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समस्या
लेखक जे अर्थ लिखबाक समय चाहैत छलाह, की पाठक अर्थ सदा ओही धरि सीमित रहत? अथवा पाठ एक बेर सार्वजनिक भेला बाद पाठक अपन ऐतिहासिक अनुभव, भाषा, प्रश्न आ सांस्कृतिक क्षितिजक आधारपर नूतन अर्थ गढ़ि सकैत अछि? आधुनिक साहित्य-सिद्धान्त, हर्मेन्यूटिक्स, भाषादर्शन आ इतिहासलेखनमे ई विवाद केवल साहित्यिक रुचिक प्रश्न नहि; ई प्रमाण, अर्थ, उत्तरदायित्व आ व्याख्याक सीमा सम्बन्धी मूल दार्शनिक समस्या अछि। ‘लेखकक अभिप्राय’ सेहो एकरूप नहि। लेखक की करबाक चाहैत छलाह, की कहबाक चाहैत छलाह, पाठकसँ की प्रतिक्रिया चाहैत छलाह, बादमे अपन रचनाक विषयमे की कहलनि—ई चारू एक समान नहि। अभिप्राय मानसिक अवस्था, संप्रेषणात्मक लक्ष्य, विधागत चुनाव, राजनीतिक उद्देश्य अथवा पश्चात् आत्मव्याख्या भऽ सकैत अछि। ‘पाठकक अर्थ’ सेहो एकटा निजी अनुभूति मात्र नहि। पाठक भाषा-समुदाय, विधा, शिक्षा, इतिहास, परम्परा, संस्थागत पठन-पद्धति आ सामूहिक स्मृतिक भीतर पढ़ैत अछि। तेँ पाठकक अर्थ व्यक्तिगत होइतहुँ सामाजिक नियम आ साझा भाषासँ प्रभावित रहैत अछि। बीसम शताब्दीमे लेखक-केंद्रित पठनक आलोचना अनेक रूपमे भेल। विम्सैट आ बिअर्ड्सलीक ‘अभिप्रायगत भ्रान्ति’ (intentional fallacy) बाहरी लेखक-अभिप्रायकेँ काव्य-मूल्य वा अर्थक अंतिम कसौटी मानबाक विरुद्ध चेतावनी देलक। रोलाँ बार्थक ‘लेखकक मृत्यु’ लेखकक सार्वभौम अर्थ-अधिकार पर प्रश्न उठबैत अछि। मुदा एहि आलोचनासभकेँ ‘लेखक अप्रासंगिक अछि’ कहि सरल बना देब गलत होयत। दोसरी दिस ई. डी. हिर्श लेखक-नियत अर्थक पुनर्निर्माण बिना व्याख्यात्मक वैधता अस्थिर भऽ जाएत, ई तर्क दैत छथि। क्वेन्टिन स्किनर ऐतिहासिक विचारक पाठ पढ़ैत काल भाषिक-राजनीतिक प्रसंग आ लेखकक कृत्यगत अभिप्राय पर बल दैत छथि। रिकोयर पाठक स्वायत्तता स्वीकारैत छथि, मुदा पाठीय संरचना आ व्याख्यात्मक अनुशासन नहि छोड़ैत। एहि अध्यायक मूल समस्या तेँ ‘लेखक वा पाठक’ बीच चुनाव नहि। प्रश्न अछि—लेखकक ऐतिहासिक अभिप्राय, पाठक भाषिक संरचना, विधा, पाठक-समुदाय, ग्रहण-इतिहास आ वर्तमान महत्त्वकेँ अलग-अलग स्तरपर कोना जाँचल जाए, ताकि न लेखक-पूजा हो, न अर्थ-अराजकता।
मूल प्रतिपादन
समानान्तर दर्शनक मूल प्रतिपादन ई अछि: लेखकक अभिप्राय अर्थक महत्वपूर्ण प्रमाण अछि, परमाधिकार नहि; पाठकक अर्थ व्याख्यात्मक सम्भावना अछि, प्रमाणविहीन स्वच्छन्दता नहि। पाठ लेखक आ पाठक बीच सार्वजनिक मध्यस्थ संरचना अछि। अर्थक कम-से-कम पाँच स्तर अलग राखल जाए: (1) ऐतिहासिक लेखक-अभिप्राय, (2) पाठीय/भाषिक अर्थ, (3) विधा आ परम्परागत संकेत, (4) ग्रहण-इतिहासमे पाठकक अर्थ, आ (5) वर्तमान महत्त्व वा अनुप्रयोग। एहि स्तरसभकेँ मिलाएब भ्रम उत्पन्न करैत अछि। लेखकक ऐतिहासिक अर्थ पुनर्निर्मित करबाक लेल पत्र, प्रस्तावना, प्रारूप, समकालीन शब्दावली, प्रकाशन-सन्दर्भ, संशोधन, समकालीन प्रतिक्रिया आ तुलनात्मक रचना उपयोगी प्रमाण हो सकैत अछि। मुदा लेखकक बादक आत्मव्याख्या सेहो त्रुटिहीन नहि। पाठीय अर्थ लेखकक मानसक निजी प्रतिलिपि नहि। एक बेर भाषा सार्वजनिक रूप लैत अछि, शब्द, वाक्य, रूपक, कथानक, विधा आ अन्तर्पाठीय सम्बन्ध पाठक जाँच योग्य होइत अछि। लेखक जे लिखलनि, ओ लेखक जे सोचलनि तकर पूर्ण समानता मानि नहि सकैत छी। पाठकक सक्रियता आवश्यक, मुदा पाठक सर्वशक्तिमान नहि। व्याकरण, शब्दार्थ, पाठीय संगति, विधा, ऐतिहासिक प्रसंग, संस्करण, स्रोत, प्रतिपक्ष आ पाठक प्रतिरोध व्याख्याक सीमा बनबैत अछि। समानान्तर सूत्र—‘लेखककेँ सुनू, लेखकमे पाठकेँ कैद नहि करू; पाठककेँ स्थान दिअ, पाठकक इच्छाकेँ प्रमाण नहि मानू; अर्थक स्तर अलग करू, तखन संवाद जोड़ू।’
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—अभिप्रायक प्रत्यक्ष पहुँच सामान्यतः नहि होइत। हम लेखकक मानस सीधे नहि देखैत छी; पत्र, प्रारूप, वक्तव्य, सन्दर्भ आ पाठद्वारा अनुमान करैत छी। अतः ‘लेखक निश्चित रूपेँ ई चाहैत छलाह’ स्वयं प्रमाणाधारित ऐतिहासिक दावा अछि। दोसर तर्क—लेखकक निजी अभिप्राय आ सार्वजनिक भाषिक अर्थ अलग भऽ सकैत अछि। लेखक कोनो शब्द गलत अर्थमे प्रयोग करि सकैत छथि, अनजाने विरोधाभास लिखि सकैत छथि, अथवा रचना एहन अर्थ-संरचना बना सकैत अछि जे लेखक स्वयं पूर्णतः स्पष्ट नहि कएने होथि। तेसर तर्क—विम्सैट आ बिअर्ड्सलीक अभिप्रायगत भ्रान्तिक चेतावनी विशेषतः एहि बातपर केन्द्रित अछि जे रचनाक मूल्य/अर्थक निर्णय केवल लेखकक बाहरी कथनसँ नहि हो। पाठक भीतरक प्रमाण, भाषा आ संरचना स्वतंत्र रूपेँ जाँचल जाए। चारिम तर्क—एहि चेतावनीसँ लेखकत्व, तिथि, प्रसंग वा संप्रेषणात्मक लक्ष्य अप्रासंगिक नहि बनैत। ऐतिहासिक शोधमे लेखकक उद्देश्य आ उपलब्ध भाषिक विकल्प जानब अर्थनिर्धारणमे अत्यन्त उपयोगी हो सकैत अछि। पाँचम तर्क—हिर्शक ‘अर्थ’ (meaning) आ ‘महत्त्व’ (significance)क भेद उपयोगी अछि। लेखकक ऐतिहासिक अर्थ अपेक्षाकृत स्थिर लक्ष्य हो सकैत अछि, जबकि बादक समाजमे ओहि पाठक महत्त्व बदलि सकैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि भेदकेँ कठोर द्वैत नहि, कार्यगत अनुशासन मानैत अछि। छठम तर्क—बार्थक ‘लेखकक मृत्यु’ केँ लेखकक जैविक अथवा ऐतिहासिक नाश नहि बुझू। ई आलोचनात्मक हस्तक्षेप लेखककेँ अर्थक एकमात्र स्रोत बनायब विरुद्ध अछि; भाषा, उद्धरण, सांस्कृतिक संकेत आ पाठक भूमिका पर बल दैत अछि। सातम तर्क—फूकोक ‘लेखक-कार्य’ (author-function) बतबैत अछि जे ‘लेखक’ केवल व्यक्ति नहि, वर्गीकरणक संस्थागत साधन सेहो हो सकैत अछि। एक नाम ग्रन्थसमूह, प्रामाणिकता, स्वामित्व, प्रतिष्ठा आ अनुशासनक सीमासँ जुड़ि सकैत अछि। आठम तर्क—स्टैनली फिशक व्याख्यात्मक समुदाय (interpretive communities) पाठककेँ अकेला सार्वभौम व्यक्ति मानबाक विरुद्ध महत्त्वपूर्ण चुनौती अछि। पाठक जे अर्थ ‘देखैत’ अछि, ओ प्रशिक्षण, विधागत अपेक्षा आ सामुदायिक पठन-नियमसँ निर्मित हो सकैत अछि। नवम तर्क—व्याख्यात्मक समुदायक अस्तित्वसँ सभ समुदाय बराबर सही नहि होइत। किछु पठन पाठीय प्रमाण, ऐतिहासिक तथ्य, भाषिक प्रयोग आ प्रतिप्रमाण सामने अधिक सबल हो सकैत अछि। बहुलता सत्य-मूल्यांकन समाप्त नहि करैत। दसम तर्क—उम्बेर्तो एकोक ‘व्याख्याक सीमा’क आग्रह महत्त्वपूर्ण अछि: पाठ बहु-पठनक अनुमति दे सकैत अछि, मुदा प्रत्येक कल्पना पाठक व्याख्या नहि। अतिव्याख्या (overinterpretation) तखन जे पाठीय संकेतसँ बहुत दूर निष्कर्ष थोपल जाए। एगारहम तर्क—स्किनरक ऐतिहासिक पद्धति स्मरण करब जरूरी: कोनो राजनीतिक/दार्शनिक वाक्य बुझबाक लेल लेखक उपलब्ध भाषिक परम्परामे की कृत्य करि रहल छलाह—समर्थन, खण्डन, व्यंग्य, पुनर्परिभाषा, हस्तक्षेप—ई जाँचू। केवल आधुनिक शब्दार्थ पर्याप्त नहि।
पूर्वपक्ष
पहिल पूर्वपक्ष कठोर अभिप्रायवादी अछि—यदि लेखकक अर्थ अंतिम कसौटी नहि, तखन व्याख्यात्मक वैधता कोना? भाषा आखिरकार कोनो वक्ता द्वारा उद्देश्यपूर्वक उपयोग होइत अछि; अभिप्राय हटला पर अर्थ अनिश्चित होयत। दोसर पूर्वपक्ष कठोर पाठ-केंद्रित अछि—लेखकक मानस निजी/अप्राप्य; केवल प्रकाशित पाठ सार्वजनिक वस्तु अछि। बाहरी जीवनी/पत्र/डायरी अर्थमे घुसब अनावश्यक। तेसर पूर्वपक्ष पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टिसँ अछि—अर्थ पढ़बाक घटनामे उत्पन्न होइत अछि; लेखकक ऐतिहासिक इरादा वर्तमान पाठक अनुभव पर शासन किएक करत? चारिम पूर्वपक्ष उत्तर-संरचनावादी अछि—भाषा लेखकक नियन्त्रणसँ पहिनेसँ अधिक व्यापक; लेखक स्वयं भाषिक भेद/उद्धरण/परम्पराक भीतर लिखैत अछि। ‘मूल अभिप्राय’ स्थिर केन्द्र बनबैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष इतिहासकारक अछि—यदि वर्तमान पाठक अर्थक समान प्रतिष्ठा देल जाए, तखन काल-विस्थापन आ अनैतिहासिक अधिग्रहण (appropriation) बढ़त। छठम पूर्वपक्ष नैतिक अछि—लेखकक घोषित ‘इरादा’ हानिकारक सार्वजनिक अर्थ वा प्रभावसँ बचबाक बहाना बनि सकैत अछि। सातम पूर्वपक्ष भारतीय तुलना सँ अछि—तात्पर्य, ध्वनि, रस, वाक्यार्थ, व्यञ्जना वा भाष्य-परम्पराकेँ आधुनिक अभिप्रायवाद/पाठक-प्रतिक्रिया बहस (intentionalism/reader-response debate) संग सीधा एक मानब ऐतिहासिक भ्रम होयत।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—लेखक-अभिप्रायकेँ हटाओल नहि जा रहल; ओकरा प्रमाणक एक महत्त्वपूर्ण श्रेणी बनाओल जा रहल अछि। परमाधिकार हटब = अप्रासंगिकता नहि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—केवल पाठ-केंद्रित पद्धति कखनो पर्याप्त, कखनो नहि। व्यंग्य, प्रसंगविशेष शब्द, राजनीतिक संकेत, संस्करण-इतिहास वा लेखकत्व-विवादमे बाहरी प्रमाण अनिवार्य भऽ सकैत अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—पाठक अनुभव वास्तविक आ अध्ययनयोग्य, मुदा ‘हम एना पढ़ैत छी’ सँ ‘पाठ ऐतिहासिक रूपेँ एही अर्थमे लिखल गेल’ निष्कर्ष नहि निकलैत। ग्रहण-इतिहास आ ऐतिहासिक अर्थ अलग राखू। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—भाषा लेखकसँ व्यापक अछि, मुदा लेखक भाषिक विकल्प भीतर कृत्य करैत छथि। संरचना आ अभिप्राय प्रतिस्पर्धी नहि; विश्लेषणक अलग स्तर। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—वर्तमान पुनर्पाठ वैध, यदि स्वयंकेँ वर्तमान पुनर्पाठ रूपमे चिह्नित करय। अतीतपर वर्तमान श्रेणी चुपचाप आरोपित करब टारू। छठम पूर्वपक्षक उत्तर—नैतिक मूल्यांकनमे अभिप्राय, क्रिया, पूर्वानुमेय परिणाम, वास्तविक परिणाम, सत्ता-संबंध आ सुधारक उत्तरदायित्व अलग-अलग जाँचू। अभिप्राय न पूर्ण बचाव, न पूर्णतः अप्रासंगिक। सातम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय सिद्धान्तकेँ स्वतंत्र इतिहास/पदावलीमे पढ़ू। तुलनात्मक संवाद समस्या-स्तरपर राखू; ‘पूर्वरूप’ वा ऐतिहासिक प्रभाव केवल स्पष्ट प्रमाणसँ।
भारतीय संवाद
मीमांसा वाक्यार्थ, तात्पर्य, विधि, प्रसंग आ पाठीय संगतिक प्रश्नपर समृद्ध पद्धति विकसित करैत अछि। ‘वक्ता की चाहैत छल?’ प्रश्न ओतऽ आधुनिक व्यक्तिगत लेखक-अभिप्रायसँ भिन्न धार्मिक/शास्त्रीय प्रामाण्य-सन्दर्भमे उठैत अछि; तेँ सीधा समानीकरण अनुचित। न्याय शब्दप्रमाण वक्ता, वाक्य, अर्थ, अभिप्राय आ विश्वसनीयताक सम्बन्धपर विचार करैत अछि। विशेषतः लौकिक वाक्यमे वक्ताक तात्पर्य बुझब महत्त्वपूर्ण, मुदा ज्ञानक वैधता लेल अन्य कसौटी सेहो आवश्यक। भर्तृहरिक भाषा-दृष्टि शब्दक अर्थकेँ व्यापक वाक्य/प्रयोग/भाषिक समग्रतासँ जोड़ैत अछि। ई लेखकक निजी मानसक बाहरी भाषिक संरचना पर ध्यान देबाक उपयोगी संवाद-बिन्दु अछि, ऐतिहासिक समानता नहि। आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्त बतबैत अछि जे साहित्यिक अर्थ अभिधेय कथनसँ अधिक हो सकैत अछि। व्यञ्जित अर्थ लेखकक ‘एक वाक्य मे कहल इरादा’मे समेटायल नहि; पाठीय काव्य-संरचना, सहृदयक योग्यता आ सांस्कृतिक संकेत सक्रिय रहैत अछि। अभिनवगुप्तक रस-व्याख्यामे पाठक/दर्शकक अनुभूति केंद्रीय बनैत अछि, मुदा निजी भावनात्मक मनमानी नहि। काव्य/नाट्य संरचना, विभावादि, परम्परा आ सहृदयता अर्थ-अनुभवक अनुशासन बनबैत अछि। भाष्य-परम्परामे एक मूल पाठ अनेक टीका पबैत अछि। एहि बहुलतासँ मूल पाठक अर्थ समाप्त नहि; उलटे व्याख्याक इतिहास स्वयं अध्ययनयोग्य बनैत अछि। कुन भाष्य कोन काल/सम्प्रदाय/प्रश्नक उत्तर, स्पष्ट करू। पूर्वपक्ष–उत्तरपक्ष परम्परा लेखकक मत पुनर्निर्माणक नैतिक अनुशासन सिखबैत अछि—प्रतिपक्षक कथनकेँ जानबूझि कमजोर नहि बनाउ। आधुनिक बहसमे एकरा ‘सबल प्रतिपक्ष सिद्धान्त’ रूपमे उपयोग कएल जा सकैत अछि। भारतीय संवादक निष्कर्ष—तात्पर्य, ध्वनि, रस, शब्दप्रमाण आ भाष्य-परम्परा अर्थक अनेक स्तर खोलैत अछि; मुदा आधुनिक लेखक-अभिप्राय बहसक ‘भारतीय संस्करण’ कहब अनुचित।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक पाण्डुलिपि-परम्परामे लेखकत्व, प्रतिलिपिकार, टीकाकार, सम्पादक आ बादक संकलक अलग-अलग भूमिका निभा सकैत छथि। केवल शीर्षक वा परम्परागत लेखकत्व-आरोपण (attribution) देखिकऽ एकल लेखक-मानस पुनर्निर्मित करब जोखिमपूर्ण। एकहि नामधारी अथवा परम्परागत रूपेँ एक लेखकसँ जोडल ग्रन्थसभक काल, भाषा, शैली, पाण्डुलिपि-साक्ष्य, अन्तःसाक्ष्य आ बाह्य प्रमाण अलग-अलग जाँचू। लेखकत्व सिद्ध भेला पहिने लेखक-अभिप्रायपर विशाल इतिहास-कथा नहि बनाउ। नव्य-न्याय ग्रन्थ पढ़ैत काल तकनीकी पदक स्थिर परिभाषा, प्रतिपक्ष, अवच्छेदक संरचना आ टीका-परम्परा लेखकक निजी मनोविज्ञानपेक्षा अधिक प्रत्यक्ष प्रमाण दैत अछि। तथापि ग्रन्थकारक विवादगत लक्ष्य ऐतिहासिक पठनमे महत्त्वपूर्ण। मैथिली लोकगीत/लोककथामे एकल लेखक-अभिप्राय प्रायः अनुपलब्ध वा अप्रासंगिक हो सकैत अछि। प्रदर्शन-समुदाय, प्रसंग, रूपान्तर, गायन-परम्परा, लिंगगत अनुभव आ क्षेत्रीय संस्करण ग्रहण-इतिहासक मुख्य स्रोत बनैत अछि। आधुनिक मैथिली साहित्य/पत्रिकामे सम्पादकीय शीर्षक, वर्तनी-संशोधन, अंश-चयन, पुनर्मुद्रण आ डिजिटल प्रस्तुति पाठक अर्थ बदलि सकैत अछि। मूल संस्करण आ सम्पादित संस्करण अलग पहिचानू। मिथिलाक इतिहास-लेखनमे लोक-गौरव, जातिगत स्मृति, क्षेत्रीय राजनीति वा राष्ट्रवादी ग्रहण बादक अर्थ जोड़ि सकैत अछि। एहि ग्रहणकेँ सामाजिक तथ्य रूपमे अध्ययन करू, मुदा मूल दस्तावेजक ऐतिहासिक अर्थसँ अलग राखू। डिजिटल विदेह जकाँ बहु-लेखकीय मंचमे लेखक, सम्पादक, अभिलेख-संरक्षक, तकनीकी प्रस्तोता आ पाठक समुदाय अर्थक अलग कड़ी बनबैत छथि। अधितथ्य (metadata), मूल प्रकाशन-तिथि, संस्करण, लेखकत्व आ सम्पादकीय हस्तक्षेप स्पष्ट रहय। समानान्तर सूत्र—‘लेखकत्व पहिने प्रमाणित करू; मूल अर्थ, पाठीय अर्थ, ग्रहण-इतिहास आ वर्तमान उपयोग अलग लिखू; तखन संवाद बनाउ।’
समकालीन प्रयोग
कृत्रिम बुद्धि (AI) द्वारा उत्पादित पाठमे पारम्परिक मानवीय लेखक-अभिप्राय सीधे मानि लेब उचित नहि। निर्देश देनिहार व्यक्ति, प्रणाली-निर्माता, प्रशिक्षण-सामग्री, पुनर्प्राप्त स्रोत, चयनकर्ता/सम्पादक आ अन्तिम प्रकाशकक भूमिका अलग जाँचू। AI-पाठक अर्थकेँ केवल ‘मशीनक इरादा’ कहि समझाएब भ्रमकारी हो सकैत अछि। अधिक उपयोगी प्रश्न अछि—कौन निर्देश, कौन स्रोत, कौन मॉडल-व्यवहार, कौन सम्पादकीय चयन आ कौन सार्वजनिक प्रसंग अंतिम पाठ बनौलक? कानूनमे विधायिकाक मूल अभिप्राय, विधिक पाठ, न्यायिक पूर्वनिर्णय, संवैधानिक सिद्धान्त आ वर्तमान अधिकारक प्रश्न अलग-अलग वजन रखैत अछि। ‘लेखकक इरादा’ मात्रसँ नागरिक अधिकार समाप्त नहि कएल जा सकैत अछि। सोशल मीडिया पोस्टमे लेखक बादमे ‘ई मजाक छल’ कहि सकैत अछि। अर्थ जाँचैत काल भाषा, पूर्व पोस्ट, श्रोता, संकेत, व्यंग्य-संकेत आ प्रसंग देखू; नैतिक मूल्यांकनमे वास्तविक प्रभाव सेहो अलग जाँचू। समाचारक शीर्षक (headline) अथवा छोट अंश (clip) मूल वक्ताक अभिप्राय बदलि देखाबि सकैत अछि। पूरा साक्षात्कार, प्रश्न, कालक्रम आ मूल रिकॉर्ड उपलब्ध रहय तखन उद्धरणक अर्थ अधिक विश्वसनीय बनैत अछि। वैज्ञानिक लेखनमे लेखकक ‘हम ई सिद्ध करबाक चाहैत छी’ उद्देश्य निष्कर्षक सत्यता सिद्ध नहि करैत। डेटा, पद्धति, सांख्यिकी, पुनरुत्पादन आ सहकर्मी समीक्षा स्वतंत्र कसौटी। इतिहासमे निजी पत्र/डायरी लेखकक अभिप्राय लेल महत्वपूर्ण, मुदा आत्म-प्रस्तुति (self-presentation), रणनीति, स्मृति-दोष आ लक्षित पाठकक प्रभाव जाँचू। निजी स्रोत = निष्कलुष मानस-पहुँच नहि। अनुवादमे अनुवादक ‘लेखकक मर्म’ नामपर मूल पाठ बदलि सकैत अछि। कठिन पदक स्थिति स्पष्ट करू: मूल पद → सम्भावित अर्थ → चयनित अनुवाद → विकल्प। पारदर्शिता व्याख्यात्मक उत्तरदायित्व बढ़बैत अछि। शिक्षामे विद्यार्थीकेँ तीन अलग प्रश्न दिअ: ‘लेखक शायद की कहय चाहैत छथि?’, ‘पाठक कौन पंक्ति/संरचना एहि पठनकेँ समर्थन करैत अछि?’, ‘आइ हमरा लेल एकर महत्त्व की?’—एहि भेदसँ ऐतिहासिकता आ आलोचनात्मक स्वतंत्रता दुनू बचैत अछि। डिजिटल अभिलेखमे खोज-इंजन लोकप्रिय उद्धरण ऊपर आनैत अछि; लोकप्रियता लेखकक मूल अर्थ नहि। स्रोत-उत्पत्ति (source provenance), संस्करण (edition), तिथि (date), आसपासक अनुच्छेद (surrounding paragraphs) आ बादक ग्रहण (later reception) अलग जाँचू। समानान्तर जाँच-सूत्र: लेखकत्व निश्चित अछि? समकालीन भाषिक अर्थ की? लेखकक उपलब्ध प्रमाण की? पाठक भीतरक प्रतिरोध की? विधा की अनुमति दैत अछि? ग्रहण-इतिहास कोना बदलल? वर्तमान उपयोग मूल अर्थसँ अलग चिन्हित अछि? प्रतिप्रमाण की कहैत अछि?
अध्याय-निष्कर्ष
लेखकक अभिप्राय आ पाठकक अर्थक विवाद शून्य-योग युद्ध नहि। अर्थ बहुस्तरीय अछि; विभिन्न प्रश्न लेल विभिन्न प्रमाण उचित। ऐतिहासिक लेखक-अभिप्राय पुनर्निर्मित कएल जा सकैत अछि, मुदा प्रत्यक्ष मानस-पहुँच मानि नहि। पाठीय संरचना लेखकक निजी घोषणा सँ स्वतंत्र परीक्षण माँगैत अछि। पाठकक सक्रियता अर्थ खोलैत अछि, मुदा निजी इच्छा पाठीय प्रमाणक स्थान नहि लैत। ‘लेखकक मृत्यु’ लेखकत्वक ऐतिहासिक नाश नहि; लेखक-सर्वाधिकारक आलोचना अछि। ‘अभिप्रायगत भ्रान्ति’ लेखकक सभ सन्दर्भ निषिद्ध नहि करैत; बाहरी इरादाकेँ अंतिम सौन्दर्य/अर्थ-कसौटी बनाबयब विरुद्ध चेतावनी अछि। समानान्तर दर्शन अर्थक पाँच स्तर अलग राखैत अछि—अभिप्राय, पाठ, विधा/भाषा, ग्रहण, वर्तमान महत्त्व। एहि विभाजनसँ इतिहासक सटीकता आ वर्तमान व्याख्याक सृजनात्मकता दुनू बचैत अछि। भारतीय तात्पर्य, शब्दप्रमाण, ध्वनि, रस आ भाष्य-परम्परा आधुनिक बहसक पूर्वरूप नहि; मुदा लेखक–पाठ–पाठक सम्बन्धक स्वतंत्र दार्शनिक संसाधन रूपमे फलदायी संवाद प्रदान करैत अछि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘लेखकक अभिप्राय प्रमाण अछि, परमाधिकार नहि; पाठकक अर्थ सम्भावना अछि, स्वच्छन्दता नहि; पाठ बीचक सार्वजनिक भूमि अछि—जतऽ इतिहास, भाषा, प्रमाण आ संवाद एक-दोसरकेँ जाँचैत अछि।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• डब्ल्यू. के. विम्सैट आ मोनरो सी. बिअर्ड्सली — ‘अभिप्रायगत भ्रान्ति’ (The Intentional Fallacy)। • ई. डी. हिर्श — ‘व्याख्यामे वैधता’ (Validity in Interpretation)। • रोलाँ बार्थ — ‘लेखकक मृत्यु’ (The Death of the Author)। • मिशेल फूको — ‘लेखक की अछि?’ (What Is an Author?)। • पॉल रिकोयर — ‘व्याख्याक सिद्धान्त: विमर्श आ अर्थक अधिशेष’ (Interpretation Theory: Discourse and the Surplus of Meaning)। • पॉल रिकोयर — ‘हर्मेन्यूटिक्स आ मानव-विज्ञान’ (Hermeneutics and the Human Sciences)। • हांस-जॉर्ग गाडामर — ‘सत्य आ पद्धति’ (Truth and Method)। • उम्बेर्तो एको — ‘व्याख्याक सीमा’ (The Limits of Interpretation)। • उम्बेर्तो एको एवं अन्य — ‘व्याख्या आ अतिव्याख्या’ (Interpretation and Overinterpretation)। • स्टैनली फिश — ‘की एहि वर्गमे कोनो पाठ अछि?’ (Is There a Text in This Class?)। • क्वेन्टिन स्किनर — ‘विचार-इतिहासमे अर्थ आ समझ’ (Meaning and Understanding in the History of Ideas)। • जे. एल. ऑस्टिन — ‘शब्दसँ काज कोना करैत छी’ (How to Do Things with Words)। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • आनन्दवर्धन — ध्वन्यालोक। • अभिनवगुप्त — लोचन तथा अभिनवभारती। • बी. के. मतिलाल — ‘शब्द आ जगत’ (The Word and the World)।