दोसर सिद्धान्त अछि--सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद। एकर आरम्भ दू अतिवादक अस्वीकृतिसँ होइत अछि। पहिल, जगत केवल हमर चेतना वा भाषाक निर्माण अछि; दोसर, वास्तविकता केवल अलग-अलग वस्तुसभक निष्प्राण ढेर अछि, सम्बन्धक कोनो मूल महत्त्व नहि। समानान्तर दर्शन कहैत अछि--जगत हमर इच्छासँ स्वतंत्र प्रतिरोध रखैत अछि, मुदा हम ओकरा सदैव सम्बन्ध, शरीर, भाषा, इतिहास आ सामाजिक स्थिति मार्फत अनुभव करैत छी। 66.1 वस्तुगत प्रतिरोध आगि हमर मतपर निर्भर नहि जे ओ जरेत की नहि; रोग, बाढ़, गुरुत्व, भूख, शरीरक क्षति, वस्तुक भार-ई सभ वास्तविकता हमर पसन्दसँँ बाहर प्रतिरोध करैत अछि। एहि कारण सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद सापेक्षतावाद नहि। “हमरा एना लगैत अछि” आ “वास्तवमे एना अछि” बीच भेद बनल रहैत अछि। प्रमाण, परीक्षण आ सुधारक आवश्यकता एतहि सँ निकलैत अछि। 66.2 सम्बन्ध वास्तविक अछि मुदा deh केवल एकाकी पदार्थ मानब अधूरा अछि। मनुष्य पुत्र, माता, नागरिक, श्रमिक, भाषिक व्यक्ति, मित्र, पड़ोसी, जैविक जीव आ ऐतिहासिक उत्तराधिकारी--अनेक सम्बन्धमे एकहि समय अस्तित्व रखैत अछि। समाज केवल व्यक्तिसभक जोड़ नहि; संस्था, नियम, भाषा, स्मृति आ सत्ता सम्बन्धक संरचना बनबैत अछि। नदी केवल जलराशि नहि; पारिस्थितिकी, कृषि, भूगोल, स्मृति आ आजीविकाक सम्बन्ध सेहो अछि। 66.3 व्यक्ति आ समाज सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद व्यक्तिक स्वतंत्र गरिमा स्वीकारैत अछि, मुदा ओकरा समाजसँ बाहर कल्पित आत्मनिर्भर परमाणु नहि मानैत। व्यक्ति भाषा, पालन-पोषण, शिक्षा, संसाधन आ संस्थाक मार्फत विकसित होइत अछि। तैओ समाज व्यक्ति पर पूर्ण अधिकार नहि रखैत। सम्बन्ध व्यक्ति बनबैत अछि; व्यक्ति सेहो सम्बन्ध बदलि सकैत अछि। एहि द्विपक्षीयतामे स्वतंत्रता आ उत्तरदायित्व दुनू स्थान पबैत अछि। 66.4 अनुभव आ वस्तु एकहि वास्तविकता अलग सामाजिक स्थानसँ अलग रूपमे अनुभव हो सकैत अछि। बाढ़ अधिकारी लेल आपदा-आँकड़ा, किसान लेल फसलक विनाश, बच्चा लेल स्कूल टूटबाक अनुभव, आ प्रवासी परिवार लेल विस्थापन भऽ सकैत अछि। ई अनेक अनुभव वास्तविकताकें मनमाना नहि बनबैत; बल्कि ओकर बहुस्तरीयता देखबैत अछि। वस्तुगत घटना एक, ओकर मानवीय सम्बन्ध अनेक। 66.5 भारतीय आ पाश्चात्य संवाद न्याय-वैशेषिकक वस्तुवादी प्रवृत्ति, बौद्ध प्रतीत्यसमुत्पादक सम्बन्ध-संवेदनशीलता, जैन अनेकान्तक बहुपक्षीयता, अरस्तूक सामाजिक मनुष्य, हेगेलक मान्यता-विमर्श आ समकालीन सम्बन्धात्मक दर्शन-सभसँ संरचनात्मक संवाद सम्भव अछि। मुदा एहि ग्रन्थक सिद्धान्त कोनो एक परम्पराक पुनरावृत्ति नहि; ई एहि प्रश्नक स्वतन्त्र उत्तर अछि जे वस्तुगतता आ सम्बन्धात्मक अनुभवकेँ एक संग कोना राखल जाए। 66.6 पूर्वपक्षः सम्बन्ध मानलासँ वस्तुगत सत्य कमजोर होयत आपत्ति ई जे जे प्रत्येक ज्ञान सामाजिक सम्बन्धमे बनैत अछि, तखन सत्य सत्ता वा दृष्टिकोणक खेल बनि जाएत। उत्तरपक्षः ज्ञान सम्बन्धित, वस्तु प्रतिरोधी ज्ञाता सम्बन्धित अछि; सत्य केवल सम्बन्धक इच्छा नहि। हमर वर्णन भाषा आ दुष्टिकोणसँ प्रभावित भऽ सकैत अछि, मुदा जगत गलत वर्णनकें विफल करेत अछि। चिकित्सा, इंजीनियरी, कृषि आ इतिहास--सभमे वास्तविक प्रतिरोध wae सीमा निर्धारित करैत अछि। तेँ सम्बन्धात्मकता ज्ञानक स्थिति sada अछि, सत्यक मनमानापन नहि। 66.12 कारणक सम्बन्धात्मक जाल घटना प्रायः एक कारणसँ नहि, अनेक शर्तक जालसँ होइत। बाढ़मे वर्षा, नदी-पथ, बाँध, बसावट आ चेतावनी संयुक्त। “मुख्य कारण? प्रशन उद्देश्य अनुसार बदलि सकैत-_वैज्ञानिक व्याख्या, कानूनी दोष वा रोकथाम। बहुकारणीयता जिम्मेदारी धुँधला नहि करय। जे अभिकर्ता ज्ञात जोखिम नियंत्रित कारि सकैत छल ओकर भूमिका अलग चिन्हित हो। सम्बन्ध देखब अनन्त सूची नहि। आवश्यक, पर्याप्त, योगदानकारी आ पृष्ठभूमि शर्त अलग कएल जाए। 66.13 देह-परिवेशक सम्बन्ध क्षमता शरीर भीतरक गुण मात्र नहि। व्हीलचेयर उपयोगकर्ताक गतिशीलता सड़क, भवन आ परिवहनसँ संयुक्त बनैत अछि। परिवेश बदलला पर 'अक्षमता'क सामाजिक परिणाम बदलि सकैत। एहि दृष्टिसँ देहक वास्तविकता नकारल नहि। चिकित्सा आ सुलभ परिवेश अलग, पूरक उपाय। व्यक्ति कें सुधारक एकमात्र वस्तु मानब अन्याय। नीति प्रभावित व्यक्तिक अनुभव, तकनीकी मानक आ संसाधन जोड़य। सार्वभौम रचना अधिक लोकक क्षमता बढ़बैत अछि। 66.14 सम्बन्ध टूटबाक नेतिकता सभ सम्बन्ध बचायब आवश्यक नहि। हिंसक परिवार, शोषक काम वा दमनकारी समुदाय छोड़ब गरिमाक रक्षा भऽ सकैत। सहअस्तित्व निकासक अधिकार बिना बन्धन बनि जाइत। निकासक निर्णय दोसरपर वास्तविक दायित्व छोड़ि सकैत--बालक, ऋण वा साझा संसाधन। जिम्मेदारी स्पष्ट कऽ सुरक्षित पृथक्करण हो। समाज निकासक लागत घटाबय: आश्रय, कानून, आय आ नूतन सम्बन्ध। केवल “छोड़ि दिअ” सलाह निर्भरता नहि बुझैत। 66.15 पूर्वपक्षः सम्बन्धपर बल व्यक्तिक अधिकार कमजोर करैत समुदायिक सम्बन्धक महत्त्व कहला पर व्यक्ति परिवार वा परम्पराक अधीन होयत--ई भय ऐतिहासिक रूपसँ उचित। सामूहिक हितक नामपर असहमति दबाओल गेल अछि। सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद अधिकारकें सम्बन्ध-विरोधी नहि, न्यायपूर्ण सम्बन्धक शर्त मानैत अछि। सहमति, आवाज, निकास आ समान दर्जा बिना सम्बन्ध वैध नहि। व्यक्ति सेहो दूसरक देखभाल आ सार्वजनिक साधनपर निर्भर; अधिकार संग दायित्व हो। दायित्व पारस्परिक आ अनुपातिक, जन्मगत अधीनता नहि। 66.7 वस्तु आ सम्बन्धक सह-वास्तविकता वस्तु केवल सम्बन्धक गाँठ नहि, कारण ओकर गुण आ प्रतिरोध सम्बन्ध बदललासँ तुरन्त समाप्त नहि होइत। मुदा वस्तु पूर्ण पृथक सार सेहो नहि; पहचान इतिहास, उपयोग आ अन्य वस्तुसँ सम्बन्धमे खुलैत अछि। सहअस्तित्वात्मक यथार्थवाद दूनू अतिवाद रोकैत अछि। नदी भौतिक प्रवाह अछि आ समुदायिक जीवनक सम्बन्ध सेहो। सामाजिक अर्थ जलक गुण नकारैत नहि; भौतिक वर्णन सांस्कृतिक अर्थ समाप्त नहि करैत। 66.8 निर्भरता आ स्वायत्तता मानवीय स्वायत्तता निर्भरता-विहीनता नहि। भाषा, देखभाल आ संस्था क्षमता बनबैत अछि। प्रश्‍न ई जे निर्भर सम्बन्ध व्यक्तिक आवाज बढ़बैत अछि की मनमाना नियन्त्रण। सहायता देनिहारक शक्ति नियम, सम्मान आ अपीलसँ सीमित हो। प्राप्तकर्ता कृतज्ञताक ऋणमे अधिकार नहि गमाय। सम्बन्धात्मक स्वतंत्रता सहयोग भीतर प्रभुत्व-विरोधी सुरक्षा अछि। 66.9 दृष्टिकोण आ वस्तुगत प्रतिरोध ज्ञान सदैव कोनो VAS अबैत अछि। किसान, अभियन्ता आ नदीक किनारक निवासी एकहि seh अलग पक्ष देखैत छथि। ककरो दृष्टि पूर्ण नहि, मुदा सभ समान रूपसँ प्रासंगिक सेहो नहि। वस्तुगतता दृष्टिहीनता नहि, दृष्टिसभक आलोचनात्मक संयोजन अछि। मापन, अनुभव, इतिहास आ प्रतिवाद जोड़ल जाए। जे निष्कर्ष अनेक स्वतंत्र दृष्टि सहैत अछि ओकर विश्वसनीयता बढ़त अछि। 66.10 संस्था सम्बन्धक स्थिर रूप कानून, बाजार, परिवार आ विश्वविद्यालय दोहराओल सम्बन्धकें स्थिर करैत अछि। संस्था व्यक्तिसँ अधिक टिकैत, मुदा व्यक्तिक क्रिया बिना अस्तित्व नहि रखैत। एहि कारण परिवर्तन केवल मन बदललास नहि, नियम आ संसाधन बदललासँ सेहो होयत। मुदा संस्था कें दानव-जकाँ स्वतंत्र अभिकर्ता मानि व्यक्तिगत जिम्मेदारी मिटाओल नहि जाए। स्तर अलग रखल जाए। 66.11 संघर्ष आ सहअस्तित्व सहअस्तित्वक अर्थ संघर्षक अभाव नहि। संसाधन, मूल्य आ पहचानक वास्तविक मतभेद रहत। प्रश्‍न ई जे संघर्ष हिंसा आ अपमान बिना कोना संस्थागत हो। निष्पक्ष प्रक्रिया, अधिकारक सीमा, अस्थायी समझौता आ पुनर्विचारक मार्ग चाही। कृत्रिम सामंजस्य कमजोरक मौनपर टिकि सकैत अछि; खुलल असहमति अधिक स्थायी शान्तिक आधार बनि सकैत अछि। अध्याय-निष्कर्ष सहअस्तित्वात्मक यथार्थवादक सूत्र अछि-वास्तविकता हमर इच्छासँ स्वतंत्र अछि, मुदा ओकर मानवीय अनुभव सम्बन्धक जालमे घटैत अछि। व्यक्ति वास्तविक, समाज वास्तविक; शरीर वास्तविक, अर्थ वास्तविक; वस्तु वास्तविक, सम्बन्ध सेहो वास्तविक। ई सिद्धान्त कठोर व्यक्तिवाद आ कठोर सामूहिकतावाद दुनूक विकल्प प्रस्तुत करैत अछि। अध्याय-ग्रन्थसूचौ गौतम — Nyaya-sitra. कणाद — Vaisesika-sutra. नागार्जुन — Milamadhyamakakarika. उमास्वाति — Tattvarthasutra. Aristotle — Politics. Charles Taylor — Sources of the Self.