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VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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डॉआभा झा (संस्कृतक शिक्षिका, विद्वान एवं समीक्षक)

विवर्त्त

वि उपसर्ग पूर्वक वृत् धातुसॅं घञ् प्रत्यय केला उत्तर बनैत छैक विवर्त्त जकर अर्थ होइत छैक घूर्णन अथवा विस्तारण। एकरा परिवर्तनक स्वत: स्फूर्त क्रिया अर्थात् evolution सेहो मानल जा सकैत अछि। विवर्त्त कत्तहु भए सकैछ, चिन्तनमे, प्रकृतिमे अथवा सम्पूर्ण चराचर जगतमे। वाक्यपदीयम् केर पहिल कारिकामे कहल गेल छैक -

अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम्

विवर्ततेsर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यत:।

अर्थात् शब्द रूपी ब्रह्म अनादि, विनाश रहित आ अक्षर (जकर नाश नहि होइछ) अछि आ ओकर विवर्त्त प्रक्रियासॅं ई जगत भासित होइत अछि। आलोचना, समीक्षा, चिन्तन परक आलेख आदिकेँ एहि विवर्त्त प्रक्रियाक अंग मानल जयबामे कोनो तरहक विमति नहि होयबाक चाही। मैथिली आलोचना- संसारमे शीर्ष पर अवस्थित, अपन समयक अधिकांश भाग मैथिलीक साहित्यक अन्वेषण, लेखन, प्रमाणीकरण, प्रमापीकरण आ तदर्थ अनुसंधान लेल प्रवृत्त श्री रमानन्द झा रमण जीक विवर्त्त शीर्षक पोथी निस्संदेह एहन नहि जकरा ऊपरे- ऊपर पढ़ल जाय,पढ़बा -बुझबा लेल उतर पड़ै छै गहीर जलमे, तखन भेटैत छै प्रभावपूर्ण तथ्यात्मक साक्ष्य आ विश्वसनीय स्रोत।

एहि पोथीक लेख सभ उत्कृष्ट शोध-पत्रक रूपमे लिखल अछि, जकर स्रोत प्रत्येक लेखक अंतमे देल अछि। कोनो कल्पना नहि, कोनो वाद नहि, अपन मतक उपस्थापन आ आरोपणक कोनो प्रयास नहि! मनुस्मृति मे कहल गेल छैक -

अलब्धं चैव लिप्सेत् लब्धं रक्षेत् यत्नतः

रक्षितं वर्धयेच्चैव वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत्। 99

अर्थात् जे नहि अछि, तकरा प्राप्त करबाक इच्छा राखी, जे भेटि गेल, तकर यत्नपूर्वक रक्षा करी आ रक्षित धनकेँ बढ़यबाक कोशिश करी आ जे फाजिल अछि तकरा सत्पात्रकेँ दान करी। ई श्लोक विद्या आ धन दुहू पर समानरूपसॅं आइयो लागू अछि। यावज्जीवमधीते विप्र: एहि भावक सम्मान करैत आजन्म विद्या-प्राप्तिक प्रयास करबाक चाही, जे किछु शोध अथवा प्रयोगक माध्यमसॅं ज्ञात भेल, ओकर संरक्षण करबाक चाही आ जतेक प्राप्त ज्ञान अछि ओकरा पोथी रूपमे अथवा प्रवचन रूपमे अगिला पीढ़ी लेल सुरक्षित रखबाक चाही। विद्या दान ओहिनो सर्वोत्तम दान मानल जाइत छैक, जाहिसॅं एक त ज्ञानक परम्परा अविच्छिन्न रहैत छैक आ देनिहारक क्षमता सेहो बढ़ैत छैक। ई समाजक अपना ऊपर एक तरहक ऋण सेहो अछि।

एहि ऋषि-ऋणक अदायगीकेँ अपन कर्त्तव्य बूझि आदरणीय रामानंद झा रमण कतोक विलुप्तप्राय लेखादिक संग्रह, तत्सम्बद्ध साहित्यक अन्वेषण ,सम्पादन आ सृजनक माध्यमसॅं संरक्षणक काज करैत मातृभाषा अनुरागी लोकनिक सम्मानक पात्र बनल छथि। हिनका विषयमे पं गोविंद झा कहैत छथिन-

'डा. जयकान्त मिश्र, आचार्य रमानाथ झा आदि किछु विद्वान जे अनुसन्धान, संग्रह आ समीक्षाक परम्परा चलाओल ताहि बाटकेँ सम्प्रति प्रायः एकसरे रमणजी धएने छथि। अनुसन्धान रसिक पण्डित श्रीरमानन्द झा 'रमण' नब-नब वस्तुक अन्वेषण करैत छथि आलोचक रमणजी ओकर सारगर्भ समीक्षा सेहो करैत छथि।

प्रो. आनन्द मिश्र हिनका एकटा गुटनिरपेक्ष आलोचक मानैत छथिन जे अपन आलेख तथ्यानुसार आगाँ बढ़बैत छथि।

एखन विवेच्य पोथी विवर्त सेहो अही प्रवृत्तिक अद्यतन कड़ी थिक। पहिल लेखमे 1947 सॅं पूर्व प्रकाशित (1905 मैथिली हित साधन) पत्रिकाक विवरण आ ओहिमे संगृहीत सामग्रीक माध्यमसॅं स्वाधीनता- आन्दोलन पर ओकर प्रभाव पर विशद चर्चा अछि। सत्रह पृष्ठक एहि लेखक तथ्यात्मकता ओकर आठ पृष्ठक 36 बिन्दुक सन्दर्भसॅं जानल जा सकैत अछि।

दोसर लेख सेहो राष्ट्रीय चेतनाक जागृति लेल प्रवासी मैथिल द्वारा मिथिला मोद नामक पत्रिकाक प्रकाशन आ ताहि माध्यमसॅं देशक सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक उन्नतिक उद्देश्यकेँ रेखांकित करब लेखककेँ अभीष्ट छनि। एकटा लेखमे मैथिलीक आद्य उपन्यासकार पं जीबछ मिश्रक समय, समाज आ सामाजिक दृष्टिक अन्वेषण करैत लेखकक ई पंक्ति द्रष्टव्य अछि -

जीबछ मिश्रक 'रामेश्वर' सर्वदेशीय अछि, जाति-धर्म - क्षेत्र निरपेक्ष। 'रामेश्वर'क सार्वदेशिकता रामेश्वरक एहि कथनमे निहित छैक जे 'पेटक ज्वालासँ कातर मनुष्यसँ किछु असाध्य नहि होइत छैक।' भ्रष्टाचार एवं स्वार्थलिप्साक जालमे छटपटाइत रामेश्वर तँ एक प्रतीक मात्र थिक। 'रामेश्वर' सॅं आरम्भ भेल मैथिली उपन्यासक यात्रामे विश्वदृष्टिक अन्वेषण लेखककेँ अभिप्रेत छनि। एहि प्रसंगमे ओ निर्दयी सासु, सुमति, चन्द्रग्रहण, कन्यादान, माधवी माधव, कुमार, भलमानुस, पारो, पृथ्वी पुत्र, नैका बनिजारा, बिहाड़ि पानि आ पाथर आदि उपन्यासक प्रसंगमे समकालीन दृष्टिक खोज करैत कहैत छथि -

समकालीन विश्वदृष्टि मानवक मुक्ति-संघर्षक एहि अभियानमे प्राण-प्रणसँ सहयोगी अछि। आ ओही युग-दृष्टिक अनुरूप समकालीन मैथिली उपन्यास शोषण, अत्याचार, राजनीतिक पराधीनता, आर्थिक विषमता, धार्मिक असहिष्णुता एवं कट्टरता आ सामाजिक अन्यायक विरुद्ध डेग रोपबाक साहसकें स्वर दैत अछि। सुविधा भोगीवर्गक अत्याचार, धर्म आ जातिक नामपर, सम्प्रदाय, क्षेत्र आ भाषाक नामपर होइत विभेद आ शोषणक विरोधमे जनमानसकेँ जगबैत अछि। शोषित, भूखल, अभावग्रस्तक प्रति सहानुभूति व्यक्त करैत ओहन समाजक कल्पना करैत अछि जे सभ प्रकारक शोषण आ अत्याचारसँ मुक्त होअए, समाजक सभ केओ समान सुविधा आ अवसर पाबय, मानव सभ्यता आ संस्कृतिक विकासमे समरूप सहयोगी बनि सकए।

तदनन्तर मैथिली कथामे बहुसांस्कृतिकता महाभारत कथा आधारित मैथिली-साहित्य शीर्षकसॅं दूटा महत्त्वपूर्ण लेख अछि। 'राजाजी'क रूपमे सलहेसकें सामाजिक मान्यताक आधार आ 'गीत दीनाभद्री' : गाथाक विकास एवं महत्त्व नामक लेखमे पूर्वापरप्रसंग, डॉ जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन आ विभिन्न विद्वानक मान्यताक आधार पर लेखक अपन मतक उपस्थापन कएने छथि।

कथा, उपन्यास,गाथा आदिक उपरांत साहित्यक महत्त्वपूर्ण पक्ष समालोचनाक अंतर्गत जयधारी सिंहक समालोचना-कर्म पर विचार कएलनि अछि। अलगसॅं लिली रे, शेफालिका वर्मा, कांचीनाथ झा किरण सदृश लेखकक रचना संसार पर लेखक द्वारा दृष्टि देल गेल अछि। अनुवादक व्यावहारिक आ साहित्यिक प्रयोजन आ ओहिमे अम्बिका नाथ मिश्र महोदयक योगदान पर विशद चर्चा अछि। मैथिली साहित्यमे विधा एवं छन्दक वैविध्यक बादो विदेशी काव्यशैलीक ग्रहण आ ओहिमे निहित सौंदर्य आ संरचनाक बोध करबैत धर्मेन्द्र विह्वलक कवितामे जापानी टांकाक सोदाहरण प्रस्तुति लेखक रोचकता बना कए रखने अछि। अंतिम लेख मैथिलीमे शोक-काव्य आ ओहि परम्परामे ललितनारायण मिश्रक योगदान पर चर्चा अछि।

संक्षेपमे कहल जा सकैछ सिद्धिरस्तु प्रकाशनसॅं छपल 242 पृष्ठक ई पोथी विचार- सघन, दृष्टान्त-समृद्ध, गाम्भीर्य- समन्वित, बहु आयामी आ विविधवर्णी अछि। जे कि ई आलोचनात्मक निबन्धक पोथी अछि त स्वाभाविक अछि जे तथ्यात्मकता आ विचार-मन्थन प्रमुख तत्त्व अछि आ तैं पढ़बा काल सर्वतोभावेन मानसिक सन्नद्धता जरूरी। संपूर्ण पोथीमे एक एक कथनक समर्थनमे देल गेल सन्दर्भ एहि पोथीक अतिरिक्त विशेषता अछि। टंकण अशुद्धि नगण्य- प्राय अछि। पोथीक आवरण पृष्ठ अत्यंत सुंदर आ छपाइ एकदम साफ अछि। मैथिली भाषा आ साहित्यक गम्भीर जिज्ञासु पाठक ई पोथी पढ़लासॅं अवश्य लाभान्वित होयताह ।लेखककेँ सादर अभिवादन आ पोथी उपलब्ध करयबा लेल युवा मैथिली सेवी श्री उज्ज्वल कुमार झाकेँ धन्यवाद।

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।

साहित्य अकादेमीक संकीर्ण मैथिली भाषा विभागसँ विदेह (मैथिली साहित्यक समानान्तर मंच) ऐ अर्थमे सेहो फराक अछि जे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिका सन सहभाषाकेँ संग लऽ कऽ मिथिलाक बोली-वैविध्यक समग्र चित्र देल जाइत अछि। विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक भाषा विज्ञान, रचना आ व्याकरण मैथिलीक संग देल गेल अछि मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा विज्ञान (ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर, संगे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक साहित्य ई-प्रकाशित आ समीक्षित सेहो होइत अछि।– गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह ISSN 2229-547X
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