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समस्या
‘फ्रैंकफर्ट स्कूल’ नाम सुनिते प्रायः एकटा एकरूप दार्शनिक सम्प्रदायक छवि बनैत अछि, मुदा ऐतिहासिक रूपेँ ई एकरूप ‘स्कूल’ नहि छल। फ्रैंकफर्टक सामाजिक अनुसन्धान संस्थान (Institut für Sozialforschung) सँ जुड़ल चिन्तकसभक बीच मार्क्सवाद, मनोविश्लेषण, समाजशास्त्र, अर्थनीति, सौन्दर्यशास्त्र, राजनीति आ दर्शनक सम्बन्धपर गम्भीर सहमति सेहो छल आ तीव्र मतभेद सेहो। तैं पहिल समस्या नामक अछि: ‘फ्रैंकफर्ट स्कूल’केँ स्थिर सिद्धान्तक पेटी नहि, बहस करैत आलोचनात्मक परम्परा रूपमे कोना बुझल जाए? बीसम शताब्दीक आरम्भमे यूरोपीय आधुनिकताक एकटा मूल विरोधाभास सामने छल। विज्ञान, उद्योग, प्रशासन, संचार आ विधिक संस्थासभक विस्तार भेल, मुदा एहि प्रगतिक संग युद्ध, साम्राज्यवाद, आर्थिक संकट, फासीवाद, यहूदी-विरोध, जन-प्रचार आ व्यापक सामाजिक अधीनता सेहो देखल गेल। यदि आधुनिक विवेक स्वतन्त्रता बढ़बैत अछि, तखन आधुनिक समाज अधिनायकवाद आ सामूहिक विनाशक क्षमता किएक पैदा करैत अछि? फ्रैंकफर्ट परम्पराक मूल बेचैनी एहि प्रश्नसँ शुरू होइत अछि। दोसर समस्या मार्क्सवादी सिद्धान्तक सीमासँ जुड़ल छल। आर्थिक शोषण आ वर्ग-संघर्ष महत्त्वपूर्ण रहल, मुदा केवल उत्पादन-संबंधसँ फासीवादी आकर्षण, परिवारक मनोवैज्ञानिक अनुशासन, जन-संस्कृति, राष्ट्रवाद, यहूदी-विरोध, उपभोक्तावाद अथवा आज्ञापालनक गहन भावनात्मक कारण पूर्ण रूपेँ स्पष्ट नहि होइत छल। एहि कारण फ्रैंकफर्टक चिन्तकसभ मार्क्सक आलोचनात्मक अर्थनीतिकेँ फ्रायड, वेबर, हेगेल, नीत्शे आ आधुनिक समाजविज्ञानक प्रश्नसभ संग संवादमे आनलनि। तेसर समस्या ज्ञानक स्वरूपक अछि। समाजक अध्ययन करनिहार विद्वान स्वयं समाजसँ बाहर निष्पक्ष दर्शक नहि। श्रेणी, आँकड़ा, संस्था, विश्वविद्यालय, वित्तपोषण, भाषा आ ‘सामान्य’ मानल गेल धारणा सामाजिक सम्बन्धसँ बनैत अछि। तैं प्रश्न उठैत अछि—समाजविज्ञान केवल ‘जे अछि’ तकर वर्णन करत, वा ओहि व्यवस्थाक अन्तर्विरोध आ सम्भावित अन्यायकेँ सेहो जाँचत? चौठ समस्या आलोचनाक मानदण्डक अछि। यदि आलोचक कहैत अछि जे वर्तमान समाज दमनकारी अछि, तऽ ओ कोन आधारपर ई निर्णय करैत अछि? केवल व्यक्तिगत नैतिक पसन्द पर्याप्त नहि; मुदा समाजक वर्तमान मान्यताकेँ जसक तस मानि लेलासँ आलोचना निष्प्रभावी भऽ जाइत अछि। फ्रैंकफर्ट परम्परा एहि दुविधामे ‘अन्तर्निहित’ वा ‘अभ्यन्तर’ आलोचना (immanent critique)क विभिन्न रूप विकसित करैत अछि—समाज अपन जे स्वतन्त्रता, समानता, विवेक अथवा मानव गरिमाक दावा करैत अछि, ओकर वास्तविक संस्थागत रूप ओहि दावासँ मेल खाइत अछि कि नहि? एहि अध्यायक समस्या तेँ दूहरी अछि: एक दिस फ्रैंकफर्ट स्कूलक ऐतिहासिक-सैद्धान्तिक पहचान स्पष्ट करब; दोसर दिस ओकर आलोचनात्मक पद्धतिक उपयोगिता आ सीमा जाँचब। एकरा न तऽ ‘मार्क्सक बादक एकमात्र सत्य’ मानल जाएत, न केवल यूरोपीय इतिहासक विचित्र प्रसंग। समानान्तर दर्शनक प्रश्न ई अछि—सत्ता, ज्ञान, संस्कृति, अर्थव्यवस्था आ मनोविज्ञानक सम्बन्ध जाँचबाक एहि पद्धतिसँ की ग्रहण कएल जा सकैत अछि, आ भारतीय तथा मिथिलाक भिन्न इतिहासक कारण कतय संशोधन जरूरी अछि?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे फ्रैंकफर्ट स्कूलक स्थायी महत्त्व कोनो एक सूत्रमे नहि, बल्कि आलोचनात्मक अनुसन्धानक एक अनुशासनमे अछि: समाजक प्रत्यक्ष तथ्यकेँ ओकर ऐतिहासिक निर्माण, आर्थिक हित, संस्थागत सत्ता, सांस्कृतिक अर्थ, मनोवैज्ञानिक गठन आ घोषित नैतिक आदर्श सभक संग जोड़ि पढ़ू; आ निष्कर्षकेँ मुक्तिदायी सम्भावनाक प्रश्नसँ अलग नहि करू। फ्रैंकफर्टक सामाजिक अनुसन्धान संस्थान 1923 मे स्थापित भेल। मैक्स होर्खाइमर 1930 मे निदेशक बनलाक बाद 1931 केर उद्घाटन व्याख्यानमे दर्शन आ सामाजिक अनुसन्धानकेँ जोड़निहार अन्तरविषयी कार्यक्रमक रूपरेखा रखलनि। एहि कार्यक्रममे दार्शनिक संकल्पना केवल अमूर्त विचार नहि, आ आँकड़ा केवल निष्पक्ष तथ्य नहि; दुनूकेँ सामाजिक समग्रता, ऐतिहासिक परिवर्तन आ वास्तविक मानवीय अनुभवक सम्बन्धमे पढ़बाक प्रयास छल। 1930 दशकमे नाजी सत्ता-विस्तार संस्थानक इतिहासकेँ प्रत्यक्ष रूपेँ बदलि देलक। संस्थान जर्मनीसँ बाहर गेल, अन्ततः न्यूयॉर्कमे कोलम्बिया विश्वविद्यालय संग जुड़ल, आ ओकर अनेक सदस्य निर्वासनक अनुभवसँ गुजरल। एहि ऐतिहासिक आघातक कारण अधिनायकवाद, यहूदी-विरोध, प्रचार, आज्ञापालन, आधुनिक राज्य, परिवार, संस्कृति आ तर्कशीलताक प्रश्न केवल अकादमिक विषय नहि रहल; ई सभ जीवित राजनीतिक प्रश्न बनि गेल। 1937 केर ‘Traditional and Critical Theory’ मे होर्खाइमर पारम्परिक सिद्धान्त आ आलोचनात्मक सिद्धान्त बीच भेद प्रतिपादित करैत छथि। पारम्परिक सिद्धान्त प्रायः अपन विषय-वस्तुकेँ बाहरी तथ्य मानि वर्णन वा नियम बनाबैत अछि; आलोचनात्मक सिद्धान्त समाज आ ज्ञानक सम्बन्ध, सिद्धान्तक सामाजिक भूमिका, आ विद्यमान व्यवस्थाक परिवर्तनशीलताकेँ जाँचैत अछि। ई अनुभवजन्य अनुसन्धानक विरोध नहि; बल्कि अनुभवजन्य तथ्यक सामाजिक अर्थ आ ऐतिहासिक शर्त स्पष्ट करबाक माँग अछि। फ्रैंकफर्ट परम्पराक विभिन्न सदस्य अलग निष्कर्षपर पहुँचलाह। होर्खाइमर आ अडोर्नो आधुनिक विवेकक आत्म-विरोध आ ‘संस्कृति उद्योग’क आलोचना गहन बनौलनि; मार्क्यूजे उन्नत औद्योगिक समाजक अनुरूपता आ एक-आयामी चेतनाक प्रश्न उठौलनि; हाबर्मास बादमे संवादात्मक विवेक आ सार्वजनिक तर्कक सम्भावना पुनर्निर्मित कएलनि। एहि भिन्नतासँ स्पष्ट अछि जे ‘Critical Theory’ एक बन्द सिद्धान्त नहि; अपन पूर्व निष्कर्षक आलोचना करब स्वयं ओकर परम्पराक अंश अछि। समानान्तर प्रतिपादन—‘समाजकेँ केवल तथ्यक संग्रह नहि, विरोधाभासक चलैत संरचना रूपमे पढ़ू; मुदा कोनो एक संरचनाकेँ सर्वव्याख्यात्मक नियति नहि बनाउ। अर्थनीति, संस्कृति, मन, संस्था, भाषा आ इतिहासक सम्बन्ध जाँचू; प्रमाण अलग-अलग स्रोतसँ लिअ; आ आलोचनाक मानदण्ड स्वयं स्पष्ट करू।’
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—‘फ्रैंकफर्ट स्कूल’ एकरूप सम्प्रदाय नहि। होर्खाइमर, अडोर्नो, मार्क्यूजे, फ्रॉम, पोलॉक, लोवेन्थाल, न्यूमान, किर्खहाइमर आ विस्तृत वृत्तमे बेंजामिन जकाँ चिन्तकक रुचि आ निष्कर्ष अलग-अलग छल। बादमे हाबर्मास, होन्नेथ आदि नव पीढ़ी अलग आधारपर आलोचनात्मक सिद्धान्तकेँ पुनर्गठित करैत छथि। इतिहास लिखैत काल एहि मतभेदकेँ मिटायब उचित नहि। दोसर तर्क—आलोचनात्मक सिद्धान्त अन्तरविषयी अछि। सामाजिक अधीनता केवल आर्थिक वा केवल मनोवैज्ञानिक कारणसँ नहि बुझल जा सकैत। उत्पादन, राज्य, कानून, परिवार, शिक्षा, माध्यम, कला, इच्छा, भय आ पहचान एक-दोसर पर प्रभाव डालैत अछि। एहि कारण एकहि प्रश्नक उत्तर लेल दर्शन, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, इतिहास आ सांस्कृतिक अध्ययनक साक्ष्य जोड़बाक आवश्यकता पड़ैत अछि। तेसर तर्क—तथ्य स्वयं सामाजिक प्रसंगसँ रिक्त नहि। बेरोजगारीक दर, उपभोगक आँकड़ा, चुनावी व्यवहार वा विद्यालयी उपलब्धि उपयोगी तथ्य छथि, मुदा कोन श्रेणी बनाओल गेल, की मापल गेल, की छोड़ल गेल, आ मापन कोन संस्थागत लक्ष्य लेल भेल—ई प्रश्न तथ्यक व्याख्यात्मक अर्थ बदलि सकैत अछि। आलोचनात्मक दृष्टि आँकड़ाकेँ अस्वीकार नहि, ओकर निर्माण आ उपयोगक शर्त उजागर करैत अछि। चारिम तर्क—विचारधारा (ideology) केवल जानि-बुझि कहल झूठ नहि। एहन धारणा जे सामाजिक सम्बन्धकेँ प्राकृतिक, अपरिहार्य वा सामान्य देखबैत अछि, ओ सत्यक अंश रखितो भ्रमकारी भऽ सकैत अछि। उदाहरणतः ‘सभ व्यक्ति बाजारमे स्वतन्त्र छथि’ कानूनी स्तरपर आंशिक सत्य हो सकैत अछि, मुदा असमान सम्पत्ति, शिक्षा, जाति, लिंग वा शक्ति-संसाधन वास्तविक विकल्पकेँ सीमित करि सकैत अछि। पाँचम तर्क—आलोचना बाहरी उपदेश मात्र नहि होयबाक चाही। समाज यदि समान नागरिकता, योग्यता, स्वतन्त्र अभिव्यक्ति वा न्यायिक निष्पक्षताक दावा करैत अछि, तऽ आलोचना एहि घोषित मान्यताकेँ वास्तविक व्यवहारक विरुद्ध जाँचि सकैत अछि। एहि प्रकारक अभ्यन्तर आलोचना व्यवस्था द्वारा मानल आदर्श आ ओकर व्यवहारिक विरोधाभास बीच दूरी स्पष्ट करैत अछि। छठम तर्क—मुक्ति (emancipation) आलोचनात्मक सिद्धान्तक दिशासूचक अछि, तैयार नक्शा नहि। यदि आलोचना स्वयं नव अधिनायकवादी योजना थोपैत अछि तऽ ओ अपन उद्देश्यसँ विचलित भऽ जाइत अछि। तैं मुक्तिक अर्थ स्वायत्तता, विवेकपूर्ण भागीदारी, दमनक कमी, गरिमा आ वास्तविक विकल्पक विस्तार रूपमे जाँचल जाए; एकमात्र ऐतिहासिक अन्तिम अवस्था रूपमे नहि। सातम तर्क—आधुनिक विवेकक आलोचना विवेक-विरोध नहि। होर्खाइमर आ अडोर्नोक कठोर प्रश्न ई अछि जे साधनात्मक विवेक (instrumental reason) जखन केवल ‘लक्ष्य कोना पाबी’ पर केन्द्रित होइत अछि आ ‘लक्ष्य उचित अछि कि नहि’ प्रश्न छोड़ि दैत अछि, तखन अत्यन्त दक्ष संस्था सेहो अमानवीय उद्देश्य पूरा करि सकैत अछि। समाधान अन्ध परम्परा वा मिथकक वापसी नहि, विवेकक आत्मालोचना अछि।
पूर्वपक्ष
पहिल पूर्वपक्ष कहैत अछि—फ्रैंकफर्ट स्कूल अत्यधिक निराशावादी अछि। यदि संस्कृति उद्योग चेतना नियंत्रित करैत अछि, साधनात्मक विवेक आधुनिकता पर हावी अछि, आ पूँजीवादी व्यवस्था विरोधकेँ समाहित करि लैत अछि, तऽ वास्तविक परिवर्तनक कर्ता कतय बचैत अछि? दोसर पूर्वपक्ष प्रत्यक्षवादी अछि—सामाजिक विज्ञानक काम तथ्य आ कारण बतायब अछि; ‘मुक्ति’ वा ‘दमन’ जकाँ मूल्य-शब्द अनुसन्धानमे आनलासँ निष्पक्षता नष्ट होइत अछि। आलोचनात्मक सिद्धान्त विज्ञान नहि, राजनीतिक दर्शन भऽ जाइत अछि। तेसर पूर्वपक्ष उदारवादी अछि—व्यक्ति लोकप्रिय संस्कृति उपभोग करैत अछि कारण ओकरा पसिन्न अछि। विज्ञापन, चलचित्र, संगीत वा डिजिटल मंचकेँ ‘संस्कृति उद्योग’ कहि दर्शककेँ भ्रमित वा निष्क्रिय मानब अभिजात सांस्कृतिक अहंकार भऽ सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष मार्क्सवादी अछि—फ्रैंकफर्ट चिन्तकसभ आर्थिक वर्ग-संघर्षसँ हटि संस्कृति, मनोविज्ञान आ दर्शनमे अत्यधिक उलझि गेलाह; एहि कारण पूँजी आ श्रमक ठोस सम्बन्ध धुँधला भऽ गेल। पाँचम पूर्वपक्ष उत्तर-औपनिवेशिक आ जाति-आलोचनात्मक अछि—यूरोपीय फासीवाद आ औद्योगिक पूँजीवादक अनुभवसँ विकसित श्रेणीसभकेँ भारतपर सीधा लागू करब उपनिवेशवादी ज्ञानक दोसर रूप भऽ सकैत अछि। जाति, औपनिवेशिकता, भाषा, धर्म, क्षेत्र आ ग्रामीण सामाजिक संरचना अपन स्वतंत्र इतिहास रखैत अछि। छठम पूर्वपक्ष व्यावहारिक अछि—यदि आलोचना प्रत्येक संस्था, सांस्कृतिक वस्तु आ तकनीकक भीतर सत्ता खोजैत रहत, तऽ निर्णय असम्भव भऽ जाएत। समाजकेँ चलाबय लेल प्रशासन, विशेषज्ञता, बाजार, तकनीक आ सामान्यीकृत नियम आवश्यक; निरन्तर आलोचना स्वयं निष्क्रियताक कारण बनि सकैत अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—निराशावाद फ्रैंकफर्ट परम्पराक वास्तविक जोखिम अछि, विशेषतः जखन ‘प्रशासित समाज’क भाषा सर्वग्रासी बनि जाइत अछि। मुदा एहि परम्पराक भीतर स्वयं मतभेद अछि: बेंजामिन जन-संस्कृतिक नव सम्भावना देखैत छथि, मार्क्यूजे प्रतिरोधक विषय खोजैत छथि, हाबर्मास संवादात्मक विवेक पुनर्निर्मित करैत छथि। तैं ‘पूर्ण बन्द समाज’केँ सिद्धान्तक अनिवार्य निष्कर्ष नहि मानल जाए। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—मूल्य-तटस्थताक दावा सेहो मूल्य आ संस्थागत चुनावसँ मुक्त नहि। मुदा एहि कारण तथ्यक कठोरता छोड़ल नहि जा सकैत। आलोचनात्मक अनुसन्धानकेँ अपन नैतिक मानदण्ड घोषित करबाक, स्रोत पारदर्शी रखबाक, विधि परीक्षण योग्य बनाबयबाक, आ विरोधी प्रमाण स्वीकार करबाक अधिक जिम्मेदारी अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—लोकप्रिय संस्कृतिक आलोचना दर्शकक अपमान नहि होयबाक चाही। उपयोगी प्रश्न ई अछि जे विकल्पक विविधता वास्तविक अछि कि एकहि व्यावसायिक तर्क अनेक रूपमे दोहराइत अछि; सृजनकर्ताक श्रम-शर्त की अछि; दृश्यता कोन एल्गोरिदम वा पूँजी नियंत्रित करैत अछि; आ दर्शक कोना पुनर्व्याख्या वा प्रतिरोध करैत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—अर्थनीतिकेँ छोड़ब आलोचनात्मक सिद्धान्तक कमजोरी हो सकैत अछि, मुदा संस्कृति आ मनोविज्ञानकेँ केवल ‘ऊपरी ढाँचा’ कहि छोड़ब सेहो अधूरा। आर्थिक संस्था स्वयं कानूनी वैधता, उपभोगक इच्छा, सामाजिक पहचान, शिक्षा आ राजनीतिक सहमति पर निर्भर करैत अछि। सम्बन्ध बहुदिशात्मक अछि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय वा मिथिलाक प्रसंगमे फ्रैंकफर्ट श्रेणी सभकेँ नाम बदलि प्रतिलिपि नहि कएल जाए। तुलनात्मक नियम ई रहत: समस्या-साम्य पहिचानू, ऐतिहासिक भिन्नता स्पष्ट करू, स्थानीय स्रोतसँ श्रेणी जाँचू, आ जे तत्व मेल नहि खाइत अछि ओकरा अस्वीकार वा संशोधित करू। छठम पूर्वपक्षक उत्तर—आलोचना निर्णयक विकल्प नहि, निर्णयक गुणवत्ता बढ़ाबयबाक साधन अछि। प्रशासन आवश्यक हो सकैत अछि, मुदा प्रश्न रहत—नियम के बनबैत अछि, अपीलक मार्ग अछि कि नहि, त्रुटि कोना सुधरैत अछि, लागत ककरा पर पड़ैत अछि, आ संस्था अपन घोषित लक्ष्य पूरा करैत अछि कि नहि। आलोचना सुधारक प्रक्रिया बनि सकैत अछि।
भारतीय संवाद
भारतीय बौद्धिक इतिहासमे फ्रैंकफर्ट स्कूलक सीधा समकक्ष खोजब अनुचित होयत। सामाजिक आलोचनाक परम्परा बहुल अछि आ ओकर स्रोत बौद्ध, जैन, भक्ति, सूफी, न्याय, औपनिवेशिक आधुनिकता, राष्ट्रवाद, समाज-सुधार, जाति-विरोध, मार्क्सवाद आ संवैधानिक विचार धरि फैलल अछि। तुलना प्रभावक दावा नहि, प्रश्नक स्तरपर संवाद होयबाक चाही। डॉ. भीमराव आंबेडकरक जाति-आलोचना एकटा महत्त्वपूर्ण चुनौती प्रस्तुत करैत अछि: सामाजिक अधीनताकेँ केवल आर्थिक वर्गमे समेटल नहि जा सकैत। जाति श्रम-विभाजन मात्र नहि, श्रमिकक विभाजन, सामाजिक सम्मान, विवाह, शिक्षा, धार्मिक वैधता आ राजनीतिक शक्ति संग जुड़ल संरचना अछि। भारतमे आलोचनात्मक सिद्धान्त यदि जातिक स्वतंत्र कारणात्मक शक्ति नहि जाँचत तऽ ओ अधूरा रहत। गांधीक ‘हिन्द स्वराज’ आधुनिक सभ्यता, मशीन, केंद्रीकृत राज्य आ अनियंत्रित इच्छा पर आलोचना करैत अछि। फ्रैंकफर्ट आधुनिकताक आलोचना संग समस्या-साम्य अछि, मुदा नैतिक आधार भिन्न: गांधी आत्मसंयम, स्वराज आ अहिंसा पर बल दैत छथि; फ्रैंकफर्ट परम्परा मार्क्सवादी सामाजिक सिद्धान्त, मनोविश्लेषण आ आधुनिक दर्शनसँ तर्क विकसित करैत अछि। समानता कहब सरल, भिन्नता स्पष्ट करब अधिक जरूरी। रवीन्द्रनाथ ठाकुर राष्ट्रवाद, यान्त्रिक संगठन आ मानवक सृजनशील स्वतन्त्रतापर जे प्रश्न उठबैत छथि, ओ आधुनिक संस्थागत विवेकक आलोचना संग संवाद खोलैत अछि। मुदा ठाकुरक मानवीयता, शिक्षा आ सांस्कृतिक विश्व-दृष्टि अपन अलग दार्शनिक परम्परा रखैत अछि; एकरा ‘भारतीय Frankfurt School’ कहब इतिहासक विकृति होयत। डी. डी. कोसाम्बीक ऐतिहासिक भौतिकतावादी पद्धति भारतीय इतिहासमे उत्पादन, सामाजिक संरचना, पुरातत्त्व, सिक्का, साहित्य आ स्थल-साक्ष्य जोड़बाक महत्त्व देखबैत अछि। एहि बहुस्रोत पद्धति आ फ्रैंकफर्टक अन्तरविषयी आग्रह बीच उपयोगी संवाद सम्भव, यद्यपि उद्देश्य आ सैद्धान्तिक भाषा अलग अछि। भारतीय प्रसंग आलोचनात्मक सिद्धान्तक ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ द्वैतकेँ चुनौती दैत अछि। परम्परा भीतर प्रतिरोध आ दमन दुनू हो सकैत; आधुनिक कानून भीतर मुक्ति आ नौकरशाही अधीनता दुनू। तैं न परम्पराक रोमानीकरण, न आधुनिकताक स्वतः महिमामण्डन। संस्था-दर-संस्था प्रमाण जाँचल जाए। औपनिवेशिकता बिना भारतीय आधुनिकताक आलोचना अपूर्ण अछि। भूमि-राजस्व, जनगणना, जातिगत वर्गीकरण, शिक्षा, कानून, भाषा-नीति आ ज्ञान-संस्थान उपनिवेशकालमे नूतन रूप पेलक। मुदा सभ वर्तमान समस्या उपनिवेशसँ शुरू भेल कहब सेहो गलत; पूर्व-औपनिवेशिक पदानुक्रम आ स्थानीय सत्ता-रूपक स्वतंत्र इतिहास जाँचब आवश्यक अछि। भारतीय संवादक समानान्तर सूत्र—‘वर्गकेँ जातिसँ, जातिकेँ लिंगसँ, लिंगकेँ धर्म वा क्षेत्रसँ, आ सभकेँ इतिहास आ अर्थनीतिसँ जोड़ू; मुदा कोनो एक श्रेणीमे दोसराकेँ विलीन नहि करू। आलोचना स्थानीय स्रोत, भाषिक अर्थ आ संवैधानिक गरिमाक कसौटी पर चलू।’
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक सामाजिक आलोचना लिखैत काल पहिल नियम—क्षेत्रकेँ सांस्कृतिक रूपेँ एकरूप नहि मानू। भारत आ नेपालक विभिन्न प्रशासनिक क्षेत्र, नगर-गाम, जाति-समूह, भाषा-रूप, लिंग-अनुभव, श्रम-व्यवस्था, प्रवास आ शिक्षा-अवसर अलग-अलग सामाजिक संसार बनबैत अछि। ‘मिथिला’ विश्लेषणक इकाई हो सकैत अछि, मुदा आन्तरिक विविधता लुकाबयबाक बहाना नहि। दोसर नियम—बौद्धिक परम्परा आ सामाजिक संरचना अलग स्रोतसँ जाँचू। न्याय, नव्य-न्याय, मीमांसा, साहित्य, पञ्जी, धर्मशास्त्र वा दरबारी लेखन महत्त्वपूर्ण स्रोत छथि, मुदा ई सभ सम्पूर्ण जनजीवनक प्रत्यक्ष प्रतिलिपि नहि। कृषक, कारीगर, स्त्री, दलित, सीमावर्ती समुदाय, मौखिक परम्परा, लोकगीत, न्यायालयी अभिलेख, राजस्व दस्तावेज, जनगणना, पत्र-पत्रिका आ जीवन-कथा अलग साक्ष्य देैत अछि। तेसर नियम—परम्परागत प्रतिष्ठाकेँ सामाजिक सत्यक प्रमाण नहि मानू। कोनो संस्था ‘प्राचीन’ अथवा ‘सम्मानित’ अछि, एहि कारण ओकर सामाजिक परिणाम स्वतः न्यायपूर्ण नहि। उलट दिशामे, आधुनिक वा डिजिटल संस्था स्वतः प्रगतिशील नहि। प्रश्न हमेशा परिणाम, प्रवेश, अपील, गरिमा आ शक्ति-संतुलनक अछि। चौठ नियम—भाषा स्वयं सामाजिक सत्ता संग जुड़ल अछि। कोन मैथिली रूप प्रतिष्ठित मानल जाइत अछि, कोन लिपि वा वर्तनी प्रकाशित होइत अछि, ककर भाषा ‘अशुद्ध’ कहल जाइत अछि, शिक्षा आ डिजिटल खोजमे कोन रूप दृश्य अछि—ई सभ सांस्कृतिक पूँजीक प्रश्न बनि सकैत अछि। मुदा भाषिक विविधताक अध्ययन वास्तविक उपयोगक आँकड़ा आ स्रोत पर आधारित हो। पाँचम नियम—प्रवास, शिक्षा आ माध्यमक कारण मिथिलाक सामाजिक अनुभव बहु-स्थानीय भऽ गेल अछि। गामक परिवार, महानगरमे श्रमिक वा पेशेवर सदस्य, नेपाल–भारतक सीमा-पार सम्बन्ध, डिजिटल संचार आ धन-प्रेषण एकहि गृहस्थ जीवनमे जुड़ि सकैत अछि। आलोचनात्मक अध्ययन लेल ‘स्थानीय समाज’केँ स्थिर भौगोलिक डब्बा मानब पर्याप्त नहि। छठम नियम—मिथिलाक संस्कृतिक उत्पादनकेँ संस्कृति उद्योगक सरल प्रतिलिपि नहि मानू। विवाहगीत, लोकनाट्य, चित्रकला, ई-पत्रिका, यूट्यूब, ऑडियो, प्रकाशन आ सोशल मीडिया अलग उत्पादन-तर्क रखैत अछि। कतहु बाजार प्रभुत्वशाली, कतहु सामुदायिक प्रतिष्ठा, कतहु स्वैच्छिक श्रम, कतहु मंचक एल्गोरिदम। प्रत्येक क्षेत्रक अर्थनीति अलग जाँचल जाए। सातम नियम—क्षेत्रीय गौरव आलोचनाक शत्रु नहि, मुदा प्रमाणक विकल्प सेहो नहि। मिथिलाक उपलब्धि लिखू, संगहि बहिष्कार, असमानता, संसाधन-वितरण आ मौन स्वरक प्रश्न उठाउ। आलोचना ‘अपमान’ नहि; प्रमाणसँ आत्मसमीक्षा क्षेत्रीय बौद्धिक परम्पराकेँ अधिक विश्वसनीय बनबैत अछि। आठम नियम—समानान्तर दर्शन फ्रैंकफर्टक ‘समग्र सामाजिक आलोचना’क आग्रह ग्रहण करैत अछि, मुदा एक सार्वभौम यूरोपीय कथा थोपैत नहि। मिथिलाक अध्ययनमे स्थानीय भाषाक स्रोत, भारतीय संवैधानिक मानदण्ड, जाति-लिंग-वर्ग सम्बन्ध, सीमा-पार भूगोल, ऐतिहासिक अभिलेख आ जीवित सांस्कृतिक अभ्यास सभकेँ एकहि प्रमाण-संवेदनशील ढाँचामे आनल जाए।
समकालीन प्रयोग
डिजिटल मंचमे फ्रैंकफर्टक संस्कृति-आलोचना नूतन रूप पबैत अछि। आज सामग्रीक चयन केवल सम्पादक नहि, अनुशंसा-एल्गोरिदम, विज्ञापन मॉडल, उपयोगकर्ता-डेटा आ ध्यान-अर्थनीति सेहो करैत अछि। प्रश्न ई नहि जे ‘एल्गोरिदम खराब अछि’; प्रश्न अछि ओकर लक्ष्य-फलन की, पारदर्शिता कतेक, त्रुटि आ पक्षपातक उपचार कोना, आ उपयोगकर्ता कतेक वास्तविक विकल्प रखैत अछि। समाचार आ राजनीतिक संचारमे ‘वायरल’ लोकप्रियता सत्यक प्रमाण नहि। आलोचनात्मक क्रम हो—मूल स्रोत खोजू → तिथि आ प्रसंग जाँचू → सम्पादन वा काट-छाँट देखू → आर्थिक/राजनीतिक हित पहचानू → वैकल्पिक स्रोत पढ़ू → तखन निर्णय करू। विचारधारा-आलोचना तथ्य-जाँचक स्थान नहि लैत; ओकर बादक सामाजिक व्याख्या प्रदान करैत अछि। कृत्रिम बुद्धि प्रणाली भाषा, छवि, वर्गीकरण आ निर्णय-सहायता बनबैत अछि। आलोचनात्मक प्रश्नसभ: प्रशिक्षण-सामग्री कतयसँ आयल? ककर भाषा कम प्रतिनिधित्व पेलक? मॉडल कोन त्रुटि नियमित रूपेँ करैत अछि? स्वचालनसँ श्रमक स्वरूप कोना बदलैत अछि? निर्णयक अपील सम्भव अछि? दक्षता आ न्याय दुनू मापल जाए। शिक्षामे परीक्षा-अंक, रैंकिंग आ ‘प्रदर्शन’ उपयोगी माप हो सकैत अछि, मुदा जखन ओ शिक्षा स्वयं बनि जाइत अछि तखन साधन लक्ष्यकेँ विस्थापित करैत अछि। आलोचनात्मक अध्ययन कक्षा-अनुभव, भाषा, संसाधन, शिक्षक-समय, सामाजिक पृष्ठभूमि, जिज्ञासा आ दीर्घकालीन क्षमता सभकेँ संग पढ़त। विश्वविद्यालय आ अनुसन्धानमे citation count, impact factor, ranking, grant size जकाँ सूचक निर्णयमे मदद करैत अछि, मुदा ओ ज्ञानक पूर्ण मूल्य नहि। मापदण्ड जखन लक्ष्य बनि जाइत अछि तखन शोध-विषय, भाषा, स्थानीय अभिलेख आ दीर्घकालीन सम्पादन जकाँ कम-मापनीय कार्य हाशियामे जा सकैत अछि। सांस्कृतिक सम्पादनमे स्वतंत्र ई-पत्रिका वा सामुदायिक अभिलेखागार बाजार-संस्कृतिक विकल्प दे सकैत अछि, मुदा ओकरा सेहो आत्मसमीक्षा चाही: लेखक चयन, पहुँच, अभिलेख संरक्षण, भाषा-विविधता, प्रतिउत्तर, संशोधन आ स्रोत-पारदर्शिता। ‘स्वतंत्र’ कहलासँ सत्ता-संबन्ध समाप्त नहि होइत। नीति-निर्माणमे आलोचनात्मक सिद्धान्तक उपयोग एहन हो: घोषित लक्ष्य लिखू → लाभार्थी आ प्रभावित समूह अलग करू → डेटा स्रोत जाँचू → वितरणात्मक परिणाम मापू → अनपेक्षित हानि खोजू → शिकायत/अपील सुनू → सार्वजनिक कारण दिअ → समयानुसार पुनर्मूल्यांकन करू। ई प्रक्रिया विचारधारात्मक नारा सँ अधिक कठोर अछि। कार्यस्थलमे उत्पादकता-सॉफ्टवेयर, निगरानी, स्कोर आ लक्ष्य व्यवस्थापनक दक्षता बढ़ा सकैत अछि। मुदा मानव श्रमकेँ मात्र मापनीय इकाई बनबैत काल स्वायत्तता, गोपनीयता, रचनात्मकता, विश्राम आ गरिमाक लागत जाँचब आवश्यक। ‘जे मापल जा सकैत अछि’ हमेशा ‘जे महत्त्वपूर्ण अछि’ केर बराबर नहि। उपभोक्ता समाजमे पसन्दक संख्या स्वतंत्रताक पूर्ण माप नहि। हजार विकल्प रहितो यदि सभ एकहि मंच, ऋण-व्यवस्था, डेटा-संग्रह वा विज्ञापन-तर्क भीतर बनल अछि, तऽ संरचनात्मक निर्भरता बचि सकैत अछि। उलट रूपेँ, बाजारक प्रत्येक पसन्दकेँ ‘झूठी आवश्यकता’ कहलासँ व्यक्तिक वास्तविक आनन्द आ एजेंसी अस्वीकार होइत अछि। दुनू अति सँ बचू।
अध्याय-निष्कर्ष
फ्रैंकफर्ट स्कूलक दार्शनिक महत्त्व ओकर नामक सूचीमे नहि, बल्कि आलोचनाक स्वरूप बदलयबाक प्रयासमे अछि। समाजकेँ केवल आर्थिक संरचना, केवल विचार, केवल मन अथवा केवल संस्था सँ नहि बुझल जा सकैत; एहि स्तरसभक परस्पर सम्बन्ध, इतिहास आ विरोधाभास जाँचब जरूरी अछि। Critical Theory पारम्परिक समाजविज्ञानक अनुभवजन्य अनुसन्धान अस्वीकार नहि करैत; ओ पूछैत अछि जे तथ्य कोन सामाजिक व्यवस्था भीतर बनल, सिद्धान्त कोन भूमिका निभबैत अछि, आ विद्यमान व्यवस्था परिवर्तनशील अछि कि नहि। एहि कारण तथ्य, इतिहास, मानदण्ड आ व्यवहार—चारूकेँ जोड़ल जाए। फ्रैंकफर्ट परम्पराक शक्ति ओकर अधिनायकवाद, संस्कृति, विचारधारा, साधनात्मक विवेक आ आधुनिक संस्थाक आत्म-विरोध पर तीक्ष्ण दृष्टिमे अछि। ओकर सीमा जखन ई आलोचना दर्शकक एजेंसी घटा दैत अछि, यूरोपीय अनुभव सार्वभौम बनबैत अछि, वा समाजकेँ अत्यधिक बन्द समग्रता मानि लैत अछि। भारतीय सन्दर्भ एहि परम्पराकेँ जाति, औपनिवेशिकता, धर्म, भाषा, ग्रामीण संरचना, संवैधानिकता आ बहुस्तरीय पहचानक प्रश्नसँ पुनर्गठित करबाक माँग करैत अछि। मिथिलाक प्रसंगमे स्थानीय स्रोत, बहुभाषिकता, क्षेत्रीय विविधता, प्रवास, जाति-लिंग-वर्ग सम्बन्ध आ डिजिटल परिवर्तनक स्वतंत्र अध्ययन आवश्यक अछि। समानान्तर दर्शन एहि अध्यायसँ एकटा मूल नियम ग्रहण करैत अछि: ‘समाजक घोषित आदर्श आ वास्तविक व्यवस्था बीच दूरी जाँचू।’ मुदा संगहि दोसर नियम जोड़ैत अछि: ‘आलोचक स्वयं प्रमाण, प्रतिपक्ष आ आत्मसमीक्षासँ मुक्त नहि।’ आलोचना स्वयं सत्ता बनि सकैत अछि, यदि ओकरा प्रश्न नहि कएल जाए। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘तथ्य देखू, इतिहास जोड़ू, सत्ता पहिचानू, विचारधारा जाँचू, पीड़ित अनुभव सुनू, प्रतिपक्ष पढ़ू, मानदण्ड स्पष्ट करू, आ परिवर्तनक सम्भावना खोलू। आलोचना केवल नकार नहि; अधिक स्वतंत्र, अधिक उत्तरदायी आ अधिक सत्यापित सामाजिक जीवनक खोज अछि।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• मैक्स होर्खाइमर — ‘Traditional and Critical Theory’ (1937), Critical Theory: Selected Essays मे संकलित। • मैक्स होर्खाइमर आ थियोडोर डब्ल्यू. अडोर्नो — Dialectic of Enlightenment। • थियोडोर डब्ल्यू. अडोर्नो, एल्से फ्रेंकेल-ब्रुन्सविक, डैनियल जे. लेविन्सन आ आर. नेविट सैनफोर्ड — The Authoritarian Personality। • थियोडोर डब्ल्यू. अडोर्नो — Minima Moralia: Reflections from Damaged Life। • थियोडोर डब्ल्यू. अडोर्नो — Negative Dialectics। • हर्बर्ट मार्क्यूजे — One-Dimensional Man: Studies in the Ideology of Advanced Industrial Society। • हर्बर्ट मार्क्यूजे — Eros and Civilization। • एरिक फ्रॉम — Escape from Freedom। • फ्रेडरिक पोलॉक — State Capitalism: Its Possibilities and Limitations। • फ्रांज न्यूमान — Behemoth: The Structure and Practice of National Socialism। • वाल्टर बेंजामिन — ‘The Work of Art in the Age of Its Technological Reproducibility’। • युर्गेन हाबर्मास — The Theory of Communicative Action, Vols. 1–2। • मार्टिन जे — The Dialectical Imagination: A History of the Frankfurt School and the Institute of Social Research, 1923–1950। • रॉल्फ विगर्सहाउस — The Frankfurt School: Its History, Theories, and Political Significance। • डेविड हेल्ड — Introduction to Critical Theory: Horkheimer to Habermas। • पीटर ई. गॉर्डन, एस्पेन हैमर आ एक्सेल होन्नेथ (सम्पादक) — The Routledge Companion to the Frankfurt School। • भीमराव रामजी आंबेडकर — Annihilation of Caste। • मोहनदास करमचन्द गांधी — Hind Swaraj or Indian Home Rule। • रवीन्द्रनाथ ठाकुर — Nationalism। • डी. डी. कोसाम्बी — An Introduction to the Study of Indian History।