा आ मुक्ति-सन्दर्भ अलग। अपोह अर्थक वर्गीय सीमांकनमे अन्यक अपवर्जनक भूमिका देखबैत अछि; différance भिन्नता–स्थगन आ चिह्न-छापक संरचना खोलैत अछि। दुनू भेदक महत्त्व स्वीकारैत अछि, मुदा अर्थमीमांसक/ज्ञानमीमांसक ढाँचा भिन्न। अनेकान्तवाद बहुपक्षीय यथार्थ-वर्णनक अनुशासन अछि; विखण्डन स्थिर द्वैध-पदानुक्रमक आन्तरिक निर्भरता खोलैत अछि। अनेकान्तवाद = सापेक्षतावाद नहि; विखण्डन = मनमाना अर्थ नहि। समानान्तर सूत्र—‘साम्य समस्या-स्तरपर राखू; भिन्नता सिद्धान्त-स्तरपर स्पष्ट करू; प्रभाव केवल ऐतिहासिक प्रमाणसँ।’
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—ऐतिहासिक प्रभाव आ दार्शनिक साम्य अलग। कोनो भारतीय विचारक देरिदापर प्रभाव डाललाह—एहन दाबी लेल प्रत्यक्ष पाठ, अनुवाद, पत्राचार, अध्ययन, उद्धरण अथवा ऐतिहासिक संपर्क चाही। केवल अवधारणात्मक समानता प्रभावक प्रमाण नहि। दोसर तर्क—नागार्जुनक शून्यता ‘किछु नहि’ नहि। शून्यता स्वभाव-सिद्ध स्वतन्त्र अस्तित्वक निषेध अछि; प्रतीत्यसमुत्पादक संग गहिर सम्बन्ध रखैत अछि। एहि कारण शून्यता = शून्यवाद (nihilism) अथवा विखण्डन (deconstruction)—दुनू गलत। तेसर तर्क—मध्यमक आलोचना प्रतिपक्षक प्रतिज्ञाक आन्तरिक परिणाम खोलि सकैत अछि। एहि कारण विखण्डनात्मक पठनसँ कार्यगत साम्य देखाइत अछि; मुदा मध्यमक तर्कशास्त्रीय–सोतिरियोलॉजिकल उद्देश्य अलग। चारिम तर्क—अपोह भेदपर आधारित होइतहुँ différance नहि। दिङ्नाग–धर्मकीर्ति शब्दक सामान्य अर्थ/वर्गीय बोध के अन्यक अपवर्जनद्वारा स्पष्ट करबाक प्रयास करैत छथि। देरिदा स्थिर संकेतित, उपस्थितिक विशेषाधिकार आ भिन्नता–स्थगनक प्रश्न उठबैत छथि। पाँचम तर्क—जैन अनेकान्तवाद वस्तुक अनेक पक्ष मानैत अछि, न कि सत्यक अनुपस्थिति। नय/दृष्टिबिन्दु (standpoint) कथनक सीमा स्पष्ट करैत अछि; स्याद्वाद शर्तबद्ध प्रतिपादनक अनुशासन दैत अछि। ई सापेक्षतावाद नहि। छठम तर्क—अनेकान्तवादक नैतिक शिक्षा बौद्धिक अहिंसा आ प्रतिपक्षक सीमित सत्यांश स्वीकारबाक दिशामे विकसित भऽ सकैत अछि; मुदा विखण्डनक पदानुक्रम-विच्छेदनक पद्धति अलग। सातम तर्क—अद्वैतक अनिर्वचनीयता माया/जगतक स्थिति सम्बन्धी विशिष्ट तत्त्वमीमांसक समस्या अछि। ‘न सत्, न असत्’ प्रकारक दार्शनिक कठिनाइ केँ भाषिक अनिर्णेयता (linguistic undecidability) कहब श्रेणी-दोष। आठम तर्क—उपनिषदिक नेति-नेति निषेधात्मक संकेत अछि; उद्देश्य ब्रह्मकेँ सीमित वस्तुगत गुणसभमे कैद नहि करब। ई पाठीय विखण्डन (deconstruction) क सामान्य पद्धति नहि। नवम तर्क—न्यायीय अभाव अनुपस्थितिक वस्तुगत/ज्ञानमीमांसक विश्लेषण अछि। ‘घटाभाव’ किसी स्थलपर घटक अभावक ज्ञेय स्थिति हो सकैत अछि; ई देरिदीय चिह्न-छाप (trace) अथवा अनुपस्थिति (absence) क समानार्थी नहि। दसम तर्क—नव्य-न्याय विखण्डनक प्रतिपक्षीय संवादमे विशेष महत्त्वपूर्ण अछि। विखण्डन बन्दी/स्थिरता (closure) क शर्त पूछैत अछि; नव्य-न्याय दाबी के अधिक सटीक अवच्छेदन द्वारा सीमित/स्पष्ट करैत अछि। दुनूक संयुक्त संवाद ‘अर्थ खुलल की बन्द?’ सँ अधिक सूक्ष्म—‘कतेक सीमा पर्याप्त?’—प्रश्न बनबैत अछि। एगारहम तर्क—मीमांसा अर्थक अनुशासन दैत अछि: आकांक्षा, योग्यता, सन्निधि, तात्पर्य, विधि, प्रसंग। विखण्डन अर्थक दबायल निर्भरता खोलैत अछि। तुलना स्थिरता बनाम अराजकता नहि, बल्कि अर्थ-निर्धारणक अलग सिद्धान्तसभक संवाद। बारहम तर्क—भर्तृहरिक स्फोट अर्थ-बोधक समग्रता पर बल दैत अछि; विखण्डन अर्थक भिन्नता, चिह्न-छाप (trace) आ पुनरावृत्ति पर। एहि कारण स्फोट = संरचनावाद/विखण्डन (structuralism/deconstruction) दाबी विशेष रूपेँ गलत।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे ऐतिहासिक भिन्नता पर एतेक जोर देलासँ तुलना निष्फल भऽ जाएत। यदि प्रत्येक परम्परा ‘अलग’ अछि, तखन विश्व-दर्शन संवाद सम्भव कोना? दोसर पूर्वपक्ष कहैत अछि जे नागार्जुनक स्वभाव-आलोचना, जैन बहुपक्षीयता आ अपोहक भेद-सिद्धान्त वास्तवमे उत्तर-संरचनात्मक सोचक समान रूप छथि; ‘पूर्वरूप’ शब्द न प्रयोग केलहुँ दार्शनिक समानता प्रबल अछि। तेसर पूर्वपक्ष भारतीय परम्परा-समर्थक अछि—आधुनिक पाश्चात्य सिद्धान्तक शब्दावली भारतीय दर्शनपर लगाबयब स्वयं औपनिवेशिक बौद्धिक केन्द्रवाद अछि। चारिम पूर्वपक्ष विखण्डन-समर्थक अछि—भारतीय दार्शनिक यथार्थवाद, आत्मा, धर्म, मुक्ति वा प्रमाणक स्थिर श्रेणी अंततः उपस्थितिक तत्त्वमीमांसा (metaphysics of presence) क रूप छथि; हुनका विखण्डित कएल जाए। पाँचम पूर्वपक्ष पद्धतिगत अछि—‘समस्या-साम्य’ स्वयं विश्लेषक द्वारा बनाओल जा सकैत अछि; चयनात्मक उदाहरण तुलना केँ पुष्ट करबाक पूर्वाग्रह (bias) पैदा करैत अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—भिन्नता संवादक शत्रु नहि, शर्त अछि। यदि दुनू पक्ष पहिने समान बना देल जाए, तखन संवाद नहि, आत्म-प्रतिबिम्ब रहि जाइत। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—दार्शनिक साम्य स्तरित करू: समस्या-साम्य, अवधारणात्मक साम्य, कार्यगत साम्य, तर्क-साम्य, निष्कर्ष-साम्य। प्रत्येक स्तर अलग प्रमाण माँगैत अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—आधुनिक तुलनात्मक शब्दावली उपयोगी पुल हो सकैत अछि, शर्त ई कि मूल भारतीय पद, पाठ, ऐतिहासिक सन्दर्भ आ आन्तरिक प्रतिपक्ष प्राथमिक रहय। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—‘उपस्थितिक तत्त्वमीमांसा (metaphysics of presence)’ केँ सार्वभौम हथौड़ा नहि बनाओल जाए। न्यायीय यथार्थवाद वा मीमांसक प्रामाण्यक आलोचना हुनकर अपने तर्क/प्रमाणक आधारपर हो, नाम-मात्रसँ ‘वचनकेन्द्रवादी (logocentric)’ नहि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—तुलनाक चयन पारदर्शी राखू; विरोधी उदाहरण, असमानता आ अपवाद लिखू। समानान्तर दर्शनक नियम—साम्य जतए, ततेक मात्र; भिन्नता जतए, ओतए स्पष्ट।
भारतीय संवाद
नागार्जुनक मूलमध्यमककारिका स्वभाव, कारणता, गति, आत्मा, समय, निर्वाण आदि पर क्रमिक आलोचना करैत अछि। एहि तर्कक उद्देश्य स्थिर तत्त्वमीमांसक आधारक सरल प्रतिस्थापन नहि, स्वभाव-सिद्ध दृष्टिक आलोचना अछि। देरिदासँ संवाद ‘स्थिर आधारक समस्या’ धरि सुरक्षित। दिङ्नाग–धर्मकीर्ति परम्परामे अपोह भाषा/विचार आ वास्तविक विशेष (particular) बीच सम्बन्धक समस्या हल करबाक प्रयास अछि। एतय अर्थक नकारात्मक सीमांकन एक ज्ञानमीमांसक परियोजना अछि, पाठीय अनिर्णेयता (textual undecidability) नहि। जैन अनेकान्तवाद यथार्थवादक भीतर बहुपक्षीयता अछि। वस्तु अनेक धर्म/पर्याय रखैत अछि; दृष्टि सीमित हो सकैत अछि। एहि कारण ‘दृष्टि अनेक’ = ‘घटना मनमाना’ नहि। अद्वैत वेदान्तक अनिर्वचनीयता, अध्यास आ माया ब्रह्म–जगत सम्बन्धक विशिष्ट तत्त्वमीमांसक ढाँचामे अछि। विखण्डनक समानार्थी बनबैत काल अद्वैतक मोक्ष, ज्ञान आ ब्रह्म-विचार गायब भऽ जाइत। न्याय–नव्य-न्याय भाषा, तर्क आ यथार्थक सम्बन्ध स्पष्ट करैत अछि। अभाव, सम्बन्ध, अवच्छेदक, विशेषणता आदि पद स्थिरताक यन्त्र मात्र नहि; दाबी-सीमा सूक्ष्म करबाक पद्धति छथि। मीमांसा पाठक प्रामाण्य, विधि, तात्पर्य आ प्रसंग पर सूक्ष्म बहस विकसित करैत अछि। एहि परम्परामे पाठक अर्थ स्थिर करबाक नियम स्वयं विवादित, विकसित आ भाष्यित भेल—ई आन्तरिक आलोचनात्मकता महत्त्वपूर्ण अछि। भर्तृहरि शब्द/वाक्य/बोधक समग्रता पर जटिल विचार करैत छथि। स्फोटक अर्थ ‘गुप्त स्थिर संकेतित (signified)’ नहि, आ ओकरा देरिदीय चिह्न-छाप (Derridean trace) क प्रतिपक्ष रूपमे सरल करब अनुचित। भारतीय संवादक निष्कर्ष—भारतीय दर्शन विखण्डनक ‘पूर्वज’ नहि; ओ स्वतंत्र समकालीन संवाद-सहचर अछि।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि तुलनात्मक दर्शनकेँ स्थानीय गौरवक उपकरण नहि बनबैत। मिथिला पद्धतिगत गृहभूमि अछि—पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष, परिभाषा, प्रमाण, सम्बन्ध, भाष्य, पुनर्परीक्षण—विश्व-दर्शनक एकमात्र उद्गम नहि। नव्य-न्यायीय स्पष्टता विखण्डनक बाद पुनर्निर्माणमे उपयोगी अछि। विखण्डन दाबी खोलैत अछि; नव्य-न्यायीय शैली पूछैत अछि—ठीक विषय की, सम्बन्ध की, सीमा की, अपवाद की? समानान्तर इतिहास-दृष्टि भारतीय अवधारणाकेँ आधुनिक श्रेणीमे कैद नहि करैत। ‘बौद्ध = उत्तर-आधुनिक (postmodern)’, ‘जैन = सापेक्षतावादी (relativist)’, ‘नव्य-न्याय = विश्लेषणात्मक दर्शन (analytic philosophy)’ जकाँ लेबल अस्वीकार्य। मैथिली भाषामे आधुनिक दार्शनिक पदक रूपान्तरण स्वयं आलोचनात्मक कार्य अछि। ‘विखण्डन’, ‘भिन्नता-स्थगन’, ‘चिह्न-छाप’, ‘बहुपक्षीयता’ जकाँ पद स्पष्ट मैथिली व्याख्यासहित देल जाए; अंग्रेजी केवल सहायक कोष्ठकमे। गरिमा-आधारित नैतिकता तुलना में व्यक्ति/समुदायकेँ सभ्यतागत प्रतीक बनायब सँ रोकैत अछि। ‘भारत आध्यात्मिक, पश्चिम तार्किक’ जकाँ द्वैध स्वयं विखण्डनीय आ ऐतिहासिक रूपेँ कमजोर। बहुप्रमाणीय विवेकवाद ग्रन्थ, भाष्य, पाण्डुलिपि, ऐतिहासिक संपर्क, अनुवाद, शब्दावली, सामाजिक प्रयोग आ आधुनिक विद्वत्ता (scholarship) सभकेँ अलग प्रमाण-भार दैत अछि। आत्मसमीक्षा—समानान्तर दर्शन जँ भारतीय अवधारणामे अपने सिद्धान्तक पूर्वरूप खोजय लागय, तखन ओकरा रोकबाक सातम सिद्धान्त आत्मसमीक्षा अछि। प्रभाव केवल प्रमाणसँ; साम्य केवल सीमा सहित।
समकालीन प्रयोग
विश्व-दर्शन पाठ्यक्रममे भारतीय ग्रन्थकेँ ‘पूर्वी उदाहरण’ बनाबयक बदला स्वतंत्र तर्क-पद्धति रूपमे पढ़ल जाए। फिर तुलनात्मक खण्ड (comparative module) मे समान समस्या पर संवाद कराओल जाए। कृत्रिम बुद्धि (AI) आधारित दर्शन-सारांश प्रणाली ‘नागार्जुन = विखण्डन (Nāgārjuna = deconstruction)’ जकाँ आकर्षक पर गलत समतुल्यता (equivalence) बना सकैत अछि। प्रशिक्षण/मूल्यांकनमे काल-विस्थापन-विरोधी नियम (anti-anachronism rule) आ स्रोत-सचेत तुलना (source-aware comparison) आवश्यक। डिजिटल ज्ञानकोशमे परस्पर-सन्दर्भ (cross-reference) उपयोगी अछि—‘तुलना करू (compare with)’ कहू, ‘समान अछि (same as)’ नहि। अवधारणा-पृष्ठपर ऐतिहासिक प्रसंग (historical context), मूल पाठ (primary text), तकनीकी परिभाषा (technical definition) आ तुलना-सावधानी (comparison warning) जोड़ल जाए। अनुवादमे ‘शून्यता = रिक्तता (śūnyatā = emptiness)’ अथवा ‘अपोह = अपवर्जन (apoha = exclusion)’ जकाँ एक-शब्दीय समतुल्य (equivalent) पर्याप्त नहि। मूल पद, मैथिली व्याख्या, प्रसंग आ तकनीकी अर्थ एकसंग देल जाए। सार्वजनिक विमर्शमे ‘हमर परम्परा पहिने सँ सभ जानैत छल’ प्रकारक दावा बौद्धिक आत्मविश्वास नहि, प्रमाणहीन पूर्वरूपवाद (precursorism) हो सकैत अछि। समानान्तर दृष्टि उपलब्धिक सम्मान आ ऐतिहासिक अनुशासन दुनू रखैत अछि। उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययनमे पश्चिमी सिद्धान्तक आलोचना जरूरी, मुदा भारतीय परम्पराकेँ एकरूप पश्चिम-विरोधी प्रतिरूप (homogeneous counter-West) बनाबयब दोसर सारवाद (essentialism) हो सकैत अछि। शोध-लेखनमे तुलना करत काल एक अलग तालिका/अनुच्छेदमे ‘साम्य’, ‘भिन्नता’, ‘ऐतिहासिक प्रभावक स्थिति’, ‘तुलनाक सीमा’ स्पष्ट लिखल जाए।
अध्याय-निष्कर्ष
भारतीय दर्शन आ विखण्डनक बीच फलदायी संवाद सम्भव अछि, मुदा ऐतिहासिक पहचान नहि। समस्या-साम्य के सिद्धान्तगत समानता बनाबयब तुलनात्मक त्रुटि अछि। शून्यता स्वभाव-आलोचना अछि, विखण्डन नहि; अपोह अर्थक अपवर्जन-सिद्धान्त अछि, différance नहि; अनेकान्तवाद बहुपक्षीय यथार्थवाद अछि, सापेक्षतावाद नहि; अनिर्वचनीयता अद्वैत तत्त्वमीमांसा अछि, अर्थ-अराजकता नहि। नव्य-न्याय विखण्डनक प्रतिपक्ष/पूरक संवाद दैत अछि—एक खुलैत, दोसर सीमा स्पष्ट करैत; समानान्तर दर्शन दुनूकेँ प्रमाण-सापेक्ष पुनर्निर्माणमे जोड़ैत अछि। भारतीय भाष्य आ शास्त्रार्थ परम्परा आन्तरिक आलोचनात्मकता रखैत अछि; ओकरा आधुनिक उत्तर-संरचनावादक नाम देबाक आवश्यकता नहि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘साम्य खोजू, पहचान नहि; भिन्नता लिखू, दूरी नहि; प्रभाव कहू तऽ प्रमाण दिअ; संवाद करू, समानीकरण नहि।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• जाक देरिदा — ‘व्याकरणशास्त्र पर’ (Of Grammatology)। • जाक देरिदा — ‘लेखन आ भिन्नता’ (Writing and Difference)। • जाक देरिदा — ‘दर्शनक हाशिया’ (Margins of Philosophy)। • जोनाथन कलर — ‘विखण्डन पर’ (On Deconstruction)। • नागार्जुन — मूलमध्यमककारिका। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • मल्लिषेण — स्याद्वादमञ्जरी। • बी. के. मतिलाल — ‘जैन दर्शनक केन्द्रीय सिद्धान्त: अनेकान्तवाद’ (The Central Philosophy of Jainism: Anekāntavāda)। • शंकराचार्य — ब्रह्मसूत्रभाष्य; उपनिषद-भाष्य, अनिर्वचनीयता/अध्यासक अद्वैत संदर्भ लेल। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • रघुनाथ शिरोमणि — पदार्थतत्त्वनिरूपण। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।