समस्या संरचना–कर्तृत्व चक्र: सीमा → अवसर → अभ्यास → प्रतिरोध → सामूहिक क्रिया → संस्थागत परिवर्तन → नूतन सीमा संरचना → स्थिति/संसाधन → सम्भावित विकल्प → कर्तृत्व → प्रतिक्रिया → प्रतिफल → नियम/संस्था/आदतमे परिवर्तन → संशोधित संरचना मनुष्य शून्यमे निर्णय नहि करैत। भाषा, परिवार, जाति, वर्ग, लिंग, विद्यालय, कानून, बाजार, तकनीक, भूगोल, स्मृति, संस्था आ ऐतिहासिक विरासत ओकर विकल्पक क्षेत्र बनबैत अछि। मुदा एहि कारण विकल्प समाप्त नहि होइत। समानान्तर दर्शनक सूत्र अछि: संरचना वास्तविक अछि, पर संरचना नियति नहि; कर्तृत्व वास्तविक अछि, पर कर्तृत्व निराधार सर्वशक्ति नहि। पहिल अतिवाद संरचनात्मक नियतिवाद अछि। एहि दृष्टिमे व्यक्ति लगभग अपन सामाजिक स्थानक परिणाम बनि जाइत—जाति ओकर भविष्य लिखैत, वर्ग ओकर चेतना, लिंग ओकर भूमिका, भाषा ओकर क्षमता, तकनीक ओकर व्यवहार। ई दृष्टि असमान अवसरक वास्तविकता देखबैत अछि, मुदा प्रतिरोध, नवाचार, विचलन, नैतिक उत्तरदायित्व आ ऐतिहासिक परिवर्तन बुझबामे कमजोर पड़ि सकैत अछि। दोसर अतिवाद इच्छावादी व्यक्तिवाद अछि। एहि अनुसार सफलताक मूल कारण “मेहनत”, “मानसिकता” वा “सही चुनाव”; गरीबी, भेदभाव, विद्यालयक गुणवत्ता, विरासत, ऋण, स्वास्थ्य, नेटवर्क, कानून, हिंसा, भाषा-बाधा आ भूगोल पृष्ठभूमि बनि जाइत। ई दृष्टि कर्तृत्वकेँ मान्यता दैत अछि, मुदा संरचनात्मक असमानता केँ नैतिक विफलताक व्यक्तिगत कथामे बदलि सकैत अछि। तेसर कठिनाई कारणक स्तर अछि। कोनो छात्र परीक्षा असफल भेल—कारण तैयारी कम, विद्यालय कमजोर, घरमे श्रम-भार, भाषा-असंगति, पोषण, परीक्षा-पद्धति, डिजिटल पहुँच, सामाजिक अपेक्षा, अथवा ई सभक सम्बन्ध? एक कारण चुनि लेब सरल कथा दैत अछि; यथार्थ बहुस्तरीय कारण-संबंध माँगैत अछि। चारिम कठिनाई “संरचना” शब्द स्वयं अत्यन्त व्यापक अछि। जँ प्रत्येक स्थिर पैटर्नकेँ संरचना कहल जाए, तर्क (unfalsifiable) बनि सकैत। संरचना चिन्हबाक लेल नियम, संसाधन-वितरण, भूमिका, प्रोत्साहन, दण्ड, पहुँच, अपेक्षा, नेटवर्क आ पुनरुत्पादन-तन्त्र स्पष्ट करब आवश्यक। पाँचम कठिनाई “कर्तृत्व”क अछि। विकल्प उपलब्ध होएब मात्र कर्तृत्व नहि। विकल्पक जानकारी, जोखिम सहबाक क्षमता, सामाजिक समर्थन, कानूनी अधिकार, समय, धन, भाषा, आत्मविश्वास आ प्रतिफलक अनुमान कर्तृत्वक व्यावहारिक परास बदलैत। छठम कठिनाई अपवादक व्याख्या अछि। जँ दमनकारी संरचनामे किछु व्यक्ति सफल होइत छथि, की संरचना अस्तित्वहीन? नहि। अपवाद संरचना केँ झुठलाबैत नहि; कखनो ओ (exceptional) संसाधन, नेटवर्क, प्रतिभा, संयोग, समर्थन वा संरचनाक आन्तरिक छिद्र देखबैत। सातम कठिनाई पीड़ितक उत्तरदायित्व अछि। संरचना व्यवहार प्रभावित करैत अछि, मुदा की एहि कारण व्यक्ति नैतिक उत्तरदायित्वसँ मुक्त? उत्तर (binary) नहि। बलप्रयोग, विकल्पक वास्तविकता, जानकारी, भय, निर्भरता आ नुकसानक अनुपात अनुसार उत्तरदायित्वक स्तर बदलि सकैत। मूल प्रतिपादन संरचना केँ समानान्तर दर्शन “नियत फल देनिहार अदृश्य शक्ति” नहि, बल्कि पुनरावृत्त नियम, संसाधन-वितरण, भूमिका, अपेक्षा, नेटवर्क, तकनीकी (affordance), दण्ड-पुरस्कार आ संस्थागत स्मृतिक सम्बन्धात्मक विन्यास मानैत अछि। ई विन्यास सम्भावना-सरणी (probability distribution) बदलैत अछि; प्रत्येक व्यक्तिक परिणाम तय नहि करैत। कर्तृत्व (agency) संरचनासँ बाहरक शुद्ध इच्छा नहि। कर्तृत्वक अर्थ उपलब्ध/कल्पनीय विकल्पक बीच निर्णय, नियमक नूतन व्याख्या, सहयोग, असहमति, प्रतिरोध, नवाचार, पलायन, (bargaining), संस्था-निर्माण आ नूतन आदत बनायब। एजेन्ट संरचनामे जन्मैत, संरचनाक भाषा उपयोग करैत, तइयो संरचनाकेँ बदलि सकैत। समानान्तर दृष्टि नियतिवादक बदला “संरचित सम्भावना”क भाषा उपयोग करैत अछि। उदाहरणतः गरीबी उच्च शिक्षा कठिन करैत अछि—ई कारणगत दावा हो सकैत; “गरीब छात्र उच्च शिक्षा नहि पाबि सकैत” नियतिवादी दावा अछि। पहिल दाबी हस्तक्षेप खोजबैत; दोसर भविष्य बन्द करैत। संरचना दमन मात्र नहि; सक्षम सेहो करैत। भाषा सीमा लगबैत, मुदा संवाद सम्भव करैत; कानून दण्ड दैत, मुदा अधिकार सुनिश्चित करैत; विद्यालय अनुशासन करैत, मुदा ज्ञान-संसाधन उपलब्ध करैत; मंच आँकड़ा (capture) करैत, मुदा नूतन सार्वजनिकता खोलैत। एकहि संस्था (enabling) आ (constraining) दूनू हो सकैत। कर्तृत्वक नैतिक मूल्य परिणाम मात्रसँ नहि। प्रतिरोध असफल होएतहुँ कर्तृत्वक अर्थ रहि सकैत; आज्ञापालन सफल होएतहुँ (autonomy) घटि सकैत। न्यायपूर्ण समाजक लक्ष्य केवल “सफल परिणाम” नहि, बल्कि वास्तविक विकल्प, गरिमा, (voice), पुनर्विचार-अधिकार आ सामूहिक परिवर्तनक क्षमता बढ़ायब। संरचना आ कर्तृत्वक पच्चीस सूत्र 1. संरचना परिणाम तय नहि करैत; परिणामक सम्भावना, लागत आ जोखिम वितरित करैत। 2. कर्तृत्व शून्यसँ उत्पन्न नहि; उपलब्ध संसाधन, भाषा, ज्ञान, सम्बन्ध आ कल्पनीय विकल्प पर आश्रित। 3. अपवाद संरचना केँ खारिज नहि करैत; अपवादक मार्ग संरचनाक छिद्र अथवा विशेष संसाधन देखबैत। 4. औसत पैटर्न व्यक्ति पर नैतिक निर्णय नहि। समूह-सांख्यिकी सँ व्यक्ति-नियति अनुमान (ecological) (fallacy) बनि सकैत। 5. नियम लिखित होएब जरूरी नहि; प्रतिष्ठा, लज्जा, अपेक्षा, नकल, मौन आ अनौपचारिक दण्ड सेहो संरचना बनबैत। 6. संसाधन केवल धन नहि; समय, सुरक्षित स्थान, भाषा, प्रमाणपत्र, नेटवर्क, जानकारी, (mobility), स्वास्थ्य आ डिजिटल पहुँच सेहो। 7. सत्ता केवल आदेश नहि; (agenda) तय करब, विकल्प अदृश्य करब, वर्ग बनायब आ पूर्वनिर्धारित सेट करब सेहो। 8. (enabling) संरचनाक आलोचना सम्भव; लाभ देनिहार संस्था सेहो असमानता पुनरुत्पादित करि सकैत। 9. कर्तृत्वक मापन “चुनाव भेल”सँ नहि; विकल्प वास्तविक छल कि नहि, (informed) छल कि नहि, (exit) सम्भव छल कि नहि—ई जाँचू। 10. (path) (dependence) नियति नहि; पुरान मार्ग परिवर्तनक लागत बढ़बैत, असम्भव नहि बनबैत। 11. (habit) आ (habitus) कारण हो सकैत, चरित्र-दोष नहि। सामाजिक (learning) आ (embodied) (routine) परिवर्तनक नीति माँगैत। पूर्वपक्ष पूर्वपक्ष 1: जँ संरचना नियति नहि, त “संरचनात्मक अन्याय” शब्द कमजोर भऽ जायत। पूर्वपक्ष 2: कर्तृत्व पर जोर (victim-blaming) बनि सकैत। पूर्वपक्ष 3: संरचनात्मक व्याख्या व्यक्ति दोषीकेँ (excuse) देत। पूर्वपक्ष 4: हर चीज बहुस्तरीय कहला पर नीति अस्पष्ट होयत। पूर्वपक्ष 5: (merit) आखिर व्यक्तिक क्षमता अछि। पूर्वपक्ष 6: परम्परा लोक स्वयं मानैत अछि, त संरचनात्मक दबाव कतेक? पूर्वपक्ष 7: (market) चयन कर्तृत्वक सर्वोत्तम प्रमाण। पूर्वपक्ष 8: कलन-विधि केवल उपयोगकर्ता वरीयता सीखैत। पूर्वपक्ष 9: कानून बनला पर संरचना बदलि गेल। पूर्वपक्ष 10: यदि संरचना मनुष्य बनबैत, तत्काल बदलि किएक नहि सकैत? पूर्वपक्ष 11: सफल अपवाद प्रेरणा देत, त ओकरा (highlight) करब ठीक। पूर्वपक्ष 12: पहचान वर्ग संरचनात्मक अन्याय मापबाक लेल जरूरी; त वर्ग आलोचना किएक? पूर्वपक्ष 13: स्थानीय समुदाय अपने नियम तय करए। पूर्वपक्ष 14: संरचना सबतर अछि, त स्वतंत्रता (illusion)। पूर्वपक्ष 15: संरचनात्मक परिवर्तन हमेशा (progressive) नहि। उत्तरपक्ष उत्तर: नहि। संरचनात्मक अन्याय व्यक्तिक प्रत्येक परिणाम तय करबाक दावा नहि; व्यवस्थित रूपेँ अवसर, जोखिम, सम्मान अथवा संसाधन असमान वितरित होएबाक दावा अछि। (probabilistic) प्रभाव सेहो नैतिक रूपेँ गम्भीर। उत्तर: कर्तृत्व स्वीकार (victim-blaming) नहि, जँ बन्धन, बलप्रयोग आ (resource) अन्तराल स्पष्ट राखल जाए। पीड़ितकेँ केवल निष्क्रिय वस्तु मानब सेहो गरिमा घटबैत। उत्तर: व्याख्या आ (justification) अलग। सामाजिक (pressure) हिंसाक कारण बुझा सकैत, हिंसा सही नहि करैत। (culpability)क (degree) प्रसंग अनुसार बदलि सकैत। उत्तर: बहुस्तरीयता हस्तक्षेप (priority) रोकैत नहि। प्रभाव (size), (feasibility), अधिकार, लागत, (reversibility) आ (distribution) अनुसार (leverage) (point) चुनल जा सकैत। उत्तर: क्षमता वास्तविक, मुदा अवसर, प्रशिक्षण, भाषा, (nutrition), समय, परीक्षण (design) आ (inherited) (advantage) (performance) बनबैत। (merit) केँ प्रसंग-(free) (substance) मानब भ्रम। उत्तर: (internalised) मानक (voluntary) अनुभव हो सकैत। (consent)क गुणवत्ता (exit) लागत, (alternatives), (childhood) (socialisation), (sanction) आ (information)सँ जाँचल जाए। उत्तर: बाजार विकल्प (resource), (information), (monopoly), पूर्वनिर्धारित, (advertising), (credit) आ (bargaining) सत्तासँ संरचित। खरीद चयन वास्तविक कर्तृत्व हो सकैत, पूर्ण (autonomy) नहि। उत्तर: आँकड़ा (selection), (objective) (function), क्रम-निर्धारण, (interface), संयमन, (monetisation) आ (feedback) (loop) वरीयता केँ (shape) सेहो करैत। वरीयता (input) आ निर्गम दूनू। उत्तर: (formal) नियम केवल एक स्तर। (enforcement), (awareness), (bureaucracy), सामाजिक (sanction), (court) पहुँच आ (informal) (practice) बिना परिणाम सीमित रहि सकैत। उत्तर: (coordination) (problem), (sunk) लागत, (vested) (interest), जाल प्रभाव, (habit), (fear), अनिश्चितता, सामग्री (infrastructure) आ असमान सत्ता परिवर्तनक लागत बढ़बैत। उत्तर: प्रेरणा उपयोगी, मुदा अपवादकेँ सामान्य नीति-साक्ष्य बनाउ नहि। (survivor) पक्षपात संरचनात्मक बाधा छुपा सकैत। उत्तर: वर्ग उपयोगी क्रियात्मक औजार, पर ऐतिहासिक/(heterogeneous) वास्तविकता (simplify) करैत। मापन लेल उपयोग करू, (essential) (destiny) नहि बनाउ। उत्तर: (subsidiarity) महत्त्वपूर्ण, मुदा मूल गरिमा, हिंसा-विरोध, समान नागरिक अधिकार आ पुनर्विचार-अधिकार स्थानीय (majority)सँ ऊपर सुरक्षा माँगि सकैत। उत्तर: स्वतंत्रता (absolute) (unconditioned) चयन नहि; कारण-जगत भीतर (reflect), (revise), (resist), (cooperate) आ (institution) बदलबाक क्षमता स्वतंत्रताक पर्याप्त सार बनि सकैत। उत्तर: सही। परिवर्तन नूतन (domination) बना सकैत। एहि कारण (impact) परीक्षण, असहमति, (reversibility), (pilot), (monitoring) आ सुधार जरूरी। भारतीय संवाद न्याय परम्परामे कर्ता, इच्छा, प्रयत्न, ज्ञान, दोष आ फल कारण-सरणीमे विचारल जाइत। नैतिक/व्यावहारिक क्रिया (isolated) इच्छा नहि; संज्ञान, (desire), (effort) आ परिस्थितिक सम्बन्ध देखबैत। समानान्तर दृष्टि एहि विश्लेषणात्मक अनुशासनसँ लाभ लैत, पर आधुनिक संस्था-सत्ता आ सामाजिक वर्गीकरणक स्तर जोड़ैत। बौद्ध प्रतीत्यसमुत्पाद (dependent origination) एकल स्वाधीन कारणक विरुद्ध सम्बन्धात्मक उत्पत्तिक शिक्षा दैत। “ई अछि तें ओ होइत” प्रकारक (conditionality) संरचनात्मक (thinking)सँ संवाद करि सकैत, यद्यपि बौद्ध (metaphysical) परियोजना आधुनिक सामाजिक संरचना सिद्धान्तक समान नहि। जैन अनेकान्तवाद वस्तु/दाबीकेँ एक दृष्टिबिन्दुसँ सम्पूर्ण नहि मानबाक सावधानी दैत। संरचना–कर्तृत्व विवादमे ई उपयोगी: व्यक्ति केवल संरचना नहि, केवल स्वतंत्र कर्ता नहि; अलग नय अलग पक्ष देखबैत। मीमांसा कर्म, विधि, अधिकार, प्रसंग आ भाषिक अपेक्षाक सूक्ष्म विश्लेषण करैत। सामाजिक नियमक कारणगत शक्ति बुझबामे ई स्मरणीय जे नियमक प्रभाव केवल लिखित वाक्य नहि; पात्रता, प्रसंग, परम्परा आ अनुपालन-संरचना महत्त्वपूर्ण। भगवद्गीतामे प्रकृति, गुण, कर्म आ कर्तृत्वक प्रश्न जटिल रूपेँ उठैत; पाठक अलग दार्शनिक परम्परा अलग व्याख्या करैत। समानान्तर दर्शन एहि पाठ केँ आधुनिक (sociology)क प्रत्यक्ष सिद्धान्त नहि बनबैत, पर (conditioned) (action) बनाम (self-understanding)क प्रश्नक ऐतिहासिक संवादस्थल मानैत। सांख्य परम्पराक प्रकृति–पुरुष भेद आधुनिक संरचना–कर्तृत्व समान नहि, तथापि “(conditioned) (processes)” आ साक्षी/विवेकक भेद कर्तृत्वक दार्शनिक कल्पना पर तुलनात्मक प्रश्न खोलि सकैत। तुलना समानता घोषित करबाक बदला अवधारणात्मक (contrast) लेल। भारतीय धर्मशास्त्रीय परम्परामे वर्ण, आश्रम, परिवार, उत्तराधिकार, विवाह, दायित्व आदि (normative) संरचना रूपमे देखल जा सकैत; मुदा ऐतिहासिक व्यवहार क्षेत्र, काल, जाति, राजसत्ता, अर्थव्यवस्था आ स्थानीय प्रथासँ बदलैत रहल। ग्रन्थ = सम्पूर्ण सामाजिक वास्तविकता नहि। भक्ति, श्रमण, लोकपरम्परा आ क्षेत्रीय भाषाक उभार देखबैत अछि जे प्रतिष्ठित भाषिक/संस्थागत संरचना भीतर नूतन धार्मिक-साहित्यिक कर्तृत्व उभरि सकैत। प्रतिरोध सदैव संस्था-विरोधी नहि; कखनो नूतन संस्था बनबैत। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मिथिला संरचना–कर्तृत्वक अध्ययन लेल बहुस्तरीय क्षेत्र अछि: नदी आ बाढ़क भौतिक भूगोल, भारत–नेपाल सीमा, ग्रामीण बसावट, कृषि, प्रवास, शिक्षा, भाषिक बहुलता, जातिगत संस्था, पंजी-स्मृति, धार्मिक केन्द्र, नगर, डिजिटल (diaspora)—सभ एकहि समय कर्तृत्वक परास बनबैत। बाढ़ केँ केवल “प्राकृतिक आपदा” मानब अधूरा। नदी-प्रणाली, तटबन्ध, भूमि-उपयोग, सड़क, राहत-व्यवस्था, प्रशासन, गरीबी, (migration) जाल आ (household) (strategy) मिलि (vulnerability) बनबैत। परिवारक पलायन कर्तृत्व अछि, मुदा (forced) चयनक तत्व सेहो हो सकैत। पंजी/वंशावली ऐतिहासिक स्रोत आ सामाजिक संस्था दूनू रूपमे देखल जा सकैत। कागजी वर्गीकरण विवाह-नेटवर्क, स्मृति आ प्रतिष्ठा पर प्रभाव डालि सकैत; मुदा प्रत्येक व्यक्तिक जीवन पंजीक वर्गद्वारा पूर्ण निर्धारित नहि। तिथि, (copy-)इतिहास, (usage) आ ऐतिहासिक परिवर्तन जाँचल आवश्यक। मैथिली, बज्जिका, अंगिका, नेपाली, हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी आदि भाषिक संसाधन अलग अवसर खोलैत। विद्यालय/न्याय/प्रशासनक भाषा संरचनात्मक (gatekeeper) बनि सकैत; बहुभाषिक क्षमता कर्तृत्व बढ़ा सकैत; (low-resource) डिजिटल (status) नया बाधा पैदा करि सकैत। प्रवास मिथिला परिवारमे (income), (aspiration), लिंग (role), (elder) (care), (education) आ (housing) बदलि सकैत। (migrant) “संरचनासँ बाहर” नहि जाइत; ओ (origin) आ (destination)क दू संरचनाक बीच नूतन जाल कर्तृत्व विकसित करैत। स्त्रीक शिक्षा/रोजगारक विस्तार कानून, विद्यालय, परिवारिक (bargaining), सुरक्षित (transport), डिजिटल पहुँच, (role) प्रतिरूप आ (labour) (market)क संयुक्त परिणाम हो सकैत। “परम्परा” वा “व्यक्तिगत (ambition)” अकेले पर्याप्त व्याख्या नहि। जातिगत असमानता पर चर्चा संरचनात्मक प्रतिरूप पहचानए, मुदा व्यक्ति केँ वर्गक (stereotype)मे कैद नहि करए। ऐतिहासिक वर्गक परिवर्तन, (locality), (class), (education), लिंग, (migration) आ (inter-)समूह सम्बन्ध (intersectional) भेद बनबैत। डिजिटल (Videha-)जकाँ मंच प्रकाशन (gatekeeping)क एक भाग बदलि सकैत: भौगोलिक दूरी घटैत, अभिलेखागार (searchable) होइत, मैथिली सामग्री वैश्विक पहुँच पबैत। मुदा (device), (bandwidth), खोज क्रम-निर्धारण, (font) (support), सुलभता आ मंच (dependence) नूतन संरचना अछि। मिथिला विषयक दार्शनिक/ऐतिहासिक लेखनक नैतिक दायित्व अछि—क्षेत्रीय गौरवकेँ कर्तृत्वक स्रोत बनाउ, पर प्रमाण-विरोधी (destiny) (narrative) नहि। “हमर परम्परा एहन अछि, तें एहन रहत” समानान्तर दर्शन स्वीकार नहि करैत। संरचना जाँचबाक व्यवहारिक प्रोटोकॉल चरण 1 — परिणाम स्पष्ट करू: कोन परिणाम/व्यवहार/असमानता बुझबाक अछि? अस्पष्ट “समाज एहन अछि” नहि। चरण 2 — (actors) चिन्हू: व्यक्ति, परिवार, समूह, संस्था, मंच, राज्य, (market), जाल—ककर निर्णय (relevant)? चरण 3 — नियम लिखू: (formal) कानून/नीति आ (informal) (expectation/d)ण्ड अलग। चरण 4 — संसाधन-मानचित्र: धन, समय, शिक्षा, भाषा, (mobility), जाल, आँकड़ा, (device), (care), विधिक पहुँच। अध्याय-निष्कर्ष “संरचना अछि, मुदा संरचना नियति नहि” समानान्तर दर्शनक आशावादी नारा मात्र नहि; कारण-विवेचनक अनुशासन अछि। ई कहैत अछि जे सामाजिक पैटर्न वास्तविक, मापनीय आ नैतिक रूपेँ महत्त्वपूर्ण अछि; मुदा ओ व्यक्ति केँ पूर्ण भविष्यवाणी योग्य वस्तु नहि बनबैत। कर्तृत्वक सम्मानक अर्थ संरचनात्मक (injustice) नकारब नहि। उलट, अन्याय चिन्हबाक उद्देश्य कर्तृत्वक वास्तविक परास बढ़ायब अछि—अधिक जानकारी, संसाधन, सुरक्षा, आवाज, (exit), पुनर्विचार-अधिकार, (association) आ संस्था बदलबाक क्षमता। संरचनात्मक सुधारक कसौटी केवल औसत परिणाम नहि: ककर विकल्प बढ़ल? ककर (risk) घटल? ककर (voice) सुनल? ककर गरिमा सुरक्षित? ककरा ऊपर नया (burden) पड़ल? सुधार (reversible/contestable) अछि कि? अध्याय ९६ आत्मसमीक्षा सिखबैत अछि जे दर्शन स्वयं आलोचनासँ बाहर नहि। अध्याय ९७ तकर सामाजिक विस्तार अछि: कोनो संस्था, परम्परा, वर्ग, तकनीक अथवा ऐतिहासिक (arrangement) केँ “एहि तरहें चलैत आयल” कहि नियति घोषित नहि कएल जा सकैत। एहि अध्यायक संयुक्त सूत्र: “संरचना हमर विकल्पक मैदान बनबैत अछि; कर्तृत्व मैदान भीतर खेल, नियमक नूतन अर्थ, सामूहिक प्रतिरोध आ कखनो मैदानक पुनर्निर्माण सम्भव करैत अछि।” एहि संचयी फाइलमे अध्याय 96–98 पूर्ण छथि; अगिला संचयी चरणमे अध्याय 99 जोड़ल जायत। अध्याय 99–100 एखन केवल (approved) (plan/blueprint) स्तरपर छथि। अध्याय-ग्रन्थसूची (Anthony Giddens — The Constitution of Society) (Pierre Bourdieu — Outline of a Theory of Practice) (Pierre Bourdieu — The Logic of Practice) (Margaret S. Archer — Structure, Agency and the Internal Conversation) (Margaret S. Archer — Realist Social Theory: The Morphogenetic Approach) (Roy Bhaskar — The Possibility of Naturalism) (Roy Bhaskar — A Realist Theory of Science) (William H. Sewell Jr. — Logics of History: Social Theory and Social Transformation) (Douglas North — Institutions, Institutional Change and Economic Performance) (Elinor Ostrom — Governing the Commons) (Elinor Ostrom — Understanding Institutional Diversity) (Amartya Sen — Development as Freedom) (Amartya Sen — The Idea of Justice) (Martha C. Nussbaum — Creating Capabilities) (John Rawls — A Theory of Justice) (Iris Marion Young — Justice and the Politics of Difference) (Iris Marion Young — Responsibility for Justice) (Nancy Fraser — Scales of Justice) (Sally Haslanger — Resisting Reality) (Charles Tilly — Durable Inequality) (Charles Tilly — Identities, Boundaries, and Social Ties) (James C. Scott — Seeing Like a State) (James C. Scott — Weapons of the Weak) (Michel Foucault — Discipline and Punish) (Michel Foucault — The Archaeology of Knowledge) (Bruno Latour — Reassembling the Social) (Peter L. Berger and Thomas Luckmann — The Social Construction of Reality) (Erving Goffman — The Presentation of Self in Everyday Life) (Albert O. Hirschman — Exit, Voice, and Loyalty) (Mancur Olson — The Logic of Collective Action) (Mark Granovetter — “Economic Action and Social Structure: The Problem of Embeddedness”) (Robert K. Merton — Social Theory and Social Structure) (Jon Elster — Explaining Social Behavior) (Daniel Kahneman — Thinking, Fast and Slow) (Cass R. Sunstein — Why Nudge?) (Lawrence Lessig — Code and Other Laws of Cyberspace) (Langdon Winner — The Whale and the Reactor) (Jan van Dijk — The Deepening Divide: Inequality in the Information Society) (B. K. Matilal — Perception: An Essay on Classical Indian Theories of Knowledge) (B. K. Matilal — The Character of Logic in India) (Jonardon Ganeri — Philosophy in Classical India) (Jonardon Ganeri — The Lost Age of Reason) (Stephen H. Phillips — Epistemology in Classical India) (Matthew R. Dasti and Stephen H. Phillips (eds.) — The Nyāya-sūtra: Selections with Early Commentaries) (John Taber — A Hindu Critique of Buddhist Epistemology) (Georges Dreyfus — Recognizing Reality) (Jay L. Garfield — Engaging Buddhism) (Peter Adamson and Jonardon Ganeri — Classical Indian Philosophy) (Patrick Olivelle — The Āśrama System)