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समस्या
फूकोक ‘पुरातत्त्व’ (archaeology) शब्द सुनितेँ भौतिक उत्खननक बिम्ब बनैत अछि, मुदा एहि पद्धतिक विषय मिट्टीक तह नहि, कथन, विमर्श, ज्ञान-क्षेत्र आ ऐतिहासिक नियमबद्धता अछि। प्रश्न ई अछि—किसी कालमे कोन प्रकारक कथन ‘ज्ञान’ रूपमे सम्भव होइत अछि, आ कोन नियम तय करैत अछि जे की कहल, वर्गीकृत, दर्ज वा वैध मानल जा सकैत अछि? परम्परागत बौद्धिक इतिहास प्रायः महान लेखक, महान विचार, प्रभाव-श्रृंखला अथवा एक विचारक चेतनाक विकासक कथा लिखैत अछि। फूकोक पुरातत्त्व एहि केन्द्रकेँ हटबैत कथनसभक प्रणालीगत सम्बन्ध, नियम, अवधारणा-निर्माण, विषय-वस्तु, वक्ता-स्थान आ अभिलेखीय शर्त जाँचैत अछि। पुरातत्त्व ‘लेखक वास्तवमे की सोचैत छलाह?’ प्रश्नकेँ पूर्णतः नकारैत नहि, मुदा ओकरा प्राथमिक केन्द्र नहि बनबैत। विश्लेषणक मुख्य इकाई ‘कथन’ (statement) अछि—जे सामान्य वाक्य, प्रतिज्ञप्ति (proposition) अथवा मात्र लिखित पंक्ति नहि, बल्कि विशिष्ट विमर्श-क्षेत्रमे कार्य करयवला कथनात्मक घटना अछि। ‘अभिलेख’ (archive) सेहो दस्तावेजक गोदाम मात्र नहि। फूकोक अर्थमे अभिलेख ओ नियम-प्रणालीक नाम अछि जे कथनसभक उद्भव, सह-अस्तित्व, परिवर्तन, पुनरावृत्ति आ लोपक क्षेत्र बनबैत अछि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—फूकोक पुरातत्त्व इतिहास, भाषाविज्ञान, संरचनावाद (structuralism) आ व्याख्याशास्त्र (hermeneutics) सँ कतेक अलग? विच्छेद (discontinuity), विमर्शात्मक गठन (discursive formation), कथन (statement), अभिलेख (archive) आ ज्ञान-रचना (episteme) जकाँ पदक सही सीमा की? आ समानान्तर इतिहास-दृष्टि एहि पद्धतिसँ की ग्रहण करैत अछि, की अस्वीकारैत?
मूल प्रतिपादन
फूकोक पुरातत्त्वक मूल प्रतिपादन ई अछि जे ज्ञान-क्षेत्र केवल व्यक्तिक अभिप्राय वा विचारक प्रत्यक्ष इतिहाससँ नहि बनैत; कथनसभ एहन नियमबद्ध विमर्शात्मक संरचनामे प्रकट होइत छथि जे कोन विषय बोलल जा सकैत अछि, के बोलि सकैत अछि, कौन अवधारणा मान्य, आ कौन सम्बन्ध ज्ञानयोग्य अछि—ई सीमित करैत अछि। पुरातत्त्व गहिर ‘छिपल अर्थ’ खोजबाक बदला जे कहल गेल अछि ओकर नियमबद्ध सतह पढ़ैत अछि। उद्देश्य ई नहि जे पाठक पीछे कोनो मूल चेतना खोजल जाए; उद्देश्य कथनसभक परस्पर सम्बन्ध आ ऐतिहासिक सम्भावना-शर्त स्पष्ट करब। विमर्शात्मक गठन (discursive formation) तखन पहिचानल जाइत अछि जखन कथन, वस्तु, अवधारणा, वक्ता-स्थान आ रणनीति बीच पर्याप्त नियमितता देखाइत अछि। समानान्तर दर्शन पुरातत्त्वसँ अभिलेखीय अनुशासन, श्रेणीक ऐतिहासिकता आ विच्छेद (discontinuity) क चेतना ग्रहण करैत अछि; मुदा दाबी जोड़ैत अछि जे विमर्शक नियम बाह्य यथार्थ, संस्था, सत्ता, पदार्थ, अनुभव आ प्रमाणक अतिरिक्त स्तरक विकल्प नहि।
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—पुरातत्त्व ‘विचारक इतिहास’ सँ ‘कथनक नियम’ दिस मोड़ अछि। प्रश्न केवल कौन लेखक की कहलाह नहि, बल्कि एक समयमे एकहि प्रकारक कथन अनेक स्थानपर सम्भव किएक भेल? दोसर तर्क—कथन (statement) प्रतिज्ञप्ति (proposition), वाक्य (sentence) अथवा भाषिक क्रिया (speech act) केर सरल समानार्थी नहि। एक कथनक पहचान ओकर भाषिक रूपक संग ओकर वस्तु, वक्ता-स्थान, अन्य कथनसभसँ सम्बन्ध आ उपयोग-क्षेत्र पर निर्भर करैत अछि। तेसर तर्क—विमर्शात्मक गठन नियमितता खोजैत अछि। यदि रोग, अपराध, भाषा वा अर्थव्यवस्था सम्बन्धी कथनसभमे वस्तु, परिभाषा, वक्ता-प्राधिकार आ अवधारणा-सम्बन्धक स्थायी ढाँचा देखाइत अछि, पुरातत्त्व ओकर नियम जाँचैत अछि। चारिम तर्क—फूको निरन्तरता (continuity) क बदला विच्छेद (discontinuity) पर बल दैत छथि। इतिहास हमेशा एकहि अवधारणाक क्रमिक प्रगति नहि; कखनो कोन प्रश्न वैध अछि, कोन वस्तु ज्ञानयोग्य अछि, कोन शब्दावली सम्भव अछि—ई पूरा व्यवस्था बदलि सकैत अछि। पाँचम तर्क—विच्छेदक अर्थ अचानक चमत्कारी टूटन नहि। पुरातत्त्व परिवर्तनक स्तर, सीमा आ असमान गति जाँचैत अछि; अलग ज्ञान-क्षेत्र अलग समयपर बदलि सकैत अछि। छठम तर्क—ज्ञान-रचना (episteme) केँ ‘युगक सामूहिक मन’ नहि मानल जाए। ई ऐतिहासिक कालमे विविध ज्ञान-क्षेत्रक सम्बन्ध सम्भव बनाबयवला संरचनात्मक शर्तक विश्लेषणात्मक पद अछि, न कि प्रत्येक व्यक्तिक चेतनाक वर्णन। सातम तर्क—अभिलेख (archive) दस्तावेजसभक योग (sum) नहि। फूकोक अर्थमे ई कथनक उत्पत्ति/अस्तित्वक नियम-क्षेत्र अछि। वास्तविक पुस्तकालय वा अभिलेखागार एहि व्यापक अवधारणाक सामग्री हो सकैत अछि, समानार्थी नहि। आठम तर्क—पुरातत्त्व लेखक (author), कृतिसमूह (oeuvre), परम्परा (tradition), प्रभाव (influence) जकाँ परिचित एकता केँ अस्थायी रूपेँ कोष्ठकित/अस्थायी रूपेँ स्थगित (bracket) करैत अछि, ताकि विश्लेषक पहिने जाँचि सकय जे कथनसभ वास्तवमे कोन सम्बन्ध बनबैत छथि। नवम तर्क—एहि पद्धतिसँ ‘मूल’ वा ‘पूर्वगामी’ खोजक आकर्षण कम होइत अछि। कोनो आधुनिक अवधारणा पुरान पाठमे समान शब्द देखलासँ एकहि ज्ञान-रचना सिद्ध नहि। दसम तर्क—पुरातत्त्व व्याख्या (interpretation) क जगह वर्णन (description) पर जोर दैत अछि: छिपल अर्थ (hidden meaning) खोजबाक बदला कथन-सम्बन्ध (statement relations), गठन-नियम (rules of formation), रूपान्तरण (transformations) आ बहिष्कार (exclusions) वर्णित करब। एगारहम तर्क—मुदा ‘वर्णन’ पूर्णतः सिद्धान्त-निरपेक्ष नहि। कौन पाठ-संग्रह (corpus), काल (period), कथन (statement), सम्बन्ध (relation) चुनल जाए—विश्लेषक निर्णय आवश्यक। एहि कारण समानान्तर पद्धति चयन-मानक पारदर्शी राखैत अछि। बारहम तर्क—पुरातत्त्व कारणात्मक व्याख्या (causal explanation) मे सीमित अछि। ओ एक विमर्श (discourse) सँ दोसर विमर्श (discourse) क संक्रमणक सामाजिक–राजनीतिक कारण पूर्णतः नहि बतबैत; एहि सीमा सँ फूकोक वंशावली (genealogy) दिस संक्रमण होइत अछि।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे विषय/कर्ता (subject) आ लेखक (author) केँ कोष्ठकित/अस्थायी रूपेँ स्थगित (bracket) करैत पुरातत्त्व मानवीय सक्रियता (agency), अभिप्राय (intention) आ सृजनशीलता (creativity) कम आँकैत अछि। वास्तविक ग्रन्थ व्यक्ति लिखैत अछि, विमर्श (discourse) स्वयं कलम नहि चलबैत। दोसर पूर्वपक्ष इतिहासकारक अछि—discontinuity पर अधिक जोर निरन्तरता (continuity), संप्रेषण (transmission), संस्था (institution) आ कारण-शृंखला (causal chain) केँ कृत्रिम रूपेँ तोड़ि सकैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष व्याख्याशास्त्रीय (hermeneutic) अछि—पाठक अर्थ, उद्देश्य आ आत्मबोधकेँ केवल सतही कथन-सम्बन्ध (surface statement relation) मे घटाबयब समझक जीवित आयाम नष्ट करैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष यथार्थवादी अछि—‘वस्तु-निर्माण (object formation)’ जकाँ भाषा रोग, पदार्थ, जैविक प्रजाति वा आर्थिक अभावकेँ विमर्श (discourse) द्वारा बनाओल वस्तु जकाँ गलत बुझायल जा सकैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष तुलनात्मक इतिहाससँ अछि—भारतीय शास्त्रीय पद, भाष्य-परम्परा अथवा ज्ञान-वर्गीकरणपर फूकोवादी पुरातत्त्व (Foucauldian archaeology) थोपलासँ यूरोपीय आधुनिकताक श्रेणी आयात हो सकैत अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—पुरातत्त्व सक्रियता (agency) क तत्त्वमीमांसक निषेध (metaphysical denial) नहि; विश्लेषणात्मक प्राथमिकता बदलैत अछि। व्यक्ति/अभिप्राय लेल अलग स्तर राखल जा सकैत अछि, मुदा विमर्श (discourse) क नियम सेहो स्वतंत्र अध्ययन योग्य। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—निरन्तरता (continuity) आ विच्छेद (discontinuity) दुनू अनुभवजन्य प्रश्न (empirical question) छथि। स्रोत जहाँ निरन्तरता देखाबय, स्वीकारू; जहाँ श्रेणी/नियम बदलय, विच्छेद दर्ज करू। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—व्याख्या आ पुरातत्त्व पूरक हो सकैत अछि। लेखकक अर्थ बुझू; साथे ई सेहो जाँचू जे लेखक किन उपलब्ध अवधारणा/श्रेणी भीतर बोलि रहल छथि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—वस्तु-निर्माण = भौतिक वस्तु बनबैत नहि। ‘रोग’क जैविक यथार्थ (biological reality) एक स्तर; ‘कौन लक्षण रोग मानल, कौन निदानात्मक श्रेणी (diagnostic category), कौन संस्था (institution)’ दोसर ऐतिहासिक–विमर्शात्मक स्तर। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय सामग्री पर पद्धति समस्या-औजार मात्र हो। मूल पद, कालक्रम, संस्थागत इतिहास, पाण्डुलिपि/शास्त्रार्थ परम्परा पहिने; फूकोक पद बादमे सीमित तुलना रूपमे।
भारतीय संवाद
भारतीय शास्त्रीय ज्ञान-वर्गीकरण विविध परम्परामे अलग अछि—न्याय, मीमांसा, बौद्ध, जैन, व्याकरण, वेदान्त। एहि विविधताकेँ एक ‘भारतीय ज्ञान-रचना (Indian episteme)’ कहब अति-सामान्यीकरण होयत। न्यायमे प्रमाण-विभाजनक इतिहास देखबैत अछि जे कोन ज्ञान-स्रोत वैध मानल जाए, एहि पर व्यवस्थित बहस छल। पुरातत्त्वीय प्रश्न ई हो सकैत अछि—प्रमाण-शब्दावलीक ऐतिहासिक रूपांतरण की? मुदा प्रमाणक सत्य-मूल्य अलग दार्शनिक प्रश्न। मीमांसा, न्याय आ बौद्ध परम्पराक एक-दोसरापर टीका/खण्डन विमर्श-सम्बन्ध (discourse relation) क समृद्ध पाठ-संग्रह (corpus) दैत अछि; तथापि ‘विमर्शात्मक गठन (discursive formation)’ शब्दकेँ ऐतिहासिक पहचानक दावा नहि बनाओल जाए। नव्य-न्यायक तकनीकी भाषा समयक संग दार्शनिक कथनक सम्भावना बदलैत अछि—विशेषतः सम्बन्ध-वर्णन (relation-description) आ सटीकता (precision) मे। ई पुरातत्त्व (archaeology) क प्रश्नसँ संवाद करि सकैत अछि: नूतन तकनीकी शब्दावली (technical vocabulary) सँ की कहब सम्भव भेल? भाष्य-परम्परा निरन्तरता (continuity) क शक्तिशाली भारतीय उदाहरण अछि, मुदा भाष्य भीतर अवधारणात्मक परिवर्तन (conceptual shifts) सेहो खोजल जा सकैत अछि। एतय निरन्तरता/विच्छेद (continuity/discontinuity) केँ प्रमाणसँ अलग-अलग जाँचू। शास्त्रीय ग्रन्थक आधुनिक मुद्रित संस्करण, विश्वविद्यालयीय पाठ्यक्रम आ आधुनिक श्रेणीकरण ‘भारतीय दर्शन (Indian philosophy)’ केँ नूतन अभिलेख/क्रम (archive/order) मे प्रस्तुत करैत अछि। ई आधुनिक ज्ञान-इतिहासक वैध पुरातत्त्वीय प्रश्न अछि। भारतीय संवादक निष्कर्ष—फूकोक पुरातत्त्व भारतीय स्रोतपर तैयार ढाँचा (ready-made framework) नहि; श्रेणी, कथन, संस्था आ परिवर्तन जाँचबाक सीमित पद्धतिगत प्रश्न-संग्रह अछि।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक समानान्तर इतिहास-दृष्टिमे पुरातत्त्व विशेष उपयोगी तखन अछि जखन आजुक सामाजिक/बौद्धिक श्रेणी अतीतपर आरोपित होयबाक जोखिम हो। आधुनिक पदक प्राचीन/मध्यकालीन अस्तित्व स्रोतसँ सिद्ध कएल जाए, अनुमानसँ नहि। पंजी, शाखा-पुस्तक, न्यायीय ग्रन्थ, भाष्य, भूमि-दस्तावेज, पत्रिका, जनगणना, पाठ्यक्रम आ डिजिटल अभिलेख अलग पाठ-संग्रह (corpus) छथि; प्रत्येकक कथन-नियम (statement rules) अलग हो सकैत अछि। किसी पदक पहिल उपलब्ध लिखित प्रयोग/उपस्थिति (occurrence) ओकर सामाजिक उत्पत्तिक निश्चित तिथि नहि। स्रोत-जीविता, मौखिक प्रयोग, पाण्डुलिपि-हानि (manuscript loss) आ अभिलेखीय जीविता (archival survival) अलग जाँचबाक चाही। मिथिला/मैथिली/जाति/उपजाति/पण्डित/लोक/राज्य जकाँ पदक ऐतिहासिक अर्थकाल बनाओल जाए—कौन काल, स्रोत, संस्था, भाषा, अर्थ? एहि सँ काल-विस्थापन कम होइत अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि निरन्तरता (continuity) केँ परम्परागत गौरव कारण स्वीकारैत नहि, disनिरन्तरता (continuity) केँ आधुनिक novelty कारण सेहो नहि। दुनू प्रमाण-दाबी छथि। अभिलेखीय मौन पुरातत्त्वीय सीमा खोलैत अछि; समानान्तर विवेकवाद ओकरा अज्ञात/सम्भाव्य रूपमे दर्ज करैत अछि, कल्पित भरपाई नहि। मैथिली ई-पत्रिका, डिजिटल पुस्तकालय आ खोजयोग्य अभिलेख (archive) आज नूतन कथन-दृश्यता (statement visibility) बनबैत अछि। जे पाठ पहिले दुर्लभ छल, खोज (search) द्वारा केन्द्रमे आबि सकैत अछि—ज्ञान-रचनाक डिजिटल परिवर्तनक उदाहरण। आत्मसमीक्षा—समानान्तर दर्शन स्वयं full chapter plan, तकनीकी शब्दावली (technical vocabulary) आ archive बनबैत अछि; भविष्यक शोध एहि संरचनाकेँ सेहो ऐतिहासिक वस्तु (historical object) रूपमे पढ़ि सकैत अछि।
समकालीन प्रयोग
डिजिटल खोज-इंजन आ कृत्रिम बुद्धि (AI) नूतन अभिलेख-सदृश दृश्यता (archive-like visibility) बनबैत अछि—कौन दस्तावेज सूचीबद्ध (indexed), क्रमांकित (ranked), पुनर्प्राप्य (retrievable) अछि, एहि सँ शोधक उपलब्ध कथन-क्षेत्र बदलि सकैत अछि। मुदा खोज-परिणाम (search result) = फूकोक तकनीकी अर्थक अभिलेख (archive) नहि। डेटाबेसमे क्षेत्र-रूपरेखा (field schema) तय करैत अछि जे की दर्ज कएल जा सकैत अछि। लिंग (gender), पेशा (occupation), भाषा (language), स्थान (location) जकाँ क्षेत्र (fields) ऐतिहासिक यथार्थ (historical reality) केँ ग्रहण (capture) सेहो करैत, सरल (simplify) सेहो। रूपरेखा-पुरातत्त्व (schema archaeology) नूतन डिजिटल इतिहास-विधि बनि सकैत अछि। चिकित्सामे निदान-पुस्तिका (diagnostic manuals) क संस्करण-इतिहास देखलासँ श्रेणी, लक्षण आ सामान्यता (normality) क ज्ञान-रचना बदलैत देखाइत अछि। जैविक प्रमाण (evidence) आ वर्गीकरण-इतिहास (classificatory history) अलग जाँचू। कानूनमे मामला-डेटाबेस (case database) आ पूर्वनिर्णय-वर्गीकरण (precedent classification) क संरचना शोधक नजर प्रभावित करैत अछि। कौन निर्णय खोजयोग्य/अधिकृत (searchable/authoritative) बनल, ई संस्थागत अभिलेख (institutional archive) प्रश्न अछि। पत्रकारितामे माध्यम-शब्दावली (media vocabulary) समयक संग बदलैत अछि—आतंकवाद (terrorism), विरोध-प्रदर्शन (protest), दंगा (riot), शरणार्थी (refugee), प्रवासी (migrant) जकाँ पदक पाठ-संग्रह विश्लेषण (corpus analysis) विमर्शात्मक परिवर्तन (discursive shift) देखाबि सकैत अछि; तथ्य-जाँच अलग अनिवार्य। भाषा-अध्ययनमे विशाल पाठ-संग्रह (large corpus) ऐतिहासिक सहप्रयोग-परिवर्तन (collocation change) देखाबि सकैत अछि। संगणकीय प्रतिरूप (computational pattern) पुरातत्त्वीय संकेत (archaeological clue) हो सकैत अछि, स्वतः व्याख्या (explanation) नहि। कृत्रिम-बुद्धि-जनित पाठ (AI-generated text) भविष्यक इतिहासकार (historian) लेल नूतन समस्या बनाओत—कथनक लेखक-कार्य (author-function), उत्पत्ति-पथ (provenance), प्रतिलिपिकरण (duplication) आ कृत्रिम पाठ-संग्रह (synthetic corpus) क सीमा स्पष्ट अधितथ्य (metadata) बिना कठिन हो सकैत अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
फूकोक पुरातत्त्व इतिहासक भौतिक उत्खनन नहि; कथन, विमर्शात्मक गठन, अभिलेख, ज्ञान-रचना आ ऐतिहासिक नियमबद्धताक पद्धति अछि। ई महान लेखकक चेतना अथवा छिपल अर्थकेँ प्राथमिकता नहि दैत; जे कहल गेल अछि ओकर सम्बन्ध, सम्भावना-शर्त आ परिवर्तन वर्णित करैत अछि। कथन साधारण वाक्य नहि; अभिलेख (archive) दस्तावेज-भण्डार मात्र नहि; ज्ञान-रचना (episteme) युगक सामूहिक मन नहि; विच्छेद (discontinuity) इतिहासक सम्पूर्ण टूटन नहि। पुरातत्त्वक सीमा कारणात्मक व्याख्या (causal explanation), संस्था/सत्ता आ शरीरगत अभ्यासक प्रश्नमे स्पष्ट होइत अछि; एहि कारण अगिला अध्यायमे वंशावली (genealogy) क आवश्यकता सामने अबैत अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि एहि पद्धतिसँ श्रेणीक ऐतिहासिकता, काल-विस्थापन-विरोध, अभिलेखीय अनुशासन आ निरन्तरता/विच्छेद (continuity/discontinuity) क प्रमाण-जाँच ग्रहण करैत अछि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘जे कहल गेल से पढ़ू; जे कहब सम्भव बनल ओकर नियम जाँचू; जे मौन अछि ओकर सीमा मानू; इतिहासक रिक्ति कल्पनासँ नहि भरू।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• मिशेल फूको — ‘ज्ञानक पुरातत्त्व’ (The Archaeology of Knowledge)। • मिशेल फूको — ‘वस्तुसभक क्रम’ (The Order of Things)। • मिशेल फूको — ‘क्लिनिकक जन्म’ (The Birth of the Clinic)। • मिशेल फूको — ‘पागलपनक इतिहास’ (History of Madness), प्रारम्भिक पुरातत्त्वीय पृष्ठभूमि लेल। • मिशेल फूको — ‘विमर्शक क्रम’ (The Order of Discourse)। • मिशेल फूको — ‘लेखक की अछि?’ (What Is an Author?)। • गैरी गटिंग — ‘मिशेल फूको: अति संक्षिप्त परिचय’ (Foucault: A Very Short Introduction)। • ह्यूबर्ट ड्रेफस आ पॉल राबिनो — ‘मिशेल फूको: संरचनावाद आ व्याख्याशास्त्रक पार’ (Michel Foucault: Beyond Structuralism and Hermeneutics)। • गौतम — न्यायसूत्र। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • रघुनाथ शिरोमणि — पदार्थतत्त्वनिरूपण। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।