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समस्या
फूकोक पुरातत्त्व, वंशावली, सत्ता–ज्ञान विश्लेषण, अनुशासन, निगरानी, शरीर आ सामान्यीकरण इतिहास लिखबाक पद्धतिमे गम्भीर परिवर्तन प्रस्तावित करैत अछि। इतिहास केवल घटनाक क्रम वा महान व्यक्तिक विचारक कथा नहि; इतिहास ई सेहो जाँचि सकैत अछि जे कोन श्रेणी कखन बनल, कोन संस्था ककरा बोलबाक अधिकार देलक, कोन अभिलेख बाँचल, कोन अनुभव दर्ज नहि भेल, आ वर्तमान व्यवस्था प्राकृतिक किएक लगैत अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि एहि आलोचनात्मक शक्ति केँ ग्रहण करैत अछि, मुदा एक निर्णायक सावधानी जोड़ैत अछि—सत्ता-विश्लेषण प्रमाणक विकल्प नहि। इतिहासकार यदि प्रत्येक स्रोतकेँ केवल ‘सत्ताक उत्पाद’ कहि छोड़ि देत, तखन सत्य-असत्य, विश्वसनीय-अविश्वसनीय, तिथि, कारण, क्रम, घटना आ मनगढ़न्त कथा बीचक भेद धुँधला भऽ जाएत। फूकोक प्रेरणा हाशियाक इतिहास खोलैत अछि, मुदा ‘हाशिया’ स्वयं सत्यक प्रमाण नहि। मौखिक स्मृति, स्त्रीक गीत, श्रमिक अनुभव, पराजित समुदाय, गैर-राजकीय दस्तावेज आ स्थानीय भाषा महत्वपूर्ण स्रोत छथि; हुनकरो काल, प्रसंग, संस्करण, संचरण, पक्षपात आ परस्पर पुष्टि जाँचल जाए। अभिलेखीय मौन सेहो दुहरा अर्थ रखैत अछि। कोनो स्वर दर्ज नहि भेल हो सकैत अछि किएक तँ संस्था ओकरा दर्ज करबाक योग्य नहि मानलक; मुदा मौन सँ विशिष्ट कथा स्वतः सिद्ध नहि होइत। मौन प्रमाण-अन्तराल अछि—कल्पनाक मुक्त अनुज्ञा नहि। समानान्तर इतिहास-दृष्टिक सामने मूल प्रश्न ई अछि—फूकोक श्रेणी-आलोचना, वंशावली, सत्ता–ज्ञान आ अभिलेखीय संवेदनशीलता केँ कोना अपनाओल जाए जे इतिहास अधिक बहुकेन्द्रिक बनय, मुदा प्रमाणक कसौटी, कारणात्मक सावधानी आ यथार्थक प्रतिरोध सुरक्षित रहय? एहि अध्यायक उद्देश्य फूकोक अनुकरण नहि, पद्धतिगत संवाद अछि। ‘फूको कहैत छथि, तेँ इतिहास एहन’ नहि; बल्कि ‘फूको कोन प्रश्न खोलैत छथि, आ समानान्तर दर्शन हुनकरा कोन अतिरिक्त कसौटी सँ जाँचैत अछि?’—ई मुख्य धुरी अछि।
मूल प्रतिपादन
समानान्तर इतिहास-दृष्टि फूकोसँ चार मुख्य पाठ ग्रहण करैत अछि—श्रेणीक ऐतिहासिकता, अभिलेखक चयनशीलता, सत्ता–ज्ञानक सम्बन्ध, आ वर्तमान व्यवस्था केँ प्राकृतिक/अनिवार्य मानबाक विरुद्ध वंशावलीक चेतना। मुदा समानान्तर इतिहास-दृष्टि चार सीमा सेहो लगबैत अछि—हाशिया स्वतः सत्य नहि; अभिलेखीय मौन कल्पनाक अनुमति नहि; सत्ता तथ्यक स्थानापन्न नहि; आ ऐतिहासिक निष्कर्ष प्रमाण-श्रेणीकरणक बाहर नहि। इतिहासक दाबी चार मुख्य अवस्थामे राखल जा सकैत अछि—सबल रूपेँ समर्थित, सम्भाव्य, विवादित, अज्ञात। एहि श्रेणीकरणक उद्देश्य अनिश्चितताकेँ लुकाबयब नहि, स्पष्ट करब अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि केन्द्र/हाशिया द्वैत केँ स्थिर नैतिक पदानुक्रम नहि मानैत। केन्द्रक दस्तावेज पक्षपाती हो सकैत अछि, मुदा उपयोगी; हाशियाक स्मृति मूल्यवान हो सकैत अछि, मुदा त्रुटिरहित नहि। दुनू पर समान आलोचनात्मक कसौटी लागू हो। समानान्तर सूत्र—‘सत्ता जाँचू, प्रमाण नहि छोड़ू; मौन दर्ज करू, कथा नहि गढ़ू; हाशिया सुनू, स्वतः सत्य नहि मानू; केन्द्र पढ़ू, स्वतः प्रामाणिक नहि मानू।’
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—इतिहासक श्रेणी स्वयं ऐतिहासिक हो सकैत अछि। ‘राज्य’, ‘जाति’, ‘उपजाति’, ‘भाषा’, ‘समुदाय’, ‘पागलपन’, ‘अपराध’, ‘सामान्यता’ जकाँ पद अलग कालमे अलग अर्थ/संस्था रखि सकैत अछि। आधुनिक निश्चित अर्थ अतीतपर स्वतः आरोपित नहि करू। दोसर तर्क—पुरातत्त्व इतिहासकारकेँ कथनक नियम जाँचबाक साधन दैत अछि। कोन प्रकारक दाबी वैध छल? के बोलि सकैत छल? कौन शब्दावली उपलब्ध छल? कोन दस्तावेजी रूप सामान्य छल? एहि प्रश्नसँ लेखक-केंद्रित इतिहास विस्तृत होइत अछि। तेसर तर्क—वंशावली वर्तमान व्यवस्था केर अपरिहार्यता तोड़ैत अछि। जे संस्था आज प्राकृतिक लगैत अछि, संभव अछि ओ अनेक आकस्मिक मोड़, संघर्ष, प्रशासनिक प्रयोग आ पराजित विकल्पसँ बनल हो। एहि तथ्यसँ सुधारक कल्पना खुलैत अछि। चारिम तर्क—मुदा ‘ऐतिहासिक रूपेँ बनल’ = ‘असत्य’ नहि। विवाह, नागरिकता, मुद्रा वा विश्वविद्यालय जकाँ संस्थागत तथ्य मानव-निर्मित छथि, मुदा वास्तविक सामाजिक परिणाम रखैत छथि। पाँचम तर्क—सत्ता स्रोत-उत्पादन प्रभावित करैत अछि। कर-अभिलेख, अदालत, सेना, भूमि-दस्तावेज, जनगणना, विश्वविद्यालय आ प्रेस अधिक दस्तावेज छोड़ि सकैत छथि। एहि कारण दस्तावेजक अधिकता सामाजिक महत्त्वक पूर्ण माप नहि। छठम तर्क—अभिलेखीय मौनक कम-से-कम चार सम्भव कारण हो सकैत अछि—घटना नहि भेल; घटना भेल मुदा दर्ज नहि भेल; दर्ज भेल मुदा स्रोत नष्ट/लुप्त; स्रोत उपलब्ध अछि मुदा शोधक खोज नहि पओलक। बिना अतिरिक्त प्रमाण एहि चारूमे एक चुनब उचित नहि। सातम तर्क—हाशियाक स्रोत इतिहासक विस्तार करैत अछि। मौखिक इतिहास, लोकगीत, घरेलू दस्तावेज, निजी पत्र, स्थानीय पत्रिका, श्रमिक स्मृति, स्त्रीक अनुभव आ क्षेत्रीय भाषा-रचना केन्द्रक अभिलेखक अन्धबिन्दु खोलि सकैत अछि। आठम तर्क—मुदा स्रोतक नैतिक प्रतिष्ठा आ तथ्यगत विश्वसनीयता अलग। पीड़ितक अनुभव नैतिक रूपेँ महत्वपूर्ण, मुदा विशिष्ट तिथि/संख्या/कारण सम्बन्धी दाबी पुनःपुष्टि माँगि सकैत अछि। नवम तर्क—फूकोक सत्ता–ज्ञान विश्लेषण इतिहासकारकेँ पूछब सिखबैत अछि—कोन संस्था ‘वैध ज्ञाता’ बनल? कोन प्रमाण-रूप मान्य? कोन भाषाकेँ आधिकारिकता? कोन अभिलेख संरक्षित? समानान्तर उत्तर जोड़ैत अछि—ई दाबी बाह्य साक्ष्यपर कतेक टिकैत अछि? दसम तर्क—विच्छेद आ निरन्तरता दुनू ऐतिहासिक दाबी छथि। परम्परा अपन निरन्तरता दावा करि सकैत अछि; आधुनिक सुधार अपन नवीनता दावा करि सकैत अछि। दुनूकेँ स्रोत-शृंखला, शब्दार्थ, संस्था आ व्यवहारसँ जाँचू। एगारहम तर्क—वर्तमानक इतिहास लिखैत काल वर्तमानवाद सँ बचब आवश्यक। आजक नैतिक/राजनीतिक प्रश्न शोधक प्रश्न चयन करि सकैत अछि, मुदा अतीतक पात्रकेँ आजुक शब्दावलीमे जबरदस्ती बोलाबय नहि। बारहम तर्क—इतिहासक कारण एकल सत्ता-संबंध नहि। जलवायु, अर्थव्यवस्था, महामारी, तकनीक, भूगोल, युद्ध, जनसांख्यिकी, व्यक्ति केर निर्णय, धार्मिक विश्वास, भाषा आ संयोगक प्रमाण जहाँ अछि, समाविष्ट करू।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे फूको-प्रेरित इतिहास सत्ता/विमर्शपर एतेक बल दैत अछि जे घटना, व्यक्ति, कारण, कालक्रम आ संस्थागत उपलब्धि गौण भऽ जाइत अछि। दोसर पूर्वपक्ष यथार्थवादी अछि—यदि अभिलेखक हर स्रोत शक्ति-संबंधसँ दूषित मानल जाए, तखन इतिहासक वस्तुनिष्ठ ज्ञान सम्भव नहि रहत। तेसर पूर्वपक्ष हाशिया-इतिहास समर्थक अछि—‘समान प्रमाण-कसौटी’ कहब स्वयं सत्ता-समर्थक हो सकैत अछि, किएक तँ हाशियाक स्रोत प्रायः केन्द्र जकाँ दस्तावेजी समर्थन नहि रखैत। चारिम पूर्वपक्ष परम्परा-समर्थक अछि—हर निरन्तरता केँ वंशावलीक संशय सँ देखब सभ्यतागत स्मृति आ परम्परागत आत्मबोध कमजोर करैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय तुलनासँ अछि—फूकोक यूरोपीय आधुनिक संस्था-विश्लेषणकेँ प्राचीन/मध्यकालीन भारतीय सामग्रीपर लागू करब अवधारणात्मक उपनिवेशवाद बनि सकैत अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—समानान्तर इतिहास-दृष्टि फूकोक प्रश्नकेँ अतिरिक्त स्तर मानैत अछि, स्थानापन्न नहि। घटना, कालक्रम, व्यक्ति, संस्था, कारण आ परिणाम सभ रहत; सत्ता/विमर्श विश्लेषण ओकरा अधिक जटिल बनबैत अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—स्रोत शक्ति-संबद्ध हो सकैत अछि, मुदा स्रोत-समीक्षा सम्भव अछि। स्वतंत्र स्रोत, भौतिक साक्ष्य, आन्तरिक संगति, तिथि, उत्पत्ति-पथ (provenance), प्रतिपक्षीय दस्तावेज आ पुनरावृत्त जाँच विश्वसनीयता बढ़बैत अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—समान कसौटीक अर्थ समान प्रकारक दस्तावेज माँगब नहि। मौखिक इतिहासक कसौटी मौखिक इतिहासक अनुकूल; पुरातत्त्वक कसौटी भौतिक साक्ष्यक अनुकूल। ‘समान’ = दाबी अनुसार निष्पक्ष प्रमाण-मानक। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—निरन्तरता मूल्यवान हो सकैत अछि; वंशावली (genealogy) ओकर प्रमाण माँगैत अछि। वास्तविक दीर्घजीवी परम्परा स्रोत-जाँच सँ मजबूत होयत, कमजोर नहि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय सामग्री अपन पदावली, कालक्रम, संस्था, भूगोल आ स्रोत सँ पहिने पढ़ल जाए। फूकोक पद तुलना/प्रश्न-औजार, ऐतिहासिक पहचान नहि।
भारतीय संवाद
भारतीय इतिहासलेखनमे शास्त्र, भाष्य, स्मृति, पाण्डुलिपि, पुरातत्त्व, शिलालेख, लोकपरम्परा, औपनिवेशिक अभिलेख आ आधुनिक आँकड़ा अलग प्रमाण-संसार बनबैत छथि। एहि सभकेँ एकहि ‘भारतीय अभिलेख’ कहि समेटब उचित नहि। न्याय–नव्य-न्याय प्रमाण, अभाव, परिभाषा आ प्रतिपक्षक अनुशासन समानान्तर इतिहास-दृष्टिक प्रमाण-पक्ष सबल करैत अछि। ‘अभिलेखमे नहि’ दाबी स्वयं अवच्छेदित हो—कोन अभिलेख, कोन काल, कोन वस्तु, कोन खोज-सीमा? मीमांसा पाठ, प्रसंग, तात्पर्य आ विधिक भेद इतिहासकारकेँ पाठीय दाबी सावधानीसँ पढ़बाक संसाधन दे सकैत अछि; मुदा आधुनिक ऐतिहासिक पद्धतिक पूर्वरूप कहब अनुचित। बौद्ध आ जैन परम्पराक बहुविध ग्रन्थ/संघ/भाष्य इतिहास देखबैत अछि जे ‘एक भारतीय परम्परा’क एकरूप कथा ऐतिहासिक रूपेँ कमजोर हो सकैत अछि। औपनिवेशिक जनगणना, भाषा-वर्गीकरण, जाति-सूची आ प्रशासनिक श्रेणी आधुनिक भारतीय सामाजिक ज्ञानक महत्वपूर्ण सत्ता–ज्ञान स्रोत छथि; मुदा ओ सभ सामाजिक पहचानकेँ शून्यसँ ‘निर्माण’ कएलक—एहन अति-दाबी सेहो प्रमाण माँगैत अछि। कौटिल्यक अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, पंजी, स्थानीय राजकीय अभिलेख, औपनिवेशिक दस्तावेज आ आधुनिक कानून अलग काल/संस्था छथि। एक निरन्तर अनुशासनात्मक वंशावली (disciplinary genealogy) बनाबयब आकर्षक, मुदा अक्सर अति-सामान्यीकरण। भारतीय संवादक निष्कर्ष—फूकोक प्रश्न उपयोगी अछि जखन ओ स्रोतक ऐतिहासिकता खोलैत अछि; अनुपयोगी तखन जे ओ स्रोतक अपने अर्थ, तर्क आ कालगत भिन्नता नष्ट करैत अछि।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक इतिहासमे राजकीय अभिलेख, पंजी/शाखा-पुस्तक, संस्कृत पाण्डुलिपि, मैथिली साहित्य, भूमि-दस्तावेज, नेपाल–भारत प्रशासनिक स्रोत, लोकगीत, स्त्रीक गीत, मौखिक परम्परा, मुद्रित पत्रिका आ डिजिटल अभिलेख—सभ अलग प्रमाण-प्रकार छथि। पंजीक स्रोत सामाजिक श्रेणी आ वंश सम्बन्धी मूल्यवान जानकारी दे सकैत अछि; मुदा बादक नकल, शाखागत भिन्नता, प्रविष्टि-काल, सामाजिक उद्देश्य आ अनुपस्थित समूह जाँचबाक चाही। किसी पद अथवा सामाजिक श्रेणीक आधुनिक अर्थकेँ मध्यकालीन स्रोतपर थोपब काल-विस्थापन हो सकैत अछि। पदक पहिल उपलब्ध प्रयोग, बादक अर्थ-विकास, संस्थागत स्वीकृति आ भौगोलिक प्रसार अलग-अलग दर्ज करू। मैथिली भाषा-इतिहासमे मानक/लोक, देवनागरी/तिरहुता, मुद्रित/मौखिक, भारत/नेपाल जकाँ द्वैत स्थिर न मानू। प्रत्येकक ऐतिहासिक संस्था, उपयोग, शक्ति-संबंध आ पाठ-साक्ष्य जाँचू। लोकस्मृति अभिलेखीय मौन भरबाक ‘कथा’ नहि, अलग स्रोत अछि। ओकर प्रदर्शन-प्रसंग, पीढ़ीगत संचरण, रूपक, स्थानीय राजनीति आ अन्य स्रोतसँ सम्बन्ध जाँचू। मिथिलाक स्त्री, श्रमिक, दलित, ग्रामीण, प्रवासी, सीमापार समुदाय वा अन्य कम-दर्ज अनुभव इतिहासमे अधिक स्थान पाबय योग्य छथि; मुदा गरिमा-आधारित समावेशन प्रमाण-जाँचक स्थानापन्न नहि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि मिथिला केँ केन्द्रक बदला पद्धतिगत गृहभूमि मानैत अछि। ‘मिथिलासँ सभ आरम्भ’ जकाँ दाबी स्वयं वंशावली, पुरातत्त्व आ प्रमाणक कसौटीपर जाँचल जाए। डिजिटल विदेह (Videha)-जकाँ अभिलेख भविष्यमे शोधक लेल स्रोत बनि सकैत अछि; तिथि, संस्करण, यूआरएल (URL)/फाइल-इतिहास, सम्पादकीय चयन आ अनुपस्थित सामग्री—सभक अधितथ्य सुरक्षित करब इतिहासक पारदर्शिता बढ़बैत अछि।
समकालीन प्रयोग
डिजिटल अभिलेखमे खोज-क्रमांकन इतिहासकारक दृश्य स्रोत-संसार प्रभावित करैत अछि। जे पृष्ठ खोजमे ऊपर, ओ अधिक उद्धृत भऽ सकैत अछि; एहि कारण खोज-दृश्यता = ऐतिहासिक महत्त्व नहि। कृत्रिम बुद्धि (AI) शोध-सहायक विशाल पाठ-संग्रह (corpus) सँ सारांश बना सकैत अछि; मुदा प्रशिक्षण-स्रोत, पुनर्प्राप्ति-पूर्वाग्रह (retrieval bias), दोहरायल पाठ (duplicated text), अनुपस्थित अभिलेख (missing archive) आ कृत्रिम उद्धरण (generated citation) इतिहासक दाबी विकृत करि सकैत अछि। मूल स्रोत-जाँच अनिवार्य। समाचार/सामाजिक माध्यमक वर्तमान अभिलेख (archive) भविष्यक वंशावली (genealogy) लेल असमान अछि—हटाओल पोस्ट, निजी समूह, मंच-बन्दी (platform closure), टूटल कड़ियाँ (broken links) आ स्क्रीनशॉट-संस्कृति (screenshot culture) स्रोत-जीविता बदलैत अछि। डिजिटल छवि/वीडियो इतिहासमे अधितथ्य (metadata), उत्पत्ति-पथ (provenance), सम्पादन-इतिहास (edit history) आ डीपफेक-पहिचान (deepfake detection) नूतन स्रोत-समीक्षा बनि रहल अछि। दृश्य उपस्थिति स्वतः प्रामाणिकता नहि। जनगणना, प्रशासनिक डेटाबेस आ सर्वेक्षण (survey) श्रेणी इतिहासकारक समाज-दृष्टि प्रभावित करैत अछि। श्रेणी-परिभाषा (category definition) बदललासँ समय-श्रृंखला तुलना भ्रामक हो सकैत अछि। सार्वजनिक स्मारक, संग्रहालय आ पाठ्यपुस्तक ‘राष्ट्रीय स्मृति’ बनबैत अछि। कोन घटना केन्द्र, कोन हाशिया—ई सत्ता-ज्ञान प्रश्न; मुदा संशोधन प्राथमिक स्रोत आ विद्वत् प्रमाण (scholarly evidence) सँ हो। वंशावली सामाजिक नीति लेल उपयोगी तखन जे वर्तमान श्रेणीक पथ-निर्भरता (path-dependence) खोलय; नीति-निर्णय फेर वर्तमान अधिकार, परिणाम, लागत, गरिमा आ प्रमाण पर हो। समानान्तर इतिहासलेखनक डिजिटल नियम हो सकैत अछि—स्रोत-कड़ी/पहचान-सूचक (source link/identifier), तिथि, संस्करण, उद्धरण-सीमा, अनिश्चितता-टिप्पणी (uncertainty note), सुधार-अभिलेख (correction log) आ हटाओल/बदलल स्रोत-अभिलेख (deleted/changed source record) सुरक्षित राखू।
अध्याय-निष्कर्ष
फूको समानान्तर इतिहास-दृष्टि लेल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण छथि किएक तँ ओ इतिहासकारकेँ श्रेणी, अभिलेख, संस्था, सत्ता–ज्ञान, शरीर, सामान्यीकरण आ वर्तमानक स्वाभाविकीकरण पर प्रश्न करब सिखबैत छथि। मुदा समानान्तर इतिहास-दृष्टि फूकोक पद्धतिसँ आगे एक स्पष्ट प्रमाण-अनुशासन राखैत अछि—सत्ता विश्लेषण सत्यक स्थानापन्न नहि; हाशिया स्वतः सत्य नहि; मौन मनगढ़न्त कथा नहि। इतिहासक निष्कर्ष सबल रूपेँ समर्थित, सम्भाव्य, विवादित वा अज्ञात हो सकैत अछि। अनिश्चितताक ई सार्वजनिक घोषणा इतिहासक कमजोरी नहि, ईमानदार ज्ञानमीमांसा अछि। केन्द्रक अभिलेख, हाशियाक स्मृति, पुरातत्त्व, पाण्डुलिपि, सांख्यिकी, डिजिटल स्रोत आ जीवित अनुभव—सभ प्रमाणक संसारमे स्थान पबैत अछि; मुदा दाबी अनुसार हुनकर प्रमाण-भार अलग। मिथिला समानान्तर इतिहास-दृष्टिक पद्धतिगत गृहभूमि अछि, प्रमाणक विशेषाधिकारित केन्द्र नहि। मिथिलाक अपने इतिहासपर सेहो वही कठोर कसौटी लागू हो। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘इतिहास मौन पढ़त, मौनकेँ मनगढ़न्त स्वर नहि देत; सत्ता जाँचत, प्रमाण नहि छोड़त; हाशिया सुनत, केन्द्रकेँ सेहो पढ़त; निष्कर्ष लिखत, संशोधनक द्वार खुलल राखत।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• मिशेल फूको — ‘ज्ञानक पुरातत्त्व’ (The Archaeology of Knowledge)। • मिशेल फूको — ‘नीत्शे, वंशावली, इतिहास’ (Nietzsche, Genealogy, History)। • मिशेल फूको — ‘अनुशासन आ दण्ड: कारागारक जन्म’ (Discipline and Punish: The Birth of the Prison)। • मिशेल फूको — ‘कामुकताक इतिहास, खण्ड 1: ज्ञानक इच्छा’ (The History of Sexuality, Volume 1: The Will to Knowledge)। • मिशेल फूको — ‘सत्ता/ज्ञान’ (Power/Knowledge), चयनित साक्षात्कार आ लेख। • मिशेल फूको — ‘विमर्शक क्रम’ (The Order of Discourse)। • फ्रेडरिक नीत्शे — ‘नैतिकताक वंशावली पर’ (On the Genealogy of Morality)। • ह्यूबर्ट ड्रेफस आ पॉल राबिनो — ‘मिशेल फूको: संरचनावाद आ व्याख्याशास्त्रक पार’ (Michel Foucault: Beyond Structuralism and Hermeneutics)। • गैरी गटिंग — ‘मिशेल फूको: अति संक्षिप्त परिचय’ (Foucault: A Very Short Introduction)। • कोलिन कूपमैन — ‘आलोचना रूपमे वंशावली’ (Genealogy as Critique)। • कार्ल जिन्जबर्ग — ‘सूत्र, मिथक आ ऐतिहासिक पद्धति’ सम्बन्धी निबन्ध-संग्रह, सूक्ष्मइतिहास आ प्रमाण-पठनक तुलनात्मक संदर्भ लेल। • मार्क ब्लोख — ‘इतिहासकारक शिल्प’ (The Historian’s Craft)। • ई. एच. कार — ‘इतिहास की अछि?’ (What Is History?)। • गौतम — न्यायसूत्र। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।