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VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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विदेह नूतन अंक
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हितनाथ झा

(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)

अनुसन्धान - प्रतिमान

डॉक्टर रमानन्द झा "रमण" केंद्रीय बैंक (रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया)मे कार्यरत रहथि केन्द्रीय बैंकक मुख्य कार्य होइत अछि ,भारतक समस्त बैंकक नीति-निर्धारण ,दिशा निर्देशनसँ लय निरीक्षण-परीक्षण नजरि राखब हिनक वृत्ति छलनि ,जकर निर्वहन करीब34 -35 वर्ष तँ कयनहिं हेताह वृत्तिक कारण भय सकैछ ,रुचियो ओहने भय गेलनि साहित्यमे पदार्पण कोनो आन विधासँ नहिँ , अनुसंधान ,आलोचनेसँ कयलनि से जे धयलनि से पकड़ने रहि गेलाह ,विचलित नहिँ भेलाह ,रास्ता नहिँ बदललाह ,अपितु रास्ता देखबैत गेलाह से निरंतरताक संग तकरे परिणाम थिकनि आजुक मैथिली साहित्यमे एक मात्र इएह छथि जे आलोचकमे सेहो सभ दिन केंद्रमे रहलाह से बेछप हिनकर जोड़ ताकब कठिन ,कारण जोड़-तोड़मे कहियो नहिँ रहलाह , दृढताक सङ्ग अपन कार्यमे जुटल रहलाह जहिना ,तहिना अपन मतकेँ प्रमाण मानि ओहिमे डटल रहब सेहो हिनक अपन एक विशेषता छनि इएह विशेषताक कारणसँ अपन क्षेत्रमे मैथिली साहित्यक एक मजबूत स्तम्भक रूपमे जानल-मानल -आँकल जाइत छथि

हिनक अनेको प्रकाशित पुस्तक छनि मौलिक ,संपादित अनुवादक सम्प्रति चेतना समितिसँ प्रकाशित "घर-बाहर" प्रधान संपादक छथि ।श्री रमणजीक नवीनतम पोथी छनि "अनुसन्धान-प्रतिमान" जे एखन हमरालग अछि पढलहुँ अछि। भय सकैछ ,एकर बादो कोनो नवीन पुस्तक आबि गेल होइन ,हमरा नहिँ जनतब अछि ,कारण जाहि लेखकक परिचयमे 40 -45 पुस्तकक बाद आदि-आदि लिखल हो ,तकर पुस्तक कखनो -कहियो आबि सकैत अछि , ओना हिनकर मौलिक पुस्तकक संख्या एगारह छनि

*अनुसन्धान-प्रतिमान*पर दू शब्द पाठकीय लिखबाक लौल करबासँ पहिने हम श्री तारानंद वियोगीक बात राखय चाहब जे हिनकर विषयमे "जखन-तखन" चौदहम अंक *मैथिली आलोचना :स्थिति अपेक्षा *मे लिखलनि अछि

""रमानंद झा 'रमण' एखनुक समयमे एकमात्र पूर्णकालिक सक्रिय आलोचक छथि ।हुनकर विषय -विस्तार बहुत व्यापक छनि ।प्रमुख क्षेत्र मुदा अतीते छियनि ।जेना रमानाथ बाबू मध्यकालक अनेक अज्ञात ,अचचर्चित कवि सभक उद्धार केलनि ,रमण जी सेहो अनेक आधुनिक अचर्चित ,अल्पचर्चित रचनाकार सभक कृति आम पाठक धरि सुलभ केलनि एहि तरहेँ हुनक उद्धार केलनि हुनकर काजमे निरंतरता सेहो रहल अछि जे हुनकर अवदानकेँ पैघ बनबैत अछि अतीतोन्मुखताक बन्हनकेँ तोड़ि s युगीन रचनाशीलताकेँ विश्लेषित करबाक प्रयास सेहो केलनि अछि जकरा हुनकर दर्जनों निबन्धमे देखल जा सकैत अछि ""

श्री रमानंद झा रमणक आलोचना निबन्धमे सामग्री प्रचुर मात्रामे भेटत ,कारण हिनकर व्यग्तिगत पुस्तकालयमे पुरानसँ नव सभ तरहक करीब-करीब अधिकांश मैथिली पुस्तक ,पत्रिका छनि से पढ़ल छनि ,पढ़ले टा नहिँ , माथामे रचल-बसल छनि से एकर उपयोग करबामे महारत हासिल छनि तै हिनकर अनुसन्धानसँ लय वर्तमानतकक लेख सरल ,सहज ,बोधगम्य भाषामे पाठकक सम्मुख परसल भेटत ,बुझबामे कतौ कोनो भाँगठ नहिँ

जेना पूर्वमे कहल गेल अछि ,हिनकर सोच स्पष्ट छनि पूर्ण रूपेण साहित्यक सेवामे लागल विलुप्त होइत अनेको रचनाकेँ , अनेको रचनाकारकेँ ,कठिन परिश्रमसँ अनुसंधान कय ओकर महत्वक निरूपण करैत ओहि समयक साहित्यकेँ वर्तमान भविष्यक लेल सुरक्षित करब ,हिनक अमूल्य अवदानमे गनल जायत

अनुसंधानक प्रयोजनसँ हमरालोकनि सभ गोटे अवगत छीहे ,मुदा सभहक अवगति नहिँ जे एहि दुःसाध्य काजमे पड़ब मानकक सङ्ग एहि प्रसङ्ग श्री रमण जी स्वयं कहैत छथि एहि पुस्तकक भूमिकामे "अनुसंधानक प्रयोजन की ?"

**हमरा अचर्चित ,अल्पचर्चित ,वा समयक प्रवाहमे सायास वा अनायास विसरल-विसराएल रचनाकार कृति पहिने आकर्षित करैत छथि हुनक अप्रकाशित रचनाकेँ ताकि संकलित करबामे आनन्द होइत अछि दोसर चरणमे ओहि रचनाकारक प्रसङ्ग कतए की लिखल गेल छैक ,तकर बेसीसँ बेसी संकलनक प्रयास करैत छी ओहिमे जँ कोनो नव सूचना रहैत छैक ,तकरो उपरेबाक कोनो प्रयास छोड़ैत नहिँ छी पारिवारिक परिचय संकलित करैत छी ।हुनक रचनाक प्रसङ्ग व्यक्त मतक प्रति सहमति-असहमति ,खंडन-मंडनक संग अपन मत ,तथ्य तर्क संग रखैत छी समकालीन संग तुलनाकेँ महत्व दैत छियैक हुनक साहित्यक विश्लेषण ,हुनक रचनाकालकेँ ध्यानमे राखि करैत छी जाहिसँ ओहिमे निहित समयक प्रतिध्वनिकेँ आजुक पाठक नीक जकाँ अकानि सकथि रचनाक सन्दर्भ बनल रहैक **

श्री रमणजीक उपर्युक्त प्रतिमानकेँ ध्यानमे राखि हुनक चर्चित पोथीकेँ पढ़ि मूल्यांकन करबाक सामर्थ्य तँ हमरामे नहिँ अछि ,एहि लेल ज्ञानक संग अध्ययनक आवश्यकता होइत छैक ,तत्कालीन समयक समाज साहित्यसँ पूर्ण अवगतक संग लिखबाक अवगति होयब जरूरी होइत छैक ,किन्तु एतवा तँ जरूर जे एहि तरहक पोथी पूरा पढ़ि लेनाइ सेहो सभक वशक बात नहिँ , जखन कि मैथिलीमे कथो -उपन्यासकक पाठक ताकब आसान नहिँ बात भले हमरालोकनि जतेक बनाबी ! हिनकर पोथी तँ उच्च प्रतिमानक उच्च वर्गक लेल ,विश्वविद्यालय /महाविद्यालयक शिक्षक छात्रलोकनिक लेल अछि , ज्ञानोपार्जनक kit अछि ,भले सिलेबसमे रहौ वा नहिँ एहि प्रसङ्ग सेहो चर्चा नहिँ करब

कने विषयान्तर भय कहैत छी , आब पी जीमे सेहो अधिकांश विश्वविद्यालयमे text book सँ नहिँ पढाओल जाइत छैक , मैथिलियेमे नहिँ ,कोनो विषयमे नहिँ कल्पना करू ,विद्यापतिक मूल पद नहिँ पढ़ि ,परीक्षाक तैयारी नोट द्वारा कैल जाय यदि हुनका पढबय पड़नि ,से पढिबैते हेताह ,तँ फेर कल्पना कय लिय ' हमरा एक एहन शोधार्थी भेटल छथि ,जनिका मूल पुस्तक देखल नहिं छलनि ,जाहिपर हुनकर रिसर्चक बाद आगूमे या पाछूमे जे कही ,डॉक्टर लागल छलनि

एहन स्थितिमे करीब-करीब अर्धशतक पोथीक कवरपर लेखक ,संपादक ,अनुवादक आदि रहब मैथिली पाठकक लेल आश्वस्त करैत अछि एहि पोथी सभक महत्व वर्तमानमे तँ सहजहिं भविष्यक लेल मार्गदर्शनक सङ्ग धरोहरकेँ सुरक्षित करब भेल।

प्रस्तुत पुस्तकमे 11 टा आलेख अछि , सभ शोधपरक ,श्रोतक संग मैथिली लोकगाथामे दीनाभद्री ,मैथिली उपन्यासकार पंडित जीबछ मिश्र ,तेजनाथ कवि भान , रास बिहारी लाल दास सुमति ,पुण्यानंद झाक मिथिला दर्पण ,यदुवर मैथिली कवितामे राष्ट्रीय चेतनाक विकास ,महाबीर झा वीरक कविताक व्याप्ति ,श्री वल्लभ झाक अवदान सर्वेक्षण , श्यामानंद झा: व्यक्तित्व एवम कृतित्व ,हरिनंदन ठाकुर सरोजक कथा आओर मिथिलामे स्त्री - शिक्षा एवं सामाजिक सुधार

हम पूरा किताब पढ़ि मात्र हम एतवा कहबाक साहस कय रहल छी जे जाहि आधार सोचि संकलन प्रस्तुत कयलनि अछि ऊपरमे जे कठोर मापदंड रखलनि अछि ओहिमे नीक जकाँ सफल भेलाह अछि हमरा बहुतोक विषयमे किछु नहिँ बुझल छल ,हँ ,नाम धरि सुनल छल से रुचिपूर्वक पढलाक बाद बहुतो नवीन बात सभ बुझलहुँ बहुतो साहित्यकारक व्यक्तित्व कृतित्वसँ अवगत भेलहुँ ,अपन धरोहरक विषयमे बुझलहुँ किछु भ्रम छल से दूर केलहुँ जेना सरोज उपनाम बुझैत छलियैक ,से नहिँ एक उपाधि थिक ,जेना विद्यालंकार ,मैथिली वाचस्पति ,मैथिली सरोज वा सरोज उमापति उपाध्ययकेँ सुमति उपाधि भेटल छलनि,से तँ बुझल छल एहिना किताब पढ़लाक बाद बहुत तथ्यात्मक साहित्यक परम्परासँ परिचित भेलहुँ वैदिक कालसँ मिथिलामे नारीक दुर्दशा ,अशिक्षा क्रमिक विकासक सामाजिक साहित्यिक उल्लेखक संग सविस्तर आलेखसँ सेहो नीक जकाँ परिचित भेलहुँ

किताब पढ़लाक बाद तँ जरूर भान भेल जे जाहि रूचिक सँग नव -नव वस्तु पढ़इत छी,ओतबे रुचि लय अपन साहित्यिक इतिहास सङ्ग मूल वस्तु सेहो पढ़ी

(साभार : 'लेख-रेख')

 

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साहित्य अकादेमीक संकीर्ण मैथिली भाषा विभागसँ विदेह (मैथिली साहित्यक समानान्तर मंच) ऐ अर्थमे सेहो फराक अछि जे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिका सन सहभाषाकेँ संग लऽ कऽ मिथिलाक बोली-वैविध्यक समग्र चित्र देल जाइत अछि। विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक भाषा विज्ञान, रचना आ व्याकरण मैथिलीक संग देल गेल अछि मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा विज्ञान (ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर, संगे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक साहित्य ई-प्रकाशित आ समीक्षित सेहो होइत अछि।– गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह ISSN 2229-547X
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