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VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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कुमार राहुल

 

अनुसंधान आ संरक्षण लेल अपस्यांत डॉ रमानंद झा रमण

 

प्रत्येक लेखक अपन दृष्टि आ रुचिक सीमामे काज करैत छथि। ई कोनो जरूरी नै जे हमरा जे पसिन्न ऐ, वैह दोसरो कें नीक लगै। एकर अतिरिक्त पारिवारिक पृष्ठभूमि, पढ़ाइ, चाकरी आ सबसं बेसी बेगरता पड़ला पर लेखन लेखककें लेखनक लीक बदलबाक लेल बाध्य करैत छै। ई बात मैथिलीमे तं सभसं बेसी आ सभ बात सं बेसी भरिगर ऐ। जं हम अपने मादे कही तं हमरा कविता-कथा-बीहनि कथा लीखब बेसी नीक लगैए, मुदा निबंध सेहो लिखि लेल करैत छी। कोनो पोथी पर टिप्पणी सेहो लिखा जाइत अछि। कहबाक तात्पर्य जे एक विधामे स्थिर रहि ओकरा पर काज केनिहारक अभाव भारतीय साहित्यक सभ भाषामे देखल जाइत छै आ मैथिली एहिसं अलग तं नहिएं ऐ। एहनामे रमानंद झा रमण समालोचना दिस अपना कें केंद्रित केना केलनि से हमरा ओतेक नै बूझल ऐ। हं, आलोचना करबाक निमित्त हुनक अपन तर्क छनि आ से हुनक मनक अनुकूल मानल जयबाक चाही। समालोचनाक क्रम मे जाहि तरहें रमानंद झा रमण साहित्यकार आ रचनाक गणना (पंजीकरण) आ पुरान पोथीक उत्खनन (शोधकर्ताक रूप मे) करैत रहलाह से मैथिली साहित्य लेल विरल कहल जयबाक चाही। पुरान पीढ़ीसं नव पीढ़ीक परिचय करेबाक गुरुत्तर भार जाहि तरहें रमण जी उठौलनि से हुनक सर्वोत्कृष्ट काज थिक। 

हम हुनकर सीमाकें तं रेखांकित कए सकैत छी, मुदा हुनका सं सभ काज करबाक अपेक्षा नै राखि सकैत छी। दोसर दिस एक आलोचकक रूपमे रमण जीक वैचारिकता कतए ऐ तेकर निर्धारण करब हमर काज नै एखन। हं, एतबा तं कहले जा सकैए जे ओ ने तं पश्चिमक अंधविरोधी छथि, ने अंधानुगामी। कोनो साहित्यकारक व्यक्तित्वमे कवि सन भावुकता, समीक्षक सन संतुलित सोच, शोधकर्ता सन मौलिक दृष्टि आ संपादक सन गंभीरता- ई सभ गुण कतेक नीक जकां संपृक्त भ' गेल छै, तेकर निर्धारण पाठक स्वयं करैत छै। ओना जं रमण जीक एकहिटा गुणकें परेखी तं हमरा हिसाबें हुनकर साहित्यिक व्यक्तित्व कें सार्थक बनेबामे समर्थ ऐ।

रमण जीक लेखन गुणात्मक तं अछिये, संख्यात्मक सेहो कम नहि। मैथिलीक हिसाबें देखी तं कतोक रचनाकारक पोथी प्रेसस्थे रहि गेल करैत छै अथवा पत्र-पत्रिकामे छिड़ियालये। जं रमण जीक काज कें देखी तं ओ जेना-जेना लिखैत गेलाह, तेना-तेना पोथीक रूप मे ओकरा पाठकक समक्ष रखैत गेलाह। नवीन मैथिली कविता, मैथिली नऽव कविता, मैथिली साहित्य ओ राजनीति, अखियासल, बेसाहल, भजारल आदि किछु पोथी एकर उदाहरण ऐ। ऐ पोथी सभमे आत्मप्रधान आलोचनाक प्रभाव अछि। (वैयक्तिक सेहो कहि सकैत छी।) किछु आलेख सैद्धांतिक आलोचनाक निकष पर सेहो सही उतरि सकैछ, मुदा तेकर संख्या हमरा कम देखायल। रमण जी उत्साहसं काज करैत छथि आ से ऐ आलोचना पद्धतिमे विद्वान आलोचक कोनो बान्हल-छेकल नियमक पालन करैत नै देखाइत छथि, बल्कि कोनो एके टा तत्त्व सं प्रभावित भ' अपन निर्णय द' दैत छथि। ई अलग बात जे किछु ठाम टिपाउट जेकां रमण जी कोनो रचना अथवा रचनाकार पर कम शब्दमे काज चला लेल करैत छथि आ अपन बात बेसी लिखैत छथि। 

किछु विद्वानक मानब छनि जे व्यक्तिगत रुचि सं अलग भ' ' कोनो कृतिक समीक्षा संभव नहि। व्यक्तिगत विचार स्वातंत्र्यक भावना एहि तरहक आलोचना कें जन्म द' विकसित केलक-ऐ आ से ऐ विचारें देखी तं रमण जीक समीक्षा शैलीमे ई बात देखा गेल करैछ।

हडसनक कहब छथि जे आलोचनाक काज मात्र कृतिक उचित-अनुचित देखब नै, बल्कि किछु निश्चित मानदंड सेहो स्थापित करब थिक। उचित नियम अपना क' आलोचना करब आ सिद्धांतक आधार पर निर्णय देब सैद्धांतिक आलोचना कहबैत ऐ।

रमण जीक आलोचनाक किछु पोथी/आलेख (मैथिलीक आरम्भिक कथा, मैथिली उपन्यासमे चित्रित समाज) पढ़ला पर हमरा ई मानयमे संकोच नै ऐ जे एक्के तरहक बहुत रास कृतिकें आधार बना क' किछु सिद्धांत सन रमण जी निश्चित क' लैत छथि आ फेर ओही सिद्धांतक आधार पर आलोचना करैत चलि गेल करैत छथि। एहि तरहें देखी तं रमण जी सैद्धांतिक आलोचना दिस जाइत सेहो देखाइत छथि। हिआओलक भूमिकामे रमानंद झा रमण लिखैत छथि-

ईशिता पूछि देलनि– "ई पोथी सब की होएतैक?" से जे होएतैक, देखल जाएतैक! ।।।। मुदा, हम विश्वासपूर्वक कहि सकैत छी, ई सभ ने अपने केँ एकभगाह लागत आओर ने गोधिआँकेँ लपेट परसबाक सुनिश्चित चालिक आभास देत अर्थात रमण जी स्पष्ट रूपें कहैत छथि जे मैथिलीमे केहन आलोचनाक दौर चलि रहल छै आ केहन आलोचना हेबाक चाही। हुनक मानी तं आलोचना वैह ठीक भेल जे आ जेना ओ लिखलनि।

व्याख्या आलोचनाक प्रधान गुण थिक। एहि तरहें देखी तं किछु आलेखमे रमणजीक आलोचक सभ सिद्धांत कें छोड़ि क' रचनाकार वा लेखकक अंतरात्मामे प्रवेश करैत छथि आ सहानुभूतिपूर्वक हुनकर कृतिक व्याख्या करैत छथि। रमणजी सभसं पहिने अन्वेषक जकां काज करैत छथि। विषय निरूपणक पद्धति, कथनक ढंग, रचनाकारक आदर्श आ प्रेरणा आदि सभ तत्त्व पर बहुत सूक्ष्म दृष्टि राखि अपन बात रखैत छथि। एहन आलेख लगैत छै जेना कोनो सेमिनारक लेल निश्चिंत मनसं लिखल गेल हो। पुरान रचनाकारक पोथीक भूमिका सभमे गुण-दोष गनबा सं बेसी सोझ-सोझ व्याख्या करैत छथि। ओना किछु ठाम रमणजीक आलोचक ई नै कहैछ जे रचनाकार एना कहैत छथि, ओना कहैत छथि।।।एकर उलट रमण जी सीधे कहैत छथि जे हमरा ई कृति एहन लागल। एहि संदर्भें देखी तं ई मानि सकैत छी जे रमण जी व्यक्तिगत मानदंड अपनबैत छथि।

पुरखा सभकें मोन पारबाक अर्थ अछि हुनकर सभक कथा, भाषा आ मूल्य कें सम्हारि क' राखब। एहि संदर्भमे लेखिका टोनी मॉरिसन मानैत छलीह जे पुरखा सभ पाछू छूटल लोक नै छथि, अपितु ओ सभ हमरा सबहक वर्तमानकें बाट देखाबय वला आत्मा छथि। साहित्यकार शर्ली एबॉटक अनुसार, हमरा सभक पूर्वज सबहक मस्तिष्कक कोनमे आ देहक कोशिका सभमे ज्ञानक शृंखलाक रूपमे जीवित रहैत छथि। किछु अही तरहक विचारक संग रमानंद झा रमण मैथिलीमे ऐतिहासिक काज सभ केलनि।

हमरा रमणजीक खोजी रूप सं पहिल साक्षात्कार श्यामानन्द रचनावली, जनार्दन झा जनसीदन कृत निर्दयी सासु आ पुनर्विवाह सन पोथी पढ़ि भेल। हमर किशोर आ युवा मनकें ओहि समय लागल छलैक जे आलोचकक काज यैह थिक। तकर बाद धीरे-धीरे रमणजीक अन्य आलेख सभ पढ़बाक सुयोग समय-समय पर लगैत रहल। चेतनाथ झा कृत श्रीजगन्नाथपुरी यात्रा, तेजनाथ झा कृत सुरराज विजय नाटक, रासबिहारी लाल दास कृत सुमति, जीबछ मिश्र कृत रामेश्वर, पुण्यानन्द झा कृत मिथिला दर्पण, यदुवर रचनावली, कृत विद्यापति विवरण, पंडित गोविंद झाः अर्चा ओ चर्चा आदि कतेको काज रमण जी कें अनकासं अलग केलकनि। 

श्यामानंद रचनावली, जनार्दन झा जनसीदन कृत निर्दयीसासु आ पुनर्विवाह, राजा टंकनाथ सं संबंधित पोथीक संपादनक आदि काज निश्चये रमण जीक पहचानकें जगजियार केलक। तैं हम हिनका साहित्यक उत्खनन (अनुसंधान आ संरक्षण) लेल प्रयासरत एकटा उत्साही आलोचक मानैत छी। ई आलोचनाक ट्रैक बदलैत रहलाह आ बीच-बीचमे भाषाशास्त्र, संपादन आदि दिस अपना कें समर्पित करैत रहलाह। 

जनार्दन झा जनसीदन निर्दयी सासुक संदर्भ मे मिथिला मिहिरमे आयल आलेख (जे बाद मे अखियासल पोथी मे संग्रहित भेल) मे रमण जी लिखैत छथि-

'जनसीदनजीक सान्निध्य आ एहि प्रकारक रचना सभकेँ देखि स्पष्ट भए जाइछ जे जनसीदनजीक व्यक्तित्वमे ओ प्रखरता नहि छल जाहिसँ शासन-व्यवस्थाक विरोधमे ठाढ़ भए सकथि। आ तेँ जनसीदनजी अपन सम्पर्क एवं सान्निध्यकेँ ध्यानमे रखैत साहित्य सर्जना लेल सामाजिक क्षेत्रकेँ अपनाओल। ओहीपर कलम उठाओल। ई तँ देशक समसामयिक राष्ट्रीय चेतनाकेँ ध्यानमे राखि जनसीदन जीक व्यक्तित्वक मूल्यांकन भेल। जँ सामाजिक आ सुधारवादी चेतनाकेँ ध्यानमे राखि जनसीदनजीक उपलब्ध साहित्यक माध्यमसँ व्यक्तित्वक विश्लेषण करैत छी तँ व्यक्तित्व प्रखर भेटैत अछि। सामाजिक विकृतिकेँ दूर करबा लेल तत्पर छथि। जे सामाजिक व्यवस्था मिथिलाक समाजकेँ कोला-कोलामे बांटि शोषण करैत छल, तकर विरोधमे शंखनाद करैत पबैत छी। उपन्यासकारक प्रखर सामाजिक चेतनाक ई प्रतिफल थिक जे घोर मानसिक संघर्षक बाद ज्योतिषी चिन्तामणि झा ओहि परिपाटीक विरोधमे कन्यादान करैत छथि जे मिथिलाक सामाजिक जीवनमे विभेद उत्पन्न करबाक हेतु ठाढ़ कएल गेल छल'

ई कहबामे असोकर्य नै जे रमणजी अपन पुरखाक (मैथिली साहित्यक शुरुआती पीढ़ीक) काज कें खाली उत्खनित करैत छथि, अपितु हुनक रचना संसारक विवेचन आलोचकीय दृष्टिकोणसं सेहो करैत छथि। ई संभव नै जे हुनक विचारसं सभ क्यो सहमते हुअय, मुदा अपन विचारसं पाठक कें परिचय तं करबैते छथि। हमरा जनतबे रमणजीक उत्खननक बादे निर्दयी सासु उपन्यासक नालंदा निवासी नारायण प्रसाद मगही अनुवाद केलनि आ अन्य इलाकाक लोक इ जनलक जे मैथिलीमे लगभग सौ साल पहिनेसं उपन्यास लिखल जा रहल छैक।

लीली रेक रचना संसार कें जखन मैथिली साहित्य बिसरय लागल छल, तखन हुनक एक-एकटा कथा, उपन्यास, दीर्घ कथा, संस्मरण आदि कें फेरसं पाठकक समक्ष रमण जी अनलनि। एकरा संगहिं ओ लीली रेक रचना पर स्वयं लिखलनि आ अन्य विद्वान लोकनिकें लिखबाक लेल प्रेरित सेहो केलनि। लीली रेक समग्र रचनासं नब पीढ़ी कें परिचय करेबाक निर्वहन रमण जी खूब नीक जकां केलनि। जं एना नै होइत तं रंगीन पर्दा आ मरीचिका सं नब पीढ़ी अनभिज्ञ रहि जा सकैत छल।  हम कहि सकैत छी जे रमणजी कें मैथिली साहित्यक पाठक वर्ग किछु बात ल' कें निश्चये मोन पाड़तनि। जेना-

जखन फेसबुक पर जन्म दिवस आ पुण्यतिथि पर कोनो रचनाकरकें ओ मोन पाड़ैत छथि तं साहित्यिक पंजीकरणक बात सहसा हमरो मोन पड़ैत अछि। ओना रमणजीक किछु आलोचनात्मक आलेख सेहो पंजीकरण दिस जाइत देखाइत अछि। मैथिली कथा, मैथिली कविताक संग विनोद बिहारी लाल, अशोक, शैलेंद्र आनंद आदि रचनाकार पर हुनक आलेख साहित्यिक पंजीकरणक एकटा नीक उदाहरण थिक। ओहिना भेटघांट आ रूचय तं सत्य ने तं फूसि सेहो स्वयंमे मीलक पाथर थिक। राजा टंकनाथ चौधरीक बिसरल अवदान कें विभिन्न माध्यमे आ विभिन्न लोक सभक मार्फत जगजियार करब रमण जीक साहित्य आ भाषाक उत्खनन कार्यक बेजोड़ उदाहरण थिक। ओहिना लीली रेक समग्र रचना सभ कें एकत्रित करैत बेराबरी प्रकाशित करब, संपादित करब आ हुनक साहित्य पर सार्थक आलोचना करब सेहो रमण जीक विरल काज थिक। 

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।

साहित्य अकादेमीक संकीर्ण मैथिली भाषा विभागसँ विदेह (मैथिली साहित्यक समानान्तर मंच) ऐ अर्थमे सेहो फराक अछि जे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिका सन सहभाषाकेँ संग लऽ कऽ मिथिलाक बोली-वैविध्यक समग्र चित्र देल जाइत अछि। विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक भाषा विज्ञान, रचना आ व्याकरण मैथिलीक संग देल गेल अछि मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा विज्ञान (ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर, संगे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक साहित्य ई-प्रकाशित आ समीक्षित सेहो होइत अछि।– गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह ISSN 2229-547X
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