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समस्या
विखण्डन पाठक भीतरक पदानुक्रम, अस्थिरता, छिपल निर्भरता आ अर्थक सीमा खोलैत अछि; नव्य-न्याय परिभाषा, सम्बन्ध, अवच्छेदक, योग्यता, अभाव आ प्रमाणक सूक्ष्म विश्लेषणद्वारा अस्पष्टता घटबैत अछि। एतयसँ आकर्षक प्रश्न उठैत अछि—नव्य-न्याय विखण्डनक प्रतिपक्ष अछि की? यदि ‘प्रतिपक्ष’ सँ आशय ई हो जे नव्य-न्याय स्थिर अर्थ, स्पष्ट सम्बन्ध आ वस्तुगत यथार्थक रक्षा करैत अछि जबकि विखण्डन अर्थक अस्थिरता खोलैत अछि, तँ तुलना किछु स्तरपर उपयोगी लगि सकैत अछि। मुदा ई द्वैत बहुत जल्दी सरलीकरण बनि जाइत अछि। नव्य-न्याय स्थिर अर्थक अन्धविश्वास नहि; ओकर तकनीकी भाषा लगातार दाबीक सीमा बदलैत, परिभाषा सुधारैत, सम्बन्ध सूक्ष्म करैत आ प्रतिपक्षीय आपत्ति समेटैत अछि। एहि अर्थमे ओ स्वयं एक उच्च विकसित त्रुटिसंशोध्य विश्लेषणात्मक परम्परा अछि। विखण्डन सेहो ‘अर्थ नष्ट’ नहि करैत; ओ पूछैत अछि कि कोनो परिभाषा कोन बहिष्कार, पदानुक्रम, इतिहास वा दबायल शर्तपर टिकैत अछि। अतः संघर्ष ‘स्पष्टता बनाम अस्पष्टता’ नहि, बल्कि ‘स्थानीय स्पष्टता कतेक पर्याप्त?’ आ ‘परिभाषा अपनी शर्तसभकेँ कतेक स्वीकारैत अछि?’ पर अछि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—नव्य-न्याय आ विखण्डनक बीच वास्तविक दार्शनिक प्रतिपक्ष, साम्य, पूरकता आ सीमा कोना स्पष्ट कएल जाए बिना हुनका एकहि आधुनिक विवादक दू पक्ष बना देने?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे नव्य-न्याय विखण्डनक ऐतिहासिक अथवा सरल सिद्धान्तगत प्रतिपक्ष नहि; ओ एक स्वतंत्र यथार्थवादी–ज्ञानमीमांसक विश्लेषण-पद्धति अछि जे विखण्डनक प्रश्नसभ लेल शक्तिशाली संवाद-सहचर आ आलोचक बनि सकैत अछि। नव्य-न्याय दाबीक विषय, विशेषण, सम्बन्ध, अवच्छेदक, प्रतियोगी, अनुयोगी, अभाव, व्याप्ति आ प्रमाणक सीमा अधिकाधिक स्पष्ट करैत अछि। ई अर्थक कार्यगत बन्दी/स्थिरता बनबैत अछि, मुदा परवर्ती आपत्ति लेल खुलल रहैत अछि। विखण्डन एहि स्पष्टतापर दोसर प्रश्न जोड़ैत अछि—परिभाषा ककरा बाहर छोड़ैत अछि? कोन पद विशेषाधिकारित? कोन ऐतिहासिक प्रक्रिया एहि स्थिरताकेँ सामान्य बनौलक? कोन अपवाद दाबीक सीमा बदलैत अछि? समानान्तर दर्शन दुनू पद्धतिक संयुक्त अनुशासन प्रस्तावित करैत अछि: ‘पहिने स्पष्ट करू; फेर सीमा खोलू; फेर प्रमाण जाँचू; अन्ततः संशोधित प्रतिपादन बनाउ।’
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—नव्य-न्यायक तकनीकी भाषा अस्पष्टताक विरुद्ध अनुशासन अछि। सामान्य भाषाक ‘सम्बन्ध’, ‘अभाव’, ‘ज्ञान’, ‘कारण’ जकाँ पदक अनेक सम्भव अर्थकेँ अवच्छेदक/सम्बन्धद्वारा सीमित कएल जाइत अछि। दोसर तर्क—ई सीमांकन स्थिर तत्त्वमीमांसक बन्दी (metaphysical closure) नहि। परिभाषा पर आपत्ति, अतिव्याप्ति, अव्याप्ति, असम्भवता वा नूतन उदाहरण आयलासँ शब्दावली आ विश्लेषण सुधारल जाइत अछि। तेसर तर्क—नव्य-न्याय अर्थकेँ जगत, ज्ञान आ भाषिक शक्ति सँ जोड़ैत अछि। शब्दक शक्ति (śakti), वाक्यबोध, सन्दर्भ आ प्रमाणक प्रश्न केवल संकेतसभक अन्तर-जाल नहि; ज्ञानोत्पत्तिक प्रश्न सेहो अछि। चारिम तर्क—गणेरी द्वारा विश्लेषित उत्तरकालीन नव्य-न्याय (late Navya-Nyāya) परम्परामे अर्थक सम्बन्ध आ शब्द-साक्ष्य/गवाही (testimony) क ज्ञानमीमांसक कार्य (epistemic function) गहिर रूपेँ जुड़ल अछि। एहि कारण भाषिक अर्थक उद्देश्य मात्र अर्थगत भेद (semantic difference) नहि, ज्ञान-प्राप्तिक सम्भावना सेहो। पाँचम तर्क—विखण्डन एहि स्पष्टताकेँ नकारैत नहि; ओ पूछि सकैत अछि—जकरा ‘सामान्य’ उदाहरण मानल गेल, ओ ककर अनुभव? जकरा अपवाद कहल गेल, ओ वास्तवमे संरचनात्मक सीमा की? छठम तर्क—नव्य-न्यायीय अभाव विखण्डनक अनुपस्थिति-धारणासँ मूलतः भिन्न अछि। अभाव वस्तुगत/ज्ञानमीमांसक श्रेणी रूपमे विश्लेषित; देरिदीय अनुपस्थिति उपस्थित अर्थक संरचनात्मक निर्भरता/चिह्न-छापसँ जुड़ल। सातम तर्क—प्रतियोगी/प्रतिपक्ष-पदार्थ (counterpositive) आ अनुयोगी/अधिकरण (locus) जकाँ अभाव-संबंधी विश्लेषण अनुपस्थितिक दाबी कतेक विशिष्ट होयबाक चाही, ई देखबैत अछि। ‘अभिलेखमे अमुक वस्तु नहि’ कहितेँ अमुक वस्तु की, कोन अभिलेख, कोन काल, कोन खोज-सीमा—एहि प्रकारक अवच्छेदन आधुनिक इतिहासलेखन लेल फलदायी अछि। आठम तर्क—विखण्डन एहि बाद पूछैत अछि—अभिलेखीय संरचना स्वयं की बचबैत? कोन आवाज दर्ज होयबाक अवसर पबैत? एहि अर्थमे नव्य-न्याय स्थानीय दाबी स्पष्ट करैत, विखण्डन संस्थागत सीमा खोलैत। नवम तर्क—नव्य-न्यायक यथार्थवाद विखण्डन लेल सबल प्रतिपक्ष अछि। यदि हर अर्थ मध्यस्थित, तखन वस्तुगत गुण, सम्बन्ध, कारण आ अभावक ज्ञान कोना सम्भव? एहि प्रश्नकेँ विखण्डन केवल पाठीय अस्थिरतासँ टारि नहि सकैत। दसम तर्क—विखण्डन नव्य-न्याय लेल प्रतिपक्षीय चेतावनी अछि। तकनीकी स्पष्टता सामाजिक तटस्थता नहि; अत्यन्त स्पष्ट वर्गीकरण सेहो अन्यायपूर्ण संस्था द्वारा प्रयुक्त भऽ सकैत अछि। एगारहम तर्क—नव्य-न्यायक परिभाषा-विवेक ‘अर्थ पूर्णतः खुलल’ दाबीकेँ नियंत्रित करैत अछि। प्रत्येक व्यवहारिक संवाद लेल पर्याप्त स्थिरता आवश्यक; अन्यथा प्रमाण, प्रतिपक्ष, निष्कर्ष—किछु सम्भव नहि। बारहम तर्क—विखण्डन ‘पर्याप्त स्थिरता’ केँ ‘पूर्ण अन्तिमता’ बनब सँ रोकैत अछि। कार्यगत परिभाषा संशोध्य रहय, विशेषतः नूतन अनुभव, नूतन स्रोत अथवा बहिष्कृत उदाहरण सामने आयलासँ।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे नव्य-न्याय आ विखण्डनक तुलना असमान अछि—एक शास्त्रीय भारतीय तर्क–ज्ञानमीमांसा, दोसर आधुनिक यूरोपीय पाठ–तत्त्वमीमांसक आलोचना। तुलना स्वयं कृत्रिम संवाद (artificial dialogue) हो सकैत अछि। दोसर पूर्वपक्ष नव्य-न्याय समर्थक अछि—यदि परिभाषा, प्रमाण आ यथार्थ स्पष्ट अछि, तखन विखण्डनात्मक अस्थिरता (deconstructive instability) अनावश्यक बौद्धिक जटिलता मात्र। तेसर पूर्वपक्ष विखण्डन समर्थक अछि—नव्य-न्यायक सूक्ष्म तकनीकी बन्दी/स्थिरता (technical closure) स्वयं वचनकेन्द्रवादी इच्छा (logocentric desire) अछि: अर्थकेँ अति-नियंत्रित करबाक प्रयास। चारिम पूर्वपक्ष सामाजिक आलोचनासँ अछि—नव्य-न्यायीय पाण्डित्य ऐतिहासिक रूपेँ सीमित विशेषज्ञ समुदायमे विकसित भेल; सार्वजनिक लोकतान्त्रिक पद्धति रूपमे ओकर उपयोग बादक पुनर्निर्माण अछि। पाँचम पूर्वपक्ष तुलनात्मक इतिहाससँ अछि—कोनो प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रभाव (historical influence) प्रमाणित नहि; अतः ‘प्रतिपक्ष’ शब्द भ्रामक हो सकैत अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—तुलना इतिहास-समानीकरण नहि, समस्या-संवाद अछि। प्रश्न एकहि: दाबी कतेक स्पष्ट, कतेक संशोध्य, कतेक यथार्थ-सापेक्ष? उत्तर अलग हो सकैत अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—स्पष्ट परिभाषा आवश्यक, मुदा स्वतः पूर्ण नहि। सामाजिक वर्गीकरण, ऐतिहासिक शब्द, विधिक श्रेणी आ पहचान सम्बन्धी अवधारणा नूतन अनुभवक कारण बदलि सकैत अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—नव्य-न्याय बन्दी/स्थिरता (closure) क अन्ध परियोजना नहि; ओकर परम्परा नूतन आपत्ति आ परवर्ती संशोधनद्वारा विकसित भेल। तकनीकी सीमांकन = तत्त्वमीमांसक अन्तिमता नहि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—ऐतिहासिक विशेषज्ञता स्वीकारल जाए। समानान्तर दर्शन ओकर तकनीकी अनुशासनकेँ सार्वजनिक मैथिली, शिक्षा, कानून, डिजिटल ज्ञान आ इतिहासक प्रश्नमे लोकतान्त्रिक पुनर्प्रयोग करैत अछि; ई ऐतिहासिक दावा नहि, समकालीन पद्धतिगत प्रस्ताव। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—प्रत्यक्ष प्रभाव सिद्ध नहि। सही वाक्य—‘ऐतिहासिक प्रभाव सिद्ध नहि; मुदा दार्शनिक संवाद अत्यन्त फलदायी।’
भारतीय संवाद
गङ्गेशक तत्त्वचिन्तामणि प्रमाण-चर्चाकेँ नूतन तकनीकी स्तरपर लऽ जाइत अछि। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द आदि विषयक विश्लेषणमे ज्ञानक कारण, सीमा, दोष आ वैधता सूक्ष्म कएल जाइत अछि। रघुनाथ शिरोमणिक पदार्थतत्त्वनिरूपण परम्परागत पदार्थ-वर्गीकरणपर पुनर्विचार करैत अछि। एहि तथ्यसँ स्पष्ट होइत अछि जे नव्य-न्याय ‘स्थिर परम्परा’ नहि; आन्तरिक पुनर्वर्गीकरण आ दार्शनिक संशोधन सम्भव रहल। गदाधर भट्टाचार्यक उत्तरकालीन नव्य-न्याय (late Navya-Nyāya) अर्थमीमांसा शब्दशक्ति, अर्थ-संबन्ध आ ज्ञान-प्राप्ति बीच जटिल सम्बन्ध विकसित करैत अछि। आधुनिक अध्ययनमे एहि अर्थगत–ज्ञानमीमांसक आयाम (semantic–epistemic dimension)क विशेष महत्त्व अछि। नव्य-न्यायक अभाव-विश्लेषण ‘अनुपस्थिति’क कठोर वस्तुगत प्रश्न प्रस्तुत करैत अछि। विखण्डनात्मक अनुपस्थिति (absence) संग तुलना तखन मात्र उपयोगी जखन भिन्नता पहिने स्पष्ट हो। मीमांसा नव्य-न्यायक स्थिर प्रतिपक्ष नहि; वाक्यार्थ, तात्पर्य, शब्दशक्ति, प्रामाण्य आदि पर नूतन बहस उत्पन्न करैत अछि। एहि कारण भारतीय दार्शनिक संसार स्वयं बहुकेन्द्रिक प्रतिपक्षीय जाल अछि। बौद्ध प्रमाणपरम्परा सामान्य, शब्द, प्रत्यक्ष आ अनुमान सम्बन्धी न्यायीय दाबीपर गम्भीर प्रतिपक्ष दैत अछि। आधुनिक विखण्डनक जरूरत बिना भारतीय परम्परामे आन्तरिक आलोचना पहिनेसँ प्रबल छल—मुदा एहि कारण ओ विखण्डन (deconstruction) नहि बनि जाइत। भारतीय संवादक निष्कर्ष—नव्य-न्याय स्पष्टताक शक्तिशाली परम्परा अछि; ओकरा आधुनिक विखण्डनक शत्रु बनाबयब दोन्हूक जटिलता घटाओत।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक समानान्तर पद्धति नव्य-न्यायसँ तीन मुख्य अनुशासन ग्रहण करैत अछि—परिभाषा स्पष्टता, सम्बन्ध-सीमांकन, प्रमाण-भार। विखण्डनसँ तीन चेतावनी—पदानुक्रम जाँचू, दबायल अपवाद देखू, केन्द्रक ऐतिहासिकता स्वीकारू। इतिहासलेखनमे एहि संयुक्त पद्धतिक प्रत्यक्ष उपयोग अछि। उदाहरणार्थ कोनो सामाजिक श्रेणी सम्बन्धी दाबी पहिले परिभाषित हो; स्रोत-काल, भूगोल, संस्था आ पदक अर्थ सीमित हो; फेर जाँचू कि बादक श्रेणी अतीतपर आरोपित तँ नहि। अभिलेखीय मौनमे नव्य-न्यायीय प्रश्न—कौन वस्तुक अभाव, कोन स्थल/स्रोतमे, कोन खोज-सीमाभित्र? विखण्डनात्मक प्रश्न—ई अभिलेखीय संरचना ककर आवाज बचबैत/दबबैत? दुनू प्रश्न एक-दोसराक पूरक। मैथिली शब्दकोश/थिसॉरस/वर्डनेट (WordNet) निर्माणमे नव्य-न्यायीय अर्थ-भेद (sense-discrimination) उपयोगी; विखण्डनात्मक चेतावनी समानार्थी पद (synonyms) केँ पूर्ण समतुल्यता (equivalence) मानब सँ रोकैत, क्षेत्रीय/सामाजिक प्रयोग (regional/social usage) नोट करैत। कानून आ प्रशासनमे तकनीकी परिभाषा आवश्यक; मुदा नागरिकक वास्तविक अनुभव परिभाषाक सीमा देखाबय तऽ संशोधन सम्भव रहय। स्पष्टता अधिकारक मित्र बनय, अवरोध नहि। कृत्रिम-बुद्धि वर्गीकरणमे नव्य-न्यायीय सटीकता (precision) श्रेणीक सीमा स्पष्ट करि सकैत अछि; विखण्डन पूछत कि प्रशिक्षण-आँकड़ा (training data), लेबल-पदानुक्रम (label hierarchy) आ बहिष्कृत मामले (excluded cases) क परिणाम की। गरिमा-आधारित नैतिकता अन्तिम नियंत्रण दैत अछि—कोनो अत्यन्त तार्किक वर्गीकरण व्यक्ति केर समान नैतिक गरिमा नकारैत अछि तऽ तार्किक स्पष्टता नैतिक वैधता नहि बनैत। आत्मसमीक्षा—समानान्तर दर्शन नव्य-न्यायकेँ ‘हमर परम्परा’ कहि आलोचनासँ मुक्त नहि राखत; न विखण्डनकेँ आधुनिक फैशन कहि अस्वीकारत। दुनू समान प्रमाण-सापेक्ष आलोचनाक विषय।
समकालीन प्रयोग
कृत्रिम बुद्धि (AI) वर्गीकरण-रूपरेखा (taxonomy) मे ‘हानिकारक सामग्री’, ‘व्यक्ति’, ‘विश्वसनीय स्रोत’, ‘संवेदनशील विशेषता’ जकाँ पदक नव्य-न्यायीय शैलीमे स्पष्ट सीमा आवश्यक। विखण्डनात्मक लेखापरीक्षण (audit) पूछत—कोन सीमांत मामला (edge case), कोन बहिष्कृत समुदाय (excluded community), कोन label hierarchy? डेटाबेस तत्त्व-संरचना (ontology) मे इकाई/सम्बन्ध-परिभाषा (entity/relation definitions) सटीक (precise) होयबाक चाही; मुदा वास्तविक-जगत श्रेणियाँ (real-world categories) बदलैत रहैत अछि। संस्करण-प्रबन्ध (versioning), अपवाद-प्रबन्ध (exception handling) आ संशोधन-नीति (revision policy) पद्धतिगत आत्मसमीक्षा बनि सकैत अछि। इतिहासमे ‘राज्य’, ‘जाति’, ‘समुदाय’, ‘भाषा’, ‘श्रोत्रिय’ जकाँ पद बिना कालगत अवच्छेदन उपयोग करब काल-विस्थापन (anachronism) उत्पन्न करि सकैत अछि। नव्य-न्यायीय सीमा + विखण्डनात्मक ऐतिहासिकीकरण (historicization) संयुक्त रूपेँ उपयोगी। कानूनमे विधिक परिभाषाक सटीकता (statutory definition precision) दैत अछि; संवैधानिक चुनौती (constitutional challenge) अथवा जीवित अनुभव (lived experience) ओकर बहिष्कार देखाबय तऽ न्यायिक/विधायी पुनर्विचार सम्भव। चिकित्सामे निदानात्मक श्रेणियाँ (diagnostic categories) स्पष्टता दैत छथि; सीमांत मामले (borderline cases) आ स्पेक्ट्रम-स्थितियाँ (spectrum conditions) कठोर द्वैध परिभाषा (binary definition) क सीमा देखबैत अछि। भाषा-प्रौद्योगिकीमे टोकन-विभाजन (tokenization), रूपविज्ञान (morphology), अर्थ-सूची (sense inventory) आ नामित-इकाई वर्ग (named-entity classes) तकनीकी श्रेणी छथि; उपभाषा (dialect), भाषा-परिवर्तन/कोड-स्विचिंग (code-switching) आ ऐतिहासिक वर्तनी (historical spelling) एहि श्रेणीक सीमा चुनौती दैत अछि। शोध-पद्धतिमे प्रत्येक मुख्य पद लेल चार प्रश्न लिखल जाए—परिभाषा की? सीमा की? अपवाद की? प्रमाण की? पाँचम प्रश्न—ई परिभाषा ककरा बाहर करैत अछि?
अध्याय-निष्कर्ष
नव्य-न्याय विखण्डनक सरल प्रतिपक्ष नहि। ई स्वतंत्र भारतीय यथार्थवादी–ज्ञानमीमांसक विश्लेषण परम्परा अछि जे स्पष्टता, सम्बन्ध, अभाव, प्रमाण आ दाबी-सीमांकनमे अद्वितीय सूक्ष्मता विकसित करैत अछि। विखण्डन एहि स्पष्टताकेँ नकारैत नहि; ओ प्रश्न करैत अछि कि स्थिरताक ऐतिहासिक, भाषिक, सामाजिक आ बहिष्कारगत शर्त की। दुनूक संवादक सर्वोत्तम रूप—स्पष्टता बिना अन्तिम बन्दी; आलोचना बिना मनमानापन। अभाव ≠ देरिदीय अनुपस्थिति; अवच्छेदक ≠ विखण्डनात्मक सीमा (deconstructive limit); नव्य-न्याय ≠ विश्लेषणात्मक दर्शन (analytic philosophy); विखण्डन ≠ सापेक्षतावाद। समानान्तर सूत्र—‘परिभाषित करू → सीमा स्पष्ट करू → विखण्डित करू → प्रमाण जाँचू → पुनर्परिभाषित करू।’ अध्यायक अन्तिम उत्तर—नव्य-न्याय विखण्डनक शत्रु नहि; ओ ओकरा प्रश्न करयवला शक्तिशाली प्रतिपक्ष, आ विखण्डन नव्य-न्यायकेँ अन्तिम बन्दी बनब सँ रोकयवला आलोचनात्मक पूरक बनि सकैत अछि।
अध्याय-ग्रन्थसूची
• गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • रघुनाथ शिरोमणि — पदार्थतत्त्वनिरूपण। • गदाधर भट्टाचार्य — शब्दशक्ति तथा नव्य-न्यायीय अर्थमीमांसा सम्बन्धी ग्रन्थपरम्परा। • बी. के. मतिलाल — ‘नव्य-न्यायक निषेध-सिद्धान्त’ (The Navya-Nyāya Doctrine of Negation)। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • बी. के. मतिलाल — ‘भारतीय दार्शनिक विश्लेषणमे ज्ञानमीमांसा, तर्क आ व्याकरण’ (Epistemology, Logic and Grammar in Indian Philosophical Analysis)। • जोनार्डन गणेरी — ‘अर्थ-शक्ति: शास्त्रीय भारतीय दर्शनमे अर्थ आ ज्ञानक साधन’ (Semantic Powers: Meaning and the Means of Knowing in Classical Indian Philosophy)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)। • डैनियल एच. एच. इन्गॉल्स — ‘नव्य-न्याय तर्कक अध्ययन-सामग्री’ (Materials for the Study of Navya-Nyāya Logic)। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • जाक देरिदा — ‘व्याकरणशास्त्र पर’ (Of Grammatology)। • जाक देरिदा — ‘लेखन आ भिन्नता’ (Writing and Difference)। • जोनाथन कलर — ‘विखण्डन पर’ (On Deconstruction)।