समस्या भाषा–यथार्थ संवाद चक्र: अनुभव → नामकरण → वर्गीकरण → कथन → प्रतिवाद → अनुवाद → पुनर्वर्णन → संशोधित अनुभव भाषा मनुष्यक संसारक एकटा मूल माध्यम अछि। हम वस्तु देखैत छी, भेद करैत छी, स्मृति बनबैत छी, कारण पूछैत छी, न्याय-अन्यायक नाम दैत छी, इतिहास लिखैत छी आ भविष्यक योजना करैत छी—एहि सभमे भाषा सक्रिय अछि। मुदा भाषा सक्रिय अछि कहब आ भाषा सभ किछुक अन्तिम निर्माता अछि कहब एक बात नहि। समानान्तर दर्शन एहि भेद पर जोर दैत अछि। “सीमा” शब्द एहि अध्यायमे प्रतिबन्ध मात्र नहि, आकार दैत क्षितिजक अर्थमे प्रयोग भेल अछि। भाषा किछु भेद स्पष्ट करैत अछि, किछु धुँधला; किछु अनुभव साझा करबाक योग्य बनबैत, किछु अनुभवक सूक्ष्मता कम करैत। मुदा सीमा चलायमान अछि—नूतन शब्द, अनुवाद, विज्ञान, कविता, कानून, लोकभाषा, बहुभाषिक संवाद, चित्र, संकेत, संख्या आ प्रतिवाद ओकर रेखा बदलैत रहैत अछि। पहिल कठिनाई भाषिक नियतिवादक अछि। जँ कहल जाए जे मनुष्य केवल अपन भाषाक श्रेणीमे सोचि सकैत अछि, तँ नूतन अवधारणा, अनुवाद, वैज्ञानिक खोज, भाषा-परिवर्तन आ स्वनिर्मित शब्दावलीक व्याख्या कठिन होइत। भाषा प्रभावशाली अछि; सर्वशक्तिमान नहि। दोसर कठिनाई तटस्थ-लेबल सिद्धान्तक अछि। जँ शब्द केवल पहिले सँ तैयार वस्तुपर नामपट्टी होइत, तँ “अपराध”, “रोग”, “जाति”, “सीमा”, “योग्यता”, “सामान्य”, “विकास”, “जोखिम” जकाँ श्रेणी समाजक व्यवहार, संस्था आ आत्मबोध बदलैत किएक? किछु वर्गीकरण वर्णनक संग सामाजिक परिणाम सेहो उत्पन्न करैत। तेसर कठिनाई अनुवादक अछि। दू भाषामे एकदम समान अर्थ हर बेर नहि भेटैत, मुदा एहि सँ अनुवाद असम्भव सिद्ध नहि होइत। अनुवाद प्रायः समतुल्यता नहि, बल्कि सन्दर्भ, प्रयोजन, प्रयोग, सांस्कृतिक संकेत आ अर्थ-हानि/लाभक विवेकपूर्ण समायोजन अछि। चारिम कठिनाई निजी अनुभवक अछि। पीड़ा, शोक, प्रेम, भय, ध्यान, स्वाद, देहगत थकान वा धार्मिक अनुभूति शब्दसँ अधिक घन हो सकैत अछि। शब्द अनुभवकेँ सार्वजनिक बनबैत, मुदा अनुभवक सम्पूर्ण गुणात्मकता अनिवार्य रूपेँ शब्दमे समाप्त नहि होइत। पाँचम कठिनाई मौनक अछि। मौन कखनो असहमति, भय, शोक, सम्मान, रणनीति अथवा अनभिज्ञता हो सकैत। भाषा-विश्लेषण जँ केवल बोलेल सामग्री देखत, तँ शक्ति कारण उत्पन्न मौन आ बोलबाक असमान अवसर छूटि सकैत। छठम कठिनाई संकेतक बहुलताक अछि। चित्र, नक्शा, संगीत, गणितीय समीकरण, इशारा, वास्तु, वस्त्र, अनुष्ठान, (interface) (icon) आ आँकड़ा सेहो अर्थ वहन करैत। भाषा महत्त्वपूर्ण माध्यम अछि, पर अर्थ-संसार भाषिक वाक्य तक सीमित नहि। सातम कठिनाई श्रेणी आ व्यक्तिक सम्बन्धक अछि। प्रशासनिक श्रेणी उपयोगी हो सकैत, पर व्यक्ति ओकरा सँ अधिक जटिल होइत। “गरीब”, “प्रवासी”, “विकलांग”, “अल्पसंख्यक”, “ग्रामीण”, “महिला”, “युवा”—ई विश्लेषणात्मक वर्ग वास्तविक विषमता देखबैत, मुदा व्यक्ति केँ पूर्ण परिभाषित नहि करैत। मूल प्रतिपादन समानान्तर दर्शन भाषाकेँ “मध्यस्थ यथार्थ”क साधन मानैत अछि। यथार्थ भाषासँ स्वतंत्र आयाम राखि सकैत, मुदा मानवक साझा ज्ञान प्रायः अवधारणा, संकेत, मापन, नाम, दस्तावेज आ कथा द्वारा व्यवस्थित होइत। एहि कारण भाषा ज्ञानक शर्त सेहो अछि आ आलोचनाक विषय सेहो। भाषा सीमा अछि किएक तँ प्रत्येक शब्द किछु भेद करैत आ किछु निरन्तरता काटैत अछि। “वन” कहिते हम एक क्षेत्र चिन्हित करैत, मुदा वनक भीतर जल, माटि, सूक्ष्मजीव, पशु, मानव उपयोग, कानूनी सीमा आ ऋतु-परिवर्तनक जटिलता एक शब्दमे समेटल जाइत। श्रेणी उपयोगी संक्षेप अछि, सम्पूर्ण यथार्थ नहि। भाषा कारागार नहि किएक तँ मनुष्य अपन शब्दावलीक आलोचना करि सकैत, नूतन शब्द बना सकैत, पुरान अर्थ बदलि सकैत, परभाषासँ ग्रहण करि सकैत, रूपक द्वारा अनजान चीज बुझा सकैत, आ शब्द विफल भेलापर चित्र/संख्या/उदाहरण/देहगत प्रदर्शनक सहारा लऽ सकैत। भाषिक विनम्रता समानान्तर दर्शनक नियम अछि: “हमर कथन यथार्थक नकल नहि, जाँच योग्य प्रस्तुति अछि।” एहि सँ सत्य कमजोर नहि होइत; उलट कथन आ यथार्थक बीच प्रमाणिक सम्बन्ध देखबाक बाध्यता बढ़ैत। भाषाक नैतिक आयाम सेहो अछि। गलत नामकरण केवल (semantic) त्रुटि नहि; अपमान, कलंक, अदृश्यता, अधिकार-वंचना वा हिंसाक पूर्वाधार बनि सकैत। तथापि सम्मानक नामकरण आलोचनात्मक चर्चा रोकबाक साधन सेहो नहि बनबाक चाही। एहि अध्यायक सूत्र: “शब्द खिड़की सेहो अछि, फ्रेम सेहो; फ्रेम दृश्य सीमित करैत, मुदा खिड़की बन्द कोठरी नहि—हम स्थान बदलि, दोसर खिड़की खोलि, बाहर जा, नक्शा बना, आ फ्रेम स्वयं बदलि सकैत छी।” भाषा, अर्थ आ यथार्थक पच्चीस सूत्र 1. शब्द वस्तु नहि; वस्तुक प्रति सार्वजनिक संकेत अछि। 2. संकेत मनमाना हो सकैत, मुदा प्रयोगक नियम पूर्ण मनमाना नहि—सफल संवाद साझा भेद आ व्यवहार माँगैत। 3. श्रेणी उपयोगी होएबाक लेल सीमा चाही; सीमा वास्तविक विविधता ओझराइ सकैत। 4. अर्थ (dictionary) (entry) मात्र नहि; वाक्य, प्रसंग, वक्ता, श्रोता, प्रयोजन, इतिहास आ व्यवहार संग बदलैत। 5. “एक शब्द = एक स्थिर अर्थ” प्रायः मिथ्या सरलता अछि। 6. बहुअर्थकता त्रुटि मात्र नहि; भाषा लचकदार होएबाक एक कारण अछि। 7. अस्पष्टता कखनो दोष, कखनो आवश्यक खुलापन। कानून/विज्ञानमे सूक्ष्मता अधिक चाही; कविता/संवादमे (deliberate) खुलापन उपयोगी हो सकैत। 8. अनुवाद शब्द-समानता नहि; अर्थ-कार्य, प्रसंग, सांस्कृतिक भार आ पाठक-उद्देश्यक समायोजन अछि। 9. अनुवाद असम्भव कहब अतिशयोक्ति; पूर्ण निष्कलंक अनुवाद सम्भव कहब सेहो अतिशयोक्ति। 10. नाम बदललासँ वस्तु हर बेर नहि बदलैत; मुदा सामाजिक वस्तु आ संस्था नामकरणसँ प्रभावित हो सकैत। 11. भाषा तथ्य बना नहि सकैत जे भौतिक प्रमाणक विरुद्ध हो; भाषा तथ्यक वर्णन/मापनक चौकट अवश्य बदलि सकैत। 12. मौन अर्थहीन नहि; मौनक अर्थ अनुमान मात्रसँ नहि, परिस्थिति आ शक्ति-संबंधसँ जाँचू। 13. जकरा नाम नहि, ओकर अनुभव असम्भव नहि; मुदा सार्वजनिक पहचान आ नीति कठिन हो सकैत। 14. नया नाम दृश्यता देि सकैत, पर नई श्रेणी नूतन (stigma) सेहो बना सकैत। भारतीय संवाद न्याय परम्पराक शब्दप्रमाण चर्चा भाषा आ ज्ञानक सम्बन्धकेँ गंभीरता सँ लैत अछि। वक्ताक विश्वसनीयता, वाक्यार्थ, पद-संबंध आ ज्ञानोत्पत्ति—ई सभ प्रश्न आधुनिक गवाही/(communication) चर्चासँ संवाद खोलैत। समानान्तर दर्शन एहि परम्पराकेँ हूबहू आधुनिक सिद्धान्त नहि बनबैत, बल्कि भाषिक ज्ञानक अनुशासनात्मक पूर्वज रूपमे पढ़ैत। मीमांसा वाक्य, शब्द-शक्ति, विधि आ पाठ-व्याख्याक जटिल प्रश्न उठबैत। परम्परागत ग्रन्थक अर्थ केवल (isolated) शब्दसँ नहि; वाक्य-संबंध, प्रयोजन, प्रसंग आ व्याख्यात्मक नियम सँ बनैत—ई (insight) कानूनी/धार्मिक (hermeneutics)मे उपयोगी संवाद दैत। बौद्ध अपोह-विचार वर्गक नकारात्मक सीमा—“ई, अन्य नहि”—पर विचारक संसाधन दैत। समानान्तर दर्शन एकरा सीधा आधुनिक (semantics) नहि कहैत; मुदा वर्गीकरणक (relational) (character) समझबाक लेल उपयोगी तुलनात्मक प्रश्न मानैत। भर्तृहरिक वाक्यपदीय भाषा, वाक्य आ अनुभूतिक एकत्व पर गहन चिन्तन प्रस्तुत करैत। आधुनिक (linguistic) (turn) सँ सरल समानता बनायब ऐतिहासिक त्रुटि होयत; तथापि भाषा केँ केवल बाहरी नामपट्टी न मानबाक दार्शनिक गम्भीरता स्पष्ट अछि। नव्य-न्याय तकनीकी भाषा अर्थभेदक असाधारण सूक्ष्मता विकसित करैत। एहि परम्परासँ समानान्तर दर्शन सीखैत अछि जे अस्पष्ट दार्शनिक बहसकेँ सम्बन्ध, (qualifier), (locus), अनुपस्थिति, संज्ञान, शर्त आदि स्पष्ट कए अधिक परीक्षणीय बनाओल जा सकैत। अलंकार/ध्वनि परम्परा अर्थक बहुस्तर देखबैत—प्रत्यक्ष कथ्य मात्र नहि, संकेत, व्यञ्जना, रस आ प्रसंग सेहो। सार्वजनिक नीति/विज्ञानमे एहि (literary) खुलापनक सीमा अछि, मुदा साहित्यिक अर्थकेँ (dictionary) (paraphrase)मे घटाब नहि चाही। पाश्चात्य भाषिक मोड़सँ संवाद विट्गेन्स्टाइनक उत्तरकालीन दर्शन प्रयोग, जीवन-रूप आ भाषा-(game) पर जोर दैत। समानान्तर दृष्टि एहि सँ “अर्थ = प्रयोग मात्र”क कठोर सूत्र नहि निकालैत; बल्कि पूछैत अछि—कथन कोन व्यवहारमे काम करैत, नियम कोना सीखल गेल, गलत प्रयोग कोना चिन्हल जाए? वास्तविकताक प्रतिरोध एहि व्यवहारक बाहरी कसौटी रहि सकैत। क्वाइन अनुवाद (indeterminacy) आ अवधारणात्मक (scheme)क समस्या उठबैत; डेविडसन (radical) (interpretation) माध्यमे अत्यधिक (scheme-relativism) पर प्रश्न करैत। समानान्तर दर्शन एहि बहससँ सीखैत अछि जे अनुवादमे (underdetermination) होइतहुँ संवादक साझा संसार, व्यवहार आ (charity)क शर्त आवश्यक। गाडामर परम्परा, पूर्वसमझ आ ऐतिहासिक (horizon)क (fusion) पर बल दैत। अर्थ प्रत्येक पाठकक निजी (invention) नहि; पाठ, परम्परा, प्रश्न आ वर्तमान (horizon)क संवादमे खुलैत। देरिदा उपस्थितिक सरल (metaphysics), (binary) (hierarchy) आ पाठक भीतरक (instability) देखबैत। समानान्तर उत्तर: विखण्डन आवश्यक आलोचनात्मक साधन हो सकैत, मुदा निर्णय, प्रमाण, हानि आ (institution)क पुनर्निर्माण बिना अन्तिम राजनीतिक/ज्ञानमीमांसीय पद्धति नहि। अध्याय-निष्कर्ष “भाषा सीमा अछि, मुदा कारागार नहि” समानान्तर दर्शनक भाषिक विनम्रताक सूत्र अछि। भाषा बिना साझा दर्शन कठिन; भाषा मात्रसँ यथार्थ समाप्त नहि। शब्द हमरा वस्तु, अनुभव आ समाजक प्रति मार्ग दैत, मुदा प्रत्येक मार्ग चयन, कटौती आ दृष्टिकोण साथे। एहि कारण दार्शनिक काम शब्दक (police) बनब नहि, बल्कि अर्थक सीमा स्पष्ट करब, ऐतिहासिक परिवर्तन चिन्हब, अनुवादक हानि/लाभ बतायब, मौन आ शक्ति देखब, आ दाबीकेँ भाषाबाह्य/स्वतंत्र प्रमाणसँ जाँचब अछि। भाषा-स्वतंत्र पूर्ण दृष्टि मानवक पहुँच बाहर हो सकैत; तथापि अनेक भाषा, अनेक पद्धति, मापन, अनुभव, प्रतिवाद आ पुनर्वर्णन द्वारा हम एकल शब्दावलीक बन्दी होएब टारि सकैत छी। अध्याय ९६ आत्मसमीक्षा खोलैत, अध्याय ९७ संरचना नियति नहि कहैत, आ अध्याय ९८ एहि विचारकेँ भाषापर लागू करैत: भाषिक संरचना वास्तविक अछि, पर मनुष्य अनुवाद, नवशब्द, शिक्षा, कला, विज्ञान, आलोचना आ सामूहिक प्रयोग द्वारा ओकर सीमाकेँ बदलि सकैत। एहि अध्यायक संयुक्त सूत्र: “शब्द हमरा संसार देखबैत अछि; विवेक हमरा शब्द बदलि फेर संसार देखबाक सामर्थ्य दैत अछि।” एहि संचयी फाइलमे अध्याय 96–98 पूर्ण छथि; अगिला संचयी चरणमे अध्याय 99 जोड़ल जायत। अध्याय 99–100 एखन केवल (approved) (plan/blueprint) स्तरपर छथि। अध्याय-ग्रन्थसूची (Ludwig Wittgenstein — Philosophical Investigations) (Ludwig Wittgenstein — Tractatus Logico-Philosophicus) (Gottlob Frege — The Foundations of Arithmetic) (Bertrand Russell — Introduction to Mathematical Philosophy) (W. V. O. Quine — Word and Object) (W. V. O. Quine — From a Logical Point of View) (Donald Davidson — Inquiries into Truth and Interpretation) (Wilfrid Sellars — Science, Perception and Reality) (P. F. Strawson — Individuals) (J. L. Austin — How to Do Things with Words) (John R. Searle — Speech Acts) (H. P. Grice — Studies in the Way of Words) (Paul Ricoeur — Interpretation Theory) (Paul Ricoeur — The Rule of Metaphor) (Hans-Georg Gadamer — Truth and Method) (Jacques Derrida — Of Grammatology) (Jacques Derrida — Writing and Difference) (Michel Foucault — The Archaeology of Knowledge) (Michel Foucault — The Order of Things) (Ian Hacking — The Social Construction of What?) (Sally Haslanger — Resisting Reality) (Charles Taylor — Human Agency and Language) (Charles Taylor — Sources of the Self) (George Lakoff and Mark Johnson — Metaphors We Live By) (Umberto Eco — Semiotics and the Philosophy of Language) (Roman Jakobson — On Linguistic Aspects of Translation) (George Steiner — After Babel) (Susan Bassnett — Translation Studies) (Lawrence Venuti — The Translator’s Invisibility) (Kwame Anthony Appiah — “Thick Translation”) (B. K. Matilal — The Word and the World: India’s Contribution to the Study of Language) (B. K. Matilal — The Character of Logic in India) (Jonardon Ganeri — Semantic Powers: Meaning and the Means of Knowing in Classical Indian Philosophy) (Jonardon Ganeri — Philosophy in Classical India) (K. Kunjunni Raja — Indian Theories of Meaning) (Harold G. Coward — The Sphota Theory of Language) (Kisor Kumar Chakrabarti — Classical Indian Philosophy of Mind) (Mark Siderits — Buddhism as Philosophy) (Georges Dreyfus — Recognizing Reality) (John Taber — A Hindu Critique of Buddhist Epistemology) (Stephen H. Phillips — Epistemology in Classical India) (Matthew R. Dasti and Stephen H. Phillips (eds.) — The Nyāya-sūtra: Selections with Early Commentaries) (Peter Adamson and Jonardon Ganeri — Classical Indian Philosophy) (Patrick Olivelle — Language, Texts, and Society) (Sheldon Pollock — The Language of the Gods in the World of Men) (Francesca Orsini — The Hindi Public Sphere 1920–1940: Language and Literature in the Age of Nationalism) (Lisa Mitchell — Language, Emotion, and Politics in South India) (Ngũgĩ wa Thiong’o — Decolonising the Mind) (Walter J. Ong — Orality and Literacy) (Jack Goody — The Interface Between the Written and the Oral)