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समस्या
विज्ञान-द्विपथक मानचित्र प्राकृतिक विज्ञान — मापन • प्रयोग • नियम • कारणात्मक संरचना सामाजिक विज्ञान — अर्थ • संस्था • इतिहास • अभिकर्तृत्व साझा अनुशासन — प्रमाण • कारण • पुनर्परीक्षण • पारदर्शिता मुख्य भेद — सामाजिक जगत अपन विषयक अर्थ-बोध आ प्रतिक्रियासँ स्वयं बदलि सकैत अछि प्राकृतिक विज्ञान आ सामाजिक विज्ञानक सम्बन्ध आधुनिक दर्शनक एक दीर्घकालिक प्रश्न अछि। भौतिकी, रसायन, जीवविज्ञान वा भूविज्ञान जकाँ विषय प्राकृतिक घटनाक मापन, प्रयोग, प्रतिमान-निर्माण आ कारणात्मक व्याख्या करैत छथि। समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति-विज्ञान, मानवशास्त्र, इतिहास वा सामाजिक मनोविज्ञान सेहो प्रमाण, आँकड़ा, तुलना आ व्याख्याक सहारा लैत अछि; मुदा ओकर विषय मनुष्य, संस्था, नियम, भाषा, अर्थ, विश्वास, मूल्य आ ऐतिहासिक स्मृति अछि। एतय शोधक विषय स्वयं अपन विषयमे धारणा रखैत अछि, नियम बुझैत अछि, विरोध करैत अछि, रणनीति बदलैत अछि आ शोधक वर्गीकरण पर प्रतिक्रिया दे सकैत अछि। तें प्रश्न केवल “दुनू विज्ञान छथि कि नहि?” नहि; प्रश्न ई अछि जे वैज्ञानिक कठोरताक समान कसौटी अलग प्रकारक विषय-वस्तुपर कोना लागू होयत। एकटा पुरान मत कहैत अछि जे सामाजिक विज्ञानकेँ प्राकृतिक विज्ञानक विधिक अनुकरण करबाक चाही। एहि प्राकृतिकतावादी दृष्टि (naturalism)मे कारण, नियम, मापन, परीक्षण आ भविष्यवाणीकेँ आदर्श मानल जाइत अछि। दोसर मत कहैत अछि जे मानवीय क्रिया केवल बाहरी घटना नहि; ओकर अर्थ, उद्देश्य, नियम-बोध आ ऐतिहासिक प्रसंग बुझब आवश्यक। एहि व्याख्यात्मक दृष्टि (interpretivism)मे क्रियाक अर्थग्रहण सामाजिक व्याख्याक केन्द्र बनैत अछि। समस्या तखन उत्पन्न होइत अछि जखन पहिल पक्ष अर्थकेँ अवैज्ञानिक मानि हटाबय चाहैत अछि अथवा दोसर पक्ष कारणात्मक परीक्षणकेँ मानव-विरोधी कहि अस्वीकार करैत अछि। Max Weberक व्याख्यात्मक समझ (Verstehen) सामाजिक क्रियाक अर्थ बुझबाक महत्त्व बतबैत अछि। मुदा एकरा केवल सहानुभूति अथवा शोधकक निजी अनुभूति मानब गलत होयत। अर्थ-बोधकेँ ऐतिहासिक दस्तावेज, भाषिक व्यवहार, क्रियाक परिणाम, संस्थागत नियम आ तुलनात्मक प्रमाणसँ अनुशासित करबाक पड़ैत अछि। ओ एना किएक कएलक—एहि प्रश्नक उत्तर अभिकर्ताक घोषित कारण, वास्तविक प्रोत्साहन, उपलब्ध विकल्प आ सामाजिक दबाव सभकेँ एक संग जाँचि सकैत अछि। एहि विवादक दोसर अक्ष व्यक्ति आ संरचना अछि। पद्धतिगत व्यक्तिवाद (methodological individualism) सामाजिक घटनाकेँ व्यक्ति-स्तरीय क्रिया आ ओकर अभिप्रायसँ जोड़बाक आग्रह करैत अछि। मुदा परिवार, बाजार, जाति, कानून, राज्य, विद्यालय, मुद्रा, भाषा वा निगम जकाँ संस्था केवल व्यक्तिक निजी इच्छा नहि; ओ नियम, अधिकार, संसाधन आ अपेक्षाक एहन संरचना बनबैत अछि जे व्यक्तिगत क्रियाक सम्भावना बदलैत अछि। तें सूक्ष्म स्तर आ व्यापक स्तरक सम्बन्ध बुझब सामाजिक विज्ञानक प्रमुख चुनौती अछि।
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे प्राकृतिक विज्ञान आ सामाजिक विज्ञानक बीच साझा ज्ञानमीमांसक अनुशासन अछि, मुदा एकहि सर्वमान्य विधि नहि। दुनू क्षेत्र प्रमाण, कारण, त्रुटि-संशोधन, स्पष्ट परिभाषा, स्वतंत्र जाँच आ सार्वजनिक आलोचना माँगैत अछि। मुदा सामाजिक विज्ञानमे अर्थ, नियम, संस्था, अभिकर्तृत्व, इतिहास, मूल्य आ आत्म-प्रतिबिम्बित प्रतिक्रिया एहन अतिरिक्त आयाम छथि जे विधिक चयन बदलैत छथि। एहि कारण विधिगत एकता आ विधिगत बहुलताक बीच संतुलन चाही। एकता ई अर्थमे जे आँकड़ा गढ़ल नहि जा सकैत अछि, विरोधी प्रमाण लुकाओल नहि जा सकैत अछि, कारण-विवेचन बिना आधार नहि बनाओल जा सकैत अछि, आ सिद्धान्त आलोचनासँ मुक्त नहि। बहुलता ई अर्थमे जे प्रयोग, सर्वेक्षण, अभिलेख, साक्षात्कार, नृवंशविज्ञान, ऐतिहासिक तुलना, सांख्यिकीय विश्लेषण, पाठ-पठन, क्षेत्र-अध्ययन आ कारणात्मक प्रतिमान अलग प्रश्न लेल अलग भूमिका निभबैत छथि। सामाजिक विज्ञानक विषय अर्थयुक्त कारणात्मक जगत अछि। मनुष्य कारणक अधीन अछि, मुदा ओ कारणक व्याख्या सेहो करैत अछि; नियमक भीतर रहैत अछि, मुदा नियम बदलि सेहो सकैत अछि; संस्था द्वारा आकार पबैत अछि, मुदा संस्था पुनर्निर्मित सेहो करैत अछि। एहि कारण प्राकृतिक नियमक नकल मात्र पर्याप्त नहि, आ मुक्त व्याख्या मात्र सेहो पर्याप्त नहि। समानान्तर दर्शन एहि सम्बन्धकेँ पाँच स्तरपर पढ़त: वस्तुगत परिस्थिति, अभिकर्ताक अर्थ, संस्थागत नियम, ऐतिहासिक पथ आ प्रमाणक सार्वजनिक परीक्षण। एहि पाँचू स्तरक संयोजन सामाजिक विज्ञानकेँ न प्राकृतिक विज्ञानक कमजोर अनुकरण बनबैत अछि, न साहित्यिक व्याख्याक नामपर परीक्षण-विहीन करैत अछि।
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—वैज्ञानिकता एकहि औजारक नाम नहि, त्रुटि-संशोधनक अनुशासनक नाम अछि। प्राकृतिक विज्ञानमे प्रयोग प्रधान हो सकैत अछि; सामाजिक विज्ञानमे कखनो प्राकृतिक प्रयोग, कखनो सर्वेक्षण, कखनो अभिलेखीय तुलना, कखनो क्षेत्र-अध्ययन अधिक उचित होयत। प्रश्न ई नहि जे प्रयोग भेल कि नहि; प्रश्न ई अछि जे दाबी लेल उपयुक्त प्रमाण जुटल कि नहि। दोसर तर्क—कारण आ अर्थ प्रतिस्पर्धी नहि। बेरोजगार व्यक्ति शहर छोड़ि प्रवास करैत अछि—एतय आयक अवसर कारणात्मक कारक हो सकैत अछि, मुदा परिवारक जिम्मेदारी, प्रतिष्ठा, भविष्यक आशा आ प्रवास-विषयक सामाजिक कल्पना क्रियाक अर्थ बनबैत अछि। केवल अर्थ बिना आर्थिक संरचना अधूरी, केवल संरचना बिना मानवीय क्रिया अधूरी। तेसर तर्क—व्याख्यात्मक समझ (Verstehen) निजी अनुमान नहि। शोधकक हम बुझि गेलहुँ पर्याप्त नहि। अभिकर्ताक कथन, व्यवहार, ऐतिहासिक सन्दर्भ, संस्थागत नियम आ विरोधी प्रमाणसँ अर्थ-विवेचन जाँचल जाए। व्याख्या सेहो प्रमाण-अनुशासित होयत। चारिम तर्क—पद्धतिगत व्यक्तिवाद (methodological individualism) राजनीतिक व्यक्तिवाद नहि। सामाजिक परिणाम व्यक्ति-क्रियासँ बनैत अछि कहब एतबा नहि कहैत जे संस्था अथवा संरचना अवास्तविक अछि। व्यक्ति स्वयं भाषा, नियम, बाजार, परिवार आ इतिहासक भीतर क्रिया करैत अछि। तें सूक्ष्म आधारक खोज उपयोगी अछि, मुदा सूक्ष्म आधार = संरचना-विलोपन नहि। पाँचम तर्क—व्यापक सामाजिक संरचना कारणात्मक भूमिका रखि सकैत अछि। कानून, आरक्षण, कर-व्यवस्था, सीमा-नियन्त्रण, विद्यालयी भाषा-नीति अथवा बैंकिंग-नियम व्यक्तिगत विकल्पक लागत आ सम्भावना बदलैत अछि। संरचनाकेँ रहस्यमय सत्ता नहि, नियम, संसाधन, दण्ड, अधिकार आ अपेक्षाक संगठित विन्यास रूपमे विश्लेषित करब चाही। छठम तर्क—सूक्ष्म आ व्यापक स्तर बीच माध्यमिक प्रक्रिया आवश्यक। केवल गरीबी अपराध बढ़बैत अछि वा व्यक्ति निर्णय करैत अछि जकाँ कथन अधूरा अछि। मध्यवर्ती प्रक्रिया—रोजगार-अवसर, सामाजिक नेटवर्क, राज्यक उपस्थिति, विद्यालय, ऋण, कलंक, जोखिम-वितरण—स्पष्ट करबाक पड़त। एहि प्रकारक प्रक्रिया-विवेचन (mechanism-based explanation) सामाजिक कारणकेँ अधिक परीक्षणयोग्य बनबैत अछि। सातम तर्क—सहसम्बन्ध कारण नहि। दुई चलक एक संग बदललासँ कारणात्मक दिशा सिद्ध नहि होइत। उल्टा कारण, छुपल तेसर कारक, चयन-पक्षपात आ मापन-दोष जाँचबाक पड़ैत अछि। सामाजिक विज्ञानक कारणात्मकता लेल प्रतिकल्पना (counterfactual), प्राकृतिक प्रयोग, यादृच्छिकीकरण, दीर्घकालिक आँकड़ा अथवा अन्य पहचान-पद्धति उपयोगी भऽ सकैत अछि, मुदा प्रत्येकक अपन सीमा अछि। आठम तर्क—यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण (randomized controlled trial) शक्तिशाली साधन अछि, सार्वभौम उत्तर नहि। छोट नियंत्रित समूहमे सफल हस्तक्षेप दोसर क्षेत्र, भाषा, जाति-संरचना, संस्थागत क्षमता अथवा समयमे समान परिणाम देत—ई अलग प्रश्न। आन्तरिक वैधता आ बाह्य वैधता अलग जाँच चाहैत अछि।
पूर्वपक्ष
पहिल पूर्वपक्ष: सामाजिक विज्ञानमे प्रयोग कम अछि, तें ई वास्तविक विज्ञान नहि। उत्तर—प्रयोग वैज्ञानिकताक एक महत्त्वपूर्ण साधन अछि, एकमात्र कसौटी नहि। भूविज्ञान, खगोल-विज्ञान आ विकासवादी जीवविज्ञान सेहो अनेक प्रश्न अवलोकन, तुलना आ ऐतिहासिक प्रमाणसँ हल करैत छथि। सामाजिक विज्ञानक दाबी ओकर उपयुक्त प्रमाण आ त्रुटि-संशोधनसँ जाँचू। दोसर पूर्वपक्ष: मनुष्य स्वतंत्र अछि, तें ओकर कारणात्मक विज्ञान असम्भव। उत्तर—अभिकर्तृत्व कारणहीनता नहि। इच्छा, नियम, संसाधन, सूचना, संस्था आ इतिहास क्रियाकेँ प्रभावित करैत अछि। स्वतंत्रता स्वयं कारणात्मक संरचनाक भीतर विकल्पक प्रकार हो सकैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष: अर्थ शोधकक व्याख्या अछि, तें सामाजिक विज्ञान पूर्णतः व्यक्तिनिष्ठ। उत्तर—अर्थ-विवेचन स्रोत, भाषा, व्यवहार, संस्थागत नियम, अनेक साक्षात्कार आ विरोधी प्रमाणसँ जाँचल जा सकैत अछि। व्याख्या त्रुटिसंशोध्य बनि सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष: सामाजिक संरचना केवल व्यक्तिसभक योग अछि। उत्तर—संस्था व्यक्तिसँ बनैत अछि, मुदा संगठित नियम, पद, अधिकार आ संसाधन एहन गुण बनबैत अछि जे कोनो अकेला व्यक्तिक गुण नहि। व्यक्ति-स्तर आ संरचना-स्तरक सम्बन्ध स्पष्ट करब आवश्यक। पाँचम पूर्वपक्ष: मूल्य प्रवेश करत तँ वस्तुगतता समाप्त। उत्तर—मूल्य प्रश्न-चयन आ नीति-लक्ष्य प्रभावित करि सकैत अछि; तथापि आँकड़ा, परिभाषा आ कारणात्मक निष्कर्षक सार्वजनिक परीक्षण सम्भव अछि। मूल्य लुकाबय वस्तुगतता नहि; मूल्यक स्थान स्पष्ट करब अधिक ईमानदार पद्धति अछि। छठम पूर्वपक्ष: मात्रात्मक विधि कठोर, गुणात्मक विधि कहानी मात्र। उत्तर—खराब सांख्यिकी कठोर नहि, आ अनुशासित नृवंशविज्ञान कहानी मात्र नहि। प्रमाणक प्रकार प्रश्नपर निर्भर अछि। कारणात्मक मात्रा आ अर्थगत गहराई संयुक्त होएत अधिक पूर्ण ज्ञान दे सकैत अछि। सातम पूर्वपक्ष: प्रत्येक समाज अद्वितीय अछि, त सामान्य सामाजिक विज्ञान असम्भव। उत्तर—अद्वितीय इतिहासक भीतर तुलनीय प्रक्रिया सेहो भेटैत अछि। सामान्यीकरणक दाबी क्षेत्र, समय, संस्था आ समूहक सीमा स्पष्ट कए कएल जाए; सार्वभौम नहि तँ शर्तबद्ध ज्ञान सम्भव अछि। आठम पूर्वपक्ष: सामाजिक विज्ञान सत्ता-संरचनाक उत्पाद अछि, त ओकर सत्य-दाबी विश्वसनीय नहि। उत्तर—सत्ता वित्त, वर्गीकरण आ प्रश्न-चयन प्रभावित करैत अछि; मुदा एहि आलोचनाक निष्कर्ष स्वयं प्रमाण माँगैत अछि। संस्थागत पक्षपातक उत्तर अधिक पारदर्शिता, स्रोत-विविधता, प्रतिपक्ष आ सार्वजनिक आलोचना अछि; सत्यक त्याग नहि।
उत्तरपक्ष
पहिल उत्तर—विधि वस्तुकेँ अनुसरय। प्राकृतिक घटना, मानवीय क्रिया, संस्था आ ऐतिहासिक परिवर्तन सभपर एकहि औजार थोपब उचित नहि। प्रश्नक प्रकृति अनुसार प्रयोग, तुलना, अभिलेख, सांख्यिकी वा व्याख्या चुनल जाए। दोसर उत्तर—कारणात्मक आ अर्थगत व्याख्या अलग लिखू, फेर जोड़ू। की कारण भेल आ अभिकर्ता एकरा की अर्थ देलक—ई दुई प्रश्न एक-दोसराक स्थान नहि लेत। संयुक्त उत्तर सामाजिक विज्ञानक विशेष शक्ति अछि। तेसर उत्तर—सूक्ष्म आ व्यापक स्तरक सेतु स्पष्ट करू। व्यक्ति-क्रिया सँ संस्था आ संस्था सँ व्यक्ति-क्रिया धरि कोन प्रक्रिया चलैत अछि, ई देखाओल जाए। समाज करैत अछि अथवा व्यक्ति चुनैत अछि जकाँ ढीला वाक्य पर्याप्त नहि। चारिम उत्तर—मापनक उत्पत्ति-श्रृंखला सार्वजनिक करू। सूचक कोना परिभाषित, आँकड़ा कोना जुटल, अनुपस्थित मान कोना सँभारल, श्रेणी किएक बनल—ई सभ निष्कर्षक भाग मानल जाए। पाँचम उत्तर—कारणात्मक दाबी लेल वैकल्पिक व्याख्या खोजू। उल्टा कारण, छुपल कारक, चयन-पक्षपात, ऐतिहासिक झटका आ संस्थागत परिवर्तनक परीक्षण बिना कारण-विवेचन अधूरा अछि। छठम उत्तर—व्याख्यात्मक दाबी लेल प्रतिपक्ष खोजू। अभिकर्ताक एक कथनकेँ अन्तिम सत्य नहि मानू; व्यवहार, अन्य साक्ष्य, दस्तावेज, मौन आ विरोधी अर्थ-संरचना सेहो जाँचू। सातम उत्तर—सामान्यीकरणक सीमा लेखू। कोन जनसमूह, समय, प्रदेश, संस्थागत व्यवस्था वा नीतिगत शर्त भीतर निष्कर्ष समर्थित अछि, ई स्पष्ट हो। सीमित सत्य असफलता नहि; सीमा लुकाबय असफलता अछि। आठम उत्तर—वस्तुगतताकेँ बहुपक्षीय आलोचना रूपमे बुझू। अलग पद्धति, अलग सामाजिक स्थान, अलग स्रोत आ अलग सिद्धान्तक शोधक जखन एक-दोसराक दाबी जाँचैत छथि, त व्यक्तिगत पक्षपातक प्रभाव घटि सकैत अछि। वस्तुगतता एकटा निर्जीव दृष्टि नहि; अनुशासित सार्वजनिक प्रक्रिया अछि।
भारतीय संवाद
भारतीय दार्शनिक परम्परासभ आधुनिक प्राकृतिक विज्ञान–सामाजिक विज्ञान विभाजनक तैयार पूर्वरूप नहि। ई विभाजन आधुनिक संस्थागत विज्ञानक इतिहाससँ जुड़ल अछि। तथापि प्रमाण, अनुमान, शब्द, क्रिया, नियम, प्रयोजन आ अर्थ सम्बन्धी शास्त्रीय विचार समस्या-स्तरपर उपयोगी संवाद खोलि सकैत अछि। न्याय परम्परा प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्दक भेद करैत ज्ञान-दाबीक स्रोत आ त्रुटि जाँचबाक अनुशासन विकसित करैत अछि। आधुनिक सामाजिक विज्ञान लेल एकर उपयोग न्याय = आधुनिक पद्धतिशास्त्र कहबमे नहि, बल्कि एहि प्रश्नमे अछि जे कोन दाबी कोन प्रमाणसँ समर्थित, कोन बाधक उपलब्ध, आ अनुमानक व्याप्ति कोना सीमित अछि। मीमांसा शब्द, विधि आ क्रियाक अर्थ सम्बन्धी जटिल विचार विकसित करैत अछि, मुदा एकरा आधुनिक व्याख्यात्मक समाजशास्त्र (interpretive sociology)क पूर्वरूप कहब कालभ्रम होयत। समस्या-स्तरपर एतबा उपयोगी अछि जे भाषिक नियम आ अर्थ मानवीय क्रियाकेँ संरचित करैत छथि; सामाजिक विज्ञानमे नियम-बोध आ अभिप्रायकेँ केवल बाहरी गति जकाँ नहि पढ़ल जा सकैत। अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, अभिलेख, राजकीय दफ्तरी परम्परा अथवा ऐतिहासिक वृत्तान्त सामाजिक जीवनक स्रोत दे सकैत छथि, मुदा ओ आधुनिक सामाजिक विज्ञानक निष्पक्ष आँकड़ा-संग्रह नहि। ओसभक विधा, उद्देश्य, सत्ता-सन्दर्भ, मौन आ आदर्शात्मक भाषा जाँचि तखन उपयोग करबाक चाही। पुरान ग्रन्थमे सामाजिक तथ्य लिखल अछि आ ओ आधुनिक सर्वेक्षणक समतुल्य अछि—ई एक बात नहि। बौद्ध आ जैन परम्परासभक कारण-संबन्ध, दृष्टि, व्यवहार आ समुदाय सम्बन्धी विचार सेहो आधुनिक सिद्धान्तसँ सीधा समान नहि। तुलनाक उचित अक्ष प्रश्न अछि—व्यक्ति आ संबंध, अभिकर्ता आ शर्त, दृष्टि आ दाबी, कारण आ परिणाम। ऐतिहासिक भिन्नता सुरक्षित रहय तखनहि संवाद अर्थपूर्ण अछि। भारतीय संवादक मुख्य निष्कर्ष ई अछि जे सामाजिक विज्ञान लेल बहुप्रमाणीय अनुशासन उपयोगी अछि। प्रत्यक्ष आँकड़ा, अनुमान, विश्वसनीय साक्ष्य, अभिलेख, व्यवहार, भाषिक अर्थ आ विरोधी प्रमाणक अलग भार हो सकैत अछि। मुदा कोनो शास्त्रीय प्रमाण-सूची आधुनिक विधिक स्थानापन्न नहि; पद्धतिगत प्रेरणा मात्र अछि।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिला सामाजिक विज्ञानक विशेष परीक्षण-भूमि बनि सकैत अछि, किएक तँ एतय प्राकृतिक प्रक्रिया आ सामाजिक संरचना अनेक ठाम गुँथल अछि। बाढ़ प्राकृतिक जलवैज्ञानिक घटना अछि, मुदा ओकर क्षति तटबन्ध, भूमि-अधिकार, सड़क, वर्ग, जाति, लिंग, प्रवास, सूचना आ प्रशासनिक निर्णयसँ बदलैत अछि। केवल नदी-विज्ञान बाढ़क सामाजिक अर्थ नहि बुझाओत; केवल सामाजिक व्याख्या जलप्रवाहक भौतिक कारण नहि बदलत। एतय प्राकृतिक आ सामाजिक विज्ञानक संयुक्त पद्धति आवश्यक अछि। प्रवासक अध्ययनमे जनगणना, रेल वा बस-आवागमन, रोजगार आँकड़ा, प्रेषित धन (remittance), परिवारक संरचना, विवाह, भाषा आ आकांक्षाक साक्षात्कार एक संग उपयोगी होइत अछि। केवल आय-अन्तर प्रवासक सम्पूर्ण कारण नहि, आ केवल घर छोड़बाक पीड़ा आर्थिक संरचना नहि बुझाओत। भूमि आ कृषि अध्ययनमे राजस्व अभिलेख, नक्सा, उपग्रह छवि, वर्षा, मृदा, फसल-मूल्य, ऋण, बटाई, उत्तराधिकार आ स्थानीय शब्दावलीक संयुक्त अध्ययन चाही। दस्तावेजक श्रेणी आ वास्तविक उपयोग समान नहि हो सकैत अछि; एतय अभिलेखीय स्रोत-समालोचना अनिवार्य अछि। पंजी-परम्परा, वंशावली, विवाह-नियम आ सामाजिक प्रतिष्ठा सम्बन्धी अध्ययनमे पाण्डुलिपि, परिवार-स्मृति, कानूनी दस्तावेज, मौखिक इतिहास आ वर्तमान व्यवहारक भेद स्पष्ट राखल जाए। पंजी स्रोत अछि, सम्पूर्ण समाजक स्वतः प्रतिनिधि नमूना नहि। वर्ग, जाति, लिंग आ अभिलेखीय मौनक सीमा दर्ज हो। मैथिली भाषा-अध्ययनमे जनगणना, विद्यालयी भाषा, आत्म-पहिचान, लिपि, घरक भाषा, माध्यमक उपयोग आ प्रवासी समुदायक व्यवहार अलग चल हो सकैत अछि। मातृभाषा एक सरल प्राकृतिक गुण नहि; प्रशासनिक श्रेणी, पारिवारिक पहचान आ वास्तविक प्रयोगक परस्पर सम्बन्ध जाँचबाक पड़त। मिथिलाक समानान्तर पद्धति पूर्वपक्ष–उत्तरपक्षक अनुशासन सामाजिक शोधमे लागू करैत कहत: पहिने अपन परिकल्पनाक सर्वश्रेष्ठ विरोधी व्याख्या बनाउ; फेर स्रोत, आँकड़ा, अभिकर्ताक अर्थ आ संस्थागत इतिहासक सामने दुनूकेँ जाँचू। क्षेत्रीय गौरव, राजनीतिक आग्रह अथवा सांस्कृतिक सहानुभूति प्रमाणक स्थान नहि लेत। सामाजिक दाबी-परीक्षणक छह स्तर परिभाषा स्पष्ट करू → स्रोतक उत्पत्ति जाँचू → कारणक विकल्प खोजू → अभिकर्ताक अर्थ बुझू → संस्थागत/ऐतिहासिक सीमा लेखू → स्वतंत्र पुनर्परीक्षण करू एकहि संख्या समाज नहि बुझबैत; एकहि कथा सेहो समाज नहि बुझबैत — प्रमाणक अनेक स्तर जोड़ू
समकालीन प्रयोग
लोक-नीतिमे प्रभाव-मूल्यांकन अत्यन्त उपयोगी अछि, मुदा कार्यक्रम सफल कहबाक पहिने प्रश्न पूछू—ककरा लेल, कोन क्षेत्रमे, कतेक समय लेल, कोन तुलनात्मक समूहक सामने, आ कोन अनपेक्षित प्रभाव संग? औसत परिणाम समूहगत असमानता लुकाबि सकैत अछि। शिक्षा-अनुसन्धानमे परीक्षा-अंक महत्त्वपूर्ण आँकड़ा अछि, मुदा शिक्षणक सम्पूर्ण अर्थ नहि। भाषा-बोध, उपस्थिति, शिक्षक-उपलब्धता, घरक संसाधन, पोषण, भय, विद्यालयी संस्कृति आ पाठ्यक्रमक सम्बन्ध जोड़ब आवश्यक। केवल अंक बढ़लासँ वास्तविक सीख बढ़ल—ई स्वतः सिद्ध नहि। सार्वजनिक स्वास्थ्यमे जैविक कारण आ सामाजिक कारण संयुक्त छथि। रोगाणु अथवा जैविक जोखिम प्राकृतिक विज्ञानक विषय अछि; आवास, स्वच्छता, आय, कार्य-परिस्थिति, स्वास्थ्य-सेवा पहुँच, विश्वास आ कलंक सामाजिक विज्ञानक विषय। नीति सफल तखन होयत जखन दुनू स्तर एक-दोसराक स्थान नहि, पूरक बनय। जलवायु-परिवर्तनक सामाजिक अध्ययनमे भौतिक जलवायु प्रतिमानक निष्कर्ष सामाजिक व्यवहारक सरल भविष्यवाणी नहि बनैत। जोखिमक अनुभूति, बीमा, कृषि-विकल्प, प्रवास, भूमि-अधिकार आ राज्यक क्षमता सामाजिक प्रतिक्रिया निर्धारित करैत अछि। जलवायु-कारण वास्तविक, सामाजिक परिणाम संस्थागत रूपेँ मध्यस्थित। कृत्रिम बुद्धि-आधारित सामाजिक भविष्यवाणी विशेष सावधानी माँगैत अछि। ऋण, अपराध-जोखिम, रोजगार अथवा परीक्षा-सफलताक प्रतिमान ऐतिहासिक आँकड़ासँ नियमितता सीखि सकैत अछि; मुदा ऐतिहासिक पक्षपात, वर्गीकरणक प्रतिपुष्टि आ नीतिगत प्रतिक्रिया भविष्य बदलि सकैत अछि। उच्च भविष्यवाणी-सटीकता न्यायपूर्ण कारण-विवेचन नहि। डिजिटल मंचक अध्ययनमे आँकड़ा विशाल अछि, मुदा जनसंख्या-प्रतिनिधित्व अनिवार्य नहि। मंचपर जे लोक उपस्थित छथि, जे व्यवहार दर्ज होइत अछि, जे कलन-विधि (algorithm) देखबैत अछि आ जे आँकड़ा शोधक पबैत अछि—ई सभ चयन बनबैत अछि। बड़ा आँकड़ा (big data) = पूर्ण समाज नहि। मतदान आ जनमत-सर्वेक्षणमे प्रश्नक भाषा, नमूना, उत्तर-न-देब, सामाजिक वांछनीयता, समय आ घटनाक प्रभाव महत्वपूर्ण छथि। सर्वेक्षण उपयोगी मापन अछि, लोकतान्त्रिक इच्छा स्वयं नहि। परिणामक अनिश्चितता खुला रूपेँ देल जाए। अपराध-विज्ञानमे दर्ज अपराध आ वास्तविक अपराध अलग हो सकैत अछि। पुलिस उपस्थिति, रिपोर्ट करबाक क्षमता, कानूनी परिभाषा, सामाजिक कलंक आ प्रशासनिक प्रोत्साहन आँकड़ा बदलैत अछि। तें अपराध बढ़ल कहबाक पहिने मापन-प्रक्रिया जाँचब जरूरी अछि। अर्थशास्त्रमे प्रतिमान उपयोगी सरलीकरण छथि। प्रतिनिधि उपभोक्ता, पूर्ण सूचना अथवा संतुलन जकाँ धारणा कखनो विश्लेषण सुगम करैत अछि, मुदा वास्तविक सामाजिक संस्था आ विषमता लुकाबि सकैत अछि। प्रतिमानक उद्देश्य आ सीमा स्पष्ट रहय। इतिहास आ सामाजिक विज्ञानक संयुक्त अध्ययन नीति-परिवर्तन बुझबमे विशेष उपयोगी अछि। एक कानूनक प्रभाव तत्काल आँकड़ासँ नहि, दीर्घकालिक संस्थागत अनुकूलन, सामाजिक प्रतिरोध, अदालती व्याख्या आ प्रशासनिक क्षमता द्वारा बदलि सकैत अछि। समय स्वयं कारणात्मक आयाम अछि।
अध्याय-निष्कर्ष
प्राकृतिक विज्ञान आ सामाजिक विज्ञानक सम्बन्धक सही उत्तर एकहि विधि अथवा दू पूर्णतः अलग ज्ञान-जगत दुनू नहि। साझा वैज्ञानिक अनुशासन प्रमाण, कारण, स्पष्टता, पुनर्परीक्षण, विरोधी उदाहरण आ त्रुटि-संशोधनमे अछि। भेद विषय-वस्तुक प्रकृतिमे अछि: सामाजिक जगत अर्थयुक्त, नियम-संरचित, ऐतिहासिक आ आत्म-प्रतिबिम्बित अछि। एहि कारण सामाजिक विज्ञानकेँ कारणात्मक व्याख्याकेँ अर्थ-बोध, संस्था आ इतिहाससँ जोड़बाक पड़ैत अछि। समानान्तर दर्शन प्राकृतिकतावादक कठोर प्रमाण-अनुशासन आ व्याख्यात्मक परम्पराक अर्थ-संवेदी पद्धतिक बीच कृत्रिम समझौता नहि, कार्य-विभाजन प्रस्तावित करैत अछि। जे प्रश्न कारणात्मक अछि, ओकर कारण जाँचू; जे प्रश्न अर्थगत अछि, ओकर अर्थ जाँचू; जे प्रश्न संस्थागत अछि, नियम आ संसाधन जाँचू; जे प्रश्न ऐतिहासिक अछि, पथ जाँचू; आ सभ निष्कर्षकेँ विरोधी प्रमाणक सामने खुला राखू। अध्याय 83क सूत्र: “प्राकृतिक जगत कारणक प्रतिरोध दैत अछि; सामाजिक जगत कारणक संग अर्थ सेहो दैत अछि। विज्ञानक कठोरता दुनूमे चाही, विधि विषयक अनुरूप बदलत।”
अध्याय-ग्रन्थसूची
Max Weber — Economy and Society Max Weber — The Methodology of the Social Sciences Émile Durkheim — The Rules of Sociological Method Wilhelm Dilthey — Introduction to the Human Sciences Peter Winch — The Idea of a Social Science and Its Relation to Philosophy Charles Taylor — Philosophy and the Human Sciences Alfred Schutz — The Phenomenology of the Social World Georg Henrik von Wright — Explanation and Understanding Carl G. Hempel — Aspects of Scientific Explanation Karl Popper — The Poverty of Historicism Karl Popper — The Logic of Scientific Discovery Raymond Boudon — The Logic of Social Action Jon Elster — Explaining Social Behavior Daniel Little — Varieties of Social Explanation Daniel Little — Microfoundations, Method, and Causation Peter Hedström — Dissecting the Social Peter Hedström and Richard Swedberg (eds.) — Social Mechanisms James Coleman — Foundations of Social Theory Margaret Archer — Realist Social Theory Roy Bhaskar — The Possibility of Naturalism Andrew Sayer — Method in Social Science Nancy Cartwright — Hunting Causes and Using Them Nancy Cartwright and Jeremy Hardie — Evidence-Based Policy Judea Pearl — Causality James Woodward — Making Things Happen Donald T. Campbell and Julian C. Stanley — Experimental and Quasi-Experimental Designs for Research Donald B. Rubin — “Estimating Causal Effects of Treatments in Randomized and Nonrandomized Studies” Paul W. Holland — “Statistics and Causal Inference” Gary King, Robert O. Keohane and Sidney Verba — Designing Social Inquiry Henry E. Brady and David Collier (eds.) — Rethinking Social Inquiry John Gerring — Social Science Methodology Bent Flyvbjerg — Making Social Science Matter Helen Longino — Science as Social Knowledge Philip Kitcher — Science, Truth, and Democracy Ian Hacking — The Social Construction of What? Sally Haslanger — Resisting Reality John Searle — The Construction of Social Reality Brian Epstein — The Ant Trap Gautama — Nyāya-sūtra Vātsyāyana — Nyāya-bhāṣya Gaṅgeśa — Tattvacintāmaṇi Bimal Krishna Matilal — The Character of Logic in India Stephen H. Phillips — Epistemology in Classical India: The Knowledge Sources of the Nyāya School Jonardon Ganeri — Philosophy in Classical India: The Proper Work of Reason