Full chapter text
समस्या
संरचनावादक आलोचना, उत्तर-संरचनात्मक प्रश्न आ विखण्डनक बाद दार्शनिक काज कहाँ पहुँचैत अछि? यदि केन्द्र आलोच्य, अर्थ पूर्णतः आत्म-उपस्थित नहि, वर्गीकरण ऐतिहासिक, पाठ पुनर्पाठयोग्य आ संस्था बहिष्कार उत्पन्न करि सकैत अछि, तखन सकारात्मक प्रतिपादन कोना सम्भव? एक छोरपर पुरान निश्चितताक पुनर्स्थापना अछि—मानो आलोचना केवल भ्रम छल आ हमें फेर स्थिर आधार, एकल अर्थ, एकल केन्द्र आ निर्विवाद परम्परा दिस लौटि जेबाक चाही। दोसर छोरपर पूर्ण सापेक्षतावाद अछि—मानो प्रत्येक अर्थ समान, प्रत्येक सत्य केवल दृष्टि, प्रत्येक इतिहास कथा, प्रत्येक नैतिकता पहचान-सापेक्ष। समानान्तर दर्शन दुनू छोर अस्वीकारैत अछि। विखण्डनक सबसे महत्त्वपूर्ण शिक्षा ई नहि जे ‘किछु टिकैत नहि’; बल्कि ई जे जे टिकैत अछि ओकर टिकबाक शर्त, सीमा, बहिष्कार, इतिहास आ प्रमाण स्पष्ट रहय। आलोचना निश्चितताकेँ त्रुटिसंशोध्य बनबैत अछि, निष्प्रभावी नहि। समानान्तर उत्तरपक्षक प्रश्न तेँ पुनर्निर्माणक अछि—अर्थक बहुलता आ सत्यक कसौटी, संरचनात्मक शक्ति आ व्यक्तिगत सक्रियता, इतिहासक मौन आ प्रमाण-अनुशासन, पहचानक सामाजिकता आ व्यक्तिक गरिमा, भाषा-मध्यस्थता आ बाह्य यथार्थ—ई द्वन्द्वसभ कोना एकसंग धारण कएल जाए? एहि अध्यायक समस्या आगामी खण्डक सेतु सेहो अछि। पाठ आ संरचनाक आलोचनासँ आब प्रश्न सत्ता, संस्था, ज्ञान आ सामान्यीकरण दिस बढ़त। समानान्तर उत्तरपक्षकेँ एहन आधार बनब पड़त जे फूकोक सत्ता-ज्ञान आलोचना स्वीकारि सकय, मुदा ‘सत्ता बनौलक, तेँ असत्य’ जकाँ निष्कर्षसँ बाँचि सकय।
मूल प्रतिपादन
समानान्तर उत्तरपक्षक मूल प्रतिपादन अछि—दार्शनिक आलोचनाक अन्तिम लक्ष्य शून्यता नहि, त्रुटिसंशोध्य पुनर्निर्माण अछि। विखण्डन आवश्यक अछि जखन अवधारणा अपन बहिष्कार लुकबैत अछि; पुनर्निर्माण आवश्यक अछि जखन सार्वजनिक निर्णय, ज्ञान, न्याय आ इतिहासक प्रश्न सामने अछि। अर्थ बहुविध आ प्रसंगगत हो सकैत अछि, मुदा पूर्णतः मनमाना नहि। शब्द, वाक्य, विधा, इतिहास, वक्ता, पाठक, संस्था, प्रयोग आ बाह्य परिस्थिति अर्थक सीमा बनबैत छथि। ज्ञान बहुप्रमाणीय अछि, मुदा प्रमाण-अराजक नहि। प्रयोग, अभिलेख, मौखिक साक्ष्य, भाषिक व्यवहार, देहगत अनुभव, सांख्यिकीय प्रतिरूप, पुरातत्त्व, डिजिटल स्रोत—प्रत्येकक प्रमाण-भार दाबी-प्रकारक अनुसार जाँचल जाए। यथार्थ भाषिक/ऐतिहासिक मध्यस्थतासँ अनुभव होइत अछि, मुदा जगत भाषा मात्र नहि। गलत भविष्यवाणी, विफल प्रयोग, देहक रोग, भौतिक प्रतिरोध आ स्वतंत्र पुष्टि यथार्थक नियन्त्रण देखबैत अछि। व्यक्ति सामाजिक पहिचान द्वारा आकार पबैत अछि, मुदा व्यक्ति केर नैतिक मूल्य पहिचानक कैदी नहि। समान गरिमा समानान्तर दर्शनक सार्वभौम, मुदा त्रुटिसंशोध्य नैतिक प्रतिबद्धता अछि। समानान्तर सूत्र—‘विखण्डनक बाद पुनर्निर्माण; बहुलताक भीतर कसौटी; मध्यस्थताक भीतर यथार्थ; पहिचानक भीतर गरिमा; आलोचनाक भीतर आत्मसमीक्षा।’
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—अर्थक बहुलता आ अर्थ-अराजकता अलग। कोनो कविता अनेक पठन स्वीकारि सकैत अछि; कोनो अनुबन्धक ‘तीन दिन’ शब्द मनमाना रूपेँ ‘तीन महीना’ नहि बनि जाइत। विधा, संस्था आ प्रयोजन अर्थक कसौटी बदलैत अछि। दोसर तर्क—कार्यगत केन्द्र आवश्यक हो सकैत अछि। शब्दकोश, संविधान, वैज्ञानिक मानक, सम्पादकीय नीति, पाठ्यक्रम, डेटा-परिभाषा—सभ कार्य लेल केन्द्र बनबैत छथि। समानान्तर उत्तर ई केन्द्रकेँ समयबद्ध, पारदर्शी, संशोध्य आ अपीलयोग्य बनबैत अछि। तेसर तर्क—बहुप्रमाणीय विवेकवाद विखण्डनक बाद ज्ञानमीमांसक आधार दैत अछि। ‘स्रोत सत्ता-निर्मित अछि’ ई महत्त्वपूर्ण प्रश्न, मुदा स्रोत तेँ स्वतः झूठ नहि। स्रोत-उत्पत्ति, हित, स्वतंत्र पुष्टि, आन्तरिक सुसंगति आ बाह्य साक्ष्य जाँचल जाए। चारिम तर्क—सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद सामाजिक निर्माण आ वस्तुगत प्रतिरोध दुनू स्वीकारैत अछि। मुद्रा, नागरिकता, विश्वविद्यालय-पद जकाँ तथ्य संस्थागत निर्माण; जलक उबाल-बिन्दु, देहक चोट वा भूकम्प केवल सामाजिक सहमति नहि। पाँचम तर्क—भाषा जगतकेँ वर्गीकृत करैत अछि, मुदा जगत भाषाक दाबीकेँ प्रतिरोध करैत अछि। एहि कारण ‘भाषा सत्य धरि पहुँचबाक माध्यम अछि; सत्यकेँ मनमाना बनाबयवला अनुमति नहि।’ छठम तर्क—गरिमा-आधारित नैतिकता पहिचान-विमर्शक उत्तर अछि। जाति, वर्ग, लिंग, धर्म, क्षेत्र, भाषा आ अन्य सामाजिक स्थान अनुभव बदलैत अछि; मुदा व्यक्ति केर अन्तर्निहित नैतिक मूल्य जन्मगत श्रेणीसँ कम/बेसी नहि। सातम तर्क—‘पहिचानकेँ देखू; व्यक्तिकेँ पहिचानमे कैद नहि करू।’ ई सूत्र सार्वभौमिकतावाद (universalism) आ पहिचान-अन्धता (identity-blindness) दुनूक अति सँ बचबैत अछि। समान गरिमा सार्वभौम; न्याय-प्रयोग प्रसंग-संवेदनशील। आठम तर्क—समानान्तर इतिहास-दृष्टि अभिलेखीय मौन स्वीकारैत अछि। मौन = प्रमाण-अन्तराल; मौन = मनगढ़न्त कथा नहि। ऐतिहासिक निष्कर्ष चार श्रेणीमे राखल जा सकैत अछि—सबल रूपेँ समर्थित, सम्भाव्य, विवादित, अज्ञात। नवम तर्क—हाशियाक स्वर ज्ञानमीमांसक विशेषाधिकार (epistemic privilege) स्वतः नहि, ज्ञानमीमांसक प्रासंगिकता (epistemic relevance) अवश्य रखैत अछि। जे अनुभव मुख्य अभिलेखमे अनुपस्थित, ओ नूतन प्रमाण दे सकैत अछि; मुदा ओकरो समान आलोचनात्मक कसौटी पर जाँचल जाए। दसम तर्क—परम्परा न तऽ स्वतः सत्य, न स्वतः दमन। परम्पराकेँ आलोचनात्मक उत्तराधिकार रूपमे पढ़ू—की संरक्षित करब योग्य, की संशोधनयोग्य, की नैतिक रूपेँ अस्वीकार्य? एगारहम तर्क—विखण्डन संस्थागत अन्याय खोलि सकैत अछि; बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्र शक्ति-वितरणक पुनर्निर्माण प्रस्तावित करैत अछि। स्थानीय स्वायत्तता महत्त्वपूर्ण, मुदा सार्वभौम अधिकारक उल्लंघनक अनुमति नहि। बारहम तर्क—धर्मक विवेकपूर्ण बहुलता स्थिर धार्मिक केन्द्र आ पूर्ण धर्म-विरोध दुनूक अति सँ बचबैत अछि: मानबाक, नहि मानबाक आ बदलबाक स्वतंत्रता समान नागरिक गरिमाक भीतर। तेरहम तर्क—आत्मसमीक्षा सातम नियामक सिद्धान्त अछि। यदि समानान्तर दर्शन अपन सूत्रकेँ आलोचनासँ मुक्त बना दे, तँ ओहि केन्द्रवादक पुनरावृत्ति करत जकर आलोचना करैत अछि।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे ई उत्तरपक्ष अत्यधिक मध्यमार्गी अछि—हर विवादमे ‘दुनू पक्ष’ राखि तीक्ष्ण दार्शनिक निष्कर्ष सँ बचैत अछि। दोसर पूर्वपक्ष उत्तर-संरचनात्मक अछि—‘यथार्थ’, ‘गरिमा’, ‘प्रमाण’ आ ‘सार्वभौम अधिकार’ स्वयं ऐतिहासिक अवधारणा छथि; हुनका पुनः केन्द्र बनायब विखण्डनक आलोचना निष्प्रभावी करैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष यथार्थवादी अछि—यदि सत्य आ यथार्थ स्वीकारल, तखन विखण्डन/उत्तर-संरचनावाद (deconstruction/post-structuralism) क एतेक विस्तृत मध्यस्थता-विमर्श अनावश्यक अछि। चारिम पूर्वपक्ष पहचान-आधारित आलोचनासँ अछि—समान गरिमा कहब संरचनात्मक असमानता आ ऐतिहासिक अन्यायकेँ अमूर्त व्यक्तिवाद (abstract individualism) मे विलीन करि सकैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष परम्परा-समर्थक अछि—त्रुटिसंशोध्य परम्परा कहब प्राधिकार (authority) कमजोर करैत, निरन्तर आधुनिक कसौटी पर अतीतकेँ जाँचैत अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—मध्य स्थिति स्वतः सत्य नहि; समानान्तर उत्तर प्रत्येक मुद्दापर प्रमाण-भारित निर्णय (evidence-weighted judgment) माँगैत अछि। कखनो प्रतिपक्षक एक पक्ष स्पष्ट रूपेँ अधिक समर्थित हो सकैत अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—यथार्थ, गरिमा आ प्रमाण आलोचनासँ मुक्त केन्द्र नहि; ओ कार्यगत दार्शनिक प्रतिबद्धता छथि जे स्वयं सार्वजनिक तर्क, अनुभव आ नूतन ज्ञानद्वारा संशोध्य रहैत छथि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—यथार्थवाद मध्यस्थता-आलोचनाकेँ निरर्थक नहि बनबैत। सही वस्तु गलत वर्गीकृत हो सकैत; सही घटना पक्षपाती अभिलेखमे दर्ज हो सकैत; सही डेटा अन्यायपूर्ण संस्था द्वारा प्रयुक्त हो सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—समान गरिमा पहिचान-अन्धता (identity-blindness) नहि। संरचनात्मक असमानता मापन, ऐतिहासिक सुधार, विशेष सुरक्षा आ प्रतिनिधित्व आवश्यक हो सकैत अछि; नैतिक सीमा ई कि व्यक्ति केर मूल्य श्रेणीद्वारा तय नहि हो। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—परम्पराक सम्मान आलोचनासँ मुक्त प्रतिरक्षा कवच नहि। जीवित परम्परा भाष्य, विवाद, पुनर्पाठ आ परिवर्तनद्वारा टिकैत अछि; आत्मसमीक्षा परम्परा-विनाश नहि।
भारतीय संवाद
न्याय–नव्य-न्याय समानान्तर उत्तरपक्षक ज्ञानमीमांसक अनुशासन (epistemic discipline) दैत अछि—दाबी स्पष्ट करू, प्रमाण पहिचानू, सम्बन्ध सीमित करू, प्रतिपक्ष जाँचू। मुदा समानान्तर दर्शन सामाजिक सत्ता आ ऐतिहासिक बहिष्कारक प्रश्न अलग जोड़ैत अछि। मीमांसा भाषिक/पाठीय अर्थक अनुशासित शर्त दैत अछि—आकांक्षा, योग्यता, सन्निधि, तात्पर्य, विधि, प्रसंग। एहि सँ ‘अर्थ मनमाना नहि’क भारतीय संवाद सबल होइत अछि, मुदा आधुनिक व्याख्याशास्त्र (hermeneutics) क समानता नहि। मध्यमक स्थिर स्वभावक आलोचना आत्मसमीक्षात्मक चेतावनी दैत अछि; न्यायीय यथार्थवाद वस्तुगत ज्ञानक प्रतिपक्ष दैत अछि। समानान्तर दर्शन दुनूकेँ कृत्रिम समेकन (synthesis) मे नहि मिलबैत; संवादमे रखैत अछि। जैन अनेकान्तवाद दृष्टि-सीमाक अनुशासन दैत अछि। समानान्तर बहुप्रमाणीय विवेकवाद एतयसँ बहुलता-संवेदना ग्रहण करि सकैत अछि, मुदा ‘अनेकान्तवाद = बहुलतावाद (anekāntavāda = pluralism)’क ऐतिहासिक पहचान नहि। भारतीय शास्त्रार्थक पूर्वपक्ष–उत्तरपक्ष आलोचनाक बाद प्रतिपादनक आवश्यकता देखबैत अछि। केवल खण्डन पर्याप्त नहि; सिद्धान्त अपन उत्तर आ प्रमाण प्रस्तुत करैत अछि। ई समानान्तर पुनर्निर्माण लेल महत्त्वपूर्ण पद्धतिगत प्रेरणा अछि। भर्तृहरि, बौद्ध अपोह, मीमांसा, न्याय आ जैन परम्परा अर्थक अलग मॉडल दैत छथि; एहि बहुलतासँ स्पष्ट होइत अछि जे ‘भारतीय अर्थ-सिद्धान्त’ एकटा एकल उत्तर नहि। भारतीय संवादक निष्कर्ष—विखण्डनक बाद भारतीय दर्शनक उपयोग तैयार समाधान रूपमे नहि, बहु-प्रतिपक्षीय दार्शनिक संसाधन रूपमे हो।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिला समानान्तर उत्तरपक्षक पद्धतिगत गृहभूमि अछि, विश्व-दर्शनक सार्वभौम केन्द्र नहि। मिथिलाक बौद्धिक परम्परामे प्रश्न, परिभाषा, पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष, भाष्य, पुनर्परीक्षण आ तकनीकी स्पष्टताक संसाधन उपलब्ध छथि। नव्य-न्यायसँ स्पष्टता; लोक-संस्मरण/स्त्री-गीत/सामाजिक अनुभवसँ अभिलेखीय विस्तार; आधुनिक लोकतन्त्रसँ समान अधिकार; विज्ञानसँ परीक्षण; डिजिटल युगसँ नूतन प्रमाण—ई सभ समान मानक बिना मिश्रित नहि, दाबी-प्रकारानुसार जोड़ा जाए। इतिहासमे ‘मिथिला’क सीमा कालानुसार बदलि सकैत अछि; क्षेत्र, राजकीय संरचना, भाषा-संसार आ सांस्कृतिक स्मृति एकहि रेखा नहि। समानान्तर दृष्टि प्रत्येक दाबीमे समय/स्थान स्पष्ट करैत अछि। पंजी, शाखा-पुस्तक, शास्त्रीय ग्रन्थ, भूमि-अभिलेख, साहित्य, पुरातत्त्व, मौखिक परम्परा आ आधुनिक आँकड़ा अलग प्रमाण-प्रकार छथि। एक स्रोतक मौन दोसर स्रोतक सम्भावना नष्ट नहि करैत। मैथिली भाषामे दार्शनिक लेखन स्वयं पुनर्निर्माण अछि—विदेशी पदक अन्धानुवाद नहि, शुद्ध मैथिली व्याख्या, आवश्यक मूल पद कोष्ठकमे, आ स्थानीय बौद्धिक परम्परासँ संवाद। गरिमा-आधारित नैतिकता मिथिलाक सामाजिक परम्परा सेहो समान आलोचनाक विषय बनबैत अछि। जे प्रथा जन्माधारित असमान मानव-मूल्य मानैत अछि, ओकर ‘परम्परा’ होयब नैतिक वैधताक प्रमाण नहि। बहुकेन्द्रिकता स्थानीय संस्था, भाषा-समुदाय आ सांस्कृतिक स्वायत्तताक सम्मान करैत अछि; मुदा व्यक्ति-अधिकार, लैंगिक समानता, जातिगत गरिमा आ विचार-स्वतन्त्रता स्थानीय बहुमतक अधीन नहि। आत्मसमीक्षा—समानान्तर दर्शन यदि मिथिलाकेँ नूतन अपरिवर्तनीय केन्द्र बनाबैत अछि, तखन अपन मूल सिद्धान्तक विरुद्ध जाइत अछि। मिथिला आधार अछि; प्रमाणक विशेषाधिकार नहि।
समकालीन प्रयोग
कृत्रिम बुद्धि (AI) युगमे समानान्तर उत्तरपक्ष विशेष उपयोगी अछि। भाषा-मॉडल उत्तरक विखण्डन स्रोत, प्रशिक्षण-वितरण, लेबल (label), विलोपन (omission) आ पूर्वाग्रह (bias) खोलि सकैत अछि; पुनर्निर्माण स्वतंत्र सत्यापन, उत्पत्ति-पथ (provenance), मानवीय उत्तरदायित्व (human responsibility) आ अपील (appeal) प्रक्रिया जोड़ैत अछि। डिजिटल सूचना मे ‘वायरल (viral)’ = सत्य नहि। बहुप्रमाणीय विवेकवाद मूल स्रोत, तिथि, प्रत्यक्ष साक्ष्य, स्वतंत्र रिपोर्ट, छवि/वीडियो सत्यापन आ संस्थागत विश्वसनीयता (institutional credibility) अलग-अलग जाँचैत अछि। कानूनमे श्रेणी-आलोचना (category critique) जरूरी, मुदा निर्णय आवश्यक। समानान्तर पद्धति परिभाषा जाँचि, बहिष्कृत मामले (excluded cases) पहिचानि, अधिकार-प्रभाव मापि, फेर संशोधित नियम/अपवाद/अपील-प्रक्रिया (rule/exception/appeal mechanism) प्रस्तावित करैत अछि। इतिहासमे विखण्डन (deconstruction) अभिलेखीय पूर्वाग्रह (archive bias) खोलैत अछि; समानान्तर पुनर्निर्माण स्रोत-त्रिकोणीकरण (source triangulation), कालक्रम (chronology), भौतिक साक्ष्य (material evidence), मौखिक इतिहास (oral history) आ अनिश्चितता-श्रेणीकरण (uncertainty grading) द्वारा उत्तर बनबैत अछि। विज्ञानमे सिद्धान्त-सापेक्षता (theory-ladenness) स्वीकारल जा सकैत अछि, मुदा प्रयोग (experiment), पुनरावृत्ति (replication), मापन (measurement) आ पूर्वानुमान-सफलता (predictive success) द्वारा वस्तुगत नियन्त्रण सम्भव। आलोचना वैज्ञानिकतावाद (scientism) रोकैत अछि; पुनर्निर्माण विज्ञानक प्रमाण-मूल्य बचबैत अछि। भाषा-नीतिमे मानक/अमानक पदानुक्रम जाँचल जाए; शिक्षा/प्रकाशन लेल कार्यगत मानक राखल जाए; क्षेत्रीय रूप, लिपि, अभिगम्यता (accessibility) आ डिजिटल औजार (digital tools) लेल बहु-प्रवेश उपलब्ध हो। सामाजिक पहचान-विमर्शमे श्रेणी सामाजिक रूपेँ निर्मित (category constructed) हो सकैत अछि; भेदभाव (discrimination) वास्तविक हो सकैत अछि। समानान्तर उत्तर श्रेणीकेँ विश्लेषण लेल उपयोग करैत अछि, व्यक्ति केर सम्पूर्ण परिभाषा नहि बनबैत। सार्वजनिक दर्शनमे अंतिम कसौटी ई अछि—की प्रतिपादन प्रतिपक्षक सही रूप प्रस्तुत करैत अछि? की प्रमाण-मानक दुनू पक्षपर समान अछि? की निष्कर्ष संशोध्य अछि? की व्यक्ति गरिमा सुरक्षित अछि?
अध्याय-निष्कर्ष
समानान्तर उत्तरपक्ष विखण्डनक अस्वीकार नहि; ओकर दार्शनिक अगिला चरण अछि। जे अवधारणा आलोचनामे टूटैत अछि, ओकरा पुरान रूपमे नहि, सीमा स्पष्ट कऽ पुनर्निर्मित कएल जाए। अर्थ बहुल हो सकैत अछि, मुदा अराजक नहि; सत्य मध्यस्थित हो सकैत अछि, मुदा मनमाना नहि; इतिहास अपूर्ण हो सकैत अछि, मुदा असम्भव नहि; पहचान सामाजिक हो सकैत अछि, मुदा गरिमा श्रेणी-सापेक्ष नहि। बहुप्रमाणीय विवेकवाद ज्ञानक कसौटी दैत अछि; सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद जगतक प्रतिरोध बचबैत अछि; गरिमा-आधारित नैतिकता मानव-मूल्य सुरक्षित करैत अछि; बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्र सत्ता-वितरणक उत्तर दैत अछि; आत्मसमीक्षा सभकेँ त्रुटिसंशोध्य रखैत अछि। भारतीय दर्शन समानान्तर उत्तरपक्षक ‘पूर्वरूप’ नहि; न्याय, नव्य-न्याय, मीमांसा, बौद्ध, जैन, व्याकरण आ भाष्य-परम्परा स्वतंत्र संवाद-संसाधन छथि। एहि अध्यायसँ पाँचम खण्डक निष्कर्ष सूत्र रूपमे स्पष्ट अछि—‘विखण्डनक बाद पुनर्निर्माण आवश्यक।’ अगिला खण्डमे प्रश्न पाठक भीतरक पदानुक्रमसँ संस्थागत सत्ता दिस बढ़त: ज्ञान आ सत्ता अलग छथि की? समानान्तर उत्तरपक्ष एहि नूतन प्रश्न लेल एक सीमा पहिनेसँ तय करैत अछि—सत्ता ज्ञानकेँ प्रभावित करि सकैत अछि; प्रत्येक ज्ञान सत्ता मात्र नहि।
अध्याय-ग्रन्थसूची
• जाक देरिदा — ‘व्याकरणशास्त्र पर’ (Of Grammatology)। • जाक देरिदा — ‘लेखन आ भिन्नता’ (Writing and Difference)। • जाक देरिदा — ‘दर्शनक हाशिया’ (Margins of Philosophy)। • जोनाथन कलर — ‘विखण्डन पर’ (On Deconstruction)। • क्रिस्टोफर नॉरिस — ‘विखण्डन: सिद्धान्त आ अभ्यास’ (Deconstruction: Theory and Practice)। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • रघुनाथ शिरोमणि — पदार्थतत्त्वनिरूपण। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • नागार्जुन — मूलमध्यमककारिका। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • मल्लिषेण — स्याद्वादमञ्जरी। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • बी. के. मतिलाल — ‘शब्द आ जगत’ (The Word and the World)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)। • जोनार्डन गणेरी — ‘अर्थ-शक्ति’ (Semantic Powers)। • कार्ल पॉपर — ‘वैज्ञानिक खोजक तर्क’ (The Logic of Scientific Discovery), त्रुटिसंशोधनक आधुनिक संदर्भ लेल।