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समस्या
भारतीय बौद्धिक इतिहासमे भाष्य केवल मूल ग्रन्थक कठिन शब्द बुझाबयवला सहायक लेख नहि। अनेक परम्परामे सूत्र, कारिका, मूलग्रन्थ, भाष्य, वृत्ति, वार्त्तिक, टीका, उपटीका, टिप्पणी आ निबन्ध मिलि एकटा दीर्घ तर्क-परम्परा बनबैत अछि। मूल पाठ संक्षिप्त हो सकैत अछि, मुदा ओकर दार्शनिक जीवन बहुधा भाष्यसभक बहस, पुनर्परिभाषा, आपत्ति आ समाधानमे विस्तृत होइत अछि। ‘भाष्य-परम्परा’ शब्द स्वयं एकरूप नहि। अलग शास्त्र आ कालमे भाष्य (commentary), वृत्ति (expository gloss), वार्त्तिक (critical supplementation), टीका (sub-commentary), व्याख्या, पञ्जिका अथवा टिप्पणी जकाँ नामसभक कार्य आ सीमा बदलि सकैत अछि। तेँ एक आधुनिक कठोर श्रेणी-सारणी सब भारतीय ग्रन्थपर थोपब उचित नहि। भाष्य कखनो मूल पाठक अर्थ स्थिर करैत अछि, कखनो विकल्प खोलैत अछि, कखनो पूर्वपक्ष पुनर्निर्मित करैत अछि, कखनो सिद्धान्त बदलैत अछि। भाष्यकार अपन नवोन्मेषकेँ ‘मूलक सही अर्थ’ रूपमे प्रस्तुत करि सकैत छथि; एहि कारण परम्परा आ मौलिकता एक-दोसरक विरोधी मानब भ्रामक अछि। भारतीय भाष्य-परम्पराक अध्ययनमे एक दोसर कठिनाई पाठ-इतिहास अछि। हस्तलिखित प्रतिलिपि, पाठभेद, लोप, अन्तःक्षेप, पुनर्लेखन, अलग पाठ-परिवार आ सम्पादकीय निर्णय मूल/भाष्यक सीमा बदलि सकैत अछि। आधुनिक मुद्रित संस्करणकेँ स्वतः ‘मूल’ मानि लेब ऐतिहासिक भूल हो सकैत अछि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—भाष्य मूल पाठक अधीन पुनरुक्ति अछि की स्वतंत्र दर्शन? भाष्यकारक प्राधिकार कोना बनैत अछि? पूर्वपक्ष–उत्तरपक्ष व्याख्याक नैतिक अनुशासन कोना बनि सकैत अछि? पाठभेद, परम्परा, संस्था, भाषा, सत्ता आ पाठक-समुदाय अर्थक निर्माणमे की भूमिका निभबैत अछि? आ भारतीय भाष्य-पद्धतिकेँ आधुनिक हर्मेन्यूटिक्सक ‘पूर्वरूप’ कहल जाए बिना फलदायी संवाद कोना बनाओल जाए?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे भारतीय भाष्य-परम्परा अर्थ-संरक्षण मात्र नहि, अर्थ-परीक्षण, तर्क-विस्तार, प्रतिपक्ष-निर्माण, पुनर्परिभाषा आ बौद्धिक नवोन्मेषक संस्थागत पद्धति सेहो अछि। मूल ग्रन्थ आ भाष्यक सम्बन्ध एकदिश नहि। मूल पाठ भाष्यकेँ सीमा दैत अछि; भाष्य मूल पाठक अर्थ-क्षेत्र, प्रश्न-क्रम, पद-परिभाषा आ ग्रहण-इतिहास बदलि सकैत अछि। बादक पाठक प्रायः मूलकेँ भाष्यक आँखिसँ पढ़ैत अछि। भाष्यक वैधता केवल परम्परागत प्रतिष्ठासँ नहि। पाठीय संगति, पद-प्रयोग, प्रसंग, प्रतिपक्षक निष्पक्ष पुनर्निर्माण, तर्कक शक्ति, अन्य स्रोतसँ सामञ्जस्य, पाठ-इतिहास आ प्रतिप्रमाणक सामना—ई सभ कसौटी आवश्यक। पूर्वपक्ष–उत्तरपक्षक पद्धति समानान्तर दर्शन लेल विशेष महत्त्वपूर्ण अछि: विरोधी मतकेँ जानबूझि कमजोर बनायब नहि; पहिने ओकर सबल रूप पुनर्निर्मित करू, तखन आलोचना करू। समानान्तर सूत्र—‘मूल पाठ बचाउ, भाष्यक स्वतन्त्र तर्क सेहो पढ़ू; परम्परा मानू, परम्परागत प्रतिष्ठाकेँ प्रमाण नहि मानू; प्रतिपक्ष सही बनाउ, तखन उत्तर दिअ।’
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—सूत्रात्मक लेखन संक्षिप्तता पर आधारित हो सकैत अछि। संक्षिप्त मूलक अर्थ शिक्षण, मौखिक व्याख्या आ भाष्य बिना अस्पष्ट रहि सकैत अछि। एहि कारण भाष्य बाहरी परजीवी लेखन नहि, कखनो मूल परम्पराक कार्यशील अवयव बनैत अछि। दोसर तर्क—भाष्य, वृत्ति, वार्त्तिक, टीका आदि नामसभक कार्य परम्परा-विशिष्ट अछि। सामान्य रूपेँ वृत्ति संक्षिप्त व्याख्या, भाष्य विस्तृत विवेचन, वार्त्तिक कथित/अकथित/दुर्कथित विषयक समीक्षा, टीका भाष्य अथवा पूर्वग्रन्थक उपव्याख्या करि सकैत अछि; मुदा एहि परिभाषासभकेँ सार्वत्रिक नियम नहि मानू। तेसर तर्क—पतञ्जलिक महाभाष्य उदाहरण दैत अछि जे ‘भाष्य’ स्वयं विशाल स्वतंत्र बौद्धिक कृति बनि सकैत अछि। मूल सूत्र/वार्त्तिकक व्याख्या करैत-करैत भाष्य भाषा, तर्क, प्रयोग आ पद्धतिक नूतन प्रश्न खोलि सकैत अछि। चारिम तर्क—न्याय परम्परामे न्यायसूत्र → वात्स्यायनक न्यायभाष्य → उद्योतकरक न्यायवार्त्तिक → वाचस्पति मिश्रक न्यायवार्त्तिकतात्पर्यटीका जकाँ स्तर देखबैत अछि जे भाष्य-परम्परा बहु-पीढ़ीय तर्क-संवाद हो सकैत अछि। बादक ग्रन्थ पूर्वग्रन्थक केवल सार नहि, आलोचना आ पुनर्गठन सेहो करैत अछि। पाँचम तर्क—मीमांसा पाठ-व्याख्याकेँ अत्यन्त अनुशासित बनबैत अछि। श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान आ समाख्या जकाँ व्याख्यात्मक संकेत अलग पाठीय दाबी बीच प्राथमिकता/संगति जाँचबाक साधन दैत अछि। ई नियम आधुनिक हर्मेन्यूटिक्सक अनुवाद नहि, स्वतन्त्र शास्त्रीय परियोजना अछि। छठम तर्क—वेदान्तमे एकहि ब्रह्मसूत्र पर भिन्न भाष्य परम्परा दार्शनिक मतभेदक संस्थागत रूप देखबैत अछि। एक मूल पाठ अलग तत्त्वमीमांसक प्रतिपादनक आधार बनि सकैत अछि; तेँ ‘मूल पाठक केवल एक स्पष्ट अर्थ छल’ दाबी स्वतः सिद्ध नहि। सातम तर्क—बौद्ध आ जैन परम्परामे भाष्य/टीका सिद्धान्तगत सीमा, प्रतिपक्ष आ पद-परिभाषा सुरक्षित करैत अछि। अलग सम्प्रदाय एकहि शब्दकेँ भिन्न तर्क-परिप्रेक्ष्यमे उपयोग करि सकैत अछि; शब्द-समानता = सिद्धान्त-समानता नहि। आठम तर्क—काव्यशास्त्रमे आनन्दवर्धनपर अभिनवगुप्तक लोचन अथवा नाट्यशास्त्रपर अभिनवभारती जकाँ भाष्य मूल पाठक ग्रहण बदलि सकैत अछि। टीकाकार केवल कठिन पद नहि खोलैत; सिद्धान्तक नया केन्द्र निर्मित करि सकैत अछि। नवम तर्क—पूर्वपक्ष भाष्यक अलंकार मात्र नहि। सबल पूर्वपक्ष लेखककेँ अपन सिद्धान्तक सीमा स्पष्ट करबाक बाध्यता दैत अछि। कमजोर अथवा काल्पनिक प्रतिपक्ष विजय आसान करैत अछि, मुदा दार्शनिक विश्वसनीयता घटबैत अछि। दसम तर्क—उत्तरपक्षक काम विरोधी मत नष्ट करब मात्र नहि; भेदक ठीक स्थान निर्धारित करब, स्वीकार्य अंश बचायब, असहमतिक कारण स्पष्ट करब आ वैकल्पिक सिद्धान्त प्रस्तुत करब सेहो हो सकैत अछि। एगारहम तर्क—भाष्य परम्परा स्मृति-संरक्षणक साधन अछि। भाष्य कखनो एहन पूर्वग्रन्थक अंश उद्धृत करैत अछि जे मूल रूपमे बादमे नष्ट अथवा दुर्लभ भऽ गेल। मुदा उद्धृत अंश स्वतः पूर्ण मूल पाठक प्रतिनिधि नहि; उद्धरणक चयन आ उद्देश्य जाँचू।
पूर्वपक्ष
पहिल पूर्वपक्ष आधुनिक मौलिकतावादी अछि—भाष्य मूल लेखकक पीछे चलैत अछि; वास्तविक दर्शन स्वतंत्र ग्रन्थमे होइत अछि। एहन दृष्टिमे टिप्पणीकार दोसर श्रेणीक लेखक बनि जाइत छथि। दोसर पूर्वपक्ष परम्परावादी अछि—स्वीकृत भाष्यकारक व्याख्या स्वयं प्रामाणिक; आधुनिक पाठकक संशय परम्परा-विच्छेद अछि। तेसर पूर्वपक्ष पाठ-केंद्रित अछि—मूल पाठ उपलब्ध अछि तऽ बादक टीका इतिहासक बोझ; अर्थ मूल पाठसँ सीधे निकालल जा सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष उत्तर-आधुनिक अछि—भाष्यक अनन्त श्रृंखला देखबैत अछि जे मूल अर्थ स्थिर नहि; हर व्याख्या दोसर पाठ मात्र अछि, ताहि कारण निर्णायक कसौटी सम्भव नहि। पाँचम पूर्वपक्ष सामाजिक आलोचना सँ अछि—भाष्य-परम्परा प्रायः शिक्षित अभिजात संस्थासँ जुड़ल; एकरा ‘भारतीय ज्ञान’क सम्पूर्ण प्रतिनिधि मानलासँ मौखिक, स्त्री, श्रमजीवी, लोकभाषिक आ गैर-शास्त्रीय ज्ञान हाशियापर जा सकैत अछि। छठम पूर्वपक्ष तुलनात्मक दर्शन सँ अछि—भारतीय भाष्य-परम्पराकेँ हर्मेन्यूटिक्स, सूक्ष्म पाठ-पठन (close reading) अथवा विश्लेषणात्मक टिप्पणी-पद्धति (analytic commentary) केर प्राचीन रूप कहब यूरोपीय श्रेणी द्वारा भारतीय इतिहासक पुनर्वर्गीकरण अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—भाष्य अधीन विधा हो सकैत अछि, मुदा अधीनता = बौद्धिक निष्क्रियता नहि। महाभाष्य, न्यायभाष्य-परम्परा, मीमांसा, वेदान्त आ काव्यशास्त्रक उदाहरण देखबैत अछि जे भाष्य स्वयं सिद्धान्त बनबैत अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—परम्परागत प्रतिष्ठा ऐतिहासिक तथ्य अछि, सत्यक स्वतः प्रमाण नहि। भाष्यकारक तर्क पुनःजाँच योग्य रहत; परम्परा आलोचनासँ बाहर नहि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—‘सीधा मूल पाठ’ प्रायः भ्रम हो सकैत अछि, विशेषतः जखन पाठ संक्षिप्त, तकनीकी वा पाठभेदी हो। आधुनिक पाठक सेहो शब्दकोश, संस्करण, सम्पादक, शिक्षक आ पूर्वव्याख्याक मध्यस्थतासँ पढ़ैत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—व्याख्याक इतिहास खुलल रहैत अछि, मुदा हर पठन समान समर्थित नहि। पाठीय प्रतिरोध, व्याकरण, पद-प्रयोग, तिथि, सन्दर्भ, तर्क आ अन्य स्रोत कसौटी दैत अछि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भाष्य-परम्पराकेँ भारतीय ज्ञानक एक महत्त्वपूर्ण धारा मानू, सम्पूर्णता नहि। शास्त्रीय पाठक संग मौखिक, लोक, स्त्री, क्षेत्रीय, कारीगर, प्रशासनिक आ भौतिक स्रोत सेहो पढ़ू। छठम पूर्वपक्षक उत्तर—आधुनिक हर्मेन्यूटिक्स संग तुलना समस्या-स्तरपर राखू: परम्परा, अर्थ, पाठ, पूर्वबोध, व्याख्या। ऐतिहासिक पहचान वा ‘पूर्वगामी’ दाबी केवल ठोस प्रमाणसँ।
भारतीय संवाद
भारतीय भाष्य-परम्परा स्वयं एकरूप ‘भारतीय पद्धति’ नहि। व्याकरण, न्याय, मीमांसा, वेदान्त, बौद्ध, जैन, काव्यशास्त्र, धर्मशास्त्र आ अन्य परम्पराक लक्ष्य, प्रामाण्य-सिद्धान्त, पदावली आ बहस अलग। पाणिनि–कात्यायन–पतञ्जलि परम्परा नियम, वार्त्तिक, उदाहरण, प्रयोग आ प्रतिप्रश्नक माध्यमसँ व्याकरणकेँ गतिशील तर्कशास्त्रीय अनुशासन बनबैत अछि। महाभाष्यक महत्त्व केवल ‘पाणिनि समझाबयब’मे सीमित नहि। न्याय परम्परा भाष्य/वार्त्तिक/टीका मार्फत प्रमाण, अनुमान, शब्द, वाद आ तत्त्वमीमांसक विवादक क्रमिक पुनर्गठन देखबैत अछि। नव्य-न्याय बादमे परिभाषा आ सम्बन्ध-विश्लेषणक तकनीकी भाषा अधिक सूक्ष्म करैत अछि। मीमांसा भाष्य-परम्परा पाठीय विरोध-समाधान, विधि, निषेध, अर्थवाद, प्रसंग आ तात्पर्य जाँचबाक औपचारिक अनुशासन विकसित करैत अछि। एकरा आधुनिक विधिक व्याख्याक प्रत्यक्ष पूर्वरूप कहब उचित नहि, मुदा समस्या-संवाद फलदायी अछि। वेदान्तक भिन्न भाष्य परम्परा एकहि सूत्र-समूहक अलग तत्त्वमीमांसक पठन प्रस्तुत करैत अछि। एहि बहुलतासँ मूल पाठ निरर्थक नहि; उलटे व्याख्यात्मक कसौटी आ दार्शनिक पूर्वप्रतिज्ञाक भूमिका स्पष्ट होइत अछि। बौद्ध आ जैन टीका-परम्परा प्रतिपक्ष, पद-सीमा, युक्ति आ सम्प्रदायगत विकासक इतिहास बचबैत अछि। हुनका आधुनिक सापेक्षतावाद वा विखण्डनमे घोलब अनुचित। काव्यशास्त्रीय भाष्य साहित्यिक अनुभव, ध्वनि, रस, अलंकार, अभिनय आ सहृदयताक प्रश्न खोलैत अछि। साहित्यिक भाष्यक कसौटी दार्शनिक प्रमाणशास्त्रक कसौटीसँ पूर्ण समान नहि। भाष्य-परम्पराक साझा शिक्षा ई नहि जे ‘भारतीय परम्परा सदैव बहुलवादी छल’; बल्कि ई जे अनेक शास्त्रमे मतभेदकेँ लिखित, पुनरावृत्त, उद्धृत आ उत्तरित करबाक संस्थागत रूप विकसित भेल।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक बौद्धिक इतिहासमे न्याय–नव्य-न्याय, मीमांसा, स्मृति आ अन्य शास्त्रक अध्ययन भाष्य/टीका-परम्परासँ अलग कऽ बुझल नहि जा सकैत। संक्षिप्त मूलग्रन्थक अर्थ बहुधा शिक्षण-परम्परा आ टीका-उपटीकासँ खुलैत अछि। तत्त्वचिन्तामणि जकाँ नव्य-न्याय ग्रन्थ आधुनिक पाठक लेल केवल मूल पाठ पढ़ि बुझब कठिन अछि। बादक टीका, पद-परिभाषा, प्रतिपक्ष आ शिक्षण-परम्परा अध्ययनक वास्तविक प्रवेश-द्वार बनैत अछि; मुदा बादक टीकाकेँ मूल लेखकक ‘एकमात्र अर्थ’ घोषित नहि करू। मिथिलामे उपलब्ध पाण्डुलिपि अलग लिपि, प्रतिलिपि-परम्परा, लेखनकाल आ पाठभेद रखि सकैत अछि। तिरहुता/मिथिलाक्षर, देवनागरी अथवा अन्य लिपिमे रूपान्तरण करत काल अक्षर-साम्य, विराम, संयुक्ताक्षर, परवर्ती वर्तनी आ सम्पादकीय विस्तार स्पष्ट दर्ज हो। पाण्डुलिपिक हाशिया-टिप्पणी, पाठान्तर, स्वामित्व-चिह्न, तिथि, लेखकीय टिप्पणी आ प्रतिलिपिकारक सूचना केवल सजावटी सामग्री नहि; ग्रन्थक ग्रहण-इतिहास आ संचरण-पथक प्रमाण हो सकैत अछि। मिथिलाक शास्त्रीय गौरव लिखैत काल ‘एहि क्षेत्रमे ग्रन्थ पढ़ल गेल’ आ ‘एहि क्षेत्रमे ग्रन्थ रचल गेल’ बीच भेद राखू। पाण्डुलिपि-उपस्थिति स्वतः लेखकत्व, उत्पत्ति वा प्रभाव सिद्ध नहि करैत। मैथिलीमे संस्कृत दार्शनिक ग्रन्थक आधुनिक व्याख्या करैत काल तीन तह स्पष्ट राखू: मूल संस्कृत पद → शुद्ध मैथिली अर्थ/व्याख्या → आवश्यक अंग्रेजी तकनीकी समतुल्य। अंग्रेजी शब्द मूल अर्थक स्थान नहि लेत। विदेह जकाँ डिजिटल प्रकाशन भाष्य-परम्पराक नूतन सार्वजनिक रूप बना सकैत अछि—मूल पाठ, अनुवाद, टिप्पणी, प्रतिपक्ष, संशोधन-इतिहास आ स्रोत-लिंक एकसंग उपलब्ध कराओल जा सकैत अछि। मुदा डिजिटल सुविधा सम्पादकीय उत्तरदायित्व घटबैत नहि। समानान्तर सूत्र—‘मूल, पाठभेद, भाष्य आ आधुनिक व्याख्या चारूकेँ अलग चिन्हित करू; मिथिलाक परम्पराकेँ गौरवसँ पढ़ू, प्रमाणसँ जाँचू।’
समकालीन प्रयोग
डिजिटल सम्पादनमे मूल पाठ, पाठभेद, अनुवाद आ टिप्पणी अलग दृश्य-स्तरमे देखाओल जाए। पाठककेँ कुन शब्द मूल लेखकक, कुन सम्पादकक, कुन अनुवादकक—तत्काल बुझाइ। कृत्रिम बुद्धि (AI) प्राचीन ग्रन्थक ‘व्याख्या’ बनबैत काल प्रशिक्षण-सामग्रीक लोकप्रिय भाष्य दोहराबि सकैत अछि। AI द्वारा बहुमत-व्याख्या = ऐतिहासिक रूपेँ सर्वोत्तम व्याख्या नहि। स्रोत, संस्करण, उद्धरण आ अनिश्चितता अनिवार्य। कृत्रिम बुद्धि (AI) यदि मूल संस्कृत/मैथिली पाठ बिना केवल आधुनिक सारांशपर आधारित उत्तर दैत अछि, तखन भाष्य-श्रृंखला टूटि स्रोत-अस्पष्टता बढ़ैत अछि। समानान्तर नियम—मूल पाठपर पुनःफेरू, उद्धरण सत्यापित करू, भाष्यक स्तर चिन्हित करू। शिक्षामे विद्यार्थीकेँ केवल ‘सही भाष्य’ याद नहि कराउ; एक मूल अंश, दू भिन्न भाष्य, तर्कक भेद आ अपन प्रमाणाधारित निष्कर्ष तुलना कराउ। एहि सँ परम्परा जीवित आलोचनात्मक अभ्यास बनैत अछि। कानूनी व्याख्यामे न्यायिक टीका/पूर्वनिर्णय मूल विधिक पाठक ग्रहण बदलैत अछि। भारतीय शास्त्रीय भाष्यसँ सीधा समानता नहि, मुदा ‘मूल पाठ + व्याख्यात्मक परम्परा + नूतन प्रसंग’ समस्या तुलनात्मक रूपेँ उपयोगी। धार्मिक बहसमे लोकप्रिय आधुनिक टीकाकेँ ‘मूल शास्त्र’ कहि उद्धृत करब टारू। मूल, भाष्य, सम्प्रदायगत टीका, आधुनिक प्रवचन आ सोशल मीडिया उद्धरण अलग स्तर। अनुवाद परियोजनामे संस्करण-संख्या, सम्पादक, पाण्डुलिपि-आधार, पाठभेद, मूल पृष्ठ, अनुवादक निर्णय आ टिप्पणीक स्रोत अधितथ्य (metadata) रूपमे सुरक्षित राखू। डिजिटल खोजमे लोकप्रिय टीका ऊपर आएब सामान्य; खोज-क्रमांकन ऐतिहासिक प्रामाणिकता नहि। अल्प-प्रचलित पाण्डुलिपि अथवा आलोचनात्मक संस्करण अधिक उपयोगी हो सकैत अछि। समानान्तर जाँच-सूत्र: मूल पाठ कुन संस्करण? पाठभेद अछि? भाष्यकार कोन प्रश्नक उत्तर दैत छथि? पूर्वपक्ष निष्पक्ष अछि? नवीन दावा मूलक नामपर थोपल गेल अछि? अन्य भाष्य की कहैत? संस्थागत प्रतिष्ठा तर्ककेँ ढाँकि रहल अछि? आधुनिक उपयोग ऐतिहासिक अर्थसँ अलग चिन्हित अछि?
अध्याय-निष्कर्ष
भारतीय भाष्य-परम्परा ‘मूल ग्रन्थ + सहायक टिप्पणी’क सरल ढाँचा नहि; ई बहु-पीढ़ीय तर्क, शिक्षण, संरक्षण, विवाद आ नवोन्मेषक जटिल बौद्धिक संस्था अछि। भाष्य मूल पाठक अधीन होइतहुँ स्वतंत्र दार्शनिक शक्ति पाबि सकैत अछि। बादक भाष्य मूलक ग्रहण बदलैत अछि; तेँ मूल, भाष्य आ ग्रहण-इतिहास अलग रखब आवश्यक। पूर्वपक्ष–उत्तरपक्षक सर्वोत्तम रूप आलोचनात्मक नैतिकता सिखबैत अछि—प्रतिपक्षक मतकेँ सही बनाउ, तखन उत्तर दिअ। ई पद्धति समानान्तर दर्शनक विद्वत्तापरक (scholarly) ढाँचाक केन्द्रमे रहत। परम्परा ज्ञानक वाहक अछि, स्वतः प्रमाण नहि। शास्त्रीय प्रतिष्ठा, गुरु-परम्परा, संस्थागत कैनन, क्षेत्रीय गौरव वा डिजिटल लोकप्रियता तर्क/पाठ/प्रमाणक स्थान नहि लेत। भारतीय भाष्य-पद्धतिकेँ आधुनिक हर्मेन्यूटिक्स, विश्लेषणात्मक दर्शन वा विखण्डनक पूर्वरूप नहि कहल जाए। समस्या-संवाद फलदायी अछि; ऐतिहासिक प्रभाव केवल प्रमाणसँ। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘भाष्य परम्पराकेँ जीवित रखैत अछि, मुदा जीवित परम्परा प्रश्न स्वीकारैत अछि; मूल पाठ सीमा दैत अछि, मुदा भाष्य तर्क खोलैत अछि; परम्परा सँ सीखू, प्रमाणक सामने सभकेँ उत्तरदायी राखू।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• पाणिनि — अष्टाध्यायी। • कात्यायन — वार्त्तिक, पाणिनीय परम्परा। • पतञ्जलि — महाभाष्य। • जैमिनि — मीमांसासूत्र। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्त्तिक तथा तन्त्रवार्त्तिक। • प्रभाकर — बृहती, शबरभाष्यपर टीका-परम्परा। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • उद्योतकर — न्यायवार्त्तिक। • वाचस्पति मिश्र — न्यायवार्त्तिकतात्पर्यटीका। • बादरायण — ब्रह्मसूत्र। • शङ्कर — ब्रह्मसूत्रभाष्य। • रामानुज — श्रीभाष्य। • आनन्दवर्धन — ध्वन्यालोक। • अभिनवगुप्त — लोचन तथा अभिनवभारती। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • रघुनाथ शिरोमणि — दीधिति, तत्त्वचिन्तामणि-व्याख्या-परम्परा। • बी. के. मतिलाल — ‘शब्द आ जगत’ (The Word and the World)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)। • शेल्डन पोलॉक — ‘मनुष्यलोकमे देवसभक भाषा’ (The Language of the Gods in the World of Men: Sanskrit, Culture, and Power in Premodern India)।