समस्या सत्ता–ज्ञान–सत्य परीक्षण-चक्र: प्रश्न → पहुँच → वर्गीकरण → प्रमाण → व्याख्या → प्रतिवाद → स्वतंत्र जाँच → सुधार → उत्तरदायित्व ज्ञान शून्य आकाशमे उत्पन्न नहि होइत। ककरा प्रश्न पूछबाक अधिकार अछि, ककरा पुस्तकालय/अभिलेखागार धरि पहुँच अछि, कोन भाषा “मानक” मानल जाइत अछि, कोन आँकड़ा संग्रह होइत अछि, कोन विशेषज्ञताकेँ प्रतिष्ठा भेटैत अछि, कोन शोधकेँ धन मिलैत अछि, आ ककर गवाही “विश्वसनीय” बुझल जाइत अछि—ई सभ सामाजिक-संस्थागत शक्ति-संबंधसँ प्रभावित होइत अछि। एहि साधारण तथ्यकेँ नकारब भोला यथार्थवाद होयत। मुदा दोसर अतिवाद सेहो समान रूपेँ त्रुटिपूर्ण अछि: जँ सत्ता ज्ञान-उत्पादन प्रभावित करैत अछि, तँ सत्य केवल सत्ता-द्वारा बनाओल कथा अछि। एहि निष्कर्षमे “ज्ञानक सामाजिक परिस्थिति” आ “दाबीक सत्य-मूल्य” एक-दोसरामे मिला देल जाइत अछि। कोनो सरकार वर्षा रोकबाक आदेश जारी कए वर्षा बन्द नहि करा सकैत; कोनो विश्वविद्यालय मतगणना बदलि ऐतिहासिक घटना बदलि नहि सकैत; कोनो कम्पनी जोखिमक नाम बदलि विषाक्त पदार्थक जैविक प्रभाव समाप्त नहि कए सकैत। समानान्तर दर्शनक प्रस्ताव अछि जे सत्ता आ सत्यक सम्बन्ध न पूर्ण स्वतंत्रता अछि, न पूर्ण पहचान। सत्ता सत्य धरि पहुँचक मार्ग, गति, लागत, दृश्यता आ व्याख्याक विकल्प बदलि सकैत अछि; मुदा विश्व, शरीर, दस्तावेज, स्मृति, मापन, प्रतिवाद आ स्वतंत्र स्रोत बारम्बार एहन प्रतिरोध प्रस्तुत करैत अछि जे मनमाना दाबीकेँ असफल करैत अछि। एहि अध्यायक लक्ष्य “निष्पक्ष दृष्टिकोण”क भोला आदर्श बचेनाइ नहि, बल्कि बेहतर निष्पक्षताक संस्थागत शर्त बनब अछि: स्रोतक उत्पत्ति-श्रृंखला, हित-संघर्षक खुलासा, विधिक पारदर्शिता, असहमतिक स्थान, पुनरुत्पादन, डेटा-अभिगम, संस्करण-इतिहास, अपील, त्रुटि-सुधार आ बहुप्रमाणीय जाँच। पहिल समस्या प्रश्न-चयनक अछि। शोध के विषय “महत्त्वपूर्ण” मानल जाए, एहि पर धन, प्रतिष्ठा, प्रशासनिक प्राथमिकता आ सार्वजनिक दबाव प्रभाव डालैत अछि। जे प्रश्न पूछल नहि गेल, ओकर उत्तर अनुपस्थित रहत; मुदा अनुपस्थिति सँ प्रश्नक वस्तु असत्य नहि भऽ जाइत। दोसर समस्या अभिलेखीय पहुँचक अछि। दस्तावेज नष्ट, गोपनीय, अवर्गीकृत, निजी संग्रहमे बन्द, खराब (catalogued) वा केवल एक भाषामे उपलब्ध हो सकैत। इतिहासकारक दाबी एहि पहुँच-संरचनासँ प्रभावित होइत; तथापि उपलब्ध स्रोतक आलोचनात्मक परीक्षण सँ अधिक/कम विश्वसनीय निष्कर्ष निकालल जा सकैत अछि। तेसर समस्या वर्गीकरणक अछि। राज्य, विद्यालय, अस्पताल, न्यायालय, कम्पनी आ मंच (platform) निरन्तर वर्ग बनबैत अछि—निवासी/अनिवासी, जोखिमपूर्ण/सुरक्षित, योग्य/अयोग्य, अपराध/अशान्ति, रोग/सामान्य, (spam/legitimate)। वर्ग परिणामकारी अछि; मुदा वर्गक सामाजिक प्रभाव एहि प्रश्नक उत्तर नहि जे ओकर (underlying) तथ्यगत (basis) सही अछि कि नहि। मूल प्रतिपादन समानान्तर दर्शन सत्ता–ज्ञान सम्बन्धकेँ तीन स्तरमे अलग करैत अछि। पहिल, उत्पादन-स्तर: प्रश्न, डेटा, संस्था, भाषा, धन, पहुँच, पद्धति। दोसर, प्रसार-स्तर: प्रकाशन, मंच, (censorship), क्रम-निर्धारण, प्रतिष्ठा, (pedagogy)। तेसर, सत्य-परीक्षण स्तर: प्रमाण, विरोधाभास, (prediction), पुनरावृत्ति-परीक्षण, स्वतंत्र पुष्टिकरण, बाधक-प्रमाण। सत्ता पहिल दू स्तरपर भारी प्रभाव डालि सकैत अछि; तेसर स्तरकेँ सेहो बाधित करि सकैत अछि, मुदा पूर्णतः मनमाना नहि बना सकैत, कारण दावा विश्व/स्रोत/दूसर दावासँ टकराइत अछि। गलत (bridge) (design) गिरि सकैत, गलत (medical) (dose) नुकसान कए सकैत, (fabricated) तिथि स्वतंत्र अभिलेखागारसँ असंगत निकलि सकैत। “सत्य” एहि अध्यायमे जादुई (absolute) (certainty) नहि। सत्य-दाबी संशोधनयोग्य हो सकैत, विश्वसनीयता (graded) हो सकैत, प्रमाण अधूरा हो सकैत। (Fallibility) आ (arbitrariness) एक बात नहि। जँ हम गलत हो सकैत छी, एहि सँ ई नहि निकलैत जे किछुओ चलेत। पच्चीस सूत्र 1. सत्ता प्रश्नक (agenda) बदलि सकैत अछि; उत्तरक तथ्यगत बन्धन समाप्त नहि करैत। 2. अभिलेखागार चयनित अछि; चयनित = काल्पनिक नहि। 3. मौन प्रमाण हो सकैत, मुदा मौनक कारण स्वतंत्र रूपेँ जाँचू। 4. अनुभव महत्त्वपूर्ण प्रमाण अछि; अनुभव = सर्वज्ञता नहि। 5. विशेषज्ञता आवश्यक अछि; (credential) = अचूकता नहि। 6. संख्या शक्तिशाली साधन अछि; मापन (design) मूल्य-मुक्त नहि। 7. वर्ग सामाजिक परिणाम बनबैत; वर्गक अनुभवाधारित (adequacy) अलग जाँचू। 8. (standpoint) अनदेखल पक्ष खोलि सकैत; (standpoint) स्वयं अन्तिम न्यायाधीश नहि। 9. सहमति प्रमाण हो सकैत; सहमतिक (independence) आ प्रोत्साहन जाँचू। 10. असहमति महत्त्वपूर्ण; असहमति = सत्यक प्रमाण नहि। 11. (censorship) ज्ञान घटा सकैत; (absolute) वाणी स्वतंत्रता स्वतः सत्य बढ़बैत नहि। 12. पारदर्शिता उपयोगी; मूल आँकड़ा (dump) पारदर्शिताक बराबर नहि। 13. उत्पत्ति-श्रृंखला बिना (fluency) विश्वसनीयता नहि। 14. हित-संघर्ष दाबीकेँ स्वतः झूठ नहि बनबैत; (disclosure) (scrutiny) बढ़बैत। 15. संस्थागत (trust) (blind) (faith) नहि; (audited) (reliability) अछि। 16. (repeated) दावा स्वतंत्र पुष्टिकरण नहि। 17. स्रोत (diversity) तभी उपयोगी जखन स्रोत वास्तवमे स्वतंत्र हो। 18. भाषा (framing) बदलैत; (framing) घटना स्वयं नहि बदलैत। 19. शक्ति असमानता गवाहीक (uptake) बदलैत; तथ्यगत सामग्री फेरो जाँच योग्य। 20. तथ्य आ मूल्य अलग स्तर, मुदा नीतिमे परस्पर सम्बन्धित। 21. अनिश्चितता स्वीकारब कमजोरी नहि; (fabricated) (certainty) ज्ञान-विरोधी अछि। 22. सुधार तन्त्र सत्य-(seeking) (institution)क केन्द्र अछि। 23. पुनर्विचार-अधिकार बिना (algorithmic) प्राधिकार लोकतान्त्रिक रूपेँ कमजोर अछि। 24. बहुप्रमाणीयता “सब पक्ष बराबर” नहि; प्रमाणक भार कारणसहित अलग हो। 25. सत्ता-आलोचना स्वयं सत्ता बनि सकैत; आत्मसमीक्षा अनिवार्य। सत्ता ज्ञानकेँ कोना आकार दैत अछि एजेंडा आ वित्त पूर्वपक्ष पूर्वपक्ष 1: “सभ ज्ञान सत्ता-द्वारा निर्मित, तें (objective) सत्य मिथक।” उत्तर: (construction) (production-)प्रसंग समझबैत, सत्य-शर्त नहि मिटबैत। (Claim) विश्व/प्रमाणसँ असंगत हो सकैत। पूर्वपक्ष 2: “विजेता इतिहास लिखैत, तें पराजितक कथा स्वतः सत्य।” उत्तर: विजेता पक्षपात वास्तविक; पराजित स्रोत (counter-)प्रमाण दे सकैत, मुदा स्वतः (infallible) नहि। दूनू स्रोत आलोचना चाही। पूर्वपक्ष 3: “विशेषज्ञ सभ (elite) छथि; लोक-अनुभव श्रेष्ठ।” उत्तर: स्थानीय (experience) अनदेखल पक्ष खोलैत; जटिल कारणगत अनुमान लेल (specialised) पद्धति आवश्यक हो सकैत। (Collaborative) (expertise) बेहतर। पूर्वपक्ष 4: “डेटा निष्पक्ष, कथा पक्षपाती।” उत्तर: आँकड़ा (collection), (coding), (missingness), (denominator), प्रतिरूप चयन (value/assumption)सँ प्रभावित; तइयो (transparent) मापन कथा मात्रसँ अधिक बन्धन दैत। पूर्वपक्ष 5: “हर सत्य दावा सत्ता-अधिग्रहण, तें (neutral) (adjudication) असम्भव।” उत्तर: पूर्ण (neutrality) कठिन; (comparative) (procedural) (fairness) सम्भव—खुला प्रमाण, (recusal), पुनर्विचार-अधिकार, तर्क-(giving), स्वतंत्र समीक्षा। पूर्वपक्ष 6: “सत्यक नामपर (censorship) उचित।” उत्तर: (demonstrable) हानिक (narrow) नियम सम्भव, मुदा असहमति (suppression) सत्य-अन्वेषण घटबैत। (Rule) (viewpoint-based) नहि, प्रमाण-(based) हो। पूर्वपक्ष 7: “यदि अनिश्चितता अछि तँ निर्णय रोकू।” उत्तर: नीति अक्सर अनिश्चिततामे चाही। (calibrated) विश्वसनीयता, (reversible) (action), (monitoring), (precaution), (update) नियम उपयोगी। पूर्वपक्ष 8: “बहुप्रमाणीयता मिथ्या (balance) बनौत।” उत्तर: नहि; प्रमाण (weighting) (explicitly) असमान हो। एक (peer-reviewed) (replicated) (study) आ एक (anonymous) (viral) (post) बराबर नहि। उत्तरपक्ष: सत्य-अन्वेषी संस्थाक सात स्तम्भ 1. अभिगम: (relevant) आँकड़ा/स्रोत तक यथासम्भव समान पहुँच। 2. पारदर्शिता: पद्धति, (funding), (assumptions), (edits), संस्करण, (conflicts) सार्वजनिक। 3. प्रतिवाद: असहमति सुरक्षित; आलोचक प्रतिशोधसँ बचल। 4. स्वतंत्रता: (corroborating) (sources)क (dependency) (graph) स्पष्ट। 5. सुधार: सुधार, (retraction), शुद्धिपत्र, पुनर्विचार-अधिकार जीवित प्रक्रिया। 6. प्रतिनिधित्व: अनदेखल पक्ष घटेबाक लेल विविध अनुभव/विशेषज्ञता; (diversity) = प्रमाण (standard)क विकल्प नहि। 7. उत्तरदायित्व: निर्णयक (owner), (reasons), समीक्षा तिथि, (harmed) (party)क (remedy) स्पष्ट। सत्ता–ज्ञान दाबी जाँचक पन्द्रह-चरणीय पद्धति 1. दाबी ठीक-ठीक लिखू; तथ्यगत, कारणगत, (normative), विधिक, (predictive) कि पहचानू। 2. (key) पद आ वर्ग परिभाषित करू। 3. दाबी ककरा लाभ/हानि पहुँचा सकैत, (stakeholder) मानचित्र बनाउ। 4. प्राथमिक स्रोत/उत्पत्ति-श्रृंखला चिन्हू। 5. स्रोत (creator)क (purpose), प्रोत्साहन, पहुँच आ (constraints) लिखू। 6. (missing) स्रोत/(voice)क कारण खोजू। 7. स्रोत (independence) (dependency) (graph) बनाउ। भारतीय संवाद न्याय परम्परामे प्रमाण (pramāṇa) आ प्रमाणाभासक भेद सत्ता-ज्ञान प्रश्न लेल उपयोगी अनुशासन दैत अछि। वक्ता प्रतिष्ठित अछि कि नहि एतबे नहि; प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द—प्रत्येकक वैधता-शर्त आ दोष जाँचल जाइत। शब्द-प्रमाणमे आप्तता (विश्वसनीय वक्ता)क प्रश्न आधुनिक गवाही (ethics) सँ संवाद करैत। विश्वसनीयता सामाजिक प्रतिष्ठासँ समान नहि; ज्ञान, ईमानदारी, प्रसंग, हित-संघर्ष आ स्वतंत्र पुष्टिकरण आवश्यक। बौद्ध प्रमाणमीमांसा संज्ञानक त्रुटि, अनुमान आ अवधारणा (formation) पर सूक्ष्म प्रश्न उठबैत। अनुभूति आ अवधारणात्मक (construction)क भेद आधुनिक वर्ग आलोचनासँ संवाद करि सकैत। मीमांसा (textual) प्राधिकारक (sophisticated) नियम विकसित करैत, मुदा आधुनिक सार्वजनिक विवेकमे परम्परागत प्राधिकारक दावा (plural) (citizenry)क समान नागरिक कारणसँ पुनः जाँचल चाही। जैन अनेकान्तवाद अनेक पक्ष देखनेक अनुशासन दैत; ओकर अर्थ “सभ विरोधी दाबी बराबर सत्य” नहि। (standpoint) (conditionality) (logical) विरोधाभासकेँ जादू सँ समाप्त नहि करैत। नव्य-न्यायक अवच्छेदक, सम्बन्ध, (qualificand/qualifier-)जकाँ विश्लेषण वर्गक (precise) सीमा तय करबाक प्रेरणा दैत: “ककर विषयमे?”, “कोन सम्बन्धमे?”, “कोन समय?”, “कोन शर्तमे?”—एहि स्पष्टतासँ राजनीतिक अस्पष्टता घटैत। मिथिला-केन्द्रित समानान्तर अनुप्रयोग मिथिला, वज्जि, अङ्ग वा नेपाल–भारत सीमाक्षेत्रक इतिहास लिखैत समय आधुनिक (administrative) (boundary) केँ अतीतपर सीधा आरोपित नहि करू। (inscription), (manuscript), (gazetteer), मौखिक (memory), भाषा (geography), (river) (route), (pilgrimage) जाल, (land) अभिलेख आ (archaeology)क प्रमाण अलग समय-मानचित्र पर रखू। स्थानीय प्रतिष्ठित परिवारक अभिलेखागार मूल्यवान हो सकैत, मुदा (preservation) सत्ताक द्योतक सेहो। जे परिवार अभिलेख बचा सकल, ओ इतिहासमे अधिक दृश्य; जे समुदायक अभिलेख नष्ट, ओकर अनुपस्थिति “इतिहास नहि”क प्रमाण नहि। भाषिक सत्ता जाँचू: मैथिली, संस्कृत, फारसी, उर्दू, हिन्दी, नेपाली, अंग्रेजी अथवा स्थानीय बोलिक स्रोत अलग प्रशासनिक/सांस्कृतिक प्रसंग दर्शा सकैत। एक भाषा-अभिलेखागार केँ सम्पूर्ण क्षेत्रक (voice) नहि मानू। स्थान-नाम बदलल, नदीक धारा बदलल, (district) (boundary) बदलल, (script) बदलल—एहि कारण खोज विफलताक अर्थ स्रोत अनुपस्थिति नहि। प्राधिकार-(file), (alias) (mapping), ऐतिहासिक (gazetteer) आ (GIS) (crosswalk) उपयोगी। समानान्तर इतिहास-दृष्टि स्थानीय गौरव आ आत्मालोचना दूनू राखत: प्रमाण मजबूत हो तँ गर्व; प्रमाण कमजोर हो तँ विश्वसनीयता घटाउ। क्षेत्रीय अस्मिता तथ्यगत (standard)क विकल्प नहि। अध्याय-निष्कर्ष “सत्ता ज्ञानकेँ प्रभावित करैत अछि, सत्यकेँ मनमाना नहि बनबैत अछि” एहि अध्यायक संतुलित सूत्र अछि। सत्ता ककर प्रश्न सुनल जाए, ककर स्रोत बाँचि रहए, ककर भाषा प्रतिष्ठित हो, ककर प्रमाण (circulate) करए—ई सभ बदलि सकैत। एतए सत्ता-आलोचना ज्ञानमीमांसाक अनिवार्य भाग अछि। मुदा सत्यक अवधारणा त्यागलासँ कमजोरक रक्षा नहि होइत; उलटे शक्तिशाली व्यक्ति कहि सकैत जे “हमर सत्य” पर्याप्त। न्याय लेल साझा तथ्यगत (adjudication), (documented) प्रमाण, विरोधाभास परीक्षण, स्वतंत्र पुष्टिकरण आ सुधार तन्त्र आवश्यक। समानान्तर दर्शन एतए (neither) (naive) (objectivism) (nor) (total) (relativism) चुनैत। ओकर आदर्श “स्थित, संशोधनयोग्य, बहुप्रमाणीय वस्तुनिष्ठता” अछि—जे अपन स्थान/हित/भाषा स्वीकारैत, मुदा एही कारण प्रमाण (standard) नहि छोड़ैत। अध्याय ९६ आत्मसमीक्षा सिखबैत, अध्याय ९७ संरचना नियति नहि कहैत, अध्याय ९८ भाषाकेँ सीमा पर कारागार नहि मानैत, आ अध्याय ९९ सत्ता-ज्ञानक वास्तविक सम्बन्ध स्वीकार करैतहुँ सत्यकेँ मनमाना बनबाक सँ रोकैत। एहि संचयी (file)मे अध्याय 96–99 पूर्ण छथि; अध्याय 100 एखन (approved) (plan) आ 100.1–100.25 (detailed) (blueprint) स्तरपर अछि। पूर्ण अध्याय १०० अगिला संचयी चरणमे जोड़ल जायत। अध्याय-ग्रन्थसूची (Michel Foucault — The Archaeology of Knowledge) (Michel Foucault — Discipline and Punish) (Michel Foucault — The History of Sexuality, Volume 1) (Michel Foucault — Power/Knowledge) (Thomas S. Kuhn — The Structure of Scientific Revolutions) (Karl Popper — The Logic of Scientific Discovery) (Karl Popper — Conjectures and Refutations) (Robert K. Merton — The Sociology of Science) (Robert N. Proctor — Golden Holocaust) (Naomi Oreskes and Erik M. Conway — Merchants of Doubt) (Naomi Oreskes — Why Trust Science?) (Helen Longino — Science as Social Knowledge) (Helen Longino — The Fate of Knowledge) (Sandra Harding — Whose Science? Whose Knowledge?) (Donna Haraway — “Situated Knowledges”) (Miranda Fricker — Epistemic Injustice) (José Medina — The Epistemology of Resistance) (Kristie Dotson — “Tracking Epistemic Violence, Tracking Practices of Silencing”) (Charles Mills — The Racial Contract) (Ian Hacking — The Social Construction of What?) (Ian Hacking — Historical Ontology) (Sally Haslanger — Resisting Reality) (Philip Kitcher — Science, Truth, and Democracy) (Alvin Goldman — Knowledge in a Social World) (C. A. J. Coady — Testimony: A Philosophical Study) (Bernard Williams — Truth and Truthfulness) (Hannah Arendt — “Truth and Politics”) (Jürgen Habermas — Between Facts and Norms) (Jürgen Habermas — The Theory of Communicative Action) (Pierre Bourdieu — Homo Academicus) (Pierre Bourdieu — Language and Symbolic Power) (Edward Said — Orientalism) (Antonio Gramsci — Selections from the Prison Notebooks) (Walter Lippmann — Public Opinion) (Jacques Ellul — Propaganda) (Samuel Woolley and Philip N. Howard (eds.) — Computational Propaganda) (Luciano Floridi — The Philosophy of Information) (Cathy O’Neil — Weapons of Math Destruction) (Virginia Eubanks — Automating Inequality) (Ruha Benjamin — Race After Technology) (Safiya Umoja Noble — Algorithms of Oppression) (B. K. Matilal — Perception: An Essay on Classical Indian Theories of Knowledge) (B. K. Matilal — The Character of Logic in India) (Stephen H. Phillips — Epistemology in Classical India) (Jonardon Ganeri — Philosophy in Classical India) (Jonardon Ganeri — Attention, Not Self) (Matthew R. Dasti and Stephen H. Phillips (eds.) — The Nyāya-sūtra: Selections with Early Commentaries) (John Taber — A Hindu Critique of Buddhist Epistemology) (Georges Dreyfus — Recognizing Reality) (Mark Siderits — Buddhism as Philosophy) (Kisor Kumar Chakrabarti — Classical Indian Philosophy of Mind) (Peter Adamson and Jonardon Ganeri — Classical Indian Philosophy) (Marc Bloch — The Historian’s Craft) (E. H. Carr — What Is History?)