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परम्परागत नैतिकता मुख्यतः वर्तमान मनुष्यसभक सम्बन्धपर केन्द्रित रहल। मुदा पर्यावरणीय संकट प्रश्न
बदलि दैत अछि। अजन्मा पीढ़ीक प्रति हमर दायित्व अछि? प्रजाति केवल मानव उपयोगक साधन अछि?
नदीक मूल्य केवल बाजार-मूल्य? जे निर्णय आज लैत छी ओकर परिणाम सैकड़ों वर्ष बादक जीवन प्रभावित
करेत अछि--तखन नैतिक समुदायक सीमा वर्तमान नागरिक धरि किएक रहत?
64.1 कालातीत नैतिक उत्तरदायित्व
भावी पीढ़ी एखन मतदान नहि HS सकैत अछि, अनुबन्ध नहि HS सकैत अछि, विरोध प्रदर्शन नहि HS सकैत
अछि। तथापि वर्तमान निर्णय ओकर जल, वायु, भूमि, जलवायु आ जैवविविधता प्रभावित करैत अछि। शक्ति
जँ एकतरफा अछि तँ उत्तरदायित्वक प्रश्न अधिक तीक्ष्ण होइत अछि। समानान्तर दर्शन कहैत अछि-_जे
व्यक्ति उपस्थित नहि, ओकर गरिमा शून्य नहि।
64.2 प्रकृतिक मूल्य
पर्यावरणकेँ केवल संसाधन मानलासँ नदी = पानी, जंगल = लकड़ी, भूमि = बाजार-मूल्य भऽ जाइत अछि।
मुदा प्रकृति पारिस्थितिक तन्त्र, जीवित समुदाय, सांस्कृतिक स्मृति आ भविष्यक आधार सेहो अछि। एतय दू
अतिवाद टारबाक चाही: प्रकृतिमे मनुष्यक प्रत्येक हस्तक्षेप अनैतिक--ई असम्भव; आ मनुष्यक उपयोगे
प्रकृतिक एकमात्र मूल्य--ई संकुचित।
64.3 अहिंसा, पारस्परिकता आ आधुनिक विज्ञान
जैन अहिंसा, बौद्ध परस्पर-निर्भरता, भारतीय लोक-प्रकृति परम्परा आ आधुनिक पर्यावरण-विज्ञानक बीच
संवाद सम्भव अछि, मुदा झूठी समानता नहि। प्राचीन ग्रन्थ आधुनिक जलवायु-विज्ञान “पहिने सँ? जानैत छल
एहन दावा अनुचित। फलदायी तुलना नैतिक संवेदनशीलता, जीवनक पारस्परिकता आ संयमक प्रशनपर हो
सकैत अछि; अनुभवजन्य जलवायु-दाबी आधुनिक विज्ञानक प्रमाणपर निर्भर रहत।
64.4 पर्यावरणीय न्याय
प्रदूषण आ जलवायु-जोखिम समान रूपसँ वितरित नहि होइत अछि। गरीब, आदिवासी, नदी-निर्भर, तटीय,
कृषक आ श्रमिक समुदाय अधिक जोखिम झेलि सकैत छथि, जखन संसाधन-उपभोगक लाभ अन्यत्र केन्द्रित
हो। तें पर्यावरणीय नैतिकता केवल 'प्रकृति प्रेम' नहि; वितरण, प्रतिनिधित्व, विस्थापन, स्वास्थ्य आ
आजीविकाक न्याय सेहो अछि।
64.5 मिथिला: नदी, बाढ़ आ जीवन
मिथिलाक भूगोल नदी, बाढ़, जल-जमाव, कृषि, प्रवास आ सीमापार जल-प्रणालीसँ गहिर सम्बन्ध रखैत
अछि। बाढ़कें केवल “आपदा” वा केवल "प्राकृतिक चक्र” कहब पर्याप्त नहि। तटबन्ध, बसावट, भूमि-उपयोग,
अवसादन, प्रशासन, जलनिकासी आ स्थानीय अनुभव सभक संयुक्त अध्ययन आवश्यक अछि। समानान्तर
दर्शन एतय स्थानीय ज्ञानकें सुनैत अछि, मुदा वैज्ञानिक जलविज्ञानक विकल्प नहि बनबैत।
64.6 सावधानी सिद्धान्त
जतय सम्भावित हानि विशाल वा अपरिवर्तनीय हो, पूर्ण निश्चितताक प्रतीक्षा स्वयं जोखिमपूर्ण भऽ सकैत
अछि। मुदा सावधानी सिद्धान्त “कोनो जोखिम नहिःक असम्भव माँग सेहो नहि। नीति मे जोखिमक आकार,
सम्भाव्यता, विकल्प, लागत, लाभ आ असमान वितरणक तुलनात्मक परीक्षण आवश्यक अछि।
64.7 विकासक अर्थ
GDP, सड़क, बिजली, उद्योग--विकासक महत्त्वपूर्ण संकेत हो सकैत अछि, मुदा पूर्ण परिभाषा नहि। जँ
आर्थिक वृद्धि दीर्घकालिक जल-विनाश, स्वास्थ्य-हानि वा विस्थापनक मूल्य लुकबैत अछि, तँ विकासक लेखा
अधूरा। समानान्तर दर्शन विकासकें गरिमा, आजीविका, पारिस्थितिक स्थायित्व आ भावी विकल्पसँ जोड़ेत
अछि।
पूर्वपक्षः भावी पीढ़ीक अधिकार कोना, जखन ओ एखन अस्तित्वमे नहि?
उत्तरपक्षः अधिकारक दार्शनिक भाषा विवादित हो सकैत अछि, मुदा कमसँ कम एतेक स्पष्ट अछि जे वर्तमान
पीढ़ी एहन अपरिवर्तनीय क्षति करबाक असीम अनुमति नहि रखैत जे भविष्यक मनुष्यक मूल जीवन-शर्त नष्ट
करय। शक्ति भविष्यपर अछि, ते जिम्मेवारी सेहो अछि।
64.13 जलवायु-जोखिम आ स्थानीय निर्णय
दीर्घकालीन जलवायु प्रवृत्ति व्यापक नमूना सँ बुझल जाइत, मुदा गामक एक बाढ़ वा एक वर्षक मौसमसँ सीधा
निष्कर्ष नहि। स्थानीय योजना व्यापक विज्ञान आ स्थानीय भूगोल दुनू जोड़य।
पूर्वानुमान सम्भाव्यता रूपमे आए; प्रशासन निश्चित तिथि-जकाँ प्रस्तुत नहि करय। जोखिम मानचित्र भूमि-
मूल्य आ विस्थापनपर प्रभाव दैत, तेँ पद्धति सार्वजनिक हो।
अनिश्चितता तैयारी टारबाक कारण नहि। सुरक्षित भवन, चेतावनी आ निकास अनेक सम्भावित भविष्य मे
उपयोगी उपाय हो सकैत।
64.14 विस्थापन आ स्थानक गरिमा
परियोजना वा पर्यावरणीय जोखिम कारण पुनर्वास केवल घरक मूल्य देब नहि। आजीविका, पड़ोस, पूजा-
स्थल, भाषा आ स्मृति स्थानसँ जुड़ल अछि। नकद मुआवजा सभ सम्बन्ध पुननिर्मित नहि करैत।
प्रभावित लोक निर्णयपूर्व जानकारी, विकल्प आ मोल-भावक सामूहिक शक्ति पाबथि। कमजोर स्वामित्व-
कागजवला निवासी अदृश्य नहि हो।
जहाँ स्थानान्तरण अपरिहार्य, सेवा पहिले तैयार, आजीविका संक्रमण सुरक्षित, आ दीर्घकालीन परिणाम
जाँचल जाए। सहमति एक बेरक हस्ताक्षर नहि।
64.15 सामान्य संसाधनक शासन
तालाब, वन वा चरागाह न पूर्ण निजी, न खुलल लूट होय। समुदाय नियम, निगरानी आ दण्ड बनाबि साझा
संसाधन टिकाबि सकैत अछि। मुदा “समुदाय” भीतर शक्ति-असमानता ध्यानमे रहय।
बाहरी राज्य नियम स्थानीय ज्ञान बिना विफल, आ स्थानीय प्रभुत्व कमजोर उपयोगकर्ताकिं बाहर करि सकैत।
बहुस्तरीय शासन, स्पष्ट सीमा आ अपील चाही।
संसाधनक वहन-क्षमता अनुभवजन्य जाँच माँगैत। परम्परागत नियम उपयोगी प्रमाण, अचूकता नहि।
64.16 पूर्वपक्ष: गरीब समाज पर्यावरण वहन नहि कऽ सकैत
विकास लेल ऊर्जा, सड़क आ उद्योग चाही; पर्यावरणीय मानक गरीबक प्रगति रोकैत--एहन आपत्ति उठैत
अछि। ऐतिहासिक उत्सर्जन आ संसाधन-उपयोगक असमानता एहि तर्ककेँ बल दैत अछि।
मुदा प्रदूषणक हानि स्वयं गरीबपर अधिक पड़ैत अछि। स्वच्छ तकनीकक लागत वैश्विक आ राष्ट्रिय न्याय
अनुसार बाँटल जाए; विकासक नामपर कमजो र क्षेत्र बलिदान नहि।
न्यायपूर्ण संक्रमण समान परिणाम नहि, भिन्न जिम्मेदारी आ क्षमता अनुसार योगदान माँगैत अछि। स्थानीय
रोजगार आ स्वास्थ्य दुनू लक्ष्य हो।
64.8 जोखिम आ सावधानी
पर्यावरणीय निर्णयमे पूर्ण निश्चितता दुर्लभ। सम्भावित हानि गंभीर, व्यापक वा अपरिवर्तनीय हो तखन प्रमाणक
अभाव निष्क्रियताक स्वतः कारण नहि। सावधानी सिद्धान्त जोखिमक भार पुनर्वितरित करैत अछि।
मुदा हर सम्भावना पर सम्पूर्ण रोक नवोन्मेष असम्भव करि सकैत। सम्भाव्यता, हानिक परिमाण, विकल्प,
निगरानी आ उलटबाक क्षमता अनुसार अनुपातिक सावधानी हो।
64.9 पर्यावरणीय लागतक वितरण
प्रदूषण वा बाढ़क जोखिम प्रायः गरीब, निम्न भूभाग वा कम राजनीतिक आवाजवला समुदायपर अधिक पड़ैत
अछि, जखनकि लाभ अन्यत्र जाए। औसत लाभ एहि वितरणकें छिपा सकैत अछि।
परियोजना मूल्यांकनमे ककर भूमि, स्वास्थ्य, आजीविका आ संस्कृति प्रभावित से देखल जाए। मुआवजा
सहमति आ अपरिवर्तनीय हानिक पूर्ण विकल्प नहि।
64.10 नदीक सम्बन्धात्मक मूल्य
नदी जलक मात्रा मात्र नहि; कृषि, माछ, गाद, तीर्थ, भाषा, स्मृति आ सीमा बनबैत अछि। एक उद्देश्य लेल
नियन्त्रण दोसर सम्बन्ध नष्ट करि सकैत अछि।
नदीक रोमानी पूजासँ बाढ़, कटाव वा रोगक तथ्य नकारल नहि जाए। अभियांत्रिकी, पारिस्थितिकी आ स्थानीय
अनुभव संयुक्त योजना बनाबय। मिथिलाक नदी-जीवन बहुकारणीय अध्ययन माँगैत अछि।
64.11 मानवेतर जीवक नैतिक दर्जा
पीड़ा अनुभव करबाक क्षमता पशुक हितक कारण दैत अछि। प्रजाति भिन्न होयब मनमाना क्रूरता उचित नहि
करैत। पारिस्थितिकी तंत्रक मूल्य व्यक्तिगत जीवक पीड़ासँ अलग प्रश्न हो सकैत अछि।
भोजन, अनुसंधान आ संरक्षणमे आवश्यकता, विकल्प आ हानि घटेबाक कसौटी लागू हो। मनुष्यक हित शून्य
नहि, मुदा एकमात्र नैतिक मूल्य सेहो नहि।
64.12 न्यायपूर्ण संक्रमण
प्रदूषणकारी उद्योग घटेब आवश्यक हो सकैत, मुदा श्रमिक आ स्थानीय अर्थव्यवस्था अचानक बेरोजगार भऽ
सकैत अछि। पर्यावरणीय नीति लागत कमजोरपर डालि न्यायपूर्ण नहि बनत।
प्रशिक्षण, आय-सुरक्षा, स्थानीय निवेश आ निर्णयमे भागीदारी चाही। संक्रमणक गति वैज्ञानिक जोखिम आ
सामाजिक क्षमता दुनू ध्यानमे रखय।
अध्याय-निष्कर्ष
पर्यावरणीय नैतिकता मनुष्यकें प्रकृतिसँ अलग राजा मानबाक दृष्टि पर प्रश्न उठबैत अछि। भावी पीढ़ी, गैर-
मानवीय जीवन, स्थानीय समुदाय, वैज्ञानिक प्रमाण आ विकासक आवश्यकता--सभकें एकहि विवेकपूर्ण
संरचनामे राखब आवश्यक अछि। समानान्तर दर्शनक पर्यावरणीय सूत्र अछि--आजक सुविधा भविष्यक
अस्तित्वक मूल्यपर नहि।
अध्याय-ग्रन्थसूचौ
Aldo Leopold — A Sand County Almanac.
Hans Jonas — The Imperative of Responsibility.
Peter Singer — चयनित environmental ethics लेख.
Amartya Sen — Development as Freedom.
IPCC — Assessment Reports (वैज्ञानिक पृष्ठभूमि हेतु).