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VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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विदेह नूतन अंक
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सुजीत कुमार झा

ओ शब्द, जे एखन धरि संग अछि

जनकपुरधाममे आयोजित १६म कथा गोष्ठी छल। जानकी मन्दिरक प्राङ्गणमे रहल भानस घरमे आयोजित एहि गोष्ठीमे हमहुँ कथा वाचन कएने रही। ओ हमर पहिल कथा छल। कथा पाठ कऽ जखन मञ्चसँ नीचाँ उतरि रहल रही, तखन नीचाँ बैसल एक गोटे कहलनि— ‘बहुत बढि़या कथा छल...निरन्तर लिखू। ओ कथा हमरा दऽ दिअ, हम सभक कथा संग्रह कऽ रहल छी।

हुनक चेहरा तखन नीक जकाँ देखबामे नहि आएल। मुदा उत्साह बढ़ाबएवला हुनक ओ दूचारि शब्द हमरा कतेक दिन धरि भीतरसँ प्रेरित करैत रहल, से कहब कठिन अछि। हुनक ओ वचन बेरबेर हमर मस्तिष्कमे अबैत रहल। ओ छोटसन प्रशंसा हमर नवजात लेखकीय आत्मविश्वास लेल पैघ संबल बनि गेल छल।

एकदू सप्ताहक बाद कथा गोष्ठीक फोटोसभ साफ कराओल गेल तँ पता चलल जे हमर उत्साह बढ़ाबएवला व्यक्ति दोसर नहि, डा. रामानन्द झा रमण छथि। कवि चन्द्रमोहन झा पड़वा, जे सम्बन्धमे हमर पिसा लगैत छथि, हुनका विषयमे कहलनि—‘रमण बाबू मैथिलीक सभसँ बड़का समालोचक छथि।

ओ कथा गोष्ठी ९ अक्टुबर १९९३ कऽ भेल छल। मुदा डा. रमणसँ हमर प्रत्यक्ष भेट ओकर करीब दू वर्ष बाद भेल। ओ समय धरि हम नियमित रूपसँ लिखए लागल रही आ मैथिलीक काजमे सेहो सक्रिय भऽ गेल रही।

२३ सितम्बर १९९५ कऽ काठमाण्डूमे आयोजित एकटा कथा गोष्ठीसँ घूरि कऽ डा. रमण जनकपुरधाम आबि रहल छलाह। ओहि समय हम मैथिली विकास परिषद्, जनकपुरधामक अध्यक्ष रही। हमरा सभकेँ नाटककार डा. अरविन्द अक्कुकेँ सम्मान करबाक छल। ओहि समय हुनक नाटक एहि क्षेत्रमे खूब मंचित होइत छल। हुनक लोकप्रिय गीतराम दुलारी कटियामे ताड़ी... सेहो प्रायः सभ मञ्चपर गायकसभ गबैत छलथि।

डा. अरविन्द अक्कु संग पण्डित गोविन्द झा आ डा. रामानन्द झा रमण सेहो कार्यक्रममे पहुँचि गेलाह। हमरा दूटा आओर पाग आ दोपटा मंगबए पड़ल आ तीनू गोटेकेँ सम्मान कएल गेल। डा. रमण हमरा देखितए चिन्हि गेलाह। ओ कहलनि— ‘अहाँ कथा लिखू।

मैथिलीक लेल काज करएवला संस्था आ नवोदित लेखकसभक गतिविधिसँ परिचित भऽ कऽ ओ विशेष प्रसन्न सेहो भेल छलाह। हुनक ओ अपनत्वपूर्ण व्यवहार हमरा लेल बहुत महत्वपूर्ण छल।

 

तकर बाद २४ जनवरी १९९६ कऽ नेपालक राजविराजमे कथा गोष्ठी भेल। ओतहुँ हुनकासँ भेंट भेल। एहि बेरक भेटमे लेखनपर विस्तारसँ चर्चा भेल। जनकपुरधामसँ कथा लऽ कऽ हम, अनिलकुमार कर्ण, उपेन्द्र भगत नागवंशी आ अमितेश साह राजविराज पहुँचल छलहुँ। डा. रमण चारू गोटेसँ एक घण्टासँ बेसी समय धरि कथा लेखन आ साहित्यक विषयमे बातचित कएलन्हि।

लेखन कौशल सुधारबाक लेल हुनक सलाह हमरा एखनो शब्दशः स्मरण अछि। ओ कहलनि जे लेखनमे निखार अनबाक लेल नियमित अभ्यास, व्याकरणक समझ आ बेसीसँ बेसी पढ़ब आवश्यक अछि। प्रतिदिन लिखबाक आदत बनेबाक चाही, सरल आ स्वाभाविक शब्दक प्रयोग करबाक चाही आ लिखल सामग्रीकेँ फेरसँ पढि़ आवश्यक सुधार करबाक चाही। अलगअलग प्रकारक किताब खोजि कऽ पढ़बाक सलाह सेहो ओ देलन्हि।

हुनक तर्क छल जे जखन कोनो लेखक अलगअलग लेखकक किताब पढ़ैत अछि तँ ओकर लेखनक दायरा विस्तृत होइत अछि, नवनव शब्दक जानकारी भेटैत अछि आ अलगअलग शैलीसँ परिचय होइत अछि। परिणामतः कोनो विषय अथवा सन्दर्भपर लिखबाक समय ओकर अपन लेखन शैली सेहो अधिक प्रभावकारी बनैत अछि।

डा. रमणक ओ सलाह हमर लेखकीय यात्रामे एखनो संगसंग चलि रहल अछि।

एकर बाद भलहि डा. रमणक हमरासँ नियमित सम्पर्क नहि रहल, मुदा जखनजखन ओ जनकपुरधाम अबैत छलाह, हमरा भेटबए करैत छलाह। बादमे हुनकासँ आत्मीय सम्बन्ध निरन्तर बनल रहल। दू बेर तँ हम पटना स्थित हुनक निवासपर सेहो गेलहुँ। एक बेर ओतए हुनकासंग भोजन करबाक अवसर सेहो भेटल। साहित्यक प्रति हुनक अनुराग आ आत्मीय व्यवहारक स्मृति ओहि भेटसभकेँ विशेष बना दैत अछि।

हमर बालकथासंग्रह कोइली घूरि आउ मे डा. रमण भूमिका सेहो लिखने छथि। ई हमर लेल विशेष महत्वक बात अछि। नेपालसँ प्रकाशित प्रायः सभ प्रमुख पत्रपत्रिकामे हुनक रचना प्रकाशित होइत रहल अछि। कएटा पत्रिका हमरे सम्पादमे निकलल अछि जखने हुनका आग्रह कएलहुँ एकदिनक बाद ओ रचना पठा दैत छथि। नेपालक विभिन्न लेखकक प्रकाशित करीब आधा दर्जन पुस्तकक भूमिका सेहो ओ लिखने छथि। आफन्त नेपाल द्वारा प्रकाशित मैथिली ः कथा नेपाल क सम्पादन हुनक महत्वपूर्ण काजमे एक अछि। पाकल आमक अमृत रस क संयुक्त सम्पादन डा. राजेन्द्र विमलक संग कएने छथि। ई पुस्तक एजिङ नेपाल द्वारा प्रकाशित भेल अछि।

सन् १९९० क बाद जनकपुरधाममे आयोजित अधिकांश महत्वपूर्ण साहित्यिक तथा सांस्कृतिक समारोहमे डा. रमण आमन्त्रित आ उपस्थित होइत आएल छथि। नेपाल प्रज्ञाप्रतिष्ठान आ बी.पी. कोइराला फाउन्डेशनक आयोजनमे भेल महत्वपूर्ण कार्यक्रमसभमे सेहो हुनक सक्रिय सहभागिता रहल अछि। जीवनक छः दशक पार कऽ चुकल छथि, मुदा उम्र हुनक लेखनीक धारकेँ तनिकहुँ मन्द नहि कए सकल अछि। वृद्धावस्थामे सेहो हुनक लेखनी ओतबे धुरझार चलैत अछि आ साहित्यिक गतिविधिमे हुनक सक्रियता ओतबे देखबामे अबैत अछि।

 

किछु दिन पहिने सेहो एकटा साहित्यिक समारोहमे सहभागी होबए लेल ओ जनकपुरधाम आएल छलाह। हुनका देखला पर बुझाइत अछि जे मैथिलीक काज हुनक लेल मात्र साहित्यिक गतिविधि नहि, जीवनक ऊर्जा अछि। मैथिलीक नामपर कोनो काज होइत अछि तँ हुनक शरीरमे नव फूर्ति आबि जाइत अछिई बात ओ स्वयं सेहो स्वीकार करैत छथि।

हुनक प्रायः पुस्तक हम पढ़ने छी आ विशेष रूपसँ हुनक समालोचना लेखनक तँ हम प्रशंसक छी। सामान्यतः हम समालोचनाक अर्थ रचनाक भीतर नुकाएल अर्थ आ शिल्पकेँ बुझब, कृतिक सार्थकता आ ओकर प्रभावक परख करब बुझैत छी। समालोचना मात्र रचनाक कमी निकालबाक नाम नहि अछि। ओकरा रचनाक खूबि आ कमजोरी दुनूकेँ निष्पक्ष रूपसँ पाठकक समक्ष राखबाक चाही।

डा. रमणक समालोचनामे ई संतुलन स्पष्ट देखबामे अबैत अछि। ओ रचनाकेँ मात्र दोषक आँखिसँ नहि देखैत छथि; ओकर सामथ्र्य, सौन्दर्य, सीमा आ सम्भावनाकेँ सेहो चिन्हित करैत छथि। हुनक समालोचना रचनाकारकेँ निरुत्साहित नहि करैत, अपितु ओकरा अपन रचनाक प्रति नव दृष्टि देबाक प्रयास करैत अछि। एहि गुणे हुनका दोसर समालोचकसँ अलग पहिचान दैत अछि।

हमर लेखकीय यात्राक आरम्भिक समयमे एकटा अनजान स्वरमे कहल बहुत बढिया कथा छल सँ जे उत्साह भेटल छल, से स्वर बादमे डा. रामानन्द झा रमणक रूपमे हमरा सामने आयल। हुनक एकटा छोटसन प्रशंसा, एकटा आत्मीय सुझाव आ साहित्यप्रति हुनक निरन्तर समर्पण हमर स्मृतिमे एखनो ओतबे ताजा अछि।

लेखनक बाटपर चलैत कतेको लोक भेटैत छथिकिछु लोक क्षणभर लेल संग होइत छथि आ आगाँ बढि़ जाइत छथि, मुदा किछु लोकक एकटा शब्दो जीवनक दीर्घ यात्रामे दीपक बनि रहि जाइत अछि। डा. रामानन्द झा रमण हमर लेल ओही तरहक एकटा प्रेरणादायी व्यक्तित्व छथि।

 

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साहित्य अकादेमीक संकीर्ण मैथिली भाषा विभागसँ विदेह (मैथिली साहित्यक समानान्तर मंच) ऐ अर्थमे सेहो फराक अछि जे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिका सन सहभाषाकेँ संग लऽ कऽ मिथिलाक बोली-वैविध्यक समग्र चित्र देल जाइत अछि। विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक भाषा विज्ञान, रचना आ व्याकरण मैथिलीक संग देल गेल अछि मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा विज्ञान (ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर, संगे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक साहित्य ई-प्रकाशित आ समीक्षित सेहो होइत अछि।– गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह ISSN 2229-547X
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