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समस्या
आधुनिक माध्यम-संसारमे हम अनेक बेर एहन वस्तु देखैत छी जे वास्तविक घटनाक चित्र, प्रतिलिपि वा रिपोर्ट होइतहुँ स्वयं अनुभवक मुख्य रूप बनि जाइत अछि—विज्ञापनक जीवन-शैली, पर्यटनक तैयार दृश्य, मंचपर सजाओल व्यक्तित्व, आँकड़ा-पट्टमे संकुचित समाज, डिजिटल अवतार, कृत्रिम-बुद्धि-जनित छवि, डीपफेक आ आभासी संसार। ज्याँ बौद्रियार एहि परिवर्तनकेँ प्रतिरूप (simulacrum), अनुकरण (simulation) आ अतियथार्थता (hyperreality)क अवधारणासँ पढ़ैत छथि। साधारण प्रतिनिधित्वमे मानल जाइत अछि जे चिह्न वा छवि किछु बाहरी वस्तु/घटना प्रस्तुत करैत अछि। बौद्रियारक प्रश्न अछि—जखन चिह्न, प्रतिरूप, माध्यम आ उपभोगक जाल एतेक घना भऽ जाए जे अनुभव पहिने सँ निर्मित कोड/छविक माध्यमसँ हो, तखन ‘मूल’ आ ‘प्रतिलिपि’क भेद कोना बदलैत अछि? अतियथार्थता (hyperreality) केँ ‘झूठी दुनिया’ कहब पर्याप्त नहि। बौद्रियारक संकेत अधिक सूक्ष्म अछि: कखनो एहन प्रतिरूप/माध्यम-विन्यास बनैत अछि जे वास्तविकताकेँ मात्र नकल नहि करैत, बल्कि लोकक इच्छा, अपेक्षा, स्मृति आ व्यवहारक मानक स्वयं बनबैत अछि। मुदा एहि विचारक अति-व्याख्या सेहो खतरनाक अछि। यदि कहल जाए जे ‘सभ वास्तविकता गायब’, ‘सभ केवल अनुकरण (simulation)’, वा ‘तथ्यक कोनो अर्थ नहि’, तखन भौतिक जगत, शरीर, युद्ध, रोग, पर्यावरण, आर्थिक हानि, दस्तावेजी प्रमाण आ प्रत्यक्ष पीड़ाक वास्तविकता अनुचित रूपेँ गायब भऽ जाइत अछि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—बौद्रियारक प्रतिरूप, अनुकरण, संकेत-मूल्य, माध्यम आ अतियथार्थता वास्तवमे की कहैत अछि? ओ मार्क्सवादी उपयोग-मूल्य/विनिमय-मूल्यक आलोचनासँ संकेत-मूल्य दिस कोना बढ़ैत छथि? आ समानान्तर दर्शन माध्यम-संवेदनशीलता ग्रहण करैत यथार्थ आ प्रमाण कोना बचबैत अछि?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे बौद्रियार आधुनिक/उत्तर-आधुनिक उपभोक्ता-माध्यम समाजमे चिह्नक शक्ति पर बल दैत छथि: वस्तु केवल उपयोग अथवा कीमत कारण नहि, सामाजिक संकेत-मूल्य (sign-value) कारण सेहो उपभोगित होइत अछि। प्रतिरूप (simulacrum) एहन छवि/रूप/मॉडल हो सकैत अछि जे कोनो मूलक साधारण प्रतिलिपि मात्र नहि रहि, स्वयं सामाजिक वास्तविकता बनाबय/व्यवस्थित करयवला संकेत-रचना बनि जाए। अनुकरण (simulation) प्रतिलिपि बनाबयब मात्र नहि; एहन प्रक्रिया अछि जतऽ मॉडल, कोड, छवि आ संकेत व्यवहारक वास्तविकता पूर्वनिर्धारित वा पुनर्संरचित करि सकैत अछि। अतियथार्थता (hyperreality) एहन अवस्था सूचित करैत अछि जतऽ प्रतिनिधित्वक जाल अनुभवक एतेक प्रमुख माध्यम बनि जाए जे लोक प्रतिरूपक आधारपर वास्तविकताकेँ बुझैत, अपेक्षा करैत आ पुनर्गठित करैत छथि। समानान्तर दर्शन एहि विश्लेषणकेँ स्वीकारैत अछि, मुदा सूत्र जोड़ैत अछि—‘प्रतिनिधित्व अनुभव बदलि सकैत अछि; बाह्य जगत समाप्त नहि करैत। छवि जाँचू, स्रोत जाँचू, घटना जाँचू।’
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—बौद्रियारक आरम्भिक काज उपभोक्ता-समाजक आलोचनासँ जुड़ल अछि। वस्तु केवल उपयोग-मूल्य वा विनिमय-मूल्य नहि; ब्राण्ड, शैली, प्रतिष्ठा, वर्ग, आधुनिकता, विद्रोह वा रुचिक संकेत सेहो बनि सकैत अछि। दोसर तर्क—संकेत-मूल्य (sign-value)क कारण उपभोग आवश्यकता-सन्तुष्टि मात्र नहि रहैत। एकहि कार्यवला दू वस्तु सामाजिक संकेतमे बहुत अलग अर्थ रखि सकैत अछि। तेसर तर्क—प्रतिरूपक संसारमे छवि ‘मूलक प्रति’ सँ अधिक हो सकैत अछि। पर्यटन-स्थल वास्तविक अनुभवसँ पहिने विज्ञापन/फिल्म/फोटोद्वारा अपेक्षित दृश्य बनि जाइत अछि; आगन्तुक वास्तविक स्थलकेँ पहिले सँ बनल छविक कसौटीपर देखैत अछि। चारिम तर्क—अनुकरण (simulation)क महत्त्व व्यवहार-निर्माणमे अछि। मानचित्र, मॉडल, प्रोफ़ाइल, रैंकिंग, जोखिम-अंक, ब्राण्ड-छवि वा डिजिटल अवतार वास्तविक निर्णय पर असर डालि सकैत अछि, भले ओ वास्तविकताक पूर्ण प्रतिरूप नहि। पाँचम तर्क—बौद्रियारक ‘अतियथार्थता’क अर्थ वास्तविकतासँ अधिक तीव्र/सुसंगठित/तैयार अनुभव हो सकैत अछि। मनोरंजन-स्थल, विज्ञापन, मीडिया-दृश्य वा डिजिटल मंच एहन अनुभव बनबैत जे अव्यवस्थित वास्तविक जीवनसँ अधिक ‘वास्तविक जकाँ’ महसूस हो। छठम तर्क—माध्यम घटना केर पैमाना, क्रम, पुनरावृत्ति आ दृश्यता बदलैत अछि। कोन दृश्य बारम्बार देखाओल जाए, कोन शब्द शीर्षक बनय, कोन आँकड़ा ग्राफमे आय—ई घटना केर सार्वजनिक अर्थ बदलि सकैत अछि। सातम तर्क—मुदा माध्यमीय निर्माण तथ्यक पूर्ण नकार नहि। एक वीडियो गलत प्रसंगमे वायरल भऽ सकैत अछि; एहि कारण स्रोत, तिथि, स्थान, मूल फाइल, अन्य कैमरा, प्रत्यक्षदर्शी, भौतिक परिणाम आ स्वतंत्र रिपोर्ट जाँचब जरूरी। आठम तर्क—प्रतिरूपक शक्ति स्मृतिपर सेहो पड़ैत अछि। लोकप्रिय चलचित्र/धारावाहिक ऐतिहासिक चरित्रक एहन छवि बना सकैत अछि जे जन-स्मृति मूल स्रोतक तुलना मे अधिक प्रभावी हो। प्रभाव = ऐतिहासिक सत्य नहि। नवम तर्क—राजनीतिक जीवनमे छवि-निर्माण नीति-विषयक जटिलता केँ प्रतीक, नारा, मंचित दृश्य आ संक्षिप्त क्लिपमे बदलि सकैत अछि। लोकतन्त्रकेँ दृश्य-प्रतिस्पर्धा मात्र बनब सँ बचय लेल दस्तावेज, नीति, आँकड़ा आ जवाबदेही जरूरी। दसम तर्क—डिजिटल मंचपर अनुशंसा-कलनविधि (recommendation algorithm) लोककेँ कोन संसार देखाइत अछि, एहि पर असर दैत अछि। व्यक्ति केर ‘लोकप्रिय संसार’ सम्पूर्ण समाजक प्रतिनिधि नहि हो सकैत अछि। एगारहम तर्क—कृत्रिम-बुद्धि-जनित पाठ/छवि प्रतिरूपक प्रश्न नूतन बनबैत अछि। एहन छवि वास्तविक फोटो जकाँ देखाइ सकैत अछि, मुदा ओकर कोनो वास्तविक घटना नहियो हो सकैत अछि। दृश्य विश्वसनीयता ≠ घटना-प्रमाण। बारहम तर्क—डीपफेक (deepfake) अतियथार्थताक व्यावहारिक संकट अछि: आवाज, चेहरा, प्रकाश, गति विश्वसनीय, मुदा घटना कृत्रिम। अतः ‘देखल’ स्वयं पर्याप्त प्रमाण नहि। तेरहम तर्क—बौद्रियारक सिद्धान्तक सीमा ई अछि जे कखनो भाषा एतेक व्यापक होइत अछि जे वस्तुगत यथार्थ, कारण, भौतिक पीड़ा आ संस्थागत विश्लेषण अस्पष्ट हो सकैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि स्थानपर यथार्थवादक प्रतिपक्ष जोड़ैत अछि।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप यथार्थवादी अछि—बौद्रियार ‘वास्तविक गायब’ जकाँ उत्तेजक भाषा उपयोग करैत वास्तविक जगत आ कारणात्मक संरचना कम आँकैत छथि। दोसर पूर्वपक्ष मार्क्सवादी अछि—संकेत, माध्यम आ उपभोग पर अत्यधिक बल उत्पादन, श्रम, वर्ग, स्वामित्व, पूँजी आ भौतिक असमानता केँ गौण करि सकैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष अनुभवजन्य सामाजिक विज्ञानसँ अछि—‘अतियथार्थता’ आकर्षक सांस्कृतिक वर्णन अछि, मुदा स्पष्ट मापन/परीक्षण कठिन; अवधारणा अत्यधिक व्यापक बनि सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष नैतिक अछि—यदि वास्तविक/प्रतिरूप भेद अत्यधिक धुँधला कहल जाए, तखन भ्रामक सूचना (misinformation), प्रचार (propaganda), धोखाधड़ी (fraud) वा साक्ष्य-वचन (testimony) सम्बन्धी नैतिक दायित्व कमजोर हो सकैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय तुलना सँ अछि—अद्वैतक माया, बौद्ध शून्यता, योगाचार विज्ञानवाद, ‘इन्द्रजाल’ वा मिथकीय छविकेँ बौद्रियारक अनुकरण/अतियथार्थता (simulation/hyperreality) केर पूर्वरूप कहब ऐतिहासिक/दार्शनिक त्रुटि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—बौद्रियारक उपयोग ‘जगत नहि’ दाबी रूपमे नहि, प्रतिनिधित्व/संकेतक स्वायत्त प्रभावक आलोचना रूपमे अधिक फलदायी। समानान्तर दर्शन बाह्य यथार्थक प्रतिरोध स्पष्ट राखैत अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—संकेत-अर्थव्यवस्था भौतिक अर्थव्यवस्थाक विकल्प नहि। ब्राण्ड-छवि, प्रतिष्ठा आ उपभोग श्रम, आपूर्ति-श्रृंखला, पूँजी, भूमि, ऊर्जा आ पर्यावरणीय लागतसँ जुड़ल छथि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—अतियथार्थता केँ सर्वव्यापी तथ्य नहि, विश्लेषणात्मक संकेत मानू। विशिष्ट मामला मे माध्यम-प्रभाव, धारणा, व्यवहार आ भौतिक परिणाम अलग मापल जाए। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—प्रतिरूप-समृद्ध संसारमे नैतिक दायित्व घटैत नहि, बढ़ैत अछि। उत्पत्ति-पथ, सम्पादन-इतिहास, कृत्रिम निर्माणक खुलासा, सहमति, क्षति आ सुधारक दायित्व अधिक महत्त्वपूर्ण। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय सिद्धान्त अपन तत्त्वमीमांसक/ज्ञानमीमांसक सन्दर्भमे पढ़ल जाए। माया ≠ अनुकरण, शून्यता ≠ अतियथार्थता, अपोह ≠ संकेत-मूल्य। तुलना केवल सीमित समस्या-संवाद।
भारतीय संवाद
अद्वैत वेदान्तमे माया/अध्यास ब्रह्म–जगत सम्बन्ध, अविद्या आ ज्ञान-मुक्तिक विशिष्ट तत्त्वमीमांसक समस्या अछि। बौद्रियारक माध्यम/उपभोक्ता-संस्कृति विश्लेषणसँ ऐतिहासिक/सिद्धान्तगत समानता नहि। मध्यमक शून्यता स्वभाव-सिद्ध अस्तित्वक आलोचना अछि; ‘वास्तविकता समाप्त (real is gone)’ प्रकारक उत्तर-आधुनिक दाबी नहि। प्रतीत्यसमुत्पाद आ द्विसत्यक पृष्ठभूमि बौद्रियारसँ अलग। योगाचार परम्पराक विज्ञान-विचार संवेदन/चेतना सम्बन्धी बौद्ध परियोजना अछि; डिजिटल अनुकरण (digital simulation) केर पूर्वरूप (precursor) कहब अनुचित। न्याय दर्शन प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द आ वस्तुगत यथार्थक कसौटी द्वारा प्रतिरूप/भ्रमक प्रश्न लेल सबल प्रतिपक्ष दैत अछि। ‘जे देखाइत अछि’ आ ‘जे अछि’ बीच भेद जाँचबाक ज्ञानमीमांसक संसाधन उपलब्ध। न्यायीय भ्रम-विचार देखबैत अछि जे गलत अनुभूति सम्भव होयब सत्य-असम्भवता नहि। त्रुटिक कारण विश्लेषित करब वस्तुगत ज्ञानक रक्षा करैत अछि। मीमांसा शब्द, तात्पर्य, प्रसंग आ प्रामाण्यक अनुशासन दैत अछि। माध्यम/सन्देश सम्बन्धी आधुनिक प्रश्नक समानार्थी नहि, मुदा ‘वक्तव्य किन शर्तमे प्रमाण?’ प्रश्नपर संवाद सम्भव। भारतीय काव्य/नाट्य परम्परामे प्रतिनिधित्व, रस, अभिनय आ कल्पना विकसित अवधारणा छथि; कलात्मक प्रतिनिधित्व = छल नहि। बौद्रियारक अनुकरण (simulation) सँ तुलना करब तऽ कला/सौन्दर्यशास्त्रक अलग उद्देश्य स्पष्ट रहय। भारतीय संवादक निष्कर्ष—माया, शून्यता, भ्रम, अभिनय आ प्रतिरूप सभ अलग अवधारणा छथि; आधुनिक समान शब्द देखलासँ सिद्धान्तगत पहचान नहि।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक सांस्कृतिक छवि आज चित्रकला, विवाह-रूपक, पर्यटन, सोशल मीडिया, मिथिला-पोशाक, प्रतीक, डिजिटल पोस्टर आ ब्राण्डिंग द्वारा विश्वभरि प्रसारित होइत अछि। ई दृश्यता उपयोगी, मुदा ‘मिथिला’क सम्पूर्ण सामाजिक/ऐतिहासिक वास्तविकता नहि। मधुबनी/मिथिला चित्रकलाक वैश्विक प्रतिरूप कखनो स्थानीय विविध शैली, कलाकारक सामाजिक इतिहास, सामग्री, धार्मिक/लोक प्रसंग आ आर्थिक श्रमकेँ एक सजावटी ‘मिथिला लुक’मे संकुचित करि सकैत अछि। मैथिली भाषा डिजिटल माध्यममे देवनागरी-मानक, रोमन लिप्यन्तरण, संक्षिप्त पोस्ट, वीडियो, मीम आ स्वचालित अनुवाद रूपमे अलग ‘दृश्य रूप’ पबैत अछि। डिजिटल दृश्यता = भाषिक पूर्णता नहि। ऐतिहासिक व्यक्तित्वक लोकप्रिय पोस्टर/वीडियो स्रोत-विहीन कथा दोहरा सकैत अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि ‘बहुबार साझा’ केँ प्रमाण नहि मानैत—मूल स्रोत, तिथि, उद्धरण, संस्करण जाँचैत अछि। डिजिटल अभिलेख/वेबसाइट वास्तविक स्रोतक पहुँच बढ़बैत अछि; साथे अन्तरफलक/खोज-क्रमांकन (interface/search ranking) क कारण किछु सामग्री अधिक दृश्य बनि सकैत अछि। दृश्यता आ ऐतिहासिक महत्त्व अलग। सांस्कृतिक गौरव लेल प्रतीक आवश्यक हो सकैत अछि; मुदा प्रतीक स्वयं बहुल वास्तविकता पर पर्दा न बनय। मिथिला = एक रंग, एक पोशाक, एक विवाह, एक कुल वा एक कला मात्र नहि। समानान्तर सूत्र—‘छवि मिथिलाकेँ देखाबय, मिथिलाकेँ प्रतिस्थापित नहि करय; डिजिटल प्रतिरूप स्रोत दिस रास्ता खोलय, स्रोतक स्थान नहि लय।’ आत्मसमीक्षा—समानान्तर दर्शन स्वयं यदि आकर्षक सूत्र/डिजाइन/डायग्राम कारण अधिक ‘वास्तविक’ बुझायल जाए, तखन ग्रन्थक तर्क/प्रमाण गौण भऽ सकैत अछि। प्रस्तुति तर्कक सहयोगी हो, स्थानापन्न नहि।
समकालीन प्रयोग
कृत्रिम-बुद्धि-जनित छवि (AI-generated image) वास्तविक फोटो जकाँ विश्वसनीय हो सकैत अछि। समानान्तर पद्धति दृश्य शैली पर नहि, उत्पत्ति-पथ, मूल फाइल, अधितथ्य, प्रकाशन-सन्दर्भ आ स्वतंत्र स्रोतपर भरोसा करैत अछि। डीपफेक (deepfake) सार्वजनिक व्यक्ति केर आवाज/चेहरा कृत्रिम रूपेँ जोड़ि सकैत अछि। ‘वीडियो अछि’ = घटना सिद्ध नहि; डिजिटल हस्ताक्षर, स्रोत-श्रृंखला, न्यायवैज्ञानिक विश्लेषण (forensic analysis) आ स्वतंत्र पुष्टि (corroboration) आवश्यक। आभासी प्रभावक (virtual influencer) विज्ञापन, फैशन आ राजनीति-जकाँ क्षेत्रमे मानव-जकाँ सामाजिक उपस्थिति बना सकैत अछि। पारदर्शिता—ई व्यक्ति वास्तविक अछि की कृत्रिम—उपभोक्ता स्वायत्तता लेल आवश्यक। सामाजिक माध्यम फ़िल्टर/सौन्दर्य-प्रभाव (filter/beauty effect) शरीरक सांस्कृतिक मानक बदलि सकैत अछि। जे चेहरा रोज स्क्रीनपर ‘सामान्य’ देखाइत, ओ वास्तविक जनसंख्या-सांख्यिकी नहि। वित्तीय बाजारमे कथा (narrative), आँकड़ा-पट्ट (dashboard) आ भावना-संकेतक (sentiment indicator) धारणा बदलि वास्तविक खरीद-बिक्री उत्पन्न करि सकैत अछि—प्रतिनिधित्व वास्तविक परिणाम बनबैत अछि। युद्ध/आपदामे पुरान वीडियो नूतन घटना रूपमे पुनर्प्रसारित भऽ सकैत अछि। तिथि, भू-स्थान, मौसम, छाया, भाषा, स्रोत आ अन्य रिपोर्ट जाँचब आवश्यक। शिक्षामे अत्यधिक परिष्कृत प्रस्तुति (polished presentation) कमजोर तर्ककेँ विश्वसनीय बना सकैत अछि। समानान्तर कसौटी—सौन्दर्य अलग, प्रमाण अलग। इतिहासमे पुनराभिनय (reenactment), वृत्तचित्र-पुनर्निर्माण (documentary reconstruction) आ कृत्रिम-बुद्धि पुनर्स्थापन (AI restoration) उपयोगी दृश्य सहायता हो सकैत अछि; स्पष्ट लेबल बिना ओकरा प्राथमिक स्रोत जकाँ प्रस्तुत नहि कएल जाए।
अध्याय-निष्कर्ष
बौद्रियारक दर्शन माध्यम/उपभोग समाजमे संकेत, प्रतिरूप, अनुकरण आ अतियथार्थताक शक्ति देखबैत अछि। प्रतिरूप केवल मूलक प्रति नहि; कखनो सामाजिक अपेक्षा, स्मृति, इच्छा आ व्यवहारक मॉडल बनि सकैत अछि। संकेत-मूल्य वस्तुक उपयोग/कीमतसँ अलग सामाजिक अर्थ जोड़ैत अछि। अतियथार्थता बाह्य जगतक दार्शनिक अन्त आवश्यक रूपेँ नहि; प्रतिरूपक एहन प्रभुत्वक विश्लेषण अछि जतऽ छवि अनुभवक मानक बनि सकैत अछि। समानान्तर दर्शन यथार्थवादक सीमा स्पष्ट राखैत अछि—शरीर, पदार्थ, घटना, कारण, दस्तावेज, प्रत्यक्ष परिणाम आ स्वतंत्र प्रमाण प्रतिनिधित्वसँ बाहर/पार प्रतिरोध दे सकैत अछि। माया ≠ अनुकरण; शून्यता ≠ अतियथार्थता; भ्रम-विचार ≠ बौद्रियार; भारतीय अवधारणाकेँ आधुनिक माध्यम-सिद्धान्तमे घोलब अनुचित। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘प्रतिरूप पढ़ू, स्रोत खोजू; माध्यम जाँचू, घटना जाँचू; छवि केर प्रभाव मानू, जगतकेँ छवि मात्र नहि बनाउ।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• ज्याँ बौद्रियार — ‘प्रतिरूप आ अनुकरण’ (Simulacra and Simulation)। • ज्याँ बौद्रियार — ‘उपभोक्ता समाज: मिथक आ संरचना’ (The Consumer Society: Myths and Structures)। • ज्याँ बौद्रियार — ‘वस्तुसभक प्रणाली’ (The System of Objects)। • ज्याँ बौद्रियार — ‘चिह्नक राजनीतिक अर्थव्यवस्थाक आलोचना’ (For a Critique of the Political Economy of the Sign)। • ज्याँ बौद्रियार — ‘प्रतीकात्मक विनिमय आ मृत्यु’ (Symbolic Exchange and Death)। • मार्शल मैकलुहान — ‘माध्यमक बुझाइ’ (Understanding Media), आधुनिक माध्यम-दर्शनक संवाद लेल। • गाय देबोर — ‘दृश्य-तमाशाक समाज’ (The Society of the Spectacle), छवि/वस्तुकरणक समकालीन प्रतिपक्षीय संदर्भ लेल। • डेविड हार्वी — ‘उत्तर-आधुनिकताक अवस्था’ (The Condition of Postmodernity)। • फ्रेडरिक जेम्सन — ‘उत्तर-आधुनिकता, अथवा उत्तर-पूँजीवादक सांस्कृतिक तर्क’ (Postmodernism, or, The Cultural Logic of Late Capitalism)। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • नागार्जुन — मूलमध्यमककारिका। • शंकराचार्य — ब्रह्मसूत्रभाष्य तथा उपनिषद-भाष्य, माया/अध्यासक भिन्न दार्शनिक सन्दर्भ लेल। • बी. के. मतिलाल — ‘धारणा’ (Perception), भ्रम/ज्ञानक भारतीय ज्ञानमीमांसक संदर्भ लेल। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)।