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समस्या
हर्मेन्यूटिक्स (hermeneutics) मूलतः व्याख्याक कला/पद्धति सम्बन्धी परम्परासँ विकसित भेल, मुदा आधुनिक दार्शनिक हर्मेन्यूटिक्स प्रश्नकेँ अधिक गहिर बनबैत अछि: हम कोनो पाठ, व्यक्ति, घटना, परम्परा वा जगतकेँ बुझैत कोना छी? बुझब केवल तकनीक नहि, मनुष्यक ऐतिहासिक/भाषिक अस्तित्वक मूल प्रक्रिया किएक? प्रारम्भिक हर्मेन्यूटिक परम्परामे बाइबिल, कानून आ शास्त्रीय पाठक सही अर्थ खोजब महत्वपूर्ण छल। श्लाइअरमाखर व्याख्याकेँ व्यापक पद्धति बनबैत छथि; डिल्थे मानव-विज्ञान/ऐतिहासिक विज्ञानक विशेष समझ-प्रक्रियासँ जोड़ैत छथि; हाइडेगर बुझबकेँ अस्तित्वगत संरचना बनबैत छथि; गाडामर एहि रेखाकेँ परम्परा, पूर्वबोध, भाषा, संवाद आ ऐतिहासिकता संग विकसित करैत छथि। व्याख्यात्मक वृत्त (व्याख्यात्मक वृत्त (hermeneutic circle))क मूल कठिनाई ई अछि—भाग केँ समग्रसँ बुझैत छी आ समग्र केँ भागसभसँ। एक वाक्य अध्यायक अर्थपर निर्भर; अध्यायक अर्थ वाक्यसभपर। ई वृत्त दुष्चक्र होयबाक जरूरी नहि; पुनर्पाठ/संशोधनक गतिशील प्रक्रिया हो सकैत अछि। बुझब कखनो शून्य पूर्वधारणासँ शुरू नहि होइत। भाषा, शिक्षा, परम्परा, पूर्व अनुभव, प्रश्न, विधा, ऐतिहासिक ज्ञान—सभ पाठककेँ आरम्भिक अपेक्षा दैत अछि। समस्या पूर्वबोध होयब नहि; ओकरा अचेत/असंशोध्य विशेषाधिकार बनाओल जाए तखन समस्या। गाडामरक पूर्वनिर्णय (prejudice/Vorurteil)क पुनर्पाठ ई नहि कहैत जे हर पक्षपात सही। हुनकर प्रश्न ई अछि जे पूर्वनिर्णय/पूर्वबोध बिना बुझब आरम्भे नहि होइत; समझक प्रक्रिया एहि पूर्वबोधकेँ पाठ/अन्य व्यक्ति/परम्पराक प्रतिरोध सामने संशोधित करैत अछि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—यदि बुझब हमेशा ऐतिहासिक आ भाषिक अछि, तखन सही/गलत व्याख्याक भेद कोना? लेखकक अभिप्राय, पाठकक पूर्वबोध, परम्परा, भाषा, प्रसंग, प्रमाण आ वर्तमान प्रश्नक बीच सीमा कोना बनत? समानान्तर दर्शन एहि खुलापनकेँ प्रमाण-अनुशासनसँ कोना जोड़त?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे बुझब निष्क्रिय प्रतिलिपि नहि; प्रश्न, पूर्वबोध, पाठ/घटना, प्रसंग, भाषा आ पुनर्परीक्षणक संवादात्मक प्रक्रिया अछि। व्याख्यात्मक वृत्त दुष्चक्र नहि, संशोधन-वृत्त हो सकैत अछि: आरम्भिक समग्र-बोध भागक पठन निर्देशित करैत; भागसभ समग्र-बोध सुधारैत; नूतन समग्र फेर भागसभक अर्थ बदलि सकैत। ऐतिहासिकता बाधा मात्र नहि; अर्थ-प्रवेशक शर्त सेहो। पाठक वर्तमानसँ अतीत दिस जाइत अछि, मुदा अतीतकेँ वर्तमानक शब्दावलीमे कैद नहि करबाक अनुशासन चाही। गाडामरक क्षितिज-संलयन (fusion of horizons)क उपयोग ई अर्थमे फलदायी जे पाठक/पाठक ऐतिहासिक क्षितिज संवादमे बदलैत छथि; ई न तऽ अतीतक पूर्ण आत्मसमर्पण, न वर्तमानक उपनिवेशीकरण। समानान्तर दर्शनक सूत्र—‘पूर्वबोध स्वीकारू, पूर्वग्रहक परीक्षा करू; पाठ खोलू, पाठमे मनमाना अर्थ नहि भरो; परम्परा सुनू, आलोचना रोकू नहि; अर्थ बहुल हो सकैत अछि, प्रमाणहीन नहि।’
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—श्लाइअरमाखर व्याख्याकेँ व्याकरणिक आ मनोवैज्ञानिक/व्यक्तिगत समझक संयुक्त समस्या बनबैत छथि। पाठक शब्द/भाषा-संरचना आ लेखकक अभिव्यक्ति दुनू देखैत अछि। दोसर तर्क—डिल्थे प्राकृतिक विज्ञानक व्याख्या आ मानव/ऐतिहासिक विज्ञानक समझ (Verstehen) बीच भेद पर बल दैत छथि। मानव क्रिया अर्थ-संपन्न होइत; केवल बाह्य कारणसँ पूरा नहि बुझायल जा सकैत। तेसर तर्क—हाइडेगर हर्मेन्यूटिक्सकेँ पाठ-पद्धतिसँ अस्तित्वगत प्रश्न बनबैत छथि। मनुष्य जगतमे पहिने सँ अर्थपूर्ण सम्बन्धमे स्थित; ‘समझ’ बादमे जोड़ल तकनीक नहि। चारिम तर्क—गाडामरक दार्शनिक हर्मेन्यूटिक्स पद्धतिक महत्त्व नकारैत नहि, मुदा बुझबकेँ केवल नियम-सूचीमे कैद कएल जा सकैत, ई मान्यता अस्वीकारैत अछि। समझ ऐतिहासिक, संवादात्मक आ भाषिक घटना अछि। पाँचम तर्क—पूर्वनिर्णय (prejudice) अनिवार्यतः नकारात्मक नहि। आरम्भिक पूर्वधारणा पाठ खोलैत अछि; पाठक काम ई कि ओ अपन पूर्वधारणाकेँ प्रश्न/प्रतिप्रमाण सामने संशोधित करय। गाडामर एहि संशोध्यता केँ समझक केन्द्र बनबैत छथि। छठम तर्क—भाग–समग्र सम्बन्ध व्याख्यात्मक वृत्तक आधार अछि। शब्द वाक्यमे, वाक्य अध्यायमे, अध्याय कृतिमे, कृति ऐतिहासिक/विधागत प्रसंगमे अर्थ पबैत; फेर प्रत्येक भाग समग्रक अर्थ बदलि सकैत। सातम तर्क—‘परम्परा’ गाडामर लेल मृत भार नहि; प्रभावकारी इतिहासक माध्यम अछि। हम परम्परासँ बाहर शून्य बिन्दुपर नहि; मुदा परम्परा संवादमे प्रश्नित/पुनर्पाठित हो सकैत। आठम तर्क—क्षितिज (horizon) पाठक/युगक संभावित अर्थ-क्षेत्र सूचित करैत अछि। क्षितिज-संलयन (fusion of horizons) भिन्न क्षितिजक सम्पूर्ण विलयन नहि; संवादद्वारा नया/विस्तृत समझक सम्भावना। नवम तर्क—संवादक आदर्शमे प्रश्न/उत्तर संरचना महत्त्वपूर्ण। पाठ केवल उत्तर नहि; पहिने बुझू कि ओ कोन प्रश्नक उत्तर दैत अछि। वर्तमान प्रश्न अलग हो सकैत, ताहि कारण मूल प्रश्न आ वर्तमान उपयोग दुनू स्पष्ट करू। दसम तर्क—भाषा समझक सार्वभौम माध्यमक रूप लैत अछि, मुदा समानान्तर दर्शन भाषा-सर्वशक्तिमानता अस्वीकारैत। पाठीय अर्थ भाषा-सापेक्ष; ऐतिहासिक घटना/भौतिक वस्तु भाषा मात्र नहि। एगारहम तर्क—व्याख्या खुलल हो सकैत अछि, असीम नहि। व्याकरण, शब्दार्थ, पाठीय संरचना, विधा, तिथि, संस्करण, लेखकक ज्ञात प्रसंग, अन्तर्पाठीय सम्बन्ध, ऐतिहासिक स्रोत आ आन्तरिक संगति व्याख्याकेँ सीमित करैत अछि। बारहम तर्क—लेखकक अभिप्राय महत्त्वपूर्ण प्रमाण हो सकैत अछि, अंतिम न्यायाधीश नहि। लेखक स्वयं असंगत/अस्पष्ट हो सकैत; पाठ सामाजिक सन्दर्भमे लेखकक अभिप्रायसँ अधिक प्रभाव उत्पन्न करि सकैत। तेरहम तर्क—पाठकक अनुभव सेहो अर्थ खोलि सकैत अछि, मुदा ‘हमरा एना लगैत’ पर्याप्त अकादमिक प्रमाण नहि। व्यक्तिगत प्रतिसाद आ पाठीय/ऐतिहासिक दाबी अलग श्रेणी। चौदहम तर्क—हर्मेन्यूटिक उदारता प्रतिपक्षक सबसे सबल रूप (strongest version) पढ़बाक मांग करैत अछि। उद्धरण काटि कृत्रिम कमजोर प्रतिपक्ष (straw man) बनब व्याख्या नहि; प्रतिपक्षक प्रश्न, पद, सीमा आ सन्दर्भ पहिने पुनर्निर्मित करू।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप पद्धतिवादी अछि—यदि व्याख्या ऐतिहासिक/पूर्वबोध-सापेक्ष, तखन सही पठनक वस्तुगत पद्धति (objective method) कहाँ? नियम बिना व्याख्या मनमाना भऽ सकैत अछि। दोसर पूर्वपक्ष लेखक-केंद्रित अछि—पाठक/परम्पराक भूमिका बढ़ाबयब लेखकक वास्तविक अभिप्राय केँ विकृत करि सकैत अछि; अर्थ लेखक तय करैत छथि। तेसर पूर्वपक्ष विखण्डनवादी अछि—हर्मेन्यूटिक्स समझ/संवाद/संलयनक आदर्श पर अधिक भरोसा करैत अछि; भाषा भीतर अस्थिरता/विरोध/असमझ सेहो मूलभूत हो सकैत। चारिम पूर्वपक्ष आलोचनात्मक सिद्धान्त सँ अछि—परम्परा/प्राधिकारक सकारात्मक भूमिका पर बल विचारधारा, सत्ता, लिंग/जाति/वर्ग बहिष्कार केँ सामान्य बना सकैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय तुलना सँ अछि—मीमांसा, न्याय, भाष्य, टीका, पूर्वपक्ष–उत्तरपक्ष वा शास्त्रार्थकेँ ‘भारतीय हर्मेन्यूटिक्स (Indian hermeneutics)’ कहि एक आधुनिक यूरोपीय श्रेणीमे घोलब अनुचित।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—हर्मेन्यूटिक्स पद्धति-विरोध नहि, पद्धति-पर्याप्तताविरोध अछि। आलोचनात्मक संस्करण, व्याकरण, स्रोत-समीक्षा, तिथि, अभिलेख, तुलनात्मक पठन आवश्यक; मुदा समझक ऐतिहासिकता नियम-पुस्तिका सँ समाप्त नहि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—लेखकक अभिप्राय महत्त्वपूर्ण, विशेषतः ऐतिहासिक पुनर्निर्माणमे। मुदा भाषा/विधा/प्रकाशन-सन्दर्भ आ पाठक समुदाय अर्थक सामाजिक जीवन बढ़बैत अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—समझ हमेशा पूर्ण सम्मति नहि। संवाद असहमतिकेँ स्पष्ट करि सकैत अछि; क्षितिज-संलयन = समानता नहि। व्याख्याक निष्कर्ष ‘हम सहमत’ नहि, ‘हम स्पष्ट रूपेँ बुझलहुँ’ सेहो हो सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—परम्पराक प्रभाव स्वीकारब प्राधिकार-पूजा नहि। समानान्तर दर्शन सत्ता-समीक्षा जोड़ैत अछि: ककर परम्परा? ककर आवाज अनुपस्थित? कौन व्याख्या संस्थागत बलसँ मानक बनल? पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय परम्परा स्वतंत्र पद/पद्धति रूपमे पढ़ल जाए। तुलनात्मक शब्द ‘हर्मेन्यूटिक’ केवल समस्या-संवादक सुविधा; ऐतिहासिक पहचान/प्रभावक दावा नहि।
भारतीय संवाद
मीमांसा भारतीय व्याख्यात्मक परम्पराक अत्यन्त विकसित रूप अछि—वाक्य, विधि, तात्पर्य, प्रसंग, विरोध-समाधान आ पाठीय प्रामाण्य सम्बन्धी सूक्ष्म नियम। मुदा मीमांसा = गाडामर नहि; ओकर वैदिक/धर्ममीमांसक लक्ष्य अलग। न्याय शब्दप्रमाणमे वक्ता, वाक्य, अर्थ, ज्ञानोत्पत्ति आ विश्वसनीयताक प्रश्न उठबैत अछि। हर्मेन्यूटिक्स संग संवाद—कौन कथन बुझल गेल? किएक मानल जाए?—दू अलग स्तर जोड़ैत अछि। व्याकरण परम्परा शब्द–वाक्य–स्फोट/प्रयोगक अलग दर्शन दैत अछि। अर्थक समग्रता सम्बन्धी समस्या-साम्य हो सकैत, मुदा आधुनिक व्याख्यात्मक वृत्त (hermeneutic circle) क ऐतिहासिक पूर्वरूप नहि। बौद्ध भाष्य/प्रमाण परम्परामे प्रतिपक्ष पुनर्निर्माण, पद-विश्लेषण आ सिद्धान्तगत प्रसंगक अनुशासन देखाइत अछि; समानान्तर पद्धति एहि विद्वत्तापरक अनुशासन (scholarly discipline) सँ संवाद करैत अछि। जैन नय/स्याद्वाद कथनक पक्ष/शर्त स्पष्ट करैत अछि। व्याख्यात्मक बहुलता लेल उपयोगी तुलना, मुदा अनेकान्तवाद ≠ व्याख्यात्मक सापेक्षतावाद (hermeneutical relativism)। शास्त्रार्थक पूर्वपक्ष–उत्तरपक्ष पद्धति हर्मेन्यूटिक उदारताक महत्त्वपूर्ण भारतीय संवाद-बिन्दु अछि: प्रतिपक्षक मतकेँ पहिने यथासम्भव सही रूपमे प्रस्तुत करू, तखन खण्डन। भारतीय भाष्य-परम्परा निरन्तरता (continuity) आ पुनर्व्याख्या (reinterpretation) दुनू देखबैत अछि। एकहि सूत्र अलग काल/सम्प्रदायमे अलग पठन पबैत; एहि परिवर्तनक इतिहास लिखब स्वयं दार्शनिक/ऐतिहासिक कार्य। भारतीय संवादक निष्कर्ष—मीमांसा, न्याय, भाष्य, शास्त्रार्थ स्वतंत्र बौद्धिक परम्परा छथि; ‘हर्मेन्यूटिक्सक भारतीय संस्करण’ कहि हुनकर भिन्नता नष्ट नहि करू।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक शास्त्रीय/आधुनिक बौद्धिक इतिहासमे भाष्य, टीका, नव्य-न्यायीय परिभाषा, पंजी, लोककथा, गीत, पत्रिका, न्यायालय/भूमि-दस्तावेज आ डिजिटल सामग्री अलग व्याख्यात्मक विधा छथि; सभकेँ एकहि पठन-पद्धति सँ नहि पढ़ल जाए। नव्य-न्याय ग्रन्थक तकनीकी शब्दावली (technical vocabulary) आधुनिक सरल भाषामे अनुवाद करत काल परिभाषा/अवच्छेदन गायब भऽ सकैत अछि। व्याख्या लेल मूल पद, प्रसंग, प्रतिपक्ष आ उदाहरण बचाउ। पंजी/वंशावली दस्तावेजक अर्थ केवल नाम-सूची नहि; कौन उद्देश्य, कौन काल, कौन प्रतिलिपि, कौन सामाजिक श्रेणी, कौन बादक अन्तःक्षेप (interpolation)—एहि प्रश्न बिना व्याख्या अधूरी। मैथिली लोकगीतक ‘शाब्दिक इतिहास’ बनब गलत हो सकैत अछि। गीत भाव/स्मृति/सामाजिक संरचना/अनुष्ठानिक प्रसंगक स्रोत; विशिष्ट घटना-दाबी लेल अलग स्वतंत्र पुष्टि (corroboration) चाही। आधुनिक मैथिली पाठक प्राचीन/मध्यकालीन पाठ आधुनिक जाति, राष्ट्र, लिंग, भाषा-मानक वा राजनीतिक शब्दावलीसँ पढ़ि सकैत छथि। समानान्तर नियम—वर्तमान प्रश्न उपयोग करू, वर्तमान श्रेणी अतीतपर चुपचाप नहि थोपु। मिथिलाक बहुभाषिक स्रोत—संस्कृत, मैथिली, अवहट्ट/अपभ्रंश, प्राकृत, फारसी, हिन्दी, नेपाली, अंग्रेजी—अनुवाद/व्याख्याकेँ बहु-क्षितिजीय बनबैत अछि। शब्द-समानता = अवधारणा-समानता नहि। डिजिटल सम्पादनमे खोजयोग्यता (searchability) उपयोगी, मुदा अक्षर-पहिचान (OCR), वर्तनी-मानकीकरण (spelling normalization), अतिसम्पर्क (hyperlink), अंश-उद्धरण (excerpting) पाठकक अर्थ बदलि सकैत अछि। मूल पृष्ठ/संस्करणक पहुँच बचाउ। समानान्तर सूत्र—‘पाठकेँ वर्तमानमे जीवित करू, अतीतकेँ वर्तमानमे कैद नहि करू; पाठक आवाज सुनू, पाठक प्रतिरोध सेहो सुनू।’
समकालीन प्रयोग
कानूनमे विधान/संविधानक व्याख्या लेल पाठ, ऐतिहासिक प्रसंग, पूर्वनिर्णय (precedent), उद्देश्य, अधिकार आ वर्तमान परिस्थितिक सम्बन्ध जटिल हर्मेन्यूटिक प्रश्न बनबैत अछि। न्यायाधीशक पठन मनमाना नहि; सार्वजनिक कारण/पाठीय आधार चाही। कृत्रिम बुद्धि (AI) पाठ-सारांश मूल पाठक ‘अर्थ’ कहि प्रस्तुत करि सकैत अछि; मुदा मॉडल-प्रसंग-सीमा (model context window), पुनर्प्राप्ति-चयन (retrieval selection), निर्देश-रूपांकन (prompt framing) आ प्रशिक्षण-वितरण (training distribution) व्याख्या प्रभावित करैत अछि। मूल पाठ/उद्धरण जाँचू। इतिहासमे डिजिटाइज्ड खोज (digitized search) केवल मुख्य शब्द (keyword) भेटबैत; शब्दक ऐतिहासिक अर्थविज्ञान (historical semantics) बदलि सकैत अछि। समान शब्द अलग कालमे अलग अर्थ रखि सकैत। पत्रकारितामे उद्धरण (quote) छोट कएलासँ अर्थ बदलि सकैत अछि। पूरा उत्तर, प्रश्न, स्वर (tone), कालक्रम (chronology), स्रोत-प्रसंग (source context) जाँचब हर्मेन्यूटिक अनुशासन। अनुवादमे शाब्दिक समतुल्यता (literal equivalence) पर्याप्त नहि; पदक दार्शनिक/सांस्कृतिक प्रसंग चाही। मुदा ‘सांस्कृतिक अर्थ’ कहि मूल पाठसँ मनमाना विचलन सेहो नहि। धार्मिक बहसमे पाठीय उद्धरण संस्था/सम्प्रदाय/भाष्य/ऐतिहासिक सन्दर्भ बिना भ्रामक हो सकैत अछि। सार्वजनिक नीति लेल धार्मिक व्याख्या अलग, नागरिक अधिकार/कानूनक साझा कारण अलग। साहित्यिक आलोचनामे पाठक-प्रतिक्रिया वैध स्तर; लेखक-जीवनी, पाठीय संरचना, ऐतिहासिक प्रसंग, प्रकाशन-इतिहास अलग स्तर। आलोचक कुन स्तरपर दावा करैत, स्पष्ट करू। डिजिटल अभिलेखमे अतिसम्पर्क/नेविगेशन (hyperlink/navigation) पाठकक पठन-क्रम (reading order) बदलि सकैत अछि। ‘मूल क्रम’ आ ‘डिजिटल प्रवेश-पथ’ अलग दस्तावेज कएल जाए। शिक्षामे व्याख्या-कौशल लेल विद्यार्थीकेँ केवल ‘अपन मत’ नहि, पाठीय प्रमाण + वैकल्पिक पठन + प्रतिपक्ष + निष्कर्षक सीमा लिखबाक अभ्यास दिअ।
अध्याय-निष्कर्ष
हर्मेन्यूटिक्स पूछैत अछि—बुझब स्वयं कोना सम्भव? उत्तर केवल नियम-सूची नहि; भाषा, इतिहास, परम्परा, पूर्वबोध, प्रश्न, संवाद आ पुनर्परीक्षणक प्रक्रिया अछि। व्याख्यात्मक वृत्त भाग–समग्रक दुष्चक्र नहि, संशोधनक सम्भावना: प्रारम्भिक बोध पाठक परीक्षणमे बदलैत रहैत अछि। पूर्वबोध आवश्यक, पक्षपात अचूक नहि। परम्परा अर्थ खोलि सकैत, आलोचना रोकि नहि सकैत। क्षितिज-संलयन समझ बढ़ा सकैत, भिन्नता मिटा नहि सकैत। व्याख्या बहुल हो सकैत, असीम नहि। भाषा, व्याकरण, विधा, पाठीय संरचना, तिथि, संस्करण, ऐतिहासिक प्रसंग, लेखकक अभिप्राय, प्रतिप्रमाण आ आन्तरिक संगति सीमा दैत अछि। भारतीय मीमांसा/न्याय/भाष्य/शास्त्रार्थ स्वतंत्र परम्परा छथि; आधुनिक हर्मेन्यूटिक्स संग समस्या-संवाद फलदायी, ऐतिहासिक समानता-दाबी अनुचित। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘पहिने बुझू जे पाठ की पूछैत अछि; फेर जाँचू जे हम की मानि पढ़ि रहल छी; भाग–समग्र संवादमे चलू; प्रमाणसँ सीमा राखू; आ नूतन बोध सामने अपन पूर्वबोध बदलू।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• फ्रेडरिक श्लाइअरमाखर — ‘हर्मेन्यूटिक्स आ आलोचना’ (Hermeneutics and Criticism)। • विल्हेल्म डिल्थे — ‘मानव-विज्ञानक परिचय’ (Introduction to the Human Sciences), समझ/ऐतिहासिक ज्ञानक संदर्भ लेल। • मार्टिन हाइडेगर — ‘अस्तित्व आ समय’ (Being and Time), समझ/व्याख्यात्मक वृत्तक अस्तित्वगत रूप लेल। • हांस-जॉर्ग गाडामर — ‘सत्य आ पद्धति’ (Truth and Method)। • हांस-जॉर्ग गाडामर — ‘दार्शनिक हर्मेन्यूटिक्स’ (Philosophical Hermeneutics), चयनित निबन्ध। • पॉल रिकोयर — ‘व्याख्याक सिद्धान्त’ (Interpretation Theory), अगिला अध्यायसभक सेतु लेल। • पॉल रिकोयर — ‘हर्मेन्यूटिक्स आ मानव-विज्ञान’ (Hermeneutics and the Human Sciences)। • ई. डी. हिर्श — ‘व्याख्यामे वैधता’ (Validity in Interpretation), लेखक-अर्थक आलोचनात्मक प्रतिपक्ष लेल। • जुर्गेन हाबर्मास — ‘ज्ञान आ मानवीय हित’ (Knowledge and Human Interests), हर्मेन्यूटिक्स/आलोचनात्मक सिद्धान्तक बहस लेल। • जाक देरिदा — ‘लेखन आ भिन्नता’ (Writing and Difference), समझ/उपस्थिति सम्बन्धी आलोचनात्मक प्रतिपक्ष लेल। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • प्रभाकर परम्पराक मीमांसा-ग्रन्थ, वाक्यार्थ/प्रामाण्यक भिन्न सिद्धान्त लेल। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • बी. के. मतिलाल — ‘शब्द आ जगत’ (The Word and the World)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)। स्थिति-टिप्पणी