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समस्या
त्रिकोणीय संवादक मानचित्र न्याय — स्थायी आत्मा • प्रमाण-विश्लेषण • सम्बन्धक सूक्ष्मता बौद्ध — अनात्मा • प्रक्रिया-सातत्य • स्वसंवेदन-विवाद आधुनिक मन-दर्शन — मस्तिष्क-निर्भरता • देहधर्मिता • प्रयोग • कृत्रिम बुद्धि (AI) साझा समस्या → भिन्न उत्तर → प्रमाण-परीक्षण → नियंत्रित तुलना मन, चेतना आ व्यक्तित्वक प्रश्नपर न्याय, बौद्ध दर्शन आ आधुनिक मन-दर्शन (philosophy of mind) केँ एक संग पढ़ब फलदायी अछि, मुदा एतय तुलना बहुत सावधानीसँ करबाक पड़ैत अछि। ज्ञान, चेतना, स्मृति, आत्मा, विषयी (subject), निरूपण (representation) आ संज्ञान (cognition) जकाँ शब्द अलग-अलग परम्परामे एकहि अर्थ नहि रखैत अछि। न्याय दर्शनक आत्मा, मनस्, इन्द्रिय आ ज्ञान-घटना सम्बन्धी तर्क अपन पदार्थमीमांसा, प्रमाणमीमांसा आ मोक्ष-सन्दर्भमे विकसित भेल; बौद्ध दर्शनक अनात्मा, क्षणिकता, प्रतीत्यसमुत्पाद, विज्ञान-सन्तान आ स्वसंवेदन-विवादक अपन ऐतिहासिक आ साधनात्मक प्रसंग अछि; आधुनिक मन-दर्शन तंत्रिका-विज्ञान (neuroscience), मनोविज्ञान (psychology), भाषा, संगणना (computation) आ विश्लेषणात्मक तत्त्वमीमांसा (analytic metaphysics)क बीच प्रश्न उठबैत अछि। तें शब्द-साम्यकेँ सिद्धान्त-साम्य मानि लेब तुलनात्मक भूल होयत। एहि अध्यायक वास्तविक प्रश्न ई नहि जे तीनूमे सँ “कौन सही” अछि। प्रश्न ई अछि जे स्मृति, अनुभूति, आत्मबोध, त्रुटि, कर्तृत्व, चेतना आ ज्ञानक वैधता सम्बन्धी साझा कठिनाइसभकेँ तीनू परम्परा कोना अलग ढंगसँ खोलैत अछि। समानान्तर पद्धति एतय ऐतिहासिक भिन्नता बचबैत समस्या-स्तरपर संवाद बनबैत अछि। पहिल कठिनाई विषयी-आश्रय (subject-bearer)क अछि। ज्ञान होइत अछि तँ ककर? न्याय स्थायी आत्माकेँ ज्ञान, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख आ दुःख जकाँ गुणक आश्रय मानैत अछि। अनेक बौद्ध परम्परा स्थायी आत्मा स्वीकार नहि करैत कारणात्मक प्रवाह (causal stream), स्कन्ध-समूह (aggregates) वा संज्ञान-श्रृंखला (cognition-series) द्वारा सातत्य बुझबैत अछि। आधुनिक मन-दर्शनमे आत्मबोध (self) केँ कखनो स्थायी सत्ता, कखनो आख्यानात्मक निर्माण (narrative construction), कखनो देहगत प्रणाली (embodied system), कखनो आत्म-प्रतिमान (self-model), आ कखनो व्यवहारिक व्यक्ति-स्तरीय कोटि रूपमे बुझल जाइत अछि। दोसर कठिनाई उद्देश्यता (intentionality)क अछि—ज्ञान ककरा विषय बनबैत अछि? न्यायमे विषय, विशेष्य, विशेषक, सम्बन्ध आ त्रुटिक विश्लेषण अत्यन्त सूक्ष्म अछि। बौद्ध ज्ञानमीमांसामे प्रत्यक्ष, अनुमान, अपोह, आभास आ अवधारणात्मक आरोपणक भिन्न विवेचन अछि। आधुनिक दर्शन बाह्यवाद (externalism), निरूपणवाद (representationalism), प्रयोजनार्थमीमांसा (teleosemantics), पूर्वानुमानात्मक संसाधन (predictive processing) आ क्रियात्मकतावाद (enactivism)क माध्यमसँ मानसिक विषय-वस्तुक प्रश्न उठबैत अछि।
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे न्याय, बौद्ध आ आधुनिक मन-दर्शनक बीच सर्वाधिक फलदायी संवाद सिद्धान्त-समानता पर नहि, समस्या-समानता पर आधारित होयत। चेतना, संज्ञान, त्रुटि, स्मृति, आत्मबोध, उद्देश्यता आ प्रमाण साझा प्रश्न बनि सकैत अछि; मुदा सत्तामीमांसा (ontology), मोक्षमीमांसा (soteriology), पद्धति आ ऐतिहासिक शब्दावलीकेँ अलग रखब आवश्यक अछि। समानान्तर पद्धति कोनो वंशावलीगत उत्पत्ति (genealogy) सिद्ध करबाक परियोजना नहि। ई नहि कहैत अछि जे आधुनिक मन-दर्शन न्याय अथवा बौद्ध दर्शनसँ निकलल, आ नहि ई दावा करैत अछि जे शास्त्रीय भारतीय कोटिसभ आधुनिक तंत्रिका-विज्ञानक निष्कर्ष पहिनेसँ जानैत छल। दावा केवल एतबा अछि जे स्वतन्त्र रूपेँ विकसित दार्शनिक परम्परासभ किछु समान कठिन प्रश्नपर अलग अवधारणात्मक साधन उपलब्ध करबैत छथि। न्यायक प्रमुख बल सूक्ष्म भेद अछि। आत्मा, मनस्, इन्द्रिय, अर्थ, ज्ञान, स्मृति, इच्छा, प्रयत्न, सुख, दुःख, अभाव आ त्रुटिक सम्बन्धक विश्लेषणमे न्याय बहुत महीन भेद करैत अछि। नव्य-न्याय एहि सम्बन्ध-भाषाकेँ आरो सूक्ष्म बनबैत अछि। आधुनिक मन-दर्शन लेल एहि परम्पराक महत्त्व “पूर्वगामी विश्लेषणात्मक दर्शन” घोषित करबमे नहि, बल्कि अवधारणात्मक अनुशासनमे अछि। बौद्ध परम्पराक प्रमुख बल प्रक्रिया-अभिमुखता अछि। व्यक्ति स्थायी पदार्थ अछि कि कारणात्मक रूपेँ जुड़ल बदलैत प्रक्रिया—ई प्रश्न बौद्ध अनात्म-दृष्टि बहुत तीक्ष्ण बनबैत अछि। स्कन्ध, संस्कार, स्मृति, देहगत अवस्था आ सामाजिक सम्बन्धक प्रवाह स्थायी आत्माक अनिवार्यता पर प्रश्न उठबैत अछि। मुदा अनात्माकेँ केवल “आत्म-भ्रम (self illusion)” कहि देब उचित नहि; एकर नैतिक, कारणात्मक, ध्यानात्मक आ मोक्षमीमांसक सन्दर्भ अछि। आधुनिक मन-दर्शनक प्रमुख बल अनुभवजन्य समेकन (empirical integration) अछि। मस्तिष्क-आघात, तंत्रिका-चित्रण (neuroimaging), निश्चेतना (anesthesia), विभक्त-मस्तिष्क (split-brain), विकासात्मक मनोविज्ञान, मनोचिकित्सकीय विकार, देहधर्मिता, संगणकीय प्रतिमान-निर्माण (computational modelling), कृत्रिम बुद्धि आ संज्ञानात्मक तंत्रिका-विज्ञान मानसिक अवधारणासभकेँ एहन प्रमाणक सामने आनैत अछि जे शास्त्रीय परम्परासभक अनुभवजन्य आधारसँ बहुत अलग अछि। एहि प्रमाणकेँ शास्त्रीय कोटिपर बलपूर्वक आरोपित करब नहि, बल्कि संवादक कसौटी बनाबय चाही।
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—“ककर ज्ञान?” प्रश्न तीनू परम्पराक केन्द्रमे अछि, मुदा उत्तर एक नहि। न्याय स्थायी विषयी मानैत अछि; बौद्ध कारणात्मक प्रवाह वा व्यवहारगत व्यक्ति-सातत्य पर जोर दैत अछि; आधुनिक देहगत वा कार्यात्मक विवेचन जीव वा प्रणाली-स्तरीय संगठनपर जोर दऽ सकैत अछि। तें “विषयी (subject)” शब्दक एकहि सार्वत्रिक अर्थ मानब उचित नहि। दोसर तर्क—स्मृति व्यक्ति-पहिचानक निर्णायक प्रमाण नहि, मुदा सातत्यक महत्त्वपूर्ण कसौटी अछि। न्याय स्मरणकर्ता आ पूर्वानुभवकर्ताक एकत्वसँ स्थायी आत्माक पक्ष मजबूत करैत अछि। बौद्ध उत्तर कारणात्मक उत्तराधिकार द्वारा सातत्य बुझबैत अछि। आधुनिक विचार-प्रयोग स्मृति-स्थानान्तरण, स्मृतिलोप आ विभाजन-प्रकरण द्वारा पहचान आ सातत्यक भेद स्पष्ट करैत अछि। तेसर तर्क—प्रत्यभिज्ञान केवल स्मृति नहि। “ई ओही वस्तु अछि” कहैत समय पूर्व अनुभव, वर्तमान प्रत्यक्ष आ एकत्व-निर्णय जुड़ैत अछि। न्याय एहि प्रकारक बोधसँ स्थायी विषयी लेल समर्थन खोजि सकैत अछि; बौद्ध आलोचना कारणात्मक श्रृंखलामे पूर्व प्रभाव मानि स्थायी आत्मा निष्कर्षकेँ चुनौती दैत अछि; आधुनिक संज्ञान-विज्ञान प्रतिरूप-पहिचान (pattern recognition)क यांत्रिक विवेचन दैत अछि। चारिम तर्क—आत्म-बोधक संरचनापर न्याय आ बौद्ध विवाद आधुनिक अधिसंज्ञानसँ सार्थक संवाद खोलैत अछि। अनुव्यवसाय परवर्ती ज्ञानक माध्यमसँ पूर्व ज्ञानक बोध बतबैत अछि; स्वसंवेदन ज्ञानक आत्म-प्रकाशी पक्ष पर जोर दैत अछि; आधुनिक उच्च-स्तरीय निरूपण (higher-order representation), वैश्विक उपलब्धता (global availability) आ अधिसंज्ञानात्मक पहुँच (metacognitive access) अलग प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। पाँचम तर्क—“कौन पहिने?” सँ अधिक उपयोगी प्रश्न अछि—“कौन अवधारणा कोन समस्या अधिक स्पष्ट करैत अछि?” ऐतिहासिक प्राथमिकता स्रोत-प्रमाणक विषय अछि; अवधारणात्मक उपयोगिता अलग कसौटी अछि। छठम तर्क—त्रुटि मनक बनावट बुझबाक दर्पण अछि। न्याय भ्रममे आश्रय, विषय, विशेषक, स्मृति आ सम्बन्धक दोष जाँचैत अछि। बौद्ध विचार अवधारणात्मक आरोपण पर प्रश्न उठबैत अछि। पूर्वानुमानात्मक संसाधन (predictive processing) प्रत्यक्षकेँ पूर्व-अपेक्षा आ इन्द्रिय-सूचनाक परस्पर क्रियासँ बुझैत अछि। तीनू विवेचन एक नहि, मुदा तीनू मानसिक मध्यस्थताक प्रश्न खोलैत अछि। सातम तर्क—प्रथम-पुरुष प्रामाणिकता अभ्रान्तता नहि। हम अपन पीड़ा, इच्छा वा अनुभूतिक विशेष पहुँच रखैत छी, मुदा आत्म-वञ्चना, कथानिर्मिति, अप्रत्यक्ष पूर्वाग्रह आ मिथ्या-वर्णन सम्भव अछि। एतय न्याय-बौद्ध अन्तर्बोध-विवाद आधुनिक आत्मज्ञानक प्रश्नसँ फलदायी संवाद करि सकैत अछि। आठम तर्क—तृतीय-पुरुष प्रमाण सेहो स्वयं पर्याप्त नहि। मस्तिष्क-चित्र मानसिक अर्थ स्वतः नहि पढ़ैत; कार्य-सन्दर्भ, व्यवहार, प्रतिवेदन, चिकित्सकीय परिस्थिति आ व्याख्या चाही। तें मानसिक-अवस्था सम्बन्धी दाबी बहुप्रमाणीय रहबाक चाही।
पूर्वपक्ष
पहिल पूर्वपक्ष: न्याय स्थायी आत्मा मानैत अछि आ बौद्ध अनात्मा; तें वास्तविक संवाद सम्भव नहि। उत्तर ई जे असहमति संवादक बाधा नहि, ओकर आधार अछि। स्मृति, कर्तृत्व, त्रुटि आ सातत्य जकाँ साझा व्याख्येय पर प्रतिस्पर्धी उत्तर तुलना योग्य छथि। दोसर पूर्वपक्ष: शास्त्रीय भारतीय प्रणालिसभ धार्मिक वा मोक्षाभिमुख छथि, आधुनिक दर्शन वैज्ञानिक; तें तुलना कोटि-त्रुटि (category mistake) अछि। आपत्तिक एक भाग सही अछि—ऐतिहासिक लक्ष्य अलग छथि। मुदा प्रत्यक्ष, अनुमान, स्मृति, भाषा, आत्मबोध आ तर्कपर शास्त्रीय दार्शनिक दाबीसभ समस्या-स्तरपर तुलना योग्य छथि। तेसर पूर्वपक्ष: आधुनिक तंत्रिका-विज्ञानक बाद आत्मा–अनात्मा विवाद अप्रासंगिक भऽ गेल। तंत्रिका-विज्ञान निर्भरता, क्रियाविधि आ सहसम्बन्धक अनेक प्रश्न स्पष्ट करैत अछि; मुदा व्यक्ति-पहिचान, विषयिता, प्रथम-पुरुष प्रामाणिकता, मानकता आ चेतनाक तत्त्वमीमांसा स्वतः समाप्त नहि होइत। चारिम पूर्वपक्ष: बौद्ध अनात्मा आधुनिक संज्ञान-विज्ञान द्वारा सिद्ध भऽ गेल। ई अतिशयोक्ति अछि। संज्ञान-विज्ञान स्थिर अन्तःपुरुषी आत्माक अनेक प्रतिमान कमजोर करि सकैत अछि, मुदा बौद्ध अनात्म-दृष्टिक नैतिक आ मोक्षमीमांसक प्रतिपादन कोनो एक वैज्ञानिक निष्कर्ष नहि। पाँचम पूर्वपक्ष: न्याय अनुव्यवसाय उच्च-स्तरीय सिद्धान्तक प्राचीन रूप अछि। समस्या-स्तरपर साम्य अवश्य अछि, मुदा अवधारणात्मक भूमिका, सत्तामीमांसा, कारण-विवेचन, शब्दावली आ लक्ष्य भिन्न छथि। ऐतिहासिक प्रमाण बिना “पूर्वरूप” कहब उचित नहि। छठम पूर्वपक्ष: स्वसंवेदन अनुभवगत चेतना (phenomenal consciousness)क ठीक ओही सिद्धान्त अछि जे आधुनिक दर्शनमे भेटैत अछि। ई सेहो अनुचित तादात्म्य अछि। बौद्ध विवाद ज्ञानक आत्म-प्रकाशिता पर केन्द्रित अछि; आधुनिक अनुभवगत चेतनाक शब्दावली आ समस्या-विन्यास अलग अछि। सातम पूर्वपक्ष: जँ अन्तमे सभ परम्परा अलग छथि, त तुलना निरर्थक। उलटे, नियंत्रित तुलना प्रत्येक परम्पराक छिपल पूर्वधारणाकेँ अधिक स्पष्ट करैत अछि। न्याय स्थायी आश्रयक प्रश्न उठबैत अछि, बौद्ध स्थायी पदार्थक अनिवार्यता चुनौती दैत अछि, आ आधुनिक विज्ञान अनुभवजन्य सीमा प्रस्तुत करैत अछि। आठम पूर्वपक्ष: मिथिलाक उल्लेख केवल क्षेत्रीय गौरवक कारण अछि। यदि एहन हो तँ आपत्ति उचित होयत। एहि अध्यायमे मिथिलाक महत्त्व प्राथमिकता-दाबी नहि, बल्कि पूर्वपक्ष–उत्तरपक्ष, परिभाषा, सम्बन्ध-विच्छेद आ प्रमाण-परीक्षणक पद्धतिगत संस्कार रूपमे अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल उत्तर—तुलना समता नहि, सम्बन्ध अछि। दू अवधारणाक बीच साम्य, भेद, अनुवाद-कठिनाई आ व्याख्यात्मक परिणाम अलग-अलग दर्ज कएल जाए। दोसर उत्तर—प्रत्येक तुलनात्मक दाबी लेल तीन प्रश्न अनिवार्य हो: ऐतिहासिक स्रोत की? मूल पारिभाषिक अर्थ की? आधुनिक तुलना कोन विशिष्ट समस्या-अक्षपर अछि? एहि त्रिस्तरीय कसौटी सँ कालभ्रम घटैत अछि। तेसर उत्तर—न्यायकेँ केवल “पदार्थ-सिद्धान्त” कहि समाप्त नहि करू। ज्ञान-वर्गीकरण, त्रुटि, शब्द-प्रमाण, अनुमान, स्मृति, इच्छा, प्रयत्न आ भाषा-विश्लेषणक व्यापक परम्परा मन-दर्शन लेल महत्त्वपूर्ण अछि। चारिम उत्तर—बौद्ध दर्शनकेँ केवल “अनात्मा” नारा धरि सीमित नहि करू। अभिधर्मक मानसिक घटक, दिङ्नाग–धर्मकीर्तिक ज्ञानमीमांसा, माध्यमिक आलोचना, योगाचार आ स्वसंवेदन-विवादक भीतर पर्याप्त बहुलता अछि। पाँचम उत्तर—आधुनिक मन-दर्शन एक स्वर नहि। भौतिकवाद (physicalism), कार्यात्मकतावाद (functionalism), निरूपणवाद (representationalism), क्रियात्मकतावाद (enactivism), उच्च-स्तरीय सिद्धान्त, आख्यानात्मक आत्मबोध, अनुभवविज्ञान (phenomenology), पूर्वानुमानात्मक संसाधन आ उन्मूलनवाद (eliminativism) आपसमे असहमत छथि। छठम उत्तर—जखन प्रश्न अनुभवजन्य हो, त आधुनिक विज्ञान निर्णायक सीमा प्रस्तुत करैत अछि। मुदा अवधारणात्मक अनिवार्यफल, मानकता वा तत्त्वमीमांसक व्याख्या लेल दार्शनिक विश्लेषण अलग आवश्यक अछि। सातम उत्तर—प्रथम-पुरुष अनुभवकेँ प्रमाण मानू, अभ्रान्त वाणी नहि। तृतीय-पुरुष तंत्रिका-विज्ञानकेँ शक्तिशाली प्रमाण मानू, पूर्ण अर्थगत व्याख्या नहि। आठम उत्तर—कृत्रिम बुद्धि सम्बन्धी मानसिक शब्दावलीकेँ मानवीकरणात्मक शॉर्टकट नहि बनाउ। “समझैत अछि”, “याद रखैत अछि”, “चाहैत अछि” जकाँ कथनमे कार्यगत, संरचनात्मक, अनुभवगत आ नैतिक अर्थ अलग-अलग जाँचू।
भारतीय संवाद
भारतीय मन-विमर्शक पहिल शर्त बहुलता स्वीकारब अछि। “भारतीय दर्शन”क एक आत्म-सिद्धान्त नहि। न्याय स्थायी आत्मा मानैत अछि; सांख्य पुरुष आ चित्तक भेद दैत अछि; मीमांसा ज्ञाताक स्वरूपपर आन्तरिक मतभेद रखैत अछि; अद्वैत साक्षी–आत्माक अद्वैत विवेचन दैत अछि; बौद्ध परम्परासभ अनात्मा आ प्रक्रिया-सातत्यक अनेक रूप प्रस्तुत करैत छथि; जैन दर्शन जीवक अलग सत्तामीमांसा विकसित करैत अछि। न्याय–बौद्ध विवाद विशेष रूपेँ उपयोगी अछि, किएक तँ दुनू प्रत्यक्ष, अनुमान, भाषा, त्रुटि आ ज्ञानक वैधतापर सूक्ष्म तर्क दैत अछि, मुदा आत्माक विषयमे गम्भीर मतभेद रखैत अछि। एहि कारण संवाद वास्तविक दार्शनिक दबाव उत्पन्न करैत अछि, कृत्रिम समानता नहि। न्यायक स्मृति-तर्क स्थायी विषयी लेल सहज बल रखैत अछि: जे अनुभव कएलक, स्मृति ओकर होइत अछि। बौद्ध उत्तर कारणात्मक सातत्यक माध्यमसँ “मोर स्मृति”क अपनत्व बुझबाक प्रयास करैत अछि। आधुनिक अध्ययन स्मृति-पुनर्निर्माण, मिथ्या-स्मृति, स्मृतिलोप आ तंत्रिकीय परिवर्तनक आधारपर दुनू तर्ककेँ नव प्रश्नक सामने आनैत अछि। बौद्ध क्षणिकतावाद स्थायी आश्रयकर्ताक आवश्यकता चुनौती दैत अछि, मुदा कारणात्मक प्रभाविता आ सातत्य बुझाबयक भार स्वयं स्वीकारैत अछि। आधुनिक प्रक्रिया-विवेचन एहि प्रश्नक समकालीन समानरूप दे सकैत अछि, मुदा कर्म वा मोक्षमीमांसासँ तादात्म्य नहि। आत्म-प्रतिबिम्बी बोधक विवाद त्रिकोणीय संवादक केन्द्र बनि सकैत अछि। न्याय अनुव्यवसाय, बौद्ध स्वसंवेदन, अनुभवविज्ञानक पूर्व-प्रतिबिम्बी बोध, आ आधुनिक अधिसंज्ञान—चारू “अपन बोधक बोध”क अलग संरचना प्रस्तुत करैत अछि।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक दार्शनिक महत्त्व एहि अध्यायमे प्राथमिकता-दाबी नहि। मिथिला न्याय–नव्य-न्याय, मीमांसा, भाष्य, शास्त्रार्थ आ पाण्डित्यपरम्पराक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र रहल अछि; मुदा एहि ऐतिहासिक तथ्यसँ “आधुनिक मन-दर्शन एतय पहिनेसँ छल” एहन निष्कर्ष नहि निकलैत। मिथिलाक समानान्तर योगदान मुख्यतः पद्धतिमे अछि। कोनो ज्ञान-दाबी लेल पूछल जाए—आश्रय की? विषय की? विशेषक की? सम्बन्ध की? कारण की? प्रतिवाद की? बाधक की? अभावक स्थिति की? एहि सम्बन्धात्मक अनुशासनक आधुनिक अवधारणात्मक विश्लेषणमे उपयोगी स्थान अछि। स्थानीय पाण्डुलिपि, टीका, शास्त्रीय वंशावली आ मुद्रित संस्करण उपयोग करैत आलोचनात्मक सम्पादन, तिथि, पाठभेद आ स्रोत-परम्परा स्पष्ट राखब आवश्यक। क्षेत्रीय गौरव स्रोत-समालोचनाक विकल्प नहि। मैथिली पारिभाषिक शब्दावली विकसित करब सेहो ज्ञानमीमांसक कार्य अछि। “मन (mind)”, “चेतना (consciousness)”, “आत्मबोध (self)”, “बोध (awareness)”, “संज्ञान (cognition)” आ “निरूपण (representation)” केँ एकहि शब्दमे मिला देला सँ दार्शनिक भेद नष्ट होइत अछि। आवश्यकतानुसार मनस्, चित्त, विज्ञान, बोध, अनुभूति, आत्मा, व्यक्ति, ज्ञान आ प्रत्ययक अर्थ अलग स्पष्ट करबाक चाही। मिथिलाक लोक आ साहित्यिक अनुभव मन-दर्शनक अनुभवजन्य विकल्प नहि, मुदा स्मृति, शोक, प्रवास, स्वप्न, रोग, सम्बन्ध, व्यक्तित्व आ पहिचानक जीवनगत अवधारणा बुझबाक पूरक अभिलेखागार बनि सकैत अछि। एहन सामग्रीकेँ दार्शनिक तर्कमे उपयोग करबाक लेल विधा, प्रसंग आ स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक अछि। प्रमाण-पारिस्थितिकी प्रथम-पुरुष अनुभव • व्यवहारगत प्रमाण • तंत्रिकीय आँकड़ा • सामाजिक प्रसंग • अवधारणात्मक सुसंगति एकहि स्रोत अन्तिम नहि — संयुक्त परीक्षण आवश्यक
समकालीन प्रयोग
चेतना-विकारक चिकित्सकीय तंत्रिका-विज्ञान (clinical neurology of disorders of consciousness) त्रिकोणीय संवादक सीमा स्पष्ट करैत अछि। बाहरी प्रतिक्रिया कम होएत चेतना अनुपस्थित मानि लेब जोखिमपूर्ण अछि। व्यवहारगत परीक्षण, तंत्रिकीय मापन, पुनरावृत्त जाँच आ परिवारक साक्ष्यक अलग-अलग प्रमाण-मूल्य अछि। बहुप्रमाणीय विवेकवाद एतय व्यावहारिक महत्त्व रखैत अछि। मनोभ्रंश (dementia) व्यक्ति-पहिचानक प्रश्न तीक्ष्ण करैत अछि। आत्मकथात्मक स्मृति कमजोर भेला मात्रसँ व्यक्ति समाप्त नहि भऽ जाइत। देहगत सातत्य, भावात्मक प्रतिक्रिया, सामाजिक प्रत्यभिज्ञान, सम्बन्ध आ गरिमा स्मृति-केंद्रित सिद्धान्तक सीमा देखबैत अछि। न्याय स्थायी आत्माक एक तत्त्वमीमांसक उत्तर दैत अछि; बौद्ध प्रक्रिया-सातत्य दोसर प्रकारक उत्तर; आधुनिक नैतिकता देखभाल आ गरिमापर जोर दैत अछि। मनोचिकित्सामे भ्रमात्मक विश्वास (delusion) वा मिथ्या-अनुभूति (hallucination) केँ केवल “गलत विश्वास” कहि खारिज करब पर्याप्त नहि। अनुभूतिक बनावट, आघात, तंत्रिका-जैविकी, सामाजिक प्रसंग आ तर्क-पद्धति सभ जाँचबाक पड़ैत अछि। एतय न्यायिक त्रुटि-विवेचन, बौद्ध अवधारणात्मक आरोपण आ आधुनिक मनोविज्ञान अलग-अलग प्रश्न उठबैत अछि। कृत्रिम बुद्धिक भाषा-प्रतिमान (language model) प्रवाहपूर्ण उत्तर दऽ सकैत अछि, पूर्व संवादक सूचना उपयोग करि सकैत अछि आ आत्म-सन्दर्भक वाक्य बना सकैत अछि। मुदा एहि व्यवहारसँ अनुभवगत विषयी, स्थायी आत्मा वा चेतना स्वतः सिद्ध नहि होइत। संरचना, सातत्य, जगत-संबंध, कर्तृत्व, भाव-मूल्य, देहधर्मिता आ कारणात्मक एकीकरणक स्वतंत्र प्रमाण चाही। डिजिटल पहिचान (digital identity)मे खाता-सातत्य, जैवमितीय सातत्य आ व्यक्तित्वता अलग-अलग प्रश्न छथि। संकेतशब्द वा ऑनलाइन विवरण व्यक्ति स्वयं नहि, मुदा डिजिटल अभिलेख सामाजिक प्रत्यभिज्ञान, अधिकार आ प्रतिष्ठापर गम्भीर प्रभाव डालि सकैत अछि। तें तत्त्वमीमांसक आत्मा आ संस्थागत पहिचान अलग राखब आवश्यक अछि। मस्तिष्क–संगणक अन्तरफलक (brain–computer interface) मानसिक गोपनीयता (mental privacy)क प्रश्न उठबैत अछि। तंत्रिकीय संकेतक सांख्यिकीय व्याख्याकेँ “विचार-पठन (thought reading)” कहि देब सावधानी माँगैत अछि। संकेत-व्याख्या प्रायः निश्चित कार्य आ प्रशिक्षणपर आधारित अनुमान होइत अछि; ई मनक सम्पूर्ण अन्तर्वस्तु तक सीधा पहुँच नहि। न्यायक अनुमान-अनुशासन एहन अतिरंजित दाबीक परीक्षण लेल उपयोगी तुलनात्मक साधन बनि सकैत अछि। ध्यान-अनुसन्धान (meditation research)मे बौद्ध पारिभाषिक कोटिक वैज्ञानिक उपयोग करैत समय विशेष सावधानी चाही। स्मृति-सजगता, समाधि, वेदना, विज्ञान वा अनात्म-अनुभवकेँ मनोवैज्ञानिक चरमे बदलैत समय मूल दार्शनिक सन्दर्भ, साधकक भिन्नता, मापनक वैधता आ प्रतिकूल प्रभाव दर्ज करबाक चाही। शब्दक मात्र अनुवाद अनुभवक पूर्ण समानता सिद्ध नहि करैत।
अध्याय-निष्कर्ष
न्याय, बौद्ध आ आधुनिक मन-दर्शनक त्रिकोणीय संवादक मुख्य उपलब्धि कोनो विजेता चुनब नहि, बल्कि प्रश्नकेँ अधिक सूक्ष्म बनब अछि। न्याय विषयी, सम्बन्ध, ज्ञान, त्रुटि आ प्रमाणक सूक्ष्मता दैत अछि। बौद्ध दर्शन प्रक्रिया, अनित्यता, अनात्मा, निर्भर सातत्य आ स्वसंवेदनक चुनौती दैत अछि। आधुनिक दर्शन आ विज्ञान देहधर्मिता, मस्तिष्क-निर्भरता, संगणना, चिकित्सकीय प्रमाण, कृत्रिम बुद्धि आ प्रयोगात्मक सीमा जोड़ैत अछि। तीनूकेँ समान घोषित करब दार्शनिक इतिहासक क्षति होयत; पूर्णतः असम्बद्ध मानब तुलनात्मक अवसरक क्षति। समानान्तर पद्धति बीचक कठोर मार्ग चुनैत अछि—ऐतिहासिक भिन्नता सुरक्षित राखू, साझा समस्या-अक्षपर प्रश्न पूछू, प्रमाणक स्तर अलग करू, अनुवादक सीमा स्वीकारू, प्रतिपक्षकेँ न्यायपूर्ण रूपेँ प्रस्तुत करू, आ निष्कर्षकेँ त्रुटिसंशोध्य राखू। अध्याय 81क सूत्र: “समान प्रश्न समान सिद्धान्त नहि बनबैत अछि; मुदा सही तुलना अपन-अपन सिद्धान्तक छुपल पूर्वधारणा देखाबि सकैत अछि।”
अध्याय-ग्रन्थसूची
Gautama — Nyāya-sūtra Vātsyāyana — Nyāya-bhāṣya Uddyotakara — Nyāya-vārttika Udayana — Ātmatattvaviveka Gaṅgeśa — Tattvacintāmaṇi Bimal Krishna Matilal — Perception: An Essay on Classical Indian Theories of Knowledge Bimal Krishna Matilal — The Character of Logic in India Jonardon Ganeri — The Self: Naturalism, Consciousness, and the First-Person Stance Jonardon Ganeri — Attention, Not Self Stephen H. Phillips — Epistemology in Classical India: The Knowledge Sources of the Nyāya School Matthew R. Dasti and Stephen H. Phillips (eds.) — The Nyāya-sūtra: Selections with Early Commentaries Mark Siderits — Buddhism as Philosophy: An Introduction Mark Siderits — Personal Identity and Buddhist Philosophy: Empty Persons Miri Albahari — Analytical Buddhism: The Two-Tiered Illusion of Self Jay L. Garfield — Engaging Buddhism: Why It Matters to Philosophy Georges Dreyfus — Recognizing Reality: Dharmakīrti’s Philosophy and Its Tibetan Interpretations Dan Arnold — Brains, Buddhas, and Believing: The Problem of Intentionality in Classical Buddhist and Cognitive-Scientific Philosophy of Mind Christian Coseru — Perceiving Reality: Consciousness, Intentionality, and Cognition in Buddhist Philosophy Evan Thompson — Waking, Dreaming, Being: Self and Consciousness in Neuroscience, Meditation, and Philosophy Richard F. Gombrich — What the Buddha Thought Steven Collins — Selfless Persons: Imagery and Thought in Theravāda Buddhism Paul Williams — The Reflexive Nature of Awareness: A Tibetan Madhyamaka Defence John Taber — A Hindu Critique of Buddhist Epistemology: Kumārila on Perception Roy W. Perrett — An Introduction to Indian Philosophy Chakravarthi Ram-Prasad — Advaita Epistemology and Metaphysics: An Outline of Indian Non-Realism Alex Watson — The Self’s Awareness of Itself: Bhaṭṭa Mīmāṃsā and Advaita Vedānta Derek Parfit — Reasons and Persons Sydney Shoemaker — Self-Knowledge and Self-Identity Galen Strawson — Selves: An Essay in Revisionary Metaphysics Thomas Metzinger — Being No One: The Self-Model Theory of Subjectivity Shaun Gallagher — How the Body Shapes the Mind Daniel Dennett — Consciousness Explained David Chalmers — The Conscious Mind Ned Block — “On a Confusion about a Function of Consciousness” Fred Dretske — Naturalizing the Mind Ruth Millikan — Language, Thought, and Other Biological Categories Andy Clark — Surfing Uncertainty: Prediction, Action, and the Embodied Mind Alva Noë — Action in Perception Francisco Varela, Evan Thompson and Eleanor Rosch — The Embodied Mind Antonio Damasio — Self Comes to Mind