Full chapter text
समस्या
अन्तिम परीक्षण-चक्र: प्रश्न → प्रमाण → प्रतिपक्ष → भाषा/संरचना/सत्ता-जाँच → मानवीय परिणाम → आत्मसमीक्षा → संशोधन → पुनःपरीक्षण ई अध्याय पूर्ववर्ती दार्शनिकसभक सार-संग्रह नहि। एकर लक्ष्य दुनू खण्डक दीर्घ बहसक बाद समानान्तर दर्शनकेँ स्वतंत्र, त्रुटिसंशोध्य आ सार्वजनिक रूपेँ परीक्ष्य दार्शनिक पद्धतिक रूपमे प्रस्तुत करब अछि। खण्ड–१ सँ सात आधार भेटैत अछि; खण्ड–२ भाषा, संरचना, विखण्डन, सत्ता, पहचान, डिजिटलता आ कृत्रिम बुद्धिक प्रश्नसँ एहि आधारसभकेँ कठोर परीक्षा दैत अछि। अन्तिम प्रतिपादन तखनहि सार्थक अछि जखन ओ अपन पूर्व निष्कर्षकेँ पुनः जाँचि सकए। समानान्तर दर्शनक अर्थ दोसर केन्द्र स्थापित करब नहि। “मुख्यधारा” शब्दक विरुद्ध एक स्थायी “वैकल्पिक धारा” बनि फेर ओही प्रकारक बौद्धिक एकाधिकार बनब एहि परियोजनाक लक्ष्य नहि। एकर निष्ठा कोनो स्थायी शिविर प्रति नहि, बल्कि प्रमाण, सत्य, गरिमा, न्याय, स्वतंत्र विवेक आ आत्मसमीक्षा प्रति अछि। एहि कारण ई अध्याय अपन समेकित प्रतिपादनक प्रत्येक चरणमे दू कसौटी रखैत अछि: पहिल, दाबी वास्तविक प्रमाण आ प्रतिपक्ष सहि सकैत अछि कि नहि; दोसर, सिद्धान्त अपनहि आलोचनासँ बचबाक लेल विशेष छूट माँगैत अछि कि नहि। जे सिद्धान्त अपन आलोचक लेल कठोर आ अपन लेल कोमल कसौटी बनबैत अछि, ओ समानान्तर दर्शनक कसौटीपर असफल अछि। 100.1 समानान्तर दर्शन किएक? दार्शनिक इतिहास प्रायः केन्द्र आ हाशियाक भाषा मे पढ़ल जाइत अछि। मुदा केन्द्र होना सत्यक प्रमाण नहि, आ हाशियामे होना स्वतः सत्यक प्रमाण सेहो नहि। प्रतिष्ठित परम्परा कखनो दीर्घ परीक्षणक कारण टिकैत अछि; कखनो संस्था, भाषा, सत्ता वा पाठ्यक्रमक कारण। दबायल मत कखनो उपेक्षित सत्य राखैत अछि; कखनो ओ स्वयं अप्रमाणित, रूढ़ वा अन्यायपूर्ण हो सकैत अछि। अतः समानान्तर दर्शनक आरम्भ स्थान-सूचक लेबलसँ नहि, दाबी-जाँचसँ होइत अछि। “समानान्तर” शब्दक पहिल अर्थ अछि एकाधिक वैध आरम्भ-बिन्दु। कोनो प्रश्नकेँ केवल यूरोपीय, भारतीय, आधुनिक, परम्परागत, धार्मिक, वैज्ञानिक, स्थानीय अथवा वैश्विक भाषा सँ शुरू करबाक बाध्यता नहि। मुदा बहु आरम्भ-बिन्दुक अर्थ बहु सत्यक अराजकता सेहो नहि। जँ दू दाबी परस्पर-विरोधी तथ्य कहैत अछि, तँ दूनू एकहि अर्थमे सत्य नहि हो सकैत; प्रमाणक भार, प्रसंग आ अवधारणात्मक भेद जाँचबाक पड़त। दोसर अर्थ अछि बौद्धिक स्वतंत्रता। कखनो मुख्यधारा अधिक मजबूत प्रमाण देत; कखनो हाशियाक स्रोत मौन खोलत; कखनो दूनू गलत वर्गीकरणपर आधारित होयत। समानान्तर रहब स्थायी विरोध नहि, निर्णयक स्वतंत्रता अछि। एहि स्वतंत्रताक मूल्य तखन अछि जखन विचारक अपन प्रिय परम्पराक विरुद्ध प्रमाण स्वीकारि सकए। तेसर अर्थ अछि संवादक संरचना। समानान्तर रेखा साधारण ज्यामितीय अर्थमे नहि, बल्कि एहन पथक रूपक अछि जे एक-दोसराक अस्तित्व स्वीकारैत, तुलनाक सम्भावना खोलैत, मुदा बलपूर्वक विलय नहि करैत। भारतीय आ पाश्चात्य, मिथिला आ विश्व, शास्त्रीय आ डिजिटल—सभक प्रश्नकेँ समान मंचपर रखबाक लक्ष्य अछि, समान घोषित करबाक नहि। 100.2 खण्ड–१ सँ प्राप्त दार्शनिक आधार
अध्याय-निष्कर्ष
खण्ड–१ सँ सात आधार, खण्ड–२ सँ भाषा/संरचना/सत्ता/विखण्डन/कृत्रिम बुद्धिक चुनौती, आ (Chapters) 96–99 सँ आत्मसमीक्षा, कर्तृत्व, भाषिक सीमा तथा सत्ता–सत्यक संतुलन—ई सभ अध्याय १००मे एक “महासंश्लेषण” बनि नहि, परस्पर-सुधारक प्रणाली बनि सामने अबैत अछि। समानान्तर दर्शनक दार्शनिक योगदान एक नूतन अन्तिम उत्तर देबामे नहि, बल्कि प्रश्न पूछबाक एहन सार्वजनिक अनुशासन बनाबामे अछि जाहिमे बहु स्रोत, वास्तविकताक प्रतिरोध, गरिमा, सत्ता, इतिहास, आस्था, तकनीक आ आत्मसमीक्षा एक-दोसराक सीमा जाँचैत अछि। एहि अन्तिम अध्यायक बाद पोथीक पाठक लेल खुलल प्रश्न रहैत अछि: कोन दाबी एहि पद्धतिक कसौटीपर टिकैत अछि, कोन संशोधन माँगैत अछि, आ कोन भविष्यक प्रमाण एहि सूत्रसभकेँ बदलबाक अधिकार रखैत अछि? समानान्तर दर्शनक उत्तर—ई अधिकार भविष्यक प्रमाण आ बेहतर तर्कक पास सदैव रहत।
अध्याय-ग्रन्थसूची
(B. K. Matilal — Perception: An Essay on Classical Indian Theories of Knowledge) (B. K. Matilal — The Character of Logic in India) (Stephen H. Phillips — Epistemology in Classical India: The Knowledge Sources of the Nyāya School) (Jonardon Ganeri — Philosophy in Classical India) (Jonardon Ganeri — The Lost Age of Reason: Philosophy in Early Modern India 1450–1700) (Matthew R. Dasti and Stephen H. Phillips (eds.) — The Nyāya-sūtra: Selections with Early Commentaries) (John Taber — A Hindu Critique of Buddhist Epistemology: Kumārila on Perception) (Mark Siderits — Buddhism as Philosophy: An Introduction) (Georges Dreyfus — Recognizing Reality: Dharmakīrti’s Philosophy and Its Tibetan Interpretations) (Peter Adamson and Jonardon Ganeri — Classical Indian Philosophy) (Ludwig Wittgenstein — Philosophical Investigations) (J. L. Austin — How to Do Things with Words) (Paul Grice — Studies in the Way of Words) (W. V. O. Quine — Word and Object) (Donald Davidson — Inquiries into Truth and Interpretation) (Hans-Georg Gadamer — Truth and Method) (Paul Ricoeur — Interpretation Theory) (Jacques Derrida — Of Grammatology) (Jacques Derrida — Writing and Difference) (Michel Foucault — The Archaeology of Knowledge) (Michel Foucault — Power/Knowledge) (Thomas S. Kuhn — The Structure of Scientific Revolutions) (Karl Popper — Conjectures and Refutations) (Helen Longino — Science as Social Knowledge) (Naomi Oreskes — Why Trust Science?) (Miranda Fricker — Epistemic Injustice) (José Medina — The Epistemology of Resistance) (Ian Hacking — The Social Construction of What?) (Sally Haslanger — Resisting Reality) (Alvin Goldman — Knowledge in a Social World) (C. A. J. Coady — Testimony: A Philosophical Study) (Bernard Williams — Truth and Truthfulness) (Jürgen Habermas — Between Facts and Norms) (John Rawls — Political Liberalism) (Amartya Sen — The Idea of Justice) (Martha C. Nussbaum — Creating Capabilities) (Hannah Arendt — The Human Condition) (Charles Taylor — A Secular Age) (Bruno Latour — We Have Never Been Modern) (Luciano Floridi — The Philosophy of Information) (Cathy O’Neil — Weapons of Math Destruction) (Virginia Eubanks — Automating Inequality) (Ruha Benjamin — Race After Technology) (Safiya Umoja Noble — Algorithms of Oppression) (Norbert Wiener — The Human Use of Human Beings) (Herbert A. Simon — The Sciences of the Artificial) (Luciano Floridi and J. W. Sanders — “On the Morality of Artificial Agents”) (Marc Bloch — The Historian’s Craft) (E. H. Carr — What Is History?) (Carlo Ginzburg — Clues, Myths, and the Historical Method)