समस्या यथार्थवाद-विवादक मानचित्र वैज्ञानिक सफलता → सत्यक निकटता? → अदृश्य सत्ता → सिद्धान्त-परिवर्तन यथार्थवादी उत्तर — सफल सिद्धान्त वास्तविक जगतक संरचना वा सत्ताक पर्याप्त निकट वर्णन करैत अछि अनुभववादी उत्तर — अनुभव-संगतता पर्याप्त; अदृश्य सत्तापर अतिरिक्त प्रतिबद्धता आवश्यक नहि मध्यवर्ती उत्तर — संरचना, कारणात्मक हस्तक्षेप, दृष्टिकोण आ क्षेत्र-सीमा अलग-अलग जाँचू विज्ञानक सफलता असाधारण अछि। ग्रहक गति सँ जीन-संपादन, अर्धचालक सँ प्रतिरक्षा-विज्ञान, दूरबीन सँ कण-त्वरक धरि वैज्ञानिक सिद्धान्त एहन भविष्यवाणी, नियन्त्रण आ व्याख्या सम्भव करैत अछि जे सामान्य अनुमानसँ बहुत आगाँ अछि। प्रश्न उठैत अछि—ई सफलता एहि कारण अछि जे विज्ञान जगतक वास्तविक बनावटकेँ कम-बेसी सही पकड़ैत अछि, अथवा केवल एहि कारण जे सिद्धान्त अनुभवजन्य रूपेँ सफल साधन छथि? वैज्ञानिक यथार्थवादक नूतन विवाद एहि प्रश्नक अनेक रूप खोलैत अछि। वैज्ञानिक यथार्थवाद (scientific realism) एकटा अकेला सिद्धान्त नहि। सामान्यतः एकर तीन दाबी अलग कएल जा सकैत अछि: पहिल, विज्ञान वर्णित जगत मनुष्यक धारणा सँ स्वतंत्र अस्तित्व रखैत अछि; दोसर, सफल वैज्ञानिक सिद्धान्त अदृश्य सत्ता—जैसे इलेक्ट्रॉन, जीन, कृष्ण-विवर, विषाणु वा क्षेत्र—विषयमे वास्तविक ज्ञान दे सकैत अछि; तेसर, उत्कृष्ट सिद्धान्त केवल गणनात्मक औजार नहि, कम-बेसी सत्य वा सत्यक निकट वर्णन हो सकैत अछि। एहि तीनू दाबीक शक्ति एक समान नहि, आ आधुनिक विवाद ठीक एहि भेदसभपर केन्द्रित अछि। यथार्थवादी पक्षक प्रसिद्ध तर्क “चमत्कार-न-होय तर्क (no-miracles argument)” अछि। यदि वैज्ञानिक सिद्धान्त जगतक वास्तविक संरचना अथवा कारणात्मक सम्बन्धक किछु सही पक्ष नहि पकड़ैत, त ओकर दीर्घकालिक भविष्यवाणी-सफलता, नूतन घटना खोजबाक क्षमता आ तकनीकी हस्तक्षेपक सफलता लगभग चमत्कार जकाँ लागित। ई तर्क वैज्ञानिक सफलताकेँ सत्यक निकटताक संकेत मानैत अछि। मुदा संकेत आ सिद्धि एक बात नहि। विरोधी पक्ष इतिहास दिस देखैत अछि। अनेक सिद्धान्त अपन समयमे बहुत सफल छल, मुदा बादमे ओकर मूल सत्ता वा व्याख्या त्यागल गेल—जैसे ईथरक अनेक रूप, फ्लोजिस्टन, कैलोरिक द्रव्य, किछु पुरान रोग-सिद्धान्त। एहि इतिहाससँ “निराशावादी इतिहास-आगमन (pessimistic meta-induction)” बनैत अछि: जँ अतीतक सफल सिद्धान्त बादमे गलत सिद्ध भेल, त वर्तमानक सफल सिद्धान्तक सत्यपर कतेक भरोसा उचित? यथार्थवादी उत्तर कहैत अछि जे पुरान सिद्धान्त पूर्णतः विफल नहि छल; ओकर किछु सम्बन्ध, गणितीय संरचना, कारणात्मक क्षमता वा सीमित क्षेत्रीय सत्य बादक सिद्धान्तमे बचल रहल। तेसर समस्या अधोनिर्धारण (underdetermination)क अछि। उपलब्ध प्रमाण कखनो एकसँ अधिक सिद्धान्तक संग मेल खा सकैत अछि। प्रयोग अकेला सिद्धान्त नहि जाँचैत; पृष्ठभूमि-धारणा, उपकरण, सांख्यिकीय प्रतिमान, प्रारम्भिक शर्त आ सहायक परिकल्पना सेहो जुड़ल रहैत अछि। तें “प्रमाण ई सिद्धान्तक पक्षमे अछि” कहैत समय ई जाँचब आवश्यक जे वैकल्पिक व्याख्या, सहायक धारणा आ मापन-पद्धति की भूमिका निभा रहल अछि। मूल प्रतिपादन एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे वैज्ञानिक यथार्थवादक सर्वाधिक समर्थ रूप सरल “विज्ञान जे कहैत अछि, ओ सभ सच अछि” एहन मत नहि। अधिक टिकाऊ यथार्थवाद त्रुटिसंशोध्य, स्तर-संवेदी आ प्रमाण-आधारित होयत। सफल विज्ञान वस्तुगत प्रतिरोध, कारणात्मक संरचना आ वास्तविक सम्बन्धक किछु पक्ष पकड़ैत अछि; मुदा सिद्धान्तक सभ शब्द, प्रतिमान आ सत्तामीमांसक कल्पना समान रूपेँ विश्वसनीय नहि। एहि कारण “यथार्थवाद बनाम विरोधी-यथार्थवाद” एक सीधा द्वैत नहि। रचनात्मक अनुभववाद (constructive empiricism) देखबैत अछि जे विज्ञानक लक्ष्य अनुभवजन्य पर्याप्तता मानल जा सकैत अछि, अदृश्य सत्तापर पूर्ण विश्वास नहि। संरचनात्मक यथार्थवाद (structural realism) कहैत अछि जे सिद्धान्त-परिवर्तनक बीच सम्बन्ध वा संरचना अधिक स्थिर रहि सकैत अछि। सत्ता-यथार्थवाद (entity realism) कारणात्मक हस्तक्षेप सफल होएत अदृश्य सत्ताक वास्तविकतापर विशेष भरोसा दैत अछि। दृष्टिकोणगत यथार्थवाद (perspectival realism) निरूपणक ऐतिहासिक आ साधनगत दृष्टिकोण स्वीकारैत वस्तुगत कसौटी बचाबयक प्रयास करैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि बहसकेँ सात कसौटीपर पढ़त: वस्तुगत प्रतिरोध, प्रमाणक बहुलता, कारणात्मक हस्तक्षेप, सिद्धान्त-परिवर्तन, मापनक मध्यस्थता, दृष्टिकोणक सीमा आ आत्मसमीक्षा। एतय वैज्ञानिक सफलता न अंतिम सत्यक प्रमाण, न केवल सामाजिक सहमतिक परिणाम। सफलता एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण अछि, मुदा ओकर अर्थ क्षेत्र, इतिहास आ वैकल्पिक व्याख्यासँ जाँचल जाए। वैज्ञानिक यथार्थवादक नूतन रूपमे “सत्यक निकटता” शब्द सेहो सावधानी माँगैत अछि। कोनो सिद्धान्तक गणितीय सम्बन्ध, कारणात्मक दिशा, वर्गीकरण, मापन-संरचना आ सत्ता-वर्णन अलग-अलग स्तरपर सही वा गलत भऽ सकैत अछि। सिद्धान्तक एक भाग बचि सकैत अछि, दोसर भाग त्यागल जा सकैत अछि। एहि अंशगत मूल्यांकन बिना इतिहासक सफलता आ विफलता दुनू विकृत होइत अछि। एहि अध्यायमे “वास्तविक” कहबाक अर्थ सेहो एकरूप नहि। किछु सत्ता प्रत्यक्ष हस्तक्षेप द्वारा नियंत्रित होइत अछि; किछु केवल अप्रत्यक्ष संकेतसँ जाँचल जाइत अछि; किछु गणितीय संरचना रूपेँ प्रकट होइत अछि; किछु प्रभावी स्तरपर वास्तविक प्रतिरूप रूपमे उपयोगी अछि। दार्शनिक अनुशासनक काम एहि भेदसभकेँ स्पष्ट करब अछि, न एक शब्दसँ सभ प्रश्न समाप्त करब। प्रमुख तर्क पहिल तर्क—वैज्ञानिक सफलता यथार्थवादक पक्षमे वास्तविक प्रमाण अछि, मुदा निर्णायक प्रमाण नहि। नूतन भविष्यवाणी, स्वतंत्र मापन आ कारणात्मक हस्तक्षेप जतेक अधिक एकहि सिद्धान्तक पक्षमे जुटैत अछि, ओतेक सफलता केवल संयोग मानब कठिन होइत अछि। मुदा वैकल्पिक सिद्धान्त, चयन-पक्षपात आ क्षेत्रीय सीमा सेहो जाँचबाक चाही। दोसर तर्क—“चमत्कार-न-होय तर्क (no-miracles argument)” स्वयं श्रेष्ठ व्याख्याकेँ अनुमान (inference to the best explanation) पर निर्भर अछि। प्रश्न उठैत अछि: वैज्ञानिक सफलताक सर्वश्रेष्ठ व्याख्या सत्यक निकटता मात्र अछि कि पद्धतिगत चयन, असफल सिद्धान्तक विस्मरण, आँकड़ा-समंजन आ प्रतिमानक लोच सेहो भूमिका निभबैत अछि? तर्क मजबूत अछि, मुदा आत्म-प्रमाणित नहि। तेसर तर्क—निराशावादी इतिहास-आगमन वैज्ञानिक यथार्थवादकेँ पूर्णतः नष्ट नहि करैत, मुदा विनम्र बनबैत अछि। अतीतक सिद्धान्तपराजय देखबैत अछि जे सफल शब्दावली आ सत्ता-दाबी बदलि सकैत अछि। यथार्थवादी उत्तरकेँ देखाबय पड़त जे की बचैत अछि—संरचना, कारणात्मक सम्बन्ध, सीमित क्षेत्रीय सत्य, गणितीय रूप वा संदर्भित सत्ता। चारिम तर्क—सिद्धान्त-परिवर्तनमे पूर्ण विच्छेद कम, चयनात्मक सातत्य अधिक सामान्य हो सकैत अछि। न्यूटनक गुरुत्व-विवेचन सामान्य सापेक्षताक बाद मूलभूत अन्तिम सत्य नहि रहल, मुदा सीमित वेग, कमजोर क्षेत्र आ अनेक अभियांत्रिक प्रसंगमे ओकर पूर्वानुमान आजो विश्वसनीय अछि। एहि प्रकारक क्षेत्रीय सातत्य “पुरान सिद्धान्त पूर्णतः झूठ” एहन कथनकेँ कमजोर करैत अछि। पाँचम तर्क—संरचनात्मक यथार्थवादक आकर्षण ई जे ओ सिद्धान्त-परिवर्तनक बीच सम्बन्धक सातत्य बचाबय चाहैत अछि। मुदा “संरचना” शब्द स्वयं अस्पष्ट भऽ सकैत अछि। गणितीय रूप, कारणात्मक नेटवर्क, सममिति, संबंधक क्रम वा केवल सफल समीकरण—ककरा संरचना कहब? संरचना-यथार्थवादक बल एहि प्रश्नक स्पष्ट उत्तरपर निर्भर अछि। छठम तर्क—सत्ता-यथार्थवाद (entity realism) प्रयोगात्मक हस्तक्षेपक महत्त्व बढ़बैत अछि। जखन वैज्ञानिक कोनो अदृश्य सत्ता मानि उपकरण बनबैत छथि, ओकर प्रभाव नियंत्रित करैत छथि आ अलग प्रयोगमे एकहि कारणात्मक परिणाम पबैत छथि, त ओकर वास्तविकतापर भरोसा बढ़ैत अछि। तथापि हस्तक्षेप स्वयं सिद्धान्त-निरपेक्ष नहि; मापन आ उपकरणक व्याख्या चाही। सातम तर्क—रचनात्मक अनुभववाद (constructive empiricism) वैज्ञानिक विनम्रताक महत्वपूर्ण स्मरण करबैत अछि। कोनो सिद्धान्त दृश्य घटनासँ सफल मेल खाइत अछि, एतबा विज्ञानक लक्ष्य लेल पर्याप्त मानल जा सकैत अछि; अदृश्य सत्तापर विश्वास अलग दार्शनिक कदम अछि। यथार्थवादीकेँ एहि अतिरिक्त प्रतिबद्धताक कारण स्पष्ट करबाक पड़त। आठम तर्क—अधोनिर्धारण सर्वत्र समान शक्ति नहि रखैत। किछु प्रसंगमे अनेक सिद्धान्त समान आँकड़ा समझा सकैत अछि; किछु प्रसंगमे नूतन भविष्यवाणी, स्वतंत्र प्रयोग आ क्रॉस-जाँच वैकल्पिक सिद्धान्तकेँ क्रमशः हटबैत अछि। तें अधोनिर्धारणक अस्तित्व स्वीकारब आ ओकर मात्रा जाँचब अलग बात अछि। पूर्वपक्ष पहिल पूर्वपक्ष: विज्ञान तकनीक बनबैत अछि, तें ओकर सिद्धान्त सत्य अवश्य होयत। उत्तर—तकनीकी सफलता महत्त्वपूर्ण प्रमाण अछि, मुदा कखनो सीमित क्षेत्रमे लगभग-सही प्रतिमान सेहो प्रभावी होइत अछि। सफलता सत्यक पक्षमे कारण दैत अछि, पूर्ण सत्यक प्रमाण नहि। दोसर पूर्वपक्ष: अतीतक सफल सिद्धान्त गलत भेल, त वर्तमान विज्ञानपर भरोसा मूर्खता अछि। उत्तर—इतिहास सावधानी सिखबैत अछि, सर्वग्रासी संशय नहि। पुरान सिद्धान्तक सफल अंश, संरचना, मापन-संबंध आ सीमित क्षेत्रीय उपयोग कतेक बचल—ई सूक्ष्म इतिहास देखबाक चाही। तेसर पूर्वपक्ष: अदृश्य सत्ता देखल नहि जा सकैत, त ओकर अस्तित्व मानब विश्वास मात्र अछि। उत्तर—विज्ञानमे प्रत्यक्ष दृश्यता अकेला कसौटी नहि। कारणात्मक प्रभाव, स्वतंत्र उपकरण, भिन्न प्रयोग, पूर्वानुमान आ हस्तक्षेप मिलि अदृश्य सत्ताक पक्ष मजबूत करि सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष: एकहि आँकड़ा अनेक सिद्धान्त बुझा सकैत अछि, त सत्य अप्राप्य अछि। उत्तर—अधोनिर्धारण वास्तविक समस्या अछि, मुदा स्थायी निश्चय नहि। नूतन आँकड़ा, नूतन मापन, कारणात्मक हस्तक्षेप आ सिद्धान्तक अन्य क्षेत्रीय परिणाम समयक संग विकल्प अलग करि सकैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष: विज्ञान सामाजिक संस्था अछि, त वैज्ञानिक सत्य सत्ता-निर्मित अछि। उत्तर—संस्था, धन, प्रतिष्ठा आ वर्गीकरण ज्ञान-उत्पादन प्रभावित करैत अछि; मुदा प्रकृतिक प्रतिरोध, असफल भविष्यवाणी, पुनरुत्पादन आ स्वतंत्र प्रयोग सामाजिक इच्छा मात्रसँ नियंत्रित नहि होइत। सामाजिक आलोचना वस्तुगतताक विरोधी नहि; ओकर शर्त सुधारि सकैत अछि। छठम पूर्वपक्ष: संरचनात्मक यथार्थवाद सभ समस्या हल करि दैत अछि। उत्तर—ई आकर्षक मध्यवर्ती मत अछि, मुदा “संरचना”क अर्थ, संरचनाक पहचान, सिद्धान्त-परिवर्तनमे संरचनात्मक सातत्य आ वस्तु-विहीन संरचनाक सत्तामीमांसा स्वयं विवादित अछि। सातम पूर्वपक्ष: दृष्टिकोणगत सत्य स्वीकारलासँ सापेक्षतावाद अनिवार्य। उत्तर—दृष्टिकोण-निर्भर मापन स्वीकारब आ “सभ दृष्टि समान” कहब अलग बात। पारस्परिक जाँच, वास्तविक प्रतिरोध, पूर्वानुमान, मापन-संगति आ क्षेत्रीय सीमा दृष्टिकोणकेँ अनुशासित करैत अछि। आठम पूर्वपक्ष: शास्त्रीय भारतीय यथार्थवाद आधुनिक वैज्ञानिक यथार्थवादक तैयार उत्तर दैत अछि। उत्तर—ई कालभ्रम होयत। शास्त्रीय परम्परासभक वस्तु, प्रमाण, अनुमान आ त्रुटि सम्बन्धी तर्क उपयोगी संवाद खोलि सकैत अछि, मुदा आधुनिक प्रयोगशाला, गणितीय भौतिकी, सांख्यिकी आ सिद्धान्त-परिवर्तनक प्रश्न अलग ऐतिहासिक संरचना रखैत अछि। उत्तरपक्ष पहिल उत्तर—यथार्थवादकेँ दाबी-दर-दाबी बनाउ। कोनो पूर्ण सिद्धान्तपर एकहि बेर विश्वास करबाक बदला ओकर सत्ता, सम्बन्ध, गणितीय संरचना, कारणात्मक दिशा आ क्षेत्रीय उपयोग अलग जाँचू। एहि विभाजनसँ इतिहासक परिवर्तनक बीच अधिक सूक्ष्म सातत्य देखाइत अछि। दोसर उत्तर—सफलताक प्रकार अलग करू। केवल आँकड़ा-समंजन, पूर्वानुमान, नूतन भविष्यवाणी, कारणात्मक हस्तक्षेप आ स्वतंत्र पुनरुत्पादन एक समान प्रमाण नहि। नूतन आ स्वतंत्र सफलता सामान्यतः यथार्थवादी विश्वासकेँ अधिक बल दैत अछि। तेसर उत्तर—विफलता लुकाउ नहि। वैज्ञानिक यथार्थवादकेँ सफल इतिहास मात्र नहि, असफल सिद्धान्त, बंद पथ, प्रकाशन-पक्षपात आ पुनरुत्पादन-विफलता सेहो अपन विवेचनमे शामिल करबाक चाही। आत्मसमीक्षा बिना यथार्थवाद प्रचार बनि जाएत। चारिम उत्तर—मापन-पद्धति स्वयं दार्शनिक विषय अछि। “आँकड़ा स्वयं बोलैत अछि” एहन वाक्य त्यागू। आँकड़ा बनबाक प्रक्रिया, उपकरणक अंशांकन, विलोपन नियम, सांख्यिकीय धारणा आ अनिश्चितता सार्वजनिक होए। वस्तुगतता पारदर्शी प्रक्रिया सँ मजबूत होइत अछि। पाँचम उत्तर—बहुस्तरीय वास्तविकता स्वीकारब उपयोगी अछि। मूलभूत भौतिकी वास्तविक होयत तें जीवविज्ञान, मनोविज्ञान वा सामाजिक विज्ञानक प्रतिरूप “मात्र भ्रम” नहि। यदि उच्च स्तरक प्रतिरूप स्वतंत्र व्याख्या, हस्तक्षेप आ पूर्वानुमान सम्भव करैत अछि, त ओकर क्षेत्रीय वास्तविकता दार्शनिक मान्यता माँगि सकैत अछि। छठम उत्तर—दृष्टिकोणकेँ सीमा बनाउ, कैद नहि। प्रत्येक वैज्ञानिक दृष्टि उपकरण, पैमाना आ उद्देश्यक संग जुड़ल अछि; मुदा अलग दृष्टिसभ आपसमे अनुवाद, प्रतिस्पर्धा आ संयुक्त परीक्षण करि सकैत अछि। एतय वस्तुगतता बहुदृष्टि-संगति रूपमे विकसित होइत अछि। सातम उत्तर—वैज्ञानिक यथार्थवादकेँ विज्ञानवाद (scientism) सँ अलग राखू। विज्ञान प्राकृतिक आ सामाजिक जगतक अनेक तथ्यक सर्वश्रेष्ठ साधन हो सकैत अछि; मुदा नैतिक मूल्य, राजनीतिक वैधता, सौन्दर्य, अर्थ आ धार्मिक अनुभवक सभ प्रश्न वैज्ञानिक विधिसँ पूर्णतः हल होएत—ई अलग दार्शनिक दावा अछि। आठम उत्तर—अन्तिम कसौटी त्रुटिसंशोध्यता हो। वैज्ञानिक यथार्थवादक विश्वसनीयता एहि बातमे नहि जे ओ वर्तमान सिद्धान्तकेँ अन्तिम मानैत अछि, बल्कि एहि बातमे जे नूतन प्रमाण, नूतन सिद्धान्त आ नूतन उपकरणक सामने अपन प्रतिबद्धता संशोधित करि सकैत अछि। “यथार्थ अछि” आ “हम ओकर पूर्ण स्वरूप जानि लेलहुँ” एक बात नहि। भारतीय संवाद भारतीय दर्शनक अनेक परम्परामे बाह्य वस्तु, ज्ञानक वैधता, अनुमान, भ्रम आ प्रत्यक्ष सम्बन्धी गहन विवाद भेटैत अछि। एहि सामग्रीकेँ आधुनिक वैज्ञानिक यथार्थवादक पूर्वरूप कहब अनुचित, मुदा समस्या-स्तरपर संवाद फलदायी अछि। न्याय बाह्य वस्तुक अस्तित्व, प्रमाणक विश्वसनीयता आ त्रुटि-संशोधनक प्रश्न उठबैत अछि; बौद्ध ज्ञानमीमांसाक विविध धारासभ प्रत्यक्ष, अवधारणा, अपोह आ मानसिक निरूपणक सीमापर प्रश्न करैत अछि; वैशेषिक वर्गीकरण वस्तु, गुण, कर्म आ सम्बन्धक सत्तामीमांसक संरचना प्रस्तुत करैत अछि। न्याय परम्पराक विशेष योगदान ई जे ज्ञानक वैधता केवल “हमरा एहन लागल” सँ तय नहि होइत। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्दक अलग शर्त, बाधक, त्रुटि आ संशोधनक प्रश्न अछि। आधुनिक विज्ञानमे साधन अलग छथि, मुदा दाबी-परीक्षणक अनुशासन—कारण, व्याप्ति, विरोधी उदाहरण, स्वतंत्र पुष्टि—समस्या-स्तरपर तुलनीय अछि। बौद्ध प्रतिपक्ष बाह्य यथार्थपर एकरूप मत नहि दैत। दिङ्नाग–धर्मकीर्ति परम्पराक प्रत्यक्ष–कल्पना भेद, अपोह-विवेचन आ ज्ञानक क्षणिक स्वरूप आधुनिक सिद्धान्त-निर्माणसँ सीधे समान नहि। तथापि ई प्रश्न उपयोगी अछि जे अवधारणा वस्तुकेँ ज्यों-का-त्यों पकड़ैत अछि कि ज्ञानक संरचना स्वयं वर्गीकरण बनबैत अछि। वैज्ञानिक प्रतिमान आ वर्गीकरणक आधुनिक विवाद एहि समस्या-अक्षपर संवाद करि सकैत अछि। जैन अनेकान्तवादकेँ आधुनिक दृष्टिकोणगत यथार्थवाद (perspectival realism)क प्रत्यक्ष पूर्वरूप घोषित करब गलत होयत। ऐतिहासिक उद्देश्य, सत्तामीमांसा आ तर्क-पद्धति भिन्न छथि। मुदा एक वस्तुक अनेक अपेक्षा, कथनक शर्तबद्धता आ पूर्ण एकांगी दाबीक आलोचना वैज्ञानिक दृष्टिकोण-बहुलताक प्रश्नपर सावधान तुलनात्मक संसाधन दैत अछि। मीमांसा आ वेदान्तक साक्ष्य-प्रश्न एहि अध्यायमे सीमित उपयोग रखैत अछि। कारण ई जे वैज्ञानिक यथार्थवाद मुख्यतः अनुभवजन्य सिद्धान्त, अदृश्य सत्ता, प्रयोग आ सिद्धान्त-परिवर्तनक आधुनिक प्रश्न अछि। तुलना तखनहि उपयोगी जखन मूल पारिभाषिक सन्दर्भ सुरक्षित रहय; अन्यथा शास्त्रीय शब्द आधुनिक अर्थक आवरण बनि जाएत। भारतीय संवादक निष्कर्ष तें ई नहि जे आधुनिक विज्ञानक उत्तर शास्त्रमे पहिनेसँ छल। निष्कर्ष ई जे वस्तु, प्रमाण, त्रुटि, अनुमान, दृष्टि आ ज्ञानक सीमा सम्बन्धी पुरान दार्शनिक अनुशासन आधुनिक विवादकेँ वैकल्पिक प्रश्न-पद्धति दे सकैत अछि—वंशावलीगत समानता नहि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मिथिलाक समानान्तर योगदान वैज्ञानिक यथार्थवादमे प्राथमिकता-दाबी नहि, पद्धतिगत अनुशासन अछि। गङ्गेश आ नव्य-न्याय परम्परासँ प्रेरित प्रश्न-पद्धति कहत—दाबी ककरा विषयमे अछि? ओकर आश्रय की? सम्बन्ध की? अनुमानक हेतु की? व्याप्ति कोना स्थापित? बाधक की? विरोधी उदाहरण कतय? एहि क्रमबद्ध प्रश्नकेँ आधुनिक विज्ञान-दर्शनक भाषा मे हूबहू अनुवाद नहि करब, मुदा दाबी-सूक्ष्मीकरणक आदत उपयोगी अछि। मिथिलाक बौद्धिक संस्कारमे पूर्वपक्ष–उत्तरपक्षक बल वैज्ञानिक विवाद लेल विशेष शिक्षाप्रद अछि। श्रेष्ठ प्रतिपक्षकेँ कमजोर रूपमे प्रस्तुत करि जीतब शास्त्रार्थ नहि। वैज्ञानिक यथार्थवादकेँ रचनात्मक अनुभववाद, अधोनिर्धारण, निराशावादी इतिहास-आगमन आ सामाजिक विज्ञान-आलोचनाक सबलतम रूपक सामना करबाक चाही। समानान्तर पद्धति “प्रमाण अनेक; कसौटी मनमाना नहि” सूत्र एतय प्रत्यक्ष लागू करैत अछि। प्रयोगात्मक आँकड़ा, सांख्यिकीय प्रमाण, ऐतिहासिक सिद्धान्त-परिवर्तन, कारणात्मक हस्तक्षेप, प्रतिमान-सफलता, उपकरणक विश्वसनीयता आ वैज्ञानिक समुदायक आलोचनात्मक प्रक्रिया—सभ प्रमाण छथि, मुदा सभ समान भारक नहि। मिथिलाक स्थानीय अनुभव वैज्ञानिक यथार्थवादक प्रत्यक्ष प्रमाण नहि, मुदा विज्ञान–समाज सम्बन्ध बुझबाक उदाहरण दे सकैत अछि। बाढ़-पूर्वानुमान, नदी-पथक प्रतिमान, कृषि-मौसम सूचना, जनस्वास्थ्य मापन, भाषा-सर्वेक्षण वा पुरातात्त्विक तिथि जकाँ क्षेत्रमे वैज्ञानिक दाबी स्थानीय अनुभवसँ टकराइत, सुधरैत अथवा पुष्ट होइत अछि। स्थानीय ज्ञानकेँ न विज्ञानक विकल्प, न स्वतः निम्न मानब उचित; ओकर प्रमाण-मूल्य स्पष्ट कसौटीपर जाँचल जाए। एहि दृष्टिसँ मिथिला “क्षेत्रीय उदाहरण” मात्र नहि, प्रमाण-पद्धतिक परीक्षण-भूमि बनि सकैत अछि। स्थानीय आँकड़ा, अभिलेख, मौखिक ज्ञान, उपग्रह मापन, स्थल-परीक्षण आ ऐतिहासिक दस्तावेज एक संग रखि देखल जाए जे कौन दाबी कतेक स्तरपर समर्थित अछि। एतय समानान्तर दर्शन यथार्थवादकेँ अधिक उत्तरदायी बनबैत अछि। वैज्ञानिक दाबी-परीक्षणक पाँच स्तर अनुभव-संगति → स्वतंत्र पुनर्परीक्षण → कारणात्मक हस्तक्षेप → सिद्धान्त-परिवर्तनमे सातत्य → क्षेत्रीय सीमा एकहि सफल परिणाम अंतिम सत्य नहि — अनेक स्वतंत्र कसौटीक मेल विश्वास बढ़बैत अछि समकालीन प्रयोग जलवायु-विज्ञानमे वैज्ञानिक यथार्थवादक प्रश्न प्रत्यक्ष राजनीतिक अर्थ रखैत अछि। वैश्विक तापमान, महासागरीय ऊष्मा, हिम-पिघलन आ वायुमण्डलीय कार्बन अनेक स्वतंत्र मापन-पद्धतिसँ जाँचल जाइत अछि। प्रतिमान अनिश्चितता राखैत अछि, मुदा अनिश्चितता = अज्ञान नहि। अलग प्रतिमानक साझा निष्कर्ष, ऐतिहासिक आँकड़ा आ भौतिक कारण-सम्बन्ध संयुक्त प्रमाण दैत अछि। महामारी-विज्ञानमे प्रतिमान परिवर्तनशील परिस्थिति, व्यवहार, प्रतिरक्षा आ आँकड़ा-गुणवत्ता पर निर्भर रहैत अछि। आरम्भिक अनुमान बादमे बदललासँ विज्ञान “झूठ” सिद्ध नहि होइत; प्रश्न ई अछि जे परिवर्तन नूतन प्रमाणक प्रतिक्रिया छल कि पद्धतिगत त्रुटि छुपाबयक प्रयास। संशोधनक पारदर्शिता यथार्थवादी विश्वासक महत्त्वपूर्ण शर्त अछि। कृत्रिम बुद्धि-आधारित औषधि-खोजमे उच्च पूर्वानुमानात्मक सफलता आकर्षक अछि। मुदा प्रतिमान कोन आणविक कारण-संबंध पकड़ैत अछि, कोन केवल प्रशिक्षण-आँकड़ाक सहसम्बन्ध—ई अलग प्रश्न। प्रयोगशाला सत्यापन, जैविक क्रियाविधि, स्वतंत्र पुनरावृत्ति आ नैदानिक परीक्षण बिना संगणकीय सफलता वास्तविक औषधीय सत्ता-दाबी लेल पर्याप्त नहि। खगोल-विज्ञानमे कृष्ण-विवर, बाह्यग्रह वा अदृश्य द्रव्यक दाबी प्रत्यक्ष छवि मात्रपर निर्भर नहि। गुरुत्वीय प्रभाव, स्पेक्ट्रम, कक्षीय व्यवहार, स्वतंत्र दूरबीन आ अलग सिद्धान्तगत पूर्वानुमान संयुक्त प्रमाण बनबैत अछि। एहि उदाहरणसँ “देखल = वास्तविक”क सरल कसौटी अपर्याप्त सिद्ध होइत अछि। कण-भौतिकीमे अदृश्य सत्ता जटिल उपकरण, सांख्यिकीय महत्व आ सिद्धान्त-निर्देशित संकेतसँ स्थापित होइत अछि। एकहि असामान्य संकेतपर तुरन्त सत्ता घोषित करब उचित नहि; स्वतंत्र प्रयोग, पृष्ठभूमि-विवेचन आ पुनरावृत्ति आवश्यक। वैज्ञानिक यथार्थवाद एतय संस्थागत संयम पर निर्भर अछि। सामाजिक विज्ञानमे यथार्थवाद आरो जटिल अछि, किएक तँ वर्गीकरण स्वयं व्यवहार बदलि सकैत अछि। बेरोजगारी, जाति, गरीबी, अपराध, लिंग अथवा शिक्षा-गुणवत्ता मापन सामाजिक परिभाषा आ संस्थागत नियमसँ जुड़ल अछि। एहि कारण “सामाजिक वस्तु वास्तविक नहि” निष्कर्ष नहि निकलैत; बल्कि वर्गीकरण, कारणात्मकता आ मानक प्रभाव अलग जाँचबाक पड़ैत अछि। चिकित्सामे रोग-कोटि परिवर्तन वैज्ञानिक यथार्थवादक उत्कृष्ट उदाहरण अछि। रोगक जैविक क्रियाविधि, लक्षण-समूह, आनुवंशिक जोखिम आ उपचार-प्रतिक्रिया एक-दोसरासँ पूर्णतः मेल नहि खा सकैत। क्षेत्रीय यथार्थवाद कहैत अछि जे कोटि उपयोगी आ वास्तविक प्रतिरूप पकड़ि सकैत अछि, तथापि भविष्यक वर्गीकरण ओकर सीमा बदलि सकैत अछि। खुला विज्ञान (open science) यथार्थवादक संस्थागत आधार मजबूत करि सकैत अछि। आँकड़ा, कोड, पूर्व-पंजीकरण, नकारात्मक परिणाम आ पुनरुत्पादन सार्वजनिक होएत वैज्ञानिक दाबी निजी प्रतिष्ठासँ हटि साझा परीक्षणक विषय बनैत अछि। वस्तुगतता केवल दार्शनिक स्थिति नहि; पारदर्शी संस्थागत अभ्यास सेहो अछि। अध्याय-निष्कर्ष वैज्ञानिक यथार्थवादक नूतन विवाद विज्ञानपर विश्वास करब कि नहि—एतबा सरल प्रश्न नहि। वास्तविक प्रश्न अछि: वैज्ञानिक सफलतासँ हम कतेक सत्तामीमांसक निष्कर्ष निकालि सकैत छी; सिद्धान्त-परिवर्तनक इतिहास वर्तमान विश्वासकेँ कतेक सीमित करैत अछि; अदृश्य सत्ताक वास्तविकता लेल कोन प्रमाण पर्याप्त; आ मापन, प्रतिमान, दृष्टिकोण तथा संस्था वस्तुगतताकेँ कोना मध्यस्थित करैत अछि। समानान्तर उत्तर त्रुटिसंशोध्य यथार्थवादक पक्षमे अछि। जगत मनुष्यक इच्छा सँ स्वतंत्र प्रतिरोध रखैत अछि; वैज्ञानिक पद्धति ओकरा विषयमे वास्तविक ज्ञान दे सकैत अछि; मुदा प्रत्येक सफल सिद्धान्तक प्रत्येक शब्द अंतिम सत्य नहि। प्रमाणक अनेक स्रोत, सिद्धान्तक इतिहास, कारणात्मक हस्तक्षेप, स्वतंत्र पुनर्परीक्षण आ दृष्टिकोणक सीमा संयुक्त रूपेँ विश्वासक स्तर निर्धारित करैत अछि। अध्याय 82क सूत्र: “वास्तविकता विज्ञानसँ स्वतंत्र अछि; वैज्ञानिक ज्ञान वास्तविकताक निकट जा सकैत अछि, मुदा अपन प्रत्येक वर्तमान निरूपणकेँ अंतिम वास्तविकता मानि नहि सकैत।” अध्याय-ग्रन्थसूची Hilary Putnam — Mathematics, Matter and Method Hilary Putnam — Meaning and the Moral Sciences Bas C. van Fraassen — The Scientific Image Bas C. van Fraassen — Scientific Representation: Paradoxes of Perspective Stathis Psillos — Scientific Realism: How Science Tracks Truth Stathis Psillos — Knowing the Structure of Nature Anjan Chakravartty — A Metaphysics for Scientific Realism Anjan Chakravartty — Scientific Ontology: Integrating Naturalized Metaphysics and Voluntarist Epistemology John Worrall — “Structural Realism: The Best of Both Worlds?” James Ladyman — “What Is Structural Realism?” James Ladyman and Don Ross — Every Thing Must Go: Metaphysics Naturalized Steven French — The Structure of the World: Metaphysics and Representation Ian Hacking — Representing and Intervening Nancy Cartwright — How the Laws of Physics Lie Nancy Cartwright — The Dappled World Larry Laudan — “A Confutation of Convergent Realism” Richard Boyd — “Scientific Realism and Naturalistic Epistemology” Philip Kitcher — The Advancement of Science Peter Lipton — Inference to the Best Explanation Alan Musgrave — Essays on Realism and Rationalism Grover Maxwell — “The Ontological Status of Theoretical Entities” Pierre Duhem — The Aim and Structure of Physical Theory W. V. O. Quine — “Two Dogmas of Empiricism” Thomas S. Kuhn — The Structure of Scientific Revolutions Imre Lakatos — The Methodology of Scientific Research Programmes Paul Feyerabend — Against Method Mary Hesse — Models and Analogies in Science Ronald Giere — Scientific Perspectivism Michela Massimi — Perspectival Realism Michela Massimi — Perspectival Realism: How Scientific Knowledge Is Plural, Situated, and Communal Hasok Chang — Is Water H2O? Evidence, Realism and Pluralism Kyle Stanford — Exceeding Our Grasp: Science, History, and the Problem of Unconceived Alternatives Juha Saatsi (ed.) — The Routledge Handbook of Scientific Realism Bimal Krishna Matilal — Perception: An Essay on Classical Indian Theories of Knowledge Bimal Krishna Matilal — The Character of Logic in India Stephen H. Phillips — Epistemology in Classical India: The Knowledge Sources of the Nyāya School Jonardon Ganeri — Philosophy in Classical India: The Proper Work of Reason Gaṅgeśa — Tattvacintāmaṇi Gautama — Nyāya-sūtra Vātsyāyana — Nyāya-bhāṣya Udayana — Nyāyakusumāñjali Dharmakīrti — Pramāṇavārttika Dignāga — Pramāṇasamuccaya Mark Siderits — Buddhism as Philosophy Jay L. Garfield — Engaging Buddhism Jonardon Ganeri — Attention, Not Self