विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
‘हिआओल’ : भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आ विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ विस्तृत आलोचनात्मक आस्वाद
-गजेन्द्र ठाकुर
(डा. रमानन्द झा ‘रमण’, मैथिली आलोचना, अखियासल प्रकाशन, लालगंज, सरिसब-पाही, मधुबनी, २०१२)
१. उपक्रम : पोथी-परिचय आ ’हिआओल’क अर्थ-गरिमा
‘अखियासल’, ‘बेसाहल’ आ ‘भजारल’क अनन्तर डा. रमानन्द झा ’रमण’क ई चारिम आलोचना-संग्रह ’हिआओल’ (२०१२) मैथिली आलोचनाक ओहि विरल परम्पराक कड़ी थिक जाहिमे आलोचना गुटबन्दीक चपेटसँ मुक्त भऽ पाठ, पत्र-पत्रिका आ अभिलेखकेँ प्रमाण मानि चलैत अछि। पोथीक नामकरणेमे लेखकक विनम्र प्रविधिक घोषणा अछि — ‘हिआओल’ अर्थात् थाहल, अन्दाजल। ई शब्द-चयन आत्मश्लाघाक स्थान पर अनुसन्धानक अनन्त सम्भावनाक स्वीकार थिक; क्षेमेन्द्रक औचित्य-सिद्धान्तक भाषामे कही तँ शीर्षकहिमे प्रबन्धौचित्यक बीज रोपल अछि। लेखकीयमे स्वयं स्वीकारल गेल अछि जे ई सभ आलेख मनोरंजक साहित्यक कोटिक नहि थिक, ‘अरबेधि-अरबेधि’ एहन विषयक चयन कएल गेल अछि जकर अध्ययन अपेक्षित छैक मुदा लोक-दृष्टि जतऽ प्रायः नहि जाइत अछि। पण्डित गोविन्द झा आवरण-टिप्पणीमे मार्मिक शब्दमे लिखने छथि जे मैथिली-जगतक आनो नामी आलोचककेँ पूर्वज-साहित्य आ परम्परामे सड़ाइन गन्ध लगैत छनि, मुदा रमणजीकेँ ‘पुरान चाउरक भात टटका दहीक संग’ प्रिय छनि — अर्थात् परम्पराक संरक्षण आ नव मूल्याङ्कन दुनू काज ई पूर्वज-पूजा बूझि करैत छथि। फूलचन्द्र मिश्र ‘रमण’ पुरोवाक्मे उचिते लिखने छथि जे एहि निबन्ध-संग्रहमे आलोचना-प्रत्यालोचनाक संगम अछि आ लेखकक उद्देश्य ककरो प्रतिष्ठाकेँ धूमिल करब नहि, विमर्श हेतु बिन्दु सभ उपस्थित करब थिक — ‘वादे वादे जायते तत्त्वबोधः’।
एहि पोथीमे भाषा-विज्ञान, साहित्येतिहास, प्रत्यालोचना, कथा, कविता, महाकाव्य, लोकगाथा, लोकगीत, पत्रकारिता, प्राकृतिक विपत्ति, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद आ भाषिक उपनिवेशवादसँ सम्बन्धित सत्रह अध्याय समाहित अछि। विषय-सूचीसँ स्पष्ट होइत अछि जे संग्रहक विस्तार ग्रियर्सनक भाषा-अध्ययनसँ आरम्भ भऽ उपनिवेशवादक नव चालि धरि जाइत अछि। सत्रह निबन्धक ई संग्रह तीन वर्गमे सहजहिं बँटि जाइत अछि। पहिल, भाषा-चिन्तन आ भाषा-राजनीति : मैथिली एवं मिथिला भाषाक अध्ययन; रमानाथ झा आ मिथिला भाषा; मैथिली लोकगीत — अवस्था एवं संरक्षण; उपनिवेशवादक नऽव चालि। दोसर, व्यक्ति ओ कृति-केन्द्रित प्रत्यालोचना : प्रत्यालोचक किरणजी; उपेक्षितक आँखिसँ कन्यादान; अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह; यात्रीक भाषा; मनमोहन झाक कथाक अनालोचित पक्ष। तेसर, विधा ओ प्रवृत्ति-केन्द्रित इतिहास-दृष्टि : पत्रकारिताक विकासमे प्रवासीक योगदान; लोकगाथामे दीनाभद्री; मैथिली कथाक विकास — किछु नव तथ्य; कवितामे मिथिलाक भूकम्प; कथी लऽ लगेलिऐ हे कोसी माइ; महाकाव्यमे युग-सन्दर्भ; नऽव गीतमे समाज-चेतना; मैथिली कविताक वर्तमान धारा। एहि त्रिवर्गीय संरचनामे लेखकक समग्र आलोचकीय व्यक्तित्व — भाषाशास्त्री, पाठालोचक, इतिहासकार आ प्रत्यालोचक — क चारू रूप एकहि ठाम भेटैत अछि।
ई पोथी एकरेखीय साहित्येतिहास नहि, अपितु प्रचलित निष्कर्ष सभकेँ प्रश्नांकित करैत अनेक समान्तर आख्यानक संकलन अछि। लेखकक मुख्य प्रवृत्ति अछि — विस्मृत लेखक आ रचनाकेँ पुनः प्रतिष्ठित करब, पूर्ववर्ती आलोचनाक अधूरापन देखायब, लोक आ शिष्टक कृत्रिम विभाजन तोड़ब, मैथिली भाषा-साहित्यक विकासकेँ सत्ता, समाज, भूगोल आ इतिहाससँ जोड़ब, तथा मुख्य इतिहासक पार्श्वमे दबाओल स्त्री, दलित, श्रमिक, प्रवासी, ग्रामीण, बाढ़िपीड़ित आ भाषिक समुदायकेँ दृश्य बनायब। लेखक स्वयं आलोचनाकेँ रचनाक भाषा, शिल्प, तथ्य, कथ्य, पात्र आ चरित्रक गुण-दोषक सूक्ष्म विवेचन मानैत छथि। हुनका लेल आलोचना दोषान्वेषण मात्र नहि, गुणक आलोकन सेहो अछि, आ साहित्यक सृजनसँ बेसी ओकर संरक्षण ओ मूल्याङ्कनकेँ ओ महत्त्व दैत छथि।
२. समीक्षा-पद्धति : त्रिविध कसौटी
प्रस्तुत मूल्याङ्कन तीन कसौटी पर आधारित अछि।
भारतीय काव्यशास्त्रक आधार
पहिल कसौटी भारतीय काव्यशास्त्र थिक — भरतक रस-निष्पत्ति, आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्त, कुन्तकक वक्रोक्ति, क्षेमेन्द्रक औचित्य-विचार, साधारणीकरण, लोकमंगल-दृष्टि आ न्यायदर्शनक प्रमाण-मीमांसा (विशेषतः अभाव-प्रमाणक प्रश्न, जे स्वयं रमणजीक तर्क-पद्धतिमे बेरि-बेरि झलकैत अछि)। रस-सिद्धान्त रचनामे अन्ततः उत्पन्न भावानुभूतिक परीक्षा करैत अछि। ध्वनि-सिद्धान्त प्रत्यक्ष कथनक पाछाँ निहित सामाजिक, राजनीतिक आ सांस्कृतिक अर्थ खोलैत अछि। वक्रोक्ति-सिद्धान्त सामान्य कथनसँ हटिकऽ रचनात्मक भाषा, प्रतीक, व्यङ्ग्य आ विचलनक सौन्दर्य देखैत अछि। औचित्य-सिद्धान्त विषय, भाषा, पात्र, प्रसंग आ निष्कर्षक परस्पर संगतिक जाँच करैत अछि। साधारणीकरण देखैत अछि जे व्यक्तिगत अनुभव कोना सामूहिक अनुभव बनैत अछि। लोकमंगल-दृष्टि साहित्यक सामाजिक उपयोगिता, अन्याय-विरोध आ जनहितक मूल्याङ्कन करैत अछि।
पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तक आधार
दोसर कसौटी पाश्चात्य सिद्धान्त थिक — उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श, नव-इतिहासवाद, समाजभाषाविज्ञान, शैलीविज्ञान, पाठालोचन-शास्त्र, अभिग्रहण-सौन्दर्यशास्त्र (पाठक-अनुक्रिया), मार्क्सवादी ओ निम्नवर्गीय (अधीनस्थ) विमर्श, नारीवाद, दलित-विमर्श आ पर्यावरणीय आलोचना। रूपवादी दृष्टि भाषिक विन्यास, संरचना, प्रतीक, पुनरावृत्ति आ कथन-पद्धतिक विश्लेषण करैत अछि। पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टि अर्थकेँ स्थिर नहि मानि पाठकक अनुभवसँ निर्मित मानैत अछि। मार्क्सवादी दृष्टि वर्ग, श्रम, उत्पादन, शोषण आ सत्ता-संरचनाकेँ केन्द्रमे रखैत अछि। नारीवादी दृष्टि स्त्रीक मौन, देह, श्रम, शिक्षा, अधिकार आ प्रतिनिधित्वक परीक्षण करैत अछि। दलित आ अधीनस्थ दृष्टि इतिहासमे दबाओल समुदायक स्वर आ आत्मप्रतिनिधित्व खोजैत अछि। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि भाषा, शिक्षा, ज्ञान आ संस्कृतिपर औपनिवेशिक प्रभुत्वक निरन्तरताकेँ उद्घाटित करैत अछि। नव-इतिहासवादी दृष्टि साहित्यिक कृतिकेँ अपन समयक सत्ता, संस्था, अर्थव्यवस्था आ सामाजिक संघर्षसँ जोड़ैत अछि। पर्यावरणीय आलोचना मनुष्य, नदी, वनस्पति, पशु-पक्षी, भूमि आ विपत्तिक परस्पर सम्बन्ध देखैत अछि।
विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि
तेसर कसौटी विदेह समान्तर साहित्य-इतिहासक दृष्टि थिक, जे राजवंश, दरबार, शास्त्र, प्रतिष्ठित लेखक आ संस्थाक इतिहासक समानान्तर लोकजीवनक इतिहास लिखैत अछि आ प्रतिष्ठान-पोषित प्रतिमानक स्थान पर अनालोचित, उपेक्षित, लोकधर्मी आ अभिलेख-सिद्ध धाराकेँ केन्द्रमे अनैत अछि। एहि दृष्टिमे मिथिला केवल राजनीतिक सीमा नहि, सांस्कृतिक भूगोल अछि; भारत आ नेपालक मैथिली क्षेत्र एक दीर्घ सांस्कृतिक प्रवाहक अङ्ग अछि; इतिहास राजाक संग किसान, स्त्री, दलित, मुसहर, श्रमिक, गायक, पत्रकार, प्रवासी आ विपत्तिग्रस्त जनक सेहो होइत अछि; साहित्यिक इतिहास केवल प्रकाशित पोथीक नहि, लोककण्ठ, व्रतकथा, गीत, अप्रकाशित पाण्डुलिपि आ विस्मृत रचनाकारक सेहो होइत अछि; तथा नदी, बाढ़ि, भूकम्प, पलायन आ भाषिक विस्थापन ऐतिहासिक शक्ति बनि उठैत अछि। ई तेसर कसौटी एहि पोथीक लेल विशेष सार्थक अछि, कारण ‘हिआओल’क अनेक अध्याय — ’अनालोचित कवि’, ‘अनालोचित पक्ष’, ‘उपेक्षितक आँखिसँ’, ‘किछु नव तथ्य’ — स्वयं प्रति-प्रतिमान निर्माणक, अर्थात् समान्तर इतिहास-लेखनक पूर्वाभ्यास थिक। ’हिआओल’क मूल उपलब्धि एही समान्तर इतिहास-बोधमे निहित अछि। एहि मूल्याङ्कनक लगभग आधा भाग अध्याय सभक सीमा-विवेचन पर केन्द्रित अछि — ई स्वयं रमणजीक घोषित सिद्धान्तक अनुकूल थिक जे आलोचना अभिनन्दन-पत्र नहि थिक आ प्रीतिकर होएब ओकरा लेल आवश्यक नहि छैक।
३. अध्यायवार उपलब्धि आ आलोचनात्मक आस्वाद
३.१ मैथिली एवं मिथिला भाषाक अध्ययन
उद्घाटक निबन्ध कोलब्रुक (१८०१)सँ ग्रियर्सन धरिक पश्चिमी भाषा-अध्ययनक कालक्रम प्रस्तुत करैत ई मार्मिक प्रश्न उठबैत अछि जे साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ अविच्छिन्न परम्परा रहितहुँ मैथिलीक व्याकरण सभसँ पछाति किएक लिखल गेल। कोलब्रुकक ई संकीर्ण स्थापना जे मैथिली कोनो समृद्ध भाषा नहि थिक आ एकर कोनो विशिष्ट कवि नहि अछि, तकरा विखण्डित करैत बीम्स (१८७२), केलौग, हार्नले (१८८०) आ अन्ततः ग्रियर्सन (१८८१) कोना मैथिलीकेँ स्वतन्त्र भाषाक रूपमे प्रतिष्ठित कएलनि, तकर मूल अंग्रेजी साक्ष्य सोझाँ राखि लेखक देखबैत छथि जे प्रारम्भिक पश्चिमी अध्ययन मैथिलीक अध्ययन नहि, प्रशासनिक सुविधार्थ ‘नमूना-संकलन’ मात्र छल। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिएँ ई अध्याय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि — मैकालेक १८३५क टिप्पणी (‘जाहि भाषाकेँ केओ बिना सरकारी पाइक पढ़बा लेल तैयार नहि, ताहि पर खर्च किएक’) आ १८६४क ट्रेवेलियन-टिप्पणीक उद्धरणसँ स्पष्ट होइत अछि जे भाषा-नीति उपनिवेशक उपयोगिताक दासी छल। ‘बिहारी अस्मिताक पहिल उद्भावक जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन छलाह’ — ई व्यंग्य-गर्भित स्थापना नव-इतिहासवादी सूझक उदाहरण थिक, जे नामकरणक राजनीतिकेँ अस्मिताक राजनीतिसँ जोड़ैत अछि। ग्रियर्सन एहिठाम द्वैध व्यक्तित्वक रूपमे उपस्थित होइत छथि : एक दिस हुनकर सर्वेक्षण मैथिलीकेँ स्वतन्त्र पहचान दैत अछि आ हिन्दीक छायासँ मुक्त करबाक दिशामे मैथिलीक स्वतन्त्र ध्वनि-संरचना ओ क्रिया-रूपावलीकेँ प्रामाणिकता दैत अछि; दोसर दिस ‘बिहारी’ सन सामूहिक नाम औपनिवेशिक प्रशासनक सुविधानुसार भाषिक विविधताकेँ एक खाँचामे राखैत अछि।
अध्यायक प्रमुख उपलब्धि ई अछि जे लेखक भाषा-विकासकेँ केवल व्याकरण-लेखनक इतिहास नहि मानैत छथि। ओ कार्यभार आ कार्य-पारदर्शिताक समाजभाषावैज्ञानिक कसौटीसँ मैथिलीक ह्रासक व्याख्या करैत छथि — जाहि भाषाक प्रयोग प्रशासन, शिक्षा, न्याय, व्यापार आ सार्वजनिक जीवनमे घटैत अछि, ओकर सामाजिक सामर्थ्य सेहो घटैत अछि। कर्णाट-शासनमे मैथिलीक राजकाजक भाषा रहबाक अभिलेखीय प्रमाण, नेपालक राजकीय अभिलेख, तथा भोलालाल दासकेँ कहल गेल ओ प्रसिद्ध वाक्य (‘मैथिलीकेँ स्वीकृत कएने मिथिला जीबि उठत…’) — ई सभ बिहार-निर्माणक राजनीतिक अन्तर्कथाकेँ उघारैत अछि। पारम्परिक आ शिक्षाशास्त्रीय व्याकरणक भेद तथा शिक्षाशास्त्रीय व्याकरणक पाँच स्तरक विवेचन मैथिलीमे प्रायः पहिल बेर एतेक व्यवस्थित रूपमे आएल अछि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ ई अध्याय विशेष महत्त्वपूर्ण अछि, कारण भाषा-इतिहासकेँ राजकीय मान्यतासँ नहि, शिलालेख, लोकव्यवहार, व्याकरण-लेखन आ सांस्कृतिक विस्तारसँ जोड़ल गेल अछि — भाषा राजनीतिक सीमा पार करैत एक सभ्यतागत प्रवाह बनि जाइत अछि।
३.२ रमानाथ झा आ मिथिला भाषा
संग्रहक मेरुदण्ड ई दीर्घतम निबन्ध प्रत्यालोचनाक प्रतिमान थिक। आचार्य रमानाथ झाक जन्मशतवार्षिकी (१९०६–२००६)क बहन्ने हुनका पर जीवन-काल आ मरणोपरान्त लगाओल गेल आरोपक ‘टाल’क अभिलेखीय परीक्षण कएल गेल अछि। शशिनाथ चौधरीक १९३२क परिषद्-प्रतिवेदन सन दुर्लभ साक्ष्यसँ ई सिद्ध कएल गेल जे पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृति-सम्बन्धी षड्यन्त्रक आरोप तथ्य-सम्मत नहि अछि। चन्दा झाक मिथिला भाषा रामायणक चारिम संस्करणसँ रमानाथ झाक आधा पृष्ठक ’क्षमा-प्रार्थना’ छाँटि देबाक प्रसंग, आ ओकर तुलना सोवियत ’व्यक्तिपूजा’क आरोपमे नेताक शवकेँ समाधिसँ उपाड़बाक घटनासँ — ई प्रत्यालोचनाक तीक्ष्णतम क्षण थिक, जतऽ स्थानीय साहित्यिक राजनीति विश्व-इतिहासक आलोकमे अर्थवान भऽ जाइत अछि।
निबन्धक उत्तरार्धमे रमानाथ झाक अवदानक — अध्यापन, पाठ्यक्रम-निर्माण, अनुसन्धान, भाषा-मान्यता, सम्पादन आ साहित्येतिहास — क व्यवस्थित पुनर्पाठ अछि। रमानाथ झाकेँ मैथिली आलोचनाक केन्द्र-स्तम्भ मानैत रमणजी मिथिला भाषाक प्राचीनताक पाँच ऐतिहासिक साक्ष्यक उल्लेख करैत छथि : कालिदासक विक्रमोर्वशीयक दोहा, प्राकृत पैंगलक वर्णवृत्त, नेपालसँ प्राप्त सहजपन्थी सिद्ध लोकनिक चर्यापद, डाकवचन, आ अवहट्टमे विद्यापतिक रचना। बुद्धवचन-महावीरवचन-अर्धमागधीक विवेचनसँ विदेह जनपदक भाषाक सातत्य, तिरहुता लिपिक व्याप्ति, मानकीकरणक इतिहासमे पण्डित जीवनाथ रायक चिन्ता आ महाराज लक्ष्मीश्वर सिंहक १८८०क ओ ऐतिहासिक आदेश जाहिसँ देवनागरी आ हिन्दीकेँ राजकाजमे प्रवेश भेटलैक आ अन्ततः तिरहुता (मिथिलाक्षर) लिपिक विस्थापन भेल — ई सभ प्रसंग अध्यायकेँ भाषा-राजनीतिक दस्तावेज बना दैत अछि। सभसँ मौलिक अछि हाउगेन आ फर्गुसनक भाषा-प्रबन्धन सिद्धान्तक चारि चरण (चयन, संहिताकरण, प्रकार्य-विस्तार, ग्राह्यता)क कसौटी पर रमानाथ झाक कार्यक पुनर्मूल्याङ्कन — ई देखाएब जे जाहि शास्त्रक जन्महुँ नहि भेल छल, ताहि शास्त्रक प्रक्रियाक अनुरूप रमानाथ झा मैथिलीक भाषा-नियोजन कऽ गेलाह। बहुवाचिकता (द्विभाषिक स्तर-भेद)क अवधारणासँ मैथिल समाजक भाषिक यथार्थक व्याख्या समाजभाषाविज्ञानक मैथिलीमे सफल अवतरण थिक।
भारतीय परम्परामे आलोचककेँ ‘सहृदय’ कहल गेल अछि; एहि अध्यायमे रमणजी सहृदयताक अर्थ अन्धप्रशंसा नहि, ऐतिहासिक न्याय मानैत छथि। हुनकर आग्रह अछि जे व्यक्तिक योगदानक मूल्याङ्कन ओकर समय, संस्थागत कठिनाइ आ उपलब्ध साधनक आधारपर हो। पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टिसँ ई अध्याय देखबैत अछि जे एके व्यक्तित्वक मूल्याङ्कन विभिन्न पीढ़ी अलग-अलग ढङ्गसँ करैत अछि — संस्थापक पीढ़ीक श्रम पछिला पीढ़ीक लेल सामान्य सुविधा बनि जाइत अछि, फलतः मूल संघर्ष विस्मृत भऽ जाइत अछि। विदेह समान्तर इतिहासक स्तरपर अध्याय ई प्रश्न उठबैत अछि जे मैथिली भाषा-साहित्यक संस्थागत निर्माण केना भेल : विश्वविद्यालय, पाठ्यक्रम, साहित्यिक संस्था आ व्यक्तिगत विद्वत्ता एक-दोसरसँ जुड़ल छल; अतः साहित्यिक इतिहास केवल प्रकाशित रचनाक इतिहास नहि, संस्था-निर्माणक इतिहास सेहो अछि।
३.३ प्रत्यालोचक किरणजी
ई निबन्ध ‘प्रत्यालोचना’ पदकेँ मैथिली आलोचना-शास्त्रमे सैद्धान्तिक प्रतिष्ठा दैत अछि — आलोचनाक आलोचना, जे लेखकक अनुसार समाजक वैचारिक गतिशीलता आ जीवन्तताक लक्षण थिक। डा. काञ्चीनाथ झा ’किरण’क आलोचकीय व्यक्तित्वक त्रिविध विश्लेषण (लोक आलोचक, साहित्यिक आलोचक, प्रत्यालोचक) आ रचनाकारक तीन कोटिक वर्गीकरण (युगातीत, युगानुगामी, सचेत विपक्षी) पद्धति-सजग आलोचनाक परिचायक अछि। किरणजीक नव स्थापना सभक — वर्णरत्नाकर काव्य-ग्रन्थ थिक, लोकसाहित्य शिष्ट-साहित्यसँ पैघ, विद्यापति स्वाधीनताकामी सेनानी, तथा चन्दा झाक स्थान पर अकाली कवि फतूर लाल नवयुगक प्रवर्तक — सहृदय प्रस्तुतिक संगहि हुनक अन्तर्विरोधक निर्मम उद्घाटन सेहो अछि : जे किरणजी रमानाथ झाक राधाकृष्ण-विषयक मतक तीव्र खण्डन करैत छथि, वैह अन्यत्र विद्यापतिक नायिकाकेँ राजदरबारी संस्कारक कल्पित पात्र कहि प्रकारान्तरसँ ओही मतक समर्थन कऽ दैत छथि। कुलानन्द मिश्रक चन्द्रग्रहण-टिप्पणीक प्रसंगमे लेखकक ई सूत्र-वाक्य आलोचना-नीतिशास्त्रक निष्कर्ष जकाँ अछि जे कृतिमे व्यक्त विचारक विवेचन ने भक्त जकाँ हो, ने अपन मतवादकेँ रचनाकार पर आरोपित करैत।
किरणजी जाति, रूढ़ि, अन्धविश्वास, श्रमक अवमानना आ सामाजिक विषमताक विरुद्ध आलोचनात्मक स्वर उठबैत छथि; ’पराशर’क माध्यमसँ श्रम, भूख, जातीय विभाजन, धार्मिक आडम्बर आ स्त्री-पुरुष सम्बन्धक प्रश्न उठाओल गेल अछि, जे आभिजात्य पण्डित-समाजक कौलीनता आ पाँजि-व्यवस्थापर कठोर प्रहार थिक। भारतीय दृष्टिसँ किरणजीक आलोचना लोकमंगलवादी अछि — हुनका लेल साहित्यक श्रेष्ठता ओकर सामाजिक उत्तरदायित्वसँ पृथक नहि। पाश्चात्य मार्क्सवादी दृष्टिसँ हुनकर विचार सामाजिक उत्पादन, श्रम आ प्रभुत्वशाली वर्गक आलोचनासँ जुड़ैत अछि; दलित दृष्टिसँ ओ शास्त्रीय पात्रकेँ निम्नवर्गीय अनुभवक आलोकमे पुनः लिखैत छथि। ’मैथिल आँखि’क अवधारणा एहि अध्यायक मौलिक सूत्र अछि, जकरा ’गुलामी नजरि’क विरुद्ध संघर्षक रूपमे राखल गेल अछि — एकर अर्थ संकीर्ण प्रादेशिकता नहि, अपन भाषिक-सांस्कृतिक अनुभवक आधारपर विश्वकेँ देखब। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिमे ई स्थानीय ज्ञानक पुनर्प्रतिष्ठा आ स्थापित संभ्रान्तवादी इतिहास-लेखनक विरुद्ध निम्नवर्गीय प्रतिरोधक स्वर थिक।
३.४ अपेक्षिताक आँखि छोड़ि, उपेक्षितक आँखिसँ कन्यादान पढ़ल जाए
ई संग्रहक सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण अध्यायमे सँ एक थिक आ अभिग्रहण-सौन्दर्यशास्त्र (पाठक-अनुक्रिया सिद्धान्त)क मैथिलीमे विरल प्रयोग। हरिमोहन झाक पाठकक तीन श्रेणी — मनोरंजनार्थी, हनुमान-चालीसा-भक्त, आ समाज-कथा बूझि पढ़निहार — क विभाजन कऽ लेखक ई देखबैत छथि जे कृतिक अर्थ पाठक-दृष्टिसँ निर्मित होइत अछि। तखन दृष्टि-परिवर्तनक प्रस्ताव अबैत अछि : अपेक्षिता (सी. सी. मिश्र सन शिक्षित वर)क आँखि छोड़ि उपेक्षिता बुच्ची दाइक आँखिसँ उपन्यास पढ़ल जाए। ई नारी-विमर्शक ओ पद्धति थिक जे केन्द्रकेँ हटा हाशियाकेँ केन्द्र बनबैत अछि। प्रचलित हास्यप्रधान पाठकेँ छोड़ि लेखक बुच्ची दाइक मौन, अशिक्षा, भय आ सांस्कृतिक विस्थापनकेँ केन्द्र बनबैत छथि — प्रश्न ई अछि जे बुच्ची दाइ बजैत किएक नहि छथि, हुनकर जीवनक निर्णय दोसर लोक किएक करैत अछि, आ शिक्षित समाज हुनकर मौनक लेल कतेक उत्तरदायी अछि। बुच्ची दाइक निरक्षरता लेल ओ व्यक्तिकेँ नहि, समाजक ’संरचनात्मक निर्माणक दोष’केँ उत्तरदायी मानैत छथि।
सभसँ बलगर पक्ष अछि अभिलेख-प्रथम प्रमाण : जनसीदनक यशोदा (जे रामायण बाँचि लैत अछि), रासबिहारी लाल दासक सुमति, पुण्यानन्द झाक योगमाया, पुलकित मिश्रक मोहिनी — कन्यादानसँ पूर्वक मैथिली उपन्यासक नारी-पात्र निरक्षर नहि, साक्षर छलीह। एहि तथ्य-शृंखलासँ ई क्रान्तिकारी स्थापना निकलैत अछि जे स्त्री-शिक्षाक प्रश्न पर हरिमोहन झा अपन पूर्ववर्ती औपन्यासिक परम्परासँ आगाँ नहि, पाछाँ छथि। मिथिला दर्पणक योगानन्द आ कन्यादानक सी. सी. मिश्रक तुलना, तथा ’अबोधक अपंगताक दोषी अबोध स्वयं की ओकर समाज?’क प्रश्न मानवीय गरिमाक कसौटी पर हास्यक औचित्य-परीक्षा थिक। भाषिक दृष्टिसँ अध्यायक सूक्ष्म निष्कर्ष ई अछि जे शहराती पति आ ग्रामीण पत्नी एके सांस्कृतिक-भाषिक धरातलपर नहि छथि — पतिद्वारा हिन्दीमे संवाद करब स्त्रीक मौनकेँ आरो गाढ़ करैत अछि। नारीवादी आलोचनासँ ई पुनर्पाठ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि : विवाहक हास्यक आवरणक भीतर स्त्रीक वस्तुकरण, भाषिक असमानता, शिक्षा-वञ्चना आ पितृसत्तात्मक नियन्त्रण अछि; बुच्ची दाइ केवल पात्र नहि, अशिक्षित मैथिल कन्याक प्रतीक बनि जाइत छथि। ध्वनि-सिद्धान्तक आलोकमे उपन्यासक हास्यक पाछाँ करुण ध्वनि सुनाइत अछि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ ई अध्याय प्रतिष्ठित हास्यकृतिक भीतर दबाओल स्त्री-इतिहासकेँ पुनः दृश्य बनबैत अछि।
३.५ अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह
ई अध्याय विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिक बीज-पद्धतिक श्रेष्ठ उदाहरण थिक — ‘अनालोचित’क पुनर्वास। पत्र-पत्रिकामे छिड़िआएल कविताकेँ ’झोड़ि’ कऽ लेखक एक विस्मृत कविक काव्य-संसारक पुनर्निर्माण करैत छथि आ हुनका राष्ट्रीय चेतना, मिथिला-बोध, सामाजिक सुधार, स्त्री-दुःख, बाढ़ि, शोषण आ सांस्कृतिक संकटक कविक रूपमे प्रस्तुत करैत छथि। स्वयं लेखक स्वीकार करैत छथि जे सम्पूर्ण रचनावली उपलब्ध नहि रहने ई आरम्भिक अनुसन्धान अछि। ‘शरदागम’क व्याख्या ध्वनि-सिद्धान्तक व्यावहारिक प्रयोग थिक — पावसक प्रयाण, फुलाएल कास, थीर सरोवर आ विवश पुरन्दरमे १९३५क शासन-सुधार आ जन-आक्रोशक व्यंग्यार्थक उद्घाटन; प्रकृति-वर्णनक अभिधाक भीतर राजनीतिक व्यञ्जनाक ई पाठ आनन्दवर्धनक ’अर्थान्तर-संक्रमित’ ध्वनिक जीवन्त निदर्शन थिक। ‘पछबा’ कविताक विश्लेषणमे पश्चिमी भाषा-संस्कृतिक धुक्कड़सँ भारतीय शब्द-सम्पदाक झड़बाक जे प्रतीक-योजना देखाओल गेल अछि, से सांस्कृतिक साम्राज्यवादक पूर्वाभास जकाँ अछि आ अन्तिम अध्यायसँ एहि निबन्धकेँ जोड़ि दैत अछि — ‘पछबा’ केवल हवा नहि, पाश्चात्य सांस्कृतिक दबावक प्रतीक बनैत अछि, आ शरदागमन औपनिवेशिक शासनक क्षीणताक सङ्केत। ‘नोत पूरब’ सन सांस्कृतिक सन्दर्भ-गर्भित शब्दक टीका, विधवा-विलापक करुण चित्र, आ बाढ़ि-भूकम्पक द्वैध त्रासदीक कवि-साक्ष्य — सभ मिलि एक ‘निरपेक्ष’ किन्तु मैथिली-पक्षधर कविक मूर्ति गढ़ैत अछि। नव-इतिहासवादी दृष्टिसँ कविताकेँ स्वतन्त्र सौन्दर्य-वस्तु नहि, स्वतन्त्रता आन्दोलन, विभाजन, सामाजिक सुधार, बाढ़ि आ सांस्कृतिक संस्थाक गतिविधिसँ जोड़ल गेल अछि; करुण रस विधवा, बाढ़िपीड़ित आ उपेक्षित मिथिलाक चित्रणमे प्रखर होइत अछि। प्रतिष्ठित साहित्येतिहास जाहि कविक पोथी उपलब्ध नहि रहने हुनका पार्श्वमे छोड़ि दैत अछि, रमणजी पत्र-पत्रिकामे बिखरल सामग्रीक आधारपर हुनकर वैकल्पिक साहित्यिक जीवनचरित निर्मित करैत छथि — विस्मृत लेखकक पुनरुद्धारक आदर्श उदाहरण।
३.६ यात्रीक भाषा : शब्दचयन एवं शब्दनिर्माण
शैलीविज्ञानक चारि उपकरण — चयन, विचलन, समानान्तरता आ अप्रस्तुत-विधान — क सहारे वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ (नागार्जुन)क काव्य-भाषाक ई विश्लेषण संग्रहक सर्वाधिक शास्त्र-सम्पन्न आ व्यवस्थित भाषिक अध्याय थिक। यात्रीक काव्यभाषामे देशज, तत्सम, तद्भव आ आगन्तुक शब्दक सर्जनात्मक मेल देखाओल गेल अछि — ‘अपरोजक’ (नाभिपद्मसम्भूत विधाता लेल), ‘ऊत्तुंग खोपा’, ‘तपोवनी’ सन देशी-अनदेशी शब्दक संकर-निर्माण, आ ‘दलकब’ क्रियाक अर्थ-व्यञ्जकताक पद-परीक्षा। प्रत्येक स्थल पर लेखक देखबैत छथि जे पर्यायवाचीमे सँ एकहि शब्द किएक अनिवार्य अछि : एक शब्दक चयन मात्र अर्थ नहि, पात्रक सामाजिक स्थिति, वक्ताक मनोदशा, व्यङ्ग्य आ सांस्कृतिक स्मृतिकेँ व्यक्त करैत अछि। ई विवेचन कुन्तकक वर्ण-विन्यास-वक्रता आ पद-पूर्वार्ध-वक्रताक आधुनिक रूपान्तर जकाँ अछि, आ ’विचलन’क अवधारणा ’निरंकुशाः कवयः’क शास्त्रीय अनुमतिसँ जोड़ल गेल अछि — पूर्व-पश्चिमक ई सेतु-बन्ध दुर्लभ अछि। वक्रोक्ति-सिद्धान्तक दृष्टिसँ व्याकरणिक क्रमक विचलन, असामान्य संयोग आ नूतन शब्दनिर्माण भाषाकेँ सामान्य सूचना-साधनसँ काव्यात्मक अनुभवमे बदलैत अछि; ध्वनि-सिद्धान्तक अनुसार शब्दक कोशगत अर्थसँ अधिक ओकर प्रसङ्गगत व्यञ्जना महत्त्वपूर्ण होइत अछि। गौरी, कार्तिक, गणेश, लक्ष्मी सन पौराणिक पात्रक कोश-स्वीकृत अर्थसँ फराक नव-सन्दर्भीकरणक विश्लेषण, कंकाल-शृंखला आ मामा-गीतमे समानान्तरताक प्रयोग, अप्रस्तुत विधानमे सादृश्य, मानवीकरण आ इन्द्रियबोधक चित्र — सभ यात्री-काव्यक भाषिक वैलक्षण्यक प्रामाणिक कुंजी थिक। यात्रीक ’भाषाक भूगोल’क अवधारणा उल्लेखनीय अछि — कवि अपन भाषा-क्षेत्रक वस्तु, श्रम, रीति, मिथक आ बोलचालसँ परिचित छथि, तेँ हुनकर शब्द केवल सजावट नहि, जीवित जनजीवनक वाहक अछि। यात्रीक भाषा आभिजात्य संस्कृतनिष्ठ मैथिलीक विरुद्ध जनपदीय बहुस्वरताक प्रकटीकरण सेहो थिक।
३.७ मनमोहन झाक कथाक अनालोचित पक्ष
करुणाक कथाकारक रूपमे प्रतिष्ठित मनमोहन झाक कथा-साहित्यक सर्वथा अनालोचित पक्ष — भारतीय राष्ट्रीयता आ मैथिल उपराष्ट्रीयता — क उद्घाटन एहि लघु निबन्धक उपलब्धि थिक। पटना सचिवालय-गोलीकाण्ड (१९४२)क पृष्ठभूमि पर लिखल ‘आहत आत्मा’क नरेन्द्र बाबू, ताजमहलक वैभवक नीचाँ दबल श्रमिक-वेदनाक कथा, ’वीरभोग्या’, ’सप्तपदी’क महाश्वेता आ ’मीनाक्षी’क बलिदान — ई सभ देखबैत अछि जे करुणाक अन्तःसलिला धारक भीतर राष्ट्र-प्रेम आ मिथिला-संस्कृतिक रक्षाक दृढ़ स्वर बहैत अछि। रस-दृष्टिसँ करुण आ वीर रसक समन्वय एहि कथाक मूल शक्ति अछि — पात्रक व्यक्तिगत प्रेम राष्ट्र, मातृभूमि अथवा सांस्कृतिक अस्मिताक लेल त्यागमे परिणत होइत अछि। नव-इतिहासवादी दृष्टिसँ कथाक भावभूमि स्वतन्त्रता आन्दोलन, विदेशी आक्रमण आ मिथिलाक सांस्कृतिक स्मृतिसँ निर्मित अछि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ मिथिला भारतीय राष्ट्रक विरोधी नहि, ओकर भीतर विशिष्ट सांस्कृतिक इकाई अछि — एहि कारण मैथिल उपराष्ट्रीयता विखण्डन नहि, बहुस्तरीय भारतीयताक रूप बनैत अछि। मनमोहन झाक निधन (२००९)क दसम दिनक भीतर लिखल ई आलेख श्रद्धांजलि आ आलोचनाक मर्यादित संगम थिक।
३.८ मैथिली पत्रकारिताक विकासमे प्रवासीक योगदान
पत्रकारिताक परिभाषा (निर्धारित लक्ष्यक अनुरूप पाठ्य-सामग्रीक निष्पक्ष प्रसार)सँ आरम्भ कऽ लेखक पत्र, पत्रकार आ पत्रकारिताक बीच अन्तर स्पष्ट करैत छथि। हुनकर प्रश्न अछि — मैथिलीमे नियमित, आर्थिक रूपसँ आत्मनिर्भर समाचार-पत्र परम्परा सीमित रहने ‘पत्रकारिता’ शब्दक अर्थ कोना निर्धारित हो? प्रवासी-निवासीक विधिक कसौटी (विदेशी मुद्रा विनिमय अधिनियम)क सोझाँ ओ सांस्कृतिक मिथिलाक अखण्डताक तर्क रखैत छथि — नेपाल-तराइ आ भारतीय मिथिलाक बीच युग-युगक अविच्छिन्न सांस्कृतिक एकसूत्रताक आगाँ राजनीतिक सीमा गौण। प्रवासी मैथिल लोकनि द्वारा जयपुरसँ प्रकाशित ‘मैथिल-हितसाधन’ (१९०५) आ बनारससँ प्रकाशित ‘मिथिलामोद’ (१९०५) सामाजिक शिक्षा, स्त्रीशिक्षा, रूढ़िविरोध, भाषा-संवर्धन आ निर्भीक सम्पादकीय दृष्टिक वाहक बनल; एहि पत्रिका सभक उद्गार-उद्धरण सहित विवेचन ऐतिहासिक दृष्टिएँ बहुमूल्य अछि। सभसँ सूक्ष्म अछि ज्ञान-समाजशास्त्रीय ई विश्लेषण जे सम्पादकीय निर्भीकताक सामाजिक आधार की छल — विद्यावाचस्पति मधुसूदन ओझा आ मम मुरलीधर झा तत्कालीन सत्ता-केन्द्र दरभंगा पर आश्रित नहि छलाह, तेँ स्पष्टवादिता सम्भव भेल। सार्वजनिक क्षेत्रक सिद्धान्तसँ ई पत्र-पत्रिका समाजक वैचारिक संवाद-मञ्च बनैत अछि — मिथिलाक भीतर जे प्रश्न उठाएब कठिन छल, प्रवासक अपेक्षाकृत स्वतन्त्र वातावरणमे ओ प्रश्न निर्भीकतासँ उठल। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ प्रवास सीमा-बाहरक अवस्था नहि, मिथिलाक विस्तृत सांस्कृतिक परिधि अछि — जयपुर, बनारस, अजमेर, कलकत्ता, दिल्ली, नेपाल आदि स्थान मैथिली चेतनाक वैकल्पिक केन्द्र बनैत अछि। पत्रकारिताकेँ आजीविका आ व्यवसायक कसौटीसँ फराक कऽ देखबाक प्रस्ताव मैथिली पत्रकारिताक इतिहास-लेखन लेल एक वैकल्पिक (समान्तर) ढाँचा प्रस्तुत करैत अछि।
३.९ मैथिली लोकगाथामे दीनाभद्री
ई अध्याय पाठालोचन-शास्त्र आ निम्नवर्गीय विमर्शक संगम-स्थल थिक। ग्रियर्सन-संकलित गीत दीनाभद्री (१८८५)केँ मूल-स्रोतक प्रतिष्ठा दैत लेखक ई मार्मिक प्रश्न उठबैत छथि जे परवर्ती विद्वान् अपन-अपन व्यक्तिगत संकलनकेँ आधार बना लिखैत गेलाह, मुदा मूल पाठ आ अपन पाठक अन्तरक हिसाब केओ नहि देलनि — ई साहित्यिक अराजकता थिक; ग्रियर्सनक संकलनकेँ उपेक्षित राखि ‘मूल गाथा अप्रकाशित’ कहब ऐतिहासिक रूपसँ अनुचित अछि। दुनू पाठक तुलनात्मक अध्ययन (सात बनाम तेरह अध्याय, गुलामी जटक भूमिका-भेद, स्वाधीनताक बाद दीनाभद्रीक मुहमे अंग्रेजी शब्दक प्रवेश) लोकगाथाक ‘लोच’-सिद्धान्तक प्रामाणिक निदर्शन थिक — लोककण्ठमे रहैत गाथा वाचक, काल आ श्रोताक अनुसार बदलैत रहैत अछि, आ इएह लोच ओकर जीवनी-शक्ति थिक।
दीना आ भद्री मुसहर जातिक वीर भ्रातृद्वय छथि; जोरावर सिंहक सामन्ती अत्याचारक विरुद्ध हुनक विद्रोह, शौर्य, भ्रातृ-प्रेम, पंचायती लोकतन्त्रमे आस्था (‘पंचसँ निसाफ’) आ शोषक-प्रतिकारक विश्लेषण देखबैत अछि जे नायकत्वक समस्त शास्त्रीय गुण दलित समाजोमे वर्तमान छल — ई स्थापना राजकुल-केन्द्रित नायकत्व-सिद्धान्तक प्रति-कथन थिक। लोकगाथामे जातीय उत्पीड़न, सामाजिक विषमता, साहस, न्याय आ सामुदायिक स्मृति संरक्षित अछि; लोकनायकक महत्ता राजकीय पदसँ नहि, पीड़ित समुदायक रक्षा आ आत्मसम्मानसँ निर्धारित होइत अछि। दलित आलोचनासँ ई अध्याय विशेष उल्लेखनीय अछि — मुख्य इतिहास जाहि समुदायकेँ इतिहासहीन मानैत अछि, ओकर लोकगाथा स्वयं इतिहासक वैकल्पिक अभिलेख बनि जाइत अछि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिमे दीनाभद्री राजदरबारक नायक नहि, लोककण्ठक नायक छथि — एहि परिवर्तनसँ साहित्यिक आ राजनीतिक स्थानक पुनर्वितरण होइत अछि, आ लोकगाथाक वर्तमान राजनीतिक अवकाश-निर्माणमे भूमिकाक संकेत एकरा समकालीन विमर्शसँ जोड़ैत अछि।
३.१० मैथिली कथाक विकास : किछु नव तथ्य
नव-इतिहासवादी पुनर्लेखनक ई श्रेष्ठ उदाहरण थिक। स्थापित मान्यता — चन्दा झाकृत पुरुषपरीक्षाक अनुवाद (१८८९) मैथिली कथाक प्रस्थान-बिन्दु — क खण्डन तीन कसौटी पर कएल गेल अछि : अनुवादक प्रचार-प्रसारक तत्कालीन असम्भाव्यता, शब्दानुवादक अनाकर्षक भाषा (जयकान्त मिश्र आ रमानाथ झाक साक्ष्य सहित), आ प्रभावित वर्गक अव्यावहारिकता (संस्कृतक अधीत विद्वान् अनुवादसँ प्रेरित किएक होएताह?)। तकर विकल्पमे लेखक मैथिली कथाक आरम्भ केवल मुद्रित आधुनिक कथासँ मानबाक विरोध करैत छथि : ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकरमे चौंसठि कलामे परिगणित ‘कथाकौशल’, व्रतकथाक तेसर धारा (मधुश्रावणी, सिरता-बिसता)क वाचिक परम्परा, लोककथा, हास्य-व्यङ्ग्य आ मौखिक आख्यानक दीर्घ परम्पराकेँ आधुनिक कथाक पूर्वपीठिका मानल गेल अछि। रचनात्मक उपलब्धि ई अछि जे लेखक कथा आ कथाकौशलमे भेद करैत छथि — कथ्य एक वस्तु अछि; श्रोताकेँ बान्हि रखबाक भाषा, गति, स्वर, संवाद आ प्रस्तुति दोसर। एहि दृष्टिसँ मौखिक साहित्य अपरिपक्व नहि, अपन स्वतन्त्र सौन्दर्यशास्त्रवाला विधा अछि।
श्रीकृष्ण ठाकुरक चन्द्रप्रभा (रचना १८८०क दशक धरि, प्रकाशन १९३९)केँ मैथिलीक पहिल मौलिक कथाक प्रस्थान-बिन्दु मानबाक प्रस्ताव, ‘चन्द्रभागा’क स्थानपर ’चन्द्रप्रभा’ नामक शुद्धि, ’विलक्षण दाम्पत्य’क विधागत पुनर्निर्धारण आ ’मदनराज चरित’क काल-सम्बन्धी प्रश्न अध्यायक शोधपरक उपलब्धि अछि। चन्द्रप्रभाक रसधज-राजाक कथाक व्याख्या — प्रजापीड़क शासकक विरुद्ध प्रजाक असहयोग आ पलायन — मे १८५७क असफलताक बादक जन-आक्रोशक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति देखब, फूलबाड़ी आ मालीक प्रतीकक माध्यमसँ प्रजा आ शासनक सम्बन्ध पढ़ब, तथा विद्यासिन्धुक बेंग-कथा (इन्द्र-पृथ्वी-बेंग)मे औपनिवेशिक शोषण आ सत्याग्रही प्रतिरोधक रूपक पढ़ब — ई साहित्य आ इतिहासक पारस्परिक पाठक (नव-इतिहासवादक मूल प्रविधिक) सुन्दर प्रयोग थिक; ध्वनि-दृष्टिसँ राजकथा औपनिवेशिक आ सामन्ती अत्याचारक आलोचना बनि जाइत अछि।
३.११ मैथिली कवितामे मिथिलाक भूकम्प
प्रकृतिक उद्दीपक रूपक वर्णन-बहुल मैथिली काव्य-परम्परामे ध्वंसक रूपक उपेक्षाक सैद्धान्तिक प्रश्नसँ ई निबन्ध खुजैत अछि। एहिमे सन् १९३४ आ १९८८क भूकम्पक काव्यात्मक अभिलेखक अध्ययन अछि। कविवर सीताराम झाक ‘भूकम्प वर्णन’ आ कृष्णनन्दन सिंहक ’कम्पकारिका’क तुलनात्मक अध्ययनमे कम्पकारिकाक ऐतिहासिक प्रलेख-मूल्य (भूकम्प-पूर्व मिथिलाक राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक स्थिति सहित) रेखांकित कएल गेल अछि — ई केवल विनाश-वर्णन नहि, तत्कालीन मिथिलाक राजनीति, अर्थव्यवस्था, भ्रष्टाचार, वस्तु-मूल्य आ पुनर्निर्माणक काव्यात्मक दस्तावेज थिक। अठारह वर्षक वयसमे भोगल त्रासकेँ अड़तीस वर्ष धरि स्मृतिमे जिआ कऽ काव्यबद्ध करबाक मनोवैज्ञानिक टिप्पणी, दरभंगा अस्पताल आ चतुर्भुज स्थानक करुण-व्यंग्य-मिश्रित चित्र, तथा १९८८क भूकम्प-काव्य-संकलनसँ यात्री, चन्द्रभानु सिंह, धीरेन्द्र आ जीवकान्तक साक्ष्य — सभ मिलि आपदा-साहित्यक एक लघु इतिहास बनि जाइत अछि। धीरेन्द्रक पाँतीमे विपत्तिमे मनुजताक एक भऽ जएबाक निरीक्षण करुण-रसक सामाजिक परिणतिक सूचक थिक।
करुण आ भयानक रसक संयोजन एहि अध्यायक केन्द्र अछि। घर, अस्पताल, मन्दिर, बाजार, राजभवन, गरीबक झोपड़ी — सभ विनाशक समान परिधिमे आबि जाइत अछि, मुदा समान प्राकृतिक आघातक सामाजिक परिणाम असमान होइत अछि। पर्यावरणीय आलोचनासँ प्राकृतिक घटना आ सामाजिक निर्मितिक अन्तर स्पष्ट होइत अछि — भूकम्प प्राकृतिक अछि, मुदा कमजोर भवन, सरकारी उपेक्षा, असमान संसाधन आ राहतक राजनीति मानवीय निर्णयक परिणाम अछि। विदेह समान्तर इतिहासमे विपत्ति साहित्यिक इतिहासक वैध विषय बनैत अछि।
३.१२ कथी लऽ लगेलिऐ हे कोसी माइ
बाढ़ि-साहित्यक ई प्रवृत्ति-सर्वेक्षण आरसी प्रसाद सिंहक हाकरोससँ आरम्भ भऽ चन्दा झा, यात्री (कौशिकीक धार), लक्ष्मीपति सिंह, चन्द्रभानु सिंह, सियाराम झा ‘सरस’ आ सुकान्त सोम धरि पसरल अछि। एहि अध्यायमे कोसी आ मिथिलाक अन्य नदी सभकेँ मातृरूप, जीवनदायिनी शक्ति आ विनाशकारी बाढ़ि — तीनू रूपमे देखल गेल अछि। ‘नदी मातृक क्षेत्र’क शास्त्रीय गौरव आ प्रतिवर्षक जल-प्रलय, भूख, विस्थापन, ऋण आ पलायनक यथार्थक बीचक विडम्बनाकेँ लेखक कोसी-माइक लोकगीतीय उपरागसँ जोड़ि दैत छथि — माइक प्रकोप मानि मनौती करैत लोक-मानसक चित्रण सांस्कृतिक अध्ययनक सामग्री थिक। कोसीक ’माइ’ रूप सांस्कृतिक आत्मीयता उत्पन्न करैत अछि, मुदा कवितामे एहि माइसँ प्रश्न सेहो कएल जाइत अछि — भक्ति आ प्रतिरोध एकसाथ उपस्थित अछि। सुकान्त सोमक कवितामे मन्त्रीक हवाई-सर्वेक्षणक व्यंग्य — सुखाएल बाँसक फट्ठी सन आकृति सभक ऊपर उड़ैत विमान आ अखबारमे एकटा हरियर मुस्काइत चेहरा — सत्ता-आलोचनाक तीक्ष्णतम उदाहरणक रूपमे उद्धृत अछि। राहत-सामग्रीक लूट, साँप-मूसक मिलन आ पारिस्थितिकीय क्षतिक प्रसंग बाढ़िकेँ प्राकृतिक आपदासँ आगाँ राजनीतिक-नैतिक प्रश्न बना दैत अछि। पर्यावरणीय आलोचनाक दृष्टिसँ ई अध्याय मनुष्यकेन्द्रित सीमा पार करैत पशु-पक्षी, बगुला, खेत, पोखरि, वनस्पति आ सम्पूर्ण जीव-मण्डलक त्रासदी देखबैत अछि; नदीक प्राकृतिक प्रवाह, बान्ह, तटबन्ध, राहत-व्यवस्था, सरकारी सर्वेक्षण आ भ्रष्टाचार एक जटिल राजनीतिक पर्यावरण बनबैत अछि। विदेह समान्तर इतिहासक दृष्टिसँ बाढ़ि मिथिलाक बाहरी दुर्घटना नहि, ओकर सामाजिक संरचना, लोकगीत, स्मृति, अर्थव्यवस्था आ पलायनक निर्णायक इतिहास अछि।
३.१३ मैथिली महाकाव्यमे युग-सन्दर्भ
पाँच महाकाव्य — सुभद्राहरण (मुंशी रघुनन्दन दास), राधाविरह (मधुप), अगस्त्यायनी (मार्कण्डेय प्रवासी), त्रिपुण्ड (धीरेन्द्र) आ पराशर (किरण) — क चयन पाँच युगीन प्रयोजनक आधार पर कएल गेल अछि : स्वाधीनता-संघर्ष, नारी-सशक्तीकरण, राष्ट्रीय भावात्मक एकता, श्रम-निष्ठ युवा-शक्ति आ मैथिल उपराष्ट्रीयता। पौराणिक कथानकक भीतर समकालीन इतिहास पढ़बाक ई पद्धति — जहलसँ पुत्रक पत्र पाबि लिखल सुभद्राहरणमे असहयोग आन्दोलनक कर-बहिष्कार, अगस्त्यायनीमे भाषा-विवादक समाधान रूपमे शिवक डमरूसँ तमिल-संस्कृतक युगपत् जन्म, पराशरमे ’अन्न थिक प्राण’क श्रम-घोष आ सीताक मुहेँ मिथिलाक लोकतन्त्री गौरव — रूपक-पाठ (अन्योक्ति-व्याख्या)क सफल प्रयोग थिक। नव-इतिहासवादी सिद्धान्तक अनुरूप पुराणक पात्र अपन प्राचीन समयमे बन्द नहि रहैत छथि : अर्जुन स्वतन्त्रता सेनानीक कर्तव्यबोधक प्रतीक बनैत छथि; राधा राष्ट्र आ समाज-सुधारमे स्त्रीक सहभागिताक स्वर बनैत छथि; अगस्त्य उत्तर-दक्षिण समन्वयक वाहक बनैत छथि; त्रिपुण्डमे शिव कृषक आ श्रमिक बनैत छथि; पराशरमे श्रम-प्रतिष्ठा, वर्णभेद-विरोध, भूखक समक्ष कर्मकाण्डक निरर्थकता आ मैथिली अस्मिता व्यक्त अछि। भारतीय काव्यशास्त्रक साधारणीकरण प्रक्रिया एहिठाम स्पष्ट अछि — पुराणक विशिष्ट पात्र आधुनिक जनक सामूहिक आकांक्षाक प्रतिनिधि बनैत छथि। रचना-काल आ प्रकाशन-कालक सावधान अभिलेखन एहि अध्यायकेँ इतिहास-लेखनक दृष्टिएँ सेहो प्रामाणिक बनबैत अछि।
३.१४ नऽव गीतमे समाज-चेतना
‘नऽव गीत’ पदक प्रवर्तन आ परिभाषा एहि निबन्धक सैद्धान्तिक योगदान थिक — ई वयोवर्गक नहि, मूल्यबोधक द्योतक; नवीन गीतक उपरान्त रचल सभटा गीत नऽव गीत नहि। नऽव गीत पारम्परिक रूढ़ कथ्य, मिथ्या गौरव, उपदेशात्मकता आ भावुक विलापसँ हटि आधुनिक सामाजिक विसङ्गति, औद्योगीकरण, महानगरीय त्रास, भूख, बेरोजगारी आ संघर्षकेँ लयात्मक रूप दैत अछि। यन्त्र-युगक उपज मानि एहिमे बुद्धि-तत्त्व आ भाव-तत्त्वक लयात्मक सम्मिश्रणक लक्षण-निर्धारण, आ प्राचीन गीतक गार्हस्थ्य शृंगार, चन्दा झाक भाव-विह्वलता, राष्ट्रीय चेतनावादी अतीत-गान तथा मंचीय तुकबन्दी — चारूसँ एकर सीमा-रेखा खीचब वर्गीकरण-शास्त्रक सुन्दर अभ्यास थिक। नऽव गीतमे बुद्धि आ भावना विरोधी नहि, परस्पर पूरक अछि; निजी दुःख सामूहिक सामाजिक संकटमे साधारणीकृत होइत अछि। गंगेश गुंजनक ’दूभिक पेंपी पर बड़क गाछ पतरब’क प्रतीक-व्याख्या — दलित-शोषितक नव चेतना पर प्रभु-वर्गक पसरब — मार्क्सवादी पाठक संयत प्रयोग थिक; बुद्धिनाथ मिश्रक जेठुआ मकइ आ मार्कण्डेय प्रवासीक फागुन-आह्वानक विश्लेषण नऽव गीतक वैविध्यकेँ प्रमाणित करैत अछि। बालुपर लिखल इतिहास, माटिक डिबिया जकाँ जरैत गाम — ई प्रतीक आधुनिक असमानताक तीव्र ध्वनि उत्पन्न करैत अछि। मार्क्सवादी दृष्टिसँ सुविधा-भोगी वर्ग, विफल विकास-योजना, महानगरक प्रभुत्व आ ग्रामीण दण्डक आलोचना अछि; रूपवादी दृष्टिसँ नूतन प्रतीक, खण्डित बिम्ब आ बोलचालक लय नऽव गीतक वैशिष्ट्य अछि। अध्याय नऽव गीतक विविधताकेँ कमजोरी नहि, जीवित विकासक प्रमाण मानैत अछि।
३.१५ मैथिली कविताक वर्तमान धारा
भुवनेश्वर-संगोष्ठी (२०१२)मे पठित ई आलेख रवीन्द्रनाथ आ सुब्रह्मण्यम भारतीक साक्ष्यसँ भारतीय सामासिक संस्कृतिक पट पर मागधी-प्राच्य परिवारक चारू सहोदरा (असमिया, ओड़िआ, बंगला, मैथिली)क साझा विरासत, विद्यापतिक प्रभाव आ औपनिवेशिक भाषा-सत्ताक इतिहासकेँ स्मरण करैत मैथिली कविताक चारि वर्तमान धाराक निर्धारण करैत अछि : मानवजाति पर आएल संकटक चिन्ता (जीवकान्तक युद्ध-जर्जर शताब्दीकेँ विदाइ), उपभोक्तावादी संस्कृतिक विरोध, सांस्कृतिक साम्राज्यवादक प्रतिरोध (सूचना-महापथ पर एकरेखीय विकासक मत्स्यन्याय), आ जैविक-सांस्कृतिक वैविध्यक क्षरण-चिन्ता (छओ बिगहा आठ कट्ठाक कलम-उजाड़ि, बगुलाक पलायन)। जीवकान्त आ उदयनारायण सिंह ’नचिकेता’क कविताक आलोकमे उपभोक्तावादी दानवताक विरुद्ध मानवक अस्तित्व आ सांस्कृतिक स्वायत्तताक संघर्ष विश्लेषित अछि। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिसँ सूचना-साधन, बजार, उच्च प्रौद्योगिकी आ सांस्कृतिक प्रभुत्वक सम्बन्ध उद्घाटित होइत अछि — एकर आशय ई नहि जे बाहरी संस्कृतिसँ सम्पर्क वर्जित हो, अपितु एकतरफा प्रभुत्व स्थानीय भाषा, लिपि, जीवन-पद्धति आ कल्पनाशक्तिकेँ समाप्त नहि करए। पर्यावरणीय दृष्टिसँ जैवविविधता, स्थानीय धान, आमक प्रजाति, पोखरि, बगुला आ प्राकृतिक आवासक विनाश आधुनिक कविताक चिन्ता बनैत अछि। आशबीक ’अपेक्षित बहुमुखता’क नियम — परिवेशसँ लड़बा लेल कमसँ कम ओतबे आन्तरिक वैविध्य चाही जतबा परिवेशमे अछि — क प्रयोग मैथिली आलोचनामे व्यवस्था-चिन्तनक प्रवेश थिक, आ ई अस्तित्व-रक्षाक प्रश्नकेँ भावुकतासँ निकालि विज्ञानक धरातल पर आनि दैत अछि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ मैथिली कविता भारत आ नेपालक साझा भाषिक जीवन, लोकज्ञान आ सांस्कृतिक बहुलताक रक्षा करैत प्रतिरोधक काव्य बनैत अछि।
३.१६ मैथिली लोकगीत : अवस्था एवं संरक्षण
जनकपुरधामक राष्ट्रीय संगोष्ठीमे कार्यपत्र पर टिप्पणी-रूपमे प्रस्तुत ई आलेख ’लोके च वेदे च’क शास्त्रीय समानान्तरतासँ लोक-प्रतिष्ठाक भारतीय आधार जोड़ैत अछि। आरम्भमे लेखक प्रस्तुत आलेखक परिचयात्मक प्रवृत्तिक आलोचना करैत छथि आ माँग करैत छथि जे लोकगीतक केवल सूची नहि, ओकर सामाजिक कार्य, परिवर्तन आ विलुप्तिक कारणक विश्लेषण हो — जाँतक स्थानपर यन्त्र आ ढेकीक स्थानपर मिल आबि गेलापर श्रमगीतक भविष्य की होयत, ई प्रश्न अत्यन्त सार्थक अछि। लोकगीतकेँ लेखक सामूहिक भावात्मक अभिलेख, परम्परागत ज्ञान, औषधीय अनुभव, कृषि-संस्कृति, पारिवारिक सम्बन्ध आ जीवन-संस्कारक भण्डार मानैत छथि — मेथी-हरदिक औषधीय गुण, ’नानीक पीसल मेथी’क सामाजिक अर्थशास्त्र, धोबिनियाँक सोहागक पौराणिक कथा-गुम्फन, तुलसी, बेल, बाँस सन प्रतीक अनुभवसिद्ध लोकज्ञानक अङ्ग अछि। नारीवादी दृष्टिसँ अध्याय विशेष प्रखर अछि : बेटी-जन्मक अवसाद आ भ्रूण-परीक्षा-पूर्वक मरीच-प्रयोगक साक्ष्य, कन्याक सामाजिक अवमूल्यन, पतिद्वारा श्रम-शोषण, दहेज, सासु-ननदक नियन्त्रण आ नवविवाहिताक देहगत आकांक्षा लोकगीतमे सुरक्षित अछि। लगनीक अप्रस्तुत-विधान (लौंगक फूल, यमुनामे जाल)क रस-सजग व्याख्या शिष्ट-लोकक कृत्रिम भेदक खण्डन थिक। संरक्षण लेल यूनेस्कोक अमूर्त सांस्कृतिक सम्पदा-ढाँचासँ चिन्हबाक तीन आ संरक्षणक सात उपायक प्रस्ताव — अभिलेखागार, सङ्ग्रहालय, क्षेत्रीय वर्गीकरण, प्रशिक्षित सङ्कलक, ध्वनि-अभिलेखन आ समुदायकेँ प्रति उपलब्ध करायब — तथा समष्टि-चेतना आ ओगबर्नक सांस्कृतिक-तत्त्व-वैविध्यक सूत्रसँ नेपालक नव लोकतन्त्रमे लोकशक्तिक सांस्कृतिक आधारक तर्क व्यावहारिक नीति-प्रस्तावक स्तर धरि जाइत अछि, जे मैथिली आलोचनामे दुर्लभ अछि। विदेह समान्तर इतिहासमे लोकगीत अशिक्षित समुदायक मनोरञ्जन नहि, समाजक जीवित इतिहास अछि।
३.१७ उपनिवेशवादक नऽव चालि
समापन-निबन्ध उत्तर-औपनिवेशिक चिन्तनक व्यावहारिक शिखर थिक आ राजनीतिक स्वतन्त्रताक बादो भाषिक उपनिवेशवादक निरन्तरता उद्घाटित करैत अछि। तंजानियाक किस्वाहिली-प्रकरणक विस्तृत अध्ययन — स्वाधीनता (१९६२)क बाद शिक्षाक माध्यम बनएबाक संकल्प, आर्थिक संकट, विश्व बैंक आ अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोषक शर्त, निजीकरण, आ ब्रिटिश सहायता-योजनाक माध्यमे अंग्रेजीक पुनःस्थापन — सँ ई सूत्र निकालल गेल अछि जे राजनीतिक उपनिवेश गेलाक बाद भाषिक-सांस्कृतिक उपनिवेश आर्थिक सहायताक नव चालिसँ चलैत अछि। मेडागास्कर, जाम्बिया, मलेशिया आ भारतक (कर्पूरी ठाकुर-प्रसंग सहित) समान्तर दृष्टान्त, तथा एकहि दिन (१९ नवम्बर २००८) पटनामे ब्रिटिश मन्त्रीक बालिका-विद्यालय आ अमेरिकी दूतावासक महिला-महाविद्यालय गमनक सूक्ष्म पाठ — जे स्त्री-शिक्षाक नव-विकसित क्षेत्रकेँ औपनिवेशिक भाषाक प्रभाव-क्षेत्र बनएबाक सुनियोजित चालि थिक — विचारोत्तेजक अछि।
उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिसँ लेखकक प्रमुख स्थापना अछि — राज्यसत्ता छोड़ि देब मात्र उपनिवेशवादक अन्त नहि; शासनक भाषा, ज्ञानक मानदण्ड, शिक्षाक माध्यम आ रोजगारक प्रवेश-द्वारपर अधिकार बनल रहला धरि औपनिवेशिक सत्ता नव रूपमे जीवित रहैत अछि। भारतमे अंग्रेजी माध्यमक निजी विद्यालयक विस्तार, स्थानीय भाषाक प्रति शिक्षित वर्गक हीनताबोध आ घरमे पीढ़ीगत भाषा-संक्रमणक टूटन मैथिलीक लेल दूतरफा संकट उत्पन्न करैत अछि। फिशमैनक भाषा-संक्रमण सिद्धान्तक सूत्र — अन्तरपुस्तीय मातृभाषा-संक्रमणक बिना भाषा-रक्षा असम्भव; जे भाषा अन्तर-पीढ़ीगत रूपसँ संक्रमित नहि होइत अछि, ओकर मृत्यु सुनिश्चित अछि — आ मैथिल परिवारसभसँ पारिवारिक भाषाक रूपमे मैथिलीक उठि जएबाक दृष्टान्त एहि निबन्धकेँ ’मैथिली पर दू तरफा मारि’क चेतावनी-पत्र बना दैत अछि। विदेह समान्तर इतिहासक दृष्टिसँ अध्यायक सर्वाधिक मार्मिक पक्ष पारिवारिक भाषा-विच्छेद अछि — जखन दादा-दादी पोता-पोतीसँ संवाद नहि कऽ पबैत छथि, तखन केवल शब्द नहि, कथा, गीत, संस्कार, लोकज्ञान आ सामूहिक स्मृति सेहो टूटैत अछि।
४. अध्यायवार सीमा, अन्तर्विरोध आ अपूर्णता
रमणजीक अपन घोषित सिद्धान्त थिक जे आलोचना अभिनन्दन-पत्र नहि थिक; व्यक्त विचारकेँ सप्रमाण खण्डित करब वा वैमत्य राखब अवमानना नहि। समीक्षाशास्त्रमे केवल प्रशंसा करब गुटबन्दी आ मित्र-मण्डलीक संकीर्ण दायराकेँ पोसबाक समान अछि। तेँ ओही कसौटी पर, आ ओही आदर-भावसँ, प्रत्येक अध्यायक सीमा, वर्गीय विलोपन आ सैद्धान्तिक अपूर्णताक विवेचन नीचाँ प्रस्तुत अछि। ई सीमा सभ पोथीक मूल्यकेँ घटबैत नहि अछि, अपितु आगाँक अनुसन्धान लेल ’वादे वादे जायते’क द्वार खोलैत अछि।
४.१ मैथिली एवं मिथिला भाषाक अध्ययन : सीमा
पहिल सीमा स्रोत-केन्द्रक थिक। अध्याय मुख्यतः पश्चिमी विद्वान्क (कोलब्रुक, बीम्स, हार्नले, ग्रियर्सन) साक्ष्य पर ठाढ़ अछि; दीनबन्धु झासँ पूर्वक देशी वैयाकरण-चेतना — पाँजि-प्रबन्धक भाषिक अभिलेख, ज्योतिरीश्वर-कालक शब्द-संग्रह-प्रवृत्ति, संस्कृत-टीका-परम्परामे मैथिली-प्रयोगक साक्ष्य — प्रायः अस्पर्शित रहि गेल। फलतः जाहि औपनिवेशिक ज्ञान-मीमांसाक आलोचना निबन्ध करैत अछि, तकरहि स्रोत-सामग्री पर ओ स्वयं आश्रित भऽ जाइत अछि — ई उत्तर-औपनिवेशिक विमर्शक चिर-परिचित आत्म-विरोध थिक। दोसर, औपनिवेशिक ज्ञान-निर्माणक अन्तर्विरोधक पर्याप्त विश्लेषण नहि अछि : ग्रियर्सनक कार्य मैथिलीक पहचानक साधन सेहो छल आ औपनिवेशिक जनगणना, वर्गीकरण आ प्रशासनक उपकरण सेहो; कैम्पबेल (१८७४)क शब्द-संग्रहकेँ केवल प्रशासनिक सुविधा मानब, आ ग्रियर्सन द्वारा कएल गेल औपभाषिक विभाजन — पूर्वी रूपकेँ ‘गँवारी’ आ निम्नवर्गक भाषिकाकेँ ‘जोलहा बोली’ कहब — क वर्ग-विभेदी पक्षकेँ नहि चिन्हब, प्राच्यवादी ज्ञान-संचयक ओहि आलोचनासँ वञ्चित रहि जाइत अछि जे एहि द्वैधताकेँ अधिक गम्भीरतासँ खोलि सकैत छल। तेसर, कार्यभार आ कार्य-पारदर्शिताक सिद्धान्तक प्रयोग आरम्भ तँ भेल, मुदा मैथिलीक विभिन्न प्रक्षेत्र (शिक्षा, प्रशासन, व्यापार, धर्म, संचार)मे प्रयोगक कोनो क्षेत्रवार विवरण वा तुलनात्मक आकलन नहि — सिद्धान्त उदाहरणक (अंग्रेजी, संस्कृत) स्तरहि पर रहि गेल, मैथिलीक मापन नहि भेल। चारिम, ’मानक मैथिली’क निर्धारणमे अन्य उपभाषा-रूपक सामाजिक अधिकारक प्रश्न — मानक कोन शक्ति-संरचनासँ बनैत अछि — अनुत्तरित अछि; भाषाक अवनतिक कारण बाहरी आक्रमण आ प्रशासनिक उपेक्षामे केन्द्रित अछि, मैथिल समाजक आन्तरिक जातिगत विभाजन, शिक्षित वर्गक भाषिक उदासीनता, स्त्रीशिक्षाक अभाव आ आर्थिक संरचनाक भूमिका तुलनात्मक रूपसँ कम विश्लेषित अछि। पाँचम, अंग्रेजी पाद-टिप्पणीक बाहुल्य बिना अनुवादक अछि, आ निबन्धक समापन प्रश्न-शृंखलामे विसर्जित भऽ जाइत अछि — व्याकरण-लेखनक विलम्बक जे कारण-मीमांसा आरम्भ भेल छल, तकर सुगठित निष्कर्ष-सूत्र पाठककेँ स्वयं जोड़ऽ पड़ैत छैक।
४.२ रमानाथ झा आ मिथिला भाषा : सीमा
संग्रहक ई दीर्घतम अध्याय संरचनाक दृष्टिएँ शिथिल अछि — प्रत्यालोचना, जीवनी, भाषा-प्राचीनता, लिपि-विमर्श, मानकीकरण आ भाषा-प्रबन्धन : छह स्वतन्त्र निबन्धक सामग्री एकहि छत्रमे अटकाओल गेल अछि, जाहिसँ तर्कक धार ठाम-ठाम मोथरा जाइत अछि। दोसर, सन्तुलनक घोषित प्रतिज्ञाक बादो स्वर कतोक स्थानपर आलोचनात्मक जीवन-विवेचनसँ अधिक प्रतिरक्षात्मक श्रद्धाञ्जलि बनि जाइत अछि : किरणजीक मत-खण्डनकेँ ‘आवेगात्मक’ आ ‘सुविचारित नहि’ कहल गेल, मुदा विरोधी पक्ष लेल प्रयुक्त लेखकक अपन शब्दावली (‘कौचर्य-प्रवीण’, ‘खिधांस’, ‘लटुआएल-दबकल’) सेहो आवेगसँ सर्वथा मुक्त नहि — प्रत्यालोचक जाहि तटस्थताक माँग करैत छथि, से स्वयं हुनक भाषामे कतहु-कतहु भंग होइत अछि; विरोधी मतक तर्कक निष्पक्ष पुनर्निर्माण नहि कएल गेलापर प्रत्युत्तरक विश्वसनीयता घटैत अछि। तेसर, हाउगेन-फर्गुसनक परवर्ती सिद्धान्तसँ रमानाथ झाक पूर्ववर्ती कार्यक संगति देखाएब जतेक आकर्षक अछि, ततबे कालदोषक जोखिमसँ भरल — ई संगति सप्रयोजन नियोजन छल की आकस्मिक समान्तरता, एकर विवेचन नहि भेल। चारिम, मैथिलीक अत्यन्त प्राचीन अस्तित्व सिद्ध करबाक उत्साहमे महाकाव्य, बौद्धकाल अथवा प्राचीन जनपदसँ सम्बन्धित किछु निष्कर्ष भाषावैज्ञानिक प्रमाणक अपेक्षा सांस्कृतिक अनुमानपर अधिक आधारित बुझाइत अछि — ‘मिथिला’ नामक प्राचीनता स्वतः वर्तमान मैथिली भाषाक अखण्ड रूपक प्रमाण नहि बनैत अछि। पाँचम, रमानाथ झाक अपन सीमा — जेना हुनक शब्दानुवादक नीरसता जकर चर्च दसम अध्यायमे स्वयं लेखक करैत छथि, हुनक मानकीकरण-प्रतिरूपक व्यावहारिक असफलता, वा मानकीकरणमे आभिजात्य वर्गक भाषिक रूपकेँ प्राथमिकता देलासँ आन वर्ग-क्षेत्रक मैथिलीक अवमूल्यनक प्रश्न — एहि अध्यायमे प्रायः मौन अछि; व्यक्ति-समर्थन आ सिद्धान्त-समर्थन एक वस्तु नहि, आ प्रशंसाक आधिक्यसँ चरित्र पूर्ण मानवीय व्यक्तित्वक बदला आदर्शीकृत प्रतिमा बनबाक जोखिममे पड़ैत अछि। छठम, ’साहित्य-पत्र’क बन्द होएबाक आरोपक जे खण्डन अछि, ओ तर्काश्रित बेसी, अभिलेखाश्रित कम — पत्रिकाक अर्थ-व्यवस्था, ग्राहक-संख्या वा बन्द होएबाक प्रत्यक्ष कारणक कोनो दस्तावेज नहि देल गेल।
४.३ प्रत्यालोचक किरणजी : सीमा
पहिल, अध्यायक केन्द्रीय स्थापना — किरणजीक आलोचना मूलतः प्रत्यालोचना थिक, स्वतन्त्र कृति-अवगाहनसँ नहि जनमल — एकटा गम्भीर न्यूनीकरणक जोखिम रखैत अछि; प्रत्यालोचनाक स्वभाव प्रतिक्रियात्मक होइत अछि आ एहि अध्यायमे किरणजीक विचार प्रायः पूर्ववर्ती निष्कर्षक खण्डनक माध्यमसँ सामने अबैत अछि, हुनकर स्वतन्त्र सौन्दर्यशास्त्रीय प्रतिमान अधिक व्यवस्थित रूपमे निर्मित नहि होइत अछि। जे ‘प्रतिक्रियावादिता’क प्रश्न लेखक स्वयं उठबैत छथि, से बिना पूर्ण उत्तरक छोड़ि देल गेल अछि — प्रश्न उठा कऽ ओकर मीमांसासँ बचि जाएब आलोचकीय दायित्वक अधूरा निर्वाह थिक। दोसर, विरोधाभास-प्रदर्शनमे उद्धरण-चयन एकतरफा अछि : किरणजीक जाहि स्थल सभमे आत्म-संशोधन वा मत-परिमार्जन भेल हो, से खोजल नहि गेल; कोनो चिन्तकक चालीस वर्षक लेखनमे मत-भिन्नता विकास सेहो भऽ सकैत अछि, केवल विरोधाभास नहि। तेसर, कुलानन्द मिश्रक चन्द्रग्रहण-प्रसंग अपूर्ण अछि — मिश्रजीक मूल आपत्तिक पूरा तर्क-पक्ष नहि राखल गेल, केवल खण्डनीय अंश उद्धृत भेल। चारिम, सामाजिक न्याय आ लोकमंगलक आग्रह महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा साहित्यकेँ केवल विचारधारात्मक उपयोगितासँ मापल गेलापर रूप, लय, जटिलता, हास्य, विरोधाभास आ कलात्मक स्वतन्त्रताक अवमूल्यन होयबाक आशङ्का रहैत अछि; किरणजीक क्रान्तिकारी वर्ग-दृष्टिकेँ पारम्परिक अलंकारशास्त्रक चौखठिमे बान्हि देलासँ ओकर सामाजिक धार कुनहटएबाक जोखिम सेहो अछि — दूषण-पाँजि आ कौलीनतावादी शुद्धतावादक जाहि आन्तरिक विखण्डनक दिस किरणजीक लेखनक संकेत छल, से पूर्ण विकसित नहि भेल। पाँचम, ’मैथिल आँखि’ स्थानीय दृष्टिक सशक्त अवधारणा अछि, मुदा एकर सीमा स्पष्ट नहि — की ई दृष्टि सभ जाति, लिङ्ग, वर्ग, धर्म आ क्षेत्रक मैथिल अनुभवकेँ समान रूपसँ ग्रहण करैत अछि, अथवा शिक्षित पुरुष-केन्द्रित सांस्कृतिक दृष्टि पुनः ’सम्पूर्ण मिथिला’क नामपर स्थापित होइत अछि? छठम, किरणजीक काव्य-कृति (पराशर सन)क आलोचकीय दृष्टिसँ हुनक आलोचना-गद्यक अन्तर्सम्बन्धक — कवि-आलोचकक द्वैध व्यक्तित्वक — कोनो विवेचन नहि; ई पक्ष तेरहम अध्यायमे फराक चलि गेल, दुनूक सेतु नहि बनल। संगहि, प्राचीन रचना सभमे आधुनिक राष्ट्रीयता, वर्ग-संघर्ष अथवा लोकतान्त्रिक मूल्य खोजैत काल ऐतिहासिक दूरीक सावधानी हरदम नहि राखल गेल अछि।
४.४ कन्यादान-पाठ : सीमा
एहि प्रखर निबन्धक पहिल सीमा थिक प्रश्न-शृंखलाक अनुत्तरता — ‘एकर उत्तरदायी के?’ बेरि-बेरि पूछल गेल (अशिक्षा? माए-बाप? सर-कुटुम्ब? समाज?), मुदा लेखक अपन निर्णय सप्रमाण नहि देलनि; उपेक्षिताक आँखिसँ पढ़बाक जे प्रतिज्ञा छल, से अन्ततः प्रश्नवाचक मुद्रामे स्थगित भऽ गेल। दोसर, कन्यादानक हास्य-रसक पक्ष — जे कृतिक लोकप्रियताक मूलाधार थिक — क रस-शास्त्रीय परीक्षा नहि भेल : हास्यक आलम्बन अबोध बुच्ची थिक की स्वयं अर्ध-शिक्षित समाज, हास्यक भीतर करुणक अन्तर्धारा कोन विन्याससँ बहैत अछि, कथावाचकक दूरी आ विडम्बनात्मक द्वयर्थताक विश्लेषण, तथा पाठकक असहज हँसीक परीक्षण — ई प्रश्न अस्पर्शित रहल; कतोक स्थानपर पुनर्पाठ अभियोग-पत्र बनि जाइत अछि आ साहित्यिक पात्रक प्रत्येक व्यवहारकेँ प्रत्यक्ष सामाजिक यथार्थ मानि लेखक अथवा कृतिक नैतिक दोष निर्धारित करब विधागत रूपसँ जोखिमपूर्ण अछि, कारण कन्यादान हास्य, व्यङ्ग्य, विडम्बना, अतिरञ्जना आ सामाजिक प्रकार-निर्माणक रचना अछि। तेसर, द्विरागमन — जाहिमे हरिमोहन झा स्वयं कथाक उत्तर-पक्ष रचलनि — क चर्चाक अभावसँ मूल्याङ्कन आधा पाठ पर ठाढ़ अछि; उपन्यास-युग्मक समग्र पाठेँ लेखकीय दृष्टिक न्याय भऽ सकैत छल। चारिम, पूर्ववर्ती उपन्यासक साक्षर नारी-पात्रक जे तालिका अछि, ओ मात्रात्मक साक्ष्य थिक — ओहि पात्र सभक साक्षरता कथानकमे कतेक केन्द्रीय अछि आ बुच्चीक निरक्षरता कतेक, एहि गुणात्मक तुलनाक बिना ’पाछाँ हटब’क स्थापना पूर्ण-प्रमाणित नहि कहल जा सकैत अछि। पाँचम, बुच्चीक निरक्षरता स्वयं व्यंग्यक अस्त्र — समाजक आत्म-दर्शनक दर्पण — रूपमे सप्रयोजन रचना तँ नहि थिक, ई प्रश्न छूटल; संगहि बुच्ची दाइक सम्भावित अन्तःचेतना, मौनक प्रतिरोधी अर्थ, स्त्री-समुदायक पारस्परिक सम्बन्ध आ घरेलू ज्ञानक विस्तार पूर्ण रूपसँ विकसित नहि भेल। छठम, पति-पत्नीमे भाषिक असमानताक प्रश्न मूल्यवान अछि, तथापि हिन्दी बोलब मात्र सांस्कृतिक अनात्मीयताक निश्चित प्रमाण मानब सरल निष्कर्ष भऽ सकैत अछि — वर्ग, शिक्षा, नगर-ग्राम दूरी आ वैवाहिक अपरिचयक संयुक्त प्रभावक विश्लेषण अपेक्षित छल।
४.५ अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह : सीमा
लेखक स्वयं स्वीकारैत छथि जे छिड़िआएल कवितामे सँ ‘किछु मात्रे झोड़ि’ सकलाह — ई ईमानदार स्वीकारोक्ति प्रशंसनीय अछि, मुदा एकर परिणाम ई जे निष्कर्ष सभ (निरपेक्षता, अनुदार समकालीनताक शिकार) सीमित नमूना पर ठाढ़ अछि आ सामान्यीकरणक वैधता संदिग्ध रहैत अछि — सीमित आ बिखरल उदाहरणक आधारपर कविक सम्पूर्ण काव्य-दृष्टि निर्धारित करब सावधानी माँगैत अछि। दोसर, कतोक प्राकृतिक प्रतीककेँ प्रत्यक्ष राजनीतिक रूपक मानल गेल अछि — ‘पछबा’ पाश्चात्य संस्कृति आ ‘शरदागम’ औपनिवेशिक क्षयक प्रतीक अवश्य भऽ सकैत अछि, मुदा प्रतीकक ई अर्थ कविताक आन्तरिक संरचना, रचनाकालीन साक्ष्य आ अन्य कवितासँ पुष्ट होयबाक चाही; जीवनीपरक तथ्य आ काव्यार्थ कतोक स्थानपर एक-दोसरमे मिलि जाइत अछि, आ कविक जीवनक राष्ट्रीय वातावरणसँ ई स्वतः सिद्ध नहि होइत अछि जे प्रत्येक प्रकृति-कविता राजनीतिक ध्वनि रखैत हो। तेसर, गद्य-कृति — श्रीचामुण्डा आ पंचवटी उपन्यास — क नाममात्र उल्लेख भेल; ‘अनालोचित’क पुनर्वासक जे प्रतिज्ञा छल, से कविता धरि सीमित रहि गेल आ कविक आधा व्यक्तित्व एहू अध्यायक बाद अनालोचिते रहल। चारिम, विवरण-बाहुल्य अछि — जीवन-वृत्त, पत्रिका-नाम, तिथि — मुदा काव्य-शास्त्रीय विश्लेषण (छन्द-विधान, बिम्ब-योजना, भाषिक स्तर) ’शरदागम’ आ ’पछबा’क बाहर विरल अछि; फलतः लक्ष्मीपति सिंह महत्त्वपूर्ण विचारक रूपमे उभरैत छथि, मुदा कविक विशिष्ट कलात्मक स्वर कम स्पष्ट होइत अछि। पाँचम, कविक दरबारी-सामन्ती परिवेशक सान्निध्यसँ हुनक वर्ग-दृष्टि कोना प्रभावित भेल — पाश्चात्य संस्कृतिक विरोधक संग गामक जमीन्दारी शोषणक विरुद्ध हुनक काव्यमे कोन स्वर अछि — ई वर्ग-प्रश्न अस्पर्शित रहल। छठम, कविक हिन्दी-लेखन आ मैथिली-लेखनक अन्तर्सम्बन्धक प्रश्न — द्विभाषिक कवि-चेतनाक गति — उठाओल नहि गेल, जखन कि पोथीक अन्तिम अध्यायक द्विभाषिकता-विमर्शसँ एकर सोझ संगति बनि सकैत छल।
४.६ यात्रीक भाषा : सीमा
पहिल, चारू उपकरण पश्चिमी शैलीविज्ञानसँ आनल गेल अछि आ भारतीय काव्यशास्त्रसँ संगति-स्थापन (‘निरंकुशाः कवयः’, वक्रोक्ति-सम्प्रदाय) संकेत-मात्र रहि गेल; कुन्तकक छह वक्रता-भेदसँ चयन-विचलनक व्यवस्थित मिलान भेल रहितैक तँ पूर्व-पश्चिम-सेतु पूर्ण बनितैक — से अवसर छूटि गेल। दोसर, उदाहरण चयन मुख्यतः सफल भाषिक प्रयोगपर केन्द्रित अछि आ विश्लेषण-सामग्री मुख्यतः पत्रहीन नग्न गाछ पर; यात्रीक कमजोर, अतिशय कृत्रिम, अस्पष्ट अथवा समयबद्ध शब्दनिर्माणक परीक्षण, तथा हुनक परवर्ती संग्रह आ गद्यक व्यवस्थित समावेश कएल गेल रहितए तँ ’यात्रीक भाषा’क समग्र चित्र आरो सन्तुलित होइत। तेसर, विचलनकेँ कतोक स्थानपर स्वयं सौन्दर्यक प्रमाण मानल गेल अछि, मुदा प्रत्येक व्याकरणिक उल्लङ्घन कलात्मक नहि होइत अछि — औचित्य, प्रसङ्ग, अर्थ-स्पष्टता आ पाठकीय प्रभावक कसौटीपर प्रत्येक विचलनक पृथक परीक्षा आवश्यक अछि। चारिम, ’भाषाक भूगोल’क आकर्षक रूपक अपरिभाषित रहल — एकर मानचित्रण (कोन अंचलक, कोन वर्गक, कोन व्यवसाय-क्षेत्रक शब्द-सम्पदा यात्री कतऽ सँ अनलनि) बिना ई रूपक अलंकारे रहि जाइत अछि, विश्लेषण-उपकरण नहि बनैत अछि; संगहि ’देशज’क गौरव उचित अछि, मुदा भाषा सदा मिश्रित आ परिवर्तनशील होइत अछि — देशज आ आगन्तुकक कठोर विभाजन स्वयं ऐतिहासिक रूपसँ अस्थिर अछि। पाँचम, समानान्तरता-खण्डमे मामा-गीतक उद्धरण दीर्घ अछि मुदा ओकर सामाजिक व्यंग्य-पाठ (मध्यवर्गीय जीवन-वृत्तक विडम्बना) संक्षेपमे निपटा देल गेल — शैली-विश्लेषण अर्थ-विश्लेषणसँ आगाँ भागि गेल; ध्वनि-संरचना, वाक्य-दीर्घता, कथन-स्वर, संवाद, व्यङ्ग्यक बहुस्तर, भाषिक संकरता आ विभिन्न विधामे भाषा-परिवर्तनक पर्याप्त विवेचन सेहो नहि अछि।
४.७ मनमोहन झा : सीमा
ई संग्रहक लघुतम अध्याय थिक आ एकर लघुते एकर मुख्य सीमा थिक। ’अनालोचित पक्ष’क घोषणा भेल, मुदा विश्लेषण कथा-सारक स्तर पर रहि गेल — पात्रक उद्धरण अछि, कथा-शिल्पक (दृष्टिबिन्दु, कथन-भंगिमा, समय-विन्यास, संवाद, कथन-गति, करुणा आ राष्ट्रीयताक रचनात्मक सन्धिक) विवेचन नहि। अध्याय पात्रक कथन, कथावाचकक दृष्टि आ लेखकक विचारमे पर्याप्त भेद नहि करैत अछि — कोनो पात्र राष्ट्र अथवा मिथिलाक लेल आत्मोत्सर्गक बात कहैत अछि, ताहिसँ सम्पूर्ण कथा अथवा लेखकक अन्तिम विचार स्वतः निर्धारित नहि होइत अछि। राष्ट्रीयता आ मैथिल उपराष्ट्रीयताकेँ प्रायः सकारात्मक नैतिक मूल्य मानि लेल गेल अछि — राष्ट्रवादक भीतर जाति, वर्ग, लिङ्ग, धर्म आ क्षेत्रीय प्रभुत्वक सम्भावना प्रश्नांकित नहि भेल, आ उपराष्ट्रीय गौरवक भीतर निम्नवर्गीय समाजक मूल प्रश्न (भूख, बेगारी) ओझल रहि गेल। आत्मबलिदानी स्त्री-पात्र सभक प्रशंसा करैत समय ई पूछब आवश्यक छल जे स्त्रीक स्वाधीनता हुनकर अपन जीवन-चयनमे अछि अथवा पुरुष-निर्धारित राष्ट्र आ संस्कृतिक लेल बलिदानमे — नारीवादी दृष्टिसँ त्यागक महिमामण्डन पितृसत्तात्मक आदर्शकेँ पुनः पुष्ट करि सकैत अछि। करुण-रसक ख्याति आ नव-प्रतिपादित राष्ट्रीय स्वरक अन्तःसम्बन्धक रस-शास्त्रीय मीमांसा — करुणा राष्ट्रीय चेतनाक उद्दीपन बनैत अछि की अवरोध — सर्वथा अस्पर्शित अछि। निधनक दसम दिन लिखल गेलाक कारण श्रद्धांजलिक आर्द्र स्वर आलोचनाक तटस्थता पर भारी अछि; बंगला कथाक प्रभावक जे प्रचलित चर्च अछि, तकर परीक्षण स्थगित रहि गेल।
४.८ प्रवासीक योगदान : सीमा
पहिल, प्रवासी-निवासीक निर्धारण हेतु विदेशी मुद्रा-विनिमय अधिनियमक विधिक कसौटीक प्रयोग साहित्यिक-सांस्कृतिक विश्लेषण लेल अटपटाह अछि — लेखक स्वयं एकर असंगति देखबैत छथि, मुदा तखन अपन वैकल्पिक कसौटी (‘सांस्कृतिक मिथिलाक सघनता’)क कोनो परिचालनीय परिभाषा नहि दैत छथि; नेपाल-तराइकेँ सांस्कृतिक निरन्तरताक कारण ’प्रवास’सँ बाहर रखबाक तर्क भावनात्मक रूपसँ सशक्त अछि, मुदा राजनीतिक सीमा, नागरिकता, प्रशासन, आर्थिक सम्बन्ध आ भिन्न ऐतिहासिक अनुभवक वास्तविकता सेहो विचारणीय अछि। दोसर, प्रवासी पत्रकारिताक इतिहास मुख्यतः शिक्षित पुरुष सम्पादक आ प्रतिष्ठित पत्रिकाक इतिहास बनि रहि जाइत अछि — महिला सम्पादक, मुद्रक, वितरक, पाठिका, आर्थिक सहयोगी, ग्रामीण ग्राहक आ पत्राचार-लेखकक भूमिका बहुत कम देखाइत अछि; संगहि सम्पादक-वर्गक अपन सामाजिक स्थिति — जमीन्दार-संभ्रान्त वर्गक संरक्षण आ ओकर वैचारिक प्रभाव — क वर्ग-विश्लेषण नहि भेल। तेसर, अध्याय आँकड़ा-रहित अछि — कोन पत्रिका कतेक दिन चलल, प्रसार-संख्या, ग्राहक-वर्ग, वितरण-क्षेत्र, अर्थ-स्रोत, नियमितता, प्रतिबन्ध, राजकीय दबाव आ पाठकीय प्रतिक्रिया — पत्रकारिताक इतिहास-लेखन जाहि परिमाणात्मक आधारक अपेक्षा करैत अछि, से एतऽ नहि अछि; पत्रिकाक वैचारिक प्रभावक आकलन मुख्यतः सम्पादकीय सामग्रीसँ भेल अछि। चारिम, स्वाधीनोत्तर कालक सर्वेक्षण असन्तुलित अछि — मिथिला दर्शनक चर्च भेल, मुदा दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ताक परवर्ती पत्रिका-प्रयास ’नाम गनाएब’सँ आगाँ नहि गेल। पाँचम, प्रवासी-योगदानक छाया-पक्ष — प्रवास-जन्य आदर्शीकरण, मिथिलाक यथार्थसँ दूरी, भावुक अतीत-मोह — क आलोचनात्मक परीक्षा नहि भेल; योगदानक अभिनन्दन अछि, योगदानक सीमाक हिआओल नहि। छठम, पत्रकारिता आ साहित्यिक पत्रिकाक सीमा कतोक स्थानपर धुँधला अछि — साहित्यिक विशेषाङ्क, सामाजिक पत्रिका, समाचार-पत्र आ विचार-पत्रक पृथक कार्यपद्धतिक अधिक स्पष्ट वर्गीकरण अपेक्षित छल।
४.९ दीनाभद्री : सीमा
पहिल, पाठ-प्रामाणिकताक जे केन्द्रीय प्रश्न उठाओल गेल — कोन पाठ आधार मानल जाए — तकर समाधान लेखक स्वयं नहि देलनि; समीक्षित पाठक समालोचनात्मक संस्करण (पाठान्तर-सूची सहित) तैयार करबाक जे स्वाभाविक अगिला डेग छल, से प्रस्तावो रूपमे नहि आएल। संगहि लोकगाथाक एक मूल पाठ खोजबाक प्रवृत्ति स्वयं मौखिक परम्पराक बहुरूपतासँ मेल नहि खाइत — प्रत्येक क्षेत्र, गायक, अवसर, जातीय उपसमूह आ पीढ़ी अपन पाठ निर्मित करैत अछि। दोसर, ग्रियर्सनक संकलन महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा औपनिवेशिक सङ्कलक, अनुवादक, लिप्यन्तरक आ सम्पादकक मध्यस्थताक आलोचनात्मक परीक्षण पर्याप्त नहि — घुमन्तू गायकक जीवित प्रस्तुति लिखित पाठमे आबि कतेक बदलल, ई प्रश्न आवश्यक अछि। तेसर, महेन्द्रनारायण राम आ फूलो पासवानक दावाक खण्डनमे जे कठोरता अछि (‘इतिहास-सम्मत नहि’, ‘नकारात्मक दृष्टि’), से हुनक संकलन-श्रमक स्वीकृतिक संग सन्तुलित नहि भेल — प्रत्यालोचनाक जे मर्यादा-सूत्र तेसर अध्यायमे प्रतिपादित अछि, से एतऽ किछु शिथिल अछि। चारिम — आ ई गम्भीरतम — दलित लोकगाथाक विवेचन पूर्णतः अभिजात आलोचकीय स्थितिसँ भेल अछि : मुसहर समुदायक अपन गायक, अपन भगता, अपन वर्तमान वाचिक परम्पराक कोनो प्रत्यक्ष साक्ष्य (क्षेत्र-कार्य) नहि अछि; जाहि तेलुगु दलित-विमर्शक उद्धरण अध्यायमे अछि — जे कहैत अछि जे दलित-विषयमे बाजबाक अधिकार पर स्वयं दलित-स्वरक दावी अछि — तकर आलोक अपनहि पद्धति पर नहि पड़ल; बाहरी आलोचकक व्याख्या आ समुदायक आत्मव्याख्यामे अन्तर भऽ सकैत अछि। दीनाभद्रीक गाथाकेँ प्रेतयोनिसँ मुक्ति आ तीर्थ-पूजा सन सनातनी ढाँचामे राखि पढ़लासँ हुनक स्वायत्त विद्रोही रूपक संस्कृतिकरणक जोखिम सेहो प्रश्नांकित नहि भेल। पाँचम, गाथाक स्त्री-पात्र (निरसो, हिरिया, जिरिया)क भूमिकाक स्वतन्त्र विश्लेषण नहि भेल — निम्नवर्गीय विमर्शक भीतरो नारी-स्वर हाशिये पर रहि गेल; संगहि मुसहर समुदायक आन्तरिक विविधता, अनुष्ठान, प्रस्तुति-सन्दर्भ, आर्थिक परिवर्तन आ वर्तमान राजनीतिक उपयोगक विस्तृत क्षेत्रीय अध्ययन अपेक्षित छल।
४.१० कथाक विकास : सीमा
पहिल, चन्द्रप्रभाक तिथि-निर्धारण (रचना १८८०क दशक धरि) मुख्यतः सम्पादक लक्ष्मीपति सिंहक स्मृति-कथन (‘साठि-सत्तरि वर्ष पूर्वक’) आ जीर्ण-शीर्ण पाण्डुलिपिक वर्णन पर आधारित अछि — पाण्डुलिपि-विज्ञानक कोनो बाह्य कसौटी (कागज, मसि, लिपि-शैलीक काल-निर्धारण)क अभावमे प्रस्थान-बिन्दुक ई पुनर्स्थापन ओतबे दृढ़ नहि अछि जतेक निबन्धक स्वर सुझबैत अछि; जाहि कठोरतासँ रामदेव झाक मदनराज-चरित-विषयक तिथि-भ्रमक खण्डन भेल, ओही कठोरताक प्रयोग अपन पक्षक साक्ष्य पर नहि भेल — ई मापदण्डक द्वैध थिक। दोसर, आत्म-सन्दर्भक सघनता — मैथिलीक आरम्भिक कथा, मिथिला दर्पण, निर्दयी सासु आदि उद्धृत स्रोतक सम्पादक स्वयं लेखक छथि; सम्पादन-श्रम स्तुत्य अछि, मुदा अपनहि सम्पादित सामग्रीकेँ निर्णायक प्रमाण बनएबामे स्वार्थ-संलग्नताक आभास अनिवार्य अछि, जकर कोनो पद्धतिगत निराकरण (स्वतन्त्र साक्ष्यसँ पुष्टि) नहि कएल गेल। तेसर, जलधर झाक ‘विलक्षण दाम्पत्य’क विधागत स्वरूप — रम्य-रचना, समाचार-मूलक गद्य की कथा — क जे विवाद अछि, से अनिर्णीत छोड़ल गेल; ’आद्य कथा मानबाक औचित्य नहि’ कहल गेल मुदा कथात्वक कसौटी (कथानक, चरित्र, परिणति) सूत्रबद्ध नहि भेल — मौखिक आख्यान, व्रतकथा, नीति-कथा, आख्यायिका, उपन्यास आ आधुनिक लघुकथाक विधागत भेद सेहो पर्याप्त कठोरतासँ निर्धारित नहि अछि। चारिम, लुप्त सामग्रीक सम्भावना इतिहासक महत्त्वपूर्ण प्रश्न अछि, मुदा ‘उपलब्ध नहि अछि’सँ ’अवश्य छल’ धरि पहुँचब अनुमानक छलाँग होइत अछि — पाण्डुलिपि, उल्लेख, प्रकाशन-विज्ञापन, पत्राचार आ समकालीन समीक्षा सन बाहरी साक्ष्य आवश्यक अछि; वाचिक कथा-परम्पराक तेसर धाराक स्थापना सेहो रमानाथ झाक प्राचीन कथन पर आश्रित अछि, स्वतन्त्र क्षेत्र-साक्ष्य अनुपस्थित। पाँचम, पुरुषपरीक्षाक अनुवाद प्रभावहीन छल — ई सम्भव निष्कर्ष अछि, मुदा एकर प्रचार, पाठक-संख्या आ प्रभावक अभावक प्रत्यक्ष प्रमाण सेहो सीमित अछि; प्रभाव केवल लोकप्रियतासँ नहि, भाषिक अथवा शैलीगत अनुकरणसँ सेहो निर्धारित होइत अछि। छठम, चन्द्रप्रभाक राजनीतिक प्रतीकात्मक पाठ रोचक अछि, मुदा प्रत्येक राजा-प्रजा कथा औपनिवेशिक प्रतिरोधक रूपक हो, ई निश्चित नहि — सामाजिक नीति-कथा, राजधर्म आ पुरातन उपदेश-परम्पराक सम्भावना समान रूपसँ जाँचल जाएबाक चाही।
४.११ भूकम्प : सीमा
अध्याय द्वि-केन्द्रित अछि — सीताराम झा आ कृष्णनन्दन सिंह — आ १९८८क संकलनक प्रयोग चयनित उद्धरण धरि सीमित; संकलनक समग्र प्रवृत्ति-विश्लेषण (कतेक कवि, कोन-कोन दृष्टि, कोन छन्द-परम्परा) नहि भेल। दोसर, अध्याय कविताकेँ ऐतिहासिक दस्तावेजक रूपमे प्रभावपूर्ण ढङ्गसँ पढ़ैत अछि, मुदा दस्तावेजी मूल्य काव्यात्मक मूल्यपर भारी पड़ैत अछि — छन्द, ध्वनि, गति, विराम, पुनरावृत्ति आ भयानक रसक संरचनाक तुलनात्मक विश्लेषण सीमित अछि; आपदा-वर्णन लेल छन्दक औचित्य-प्रश्न — करुण-रस आ बद्ध-छन्दक सम्बन्ध — अस्पर्शित रहल। तेसर, भूकम्पक लोक-स्मृति — लोकगीत, कहबी, जनश्रुति — सर्वथा छूटल, जखन कि लोकगीत-अध्यायक लेखकसँ एहि स्रोतक उपयोगक अपेक्षा स्वाभाविक छल; शिष्ट काव्य आ लोक-अभिव्यक्तिक तुलनासँ आपदा-स्मृतिक द्विस्तरीय पाठ बनि सकैत छल। चारिम, कम्पकारिकाक ‘धर्मशाला बँचि गेल, काशी-वैद्यनाथ मन्दिर बँचल’ सन पाँतीक जे दैवी-लीला-परक व्याख्या कविक अछि, तकर आलोचनात्मक परीक्षण (भवन-संरचनाक भौतिक कारण बनाम आस्था-पाठ) नहि भेल — आलोचक एतऽ कविक विश्व-दृष्टिक वर्णनकर्ता रहि गेलाह, विश्लेषक नहि बनलाह; धार्मिक विश्वास आ वास्तविक विनाश-वितरणक अन्तर्विरोध पर्याप्त प्रश्नांकित नहि भेल। पाँचम, पीड़ित स्त्री, दलित बस्ती, भूमिहीन मजदूर, अपाङ्ग व्यक्ति आ अनाथ बालकक पृथक अनुभवक खोज कम अछि — राहत-वितरण आ पुनर्वासमे वर्ग-भेद आ जाति-भेद पर रचित लोक-अभिव्यक्ति उपेक्षित रहल; ’सम्पूर्ण मिथिला’क सामूहिक त्रासक भीतर सामाजिक विषमता छिपि सकैत अछि। संगहि भूकम्पक कारण, भूगर्भीय संरचना, राहत-नीति, मृतक-संख्या आ सामाजिक वितरणक ऐतिहासिक स्रोतसँ काव्य-वर्णनक तुलना कएल जाइत तँ साहित्य आ इतिहासक सम्बन्ध अधिक स्पष्ट होइत।
४.१२ कोसी : सीमा
ई अध्याय संग्रहक सर्वाधिक वर्णनात्मक अछि — कवि-दर-कवि उद्धरण-माला अछि, मुदा विश्लेषणक सूत्र पातर। पहिल, बाढ़िक राजनीतिक अर्थशास्त्र — बान्ह-निर्माणक इतिहास, कोसी-परियोजना, नेपाल-भारत जल-सन्धि, गाद, धारा-परिवर्तन, जल-प्रबन्धन, तटबन्धक भीतरक बस्तीक स्थायी विस्थापन — क कोनो चर्च नहि; ‘लोककृत त्रासदी’क पद एक ठाम आएल अछि, मुदा ओकर विस्तार नहि भेल, जाहिसँ बाढ़ि प्रायः नियतिक प्रकोप बनल रहि गेल आ सरकारी नीतिक आलोचना नैतिक रूपसँ प्रभावी मुदा नीतिगत रूपसँ अपूर्ण रहि जाइत अछि। दोसर, कथा-उपन्यासक (पंचवटी, लिली रेक पटाक्षेप, इन्किलाब) मात्र नामोल्लेख अछि — ’बाढ़ि-साहित्य’क जे व्यापक शीर्षक-ध्वनि अछि, से कविता धरि सिकुड़ि गेल। तेसर, लोकगीतक कोसी-उपरागक जे मार्मिक सन्दर्भ शीर्षकहिमे अछि, तकर पाठ-विश्लेषण अत्यल्प अछि — शीर्षक जे वादा करैत अछि, पाठ से पूरा नहि करैत अछि। चारिम, कविताकेँ कतोक स्थानपर प्रत्यक्ष सामाजिक प्रतिवेदनक समान पढ़ल गेल अछि — कवितामे अतिशयोक्ति, प्रतीक, भावात्मक संक्षेप आ वक्ताक काल्पनिकता सेहो होइत अछि; संगहि नदीकेँ ’माइ’ कहब आत्मीय अछि, मुदा मातृत्वक प्रतीक प्राकृतिक विनाशकेँ भाग्य अथवा देवीक कोप मानि राजनीतिक उत्तरदायित्व धुँधला करि सकैत अछि — नदी नहि, अनुचित बान्ह, कमजोर प्रशासन, भ्रष्ट राहत आ असमान बसावट अनेक त्रासदीक कारण होइत अछि, आ शृंगारिक-कारुणिक व्याख्यामे रोमानीकरणक जोखिम रहैत अछि। पाँचम, बाढ़िक बोझ स्त्री, निम्नजाति, भूमिहीन, पशुपालक आ प्रवासी मजदूरपर भिन्न-भिन्न पड़ैत अछि — एहि अन्तरसम्बन्धी विश्लेषणक विस्तार अपेक्षित छल। छठम, बाढ़ि-वर्णनक पुनरावृत्ति-दोष — प्रत्येक वर्ष एकहि अनुभवक एकहि प्रकारक अभिव्यक्ति — क जे संकेत लेखक स्वयं दैत छथि, तकरा कसौटी बना कऽ कविता सभक तारतम्य-निर्णय (के रूढ़ि, के मौलिक) नहि कएल गेल।
४.१३ महाकाव्यमे युग-सन्दर्भ : सीमा
पहिल, पाँच महाकाव्यक चयन प्रयोजन-आधारित घोषित अछि, मुदा बहिष्करणक तर्क अपूर्ण — ‘शेष महाकाव्य युग-सन्दर्भसँ हीन नहि’ कहि आगाँ बढ़ि जाएब चयन-पूर्वाग्रहक प्रश्न खुजल छोड़ि दैत अछि; कीचकवध, दत्तवती वा चित्रा सन कृतिक अनुपस्थितिक कारण-कथन अपेक्षित छल, आ शेष महाकाव्यक उल्लेख मात्रसँ ई निर्धारित नहि होइत अछि जे चुनल कृति सम्पूर्ण परम्पराक पर्याप्त प्रतिनिधित्व करैत अछि। दोसर, तीनू पुरस्कृत महाकाव्यक चयनसँ जाहि प्रतिष्ठान-निरपेक्षताक दावी पोथीक स्वर अछि, ताहिमे व्यवधान अबैत अछि — साहित्य अकादमीक स्वीकृतिक छाया चयन पर देखि पड़ैत अछि। तेसर, युग-सन्दर्भक खोजमे काव्यत्व गौण भऽ गेल — रस-निष्पत्ति, बिम्ब-विधान, छन्द-प्रयोग, महाकाव्यत्वक शास्त्रीय लक्षण (सर्ग-बद्धता, नायक-स्वरूप, व्यापक कथानक, उदात्त शैली, चरित्र-विकास, वर्णन, संवाद) पर प्रायः मौन; फलतः महाकाव्य विचार-वाहक प्रलेख जकाँ पढ़ाएल, काव्य जकाँ कम। चारिम, पुराणक पात्रकेँ आधुनिक स्वतन्त्रता सेनानी, समाज-सुधारक, कृषक अथवा क्षेत्रीय राष्ट्रवादीक रूपमे पढ़ब फलदायी अछि, मुदा ऐतिहासिक वर्तमानवादक जोखिम सेहो अछि — प्राचीन मिथक आधुनिक विचारक सीधा पूर्वरूप नहि। पाँचम, कृतिवार विस्तार असन्तुलित अछि — सुभद्राहरण आ पराशरकेँ जतेक स्थान, राधाविरह आ त्रिपुण्डकेँ ताहिसँ बहुत कम; नारी-सशक्तीकरणक जे स्थापना राधाविरहसँ जोड़ल गेल, से दू-तीन उद्धरणक भरोसे अछि आ विप्रलम्भ-शृंगारक प्रधान रससँ एहि सामाजिक पाठक सम्बन्धक मीमांसा नहि भेल — राधाक कर्तव्य पुनः पति आ राष्ट्रक सेवासँ निर्धारित अछि; स्त्रीक आत्मनिर्णय, देह, कामना आ निजी जीवनक स्वतन्त्र मूल्यपर चर्चा सीमित रहि जाइत अछि। छठम, अगस्त्यायनी आ पराशर सन कृतिमे जाति-संघर्ष आ आभिजात्य व्यवस्थाक जे प्रश्न निहित अछि, तकर सोझाँ-सोझी विखण्डनक स्थान पर ’युग-धर्म’क सामान्य विमर्श धरि रुकि जाएब सामन्ती संरचनाक पूर्ण आलोचनाक अवसर गमा दैत अछि।
४.१४ नऽव गीत : सीमा
पहिल, ’नऽव गीत’क अवधि आ व्याप्तिक निर्धारण अस्पष्ट रहल — कोन तिथिसँ, कोन कृतिसँ एकर आरम्भ मानल जाए, कोन-कोन गीतकार एहि कोटिमे अबैत छथि — एकर कोनो सूची वा काल-रेखा नहि; परिभाषा मूल्यबोध-आधारित अछि, मुदा मूल्यबोधक कसौटी व्यक्तिनिष्ठ रहि गेल, आ एहि परिभाषासँ अनेक आधुनिक कविता स्वतः नऽव गीतक भीतर आबि सकैत अछि — गीतत्वक विशिष्ट कसौटी स्पष्ट नहि। दोसर, साक्ष्य-आधार तीन-चारि गीतकार (गुंजन, प्रवासी, बुद्धिनाथ मिश्र) धरि सीमित — एतेक पातर आधार पर समग्र प्रवृत्ति-निर्धारण आगमन-दोषसँ ग्रस्त अछि; नऽव गीतकारक सामाजिक स्थिति, प्रकाशन-मञ्च, पाठक, पीढ़ीगत अन्तर आ स्त्री-गीतकारक योगदानक विस्तृत मानचित्र नहि बनैत अछि। तेसर, नऽव गीत आ नऽव कविताक भेद-विवेचन सूत्र-रूपमे दऽ विस्तार हेतु अपनहि पोथीक सन्दर्भ देल गेल — आत्म-निर्देशक ई प्रवृत्ति पाठककेँ अपूर्ण तर्कक संग छोड़ि दैत अछि। चारिम, गीतक गीतत्व — गेयता, स्वर-विधान, आरोह-अवरोह, ध्वनि-क्रम, अन्त्यानुप्रास, मात्रा, आवृत्ति, लोक-धुनसँ सम्बन्ध आ सामूहिक गायन-सम्भावना — पर कोनो विचार नहि; ’लयात्मक सम्मिश्रण’क पद आएल, मुदा लय-विश्लेषणक कोनो उदाहरण नहि, जखन कि गीत-विधाक प्राण गेयतेमे बसैत अछि — सामाजिक विषय मात्रसँ रचना गीत नहि बनैत अछि। पाँचम, पारम्परिक प्रेम, भक्ति अथवा प्रकृति-काव्यकेँ कतोक स्थानपर रूढ़ि मानि छोड़ि देल गेल — मुदा आधुनिकता केवल विषय-परिवर्तन नहि; पुरान विषयक नूतन संवेदना आ रूपान्तरण सेहो आधुनिक होइत अछि। छठम, वर्तमान युगमे नव माध्यम — ध्वनि-दृश्य मञ्च, अन्तर्जाल आ ई-पत्रिका — सँ भऽ रहल गीतक लोकतन्त्रीकरणक चर्च नहि अछि; गीत-विमर्श पारम्परिक मुद्रित संकलनक सीमामे रहि गेल।
४.१५ वर्तमान धारा : सीमा
पहिल, ई व्याख्यान-पाठ थिक आ ओकर श्रोता-सापेक्षता निबन्धमे बनल रहि गेल — पूर्वांचलीय भाषा-बन्धुत्वक दीर्घ भूमिका (जे भुवनेश्वरक सभा लेल सार्थक छल) पोथीक पाठक लेल विषयान्तर जकाँ लगैत अछि आ ‘वर्तमान धारा’क मूल विवेचन लेल स्थान घटा दैत अछि। दोसर, ’वर्तमान धारा’क चारू विषय अत्यन्त व्यापक अछि — मानव-संकट, उपभोक्तावाद, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद आ पर्यावरण लगभग सम्पूर्ण आधुनिक साहित्यकेँ समेटि सकैत अछि; काव्य-आन्दोलन, पीढ़ी, रूप, भाषा आ सौन्दर्यबोधक आधारपर अधिक सूक्ष्म वर्गीकरण अपेक्षित छल, आ धारा-विभाजनक पारस्परिक अतिच्छादन (उपभोक्तावाद आ सांस्कृतिक साम्राज्यवाद कतऽ फराक?) पर विचार नहि। तेसर, चारू धाराक साक्ष्य-घनत्व असमान अछि — मानव-संकट आ सांस्कृतिक साम्राज्यवादक धारा सुसाक्षित, मुदा उपभोक्तावाद-विरोधक धारा एक-दू उद्धरण पर; चुनल कविताक संख्या सीमित अछि आ ताहिपर आधारित व्यापक निष्कर्ष सम्पूर्ण वर्तमान मैथिली कविताक प्रतिनिधित्वक दावा पूर्ण रूपसँ सिद्ध नहि करैत अछि। चारिम, वर्तमान धाराक सूचीमे नारी-स्वर आ दलित-स्वरक अनुपस्थिति खटकैत अछि — जाहि आलोचकक अपन पोथीमे उपेक्षिता आ दीनाभद्री पर स्वतन्त्र अध्याय अछि, हुनक वर्तमान-धारा-चित्रणमे ई दुनू धारा नहि गनाएब आन्तरिक संगतिक अभाव थिक; स्त्रीवादी, दलित, आदिवासी, प्रवासी, अन्तर्जालीय आ प्रयोगधर्मी कविताकेँ पृथक वर्तमान धाराक रूपमे पर्याप्त स्थान नहि भेटल, आ विमर्श मुख्यतः प्रतिष्ठित केन्द्रक कवि धरि सीमित रहि गेल। पाँचम, नेपालक मैथिली कविताक भिन्न प्रवृत्तिक जे संकेत अछि (’राजतन्त्रक भयसँ भिन्न रहल’), तकर एकोटा उदाहरण नहि — स्थापना निराधार लटकल अछि। छठम, सांस्कृतिक साम्राज्यवादक विवेचन कतोक स्थानपर स्थानीय संस्कृति बनाम बाहरी संस्कृतिक द्वैत बना दैत अछि — संस्कृति सदैव आदान-प्रदान, मिश्रण, ग्रहण आ प्रतिरोधसँ विकसित होइत अछि; प्रत्येक बाहरी प्रभाव विनाशकारी नहि आ प्रत्येक स्थानीय परम्परा मुक्तिकामी नहि।
४.१६ लोकगीत : सीमा
पहिल, ई स्वतन्त्र निबन्ध नहि, कार्यपत्र पर टिप्पणी थिक आ एकर संरचनामे से झलकैत अछि — आरम्भमे कार्यपत्रक पद्धति-दोषक चर्च, बीचमे स्वतन्त्र लोकगीत-विमर्श, अन्तमे नीति-प्रस्ताव; तीनू खण्डक सन्धि शिथिल अछि। दोसर, यूनेस्को-ढाँचाक सात संरक्षण-उपायक जे सूची अछि, से प्रायः अनूदित-प्रतिध्वनित अछि — मैथिली लोकगीतक विशिष्ट स्थिति (के गाओत, कोन पीढ़ी, कोन अवसर बँचल अछि, कोन मरि रहल अछि)क क्षेत्र-सर्वेक्षण बिना ई उपाय-सूची यान्त्रिक अनुप्रयोग बनि गेल; संगहि अभिलेखागार, सङ्ग्रहालय आ वर्गीकरण आवश्यक अछि, मुदा जीवित लोकगीतकेँ स्थिर नमूनामे बदलि देबाक खतरा रहैत अछि — लोकगीतक जीवन गायन, अवसर, देहगत प्रस्तुति, सामूहिक सहभागिता आ परिवर्तनशील पाठमे अछि, केवल ध्वनि-सङ्ग्रहमे नहि, आ सांस्थानिक संरक्षणसँ लोक-अभिव्यक्तिक प्रतिरोधी धार कुनहटएबाक प्रश्न सेहो विचारणीय अछि। तेसर, लोकगीतक संगीत-पक्ष — राग, ताल, स्वर-लिपिबद्धता — सर्वथा अछूत; ’अवस्था एवं संरक्षण’क शीर्षकमे जे संरक्षण अछि, से पाठ-संरक्षण धरि सोचल गेल, ध्वनि-संरक्षण (स्वर-आलेखन)क चर्च नहि। चारिम, सङ्कलक, शोधकर्ता आ संस्थाकेँ अधिकार देल गेल अछि, मुदा गायक समुदायक स्वामित्व, सहमति, आर्थिक लाभ, नामोल्लेख आ अभिलेखपर पहुँचक प्रश्न पर्याप्त विकसित नहि। पाँचम, लोकगीतक भीतरक पितृसत्तात्मक स्वर — जकर मार्मिक उदाहरण (बेटी-जन्मक अवसाद, अरजल बिआनि) स्वयं निबन्धमे अछि — क आलोचनात्मक सामना नहि भेल; संरक्षणक उत्साहमे ई प्रश्न दबि गेल जे लोक-सम्पदाक कोन अंश संरक्ष्य अछि आ कोन अंश समीक्ष्य। छठम, लोकज्ञानमे औषधीय अथवा वैज्ञानिक तत्त्वक उपस्थिति महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा प्रत्येक परम्परागत विश्वासकेँ वैज्ञानिक सत्य मानि लेब रोमानीकरण होयत — अनुभवजन्य उपयोगिता आ चिकित्सकीय प्रमाणमे भेद रहैत अछि; संगहि स्त्रीक हास्य, सामूहिक प्रतिरोध, गीत-निर्माणक अधिकार आ जातिगत स्त्री-अनुभवक भिन्नता पर आरो विस्तार सम्भव छल।
४.१७ उपनिवेशवादक नऽव चालि : सीमा
पहिल, तंजानिया-प्रकरणक विस्तार जतेक अछि, मैथिली-स्थितिक तुलनात्मक विश्लेषण ताहि अनुपातमे संक्षिप्त — किस्वाहिलीक जे संस्थागत आँकड़ा (बजट-प्रतिशत, नीति-तिथि) देल गेल, तकर समकक्ष मैथिलीक कोनो आँकड़ा (विद्यालयमे मैथिली-माध्यमक स्थिति, निजी विद्यालयक प्रसार-संख्या) नहि; दृष्टान्त सुदृढ़, अनुप्रयोग पातर, आ प्रत्येक देशक भिन्न इतिहास, भाषिक जनसंख्या, अर्थव्यवस्था आ शिक्षा-संरचनाक अन्तर पर्याप्त स्पष्ट नहि रहने तुलनात्मक निष्कर्ष किछु स्थानपर अत्यधिक शीघ्र अछि। दोसर, विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष आ विदेशी सहायता भाषिक प्रभुत्वमे भूमिका निभबैत अछि, तथापि स्थानीय अभिजन, सरकारी अकर्मण्यता, अभिभावकक रोजगार-चिन्ता, शिक्षाक गुणवत्ता, पाठ्यपुस्तकक अभाव आ मातृभाषी संस्थाक कमजोरी सेहो उत्तरदायी अछि — बाहरी षड्यन्त्रक व्याख्या आन्तरिक उत्तरदायित्वकेँ ओझल करि सकैत अछि; मिथिलाक भीतरक भाषिक हीनताबोध आ आन्तरिक उपनिवेशक विखण्डन बिना बाहरी भाषिक उपनिवेशवादसँ संघर्ष अधूरा रहत, ई प्रश्न पर्याप्त विकसित नहि भेल। तेसर, निबन्ध निदान-प्रधान अछि, चिकित्सा-न्यून — भाषा-मृत्युक संकट देखाओल गेल, मुदा फिशमैनहिक प्रतिवर्तन-सिद्धान्तक (भाषा-ह्रास उनटएबाक) रचनात्मक पक्ष, जे ओही ग्रन्थमे अछि, नहि आनल गेल; पाठक चेतल तँ जाइत अछि, मुदा दिशाहीन; संगहि अंग्रेजी आ मैथिलीकेँ सर्वथा विरोधी मानब व्यावहारिक समाधान नहि — बहुभाषिक शिक्षा, मातृभाषामे आधारभूत ज्ञान, भारतीय सम्पर्कभाषा आ अन्तरराष्ट्रीय भाषाक क्रमिक शिक्षणक समन्वित रूपपर चर्चा अपेक्षित छल, कारण द्विभाषिकता स्वतः भाषा-मृत्यु नहि, असमान प्रतिष्ठावाली द्विभाषिकता संकट बनैत अछि। चारिम, व्यक्तिगत दृष्टान्त (प्राध्यापक-दम्पति, वकील साहेब, ग्रामीण महिला) नाम-सन्दर्भ-रहित अछि — सत्यापन असम्भव; जे लेखक अन्यत्र अभिलेख-प्रमाणक आग्रही छथि, से एतऽ किंवदन्ती-शैली अपना लैत छथि। पाँचम, आठम अनुसूचीमे समावेश (२००३)केँ ’प्राणक संचार’क जे आशावादी विराम-बिन्दु बनाओल गेल, तकर आलोचनात्मक परीक्षण नहि — अनुसूची-प्रवेशक दस वर्ष बाद प्रकाशित पोथीमे ई प्रश्न स्वाभाविक छल जे संवैधानिक मान्यतासँ जमीनी संक्रमण-स्थितिमे की बदलल; निबन्धक अपनहि तर्क (सरकारी मान्यता पर्याप्त नहि, अन्तरपुस्तीय संक्रमण अनिवार्य) एहि आशावादकेँ काटैत अछि — ई अन्तिम आत्म-विरोध अनसुलझल रहि गेल। छठम, शहरी द्विभाषिक परिवार, मिश्रित विवाह, प्रवासी बालक आ नूतन माध्यममे मैथिलीक सम्भावनाक चर्चा कम अछि।
४.१८ समग्र सीमा
अध्यायवार सीमाक अतिरिक्त किछु सीमा समग्र ग्रन्थ-स्तरक अछि। पहिल, पुनरावृत्ति : निबन्ध-संग्रहक स्वाभाविक दोष एतऽ सघन अछि — किरणजीक ‘आनक कानब खसब देखि कय’ वला पद्य दू अध्यायमे, सीताक ‘जनक नहि छथि राजाक दास’ वला प्रसंग तीन अध्यायमे, भोलालाल दास-सम्बन्धी उद्धरण आ किरण-रमानाथ विवादक बिन्दु अनेक ठाम दोहराएल अछि; सम्पादन-स्तर पर सन्दर्भ-निर्देशसँ ई बँचि सकैत छल। दोसर, अननूदित अंग्रेजी : पाद-टिप्पणी आ मूल-पाठ दुनूमे अंग्रेजी उद्धरणक बाहुल्य मैथिली-मात्र पाठककेँ साक्ष्यसँ वञ्चित करैत अछि — मातृभाषा-पक्षधर ग्रन्थक ई आन्तरिक विडम्बना थिक। तेसर, आत्म-सन्दर्भ : उद्धृत स्रोत सभमे लेखकक अपन सम्पादित-लिखित पोथीक अनुपात पर्याप्त अछि — ई एक दिस हुनक अध्यवसायक प्रमाण थिक, दोसर दिस प्रमाण-स्वातन्त्र्यक प्रश्न उठबैत अछि। चारिम, पद्धति-वैषम्य : किछु अध्याय (यात्री, रमानाथ झा) सिद्धान्त-सघन छथि तँ किछु (कोसी, मनमोहन झा) विवरण-प्रधान; किछु अध्याय निकट पाठपर आधारित अछि, किछु इतिहास-संशोधनक दस्तावेज, किछु विचारात्मक प्रतिवाद — एहि विविधतासँ पोथी समृद्ध बनैत अछि, मुदा समान कसौटीक अनुप्रयोगक अभावमे संग्रहक आन्तरिक स्थापत्य विषम लगैत अछि आ एकर एकीकृत सिद्धान्त स्पष्ट नहि रहि पबैत अछि। पाँचम, मुद्रण-दोष : ठाम-ठाम अशुद्धि आ सन्दर्भ-शैलीक अनेकरूपता (कतहु पूर्ण, कतहु अपूर्ण पाद-टिप्पणी) एहन प्रमाण-आग्रही ग्रन्थक विश्वसनीयता-मानकसँ मेल नहि खाइत अछि। छठम, समाधान-न्यूनता : संग्रहक अधिकांश निबन्ध प्रश्न आ निदान पर विरमि जाइत अछि — प्रश्नोत्थापनकेँ लेखक स्वयं अभीष्ट कहने छथि, तथापि कमसँ कम भाषा-संकट सन विषयमे कार्य-सूत्रक अपेक्षा अतृप्त रहि जाइत अछि। सातम, लेखकक मैथिलीप्रेम पोथीक ऊर्जा अछि, मुदा कतोक स्थानपर ई प्रेम सांस्कृतिक आदर्शीकरण, प्राचीन गौरव, बाहरी शक्तिक प्रति अत्यधिक संशय अथवा राष्ट्रीय प्रतीकक अतिव्याख्यामे परिणत होइत अछि। आठम, स्त्री, दलित, श्रमिक आ लोकक प्रश्न उठाओल गेल अछि, मुदा एहि सभ दृष्टिक अन्तरसम्बन्ध — जेना दलित स्त्री, बाढ़िपीड़ित भूमिहीन स्त्री, प्रवासी मजदूर, सीमावर्ती भाषाभाषी — क व्यवस्थित विवेचन कम अछि; जतऽ-जतऽ आभिजात्य वर्चस्वसँ पूर्ण टकराएब सम्भव छल, ततऽ-ततऽ समीक्षा कतहु-कतहु अर्ध-प्रगतिशील रहि जाइत अछि।
५. समग्र आलोचनात्मक निर्णय
५.१ पोथीक प्रमुख उपलब्धि
’हिआओल’क सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ई अछि जे ई मैथिली साहित्येतिहासक प्रचलित सरल रेखाकेँ बाधित करैत अछि। ई पोथी पूछैत अछि — स्वतन्त्र भाषा कहबाक अधिकार केकरा अछि? साहित्यिक मानक के बनबैत अछि? कोन लेखक इतिहासमे प्रतिष्ठित आ कोन विस्मृत होइत छथि? लोककण्ठक सामग्री साहित्य अछि कि नहि? स्त्रीक मौनकेँ हास्य मानल जाए कि सामाजिक त्रास? दलित लोकनायक इतिहासक विषय किएक नहि? भूकम्प आ बाढ़ साहित्येतिहासक घटना किएक नहि? प्रवासी केन्द्र मैथिली चेतनाक निर्माणमे की भूमिका निभबैत अछि? राजनीतिक स्वतन्त्रताक बाद भाषिक पराधीनता कोना जीवित रहैत अछि? एहि प्रश्नक कारण पोथी केवल आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह नहि, मैथिली साहित्यक वैकल्पिक ज्ञान-मानचित्र बनि जाइत अछि।
भारतीय काव्यशास्त्रक दृष्टिसँ पोथीक आलोचना रस आ अलंकार धरि सीमित नहि — ओ ध्वनि, औचित्य, वक्रोक्ति, लोकमंगल आ साधारणीकरणकेँ सामाजिक इतिहाससँ जोड़ैत अछि। पाश्चात्य सिद्धान्तक दृष्टिसँ पोथी एकसाथ उत्तर-औपनिवेशिक, नव-इतिहासवादी, मार्क्सवादी, नारीवादी, दलित, रूपवादी आ पर्यावरणीय प्रश्न उठबैत अछि, यद्यपि लेखक एहि सभ सिद्धान्तकेँ सदैव व्यवस्थित नाम आ पद्धतिसँ लागू नहि करैत छथि। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिसँ ‘हिआओल’ राजकीय आ प्रतिष्ठित इतिहासक समानान्तर निम्नलिखित इतिहास लिखैत अछि — भाषिक दमनक इतिहास, उपेक्षित आलोचक आ कविक इतिहास, अशिक्षित स्त्रीक इतिहास, दलित लोकनायकक इतिहास, प्रवासी पत्र-पत्रिकाक इतिहास, मौखिक कथाक इतिहास, भूकम्प आ बाढ़क इतिहास, लोकगीतमे सुरक्षित स्त्री-श्रम आ लोकज्ञानक इतिहास, आओर पीढ़ीगत भाषा-विच्छेदक इतिहास।
५.२ समग्र मूल्याङ्कन
’हिआओल’क महत्त्व अन्तिम निर्णय देबामे नहि, प्रश्नक नूतन भूमि तैयार करबामे अछि। ई पोथी पूर्ण साहित्येतिहास नहि, मुदा भावी साहित्येतिहासक लेल अनिवार्य संकेत-पोथी अछि; ई अन्तिम सिद्धान्त नहि, मुदा स्थापित सिद्धान्तक निश्चिन्तताकेँ भङ्ग करयवला आलोचनात्मक हस्तक्षेप अछि। एकर श्रेष्ठ रूप ओतए देखाइत अछि जतए लेखक विस्मृत दस्तावेज खोजैत छथि, स्थापित निष्कर्षक प्रमाण माँगैत छथि, भाषिक रूपक सूक्ष्म विश्लेषण करैत छथि, स्त्री, लोक, दलित आ विपत्तिग्रस्त जनक स्वर सुनैत छथि, आ साहित्यकेँ जीवित सामाजिक इतिहाससँ जोड़ैत छथि। एकर सीमा ओतए प्रकट होइत अछि जतए प्रतिवाद विश्लेषणपर भारी पड़ैत अछि, अनुमान प्रमाणक स्थान लैत अछि, राष्ट्रीय अथवा सांस्कृतिक आस्था कलात्मक परीक्षणकेँ दबा दैत अछि, आ जटिल इतिहास सरल द्वैतमे बदलि जाइत अछि। संगहि, जतऽ-जतऽ आभिजात्य वर्चस्वसँ पूर्ण टकराएब सम्भव छल, ततऽ-ततऽ समीक्षा अर्ध-प्रगतिशील रहि जाइत अछि — कौलीन्य, पाँजि-प्रथा आ राज्य-प्रायोजित संस्थानक विखण्डन जतेक तीक्ष्णतासँ अपेक्षित छल, ताहिसँ किछु न्यून भेल।
६. उपसंहार
समग्रतः ‘हिआओल’ मैथिली आलोचनाक ओहि दुर्लभ कोटिक ग्रन्थ थिक जे श्रद्धा आ संशय — दुनूकेँ प्रमाणक कसौटी पर कसैत अछि। भारतीय काव्यशास्त्रक दृष्टिएँ एकर मूल कसौटी औचित्य थिक — शब्दक औचित्य (यात्री-अध्याय), पाठक-दृष्टिक औचित्य (कन्यादान), इतिहास-कथनक औचित्य (कथाक विकास); ध्वनि-सिद्धान्तक व्यवहार ‘शरदागम’ आ ’पछबा’क पाठमे, आ रस-चेतना करुण-प्रधान अध्याय सभमे उपस्थित अछि, यद्यपि रस-मीमांसा एकर दुर्बल पक्ष रहल। पाश्चात्य कसौटी पर ई उत्तर-औपनिवेशिक आ समाजभाषावैज्ञानिक विमर्शक मैथिलीमे अग्रणी प्रयोग थिक, जकर सीमा सिद्धान्तक असमान आ कतहु-कतहु यान्त्रिक अनुप्रयोगमे अछि। आ विदेह समान्तर इतिहासक दृष्टिएँ एकर महत्त्व सर्वोपरि अछि — अनालोचित कवि, उपेक्षिता नायिका, दलित महानायक, प्रवासी सम्पादक, लोकगीतक अज्ञात गायिका : प्रतिष्ठान जकरा-जकरा हाशिया पर रखलक, रमणजी तकरा-तकरा अभिलेखक बलेँ केन्द्रमे अनलनि।
मुदा एहू दृष्टिएँ एक अन्तिम सीमा-रेखा खीचब न्यायोचित होएत : समानान्तर धाराक पूर्ण पद्धति ओतऽ पहुँचैत अछि जतऽ हाशियाक स्वर अपने बाजए — ‘हिआओल’मे हाशिया लेल बाजल गेल अछि, हाशियाकेँ बजाओल कम गेल अछि। ई अपूर्णता आगामी अनुसन्धानक निमन्त्रण थिक, आ इएह निमन्त्रण-धर्मिता — विचारकलोकनि विमर्शक हेतु उपस्थित होथि — एहि पोथीक स्थायी मूल्य थिक। मैथिली आलोचनाक इतिहासमे ’हिआओल’ प्रत्यालोचनाक प्रतिमान-ग्रन्थ आ समानान्तर इतिहास-लेखनक पूर्वपीठिका — दुनू रूपमे स्मरणीय रहत।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’क ’हिआओल’ (२०१२) मैथिली साहित्यिक आलोचनाक क्षेत्रमे एकटा सराहनीय आ साहसिक डेग थिक, जाहिमे कतेको स्थापित स्थापनाकेँ गम्भीर बौद्धिक चुनौती देल गेल अछि। रमणजीक भाषा-प्रेम आ मैथिलीक ठेठ शब्द-संस्कृतिक प्रति अनुराग सर्वथा स्पृहणीय अछि। एहि सैद्धान्तिक सीमाक बावजूद, ‘हिआओल’ मैथिली समीक्षाशास्त्रक सुदीर्घ पथ पर एकटा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मीलक पत्थर थिक, जे भावी पीढ़ीकेँ स्थापित आभिजात्य इतिहास-लेखनक विरुद्ध “हिआओ” (साहस) सँ लड़बाक दिशा-निर्देश अवश्य करैत अछि। ई पोथी साहित्यक मुख्य द्वारक अतिरिक्त पछुआरि, आँगन, खेत, नदी, लोककण्ठ, स्त्रीक मौन, मुसहरक गाथा, प्रवासीक पत्रिका आ भूकम्पसँ ढहल घरक भीतरसँ इतिहास देखबाक दृष्टि दैत अछि। एहि अर्थमे ई विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टिक एक सशक्त आलोचनात्मक आधारग्रन्थ अछि।
सन्दर्भ-सूची
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, हिआओल (मैथिली आलोचना-संग्रह), अखियासल प्रकाशन, लालगंज, सरिसब-पाही, मधुबनी, २०१२।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, अखियासल (आलोचना-संग्रह)।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, बेसाहल (आलोचना-संग्रह)।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, भजारल (आलोचना-संग्रह)।
जी. ए. ग्रियर्सन, An Introduction to the Maithili Language of North Bihar, कलकत्ता, १८८१।
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हरिमोहन झा, कन्यादान (मैथिली उपन्यास)।
PART 27, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_27.htm।
PART 28, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_28.htm।
PART 82, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_82.htm।
A Parallel History of Mithila & Maithili Literature, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_90.htm।
नूतन अंक सम्पादकीय, विदेह : प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/aboutme.htm।
“रमानन्द झा ‘रमण’”, मैथिली लेखक संघ, maithililekhaksangh.blogspot.com/2010/07/blog-post_677.html।
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