विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

अजित कुमार झा (संपर्क-9472834926)
मैथिली साहित्यक सूक्ष्मद्रष्टा : डा० रमानन्द झा "रमण"
"सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥"
मनुस्मृति केर ई श्लोक एकटा व्यावहारिक जीवन-मंत्र सेहो अछि। एकर अर्थ भेल सदैव सत्य बाजू मुदा से सबहक प्रिय होइक आ जौँ अप्रिय अछि अर्थात् जे किनको कटु लागि सकैत छन्हि तेहन सत्य नहि बजबाक चाही। एहन असत्य जे किनको प्रिय लागनि सेहो नहि बजबाक चाही। जरुरी नहि जे सत्य सदैव कटु होइत छैक। जाहि सत्य केँ सुनि लोग केँ कष्ट होइत छन्हि से नहि बाजय केर सुझाव देल गेल अछि। मुदा अहि बातक जौँ अक्षरशः पालन कैल जाय तखन केओ समालोचक त' नहिए बनि सकैत छथि। खैर समय एवं आवश्यकतानुसार बुद्धि एवं विवेक सँ निर्णय लेबाक चाही। समालोचक वैह बनि सकैत छथि जे मुँह देखि मुङबा नहि बाँटैत होइथ। जे स्वयं अनुशासित होइथ। जिनका विभिन्न विषय पर गहन अध्ययन होइन। जे भूत, वर्तमान एवं भविष्य केँ अकानि सकथि। जिनका ओहि परिवेशक इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र एवं मनोविज्ञान केर भरपूर ज्ञान होइन। जे बिना कोनो भेदभाव केँ सबके पढ़ैत होइथ आ सत्य केँ सत्य तथा झूठ केँ झूठ कहबाक जिनका साहस होइन। कोनो विषय वस्तु केँ अखियासि लेबाक जिनका हिआओ होइन वैह व्यक्ति अपन सार्थक समालोचना द्वारा रचनाकार सब केँ उपकृत कय सकैत छथि। ई कहबा मे कनिको दुविधा नहि भ' रहल अछि जे उपर्युक्त वर्णित समस्त गुण सँ परिपूर्ण छथि आदरणीय रमानन्द झा 'रमण' जी। आलोचक केँ सूक्ष्मद्रष्टा सेहो कहल जाइत अछि आ ताहि पैमाना पर रमण जी सिद्धहस्त छथि । पं० श्री गोविन्द झा केर कहब छनि जे डा० जयकान्त मिश्र, आचार्य रमानाथ झा आदि किछु विद्वान जे अनुसन्धान, संग्रह आ समीक्षाक परम्परा चलाओल ताहि बाट केँ सम्प्रति प्रायः एकसरे रमण जी धएने छथि।
हालहि मे हिनकर एक साक्षात्कारक वीडियो देखबाक सौभाग्य प्राप्त भेल। ओहि साक्षात्कार केँ सुनि हिनक व्यक्तित्वक एक झलक सेहो भेटल। श्रीमती दीपा मिश्र बड्ड नीँक प्रश्न सब केलखिन आ ई ओकर समुचित जवाब निधोख भ' क' देलखिन। हिनक गाम सरिसब-पाही आ प्रारम्भिक शिक्षा दीक्षा राघोपुर डेओढ़ी मे रहि क' भेल छनि। साहित्यिक एवं सांस्कृतिक रूप सँ दुनुए परिसर उर्वरा सम्पन्न रहल अछि । एक त' अपन पारिवारिक पृष्ठभूमि आ दोसर राघोपुर डेओढ़ीक साहित्यिक गोष्ठी दुनु मिलि हिनका स्वतः अहि क्षेत्र मे बढ़बा लेल प्रेरित केलकनि। भारतीय रिजर्व बैंक मे नौकरी करैत निरन्तर साहित्यिक गतिविधि सँ जुड़ल रहलथि। हिनक प्रतिभा केँ देखैत विभागो हिनका सँ अहि तरहक काज करबाक अवसर देलकनि। Export Promotion Council लेल पोथी लिखलनि - निर्यात कोना शुरू करी। वित्तीय शिक्षा योजना केँ तहत बैंक खाता खोलबाक लाभ विषय पर लिखलनि-टाकाक गाछ। सेवा निवृत्ति केर लगभग दस वर्षक बाद Non banking Finance द्वारा होइत धोखाधड़ी पर लिखलनि - लखपतिजी लुटेरा। ट्रेड युनियन सँ सेहो जुड़ल छलथि। चेतना समितिक पत्रिका घर बाहर सँ लगभग 15 वर्ष सँ जुड़ल छथि। एकर संपादक केर रूप मे काफी चर्चित भेलाह। अपन साक्षात्कार मे रमण जी कहैत छथि जे साहित्य समाजक संपत्ति होइत अछि आ संपादन भेल अहि संपत्तिक रक्षा।
आलोचना केँ विषय मे रमण जी कहैत छथि जे साहित्य लेल आलोचना नितान्त आवश्यक अछि। अहि सँ पाठक एवं साहित्यकार दुनु केँ लाभ होइत छनि मुदा बहुत दुःख केँ साथ इहो कहैत छथि जे 10-15 वर्ष मे रचनाकार सब केँ अपन आलोचना सहबाक शक्ति खत्म भ' गेल छनि। संदेश दैत रमण जी कहैत छथि जे लोग अपने लिखय मे व्यस्त छथि मुदा संवेदनशीलता केर साथ दोसर केँ पढ़ि नहि रहल छथि। बहुत आवश्यक अछि संवेदनशील ढ़ंग सँ दोसर केँ पढ़बाक। आगू कहैत छथि जे सहनशीलताक अभाव स्पष्ट रूप सँ जखन तखन देखार भ' जाइत अछि। विभिन्न पत्र-पत्रिका मे हिनका पढ़बाक यथेष्ट अवसर भेटल अछि। चेतना समितिक " घर बाहर" सेहो कतेको अंक पढ़ने छी मुदा सब छिटपुट ढ़ंग सँ।
आदरणीय रमण जी मैथिली भाषा जगत केँ सिद्धहस्त आलोचकक श्रेणी मे अबैत छथि ताहि मे कोनो संदेह नहि मुदा हिनको खूब आलोचना होइत छनि। अपना सब मे एकटा कहबी छैक - हे ननदो, तोरो ननदो। यदा कदा हिनका पर जातिवादी आरोप लगाओल जाइत छनि मुदा हुनकर कहब स्पष्ट छनि जे निरर्थक आरोप केँ ओ महत्व नहि दैत छथि। निःसंदेह नितान्त आवश्यकता अछि आलोचनाक, मुदा से सार्थक होइक तखने नीँक लगैत छैक। तखन एकटा बात साफ छैक जे उकटा पैँचीक त' कोनो अंत नहि।
लगभग आधा दर्जन आलोचनात्मक निबन्धक पोथी, एक दर्जन सम्पादित आ दुइ गोट अनूदित पोथी प्रकाशित छनि। हिनक किछु आलोचनात्मक पोथी केर नाम भेल - "अखियासल, बेसाहल, भजारल एवं हिआओल"। पोथी केर नामे पढ़ि पाठक पोथीक विषय मे अनुमान लगा सकैत छथि । विदेहक पेटार सँ डाउनलोड कय 'अखियासल' एवं 'हिआओल' पढ़लहुँ। दुनु पोथी जिज्ञासु प्रवृत्ति केर व्यक्ति एवं विशेष रूप सँ विद्यार्थी ( शोधार्थी ) सबहक लेल निःसंदेह ज्ञानवर्द्धक अछि।
सरिसब-पाही, मधुबनीक अखियासल प्रकाशन सँ सन् 2012 मे प्रकाशित भेल छनि आलोचनात्मक पोथी "हिआओल"। पहिल अध्याय केर शीर्षक अछि - ग्रिअर्सन एवं मिथिला भाषाक अध्ययन । अपन आलेख मे बड्ड सुंदर ढ़ंग सँ मिथिलाक भाषा मैथिली केर चर्चा केने छथि। मैथिली साहित्य त' प्रचुर मात्रा मे लिखल जाइत रहल छल मुदा एक स्वतंत्र भाषा केँ रूप मे ई स्थापित नहि छल। एक स्वतंत्र भाषाक रूप मे सर्वप्रथम एकरा स्थापित करबाक श्रेय नि:संदेह जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन केँ जाइत छनि। ओ मैथिलीक गहन अध्ययन कैलनि आ सन् 1881 मे पहिल बेर मैथिलीक व्याकरण लओना हली झा केर चर्चा सेहो अहि सन्दर्भ मे भेल अछि। मिथिला एवं मैथिलीक विरोधी सबहक कोनो कमी नहि अछि। अहि आलेख मे अहि बात केँ सेहो उजागर कयलनि अछि रमण जी। उदाहरणस्वरूप बिहार विभाजनक समय पटना विश्वविद्यालय केर पूर्व उपकुलपति डा० सच्चिदानन्द सिन्हा सन लोकक मैथिली भाषा-संस्कृति विरोधी मानसिकता केँ सेहो उजागर केलनि अछि। दोसर अध्याय - रमानाथ झा आ मिथिला भाषा मे मैथिली भाषाक क्षेत्र मे रमानाथ झाक अवदान केँ तोपि देबाक प्रयास निरन्तर कोना कएल गेल अछि तकरा खोँइछा छोड़ा क' स्पष्ट कयलनि अछि अहि आलेख मे। ओना हरेक काल खण्ड मे एहन कहानी दोहराओल जाइत रहल अछि। हँ समय केर अनुरूप पात्र अलग रहैत अछि। मिथिला भाषाक प्राचीनता पर प्रकाश देबय लेल वाल्मीकि रामायण केर प्रसंग उद्धृत कयलनि अछि। महर्षि वाल्मीकि अहि मे लिखने छथि जे अशोक वाटिका मे अपहृत कए राखल सीताक संग भाषाविद् हनुमानक वार्तालाप मानुषी भाषा मे भेल छल। निःसंदेह विद्वान सबहक अहि विषय मे मतान्तर अछि मुदा ओ मानुसी भाषा मैथिली छल सेहो अनेक विद्वानक मत छनि। विभिन्न कालखंडक जेना कि बुद्ध, महावीर आ डाकवचन केर उल्लेख करैत मैथिली भाषाक प्राचीनता केँ सिद्ध करबाक सार्थक प्रयास कएल गेल अछि। तेसर अध्याय - प्रत्यालोचक किरण जी मे लोहना रोड स्टेशनक समीप केर एक घटना केर चर्चा करैत रमण जी लिखने छथि जे आलोचना वा प्रत्यालोचना अभिनन्दन पत्र नहि थिक, आवश्यक नहि जे ओ प्रीतिकरे हो। रमानाथ झा जी केर अनुसार साहित्यक क्षेत्र मे पक्षपात हेय बूझल जाइत अछि। अपन मित्रक कृति केँ आकाश चढ़ाए देब, अपन विरोधीक कृति केँ गर्हित देखाएब साहित्यिक महा पाप थिक। अहि आलेख मे मैथिली भाषा साहित्यक क्षेत्र मे किरण जी केर महत्वपूर्ण अवदान पर प्रकाश दैत लिखने छथि - प्रत्यालोचक किरण जी अपन बात-विचार सँ, अपन लेखन सँ, अपन व्यवहार सँ आ समाजक परिप्रेक्ष्य मे साहित्यक मूल्यांकनक बाट प्रशस्त करबा मे सफल भेलाह अछि। एहि सँ साहित्यालोचनक एक नवदृष्टि विकसित भेल अछि।
चारिम अध्याय अछि अपेक्षितारय छोड़ि, उपेक्षितक आँखि सँ कन्यादान पढ़ल जाय। हरिमोहन झा कृत कन्यादान उपन्यास पर अपन बेबाक विचार रखने छथि रमण जी। एकटा आलोचक केर रूप मे हुनक प्रशंसा होएबाक चाही जे अतेक संवेदनशील विषय पर ओ अपन बात केँ स्पष्टता सँ रखने छथि। हरिमोहन झाक साहित्यक तीनटा श्रेणी मे विभाजन केने छथि। प्रथम श्रेणी मे ओ अबैत छथि जिनक एकमात्र उद्देश्य मनोरंजन छनि। दोसर श्रेणी मे ओ सब अबैत छथि जिनका हुनक सान्निध्य प्राप्त छलनि आ हुनक अपेक्षित व्यक्ति छथि। तेसर श्रेणी मे ओ पाठक सब अबैत छथि जे हरिमोहन झा साहित्य केँ समाज कथा बूझि पढ़ैत छथि आ ओ हिनक साहित्य केँ हनुमान चालीसा बूझि पाठ करैत छथि। अहि श्रेणी मे उच्च स्थान पर मोहन भारद्वाज जी केँ राखल गेल छनि मुदा हमरा बूझि पड़ैत अछि जे सब सँ बेसी संख्या अही श्रेणी केर पाठक वर्ग केर अछि। रमण जी केर कहब लगभग शत प्रतिशत सही छनि जे - "मैथिली मे प्रतिकूल विचार लोक केँ अरघैत नहि छनि। हम जे कहैत छी, हम जे जनैत छी, सएह टा तर्कसंगत, सएह टा यथार्थ अछि।"
हम हिनकर यथार्थ पर तर्क करबाक दक्षता नहि रखैत छी तखन हिनकर आलेख सँ सहमत सेहो नहि छी। लेखक अगर बुच्ची दाई सन पात्र पर लिखने छथि त' ग्रैजुएट पुतोहु आ ग्राम सेविका सन पात्र पर सेहो लिखने छथि। अलग अलग कथानक मे अलग अलग पात्र मे भिन्नता होएब त' हमरा स्वाभाविके बुझाइत अछि। बेमेल विवाह एकटा विकट समस्या छल। अहि लेल समाज दोषी अछि, कथाकार नहि जे एहन पात्रक चयन किएक केलनि। सी सी मिश्रा केँ मैथिली बाजय नहि अबैत छनि से कोनो अजूबा त' नहि भेल। ओहि जमाना मे अंग्रेजिया बाबू सबहक अभाव थोड़बे रहल हेतैक। खैर वर्तमान मे त' सी सी मिश्रा सबहक कोनो कमी नहि अछि। शहर त' शहर गाम मे रहय वाला सेहो सी सी मिश्रा जँका हिन्दीए बजैत छथि, मैथिली नहि। रमण जी अपन आलेख मे चारिम श्रेणी केर चर्चा नहि केलनि अछि। अहि श्रेणी मे आबय वाला लोक हिनकर साहित्य केँ मिथिलाक संस्कृति पर अनर्गल आघात बुझैत छथि आ तैँ हिनका विरुद्ध तामसे घोर रहैत छथि । भ' सकैत छैक जे ओहि वर्गक लोक केँ ओ हिनकर पाठक नहि एकभगाह आलोचक बूझैत होइथ। हम जखन मिथिला सँ लगभग दू हजार किलोमीटर दूर हिनकर कोनो कथा अथवा उपन्यास पढ़ैत छलहुँ त' बूझि पड़ैत छल जेना हमरा समक्ष चलचित्र जँका ओ घटना चलि रहल हो। ई हमर अपन मोनक व्यक्तिगत अनुभूति अछि तैँ हम लिखल। हँ भ' सकैत छैक जे तेसर श्रेणी केर पाठक वर्ग मे हम सेहो आबैत छी। हमर मानब अछि जे मिथिला मे कहियो विदुषीक अभाव नहि रहल तखन अहि बात केँ एकदम सँ खारिज नहि कैल जा सकैत अछि जे बुच्ची दाई सन पात्र सेहो छलीह। हँ हम वर्तमानक बात नहि क' रहल छी। पाँचम अध्याय- अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह पर हिनक आलेख हिनका विषय मे बहुत रास जानकारी सँ परिपूर्ण अछि। हिनकर कोनो प्रकाशित पोथी नहि छनि तैँ हिनका विषय मे अतेक जानकारी साझा करब सहज काज नहि छल। हिन्दी आ अंग्रेजी मे त' खूब लिखबे केलनि मुदा बाद मे जखन मैथिली दिस घुरलाह त' बुझू जे अही मे रमि गेलाह। पढ़बा योग्य बड्ड नीँक आलेख अछि। छठम अध्याय मे यात्रीक भाषा : शब्द चयन एवं शब्द निर्माण पर नीँक आलेख पढ़बा लेल भेटल। सातम अध्याय मे मनमोहन झाक कथाक अनालोचित पक्ष पर लिखने छथि। अपन कथा मे कारुण्यधाराक लेल विख्यात मनमोहन झा केर कथा मे राष्ट्रीयता ( भारत ) एवं उपराष्ट्रीयता ( मिथिला ) सेहो प्रमुखता सँ झलकैत अछि। हिनकर अहि पक्ष पर संभवतः पहिल बेर चर्चा भेल अछि।
आठम अध्याय अछि मैथिली पत्रकारिताक विकास मे प्रवासीक योगदान। अहि विषय पर विस्तृत आलेख भ' सकैत छल मुदा जतबे लिखलनि पढ़बा योग्य अछि। नवम अध्याय मे अछि मैथिली लोकगाथा मे दीना भद्री। दीना भद्री, दुलरा दयाल, नइका बनिजारा, बिहुला, रुइया रणपाल, लवहरि कुशहरि, लोरिक, विजय मल्ल एवं सलहेस केर विषय मे नीँक जानकारी सँ पाठक केँ अवगत करौलनि अछि अहि आलेख केर माध्यम सँ। लोकगाथा लिखित रूप सँ नहि बल्कि एक पीढ़ी सँ दोसर पीढ़ी तक मौखिक रूप मे अपन यात्रा क' रहल अछि। तैँ समय आ स्थान केर सापेक्ष कथा मे किछु अन्तर भेनाइ स्वाभाविक अछि। । सर्वप्रथम जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन अहि लोकगाथा केँ संकलित केलनि।
मैथिली कथाक विकास : किछु नव तथ्य, मैथिली कविता मे मिथिलाक भूकम्प, कथि ले लगेलिऐ, हे कोसी माई ( बाढ़िक विभीषिका ), मैथिली महाकाव्य मे युग-सन्दर्भ, न'ब गीत मे समाज चेतना, मैथिली कविता मे वर्तमान धारा, मैथिली लोकगीत : अवस्था एवं संरक्षण तथा उपनिवेशवादक न'ब चालि पर भी नीँक आलेख अहि पोथी मे समाहित अछि। अहि पोथीक भूमिका मे डा० फूल चन्द्र मिश्र ' रमण ' हिनका विषय मे लिखने छथि जे अपन निबन्धक विषय वस्तु ( थाहल, अन्दाजल ) हिआओल छनि।
अहि पोथीक लेखकीय मे आदरणीय डा० रमानन्द झा 'रमण' पोथीक विषय मे लिखने छथि - " केहन भेल अछि, मोनेमोन गुनि, मोने मे नहि राखि लेब, पलखति होअए त' किछु हमरो फोनिया दी, से विनम्र अनुरोध ।" व्यक्तिगत रूप सँ नहि फोनिया हम विदेहक माध्यम सँ अपन मोनक बात सबहक समक्ष राखि रहल छी।
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