समस्या ज्याँ-फ्राँस्वा ल्योटारक ‘उत्तर-आधुनिक अवस्था’ आधुनिक ज्ञानक वैधता सम्बन्धी प्रश्न उठबैत अछि। आधुनिक समाज केवल ज्ञान उत्पन्न नहि करैत; ओ एहि ज्ञानकेँ वैध ठहराबय लेल कथा, संस्था, विश्वविद्यालय, विज्ञान, राज्य, मुक्ति, प्रगति आ मानव-विकासक व्यापक ढाँचा बनबैत अछि। ल्योटारक प्रसिद्ध सूत्र ‘महाख्यानसभपर अविश्वास’ (incredulity toward metanarratives) केँ यदि ‘सभ कथा झूठ’ वा ‘सत्य नहि’ कहि देल जाए, तखन हुनकर विशिष्ट प्रश्न गायब भऽ जाइत अछि। प्रश्न ई अछि—कोनो ज्ञान-व्यवस्था अपन वैधता ककर आधारपर माँगैत अछि? आधुनिकतामे ‘मानवता क्रमशः मुक्त होयत’, ‘विवेक अन्ततः विजय पायत’, ‘विज्ञान सभ ज्ञानकेँ एकीकृत करत’, ‘इतिहास एक अंतिम दिशा दिस बढ़ैत अछि’ जकाँ व्यापक कथासभ ज्ञान/राजनीतिक कार्यक्रमकेँ औचित्य दऽ सकैत छल। ल्योटार एहि वैधता-मॉडल पर संशय करैत छथि। कम्प्यूटरीकृत/सूचनात्मक समाजमे ज्ञानक रूप सेहो बदलैत अछि। जे ज्ञान प्रेषित, कूटबद्ध, संग्रहीत, गणना, पुनरुत्पादित वा बाजारमे उपयोग कएल जा सकैत अछि, ओकर संस्थागत मूल्य बढ़ि सकैत अछि। प्रश्न उठैत अछि—ज्ञान सत्य/समझ लेल, कि कार्यक्षमता/उत्पादन लेल? ल्योटार विज्ञानक विरोध नहि करैत; हुनकर आलोचना ज्ञानक वैधता, विज्ञान–राजनीति सम्बन्ध, प्रदर्शन-मानक, भाषा-खेलक बहुलता आ ‘एक नियमसभकेँ सभपर लागू करबाक’ प्रवृत्ति पर केन्द्रित अछि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—महाख्यान की? लघु कथा की? भाषा-खेल, वैधीकरण, कार्यक्षमता/प्रदर्शन-मानक, नव-चाल/नव-नियम आ असहमतिक महत्त्व की? आ समानान्तर दर्शन ल्योटारक संशयसँ की ग्रहण करैत, की सीमा लगबैत अछि? मूल प्रतिपादन एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे ल्योटारक महाख्यान-विरोध ज्ञानक अराजकता नहि; वैधता केर एकाधिकार-विरोध अछि। कोनो एक कथा—वैज्ञानिक प्रगति, राष्ट्र, वर्ग-मुक्ति, सभ्यतागत नियति, बाजार, धर्म वा तकनीकी विकास—सभ ज्ञान/इतिहास/न्यायक अन्तिम निर्णायक नहि बनि सकैत। महाख्यान (metanarrative) व्यापक कथा अछि जे अलग ज्ञान-क्षेत्र, संस्था आ सामाजिक अभ्यासकेँ एक सार्वभौमिक दिशा/वैधता देबाक दावा करैत अछि। लघु कथा (little narrative) सीमित प्रसंग, समुदाय, अभ्यास वा समस्या भीतर वैधता खोजैत अछि। ल्योटार भाषा-खेल (language games)क बहुलता पर बल दैत छथि—वैज्ञानिक कथन, नैतिक आदेश, राजनीतिक माँग, कला, कानून, दैनन्दिन कथा एकहि प्रकारक नियमपर नहि चलैत। एक खेलक कसौटी दोसर खेलपर थोपब अन्याय उत्पन्न करि सकैत अछि। कम्प्यूटरीकृत ज्ञानमे कार्यक्षमता/प्रदर्शन-मानक (performativity) प्रभावी हो सकैत अछि—कम लागत, अधिक उत्पादन, अधिक गति, अधिक सूचना-प्रवाह। ल्योटारक चिंता ई अछि जे ‘जे अधिक कार्यक्षम, वही अधिक वैध’ बनि जाए। समानान्तर दर्शनक उत्तर—महाख्यानक विशेषाधिकार तोड़ू, मुदा सार्वभौम गरिमा/अधिकारक दाबी छोड़ू नहि; भाषा-खेलक भिन्नता मानू, मुदा तथ्यगत दाबी स्वतंत्र प्रमाणसँ जाँचू; दक्षता मापू, मुदा दक्षताकेँ सत्य/न्यायक एकमात्र मानक नहि बनाउ। प्रमुख तर्क पहिल तर्क—ल्योटारक ‘महाख्यान’ केवल लम्बा इतिहास नहि; वैधीकरणक कथा अछि। ओ बतबैत अछि कि ज्ञान किएक मान्य, इतिहास किधर जा रहल, राजनीतिक कार्यक्रम किएक उचित, आ संस्थाक अधिकार ककर आधारपर। दोसर तर्क—आधुनिक विज्ञान स्वयं प्रयोग/तर्कसँ ज्ञान उत्पन्न करैत अछि, मुदा समाजमे विज्ञानक स्थान औचित्य देबाक लेल ‘प्रगति’, ‘मानव-मुक्ति’, ‘तर्कशीलता’ वा ‘समृद्धि’ जकाँ अतिरिक्त कथा उपयोग हो सकैत अछि। तेसर तर्क—महाख्यानक संकटसँ विज्ञान समाप्त नहि। विज्ञान अपन विशिष्ट भाषा-खेलमे परीक्षण, प्रमाण, पुनरावृत्ति, आलोचना आ संशोधनद्वारा वैधता बना सकैत अछि; नैतिक/राजनीतिक वैधता लेल अलग तर्क चाही। चारिम तर्क—लघु कथा (little narrative) संदर्भ-संवेदनशीलता दैत अछि। स्थानीय संघर्ष, समुदाय, भाषा, स्मृति, कला वा ज्ञान-प्रथा व्यापक सिद्धान्तक भीतर गायब हो सकैत अछि; लघु कथासँ ई दृश्य बनैत अछि। पाँचम तर्क—मुदा ‘लघु’ = नैतिक रूपेँ श्रेष्ठ नहि। स्थानीय समुदाय सेहो बहिष्कार, जाति, लिंग-असमानता, हिंसा वा मिथ्या इतिहास उत्पन्न करि सकैत अछि। समानान्तर दर्शन स्थानीय स्वायत्तता केँ सार्वभौम गरिमा/अधिकारसँ सीमित करैत अछि। छठम तर्क—भाषा-खेलक भिन्नता ज्ञानक प्रकारभेद स्पष्ट करैत अछि। ‘मानक वायुदाबमे पानी लगभग 100°C पर उबलैत अछि’ प्रकारक परिस्थितिनिर्भर वैज्ञानिक कथन, ‘न्याय करू’ प्रकारक नैतिक निर्देश, आ ‘ई कविता मार्मिक अछि’ प्रकारक सौन्दर्यात्मक निर्णय एकहि प्रमाण-रूप नहि माँगैत। सातम तर्क—एहि भिन्नतासँ पूर्ण असमाप्यता आवश्यक नहि। भाषा-खेलसभक बीच अनुवाद, आलोचना, संघर्ष आ व्यावहारिक निर्णय सम्भव; मुदा एक नियम सभपर बलपूर्वक लागू करब समस्याग्रस्त। आठम तर्क—वैधीकरण (legitimation) ज्ञानक सामाजिक जीवनक प्रश्न अछि। विश्वविद्यालय कौन पाठ्यक्रम मान्य करैत, सरकार कौन विशेषज्ञ रिपोर्ट मानैत, पत्रिका कौन शोध प्रकाशित करैत, न्यायालय कौन साक्ष्य स्वीकारैत—ई सभ वैधीकरणक संस्था छथि। नवम तर्क—कम्प्यूटरीकरण ज्ञानकेँ ‘जानकारी’ (information) रूपमे अधिकाधिक रूपान्तरित करि सकैत अछि—कूटबद्ध, प्रेषणीय, संग्रहणीय, गणनीय। जे ज्ञान ई रूप नहि लऽ पबैत, ओकर संस्थागत मूल्य घटि सकैत अछि। दसम तर्क—कार्यक्षमता/प्रदर्शन-मानक (performativity) पूछैत अछि—कम निवेश/इनपुट (input) मे अधिक परिणाम/आउटपुट (output)? अधिक गति? अधिक नियंत्रण? मुदा सत्य, सुन्दरता, न्याय, करुणा, ऐतिहासिक स्मृति, भाषा-संरक्षण जकाँ मूल्य एहि एक मानकमे पूर्णतः नापल नहि जा सकैत। एगारहम तर्क—विश्वविद्यालय यदि केवल रोजगार-सूचक, पेटेण्ट, उद्धरण-संख्या, रैंकिंग वा आर्थिक प्रतिफलसँ ज्ञानक मूल्य तय करय, तखन धीमा मानविकी शोध, अल्पसंख्यक भाषा, दीर्घकालिक अभिलेख आ मूलभूत विज्ञान नुकसान उठा सकैत अछि। बारहम तर्क—नव-चाल/नव-नियम (paralogy) विद्यमान खेलक भीतर मात्र बेहतर चाल नहि; कखनो एहन नूतन कथन/नियम जे खेलक सीमा बदलि दे। वैज्ञानिक नवाचार एहन नियम-परिवर्तनद्वारा सेहो बढ़ैत अछि। पूर्वपक्ष पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे महाख्यान बिना लोकतन्त्र, मानवाधिकार, विज्ञान, समानता वा सामाजिक न्याय लेल साझा सार्वजनिक आधार कमजोर होयत। दोसर पूर्वपक्ष वैज्ञानिक अछि—विज्ञानकेँ ‘एक भाषा-खेल’ कहब ओकर विशेष प्रमाणिक सफलता, पूर्वानुमान, प्रौद्योगिक परिणाम आ वस्तुगत नियंत्रण कम आँकैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष संचारवादी अछि—यदि भाषा-खेलसभ मूलतः भिन्न, तखन सार्वजनिक तर्क, नीति, न्यायालय वा लोकतान्त्रिक विमर्शमे साझा कारण सम्भव कोना? चारिम पूर्वपक्ष राजनीतिक अर्थव्यवस्थासँ अछि—ल्योटार ज्ञानक कम्प्यूटरीकरण/कार्यक्षमता पर बल दैत छथि, मुदा पूँजी, वर्ग, श्रम, स्वामित्व आ राज्यक आर्थिक संरचना पर्याप्त विस्तारसँ नहि दे सकैत छथि। पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय तुलना सँ अछि—शास्त्रार्थ, अनेक दर्शन, अनेकान्तवाद, लोककथा वा भाष्य-परम्पराकेँ ‘भारतीय भाषा-खेल (language games)’ कहब ऐतिहासिक समानीकरण होयत। उत्तरपक्ष पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—साझा नैतिक सिद्धान्त आवश्यक हो सकैत अछि, मुदा हुनका महाख्यानक ऐतिहासिक अपरिहार्यता दाबी नहि चाही। ‘समान गरिमा’ सार्वजनिक तर्क, मानव अनुभव आ संस्थागत परीक्षणद्वारा समर्थित संशोध्य सार्वभौम प्रतिबद्धता बनि सकैत अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—विज्ञानक विशेषता स्वीकारल जाए: प्रकृति-विषयक दाबी परीक्षण/पुनरावृत्ति/पूर्वानुमानद्वारा अन्य ज्ञान-रूपसँ अलग ज्ञानमीमांसक प्राधिकार (epistemic authority) पबैत अछि। ‘भाषा-खेल’ ओकर सत्य-कसौटी नष्ट नहि करैत। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—नियम-भिन्नता साझा संवादक असम्भवता नहि। लोकतान्त्रिक संस्थाकेँ अनुवादक नियम चाही—तथ्यगत दाबी लेल प्रमाण, नैतिक दाबी लेल कारण/गरिमा, कानूनी दाबी लेल विधि/अधिकार, सौन्दर्यात्मक दाबी लेल अलग समीक्षा। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—कार्यक्षमता विश्लेषण आर्थिक संरचना सँ जोड़ल जाए। ज्ञानक बाजार, विश्वविद्यालय वित्त, पेटेण्ट, मंच-स्वामित्व, आँकड़ा-स्वामित्व आ श्रम-वितरण सत्ता-प्रश्न छथि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय परम्पराकेँ पहिने अपन पद/इतिहाससँ पढ़ू। ‘भाषा-खेल’ आधुनिक तुलनात्मक औजार हो सकैत, ऐतिहासिक पहचान नहि। भारतीय संवाद न्याय दर्शन प्रमाण-वैधता सम्बन्धी कठोर प्रश्न दैत अछि। ल्योटारक वैधीकरणक सामाजिक प्रश्नक संग न्यायीय प्रमाणक ज्ञानमीमांसक प्रश्न (epistemic question) अलग स्तरपर रखल जाए—‘संस्था मानैत अछि?’ आ ‘दाबी सत्य/प्रमाणित अछि?’ एकहि प्रश्न नहि। मीमांसा पाठ, विधि, वाक्यार्थ आ प्रामाण्यक विशिष्ट नियम दैत अछि। ई भाषा-खेलक भिन्नता जकाँ समस्या-संवाद दे सकैत अछि, मुदा मीमांसा = विट्गेन्स्टाइन/ल्योटारक भाषा-खेल (Wittgenstein/Lyotard language game) नहि। जैन अनेकान्तवाद बहुपक्षीय यथार्थ-दृष्टि अछि; ल्योटारक महाख्यान-आलोचना (metanarrative critique) सँ समानार्थी नहि। अनेकान्तवादक शर्तबद्ध कथनक तर्कीय अनुशासन ‘सभ कथा समान’ निष्कर्ष रोकैत अछि। बौद्ध मध्यमक स्थिर स्वभावक आलोचना करैत अछि; महाख्यान-विरोध नहि। ओकर मुक्ति/तत्त्वमीमांसक सन्दर्भ अलग। भारतीय शास्त्रार्थमे विभिन्न दार्शनिक परम्परा एक-दोसराक नियम/प्रमाण चुनौती दैत अछि। एतय परम्परा-पार अनुवाद (inter-tradition translation) आ असहमति (disagreement) केर ऐतिहासिक उदाहरण अछि; तथापि आधुनिक ‘असमाप्यता/असमान-माप्यता (incommensurability)’क पूर्वरूप नहि। पुराण, इतिहास, महाकाव्य, दार्शनिक सूत्र, भाष्य, नीति, लोककथा—भारतीय ज्ञान-रूप अनेक छथि। एहि बहुलताकेँ एकल ‘भारतीय महाख्यान’ वा ‘भारतीय उत्तर-आधुनिकता (Indian postmodernity)’मे समेटब अनुचित। भारतीय संवादक निष्कर्ष—ज्ञानक विविध रूप मानू; प्रत्येकक उचित कसौटी स्पष्ट करू; कोनो परम्पराकेँ केवल प्राचीन/पवित्र होयबाक कारण ज्ञानमीमांसक विशेषाधिकार (epistemic privilege) नहि दिअ। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मिथिलाक इतिहास/साहित्यमे महाख्यान बनि सकैत अछि—‘एक शाश्वत एकरूप मिथिला’, ‘एकल शुद्ध मैथिली’, ‘एक अपरिवर्तनीय सामाजिक व्यवस्था’, ‘एक अखण्ड बौद्धिक केन्द्र’। समानान्तर दृष्टि एहि सभ दाबीकेँ स्रोत/काल/क्षेत्र अनुसार जाँचैत अछि। मिथिला पद्धतिगत गृहभूमि अछि, ब्रह्माण्डक एकमात्र ज्ञान-केन्द्र नहि। स्थानीय गौरव दार्शनिक औजार हो सकैत अछि; वैश्विक श्रेष्ठताक प्रमाण नहि। मैथिलीभाषी ज्ञानक वैधता केवल विश्वविद्यालय/राज्यक मान्यतासँ तय नहि। पत्रिका, लोकपरम्परा, निजी अभिलेख, डिजिटल प्रकाशन, समुदाय-स्मृति आ शोध—सभ स्रोत हो सकैत; मुदा समान प्रमाण-अनुशासन चाही। अल्पभाषा/क्षेत्रीय ज्ञानक सबसे बड़ा जोखिम कार्यक्षमता-मानक अछि। ‘कम बाजार’, ‘कम उद्धरण’, ‘कम उपयोगकर्ता’ कहि भाषा/अभिलेख/शोध निरर्थक नहि होइत। सांस्कृतिक स्मृति, गरिमा, ज्ञान-विविधता आ ऐतिहासिक दायित्व अलग मूल्य छथि। डिजिटल मैथिली सामग्रीक भविष्य केवल संलग्नता-माप (engagement metric) पर छोड़ल जाए तऽ लोकप्रिय/छोट सामग्री ऊपर, दीर्घ शोध/शास्त्रीय ग्रन्थ नीचे जा सकैत अछि। समानान्तर ज्ञान-नीति दृश्यता (visibility) केँ गुणवत्ता/संरक्षणसँ अलग जाँचैत अछि। लघु कथा/स्थानीय स्मृति केन्द्रक अभिलेख सुधारि सकैत अछि, मुदा स्थानीय दाबी स्वतः सत्य नहि। तिथि, संस्करण, प्रतिप्रमाण, भौतिक स्रोत आ स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक। समानान्तर दर्शन महाख्यान-विरोधकेँ आत्मसमीक्षासँ जोड़ैत अछि—‘समानान्तर इतिहास’ स्वयं नया सर्वग्राही कथा (total narrative) नहि बनय; जहाँ अज्ञात, अज्ञात लिखू। मुख्य सूत्र—‘स्थानीयकेँ आवाज दिअ, मुदा विशेषाधिकार नहि; सार्वभौमिक दाबी राखू, मुदा अपरिहार्यता नहि; ज्ञानक मूल्य दक्षतासँ अधिक, सत्यक मूल्य प्रमाणसँ जुड़ल।’ समकालीन प्रयोग कृत्रिम बुद्धि (AI) युगमे ज्ञानक कार्यक्षमता-मानक अत्यन्त स्पष्ट अछि—कतेक तेज उत्तर? कतेक कम लागत? कतेक उपयोगकर्ता? मुदा उत्तरक गति/लोकप्रियता = सत्य नहि। उत्पत्ति-पथ (provenance), स्रोत-गुणवत्ता (source quality), सत्यापन (verification) आ उत्तरदायित्व (accountability) अलग चाही। विश्वविद्यालय क्रमांकन-प्रणाली (ranking system) ज्ञानकेँ प्रकाशन (publications), उद्धरण (citations), अनुदान (grants), नियुक्ति-परिणाम (placement) आ प्रतिष्ठा-अंक (reputation score) मे घटा सकैत अछि। ई उपयोगी संकेत हो सकैत, सम्पूर्ण शैक्षिक मूल्य नहि। सामाजिक माध्यम कलनविधि (algorithm) ‘संलग्नता (engagement)’ केँ प्रदर्शन-मानक बनबैत अछि; आक्रोश/सनसनी अधिक engagement दे सकैत अछि। ताहि कारण कार्य-प्रदर्शन-मानक (performativity) सत्य/गुणवत्ता क विरुद्ध जा सकैत अछि। सरकारी नीति आँकड़ा-पट्ट (dashboard) मापनीय संकेतक (measurable indicator) केँ प्राथमिकता दे सकैत अछि। जे चीज मापल कठिन—गरिमा, सांस्कृतिक क्षति, सामुदायिक भरोसा, दीर्घकालिक ज्ञान—ओ निर्णयसँ बाहर रहि सकैत अछि। स्वास्थ्य-प्रणालीमे कार्य-प्रवाह (throughput), शय्या-परिवर्तन-दर (bed turnover), परामर्श-समय (consultation time) दक्षता मापैत अछि; मुदा रोगी-सुनवाई, निदान-शुद्धता (diagnostic accuracy), देखभाल-निरन्तरता (continuity of care) आ गरिमा (dignity) सेहो मूल्य छथि। कानूनमे मामला-निपटान-दर (case disposal rate) कार्यक्षमता दैत अछि; न्यायिक गुणवत्ता, कारणयुक्त आदेश, सुनवाई आ अपीलक अधिकार अलग कसौटी। भाषा-प्रौद्योगिकीमे अधिक-संसाधन भाषा (high-resource language) पर मॉडल अधिक सफल हो सकैत; ‘प्रदर्शन (performance)’ आधारपर अल्प-संसाधन भाषा (low-resource language) छोड़ब ज्ञान-असमानता बढ़ाओत। सार्वजनिक विमर्शमे समानान्तर प्रश्न—‘ई नीतिक सफलता कोन मापदण्ड (metric) सँ मापल? जे मापदण्ड (metric) बाहर, ओकर मूल्य की? असहमति केँ त्रुटि (error) मानल गेल की नूतन सूचना?’ अध्याय-निष्कर्ष ल्योटारक महाख्यानपर अविश्वास ‘सभ सत्य समाप्त’ कहब नहि; ज्ञानक सार्वभौमिक वैधीकरणक एकाधिकारपर प्रश्न अछि। महाख्यान व्यापक वैधता-कथा दैत अछि; लघु कथा स्थानीय/सीमित संदर्भ; भाषा-खेल ज्ञान/कथनक नियम-भिन्नता; कार्यक्षमता-मानक ज्ञानकेँ उत्पादन/दक्षताक कसौटी पर कसैत अछि। कम्प्यूटरीकृत समाजमे ज्ञान सूचना/डेटामे बदलैत काल जे मापल/प्रेषित/बेचल जा सकैत अछि ओकर मूल्य बढ़ि सकैत अछि; जे धीमा, स्थानीय, अनुभवगत वा गैर-बाजारू अछि, ओकर अवमूल्यन सम्भव। विज्ञान ‘एक कथा’ मात्र नहि; ओकर अनुभवजन्य परीक्षण/पुनरावृत्ति विशेष ज्ञानमीमांसक शक्ति दैत अछि। नैतिक/राजनीतिक/सौन्दर्यात्मक दाबी लेल अन्य कसौटी आवश्यक। समानान्तर दर्शन महाख्यानक आलोचना स्वीकारैत अछि, मुदा सार्वभौम गरिमा, बहुप्रमाणीय विवेकवाद, यथार्थक प्रतिरोध आ आत्मसमीक्षा रखैत अछि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘महाख्यानक अधिकार जाँचू; लघु कथाकेँ सुनू; दक्षताकेँ उपयोग करू, देवता नहि बनाउ; असहमतिकेँ त्रुटि मात्र नहि मानू; दाबीकेँ प्रमाणसँ पुनर्वैध बनाउ।’ अध्याय-ग्रन्थसूची • ज्याँ-फ्राँस्वा ल्योटार — ‘उत्तर-आधुनिक अवस्था: ज्ञानपर प्रतिवेदन’ (The Postmodern Condition: A Report on Knowledge)। • ज्याँ-फ्राँस्वा ल्योटार — ‘न्यायसंग खेल’ (Just Gaming)। • ज्याँ-फ्राँस्वा ल्योटार — ‘विभेद: विवादित वाक्य’ (The Differend: Phrases in Dispute)। • ज्याँ-फ्राँस्वा ल्योटार — ‘उत्तर-आधुनिकक व्याख्या बच्चासभ लेल’ (The Postmodern Explained to Children)। • लुडविग विट्गेन्स्टाइन — ‘दार्शनिक अन्वेषण’ (Philosophical Investigations), भाषा-खेलक पृष्ठभूमि लेल। • डेविड हार्वी — ‘उत्तर-आधुनिकताक अवस्था’ (The Condition of Postmodernity)। • फ्रेडरिक जेम्सन — ‘उत्तर-आधुनिकता, अथवा उत्तर-पूँजीवादक सांस्कृतिक तर्क’ (Postmodernism, or, The Cultural Logic of Late Capitalism)। • जुर्गेन हाबर्मास — ‘आधुनिकता: एक अपूर्ण परियोजना’ (Modernity: An Unfinished Project), उत्तर-आधुनिक संशयक प्रमुख आलोचनात्मक प्रतिपक्ष लेल। • गौतम — न्यायसूत्र। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • मल्लिषेण — स्याद्वादमञ्जरी। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।