समस्या आधुनिक विश्वविद्यालयीय दर्शनक पाठ्यक्रम बहुत बेर एहन ढाँचामे बनल देखाइत अछि जाहिमे एक दिस “पाश्चात्य दर्शन”क इतिहास प्राचीन यूनानसँ आधुनिक विश्लेषणात्मक वा महाद्वीपीय प्रवाह धरि निरन्तर कथा जकाँ प्रस्तुत होइत अछि, आ दोसर दिस “भारतीय दर्शन”केँ पृथक् खण्डमे धर्म, मोक्ष, आत्मा, कर्म अथवा षड्दर्शनक सूची रूपमे राखि देल जाइत अछि। एहि व्यवस्था सँ एक गंभीर बौद्धिक भ्रम उत्पन्न होइत अछि—मानो दर्शनक सामान्य इतिहास पश्चिमक इतिहास हो, आ भारत ओकर एक विशेष सांस्कृतिक परिशिष्ट। एहि विभाजनक कारण भारतीय दार्शनिक परम्पराक मूल प्रश्नसभ—प्रमाण, प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, अभाव, अर्थ, वाक्य, सार्वभौम, कारणता, आत्म, अनात्म, मुक्ति, कर्तव्य, भाषा, तर्क, विवाद, अनुभूति आ यथार्थ—विश्व-दर्शनक साझा प्रश्नक रूपमे देखाइत नहि। उलटे भारतीय परम्पराकेँ बहुत बेर केवल “आध्यात्मिक” अथवा “धार्मिक” कहि देल जाइत अछि, जखन कि न्याय, मीमांसा, बौद्ध प्रमाणमीमांसा, व्याकरण, जैन तर्क, वेदान्त, लोकायत आ नव्य-न्याय सभमे कठोर अवधारणात्मक विश्लेषण, प्रतिपक्ष, प्रमाण-विवेक आ दार्शनिक असहमति विद्यमान अछि। मुदा एहि आलोचनाक उलटा संकट सेहो अछि। जँ भारतीय दर्शनकेँ सम्मान देबाक नामपर ई कहल जाए जे आधुनिक विश्लेषणात्मक दर्शन, भाषिक दर्शन, संरचनावाद, उत्तर-आधुनिकता अथवा विज्ञान-दर्शनक सभ विचार भारतमे पहिनहि उपलब्ध छल, तँ इतिहास पुनः विकृत होयत। वास्तविक सम्मान प्राचीनता-दाबीसँ नहि, स्वतंत्र प्रश्न-संरचना आ तर्कक गंभीर अध्ययनसँ अबैत अछि। एहि अध्यायक समस्या तेँ दूहरी अछि: पहिल—भारतीय दर्शनकेँ विश्व-दर्शनक नक्शामे एक पृथक् सांस्कृतिक द्वीप नहि, बराबरीक बौद्धिक परम्परा रूपमे कोना पढ़ल जाए? दोसर—तुलना कोना कएल जाए जाहिमे न पश्चिम केन्द्र बनय, न भारतीय गौरववाद इतिहासक स्थान लय? मूल प्रतिपादन एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे भारतीय दर्शनकेँ “विश्लेषणात्मक” अथवा “महाद्वीपीय” कोनो एक श्रेणीमे रखब अनुचित अछि। भारतीय परम्परासभ अपन स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रश्न, पद्धति, भाषिक उपकरण, ग्रन्थपरम्परा आ संस्थागत जीवन रखैत छथि। मुदा हुनकर प्रश्नसभ विश्व-दर्शनक सामान्य प्रश्नसँ पूर्णतः पृथक् सेहो नहि। अतः भारतीय दर्शनक उचित स्थान पाश्चात्य नक्शाक भीतर खाली कोठली खोजब नहि, बल्कि नक्शाक रूपरेखा स्वयं बहुकेन्द्रिक बनायब अछि। दर्शनक इतिहास एकटा केन्द्रसँ बाहर फैलैत रेखा नहि; अनेक केन्द्र, परम्परा, भाषा, शास्त्रार्थ आ अनुवादक परस्पर सम्पर्कक इतिहास अछि। समानान्तर दर्शन एहि बहुकेन्द्रिक नक्शामे भारतकेँ “परिशिष्ट” नहि, स्वतंत्र संवाद-पक्ष मानैत अछि। न्याय–नव्य-न्याय प्रमाण आ तर्कक सूक्ष्मता लैत अछि; मीमांसा भाषा, कर्तव्य आ व्याख्याक प्रश्न; बौद्ध दर्शन अनात्मा, क्षणिकता, प्रतीत्यसमुत्पाद, शून्यता आ ज्ञानक आलोचना; जैन दर्शन अनेकान्त, नय आ शर्तबद्ध कथन; वेदान्त आत्म–ब्रह्म–जगतक सम्बन्ध; लोकायत भौतिकताक चुनौती; व्याकरण भाषा–वाक्य–अर्थक व्यापक समस्या। ई सभक आधुनिक तुलना सम्भव अछि, मुदा समानता घोषणा कएने बिना। रंगीन रूपरेखा — दर्शनक बहुकेन्द्रिक नक्षा प्रमुख तर्क पहिल तर्क—“भारतीय दर्शन” स्वयं एकरूप परम्परा नहि। न्याय आ बौद्ध प्रमाणमीमांसा प्रत्यक्ष आ अनुमानक प्रश्नपर असहमत छथि; मीमांसा आ न्याय शब्द-प्रमाणक प्रकृति अलग ढंगसँ बुझैत छथि; अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत आ अन्य वेदान्त-प्रवृत्ति जगत–आत्म–ब्रह्म सम्बन्धपर गम्भीर मतभेद रखैत छथि; जैन अनेकान्तवाद आ बौद्ध शून्यवादक लक्ष्य, भाषा आ तर्क भिन्न छथि। तेँ भारतीय दर्शनकेँ “एक आध्यात्मिक दृष्टि” कहब तर्कगत विविधताकेँ नष्ट करैत अछि। दोसर तर्क—भारतीय परम्परामे दार्शनिकता केवल धार्मिक आस्था नहि। न्यायसूत्रक प्रमाणविचार, गङ्गेशक तत्त्वचिन्तामणिक ज्ञानमीमांसा, मीमांसक वाक्यार्थ-विचार, दिङ्नाग–धर्मकीर्तिक प्रमाणमीमांसा, भर्तृहरिक वाक्य-दर्शन, जैन नयवाद—ई सभ दार्शनिक तर्कक स्वायत्त क्षेत्र खोलैत अछि। धार्मिक पृष्ठभूमि उपस्थित भऽ सकैत अछि, मुदा तर्कक मूल्य ओकरा कारण स्वतः समाप्त नहि होइत। तेसर तर्क—पाश्चात्य दर्शन सेहो धर्मसँ ऐतिहासिक रूपेँ पूर्णतः पृथक् नहि। मध्ययुगीन ईसाई, यहूदी आ इस्लामी दर्शन, आधुनिक ईश्वरवाद-विवाद, नैतिक धर्म-दर्शन आदि देखबैत अछि जे “धर्मसँ सम्बन्ध = दर्शन नहि” एहन कसौटी स्वयं इतिहासविरुद्ध अछि। अतः भारतीय ग्रन्थक धार्मिक सन्दर्भ ओकर दार्शनिक मूल्य घटबैत नहि। चारिम तर्क—औपनिवेशिक आ आधुनिक अकादमिक वर्गीकरण भारतीय दर्शनक अध्ययनक रूप बदललक। “दर्शन”क अंग्रेजी समतुल्य, आस्तिक–नास्तिक, षड्दर्शन, धर्म बनाम दर्शन, शास्त्रीय बनाम लोक—ई सभ श्रेणी उपयोगी भऽ सकैत अछि, मुदा ऐतिहासिक स्रोतक जटिलताकेँ अत्यधिक सरल सेहो करि सकैत अछि। समानान्तर पद्धति श्रेणीकेँ साधन मानैत अछि, सत्यक अन्तिम रूप नहि। पाँचम तर्क—भारतीय दर्शनक आधुनिक पुनर्पाठ केवल परम्पराक संरक्षण नहि, नव समस्या-निर्माण सेहो अछि। के. सी. भट्टाचार्यक स्वराज-विचार, बी. आर. आम्बेडकरक जाति, लोकतन्त्र आ धर्म-समीक्षा, गांधीजीक सभ्यता-विमर्श, रवीन्द्रनाथक मानवतावादी प्रश्न, बी. के. मतिलालक तर्क–भाषा–नैतिकता, दया कृष्णक परम्परा-समालोचना, जे. एन. मोहन्तीक प्रघटनावादी–भारतीय संवाद, जोनार्डन गणेरीक बहुकेन्द्रिक दर्शन-विचार—ई सभ आधुनिक भारतीय दर्शनकेँ जीवित चिन्तन बनबैत अछि। छठम तर्क—समानता खोजब उपयोगी तखन अछि जखन ओ समस्या स्पष्ट करय। उदाहरणार्थ, नव्य-न्याय आ विश्लेषणात्मक दर्शन दुनूमे अवधारणात्मक सूक्ष्मता देखाइत अछि; मीमांसा आ आधुनिक व्याख्या-दर्शन दुनूमे अर्थ–प्रसंग–वाक्यक प्रश्न अछि; बौद्ध अपोह आ आधुनिक अर्थ-दर्शन दुनूमे वर्गीकरणक समस्या अछि। मुदा ई साम्य ऐतिहासिक पहचान वा प्रभाव सिद्ध नहि करैत। सातम तर्क—भारतीय दर्शनक समानान्तर अध्ययन सभसँ फलदायी तखन होइत अछि जखन ओकर आन्तरिक प्रतिपक्ष सुरक्षित रहय। न्यायकेँ पढ़ैत समय बौद्ध आपत्ति, बौद्धकेँ पढ़ैत समय न्यायीय प्रतिवाद, अद्वैतकेँ पढ़ैत समय द्वैत वा विशिष्टाद्वैतक आपत्ति, मीमांसाकेँ पढ़ैत समय भाषा-विवाद—ई सब शास्त्रार्थ दार्शनिक जीवनक वास्तविक आधार छथि। पूर्वपक्ष पूर्वपक्षक पहिल रूप कहि सकैत अछि जे भारतीय दर्शनकेँ विश्व-दर्शनक “बराबरीक पक्ष” बनौनाइ आधुनिक पहचान-राजनीतिक आग्रह अछि। दर्शनक कसौटी भूगोल वा सभ्यता नहि, तर्क अछि; जँ भारतीय ग्रन्थ विश्वस्तरीय दलील रखैत अछि तँ ओकर अध्ययन हो, नहि तँ केवल सांस्कृतिक गौरवक कारण नहि। दोसर पूर्वपक्ष विपरीत दिशासँ अबैत अछि। ओ कहैत अछि जे भारतीय दर्शनकेँ आधुनिक विश्व-दर्शनक कसौटीपर मापब स्वयं औपनिवेशिकता अछि। भारतीय ज्ञानपरम्परा अपन आध्यात्मिक, साधनात्मक आ मोक्षकेन्द्रित आधार पर चलैत अछि; तर्क, भाषा वा विज्ञानक आधुनिक श्रेणीमे ओकरा पढ़ब ओकर आत्माकेँ नष्ट करैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष कहैत अछि जे तुलनात्मक दर्शन प्रायः सतही समानता पैदा करैत अछि—जैँ “नव्य-न्याय = विश्लेषणात्मक दर्शन”, “बौद्ध शून्यता = विखण्डन”, “अनेकान्त = उत्तर-आधुनिक सापेक्षता”। एहन तुलना पाठककेँ भ्रमित करैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष ई अछि जे भारतीय दर्शनक शास्त्रीय ग्रन्थ संस्कृत, पालि, प्राकृत आदि कठिन भाषामे अछि; अनुवादक माध्यमेँ आधुनिक तुलना कएलासँ मूल तकनीकी सूक्ष्मता नष्ट भऽ सकैत अछि। उत्तरपक्ष पहिल पूर्वपक्षक उत्तर ई अछि जे समानान्तर दर्शन भूगोलकेँ सत्यक कसौटी नहि बनबैत। उलटे ओ सभ परम्परापर समान कसौटी लागू करैत अछि—दलील, प्रमाण, परिभाषा, प्रतिपक्ष, सन्दर्भ आ पुनर्परीक्षण। भारतीय ग्रन्थक महत्त्व ‘भारतीय’ होयबाक कारण नहि, बल्कि अपन बौद्धिक प्रश्न आ तर्कक कारण अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—परम्पराक आत्मीयता बचौनाइ आवश्यक अछि, मुदा आत्मीयता आलोचनामुक्ति नहि। मोक्ष, साधना, धर्म, शास्त्र, आत्मा, कर्म आदि शब्दक मूल संदर्भ सुरक्षित रहत; संगहि हुनकर दार्शनिक दाबी जाँचल सेहो जाएत। श्रद्धा आ आलोचना परस्पर विरोधी नहि, जँ आलोचना न्यायपूर्ण हो। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—सरलीकृत समानता सचमुच त्याज्य अछि। समानान्तर पद्धति “समान”, “असमान”, “आंशिक साम्य”, “भिन्न ऐतिहासिक कार्य” आ “अनिर्णीत” जकाँ श्रेणी अलग राखत। तुलनाक मूल्य पूर्वज सिद्ध करब नहि, प्रश्नक नूतन कोण खोलब अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—भाषिक सूक्ष्मता लेल मूल पदावली आवश्यक अछि। तेँ तकनीकी पदक मैथिली रूपान्तर करैत समय मूल संस्कृत/पालि/प्राकृत पद जहाँ जरूरी हो कोष्ठकमे राखल जाएत, ताकि न भाषा-बाधा रहय, न मूल अवधारणाक अर्थ नष्ट हो। यही नियम आधुनिक अंग्रेजी तकनीकी पदपर सेहो लागू होयत—मुख्य प्रस्तुति मैथिलीमे, अंग्रेजी केवल सहायक संकेत रूपमे। भारतीय संवाद भारतीय संवादक पहिल आधार न्याय–नव्य-न्याय अछि। प्रमाणक भेद, प्रत्यक्ष–अनुमान, उपमान, शब्द, अभाव, हेत्वाभास, व्याप्ति, पक्षता, सम्बन्ध, विशेषणता, अवच्छेदकता जकाँ अवधारणासभ दार्शनिक विश्लेषणकेँ अत्यन्त सूक्ष्म बनबैत छथि। आधुनिक ज्ञानमीमांसा, भाषा-दर्शन आ तर्क-विमर्श संग एहि परम्पराक संवाद फलदायी अछि, मुदा एहिमे ऐतिहासिक स्वतन्त्रता अनिवार्य शर्त अछि। मीमांसा भाषा आ कर्तव्यक सम्बन्ध खोलैत अछि। वाक्य अर्थ कोना देइत अछि, पद एक-दोसराक अपेक्षा कोना रखैत अछि, प्रसंग अर्थ बदलबैत अछि की नहि, कथनक उद्देश्य की, विधि आ निषेध कोना कार्य करैत अछि—एहि प्रश्नसभ आधुनिक भाषिक विश्लेषण, विधि-दर्शन, व्याख्या-दर्शन आ नैतिक दर्शनक संग प्रत्यक्ष संवाद बना सकैत अछि। बौद्ध परम्परा आत्म-सत्ता, क्षणिकता, कारणता, प्रत्यक्ष, अवधारणा आ दुःखक जाँच करैत अछि। ई आधुनिक मन-दर्शन, व्यक्तित्व-सातत्य, चेतना-विमर्श, संज्ञान-विज्ञान आ अस्तित्व-दर्शनक प्रश्नक संग संवादक क्षेत्र खोलैत अछि। मुदा अनात्माक अर्थ आधुनिक “स्वयं सामाजिक निर्माण अछि” दाबी मात्र नहि; एकर अपन मोक्षशास्त्रीय आ ज्ञानमीमांसात्मक संदर्भ अछि। जैन दर्शन अनेकान्त आ नयक माध्यमेँ दावा-परिधिक अनुशासन सिखबैत अछि। कोनो कथन कोन दृष्टि, कोन शर्त आ कोन प्रसंगमे सत्य कहल जा रहल अछि—एहि प्रश्नक आधुनिक उपयोग विज्ञान, कानून, इतिहास, विवाद-निवारण आ सार्वजनिक विमर्शमे व्यापक अछि। वेदान्त आत्म, चेतना, जगत, ब्रह्म, भेद–अभेद आ मुक्तिक प्रश्नक विभिन्न उत्तर दैत अछि। एहि परम्पराकेँ केवल “एकत्ववाद” कहि देब अनुचित; अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत आ अन्य प्रवृत्तिक आपसी प्रतिपक्ष ध्यानमे राखब आवश्यक अछि। लोकायत आ भौतिकवादी चुनौती भारतीय दर्शनक नक्शामे विशेष महत्त्व रखैत अछि। देह, इन्द्रिय, प्रत्यक्ष, परलोक-संशय आ धार्मिक अधिकारक आलोचना ई देखबैत अछि जे भारतीय बौद्धिक इतिहास केवल मोक्षवादी सहमतिक इतिहास नहि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मिथिलाक समानान्तर दृष्टि भारतीय दर्शनक एहि पुनर्नक्शांकनमे विशेष भूमिका निभबैत अछि, किएक तँ मिथिला न्याय–नव्य-न्याय, मीमांसा, भाष्य, शास्त्रार्थ, संस्कृत-पाण्डित्य आ जनभाषिक साहित्यक दीर्घ संगम-क्षेत्र रहल अछि। एहि परम्पराक पद्धतिगत शक्ति ‘हम पहिने’ दाबीमे नहि, प्रश्नकेँ सूक्ष्म करबाक अभ्यासमे अछि। गङ्गेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि ज्ञानमीमांसक पुनर्गठनक एक उत्कृष्ट उदाहरण अछि। मुदा गङ्गेशकेँ आधुनिक विश्लेषणात्मक दार्शनिक कहि देब ऐतिहासिक विस्थापन होयत। उचित तुलना ई अछि जे दुनू परम्परा अस्पष्ट दाबीक सीमा कोना निर्धारित करैत अछि, प्रमाणक संरचना कोना जाँचैत अछि, आ प्रतिपक्षक आपत्ति कोना ग्रहण करैत अछि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि संस्कृत शास्त्रीय स्रोतकेँ महत्त्व दैत अछि, मुदा लोकभाषा, मैथिली साहित्य, स्त्री-अनुभव, जातिगत संरचना, पञ्जी-परम्परा, सामाजिक इतिहास, धार्मिक व्यवहार आ आधुनिक संस्थाक अनुभवकेँ दार्शनिक सामग्री बनबासँ रोकैत नहि। दार्शनिकता केवल ग्रन्थागारमे नहि, सामाजिक जीवनक मूल्य-संघर्षमे सेहो उपस्थित अछि। एहि दृष्टिसँ भारतीय दर्शनक पुनर्पाठ दू दिशा एक साथि पकड़ैत अछि—ऊर्ध्व दिशा: अत्यन्त सूक्ष्म शास्त्रीय अवधारणा; क्षैतिज दिशा: समाज, भाषा, इतिहास, क्षेत्र, लोक आ आधुनिक ज्ञान। समानान्तर दर्शनक वैशिष्ट्य ई दुनू दिशा एक-दोसराक सामने खुलल राखब अछि। मिथिलाक पद्धति चारि अनुशासन प्रस्तावित करैत अछि: प्रतिपक्षकेँ विकृत नहि करू; प्रमाणक स्तर स्पष्ट राखू; समानता जतेक अछि ततेक मात्र कहू; आ स्थानीय गौरवकेँ इतिहासक प्रमाणक विकल्प नहि बनाउ। यही अनुशासन भारतीय दर्शनकेँ वैश्विक नक्शामे आत्मसम्मानसहित राखि सकैत अछि। समकालीन प्रयोग आइ भारतीय दर्शनक बहुकेन्द्रिक पुनर्पाठ शिक्षा लेल प्रत्यक्ष उपयोगी अछि। विद्यालय आ विश्वविद्यालयमे दर्शन पढ़बैत समय भारतीय अध्यायकेँ अलग सांस्कृतिक खण्डमे नहि, प्रश्नानुसार जोडल जा सकैत अछि—ज्ञानक अध्यायमे न्याय आ बौद्ध प्रमाणमीमांसा; भाषा-अर्थमे मीमांसा, भर्तृहरि आ अपोह; नैतिकतामे धर्म, कर्तव्य, अहिंसा, गरिमा; मन-दर्शनमे आत्म–अनात्मा; राजनीतिक दर्शनमे जाति, स्वराज, लोकतन्त्र आ समानता। कृत्रिम बुद्धि आ डिजिटल ज्ञानक युगमे न्यायीय प्रमाण-विवेक, मीमांसक वाक्य-प्रसंग, जैन दृष्टि-शर्त आ बौद्ध अवधारणात्मक संशय सब आधुनिक प्रश्नक संग संवाद खोलि सकैत अछि। मुदा AI केँ ‘नव्य-न्याय मशीन’ अथवा भारतीय दर्शनकेँ ‘पहिल संगणकीय तर्क’ कहब अतिरेक होयत। कानून आ सार्वजनिक नीति मे शब्द, साक्ष्य, प्रमाण, उद्देश्य, व्याख्या, अपवाद, शर्त आ प्रतिपक्षक प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण छथि। भारतीय भाष्य–न्याय–मीमांसा परम्पराक सूक्ष्मता आधुनिक विधिक विवेक संग तुलना योग्य अछि। जाति, लिंग, धर्म, भाषा आ क्षेत्रीय अस्मिताक प्रश्न भारतीय दर्शनक आधुनिक दायरा विस्तृत करैत अछि। शास्त्रीय स्रोत सभ उत्तर नहि दैत; समकालीन अनुभव, संविधान, सामाजिक विज्ञान, इतिहास, स्त्रीवादी आलोचना आ दलित चिन्तन सेहो प्रमाण-क्षेत्र छथि। समानान्तर दर्शन एहि स्रोतसभकेँ एकहि कसौटी—प्रमाण, तर्क, गरिमा आ आत्मसमीक्षा—पर जाँचत। वैश्विक दर्शनक क्षेत्रमे एहि पद्धतिक व्यावहारिक परिणाम ई होयत जे भारतीय विचारककेँ केवल ‘विशेषज्ञ भारतीय दर्शन’ पाठ्यक्रममे नहि, सामान्य दार्शनिक समस्याक विमर्शमे सेहो पढ़ल जाए। एही सँ संवाद बराबरीक बनत—अनुकरणक नहि, प्रतिद्वन्द्वी गौरवक नहि। अध्याय-निष्कर्ष भारतीय दर्शन विश्व-दर्शनक नक्शामे कोनो एक पाश्चात्य श्रेणी अन्तर्गत समाहित होयबाक प्रतीक्षा नहि करैत अछि। ओकर अपन इतिहास, भाषा, प्रश्न, तर्क, शास्त्रार्थ आ लक्ष्य छथि। मुदा एहि स्वतन्त्रताक अर्थ आत्मनिर्वासन सेहो नहि। सत्य, ज्ञान, भाषा, अर्थ, आत्म, जगत, नैतिकता, मुक्ति, न्याय आ समाज—ई सभ साझा मानवीय प्रश्न छथि। एहि कारण उचित दार्शनिक नक्शा बहुकेन्द्रिक होयबाक चाही। भारतीय परम्परा, विश्लेषणात्मक प्रवाह, महाद्वीपीय प्रवाह, आधुनिक विज्ञान, सामाजिक सिद्धान्त आ स्थानीय ज्ञान—सभकेँ अपन-अपन ऐतिहासिकता सुरक्षित रखैत संवादमे आनल जाए। मिथिलाक समानान्तर परम्परा एहि कार्यक पद्धतिगत आधार दैत अछि: पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष, प्रमाण, परिभाषा, भाषिक सूक्ष्मता, प्रतिवाद आ पुनर्परीक्षण। मुदा ई परम्परा स्वयं आलोचनासँ बाहर नहि। अध्यायक अन्तिम सूत्र अछि—भारतीय दर्शनकेँ विश्व-दर्शनमे स्थान देबाक अर्थ पश्चिमी नक्शामे खाली जगह भरब नहि; विश्व-दर्शनक नक्शाकेँ बहुकेन्द्रिक बनायब अछि। अध्याय-ग्रन्थसूची • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • उमास्वाति — तत्त्वार्थसूत्र। • शङ्कराचार्य — ब्रह्मसूत्रभाष्य। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality); ‘शब्द आ जगत’ (The Word and the World)। • दया कृष्ण — ‘भारतीय दर्शन: प्रतिपक्षी दृष्टि’ (Indian Philosophy: A Counter Perspective)। • जे. एन. मोहन्ती — ‘भारतीय दर्शनक विवेक’ (Reason and Tradition in Indian Thought)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India); ‘विवेकक हरायल युग’ (The Lost Age of Reason)। • के. सी. भट्टाचार्य — ‘विचारमे स्वराज’ (Swaraj in Ideas)। • बी. आर. आम्बेडकर — ‘जातिक विनाश’ (Annihilation of Caste); ‘बुद्ध आ हुनकर धम्म’ (The Buddha and His Dhamma)। • मोहनदास करमचन्द गांधी — हिन्द स्वराज। • सर्वपल्ली राधाकृष्णन — ‘भारतीय दर्शन’ (Indian Philosophy), खण्ड १–२।