Full chapter text
भाषा केवल तैयार वास्तविकताक नामकरण नहि; सामाजिक वास्तविकताके वर्गीकृत, दृश्य आ अदृश्य
करबाक साधन सेहो अछि। जे नाम दैत अछि, ओ कखनो-कखनो एहि बातपर प्रभाव रखैत अछि जे समाज
कोन वस्तु सामान्य, विचलित, अपराध, रोग, अधिकार वा पहचान मानत। मुदा एहि तथ्यसँ ई निष्कर्ष नहि
निकलैत अछि जे वास्तविकता केवल भाषासँ बनैत अछि। भाषा आ जगत बीच सम्बन्ध सत्ता, अनुभव आ
वस्तुगत प्रतिरोधक जटिल क्षेत्र अछि।
60.1 नामकरण आ राजनीतिक अर्थ
“अपराधी”, “विद्रोही”, “आतंककारी”, “स्वतंत्रता-सैनिक”--एकहि व्यक्तिक लेल अलग सत्ता-सन्दर्भमे
अलग शब्द प्रयुक्त भऽ सकैत अछि। शब्द केवल वर्णन नहि; नेतिक भाव आ कानूनी परिणाम सक्रिय कऽ
सकैत अछि। समानान्तर दर्शन पूछैत अछि--कथनक तथ्य की? नामकरणक कसौटी की? समान घटना पर
समान शब्द लागू होइत अछि की नहि?
60.2 “भाषा” आ “बोली”क सत्ता
भाषिक रूपक वर्गीकरण केवल भाषावैज्ञानिक दूरीसँ निर्धारित नहि होइत। राज्य, शिक्षा, साहित्यिक प्रतिष्ठा,
मानकीकरण, लिपि, जनगणना, मीडिया आ राजनीतिक शक्ति सेहो प्रभाव रखैत अछि। कोनो भाषिक रूपके
“केवल बोली” hed तटस्थ वैज्ञानिक कथन भऽ सकैत अछि, मुदा कखनो राजनीतिक अवमूल्यनक साधन
सेहो। तेँ भाषावैज्ञानिक प्रमाण आ सामाजिक सत्ता दुनू विश्लेषित हो।
60.3 मानक भाषा आ नागरिक पहुँच
मानक भाषा प्रशासन, शिक्षा आ व्यापक संचार सरल बनबैत अछि। मुदा जँ मानकीकरणक अर्थ स्थानीय
भाषिक रुपके अशुद्ध, अशिक्षित वा अयोग्य मानब हो, तँ भाषिक नागरिकता असमान होइत अछि। नागरिक
अपन मातृभाषामे सूचना, शिक्षा, न्याय आ सांस्कृतिक सूजन धरि कतेक पहुँच waa अछि--ई भाषिक
न्यायक प्रश्न अछि।
60.4 मौन सेहो सत्ता अछि
सत्ता केवल गलत शब्द नहि चुनैत; किछु बात कहल नै जाए एहन व्यवस्था सेहो बना सकैत अछि। अभिलेखमे
नाम नहि, पाठ्यक्रमे इतिहास नहि, आँकड़ामे भाषा नहि, संस्थामे अनुवाद नहि--ई अनुपस्थिति सार्वजनिक
ज्ञानकें आकार दैत अछि। समानान्तर दर्शन “की कहल गेल?”क संग “की नहि कहल गेल?” पूछैत अछि।
60.5 फूको, विमर्श आ सीमा
आधुनिक विचारमे विमर्श-सिद्धान्त देखबैत अछि जे ज्ञानक भ्रेणी संस्था आ सत्ता-संबंधसँ जुड़ल हो सकैत
अछि। मुदा समानान्तर दर्शन एहि अन्तर्दृष्टिकें अतिवादी सापेक्षतावादमे नहि बदलैत। यदि सत्ता ज्ञान प्रभावित
करैत अछि, ताहिसँ ई नहि निकलैत जे सभ दाबी समान। उलटे, स्रोत, संस्था, वर्गीकरण आ प्रतिपक्ष अधिक
कठोरता सँ जाँचबाक आवश्यकता बढ़ेत अछि।
60.6 मैथिली आ भाषिक गरिमा
मैथिली जकाँ क्षेत्रीय भाषाक दार्शनिक उपयोग स्वयं ज्ञान-सत्ताक प्रश्न उठबैत अछि। यदि उच्च शिक्षा वा
दर्शन केवल प्रभुत्वशाली भाषामे उपलब्ध हो, ते ज्ञानक प्रवेश असमान होइत अछि। मातृभाषामे जटिल दर्शन
लिखब अनुवादक कार्य मात्र नहि; अवधारणात्मक सृजन आ लोकतान्त्रिक ज्ञान-विस्तार सेहो अछि। मुदा
भाषिक गौरव दोसर भाषा वा समुदायक अवमानना नहि बनय।
पूर्वपक्षः भाषा केवल विचार व्यक्त करैत अछि; सत्ता भाषा बाहर अछि।
उत्तरपक्षः भौतिक सत्ता, संस्था आ संसाधन भाषा बाहर अस्तित्व रखैत अछि, मुदा भाषा ओकर वैधता,
वर्गीकरण आ दृश्यताके आकार दैत अछि। शब्द सब किछु नहि, मुदा शब्द निष्प्रभावी सेहो नहि।
60.12 शब्दकोश आ सामाजिक प्राधिकार
शब्दकोश प्रयोग दर्ज करैत, वर्तनी आ अर्थक मार्गदर्शन दैत अछि। मुदा ककर पाठ संकलित, ककर बोली
मानक, आ अपमानजनक अर्थ कोना चिह्वित--सम्पादकीय निर्णय सत्ता रखैत अछि।
शब्दकोश वास्तविक प्रयोग छिपा नहि सकैत, मुदा हानिकारक पदक चेतावनी आ ऐतिहासिक सन्दर्भ दे सकैत
अछि। वर्णन आ समर्थन अलग।
मैथिली शब्दकोशमे क्षेत्रीय रूप, उदाहरण, काल-सूचना आ स्रोत बढ़ाओल जाए। जीवित समुदाय सुधारक
प्रतिक्रिया दे सकय।
60.13 न्यायालयक भाषा
नागरिक जँ आरोप, गवाही वा निर्णयक भाषा नहि बुझय, तँ औपचारिक सुनवाई वास्तविक न्याय नहि।
अनुवादकक गुणवत्ता, तकनीकी पद आ दस्तावेजक उपलब्धता अधिकारक शर्त छथि।
शब्दशः अनुवाद कखनो कानूनी अर्थ farsa; प्रशिक्षित दुभाषिया अर्थ, स्वर आ अनिश्चितता अलग दे।
पक्षकारके अनुवाद चुनौती देबाक अवसर हो।
स्थानीय भाषा उपयोग गति घटा सकैत--एहन आपत्ति प्रशासनिक तैयारीक प्रश्न अछि, अधिकार नकारबाक
कारण नहि। मानक शब्दावली आ प्रशिक्षण बनाओल जाए।
60.14 हास्य, व्यंग्य आ सत्ता
हास्य शक्तिशालीक आलोचना, भय घटेबा आ असहमति व्यक्त करबाक साधन। मुदा कमजोर समूहक स्थायी
Se दोहराबि अपमान सामान्य बना सकैत अछि। समान वाक्य वक्ता, लक्ष्य आ प्रसंग अनुसार भिन्न प्रभाव
दैत।
आहत भावना मात्र सेंसरशिपक पर्याप्त कारण नहि। प्रत्यक्ष धमकी, लक्षित उत्पीड़न आ पदानुक्रमक
पुनरुत्पादन अलग जाँचल जाए।
उत्तर प्रतिबन्ध मात्र नहि; प्रतिहास्य, आलोचना आ मंचक विविधता सेहो। सत्ता स्वयं व्यंग्य सहय, नागरिकक
सुरक्षा बनल रहय।
60.15 पूर्वपक्षः भाषा बदललास वास्तविकता नहि बदलत
ई आपत्ति उचित स्मरण अछि जे सम्मानजनक पद गरीबी वा हिंसा समाप्त नहि करेत। शब्द-सुधार सस्ता
प्रतीक बनि संरचनात्मक काज टारि सकैत अछि।
मुदा भाषा अपेक्षा, वर्गीकरण आ शिकायतक सम्भावना प्रभावित करैत अछि। अपमानजनक सम्बोधन संस्था
भीतर निम्न दर्जा पुनः स्थापित करैत अछि।
समाधान “शब्द की संरचना'क झूठा चुनाव नहि। नाम, नियम, संसाधन आ प्रतिनिधित्व एक संग बदलय।
प्रभाव मापल जाए।
60.7 नामकरण आ प्रशासन
प्रशासन लोककेँ लाभार्थी, प्रवासी, पिछड़ा, अवैध वा विकलांग-जकाँ श्रेणीमे रखैत अछि। श्रेणी नीति सम्भव
बनबैत, मुदा वयक्तिक जटिलता घटबैत आ कलंक उत्पन्न करि सकैत अछि।
नाम ककर उद्देश्य लेल, कोन प्रमाणपर, आ व्यक्ति अपील करि सकैत अछि की नहि--ई प्रश्न आवश्यक।
आत्मसम्मानजनक भाषा संग अधिकारक वास्तविक पहुँच जुड़ल हो।
60.8 मौन करबाक विधि
आवाज केवल प्रत्यक्ष निषेधसँ नहि दबैत। एजेंडा बाहर रखब, तकनीकी भाषा, समय नहि देब, उपहास वा
शिकायतक प्रतिशोध मौन बनबैत अछि।
सुनवाईक माप बोलनिहारक संख्या मात्र नहि। ककर प्रश्न निर्णय बदलि सकैत, ककर साक्ष्य दर्ज होइत, आ
उत्तर देल जाइत अछि की नहि--ई देखल जाए।
60.9 विमर्श आ वस्तुगत प्रतिरोध
विमर्श वस्तु्के वर्गीकृत आ अर्थवान बनबैत अछि; “रोग”, “अपराध” वा “सामान्यता'क संस्था जीवनपर प्रभाव
दैत अछि। मुदा भाषा मनमाना SUS वास्तविकता बनबैत नहि। शरीर, हानि आ परिणाम दाबीकें प्रतिरोध करेत
अछि।
समानान्तर दृष्टि भाषिक निर्माण आ बाह्य यथार्थ दुनू रखैत अछि। श्रेणी इतिहास जाँचल जाए, संगहि
अनुभवजन्य प्रभाव मापल जाए।
60.10 भाषिक शिष्टता आ संरचनात्मक परिवर्तन
सम्मानजनक शब्द अपमान घटा सकैत अछि, मुदा केवल शब्द बदलि संस्था समान नहि भऽ जाइत। नूतन
नाम पुरान भेदभाव ढाँकि सकैत अछि।
भाषा आ संसाधन दुनू बदलय। अपमानजनक पद हटाओल जाए, संगहि भर्ती, शिक्षा, सेवा आ न्यायमे
असमान परिणाम सुधारल जाए। प्रतीक आ संरचना परस्पर पूरक छथि।
60.11 मैथिलीमे ज्ञान-निर्माण
मैथिलीमे दर्शन लिखब केवल तैयार विचारक अनुवाद नहि। स्थानीय उदाहरण, व्याकरणिक साधन आ जीवित
पद नूतन प्रश्न खोलि सकैत अछि। मुदा स्थानीयता नामपर तकनीकी अस्पष्टता स्वीकार्य नहि।
शब्दावली खुलल, परिभाषित आ समीक्षा योग्य हो। संस्कृत, अन्य भारतीय भाषा आ अंग्रेजीसँ संवाद हो,
मुदा मैथिली वाक्य-विन्यास स्वाभाविक रहय। ज्ञानक गरिमा भाषिक शुद्धतावाद नहि, विचारक क्षमता बढ़ेबामे
अछि।