समस्या आधुनिक दर्शनमे ज्ञानकेँ प्रायः सत्य, प्रमाण, तर्क आ वस्तुनिष्ठ जाँचक क्षेत्र मानल गेल, जबकि सत्ता केँ राज्य, दमन, आदेश, संस्था अथवा सामाजिक नियन्त्रणक क्षेत्र। मिशेल फूको एहि साफ विभाजन पर प्रश्न उठबैत छथि—विशेषतः ओहि ज्ञानमे जे मनुष्य, अपराध, रोग, कामुकता, शिक्षा, सामान्यता, पागलपन आ जनसंख्या सम्बन्धी श्रेणी बनबैत अछि। फूकोक प्रश्न ई नहि जे ‘सत्य असम्भव’ अथवा ‘ज्ञान झूठ अछि’। हुनकर प्रश्न अछि—कौन संस्था कोन वस्तुकेँ ज्ञानयोग्य बनबैत अछि? के बोलबाक अधिकार पबैत अछि? कोन मापन, परीक्षा, अभिलेख, वर्गीकरण आ सामान्यीकरण द्वारा व्यक्ति ज्ञानक विषय बनैत अछि? आ ई ज्ञान फेर व्यवहार नियंत्रित करबाक साधन कोना बनैत अछि? विद्यालयक परीक्षा विद्यार्थी सम्बन्धी ज्ञान उत्पन्न करैत अछि—अंक, श्रेणी, उपस्थितिक अभिलेख, क्षमता, ‘औसत’ आ ‘कमजोर’क वर्गीकरण। एहि ज्ञानक प्रशासनिक परिणाम सेहो अछि—उत्तीर्ण/अनुत्तीर्ण, प्रवेश, छात्रवृत्ति, अनुशासन। एतय ज्ञान आ सत्ता पूर्णतः अलग क्षेत्र नहि रहैत। अस्पताल रोगी सम्बन्धी चार्ट (chart), निदान (diagnosis), परीक्षण-परिणाम (test result) आ जोखिम-श्रेणी (risk category) बनबैत अछि; जेल कैदी-फाइल (prisoner file), आचरण-अभिलेख (conduct record) आ जोखिम-मूल्यांकन (risk assessment) बनबैत अछि; राज्य जनगणना (census), पहचान-अभिलेख (identity record) आ जनसांख्यिक श्रेणी (demographic category) बनबैत अछि। फूकोक power/knowledge प्रश्न एहि परस्परता पर केन्द्रित अछि। मुदा एहि आलोचनासँ एक खतरनाक अति-निष्कर्ष निकलि सकैत अछि—‘ज्ञान सत्ता-संबद्ध अछि, तेँ सभ ज्ञान मनमाना अछि।’ समानान्तर दर्शन एहि निष्कर्षकेँ अस्वीकारैत अछि। सत्ता ज्ञानक उत्पादन, वितरण, दृश्यता, वित्त, संस्था आ प्रयोगकेँ प्रभावित करि सकैत अछि; मुदा यथार्थ, प्रमाण, पुनरावृत्ति आ स्वतंत्र जाँच ज्ञानक अलग नियन्त्रण प्रदान करैत अछि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—ज्ञान आ सत्ता कतेक जुड़ल छथि? सत्ता ज्ञानकेँ कोना उत्पादित/संरचित करैत अछि? ज्ञान सत्ता केँ कोना सक्षम बनबैत अछि? आ एहि सम्बन्धक आलोचना करैत वस्तुगत सत्य, वैज्ञानिक विश्वसनीयता आ नैतिक उत्तरदायित्व कोना बचाओल जाए? मूल प्रतिपादन एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे ज्ञान आ सत्ता अनेक मानवीय संस्थामे परस्पर-निर्माणकारी सम्बन्ध रखैत छथि, विशेषतः जखन ज्ञान व्यक्ति/समुदायकेँ मापैत, वर्गीकृत करैत, सामान्यीकृत करैत आ प्रशासित करैत अछि। फूकोक ‘सत्ता–ज्ञान’ (power/knowledge) अवधारणा कहैत अछि जे सत्ता ज्ञानक बाहरी विकृति मात्र नहि; कखनो सत्ता-सम्बन्ध प्रश्न, श्रेणी, अभिलेख, विशेषज्ञता आ परीक्षणक पूरा क्षेत्र उत्पन्न करैत अछि। एहि सम्बन्धक उलटा पक्ष सेहो अछि—ज्ञान सत्ता केँ अधिक सूक्ष्म बनबैत अछि। निरीक्षण, आँकड़ा, परीक्षा, निदान (diagnosis), वर्गीकरण (classification), फाइल (file) आ मानक (norm) द्वारा संस्था व्यक्तिक व्यवहार देखबैत, तुलना करैत आ हस्तक्षेप करैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि विश्लेषणकेँ स्वीकारैत अछि, मुदा एक स्पष्ट सीमा जोड़ैत अछि: ‘सत्ता ज्ञानकेँ प्रभावित करैत अछि; सत्यकेँ मनमाना नहि बनबैत अछि।’ बहुप्रमाणीय विवेकवाद सत्ता-सचेत ज्ञानमीमांसा प्रस्तावित करैत अछि—स्रोतक संस्थागत स्थान जाँचू, साथे दाबीक स्वतंत्र प्रमाण सेहो जाँचू। प्रमुख तर्क पहिल तर्क—सत्ता केवल निषेध नहि। फूकोक विश्लेषणमे सत्ता उत्पादक सेहो अछि: ओ व्यवहारक ढाँचा, विशेषज्ञता, वर्गीकरण, सामान्यता, कौशल, अनुशासन आ ज्ञान-क्षेत्र उत्पन्न करि सकैत अछि। दोसर तर्क—ज्ञान केवल सत्ताक उपकरण नहि। सत्ता ज्ञानक बिना अन्ध हो सकैत अछि; आधुनिक संस्था निरीक्षण, अभिलेख, मापन आ विशेषज्ञीय निर्णयद्वारा अधिक सूक्ष्म नियन्त्रण विकसित करैत अछि। तेसर तर्क—परीक्षा (examination) सत्ता–ज्ञानक आदर्श उदाहरण अछि। परीक्षा व्यक्ति सम्बन्धी सत्य-दाबी उत्पन्न करैत अछि आ एकहि समय ओकर व्यवहारक दिशा बदलैत अछि। विद्यार्थी अध्ययन करैत अछि किएक तँ परीक्षा अछि; संस्था निर्णय लैत अछि किएक तँ परिणाम उपलब्ध अछि। चारिम तर्क—सामान्यीकरण (normalization) कानूनसँ अलग प्रकारक सत्ता अछि। कानून ‘अनुमति/निषेध’ कहि सकैत अछि; सामान्यीकरण ‘औसत/विचलित’, ‘योग्य/कमजोर’, ‘स्वस्थ/असामान्य’ जकाँ सतत-क्रम (continuum) बनबैत अछि। पाँचम तर्क—अभिलेख व्यक्ति केँ ‘दस्तावेजी वास्तविकता’ दैत अछि। विद्यालय-अभिलेख (school record), चिकित्सकीय फाइल (medical file), कारागार-दस्तावेज (prison dossier), ऋण-इतिहास (credit history), डिजिटल प्रोफ़ाइल (digital profile)—ई सभ व्यक्ति सम्बन्धी निर्णयक स्थायी आधार बनि सकैत अछि। छठम तर्क—फूकोक सत्ता केन्द्रीय षड्यन्त्र मात्र नहि। विविध संस्था, नियम, पेशा, मानक आ स्थानीय व्यवहार मिलि एहन शक्ति-व्यवस्था उत्पन्न करि सकैत अछि जकर कोनो एक एकमात्र नियोजक (master planner) नहि। सातम तर्क—सत्ता-सम्बन्ध प्रतिरोध (resistance) क सम्भावना सेहो खोलैत अछि। श्रेणी, निदान (diagnosis), पहचान-अभिलेख (identity record), पाठ्यक्रम (curriculum) वा पुलिस-पद्धति (policing method) विवादित भऽ सकैत अछि; प्रभावित व्यक्ति/समुदाय परिभाषा चुनौती दऽ सकैत छथि। आठम तर्क—ज्ञानक संस्थागत उत्पत्ति जाँचब आवश्यक, मुदा आनुवंशिक दोष (genetic fallacy) सँ बचब सेहो आवश्यक। कोनो दाबी खराब संस्थासँ आयल तेँ स्वतः झूठ नहि; प्रतिष्ठित संस्थासँ आयल तेँ स्वतः सत्य नहि। नवम तर्क—वैज्ञानिक ज्ञानमे सत्ता-संबंध वित्तपोषण (funding), प्रकाशन (publication), शोध-अजेण्डा (research agenda), पहुँच (access), पेटेण्ट (patent), पेशागत पदानुक्रम (professional hierarchy) आ आँकड़ा-स्वामित्व (data ownership) प्रभावित करि सकैत अछि। मुदा प्रयोग (experiment), पुनरावृत्ति (replication), मापन (measurement), सहकर्मी-आलोचना (peer criticism) आ स्वतंत्र पुष्टि (independent confirmation) अलग विश्वसनीयता-कसौटी दैत अछि। दसम तर्क—मानव-विज्ञानमे वर्गीकरण आत्म-प्रभावी (reflexive) हो सकैत अछि। ‘अपराधी’, ‘प्रतिभाशाली’, ‘विकलांग’, ‘जोखिमग्रस्त’ जकाँ लेबल व्यक्ति/संस्था केर व्यवहार बदलि सकैत अछि; श्रेणी स्वयं सामाजिक परिणाम उत्पन्न करैत अछि। एगारहम तर्क—सांख्यिकीय मानक (norm) नैतिक मानक (norm) नहि। ‘औसत’ होयब ‘श्रेष्ठ’ होयब नहि; ‘विचलित’ होयब ‘दोषपूर्ण मानव’ होयब नहि। गरिमा-आधारित नैतिकता वर्णनात्मक वर्गीकरण आ नैतिक मूल्य अलग रखैत अछि। पूर्वपक्ष पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे सत्ता–ज्ञान अवधारणा स्वयं अत्यधिक व्यापक अछि। यदि हर सामाजिक सम्बन्धमे सत्ता अछि, तखन ‘सत्ता’ विश्लेषणात्मक रूपेँ किछु खास नहि बतबैत। दोसर पूर्वपक्ष यथार्थवादी अछि—वैज्ञानिक सत्यक सामाजिक इतिहास बतबैत काल हम सत्यक कारणकेँ सत्ता/संस्था सँ गड़बड़ा सकैत छी। पृथ्वी सूर्यक परिक्रमा करैत अछि—ई सत्ता-निर्मित तथ्य नहि। तेसर पूर्वपक्ष उदारवादी अछि—फूको संस्था, अनुशासन आ सामान्यीकरणपर एतेक आलोचना करैत छथि जे कानून, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य आ प्रशासनक वैध कार्य गौण पड़ि सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष नैतिक अछि—यदि सत्ता सर्वत्र, तखन दमनकारी सत्ता (oppressive power) आ वैध प्राधिकार (legitimate authority) बीच भेद कतेक स्पष्ट? पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय तुलना सँ अछि—राजधर्म, दण्डनीति, शास्त्रीय प्रामाण्य, गुरु-शिष्य परम्परा अथवा जातिगत ज्ञान-वितरणकेँ सीधे फूकोवादी सत्ता–ज्ञान (Foucauldian power/knowledge) कहब ऐतिहासिक असावधानी होयत। उत्तरपक्ष पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—‘सत्ता सर्वत्र’ कहब पर्याप्त नहि; विशिष्ट तन्त्र (mechanism) पहिचानू—कौन देखैत अछि, कौन अभिलेख (record) बनबैत, कौन नियम (rule) तय करैत, कौन दण्ड/अनुमोदन (sanction) दैत, कौन अपील (appeal) सुनैत? विशिष्टता शक्ति-विश्लेषणक कसौटी हो। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—सत्ता ज्ञानक सामाजिक उत्पादनक कारण हो सकैत अछि, तथ्यक तत्त्वमीमांसक कारण (ontological cause) नहि। वैज्ञानिक दाबी जगतक साक्ष्यसँ जाँचल जाए। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—अनुशासनक आलोचना संस्था-विरोध नहि। विद्यालय, अस्पताल, जनगणना, कानून आवश्यक हो सकैत; प्रश्न आनुपातिकता (proportionality), अधिकार (rights), पारदर्शिता (transparency), सहमति (consent) आ सुधार-प्रक्रिया (correction mechanism) क अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—वैध प्राधिकार (authority) लेल सार्वजनिक कारण, अधिकार-सुरक्षा, अनुपातिकता, उत्तरदायित्व, अपील आ लोकतान्त्रिक नियंत्रण आवश्यक। केवल प्रभाव = वैध सत्ता नहि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय परम्परासँ तुलना केवल समस्या-संवाद रूपमे: ज्ञानक सामाजिक वितरण, प्रमाणक प्राधिकार, शास्त्रार्थक पहुँच (access), शिक्षा-संस्था, वर्गीकरणक सामाजिक परिणाम। ऐतिहासिक समानता नहि। भारतीय संवाद न्याय दर्शन प्रमाणक वैधता केँ सत्ता सँ अलग विश्लेषित करैत अछि—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्दक ज्ञानोत्पादक शर्त। एहि कारण Foucauldian सत्ता-ज्ञान विश्लेषण लेल न्याय एक सबल प्रतिपक्ष प्रस्तुत करैत अछि: सत्य-दाबी केवल सामाजिक प्राधिकारसँ वैध नहि। शब्दप्रमाणमे वक्ताक विश्वसनीयता, वाक्यार्थ आ ज्ञेय वस्तुक प्रश्न देखबैत अछि जे ‘के बोलैत अछि?’ महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा ‘ककर सत्ता अछि?’ एकमात्र कसौटी नहि। मीमांसा शास्त्रीय प्रामाण्य, वाक्यार्थ आ विधिक प्रश्न उठबैत अछि; फूकोक संस्थागत वंशावली (institutional genealogy) संग सीधा समानता नहि। संवादक बिन्दु—कौन पाठ/वक्ता ज्ञानक विशेषाधिकार पबैत अछि, आ एहि प्राधिकारक तर्क की? बौद्ध प्रमाणपरम्परा ज्ञानक स्रोत, प्रत्यक्ष/कल्पना आ अनुमान (inference) क सीमा जाँचैत अछि। सत्ता-विश्लेषण एहि ज्ञानमीमांसक प्रश्नक विकल्प नहि। कौटिल्यक अर्थशास्त्र राज्य, गणना, दण्ड, गुप्तचर, प्रशासन आ जन-संसाधनक ज्ञान-सत्ता सम्बन्धक ऐतिहासिक भारतीय उदाहरण दे सकैत अछि; मुदा फूकोक आधुनिक अनुशासनात्मक सत्ता (disciplinary power) संग समानता/पहचान (identity) दाबी नहि। धर्मशास्त्रीय वर्गीकरण समाजमे मानक-प्राधिकार (normative authority) रखैत छल; ओकर ऐतिहासिक प्रभाव क्षेत्र/काल/प्रयोग अनुसार जाँचल जाए। शास्त्रीय विधान = वास्तविक व्यवहार स्वतः नहि। शास्त्रार्थ ज्ञानक सार्वजनिक/अर्ध-सार्वजनिक परीक्षणक संस्था छल, मुदा भागीदारी (participation) सर्वसमान नहि। समानान्तर दृष्टि तर्कीय उपलब्धि आ सामाजिक access दुनू अलग जाँचैत अछि। भारतीय संवादक निष्कर्ष—ज्ञानक प्रामाण्य आ ज्ञानक सामाजिक सत्ता दुनू प्रश्न आवश्यक; एक दोसराक स्थानापन्न नहि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मिथिलाक बौद्धिक इतिहासमे विद्वत्-परम्परा, पंजी, शिक्षा-संस्था, भूमि-अभिलेख, दरबारी संरक्षण, धार्मिक प्रतिष्ठा, मुद्रण आ आधुनिक अकादमिक संस्था ज्ञानक दृश्यता प्रभावित करैत छथि। पंजी/वंशावली जकाँ दस्तावेज सामाजिक वर्गीकरणक ज्ञान दैत अछि; साथे ओ वर्गीकरण-प्रथा (classification practice) क हिस्सा सेहो हो सकैत अछि। अतः ओकरा केवल तटस्थ अभिलेख (neutral record) नहि, सामाजिक दस्तावेज रूपमे पढ़ू। मुद्रित ग्रन्थ, पत्रिका, पाठ्यक्रम आ पुरस्कार कोन लेखक/भाषा/विधाकेँ मान्यताप्राप्त दृश्यता (canonical visibility) दैत अछि, ई ज्ञान-सत्ता प्रश्न अछि। मुदा कम प्रकाशित लेखक स्वतः महान वा अधिक सत्य नहि। मैथिली भाषा-मानकीकरण शिक्षा/प्रकाशन लेल उपयोगी सत्ता-ज्ञान प्रक्रिया अछि। प्रश्न—मानक के बनबैत? क्षेत्रीय रूप (regional forms) क स्थान की? संशोधन-प्रक्रिया (revision process) खुलल अछि की? समानान्तर इतिहास-दृष्टि अभिलेखीय असमानता स्पष्ट लिखैत अछि। ‘स्रोत अधिक’ = ‘इतिहास अधिक महत्त्वपूर्ण’ नहि; ‘स्रोत कम’ = ‘मनगढ़न्त भरपाई’ सेहो नहि। बहुप्रमाणीय विवेकवाद संस्थागत स्रोतक साथे मौखिक इतिहास, लोकगीत, निजी पत्र, क्षेत्रीय प्रकाशन, पुरातत्त्व, डिजिटल अभिलेख आ सांख्यिकीय प्रमाण जोड़ि सकैत अछि। गरिमा-आधारित नैतिकता वर्गीकरणक मानव-परिणाम जाँचैत अछि। जाति, लिंग, भाषा, पेशा वा शिक्षा-आधारित वर्गीकरण प्रशासनिक तथ्य (administrative fact) हो सकैत अछि, नैतिक मानव-मूल्य नहि। बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्र ज्ञान-सत्ता वितरणक उत्तर दैत अछि—एक अकादमी, राज्य, विश्वविद्यालय, सम्पादक, मंच वा कलनविधि (algorithm) कोनो ज्ञान-क्षेत्रक अन्तिम स्वामी नहि; परस्पर आलोचना आ अपील आवश्यक। समकालीन प्रयोग कृत्रिम बुद्धि (AI) ज्ञान-प्रणाली (knowledge systems) मे सत्ता–ज्ञान प्रश्न प्रत्यक्ष अछि। प्रशिक्षण-आँकड़ा (training data) के चुनैत? क्रमांकन (ranking) कोन स्रोत ऊपर लबैत? सुरक्षा-लेबल (safety label) के तय करैत? उपयोगकर्ता-प्रतिक्रिया (user feedback) कोना मॉडल-व्यवहार (model behaviour) बदलैत? एहि सभक संग तथ्यगत शुद्धता (factual accuracy) अलग जाँचल जाए। एल्गोरिदमिक नियुक्ति/ऋण/पुलिसिंग (hiring/credit/policing) मे अंक (score) ज्ञान-दाबी सेहो अछि आ सत्ता-निर्णयक आधार सेहो। समानान्तर लेखापरीक्षण (audit) आँकड़ा-गुणवत्ता (data quality), विशेषता-चयन (feature choice), ऐतिहासिक पूर्वाग्रह (historical bias), मिथ्या-सकारात्मक (false positive), व्याख्या (explanation), अपील (appeal) आ असमान प्रभाव (disparate impact) जाँचत। चिकित्सामे निदानात्मक श्रेणी (diagnostic category) जीवनरक्षक ज्ञान दे सकैत अछि; साथे insurance, कलंक (stigma), employment वा surveillance पर असर डालि सकैत अछि। चिकित्सकीय वैधता (medical validity) आ सामाजिक परिणाम (social consequence) अलग-अलग जाँचू। शिक्षामे मानकीकृत परीक्षा (standardized test) तुलना सम्भव बनबैत अछि; साथे पाठ्यक्रम-संकुचन (curriculum narrowing), कोचिंग-लाभ (coaching advantage) आ लेबलिंग-प्रभाव (labeling effect) पैदा करि सकैत अछि। score = सम्पूर्ण क्षमता नहि। डिजिटल मंच सामग्री-संयमन (content moderation) लेल category बनबैत अछि—अनचाहा संदेश (spam), उत्पीड़न (harassment), भ्रामक सूचना (misinformation), वयस्क सामग्री (adult content)। परिभाषा आवश्यक, मुदा पारदर्शी नियम (transparent rule), प्रसंग-संवेदनशीलता (context sensitivity) आ अपील (appeal) चाही। राज्यमे जनगणना (census) आ पहचान-आँकड़ा (identity data) नीति/कल्याण लेल आवश्यक; साथे गोपनीयता (privacy), बहिष्कार (exclusion), गलत-वर्गीकरण (misclassification) आ निगरानी-जोखिम (surveillance risk) रखैत अछि। आँकड़ा-न्यूनता (data minimization) आ उद्देश्य-सीमा (purpose limitation) सत्ता-सचेत डिजाइनक अंग होय। विज्ञान-नीतिमे शोध-वित्तपोषण अजेण्डा (research funding agenda) प्रभावित करि सकैत अछि। कम-वित्तपोषित प्रश्न तेँ असत्य नहि; अधिक-वित्तपोषित प्रश्न तेँ सत्य नहि। प्रमाण-गुणवत्ता (evidence quality) अलग जाँचल जाए। इतिहास/पत्रकारितामे archive/search क्रमांकन (ranking) जे आसानीसँ भेटैत अछि ओकरा अतिप्रतिनिधित्व (over-represent) करि सकैत अछि। शोधक दायित्व (duty) अछि—दृश्य प्रमाण (visible evidence) आ अनुपस्थित प्रमाण (missing evidence) दुनूक मानचित्र बनाबय। अध्याय-निष्कर्ष ज्ञान आ सत्ता पूर्णतः अलग क्षेत्र नहि, विशेषतः जखन संस्था मनुष्यकेँ मापैत, वर्गीकृत करैत, अभिलेखित करैत आ सामान्यीकृत करैत अछि। फूकोक सत्ता–ज्ञान विश्लेषण (power/knowledge) देखबैत अछि जे परीक्षा, निगरानी, दस्तावेजीकरण (documentation) आ मानक (norm) ज्ञान उत्पन्न सेहो करैत अछि आ व्यवहार नियंत्रित सेहो। मुदा ‘सत्ता ज्ञानकेँ प्रभावित करैत अछि’ सँ ‘सभ ज्ञान सत्ता मात्र अछि’ निष्कर्ष नहि निकलैत। वैज्ञानिक, ऐतिहासिक आ दैनन्दिन दाबी स्वतंत्र प्रमाण, पुनरावृत्ति, स्रोत-तुलना आ यथार्थक प्रतिरोधसँ जाँचल जा सकैत अछि। समानान्तर दर्शन सत्ता-सचेत वस्तुनिष्ठता प्रस्तावित करैत अछि—स्रोतक संस्था जाँचू, वर्गीकरणक परिणाम जाँचू, प्रतिपक्ष खोलू, स्वतंत्र प्रमाण राखू, अपील/संशोधन सम्भव बनाउ। भारतीय दर्शनमे प्रमाण-विमर्श सत्ता-ज्ञानक आलोचना लेल जरूरी प्रतिपक्ष दैत अछि: प्राधिकार = सत्य नहि; साथे प्रामाण्यक सामाजिक वितरण सेहो आलोचनासँ बाहर नहि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘सत्ता ज्ञानकेँ प्रभावित करैत अछि; सत्यकेँ मनमाना नहि बनबैत अछि। ज्ञान जाँचू—आ ज्ञान बनाबयवला संस्थाकेँ सेहो।’ अध्याय-ग्रन्थसूची • मिशेल फूको — ‘ज्ञानक पुरातत्त्व’ (The Archaeology of Knowledge)। • मिशेल फूको — ‘अनुशासन आ दण्ड: कारागारक जन्म’ (Discipline and Punish: The Birth of the Prison)। • मिशेल फूको — ‘कामुकताक इतिहास, खण्ड 1: ज्ञानक इच्छा’ (The History of Sexuality, Volume 1: The Will to Knowledge)। • मिशेल फूको — ‘समाजक रक्षा आवश्यक’ (Society Must Be Defended), व्याख्यान। • मिशेल फूको — ‘सत्ता/ज्ञान’ (Power/Knowledge), चयनित साक्षात्कार आ लेख। • मिशेल फूको — ‘नीत्शे, वंशावली, इतिहास’ (Nietzsche, Genealogy, History)। • गैरी गटिंग — ‘मिशेल फूको: अति संक्षिप्त परिचय’ (Foucault: A Very Short Introduction)। • ह्यूबर्ट ड्रेफस आ पॉल राबिनो — ‘मिशेल फूको: संरचनावाद आ व्याख्याशास्त्रक पार’ (Michel Foucault: Beyond Structuralism and Hermeneutics)। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • कौटिल्य — अर्थशास्त्र, राज्य-ज्ञान/प्रशासनक भारतीय ऐतिहासिक संदर्भ लेल। • बी. के. मतिलाल — ‘धारणा: शास्त्रीय भारतीय ज्ञानमीमांसापर निबन्ध’ (Perception: An Essay on Classical Indian Theories of Knowledge)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।