विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विवर्त1 (अनुसन्धानमूलक आलोचनात्मक लेख केर संकलन)
२०२३मे प्रकाशित डा। रमानन्द झा ‘रमण’क ‘विवर्त’ अनुसन्धानमूलक आलोचनात्मक लेखक संकलन थिक। एहि पुस्तकमे संकलित आलेखक पसार पैघ अछि; एहिमे पत्र-पत्रिका (मिथिला मोद एवं अन्य), उपन्यास(जिजीविषा: लिली रे; चन्द्रग्रहण: किरण), साहित्यकार (जीबछ मिश्र, जयधारी सिंह, शेफालिका वर्मा), लोकनायक आ लोकगाथा (राजा सलहेस, दीनाभद्री), शोक-काव्यमे राजनेता (ललितनारायण मिश्र) एवं मैथिली कथा-कविता-उपन्यासक विधाक किछु पक्ष धरि पर लेख संकलित अछि। किछु लेख विशेष अवसर पर देल बीज-भाषण लेल लिखल गेल अछि, बाँकी स्वतंत्र अनुसन्धान, एवं पोथीक भूमिका थिक।
मुदा समीक्षासँ पहिने लेखकीय वक्तव्यक चर्चा, जाहिसँ पोथीक पृष्ठभूमि, एवं लेखकक भावना आ समालोचना दृष्टिक पाछाँक निहित दर्शन फड़िच्छ होइछ। पछाति, ‘विवर्त’मे संकलित प्रत्येक लेख पर वस्तुनिष्ठ विचार प्रस्तुत करब हमर अभीष्ट अछि।
मैथिलीमे आलोचनाक स्थितिपर चिंता व्यक्त करैत,वक्तव्यमे लेखक कहैत छथि, ‘बिना साक्ष्य आ बिना तर्कक पूर्व पीढ़ीक साहित्यकारक अवदानकेँ मूल्यहीन, वर्णवादी, गोत्रवादी प्रचारित करबाक प्रवृत्ति एमहर सघन आ प्रबल भेल अछि’,।।। ‘ई नहि बिसरबाक थिक जे मैथिलीक सभ लेखक अपन साहित्यिक-सांस्कृतिक परम्पराक अग्रिम कड़ी थिकहुँ’। आगाँ, पुरान पीढ़ीक साहित्यकारक सीमित साधन दिस संकेत करैत, ओ हुनकालोनिक योगदानक महत्वकेँ रेखांकित तँ करिते छथि, ओ ‘पूर्ववर्ती साहित्यकार द्वारा बनाओल भाषा साहित्यक विकासक ओही सोपान पर छओ’ मारबाक प्रवृत्तिक दुखद परिणामक दिस सेहो सचेत करैत कहैत छथि: ‘कोन ठेकान जे एहन लेखक(समालोचकक) स्थिति कालान्तरमे ओहने होनि, जेहन(दुर्गति) रूसमे लेनिनक शवक संग’ परवर्ती पीढ़ी’ केलक। तेँ, आजुक साधन-संपन्न पीढ़ीकेँ ओ ‘पूर्ववर्ती साहित्यकारलोकनिक छूटल काजकेँ उत्कर्ष धरि पहुँचाय अपन पताका फहरयबाक’ प्रेरणा दैत छथिन।’
1।‘विवर्त’ नामकरण:
पुल्लिंग संस्कृत शब्द ‘विवर्त’क व्युत्पत्ति, ‘वि’ उपसर्ग, ‘वृत्’ धातु एवं ‘घञ्’ प्रत्यय थिक। ‘संस्कृत शब्दकल्पद्रुम्’ एकर अर्थ समुदायः, अपवर्त्तनम्, नृत्यम् इति विश्वः (प्रतिपक्षः; यथा, नैषेधे । ३। ६४।) क संग किछु उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि। यथा;
“ईशाणिमैश्वर्य्यविवर्त्तमध्ये
लोकेशलोकेशयोलोकमध्ये।”
समवायाधिकरणविसदृश् कार्योत्पत्तिः । यथा, “एकस्य सतो विवर्त्तः कार्य्यजातं नतु वस्तु सत् ।”- सांख्यकौमुदी।
अर्थात् विवर्त, आभास, वा परिवर्तनक अछैतो वस्तुक यथावत् , किन्तु, भिन्न स्वरुप थिक। अर्थात्, समालोचक आलोच्य विषयकेँ यथावत् राखि ओहि पर आलोचना प्रस्तुत कयने छथि। हमरा ‘विवर्त’ शब्दक इएह अर्थ बोध भेल।
आब समीक्षाक आरंभ ‘मैथिलीक तत्कालीन पत्र-पत्रिका आ स्वाधीनता आन्दोलन’ नामक लेखसँ करी।
एहि लेखमे ‘तत्कालीन पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित स्वाधीनता आन्दोलन सम्बन्धी गतिविधि, समाचार एवं ओहिसँ प्रेरित-प्रभावित विविध विधामे सृजित मैथिली साहित्य आ भारतक स्वाधीनता आन्दोलनमे तकर सकारात्मक प्रभावक’ विवेचना अछि।
सर्वविदित अछि, 1947ई। सँ पूर्व मैथिली पत्र-पत्रिकाक संख्या आंगुर पर गनबा योग्य छल। लेखक सेहो कुल नौ गोट पत्रिकाक चर्चा कयने छथि, जाहि मे मुख्य दुइए टा – मिथिला मोद आ मिथिला मिहिर –दीर्घजीवी भेल, आ बीच-बीचमे प्रकाशन बन्न होइतो अनेक स्वरुपमे पाठकक सोझाँ अबैत रहल।
आलेखक अनुसार तहियाक पत्र-पत्रिका सभक संपादकीय नीति स्पष्ट रहैक। कोनो पत्रिका (मैथिल हित साधन) विभिन्न (दार्शनिक, वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, सामाजिक तथा अन्यान्य आवश्यक) विषयक संग मनोरंजक विषयक सामग्रीक प्रकाशनक नीति रखने छल, तँ कोनो( मिथिला मिहिर) स्पष्ट रूपें ‘राजनीतिक लेख नहि छ्पबाक’ संकल्प केने छल। ‘मिथिला मोद’ सेहो ‘राजनियम-विरुद्ध’ लेखकेँ अस्पृश्य घोषित कयने रहय2। लेखक कहैत छथि, जाहि पत्रिका(मिथिला-मित्र)मे प्रकाशन नियमावलीक बंधन नहिओ रहैक ओहूमे राजनीति वा स्वतंत्रता आन्दोलन पर केन्द्रित कोनो लेख नहि छपल छल। अर्थात् मोटामोटी सभ पत्र-पत्रिका स्वेच्छासँ सरकारक विरोध आ स्वतंत्रता आन्दोलनक समाचारसँ दूरे रहैत छल। तथापि, लेखकक विचारेँ ‘बिना अनुसन्धान एवं तत्कालीन पारिस्थितिक’ ज्ञानक बिना ई धारणा बनाएब जे ‘मैथिली पत्रिकाक प्रकाशक आ सम्पादक देशक स्वाधीनता आन्दोलनक प्रति संवेदनशील नहि छलाह, अंग्रेज सरकारक अंधभक्त भए शासन-सत्ताक विरोधमे ने किछु बाजि सकैत छलाह आ ने किछु लिखि सकैत छलाह’ अनैतिहासिक धारणा थिक। हुनक विचारेँ, ‘एहन लेख जाहिसँ लोक चेतना विकास हो, जाहिमे विलुप्त गौरव आ उत्कर्षक जनतब हो, तथा तत्कालीन शासन-व्यवस्थाक प्रति घृणा होइक’ सेहो राष्ट्रीय स्वतंत्रतामे योगदान थिक, स्वतंत्रता आन्दोलनक समर्थन थिक’।
हमरा जनैत एहि विषय पर मतभेद संभव। हँ, घरेलू उत्पादनक समर्थन अवश्य असहयोगक समर्थन भेल। 1929मे ‘मिथिला नामक पत्रमे ‘हम दरिद्र किएक भेलहुँ’ नाम आलेख मे भारतक दरिद्रताक ऐतिहासिक कारणक निर्भीक विश्लेषण अवश्य अप्रत्यक्ष रूपें भारतीय स्वतंत्रताक पक्षधर मानल जायत। एहि प्रकारें आन पत्र सबमे सेहो स्वदेशी उद्योग आ उत्पादनक समर्थनमे लेख; महगाईक चर्चा, स्वराज्यक प्राप्तिक हेतु प्रेरणा, अंग्रेजी पढ़बाक लाभ, एवं दरभंगा महाराजसँ परोक्ष रूपें मिथिलामे उच्च शिक्षा संस्थानक स्थापनाक आग्रह इत्यादि विषयक लेख छपबाक चर्चा अछि।
‘मैथिली पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित रचनामे स्वाधीनता आन्दोलनक अनुगूंज’ एहि अनुसन्धानक दोसर विन्दु थिक। ‘ई प्रभाव विभिन्न विधाक रचनामे प्रचुर मात्रामे अछि’ कहैत लेखक एकर पर्याप्त उदाहरण दैत छथि।
सारांशमे अनुसन्धानक सार-स्वरुप लेखक कहैत छथि: ‘स्वाधीनता आन्दोलनमे सक्रिय सहभागिताक लेल सामान्य मैथिलमे जाहि प्रकारक मानसिकता अपेक्षित छलैक, तकर निर्माणक लेल मैथिली पत्र-पत्रिका पूर्ण संवेदनशील आ उत्तरदायित्वपूर्ण छल।’ मुदा, ई विचार एहि विषय पर सर्वसम्मत थिक वा नहि, कहब कठिन।
ततबे नहि, अति सीमित संख्या, अल्पजीवी स्वभाव, आ थोड़ पहुँचक कारण, ई पत्र-पत्रिका सब स्वतंत्रता आन्दोलनक प्रति जनमानसकेँ प्रभावित करबामे कतेक प्रभावी आ सफल भेल छल, से स्वतंत्र अनुसन्धानक विषय थिक। एक गप आओर: मैथिली पत्रिकाक स्वर हिन्दी एवं बांग्ला पत्रक तुलनामे केहन छल, तकर चर्चा एहि लेखमे नहि अछि, ई एहि लेखक विषयो नहि थिक।
मैथिली पत्र-पत्रिकाक विकासमे ‘मिथिला-मोद’ एहि संकलनक दोसर आलेख थिक। ‘मिथिला-मोद’ बीसम शताब्दीक पूर्वार्द्धमे मैथिलीक प्रतिष्ठित पत्र छल। तेँ, एहि विषयक ऐतिहासिक महत्व अछि; कारण, एकर चर्चाक बिना मैथिली पत्रिकाक विकासक चर्चा असंभव।
लेखक कहैत छथि: ‘मिथिला-मोद’ अपन सामजिक दायित्वक प्रति पूर्णतः साकांक्ष छल, से स्पष्ट अछि।’।। (ई) मानैत छल जे देश वर्ग वा वर्ण विशेषक नहि थिक’ आ मिथिलाक समस्त निवासीकेँ मैथिल मानि देशोन्नतिक अपन अवधारणा सुदृढ़ कयने छल; संस्कृत शिक्षाक स्थान पर आधुनिक शिक्षा-प्रणालीकेँ बेसी लाभकारी मानैत छल, एवं साधनसँ बेसी खर्च आ अपव्ययकेँ देशोन्नतिक मार्गमे प्रबल बाधक मानैत छल। तर्कक पक्षमे पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत कयल गेल अछि।
एहि आलेखक आलोकमे ‘मिथिला-मोद’ संकीर्णता एवं बाल-विवाह, बहु-विवाह, कन्याक बेच-बिकिन-सन कुरीति, एवं मादक द्रव्यक सेवनक विरोधी छल। एहि पत्रमे समुद्र-यात्राक पक्षमे आलेख प्रकाशित भेले छल ई पत्र ‘सामाजिक एवं राजनीतिक स्तर पर घटैत घटनाक संवाहक (सेहो) छल।’ यद्यपि, एहि पोथीक पहिल आलेखमे संकलित साक्ष्यसँ2, ‘मिथिला-मोद सामाजिक एवं राजनीतिक स्तर पर घटैत घटनाक संवाहक छल’ उक्तिक पूर्ण समर्थन नहि होइछ।
लेख आगू कहैत अछि, ‘मोद’ हिन्दीक विरोधमे ठाढ़ होबयवला पहिल पत्र छल; मैथिलीमे बाल-शिक्षाक पक्षधर छल। मिथिलाक्षरक ह्राससँ ई चिंतित छल तँ छले, ई मैथिलीमे विभिन्न विधाक मूल लेखन, एवं अनुवादकेँ प्रोत्साहित करैत शोधपरक निबन्ध एवं साहित्यक धारावाहिक प्रकाशन सेहो करैत छल।
एहि विषयमे किरणजीक उक्ति: ‘स्व। बंकिम बाबू लोकनि जाहि दृष्टिसँ बंग साहित्यकेँ समृद्ध करब आरंभ कयल- ओएह दृष्टि पकड़ि लेने छल मिथिला-मोद’3, लेखकक उक्तिक समर्थन थिक। दुर्भाग्यवश, ‘मिथिला-मोद’क अधिकतर संस्करण अनुपलब्ध अछि। अतः ‘मिथिला-मोद’ एवं अन्य पत्रक digital platform पर संग्रहक सामूहिक प्रयास हेबाक चाही।
आद्यउपन्यासकार पं। जीबछ मिश्रक समय, समाज आ साहित्य एहि संकलनक तेसर लेख थिक। जीबछ मिश्रक ‘पारिवारिक परिचय’, ‘सम्पर्क आ प्रेरणा’, ‘पं। जीबछ मिश्रक समय’, ‘पं। जीबछ मिश्रक साहित्य’, ‘विचारक, समसामयिक विषय पर टिप्पणीकार पं। जीबछ मिश्र’, एवं ‘पं। जीबछ मिश्रक समीक्षात्मक दृष्टि’ एहि लेखक मुख्य विन्दु थिक। प्रत्येक विन्दुपर लेख विस्तारसँ चर्चा कयने छथि। ज्ञातव्य थिक, आन अनेक अप्राप्य एवं अनुपलब्ध पोथीक संकलन सम्पादनक बीच डाक्टर रमण जी ‘जीबछ मिश्र रचनावली’क सम्पादन सेहो कयने छथि।
प्रसंगवश एतय ‘पं। जीबछ मिश्रक समय’मे 19म शताब्दीमे मिथिलाक राजनीतिक एवं समाजिक स्थिति, ओहि समयमे विदेशी शासकक शिक्षा नीति एवं दरभंगा राजक प्रशासनमे हिन्दी एवं देवनागरीक जानकारक बहुलता पर सेहो चर्चा अछि। एतहि इहो चर्चा भेल अछि जे ‘महाराज महेश्वर सिंह 1857क पहिल स्वतंत्रता संग्रामक अप्रत्यक्ष समर्थक छलाह’। ओना, Eighteen Fifty Seven नामक पुस्तक कहैत अछि जे ‘बिहारक जमींदार लोकनि निरंतर ब्रिटिशक पीठ पर
2।।मिथिला मोद ,उद्गार -63, वर्ष-६ पौष ,शाके 1833 ,सन 1319 साल।
3। झा काञ्चीनाथ। मैथिली साहित्यमे आधुनिकताक आरंभ। किरण समग्र खण्ड 1 कि।सा।शोध संस्थान, 2007 pp 128
ठाढ़ रहथि।(यद्यपि) एक समयमे दरभंगा, डुमरांओ एवं हथुआक निष्ठा पर संदेह (व्यक्त)भेल छल, मुदा ओलोकनि एवं अन्य जमींदार-बंधु जन-धनसँ (कम्पनी) सरकारक सहायता केलनि।4 तथापि, एहि प्रकरणक दोसरो विवरण छैक,।5
संयोगवश, इएह समय पं। जीबछ मिश्रक उपन्यास ‘रामेश्वर’क रचनाकाल छल। एहि लेखमे ‘रामेश्वर’ उपन्यासहु पर संक्षिप्त, किन्तु, सम्पूर्णतामे चर्चा भेल अछि। अस्तु, एतय पं। जीबछ मिश्र पर संतुलित एवं संक्षेपमे संपूर्ण सामग्री भेटत।
अगिला लेख, ‘समकालीन मैथिली उपन्यासमे विश्वदृष्टि’मे लेखक पहिने समकालीनताक अवधारणा पर चिंतन प्रस्तुत करैत, ‘जीवनक मूल्यबोध’केँ समकालीनताक पर्यायक हेतु ‘विशेष समीचीन एवं ग्राह्य मानि’ अपन विचार प्रस्तुत कयने छथि। यद्यपि, ओ स्वयं मानैत छथि जे, ‘जीवन-मूल्यक सर्वसम्मत स्वरुप निर्धारित करब कबैई(माछ)केँ तराजू पर जोखब-जकाँ (कठिन) अछि।’ तैओ, ओ मैथिली उपन्यासकेँ मानव-मुक्तिक अभियानक समकालीन युग-दृष्टिक अनुकूल, एवं समाजकेँ विभिन्न चुनौतीक सोझाँ डेग रोपबाक साहसकेँ स्वर दैत पबैत छथि।’
ई एहन विषय थिक जाहि सम्पूर्ण उपन्यास-साहित्यपर एक संग विचार देब कनेक कठिन।
‘मिथिला भाषाक नापी: अमीनक खगता’नामक लेख, ‘Language Mapping: Beyond the Boundaries’ विषय पर एक अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे देल भाषण थिक। एहि लेखमे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली भाषाक भौगोलिक क्षेत्र, ‘भौगोलिक आ भाषिक स्तर पर ‘मिथिला भाषा’क छटपटाइत आरि’, भाषा पर आन पड़ोसी भाषाक अवघात एवं ‘मिथिला भाषा’क नापीक बाटमे बाधा-व्यवधान एवं निराकरणक विन्दु तथा मैथिली भाषाक वर्तनीक स्वरुप पर एकमतक अभाव पर सोदाहरण विचार करैत, लेखक भाषाशास्त्रक ज्ञानक अभावहुमे, आ राजनीतिसँ प्रेरित भावनासँ भाषाक स्वरुपमे हस्तक्षेप पर क्षोभ व्यक्त कयने छथि।
‘मैथिली कथामे बहुसांस्कृतिकता’ नामक लेखमे भारतक सांस्कृतिक समन्वयक इतिहास एवं मिथिलामे बहुसांस्कृतिकताक प्रवेश एवं प्रसारक परिप्रेक्ष्यमे विषयक प्रतिपादन भेल अछि। मैथिलीक पहिल कथा ‘चन्द्रप्रभा’सँ आरंभ होइत एहि ई विवेचना लिली रे एवं किछु साहित्य अकादेमी-पुरस्कृत अन्य कथाकारक कथा धरि आबि समाप्त भए जाइछ। वस्तुतः, विगत पचीस वर्षमे प्रवासी मैथिलक संख्यामे असाधारण वृद्धि भेले। मातृभाषाक प्रति आकर्षण एवं रचनाक संख्या दुनू बढ़ल अछि। फलतः, समाजक अनेक क्षेत्रसँ नव-नव स्वर एवं अनुभव सोझाँ आयल अछि। एहि सबकेँ सेहो विचारक परिधिमे अनने मैथिली कथाक बहुसांस्कृतिताक यथार्थ स्वरुप सोझाँ अबैत।
‘राजाजी’क रूपमे सलहेसकेँ सामाजिक मान्यताक आधार’मे सलहेसक मूलतः वर्णित चरित्रक प्रतिकूल सलहेसकेँ राजाजीक रूपमे अभिहित करबकेँ साक्ष्यक विपरीत मानल गेल अछि। एहिसँ असहमत हेबाक कोनो ठोस आधारो नहि। तथापि, सामजिक एकजुटताक हेतु राजा सलहेस-सन लोकनायकक उपादेयताकेँ लेखक उचिते स्वीकार करैत छथि। वस्तुतः, राजा सलहेस-सन लोकनायक सम्मानसँ समाजक मुख्यधारासँ अद्यावधि वंचित एक पैघ वर्गकेँ आत्मसम्मानक बोध होइत छनि। ई कि वृहत् समाजक लेल कोनो छोट उपलब्धि भेल।
4 Sen Surendra Nath । Eighteen fifty-seven। The Publication Division। Govt of India, May 1957। Pp 265-66।
5 Dutta KK। History of the Freedom Movement in Bihar। Vol।1, 1957। The Govt of Bihar। Pp 69
अस्तु, एहि आलेखमे विभिन्न लेखक-कवि द्वारा लोकगाथाक स्वरुपमे कयल गेल परिवर्तनक, एवं मिथिलाक सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्यमे लोकनायक सलहेसमे राजत्व एवं ईश्वरत्व आरोपित करबाक तार्किक विश्लेषण भेल अछि।
‘गीत दीनाभद्री: गाथाक विकास एवं महत्व’क नामक आलेखक आधार एहि विषय पर जर्मन भाषामे जॉर्ज ग्रियर्सनक ‘गीत दीनाभद्री ओ गीत नेवारक’ नामक पुरान लेख, जे वर्ष २०१०मे डा। रमानन्द झा ‘रमण’ द्वारा संपादित एवं पुनः प्रकाशित भेल तकर संग भारत एवं नेपालमे दीनाभद्रीक गाथाक अन्य संकलन विवेचना करैत लेखक एक दिस जँ पाठ-भेद एवं कथा-भेदक विषयमे लोकतंत्रमे तुष्टिकरणक राजनीतिक दिस लक्ष्य करैत छथि, तँ, दोसर दिस ओ अत्याचारक एवं शोषणक विरुद्ध निर्धन श्रमिकक प्रतिकार एवं समान लक्ष्यक प्राप्तिक हेतु सामाजिक सहयोगकेँ एहि गाथाक कालजयी तत्व मानैत एहि गाथामे निहित लोकसाहित्यक अनेक तत्वकेँ सेहो उजागर करैत छथि।
सारांशमे ई आलेख एहि विषय संतुलित एवं उपयोगी आलेख थिक।
‘महाभारत कथा आधारित मैथिली साहित्य’, एहि विषयक सर्वेक्षण, एवं संक्षिप्त परिचयात्मक आलेख थिक। सर्वविदित अछि, महाभारत-सन ग्रन्थ कथाक विशाल भंडार एवं नव-नव साहित्यक सृजनक अक्षय श्रोत थिक। तेँ, ई विषय भविष्यहुमे अध्ययनक हेतु खुजले रहत। हालहिमे, बहुत दिन पूर्व लिखल पं। काशीनाथ झाक ‘धृतराष्ट्र विलाप’6 नामक दीर्घ कविता प्रकाशमे आयल-ए। एकरो श्रोत सेहो महाभारते थिक।
‘जयधारी सिंहक समालोचना-कर्म’मे मैथिली, अंग्रेजी एवं तंत्र-साहित्यक एहि विद्वानक कुल-परिचय एवं कृतिक संग, समालोचनाक प्रकृति एवं लक्ष्य पर जयधारी सिंहक विचार, तथा हुनक समालोचना-वृत्तिक समीक्षा भेल अछि।
लिली रेक ‘जिजीविषा’ नोर-झोर नहि, नामक आलेखक शीर्षकक पृष्ठभूमि थिक, जीवकांतक उक्ति: ‘लिली रेक उपन्यास ‘पटाक्षेप’ नोर-झोर नहि थिक’। वस्तुतः, आजुक युगमे नारि लेखनकेँ ‘नोर-झोर’ कहि कतिआएब पूर्वाग्रहपूर्ण एवं पुरुषक अहंकारे बूझल जाइत। मुदा, नारि लेखनक प्रति तहियाक उपेक्षापूर्ण उक्ति आइओ शीर्षक बनि आयल, से रोचक थिक। विचारणीय थिक, की नारि वेदना-नोर-झोर- हास्यास्पद थिक? वा संपूर्ण नारि लेखन नोरे-झोर थिक? वा गंभीरता आ नारि-लेखन परस्पर विरोधी थिक। मुदा, तकर उत्तर जीवकांतक लेखनमे प्रायः भेटय।
मुदा,‘जिजीविषा’ उपन्यासक एहि समीक्षाक मूल कथ्य ई जे, जीवकान्तक धारणा- नारि साहित्यकार लोकनिक केवल अपन नारीत्व, ओकर समर्पण भावनाक निरादर आ खण्डनक चित्र (प्रस्तुत करबाक) - क विपरीत लिली रेक साहित्यकेँ ‘बन्न आङनसँ बाहर’क समस्याकेँ नेबो-जकाँ गारि प्रस्तुत करबाक क्षमता छनि। ओना ई तथ्य लिली रेक कथा ‘रंगीन पर्दा’ १९५६हि मे प्रमाणित कय चुकल छल। तथापि, साहित्यमे लिंगभेदक मानसकिताकेँ परास्त करब आइओ कठिन।7
हम ‘सरल शेफालिका छी’ डाक्टर जगदीश मिश्रक अभिनन्दन ग्रन्थक लेल शेफालिका वर्मा पर लिखल आलेख थिक। एहिमे मैथिली-हिन्दीक सुपरिचित लेखिका शेफालिका वर्माक व्यक्तित्व एवं साहित्य पर संक्षेपमे विचारक संग
श्री मती शेफालिका वर्माक आत्मकथा ‘क़िस्त क़िस्त जीवन’ पर विस्तारसँ चर्चा भेल अछि, जाहिमे हुनक जीवनक किछु
6 झा पं। काशीनाथ। काशीनाथ झा रचना संचयन। संकलन-सम्पादन कीर्तिनाथ झा, साहित्य अकादेमी दिल्ली,2025
7 झा कीर्तिनाथ। मैथिली साहित्यक विरल विभूति : लिली रे https://kirtinath।blogspot।com/2022/01/blog-post_24।html accessed 02 जुलाई 2026। मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल 2021 क फेस्टिवल बुक ‘ अरिपन’ में प्रकाशित।
रोचक घटनाक वर्णन सेहो अछि।
‘चन्द्रग्रहण:खण्डग्रास-सर्वग्रास-उग्रास’ मैथिलीक बड्ड पुरान उपन्यास, चन्द्रग्रहण, पर छोट आलेख अछि। एहिमे पोथीक रचना पाछूक प्रेरणा- समाज सुधार-, तथा एहि विषयमे पाठक लोकनिक अटकरक चर्चाक अतिरिक्त ‘भारती’ पत्रिकामे प्रकाशित भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’क चन्द्रग्रहण’क समीक्षाक चर्चा सेहो भेल अछि।
मैथिली अनुवाद-साहित्यक संदर्भमे ‘एक भारतीय यात्री’ नामक लेख पं। अम्बिकानाथ मिश्र द्वारा सुभाषचन्द्र बोसक आत्मकथा ‘An Indian Pilgrim: An Unfinished Autobiography’क मैथिली अनुवादक समीक्षा थिक। एहि समीक्षामे एहि अनुवादक पाछाँक प्रेरणा एवं अनुवादक इतिहासक संग, साहित्यमे अनुवादक व्यवहारिक एवं साहित्यिक प्रयोजन, अनुवादमे श्रोत, लक्ष्य भाषा एवं संस्कृतिसँ परिचयक महत्व, मैथिली अनुवाद साहित्यक विकास, तथा मैथिलीमे आत्मकथा-साहित्यक अनुवादक इतिहासक चर्चा सेहो भेल अछि, जाहिमे ओलिवर गोल्डस्मिथक दू अंग्रेजी उपन्यासक ‘मैथिली साहित्य-पत्र’मे प्रकाशन चर्चा अछि। ज्ञातव्य थिक, एहि संदर्भमे ‘मिथिला-मोद’क योगदान सेहो नहि बिसरल जा सकैछ: पं। काशीनाथ झा ‘काव्यतीर्थ’ द्वारा लेखक रमेशचन्द्र दत्तक उपन्यास ‘राजपूत जीवन संध्या’ क मैथिली अनुवादक किछु अंश 1923हि ई।मे ‘मिथिला-मोद’मे प्रकाशित भेल छल।8 ईहो ऐतिहासिक थिक।
आलेखमे ग्रन्थक (मूल)श्रोतभाषाक अतिरिक्त तेसर भाषासँ मैथिलीमे अनुवाद एवं पुरस्कार प्राप्त करबाक प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त भेल अछि। अंतमे पं।अम्बिकानाथ मिश्रक ‘एक भारतीय यात्री’क समीक्षाक संग एहि पोथीकेँ ‘मैथिली अनुवाद साहित्यमे महत्वपूर्ण गुणात्मक’ योगदान मानल गेल अछि।
‘धर्मेन्द्र विह्वलक जापानी पञ्चपदी:टांका’ जापानी काव्यशैलीमे लिखित धर्मेन्द्र विह्वलक मैथिली कविता संग्रह ‘व्योमक ओहिपार’ क भूमिका थिक। एहि लेखमे विदेशी काव्य-शैलीक आयातक कारण पर एक संक्षिप्त दृष्टिपात करैत, लेखक जापानी काव्यशैली आ ताहूमे ‘टांका’ पर एक संक्षिप्त परिचयात्मक दृष्टि प्रस्तुत केने छथि। संगहि, एहि भूमिकामे ‘व्योमक ओहिपार’सँ ‘टांका’ प्रकारक कविताक उदाहरण सेहो उद्धृत् भेल अछि। उद्धृत् कविता हमरा क्षणिका-सन प्रतीत भेल।
समीक्षाक सार-संक्षेपक रूपमे लेखक कहैत छथि,’व्योमक ओहिपार’मे समसामयिक जीवनक एहन कोनो समस्या आ विषय-वस्तु नहि छैक, (जे) लघु आकारक टांकामे संघनित नहि भेल हो।।।।।(एहि) शैलीमे काव्यक सर्जना कए धर्मेन्द्र विह्वलक बड़का काज कएल अछि।’ एहि समीक्षासँ हमरा ‘व्योमक ओहिपार’ पढ़बाक इच्छा अवश्य भेल।
‘मैथिली शोक-काव्यक परम्परामे ललितनारायण मिश्र’मे ‘धूर्तसमागम’क शोक-काव्य आ नेपालक ‘गीतपञ्चक’सँ ल’ कए मैथिलीक अनेक शोक-काव्यक चर्चाक पछाति, अन्ततः राजनेता ललितनारायण मिश्रपर केन्द्रित विपुल शोक-काव्यक अतिरिक्त, ललित स्मृति ग्रन्थ, १९७७क चर्चा सेहो भेल अछि। एहि समस्त काव्यकेँ रमणजी ‘एक व्यक्तिक शोकोद्गार नहि, समाजक शोकोद्गार, भारतीय राष्ट्रक शोकोद्गार’ मानैत छथि।
सारांशमे ‘विवर्त’ अनेक मौलिक विषयपर, विशेषतः जाहि पर मौलिक सामग्रीक अभाव छैक, गंभीर अध्ययनक संकलन थिक। ज्ञातव्य थिक, तथ्य अनुसन्धानक बल थिकैक। ठोस तथ्यक आधार पर स्वतंत्र निष्कर्ष संभव छैक।
8 झा काञ्चीनाथ। महाकवि प्रो। तन्त्रनाथ झा मैथिली आ हम। उद्यान किरण, अंक 7, 2019 पृष्ठ 10
ताहि दृष्टिएँ ‘विवर्त’मे संकलित प्रत्येक अनुसन्धान तथ्यक तराजू एवं समालोचनाक मापदण्ड पर संतुलित अछि। अस्तु,’विवर्त’ मैथिली समालोचना साहित्यमे महत्वपूर्ण योगदान थिक। एहि पोथीक स्वागत हेबाक चाही; ई पोथी पढ़ल जेबाक चाही।
विवर्त
(अनुसन्धान मूलक आलोचनात्मक लेख)
लेखक: डा। रमानन्द झा ‘रमण’
सिद्धिरस्तु, दिल्ली। प्रथम संस्करण 2023
मूल्य: रु। 400/- पृष्ठ संख्या 242
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