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समस्या
हांस-जॉर्ग गाडामर आधुनिक हर्मेन्यूटिक्समे एहन मोड़ दैत छथि जतऽ समझकेँ केवल पाठ-व्याख्याक तकनीक नहि, बल्कि ऐतिहासिक आ भाषिक अस्तित्वक प्रक्रिया मानल जाइत अछि। एहि प्रक्रियामे परम्परा, पूर्वनिर्णय, प्राधिकार, प्रभावकारी इतिहास आ क्षितिज केन्द्रीय बनैत छथि। ज्ञानोदय परम्परागत प्राधिकार आ ‘पूर्वग्रह’क आलोचना करैत विवेकक स्वायत्तता पर बल देलक। गाडामर एहि उपलब्धिकेँ नकारैत नहि, मुदा पूछैत छथि—की मनुष्य वास्तवमे परम्परा, भाषा आ इतिहाससँ बाहर खड़ा भऽ ‘पूर्वग्रह-रहित’ ज्ञान शुरू करि सकैत अछि? यदि हम प्रत्येक पाठ, व्यक्ति वा घटना केँ पहिनेसँ किछु भाषा, अनुभव, प्रश्न आ मान्यताक भीतर सँ पढ़ैत छी, तखन पूर्वबोध समझक बाधा मात्र नहि, आरम्भिक शर्त सेहो बनैत अछि। गाडामरक ‘पूर्वनिर्णय’ (prejudice/Vorurteil) शब्दक अर्थ अन्ध पक्षपात मात्र नहि; बुझबाक आरम्भिक पूर्वधारणा सेहो। हम कोनो पाठ पूर्ण शून्य मनसँ नहि पढ़ैत छी—भाषा, शिक्षा, परम्परा, पूर्व अनुभव, प्रश्न, विधा आ ऐतिहासिक ज्ञान पहिनेसँ सक्रिय रहैत अछि। समस्या पूर्वबोध होयब नहि; समस्या तखन जे पूर्वबोध स्वयं प्रश्नातीत बनि जाए। इसी प्रकार ‘परम्परा’ गाडामर लेल मृत बोझ नहि, समझक ऐतिहासिक माध्यम अछि। परम्परा प्रश्न, शब्दावली, समस्या, मान्यता, अभ्यास आ बौद्धिक दिशा हस्तान्तरित करैत अछि। मुदा परम्परा केवल संरक्षक नहि; ओ कखनो बहिष्कार, पदानुक्रम, मौन आ सत्ता सेहो वहन करि सकैत अछि। तेँ परम्पराक प्रभाव स्वीकारब आ ओकर नैतिक-ज्ञानमीमांसक वैधता स्वीकारब एक बात नहि। गाडामरक प्रसिद्ध ‘प्रभावकारी इतिहास’ (effective history/Wirkungsgeschichte) बतबैत अछि जे अतीत केवल ओ वस्तु नहि जे हम अध्ययन करैत छी; अतीतक प्रभाव हमर वर्तमान प्रश्न, भाषा, संवेदना आ दृष्टिकोणक निर्माणमे सेहो सक्रिय अछि। एहि कारण इतिहासकार वा पाठक पूर्णतः इतिहासक बाहर खड़ा पर्यवेक्षक नहि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—पूर्वनिर्णय आ पूर्वाग्रहक भेद कोना? परम्पराक प्राधिकार कखन वैध, कखन दमनकारी? प्रभावकारी इतिहासक चेतना कोना आत्मसमीक्षा बनैत अछि? क्षितिज-संलयन संवाद अछि की सांस्कृतिक विलयन? समानान्तर दर्शन गाडामरक परम्परा-सकारात्मकताकेँ सत्ता, प्रमाण आ गरिमासँ कोना सीमित करैत अछि?
मूल प्रतिपादन
गाडामर लेल समझ हमेशा पूर्वबोधसहित शुरू होइत अछि; व्याख्याक ई शर्त कमजोरी मात्र नहि, सम्भावना सेहो। पाठक जे किछु पहिनेसँ बुझैत अछि, ओहि आधारपर प्रश्न उठबैत अछि; पाठक प्रतिरोध, नूतन सन्दर्भ आ संवाद एहि प्रारम्भिक बोधकेँ बदलि सकैत अछि। पूर्वनिर्णय (prejudice)क आरम्भिक भूमिका समझक द्वार खोलैत अछि; मुदा ओ वैध तभी जे पाठ, अन्य व्यक्ति, इतिहास आ प्रतिप्रमाण सामने संशोध्य हो। गाडामरक उपयोग अन्ध पूर्वग्रहक औचित्य नहि, बल्कि अपन पूर्वस्थितिक चेतना प्राप्त करबमे अछि। परम्परा समझक पृष्ठभूमि प्रदान करैत अछि, परन्तु अचूक प्राधिकार नहि। परम्पराकेँ समझब, प्रश्न करब, पुनःअपनब, बदलिब आ कखनो अस्वीकारब—ई सभ एकहि ऐतिहासिक प्रक्रियाक भाग हो सकैत अछि। प्रभावकारी इतिहासक चेतना कहैत अछि—हम जे इतिहास पढ़ैत छी, ओ इतिहास हमर पढ़बाक तरीका पर पहिनेसँ प्रभाव डालि रहल अछि। पूर्ण आत्म-पारदर्शिता असम्भव हो सकैत अछि, मुदा आत्मसमीक्षा अनिवार्य अछि। क्षितिज (horizon) स्थितिगत अर्थ-क्षेत्रक रूपक अछि। क्षितिज सीमा दैत अछि, मुदा गतिशील सेहो अछि। क्षितिज-संलयन (fusion of horizons) भिन्न ऐतिहासिक स्थितिसभक संपूर्ण विलयन नहि, बल्कि संवादद्वारा नूतन बोधक उद्भव अछि। समानान्तर सूत्र—‘परम्परा सुनू, परम्पराक प्राधिकार जाँचू; पूर्वबोध स्वीकारू, पूर्वग्रहक परीक्षा करू; क्षितिज खोलू, भिन्नताकेँ विलीन नहि करू।’
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—गाडामर ‘पूर्वग्रह-विरुद्ध पूर्वग्रह’क आलोचना करैत छथि। पूर्वनिर्णय बिना प्रश्न उठब कठिन; समझ सदा किछु आरम्भिक अपेक्षा लऽ कऽ चलैत अछि। आधुनिक आलोचनात्मक विवेकक लक्ष्य शून्य पूर्वधारणा नहि, बल्कि संशोध्य पूर्वधारणा होयबाक चाही। दोसर तर्क—पूर्वनिर्णयक सकारात्मक भूमिका ओकर अचूकता नहि। समझक प्रक्रियामे आरम्भिक धारणा उजागर, प्रश्नित आ संशोधित होइत अछि। एही कारण गाडामरक पूर्वनिर्णय केँ ‘हर पक्षपात सही’ कहब हुनकर परियोजनाक विकृति होयत। तेसर तर्क—परम्परा ज्ञानक एक वैध स्रोत हो सकैत अछि किएक तँ भाषा, अवधारणा, अभ्यास, उदाहरण आ प्रश्न पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होइत अछि। मुदा परम्पराक उमेर स्वतः सत्यता सिद्ध नहि करैत। दीर्घ परम्परा गलत विश्वास सेहो बचा सकैत अछि। चारिम तर्क—प्राधिकार (authority)क वैधता पद, जन्म, प्रतिष्ठा वा बल मात्र नहि। गाडामरक फलदायी पठनमे प्राधिकार एहन मान्यता हो सकैत अछि जे दोसर व्यक्ति वा परम्पराक ज्ञान हमरापेक्षा अधिक हो सकैत अछि। समानान्तर दर्शन जोड़ैत अछि जे एहि मान्यताकेँ कारण, प्रमाण, आलोचना आ अपीलसँ अलग नहि राखल जाए। पाँचम तर्क—प्रभावकारी इतिहास बतबैत अछि जे हम इतिहासक बाहर खड़ा निरीक्षक नहि। भाषा, पाठ्यक्रम, राष्ट्रीय कथा, पारिवारिक स्मृति, धर्म, अकादमिक परम्परा, संस्थागत कैनन आ सार्वजनिक स्मृति हमर प्रश्न बनबैत अछि। हम जे पूछैत छी, ओ स्वयं ऐतिहासिक प्रभावक परिणाम हो सकैत अछि। छठम तर्क—प्रभावकारी इतिहासक चेतना पूर्ण आत्मज्ञानक दावा नहि; उलटे सीमा-बोध। हम अपन सभ पूर्वनिर्णय पूर्णतः सूचीबद्ध नहि करि सकैत छी, मुदा प्रतिपक्ष, तुलनात्मक स्रोत, बहुभाषिक पठन, अन्य समुदाय आ नूतन प्रमाणद्वारा किछु उजागर करि सकैत छी। सातम तर्क—क्षितिज स्थितिगत दृष्टिक रूपक अछि। ऐतिहासिक क्षितिजकेँ केवल ‘पुरान लोक एना सोचैत छल’ कहि बन्द पेटी नहि बनाओल जाए। पाठक आजुक प्रश्न आ अतीतक सम्भावित प्रश्न बीच दूरी जाँचैत अछि। आठम तर्क—क्षितिज-संलयन दू स्थिर संस्कृतिक रासायनिक मिश्रण नहि; समझक प्रक्रियामे अपन सीमाकेँ विस्तृत करब, अजनबी प्रश्नकेँ अपन प्रश्नसँ संवादमे लाबब, आ कखनो अपन शब्दावली बदलिब अछि। नवम तर्क—क्षितिज-संलयनक आलोचनात्मक सीमा आवश्यक: शक्तिशाली पाठक कमजोर परम्पराक आवाजकेँ ‘संलयन’ नामपर निगलि सकैत अछि। समानान्तर दर्शन स्रोत-भाषा, असहमति, सत्ता-संबंध, सांस्कृतिक दूरी आ प्रतिरोध सुरक्षित राखैत अछि। दसम तर्क—प्रश्न–उत्तर संरचना व्याख्याकेँ गहिर करैत अछि। पाठक दावा बुझबाक पहिने पूछू—लेखक कोन समस्या, प्रतिपक्ष, संस्था वा ऐतिहासिक परिस्थिति सामने लिखि रहल छलाह? उत्तरकेँ मूल प्रश्नसँ काटि देलासँ अर्थ बदलि सकैत अछि। एगारहम तर्क—वर्तमान प्रश्न वैध अछि; मुदा अतीतक पाठकेँ वर्तमान प्रश्नक सीधा उत्तर बनाओल जाए तऽ काल-विस्थापन हो सकैत अछि। पहिने मूल प्रश्न पुनर्निर्मित करू, तखन वर्तमान संवाद स्पष्ट रूपेँ अलग चरणमे करू।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप ज्ञानोदयवादी अछि—परम्परा आ पूर्वनिर्णयक सकारात्मकता अन्धविश्वास, रूढ़ि आ अधिकार-पूजा केँ पुनःवैध बना सकैत अछि। यदि मनुष्य परम्परासँ बाहर नहि जा सकैत, तखन परम्पराक विरुद्ध क्रान्तिकारी आलोचना कोना सम्भव? दोसर पूर्वपक्ष हाबर्मासीय अछि—समझक संवाद तभी मुक्त कहल जाए जखन सत्ता, विचारधारा, आर्थिक निर्भरता, लिंगगत असमानता, जातिगत पदानुक्रम आ संस्थागत दबावक विकृति पहिचानल जाए। परम्परा स्वयं विकृत संवाद हो सकैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष लेखक-केंद्रित अछि—क्षितिज-संलयन वर्तमान पाठकक अर्थकेँ मूल लेखकक ऐतिहासिक अर्थपर हावी करा सकैत अछि। यदि प्रत्येक युग अपना प्रश्नसँ पाठ पढ़त, तखन लेखकक अभिप्राय कतेक बचत? चारिम पूर्वपक्ष विखण्डनवादी अछि—‘संलयन’ भाषा भीतर अपूर्णता, असहमति, मौन, बहिष्कार आ अर्थक अस्थिरताकेँ कृत्रिम समन्वयमे बदलि देबाक जोखिम रखैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय तुलना सँ अछि—गुरु-परम्परा, श्रुति-प्राधिकार, भाष्य-परम्परा वा शास्त्रार्थकेँ गाडामरक परम्परा/प्राधिकार (tradition/authority) संग सीधा समान करब ऐतिहासिक समानीकरण होयत।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—पूर्वनिर्णयक अपरिहार्यता = पूर्वनिर्णयक वैधता नहि। गाडामरक उपयोग तभी जब संशोधन, आलोचना आ प्रतिप्रमाण खुलल रहय। समानान्तर दर्शन अन्ध परम्परा नहि, ऐतिहासिक आत्मसमीक्षा स्वीकारैत अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—समानान्तर दर्शन गाडामरमे सत्ता-समीक्षा जोड़ैत अछि: ककर परम्परा? ककर आवाज दबायल? के व्याख्या-प्राधिकार पबैत? ज्ञान-संस्थामे प्रवेश ककरा? वैकल्पिक स्रोत आ अपील कहाँ? तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—ऐतिहासिक पुनर्निर्माणमे लेखकक प्रश्न आ अभिप्राय स्वतंत्र चरण हो। वर्तमान प्रयोग बादमे स्पष्ट रूपेँ अलग लिखल जाए। लेखकक अर्थ अंतिम अर्थ नहियो हो, ताहि कारण ओकर ऐतिहासिक अर्थ अप्रासंगिक नहि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—संवादक लक्ष्य सहमति मात्र नहि, स्पष्ट भिन्नता सेहो हो सकैत अछि। ‘हम असहमत छी, मुदा आब ठीक-ठीक बुझैत छी जे असहमति कतऽ अछि’ सफल हर्मेन्यूटिक परिणाम अछि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय परम्परा स्वतंत्र इतिहास, पद, लक्ष्य आ तर्कसहित पढ़ल जाए। तुलना समस्या-स्तरपर; ऐतिहासिक प्रभाव केवल प्रमाणसँ।
भारतीय संवाद
मीमांसा परम्परा पाठीय प्राधिकार, विधि, तात्पर्य, प्रसंग, विरोध-समाधान आ वाक्यार्थक कठोर नियम दैत अछि। गाडामरक परम्परा-विचार संग संवाद सम्भव, मुदा वैदिक प्रामाण्यक सिद्धान्त अलग दार्शनिक परियोजना अछि। न्याय शब्दप्रमाणमे आप्त, वक्ता, वाक्य, अर्थ आ ज्ञानोत्पत्तिक प्रश्न उठबैत अछि। ‘प्राधिकार किएक मानू?’ प्रश्न पर न्याय अधिक स्पष्ट प्रमाणात्मक दबाव दैत अछि—केवल परम्परागत मान्यता पर्याप्त नहि। नव्य-न्याय परम्परा तकनीकी शब्दावली पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित करैत, साथे पूर्वगामी मतक संशोधन/खंडन करैत अछि। एहि अर्थमे परम्परा स्थिर पुनरावृत्ति नहि, आलोचनात्मक निरन्तरता सेहो हो सकैत अछि। शास्त्रार्थक पूर्वपक्ष–उत्तरपक्ष दिखबैत अछि जे परम्परा भीतर असहमति संस्थागत हो सकैत अछि। जीवित परम्पराक एक कसौटी ई हो सकैत अछि जे प्रतिपक्ष व्यक्त करबाक स्थान बचल अछि की नहि। बौद्ध आ जैन भाष्य-परम्परा पुनर्व्याख्या, पद-परिभाषा आ सम्प्रदायगत मतभेदक अनेक उदाहरण दैत अछि। एहि विविधताकेँ एक ‘भारतीय क्षितिज’मे समेटब गलत। भारतीय गुरु-शिष्य परम्परामे प्राधिकारक सकारात्मक आ नकारात्मक दुनू सम्भावना ऐतिहासिक रूपेँ जाँचबाक चाही—ज्ञान-संरक्षण आ सूक्ष्म प्रशिक्षणक संग बहिष्कार, सामाजिक असमान पहुँच वा प्रश्न-निरोधक सम्भावना सेहो। भारतीय संवादक निष्कर्ष—परम्परा ज्ञानक वाहक हो सकैत अछि; परम्परा स्वयं प्रमाण नहि। शास्त्रार्थ, भाष्य, प्रतिपक्ष आ पुनर्व्याख्या परम्पराक आत्मसमीक्षात्मक शक्ति देखबैत अछि।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक बौद्धिक परम्परामे नव्य-न्याय, मीमांसा, स्मृति, पंजी, ज्योतिष, साहित्य, लोकपरम्परा, स्त्री-गीत, आधुनिक पत्रिका, विश्वविद्यालयीय अध्ययन आ डिजिटल प्रकाशन अलग हस्तान्तरण-रेखा बनबैत छथि। ‘एक मिथिला परम्परा’ कहब अति-सामान्यीकरण होयत। पंजी आ शाखा-पुस्तक परम्परा प्रभावकारी इतिहासक उदाहरण दे सकैत अछि—अतीतक वर्गीकरण वर्तमान सामाजिक स्मृति आ पहिचान पर असर डालि सकैत। मुदा दस्तावेजक सामाजिक प्रभाव ओकर सभ ऐतिहासिक दाबी सत्य सिद्ध नहि करैत। तिथि, प्रतिलिपि, अन्तःक्षेप, प्रयोजन आ स्वतंत्र पुष्टि जाँचल जाए। मैथिली भाषाक मानकीकरण परम्परा आ वर्तमान प्रयोगक संवाद अछि। पुरान शब्दावली, व्याकरण आ साहित्य महत्वपूर्ण; वर्तमान वक्ताक जीवित प्रयोग सेहो। कार्यगत मानक उपयोगी हो, मुदा क्षेत्रीय रूपकेँ हीन/अशुद्ध घोषित करब उचित नहि। डिजिटल अभिलेख परम्पराक नूतन रूप अछि—पुरान पाठ खोजयोग्य, सम्पर्कयोग्य आ पुनरुत्पाद्य बनैत अछि। मुदा खोज-क्रमांकन वा अन्तरफलक स्वतः मान्यताप्राप्त प्राधिकार नहि। लोकगीत आ मौखिक परम्पराक प्रभाव वर्तमान आत्मबोध बनबैत अछि। ओकर सत्यता केवल शाब्दिक घटना-वर्णनमे नहि; सामाजिक स्मृति, भाव, श्रम, अनुष्ठान, लिंगगत अनुभव आ सामुदायिक अर्थमे सेहो। विशिष्ट ऐतिहासिक दाबी लेल अतिरिक्त पुष्टि चाही। मिथिलाक गौरव-कथा प्रभावकारी इतिहासक हिस्सा हो सकैत अछि। समानान्तर दर्शन पूछैत अछि—ई कथा कखन बनल? कोन स्रोतपर? ककरा केन्द्र/हाशिया बनबैत? वर्तमान शिक्षा/पहिचान पर की प्रभाव? गौरव प्रमाणक स्थान नहि लैत। समानान्तर सूत्र—‘परम्परा सँ बाहर नहि, परम्पराक भीतर कैद नहि; स्रोतक उत्तराधिकारी बनू, स्रोतक प्रहरी नहि; जे भेटल से ग्रहण करू, जे असत्य से संशोधित करू।’ आत्मसमीक्षा—समानान्तर दर्शन स्वयं यदि विदेह वा मिथिला संदर्भक कारण प्राधिकार पाबि जाए, तखन पाठककेँ ओकरो प्रतिपादन स्वतंत्र प्रमाणसँ जाँचबाक अधिकार रहत। परम्परा बनि जेबाक क्षणसँ आत्मसमीक्षा अधिक, कम नहि होयबाक चाही।
समकालीन प्रयोग
संवैधानिक आ कानूनी व्याख्यामे मूल ऐतिहासिक अर्थ, पूर्वनिर्णय, संवैधानिक परम्परा, वर्तमान अधिकार आ संस्थागत व्यवहार परस्पर तनावमे रहैत। समानान्तर नियम—ऐतिहासिक अर्थ आ वर्तमान अनुप्रयोग अलग चरणमे स्पष्ट करू। कृत्रिम बुद्धि (AI) प्रणाली प्रशिक्षण-पाठ-संग्रहक परम्परा यन्त्ररूपेँ विरासतमे लैत अछि—जे पाठ अधिक, जे वर्गीकरण प्रचलित, जे भाषा संसाधन-समृद्ध, ओ उत्तरक सम्भावना प्रभावित करैत अछि। पाठ-संग्रह-पूर्वाग्रह नियति नहि; लेखापरीक्षण, नूतन स्रोत, प्रतिस्रोत आ मानवीय समीक्षा द्वारा संशोधन सम्भव। शिक्षामे पाठ्यपुस्तक-परम्परा विद्यार्थी केर प्रश्नक क्षितिज बनबैत अछि। पाठ्यक्रम-विविधीकरण केवल नूतन सामग्री जोड़ब नहि; पुरान रूपांकन, मौन, अनुपस्थिति आ मूल्यांकन-मानक सेहो जाँचू। समाचार आ इतिहासमे बारम्बार एकहि रूपांकन प्रभावकारी इतिहास बनि सकैत अछि। एक घटना लगातार एक शब्दावलीमे वर्णित भेला पर भविष्यक पाठक ओही भाषा सँ सोचि सकैत अछि। शब्दावलीक इतिहास तथ्य-जाँचक पूरक अछि। धार्मिक आ सांस्कृतिक परम्परामे ‘हमेशा एना छल’ दाबी अभिलेखीय जाँच माँगैत अछि। परम्परा बदलैत, पुनर्गठित होइत, चयनित रूपेँ स्मरण होइत आ कखनो नवीन रूपकेँ प्राचीन बतबैत अछि। परिवार वा समुदाय स्मृतिमे पीढ़ी-दर-पीढ़ी कथा पहिचान बनबैत अछि। स्मृतिरूपेँ ओकर सामाजिक सत्य एक स्तर; घटना-विवरणक ऐतिहासिक सत्य अलग स्तर। दुनूकेँ मिलाउ नहि। विश्वविद्यालयीय कैनन पुरान प्राधिकार पुनरुत्पादित करि सकैत अछि। नूतन पाठ आ उपेक्षित लेखक जोड़ब योग्य, मुदा विद्वत्तापरक मानक पारदर्शी रहय; केवल पुरान प्रतिष्ठा अथवा केवल हाशियागत स्थिति साहित्यिक/दार्शनिक गुणवत्ता स्वतः सिद्ध नहि करैत। डिजिटल खोज-कलनविधि आ स्वतःपूर्णता लोकप्रिय भाषा/पूर्वाग्रह पुनरावृत्त करि सकैत अछि। उपयोगकर्ता-दृश्य क्रमांकन सत्य वा महत्त्वक अंतिम सूचक नहि। समकालीन समानान्तर प्रश्न-पद्धति: हम कोन परम्परा भीतर सँ सोचि रहल छी? हमरा ई प्रश्न कोन इतिहास देलक? कोन आवाज अनुपस्थित? कोन प्राधिकार हम स्वतः मानि रहल छी? प्रतिप्रमाण भेटला पर हम अपन क्षितिज बदलि सकैत छी की नहि?
अध्याय-निष्कर्ष
गाडामरक दार्शनिक हर्मेन्यूटिक्स समझकेँ इतिहास, परम्परा आ पूर्वबोधसँ बाहर शून्य क्रिया नहि मानैत। हम जे भाषा, प्रश्न आ मान्यतासँ पढ़ैत छी, ओ स्वयं ऐतिहासिक प्रभावक भाग अछि। पूर्वनिर्णय समझक आरम्भिक शर्त अछि; हर पूर्वग्रह सही नहि। परम्परा ज्ञानक वाहक अछि; हर परम्परा वैध नहि। प्राधिकार ज्ञान/अनुभवक मान्यता हो सकैत अछि; पद वा बल स्वतः सत्य नहि। प्रभावकारी इतिहास आत्मसमीक्षाक आग्रह दैत अछि—अतीत हमर प्रश्न बनबैत अछि, ताहि कारण हम अपन ऐतिहासिक स्थितिसँ पूर्णतः बाहर नहि जा सकैत छी। सीमा-बोध निष्क्रियता नहि; अधिक जिम्मेदार व्याख्याकेँ सम्भव बनबैत अछि। क्षितिज-संलयन संवादक रूपक अछि; भिन्नता मिटाबयब नहि। सफल समझ सहमति मात्र नहि, स्पष्ट असहमति सेहो हो सकैत अछि। समानान्तर दर्शन गाडामरक परम्परा-संवेदनशीलतामे सत्ता-समीक्षा, प्रमाण, गरिमा, वैकल्पिक स्रोत आ संशोध्यता जोड़ैत अछि। परम्परा न अन्ध शत्रु, न अन्ध गुरु—ऐतिहासिक संवाद-सहचर अछि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘परम्परा हमर आरम्भ हो सकैत अछि, अन्तिम न्यायाधीश नहि; पूर्वबोध हमर द्वार हो सकैत अछि, कारागार नहि; संवाद क्षितिज बढ़ाउ, भिन्नता नहि मिटाउ।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• हांस-जॉर्ग गाडामर — ‘सत्य आ पद्धति’ (Truth and Method)। • हांस-जॉर्ग गाडामर — ‘दार्शनिक हर्मेन्यूटिक्स’ (Philosophical Hermeneutics)। • हांस-जॉर्ग गाडामर — ‘विज्ञानक युगमे विवेक’ (Reason in the Age of Science)। • मार्टिन हाइडेगर — ‘अस्तित्व आ समय’ (Being and Time)। • जुर्गेन हाबर्मास — ‘हर्मेन्यूटिक सार्वभौमिकताक दावा’ (The Hermeneutic Claim to Universality)। • पॉल रिकोयर — ‘हर्मेन्यूटिक्स आ मानव-विज्ञान’ (Hermeneutics and the Human Sciences)। • ई. डी. हिर्श — ‘व्याख्यामे वैधता’ (Validity in Interpretation)। • जाक देरिदा — गाडामर संग संवाद/असहमति सम्बन्धी लेख। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • बी. के. मतिलाल — ‘शब्द आ जगत’ (The Word and the World)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।