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समस्या
सप्तम खण्डक अध्यायसभमे उत्तर-आधुनिकताक अनेक रूप सामने आयल—महाख्यानपर अविश्वास, प्रतिरूप/अतियथार्थताक प्रश्न, सत्य-दाबी पर संशय, विज्ञान/इतिहासक सामाजिकता, माध्यमक शक्ति, पहिचानक ऐतिहासिकता आ संस्थागत वैधीकरणक संकट। आब प्रश्न अछि—समानान्तर दर्शन एहि आलोचना सामने अपन सकारात्मक उत्तर की दैत अछि? एक सम्भावना अछि पुरान निरपेक्षतावाद दिस लौटि जेबाक—मानो सत्य पूर्णतः पारदर्शी, संस्था तटस्थ, इतिहास एकरेखीय, वैज्ञानिक ज्ञान सामाजिक शर्तसँ मुक्त, पहिचान स्थिर, केन्द्र स्वतः वैध। समानान्तर दर्शन ई वापसी अस्वीकारैत अछि। दोसर सम्भावना अछि अति-सापेक्षतावाद—हर दृष्टिकोण अपन सत्य, हर इतिहास अपन कथा, हर नैतिकता अपन समुदाय, हर विज्ञान अपन प्रतिमान, हर पहिचान अपन नियम। ई स्थिति सार्वजनिक प्रमाण, न्याय, उत्तरदायित्व आ साझा आलोचनाकेँ कमजोर करि सकैत अछि। समानान्तर दर्शनक मूल चुनौती तेँ द्वंद्वात्मक अछि: बहुलता स्वीकारब, मुदा मनमानापन नहि; सत्ता-समीक्षा करब, मुदा यथार्थ नकारब नहि; स्थानीय अनुभव सुनब, मुदा सार्वभौम गरिमा छोड़ब नहि; इतिहासक मौन मानब, मुदा कल्पना सँ रिक्ति नहि भरब। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—उत्तर-आधुनिक आलोचनाक वैध शिक्षा सभकेँ कोना समेकित कएल जाए? सत्य, प्रमाण, यथार्थ, गरिमा, लोकतन्त्र, धर्म, इतिहास आ आत्मसमीक्षा सम्बन्धी समानान्तर दर्शनक सात आधार-सूत्र उत्तर-आधुनिक चुनौतीक सामने कोना बदलैत/गहिर होइत छथि?
मूल प्रतिपादन
समानान्तर दर्शनक उत्तर ई अछि जे उत्तर-आधुनिक आलोचना अन्तिम निषेध नहि, त्रुटिसंशोध्य पुनर्निर्माणक चरण अछि। आलोचना केन्द्र/बहिष्कार/मध्यस्थता खोलैत अछि; समानान्तर दर्शन प्रमाण, यथार्थ, गरिमा आ आत्मसमीक्षा द्वारा संशोधित प्रतिपादन बनबैत अछि। बहुप्रमाणीय विवेकवाद कहैत अछि—प्रमाण अनेक, दाबी-प्रकार अनेक, कसौटी मनमाना नहि। विज्ञान, इतिहास, कानून, कला, धर्म, व्यक्तिगत अनुभव—सभ एकहि प्रकारक प्रमाण नहि माँगैत; मुदा कोनो क्षेत्र प्रमाण-विहीन विशेषाधिकार नहि पबैत। सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद कहैत अछि—हम जगतकेँ भाषा, शरीर, इतिहास, संस्था, संस्कृति आ माध्यमद्वारा अनुभव करैत छी; मुदा जगत एहि मध्यस्थतासभमे पूर्णतः घुलि नहि जाइत। बाह्य प्रतिरोध, स्वतंत्र निरीक्षण, भौतिक परिणाम आ पुनर्परीक्षण दाबीकेँ सीमित करैत अछि। गरिमा-आधारित नैतिकता कहैत अछि—पहिचान सामाजिक/ऐतिहासिक/बहुविध हो सकैत अछि; व्यक्ति केर नैतिक मूल्य पहिचानक उतार-चढ़ावसँ कम/बेसी नहि। बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्र कहैत अछि—ज्ञान, सत्ता, संसाधन आ व्याख्याक एकाधिकार तोड़ू; मुदा स्थानीय बहुमत अथवा हाशियागत पहचानकेँ सेहो व्यक्ति-अधिकार उल्लंघनक विशेषाधिकार नहि दिअ। धर्मक विवेकपूर्ण बहुलता कहैत अछि—मानबाक, नहि मानबाक, बदलबाक, प्रश्न करबाक समान स्वतंत्रता। सार्वजनिक बल-प्रयोग लेल साझा कारण चाही; निजी श्रद्धा स्वतः सार्वजनिक बाध्यता नहि बनैत। समानान्तर इतिहास-दृष्टि कहैत अछि—केन्द्र/हाशिया, अभिलेख/मौन, लिखित/मौखिक, राज्य/लोक—सभ स्रोत समान आलोचनात्मक कसौटी पर; अभिलेखीय मौन = प्रमाण-अन्तराल, मनगढ़न्त भरपाई नहि। आत्मसमीक्षा कहैत अछि—समानान्तर दर्शन स्वयं अंतिम दर्शन नहि। ओकर सात सूत्र स्वयं प्रतिपक्ष, नूतन प्रमाण, नूतन अनुभव आ नूतन नैतिक चुनौती सामने संशोध्य रहत।
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—बहुलता आ सापेक्षतावाद अलग। अनेक दृष्टिकोण उपलब्ध होयब एहि बातक प्रमाण अछि जे एकल दृष्टि अपूर्ण हो सकैत; एहि सँ हर दृष्टि समान रूपेँ सत्य नहि बनैत। दोसर तर्क—प्रसंग-सापेक्षता आ मनमानापन अलग। शब्द, कानून, नैतिकता, वैज्ञानिक मापन वा इतिहासक अर्थ प्रसंग अनुसार बदलि सकैत; मुदा प्रसंग स्वयं दाबी पर सीमा लगबैत अछि। तेसर तर्क—उत्तर-आधुनिक केन्द्र-समीक्षा उपयोगी तखन जे विशेषाधिकार/बहिष्कार खोलय। समानान्तर दर्शन एहि आलोचनाकेँ बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्रमे बदलैत अछि: केन्द्र अनेक, पारदर्शी, परस्पर-जवाबदेह आ संशोध्य। चारिम तर्क—हाशिया ज्ञानमीमांसक संसाधन (epistemic resource) हो सकैत अछि, ज्ञानमीमांसक विशेषाधिकार (epistemic privilege) स्वतः नहि। जे अनुभव मुख्य अभिलेखमे अनुपस्थित, ओ महत्वपूर्ण प्रतिप्रमाण दे सकैत; मुदा ओकरो स्रोत, प्रसंग, विरोधाभास आ स्वतंत्र पुष्टि जाँचू। पाँचम तर्क—सत्ता-समीक्षा वस्तुनिष्ठताक शत्रु नहि; वस्तुनिष्ठता सुधारक औजार। स्रोतक हित, वित्त, वर्गीकरण, मंच, प्रवेश-नियन्त्रण (gatekeeping), अभिलेख-चयन (archive selection) जाँचला सँ दाबी अधिक विश्वसनीय बनि सकैत अछि। छठम तर्क—सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद ‘कहीं सँ नहि देखल दृष्टि (view from nowhere)’ नहि माँगैत। ओ मानैत अछि जे प्रत्येक ज्ञाता स्थितिगत अछि; वस्तुनिष्ठता स्वतंत्र दृष्टि, बहु-विधि आ प्रतिपुष्टिक संगम सँ बनैत अछि। सातम तर्क—उत्तर-आधुनिक पहिचान-आलोचना व्यक्ति केर बहुस्तरीय जीवन समझबामे सहायक। समानान्तर नैतिकता जोड़ैत अछि—‘पहिचानकेँ देखू; व्यक्तिकेँ पहिचानमे कैद नहि करू।’ आठम तर्क—सार्वभौम गरिमा महाख्यान नहि, एक नैतिक सीमा-प्रतिबद्धता अछि: व्यक्ति केवल जन्म, जाति, लिंग, धर्म, भाषा, वर्ग, क्षेत्र, क्षमता वा डिजिटल प्रोफ़ाइल कारण कम नैतिक मूल्यक नहि। नवम तर्क—सार्वभौम सिद्धान्तक आत्मसमीक्षा जरूरी। ‘गरिमा’क नामपर पितृसत्तात्मक संरक्षण, ‘समानता’क नामपर भिन्नताक मिटाउ, ‘विवेक’क नामपर सांस्कृतिक उपहास—ई सम्भव विकृति छथि। दसम तर्क—धर्मक बहुलता ‘हर धार्मिक दावा समान सत्य’ नहि; स्वतंत्रता सम्बन्धी समान नागरिक अधिकार अछि। तत्त्वमीमांसक सत्य-दाबी अलग, सार्वजनिक दमन/कानून अलग प्रश्न। एगारहम तर्क—इतिहासक कथा बनैत अछि, मुदा प्रमाणक प्रतिरोध रहैत अछि। कालक्रम (chronology), उत्पत्ति-पथ (provenance), भौतिक साक्ष्य (material evidence), पाठ-समीक्षा (textual criticism), मौखिक इतिहास (oral history), पुरातत्त्व (archaeology), सांख्यिकीय अभिलेख (statistical record) एक-दोसराकेँ सीमित/सुधारि सकैत अछि। बारहम तर्क—समानान्तर निष्कर्ष-श्रेणी—सबल रूपेँ समर्थित, सम्भाव्य, विवादित, अज्ञात—उत्तर-आधुनिक अनिश्चितताकेँ ज्ञानमीमांसक ईमानदारी (epistemic honesty) मे बदलैत अछि। तेरहम तर्क—विज्ञानक सामाजिकता ओकर प्रमाणिकता नष्ट नहि। समानान्तर दर्शन संस्थागत आलोचना (institutional critique) + प्रायोगिक सीमा (experimental constraint) जोडैत अछि: वित्तपोषण (funding) जाँचू, प्रयोग (experiment) सेहो जाँचू।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि—समानान्तर दर्शन हर आलोचनाकेँ बीचक रास्तामे घोलि दैत अछि; तीक्ष्ण उत्तर-आधुनिक संशयक धार कम करैत अछि। दोसर पूर्वपक्ष कठोर यथार्थवादी अछि—यदि अन्ततः सत्य/प्रमाण/यथार्थ बचाबयब अछि, तखन देरिदा, फूको, ल्योटार, बौद्रियारक जटिलता सँ गुजरबाक आवश्यकता की? तेसर पूर्वपक्ष सापेक्षतावादी अछि—‘सार्वभौम गरिमा’ स्वयं आधुनिक/मानवतावादी महाख्यान; समानान्तर दर्शन अपन विशेष मूल्यकेँ निष्पक्ष सत्य बनबैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष पहचान-राजनीतिक अछि—व्यक्ति केर सार्वभौम गरिमा पर बल इतिहासगत समूह-अन्याय/प्रतिनिधित्व/सत्ता-विषमता कमजोर करि सकैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय परम्परा सँ अछि—समानान्तर दर्शन आधुनिक पाश्चात्य आलोचनाक उत्तर दैत भारतीय दर्शनकेँ केवल ‘संसाधन’ बना सकैत अछि, ओकर स्वायत्त प्रश्न/लक्ष्य गौण हो सकैत अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—समानान्तर दर्शन ‘बीचक रास्ता’ स्वतः नहि चुनैत; जहाँ प्रमाण एक पक्षक समर्थन करैत, स्पष्ट निर्णय देत। बहुलता निर्णय-टालू वृत्ति (decision avoidance) नहि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—उत्तर-आधुनिक आलोचना बिना यथार्थवाद स्वयं अपन संस्था, भाषा, अभिलेख (archive), श्रेणी (category) आ सत्ता-अन्धबिन्दु (power blind spot) नहि देखब। आलोचना यथार्थवादकेँ अधिक आत्मसचेत बनबैत अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—गरिमा तत्त्वमीमांसक निश्चितता (metaphysical certainty) रूपमे नहि, सार्वजनिक नैतिक प्रतिबद्धता रूपमे प्रतिपादित। ओकर औचित्य (justification) पीड़ा (suffering), पारस्परिकता (reciprocity), सक्रियता (agency), समान नैतिक प्रतिष्ठा (equal moral standing) आ लोकतान्त्रिक विवेक (democratic reason) द्वारा दएल जाए; आलोचनासँ मुक्त नहि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—गरिमा समूह-अन्याय मिटबैत नहि। उलटे ऐतिहासिक भेदभाव (historical discrimination), सुधारात्मक उपाय (reparative measure), प्रतिनिधित्व (representation), अभिगम्यता (accessibility) आ भेदभाव-विरोधी नियम (anti-discrimination rule) लेल समान नैतिक आधार दैत अछि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय दर्शन स्वतंत्र interlocutor अछि, पूर्वगामी (precursor) वा उदाहरण-मात्र (illustration) नहि। प्रत्येक तुलना मे ऐतिहासिक सन्दर्भ, मूल पद, लक्ष्य, असहमति आ सीमा लिखल जाए।
भारतीय संवाद
न्याय–नव्य-न्याय समानान्तर उत्तरक स्पष्टता/प्रमाण-पक्ष सबल करैत अछि—दाबी सीमित करू, सम्बन्ध स्पष्ट करू, प्रतिपक्ष जाँचू, प्रमाण पहिचानू। ई उत्तर-आधुनिक आलोचना (postmodern critique) केर ‘उत्तर’ पहिनेसँ तैयार छल, एहन दावा नहि। जैन अनेकान्तवाद दृष्टि-सीमाक अनुशासन दैत अछि—कथन शर्तबद्ध हो सकैत; वस्तु बहुपक्षीय। समानान्तर दर्शन एतयसँ बहुदृष्टिगत सावधानी लेल संवाद करैत, सापेक्षतावाद (relativism) नहि ग्रहण करैत। मध्यमक स्वभाव-आलोचना स्थिर तत्त्वमीमांसक सार पर प्रश्न उठबैत; समानान्तर दर्शन एहि आत्मसमीक्षात्मक दबाव स्वीकारैत, मुदा शून्यता केँ उत्तर-आधुनिक यथार्थ-विरोध (postmodern anti-realism) नहि बनबैत। मीमांसा भाषिक प्रसंग/तात्पर्यक अनुशासन दैत अछि; अर्थक बहुलता = असीम पाठक-स्वातन्त्र्य नहि। बौद्ध अपोह/प्रमाणपरम्परा अवधारणा, भाषा, प्रत्यक्ष, अनुमानक सम्बन्ध पर स्वतंत्र बहस दैत अछि; उत्तर-आधुनिकता केर ‘पूर्वरूप’ नहि। अद्वैत माया/अध्यास तत्त्वमीमांसक/मुक्ति-सन्दर्भक प्रश्न; बौद्रियारक अनुकरण (Baudrillard simulation), उत्तर-सत्य (post-truth) अथवा सामाजिक निर्माण (social construction) संग ऐतिहासिक समानता नहि। भारतीय शास्त्रार्थ पूर्वपक्ष–उत्तरपक्षक पद्धतिगत अनुशासन दैत अछि—प्रतिपक्षक शक्तिशाली रूप प्रस्तुत करू, आलोचना करू, अपन उत्तर प्रमाणित करू। समानान्तर पुनर्निर्माण लेल ई विशेष महत्त्वपूर्ण। भारतीय संवादक निष्कर्ष—‘भारतीय दर्शन उत्तर-आधुनिकताक समाधान’ एहन सभ्यतागत महाख्यान स्वयं समानान्तर दर्शनक विरुद्ध। समाधान समस्या-विशिष्ट संवाद सँ बनत।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि अपन क्षेत्रकेँ न तऽ इतिहासक सार्वभौम केन्द्र, न केवल हाशिया मानैत अछि। केन्द्र/हाशिया समय, संस्था, भाषा आ स्रोत अनुसार बदलैत अछि। मिथिलाक विद्वत् परम्परा, लोक-स्मृति, स्त्री-गीत, पंजी, भूमि-अभिलेख, पाण्डुलिपि, आधुनिक पत्रिका, नेपाल–भारत क्षेत्रीय सम्बन्ध आ डिजिटल स्रोत बहुविध प्रमाण-दुनिया बनबैत छथि। समानान्तर इतिहासक नियम—कोनो स्रोतक सामाजिक प्रतिष्ठा ओकर ज्ञानमीमांसक मूल्य (epistemic value) स्वतः तय नहि करैत। राजकीय अभिलेख, लोकगीत, निजी पत्र (private letter), मौखिक इतिहास (oral history), पाण्डुलिपि (manuscript)—सभ अपन दाबी-क्षेत्र अनुसार जाँचल जाए। मैथिलीक मानकीकरणमे बहुकेन्द्रिक उत्तर उपयोगी—विद्यालय/प्रकाशन लेल कार्यगत मानक; क्षेत्रीय/लोक/ऐतिहासिक रूपक अभिलेखन; डिजिटल अभिगम्यता (digital accessibility); संशोधन-प्रक्रिया (revision mechanism)। जाति/उपजाति/परम्परा सम्बन्धी दाबीमे वर्तमान श्रेणी अतीतपर नहि आरोपू। वंशावली (genealogy), दस्तावेज-तिथि-निर्धारण (document dating), शब्दावली-परिवर्तन (terminology change), क्षेत्रीय विविधता (regional variation), प्रतिप्रमाण (contrary evidence) जाँचू। मिथिला-विमर्शमे ‘हमर गौरव’ प्रमाणक स्थान नहि लैत। गौरव प्रमाणित उपलब्धि पर आधारित हो; अनिश्चितताकेँ स्वीकारब अपमान नहि, बौद्धिक गरिमा अछि। डिजिटल विदेह/मैथिली ज्ञान-परियोजनामे समानान्तर सूत्र—खुला अभिलेख, स्पष्ट अधितथ्य (metadata), स्रोत-लिंक, संस्करण, संशोधन-इतिहास, अभिगम्यता (accessibility), खोजयोग्यता (searchability) आ मानवीय सम्पादकीय उत्तरदायित्व (human editorial responsibility)। आत्मसमीक्षा—‘समानान्तर’ शब्द स्वयं नूतन प्रतिष्ठित ब्राण्ड/केन्द्र बनि सकैत अछि। ताहि कारण प्रत्येक समानान्तर दाबी स्वयं प्रश्नित, प्रमाणित आ संशोध्य रहय।
समकालीन प्रयोग
कृत्रिम बुद्धि (AI) उत्तर-व्यवस्थामे बहुल उत्तर उपयोगी, मुदा सत्यापन आवश्यक। पुनर्प्राप्ति (retrieval), उत्पत्ति-पथ (provenance), अनिश्चितता (uncertainty), प्रतिस्रोत (counter-source) आ मानवीय उत्तरदायित्व (human responsibility) जोड़ि ज्ञानमीमांसक बहुलतावाद (epistemic pluralism) केँ विश्वसनीयता (reliability) संग जोड़ल जाए। एल्गोरिदमिक वर्गीकरणमे श्रेणी आवश्यक (category necessary) हो सकैत, मुदा ऐतिहासिक पूर्वाग्रह/सीमांत मामले/बहिष्कृत समूह (historical bias/edge cases/excluded groups) जाँचू; अपील (appeal) आ मानवीय हस्तक्षेप-अधिकार (human override) राखू। सामाजिक माध्यममे बहु-दृष्टि लोकतान्त्रिक हो सकैत, मुदा वायरलता (virality) प्रमाण (evidence) नहि। स्रोत-प्रामाणिकता (source authenticity), बॉट-विस्तार (bot amplification), परिवर्तित माध्यम-सामग्री (manipulated media) आ समन्वित अभियान (coordinated campaign) जाँचू। विज्ञान-नीतिमे विशेषज्ञ सहमति (expert consensus) उपयोगी; असहमति-दमन (dissent suppression) गलत। अल्पमत प्रमाण (minority evidence) क वजन दाबी/quality अनुसार, केवल अल्पमत स्थिति (minority status) कारण नहि। इतिहास/स्मृति विवादमे स्मारक (monument), संग्रहालय (museum), पाठ्यपुस्तक (textbook), मौखिक साक्ष्य (oral testimony), अभिलेख (archive) सब अलग भाषा-खेल/स्रोत; सार्वजनिक इतिहास (public history) लेल प्रमाणगत क्रम (evidential hierarchy) आ नैतिक प्रसंग (ethical context) स्पष्ट हो। धर्मनिरपेक्ष सार्वजनिक क्षेत्रमे धार्मिक/अधार्मिक नागरिक समान; बलपूर्वक कानून (coercive law) लेल सार्वजनिक विवेक/अधिकार/प्रमाण (public reason/rights/evidence) चाही। पहिचान-राजनीतिमे जीवित अनुभव (lived experience) सुनू; समूह-स्तरीय प्रतिरूप (group-level pattern) जाँचू; व्यक्तिगत सक्रियता (individual agency) बचाउ; नीति (policy) लेल मापनीय भेदभाव/अधिकार-प्रभाव (measurable discrimination/rights impact) जाँचू। विश्वविद्यालय/प्रकाशनमे मान्यताप्राप्त साहित्य-सूची (canon) खोलू, गुणवत्ता-मानक (quality standard) पारदर्शी राखू; उद्धरण-प्रतिष्ठा (citation prestige) मात्र नहि, तर्क/प्रमाण/नवीनता/स्पष्टता (argument/evidence/novelty/clarity) सेहो जाँचू। भाषा-प्रौद्योगिकीमे अल्प-संसाधन भाषा-समावेशन (low-resource language inclusion) केवल उपयोगकर्ता-संख्या (user count) पर नहि; सांस्कृतिक अधिकार (cultural rights), ज्ञान-विविधता (knowledge diversity), अभिगम्यता (accessibility) आ संरक्षण-मूल्य (preservation value) समाविष्ट करू। सार्वजनिक विमर्शक समानान्तर जाँच-सूची (checklist)—दाबी की? स्रोत की? ककर आवाज अनुपस्थित? प्रतिप्रमाण की? नैतिक प्रभाव की? संशोधनक शर्त की?
अध्याय-निष्कर्ष
समानान्तर दर्शन उत्तर-आधुनिकताकेँ न पूर्णतः स्वीकारैत, न पुरान निश्चितताक नामपर अस्वीकारैत। ओ आलोचनाक वैध प्रश्नसभ ग्रहण करैत, अति-निष्कर्षकेँ प्रमाण/यथार्थ/गरिमासँ सीमित करैत अछि। बहुलता आवश्यक, मुदा मनमानापन नहि; सत्ता-समीक्षा आवश्यक, मुदा सत्य-विघटन नहि; इतिहासक चयनशीलता स्वीकार्य, मुदा कल्पित इतिहास नहि; पहिचान महत्त्वपूर्ण, मुदा नैतिक गरिमा श्रेणी-सापेक्ष नहि। बहुप्रमाणीय विवेकवाद, सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद, गरिमा-आधारित नैतिकता, बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्र, धर्मक विवेकपूर्ण बहुलता, समानान्तर इतिहास-दृष्टि आ आत्मसमीक्षा—ई सात सूत्र सप्तम खण्डक उत्तर बनैत छथि। समानान्तर दर्शन स्वयं कोनो नूतन महाख्यान नहि बनबाक दावा करैत। ओकर निष्ठा कोनो स्थिर केन्द्र, सभ्यता, पहचान अथवा परम्परा प्रति नहि; सत्य, प्रमाण, न्याय, गरिमा, स्वतंत्र विवेक आ आत्मसमीक्षा प्रति अछि। अध्यायक केन्द्रीय सूत्र—‘बहुदृष्टिगत सत्य ≠ मनमाना सत्य; प्रमाण अनेक ≠ प्रमाण-अराजकता; बहुकेन्द्रिकता ≠ नैतिक विखण्डन।’ अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘प्रश्न करू, नकारमे नहि रुकू; विखण्डित करू, पुनर्निर्माण करू; बहुलता बचाउ, सत्य बचाउ; पहिचान देखू, गरिमा बचाउ; अपन उत्तरकेँ सेहो आलोचनासँ मुक्त नहि राखू।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• ज्याँ-फ्राँस्वा ल्योटार — ‘उत्तर-आधुनिक अवस्था: ज्ञानपर प्रतिवेदन’ (The Postmodern Condition: A Report on Knowledge)। • ज्याँ-फ्राँस्वा ल्योटार — ‘विभेद’ (The Differend)। • ज्याँ बौद्रियार — ‘प्रतिरूप आ अनुकरण’ (Simulacra and Simulation)। • जाक देरिदा — ‘व्याकरणशास्त्र पर’ (Of Grammatology)। • जाक देरिदा — ‘लेखन आ भिन्नता’ (Writing and Difference)। • मिशेल फूको — ‘ज्ञानक पुरातत्त्व’ (The Archaeology of Knowledge)। • मिशेल फूको — ‘अनुशासन आ दण्ड’ (Discipline and Punish)। • रिचर्ड रॉर्टी — ‘वस्तुनिष्ठता, सापेक्षतावाद आ सत्य’ (Objectivity, Relativism, and Truth)। • हिलेरी पुटनम — ‘विवेक, सत्य आ इतिहास’ (Reason, Truth and History)। • बर्नार्ड विलियम्स — ‘सत्य आ सत्यनिष्ठा’ (Truth and Truthfulness)। • हेलेन ई. लॉन्गिनो — ‘सामाजिक ज्ञान रूपमे विज्ञान’ (Science as Social Knowledge)। • मार्क ब्लोख — ‘इतिहासकारक शिल्प’ (The Historian’s Craft)। • ई. एच. कार — ‘इतिहास की अछि?’ (What Is History?)। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • नागार्जुन — मूलमध्यमककारिका। • मल्लिषेण — स्याद्वादमञ्जरी। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।