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समस्या
दार्शनिक संशयवादक एक पुरान शक्ति ई अछि जे ओ सामान्य जीवनक लगभग सभ निश्चितताकेँ प्रश्नक अधीन करि सकैत अछि। की हमरा वास्तवमे बाह्य जगतक ज्ञान अछि? की हम अपन हाथ, मेज, घर, अन्य मनुष्य वा अपन शरीरक अस्तित्व निश्चित रूपेँ जानैत छी? की सम्भव नहि जे हमरा अनुभव छलावा, सपना अथवा कोनो व्यापक भ्रमक परिणाम हो? जी. ई. मूर एहि संकटक सामने एक विशिष्ट दार्शनिक रणनीति अपनबैत छथि। ओ संशयवादीकेँ एहन अधिकार नहि दैत छथि जे दार्शनिक सिद्धान्तक कारण सामान्य जीवनक दृढ़ ज्ञान स्वतः रद्द मानि लेल जाए। हुनकर आग्रह अछि—हम किछु सामान्य तथ्य, जइँ ‘ई हमर हाथ अछि’, ‘पृथ्वी हमर जन्मसँ पहिने सेहो अस्तित्वमे छल’, ‘अन्य मनुष्य छथि’, ‘हमर शरीर अछि’—दार्शनिक संशयवादी तर्कसँ बेसी निश्चित रूपेँ जानैत छी। एहि दृष्टिकोणक प्रश्न केवल ‘सामान्य बुद्धि सही अछि’ नहि। अधिक गहिर प्रश्न ई अछि: जखन दार्शनिक सिद्धान्त आ दृढ़ सामान्य ज्ञान टकराइत अछि, तखन प्रमाणक भार ककरा ऊपर पड़त? की सामान्य-बोध स्वतः ज्ञानक अन्तिम कसौटी अछि? की ओ केवल आरम्भिक विश्वास अछि, जकरा दार्शनिक जाँचसँ गुजरबाक चाही? मूरक नैतिक दर्शन सेहो एहि समस्या-संरचना सँ जुड़ल अछि। ‘अच्छा’ (good) केँ प्राकृतिक गुण—जैँ सुख, इच्छा-पूर्ति अथवा जैविक लाभ—सँ पूर्णतः परिभाषित कएल जा सकैत अछि की नहि? हुनकर ‘खुला प्रश्न’ तर्क एहि प्रकारक सरलीकरणपर आपत्ति करैत अछि। एहि अध्यायक समस्या तेँ द्विस्तरीय अछि—ज्ञानमीमांसामे सामान्य बुद्धि आ बाह्य जगतक यथार्थ; नैतिकतामे अवधारणात्मक अविभाज्यता। आ एहि दुनूक न्यायीय प्रत्यक्षवाद, यथार्थवाद आ प्रमाण-विवेकसँ संवाद कोना कएल जाए?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे मूरक दर्शनक शक्ति ‘सामान्य बुद्धि’क अंध समर्थनमे नहि, बल्कि दार्शनिक तर्कक प्रमाण-भार उलटि देबामे अछि। यदि कोनो दार्शनिक सिद्धान्त एहन निष्कर्षपर पहुँचैत अछि जे ‘हमरा अपन हाथक अस्तित्व ज्ञात नहि’, तखन मूर पूछैत छथि—की ओ सिद्धान्त वास्तवमे एहि सामान्य ज्ञानसँ अधिक सुनिश्चित अछि? मूर सामान्य-बोधकेँ तर्क-विरहित सहज प्रतिक्रिया नहि मानैत। ओ किछु पूर्व-सैद्धान्तिक ज्ञान-दाबीकेँ एतेक दृढ़ मानैत छथि जे दार्शनिक सिद्धान्तकेँ ओकरा विरुद्ध सफल होयबाक लेल अत्यन्त मजबूत प्रमाण देबाक पड़त। बाह्य जगतक प्रसिद्ध प्रदर्शन—एक हाथ देखबैत ‘एतय एक हाथ अछि’, दोसर हाथ देखबैत ‘एतय दोसर हाथ अछि’—एहि आग्रहक नाटकीय रूप अछि। मूरक उद्देश्य समस्त संशयवादक मनोवैज्ञानिक समाधान नहि, बल्कि ई देखाबयब जे बाह्य वस्तुक अस्तित्वक किछु प्रत्यक्ष ज्ञान हमरा प्राप्त अछि। समानान्तर दर्शन एहि पद्धतिसँ ई शिक्षा ग्रहण करैत अछि जे दार्शनिक संशय उपयोगी अछि, मुदा संशय स्वयं विशेषाधिकार प्राप्त सत्य नहि। सामान्य अनुभव, प्रत्यक्ष, सार्वजनिक पुष्टि आ व्यवहारिक स्थिरताकेँ सेहो प्रमाणक दर्जा अछि। रंगीन रूपरेखा — संशयवाद, सामान्य-बोध आ प्रमाण-भार
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—किछु सामान्य कथन दार्शनिक सिद्धान्तसँ अधिक निश्चित हो सकैत अछि। ‘हमर शरीर अछि’, ‘अन्य मनुष्य छथि’, ‘भूतकाल अछि’, ‘किछु भौतिक वस्तु हमरा बाहर अछि’—मूर एहि प्रकारक कथनकेँ सामान्य-बोधक दृढ़ सत्य मानैत छथि। दोसर तर्क—दार्शनिक सिद्धान्त यदि एहि कथनसभक निषेध करैत अछि, तँ सिद्धान्तपर प्रमाणक भार बढ़ैत अछि। केवल एतेक जे ‘भ्रम सम्भव अछि’ सँ ई सिद्ध नहि होइत जे प्रत्येक प्रत्यक्ष ज्ञान अविश्वसनीय अछि। सम्भावना आ यथार्थ संशय अलग बात छथि। तेसर तर्क—मूर बाह्य जगतक प्रमाण लेल प्रत्यक्ष प्रदर्शन उपयोग करैत छथि। हाथ देखबैत ओ कहैत छथि: ‘एतय एक हाथ अछि’; दोसर देखबैत: ‘एतय दोसर हाथ अछि’; अतः कम-से-कम दू बाह्य वस्तु अस्तित्वमे अछि। एहि प्रमाणक शक्ति एहि बातपर निर्भर अछि जे ‘ई हाथ अछि’ ज्ञान स्वयं पर्याप्त निश्चित मानल जाए। चारिम तर्क—ई प्रदर्शन संशयवादीक प्रत्येक माँग पूरा नहि करैत। संशयवादी पूछि सकैत अछि: ‘अहाँ कोना जानैत छी जे ई हाथ अछि?’ मूरक उत्तरक संरचना ई अछि जे प्रमाणक हर दाबी लेल अनन्त उच्चतर प्रमाण माँगब आवश्यक नहि। किछु ज्ञान प्रत्यक्ष रूपेँ अधिक सुनिश्चित हो सकैत अछि। पाँचम तर्क—सामान्य-बोधक दार्शनिक भूमिका भाषा आ व्यवहारसँ जुड़ल अछि। दैनिक जीवनमे ‘हाथ’, ‘वस्तु’, ‘समय’, ‘अन्य व्यक्ति’ जकाँ श्रेणी स्थिर उपयोग रखैत अछि। दार्शनिक सिद्धान्त एहि व्यवहारिक संसारसँ पूर्णतः कटल नहि रहि सकैत। छठम तर्क—मूरक नैतिक दर्शनमे ‘प्राकृतिकतावादी भ्रम’ (naturalistic fallacy) कहि प्रसिद्ध आलोचना अछि। हुनकर आशय ई नहि जे प्राकृतिक तथ्य नैतिकतासँ अप्रासंगिक अछि; बल्कि ‘अच्छा’ केँ कोनो एक प्राकृतिक गुणक समानार्थी मानि परिभाषित करब कठिन अछि। सातम तर्क—‘खुला प्रश्न’ (open question) प्रकारक तर्क एहि बातपर बल दैत अछि। यदि कहल जाए ‘अच्छा = सुखद’, तँ ‘जे सुखद अछि, की ओ वास्तवमे अच्छा अछि?’ प्रश्न अर्थहीन नहि भऽ जाइत। प्रश्न खुलल रहैत अछि; अतः दू अवधारणा पूर्णतः समानार्थी नहि। आठम तर्क—मूरक शैली विश्लेषणात्मक दर्शनक एक विशेष आदर्श स्थापित करैत अछि: साधारण वाक्य, सूक्ष्म अवधारणात्मक भेद, स्पष्ट निष्कर्ष। मुदा सरल वाक्यक अर्थ सरल दर्शन नहि। हुनकर प्रत्यक्षवादक पीछे ज्ञानक प्रमाण-भारक गम्भीर सिद्धान्त अछि। नवम तर्क—मूर कट्टर यथार्थवादक पक्षमे छथि: वस्तु मनसँ स्वतंत्र रूपेँ अस्तित्व रखि सकैत अछि। एहि बिन्दुपर हुनकर दृष्टि न्यायीय यथार्थवादसँ संवादयोग्य अछि, यद्यपि दुनूक प्रमाण-सिद्धान्त, आत्मा-विचार आ तत्त्वमीमांसा ऐतिहासिक रूपेँ अलग छथि। दसम तर्क—सामान्य-बोध अचूक नहि। इतिहासमे सामान्य मानल गेल अनेक विश्वास गलत सिद्ध भेल। तेँ मूरक पद्धतिक सर्वोत्तम रूप ई नहि जे ‘जे सामान्य अछि, से सत्य अछि’, बल्कि ‘दार्शनिक सिद्धान्त सामान्य दृढ़ ज्ञानक विरुद्ध जाए तँ ओकरा मजबूत प्रमाण देबाक चाही।’
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे सामान्य-बोध सांस्कृतिक, ऐतिहासिक आ सामाजिक रूपेँ बदलैत अछि। कखनो समाज दासता, जातिगत पदानुक्रम, स्त्री-असमानता अथवा अंधविश्वासकेँ ‘सामान्य’ मानैत रहल। तखन सामान्य-बोधकेँ दार्शनिक कसौटी बनौनाइ खतरनाक हो सकैत अछि। दोसर पूर्वपक्ष संशयवादी अछि। ओ कहैत अछि—मूर ‘ई हाथ अछि’ मानि कऽ वही बात पहिने स्वीकारि लेइत छथि जकर प्रमाण देबाक छल। यदि सपना अथवा भ्रमक सम्भावना प्रश्नमे अछि, तँ हाथ देखाबयब समस्या हल नहि करैत। तेसर पूर्वपक्ष कहैत अछि जे बाह्य जगतक अस्तित्वक प्रश्न भाषिक वा तत्त्वमीमांसक अछि, अनुभवजन्य प्रदर्शन मात्र नहि। ‘हाथ’क सार्वजनिक पहचानक आधार स्वयं जगतसँ सम्बन्धक सिद्धान्तपर निर्भर हो सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष नैतिकतामे अछि। ‘खुला प्रश्न’क सम्भावना मात्र ई सिद्ध नहि करैत जे ‘अच्छा’ कोनो प्राकृतिक गुणसँ तात्त्विक रूपेँ समान नहि। भाषा-दृष्टिसँ प्रश्न खुलल रहि सकैत अछि, यद्यपि वास्तविकता-दृष्टिसँ पहचान हो।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—समानान्तर दर्शन सामान्य-बोधकेँ सामाजिक परम्पराक प्रत्येक मान्यताक समान नहि मानैत। ‘ई हाथ अछि’ प्रकारक प्रत्यक्ष तथ्य आ ‘फलाँ जाति श्रेष्ठ अछि’ प्रकारक सामाजिक विचार एक श्रेणीक नहि। सामान्य-बोधक दार्शनिक मूल्य दाबी-प्रकार अनुसार जाँचल जाए। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—मूर संशयवादक सम्भावनाकेँ निषिद्ध नहि करैत; ओ प्रमाणक सापेक्ष निश्चितता प्रश्नमे आनैत छथि। यदि ‘ई हाथ अछि’ ज्ञान संशयवादी परिकल्पनासँ अधिक दृढ़ अछि, तँ केवल सम्भावित भ्रमक आधारपर प्रत्यक्ष ज्ञान रद्द नहि होयत। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—भाषा आ तत्त्वमीमांसा अवश्य महत्त्वपूर्ण अछि; मुदा प्रत्यक्ष अनुभवकेँ केवल सिद्धान्तक उत्पाद मानि देब समान रूपेँ अतिशय होयत। सार्वजनिक वस्तु-ज्ञान, क्रिया, स्पर्श, दृष्टि आ अन्य व्यक्तिक पुष्टि जगतसँ सम्बन्धक ठोस आधार बनबैत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—खुला प्रश्न तर्कपर बादमे अनेक आलोचना भेल। समानान्तर दृष्टि एकरा अन्तिम नैतिक प्रमाण नहि, अवधारणात्मक सावधानीक साधन मानैत अछि: तथ्यात्मक गुण आ नैतिक मूल्यकेँ बिना अतिरिक्त तर्क एकहि मानि नहि लेल जाए।
भारतीय संवाद
न्याय दर्शन मूलतः यथार्थवादी अछि। बाह्य वस्तु, गुण, क्रिया, सम्बन्ध, आत्मा आ ज्ञानक वस्तुगत विषयकेँ ओ स्वीकारैत अछि। प्रत्यक्ष ज्ञान सामान्यतः वस्तु-सापेक्ष अछि; भ्रम वास्तविक ज्ञानक सम्भावना समाप्त नहि करैत, बल्कि प्रमाणाभास वा दोषक विश्लेषण माँगैत अछि। मूर आ न्याय दुनू कट्टर संशयवादक विरुद्ध संवादयोग्य छथि। मुदा न्याय केवल सामान्य-बोधपर निर्भर नहि; ओ प्रमाणक औपचारिक वर्गीकरण—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द—आ ज्ञानोत्पत्तिक कारणक विश्लेषण दैत अछि। बौद्ध परम्परा एहि यथार्थवादपर महत्त्वपूर्ण प्रतिपक्ष प्रस्तुत करैत अछि। क्षणिकता, अनात्मा, अवधारणात्मक निर्माण आ प्रत्यक्षक प्रश्न न्यायीय स्थिर वस्तु-सत्ता पर दबाव दैत अछि। एही कारण भारतीय संवाद मूर–न्याय समानता पर समाप्त नहि होयत। मीमांसा व्यवहार, भाषा, कर्तव्य आ सामान्य जगतक विश्वसनीयताकेँ अपन ढंगसँ ग्रहण करैत अछि। ज्ञानक स्वतःप्रामाण्य सम्बन्धी मीमांसकीय प्रवृत्ति एहि प्रश्नसँ संवाद खोलैत अछि—प्रत्येक ज्ञानकेँ बाहरी प्रमाणीकरण किएक चाही? भारतीय संवादक शिक्षा ई अछि जे कट्टर संशयवादक उत्तर केवल ‘विश्वास करू’ नहि, बल्कि प्रमाण, व्यवहार, दोष, प्रतिपक्ष आ ज्ञानक उत्पत्तिक बहुस्तरीय विवेचन होयत।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक नव्य-न्याय परम्परा मूरक सामान्य-बोधक संग एक महत्त्वपूर्ण बिन्दुपर जुड़ैत अछि—ज्ञानक वस्तुगत दिशा। ‘घट अछि’, ‘पट अछि’, ‘एतय हाथ अछि’ जकाँ कथन सामान्यतः जगतमे किछु वस्तुक अस्तित्वक दावा करैत अछि; एहि दाबीक प्रमाण-रचना जाँचल जा सकैत अछि। मुदा समानान्तर मिथिला सामान्य-बोधकेँ अचूक परम्परा नहि बनबैत। सामाजिक ‘सामान्य’ बोध जाति, लिंग, भाषा आ धर्मक असमानता द्वारा विकृत भऽ सकैत अछि। अतः प्रत्यक्ष वस्तु-ज्ञान आ सामाजिक रूढ़ि अलग-अलग प्रमाण-क्षेत्र छथि। एहि अध्यायसँ बहुप्रमाणीय विवेकवादक एक महत्त्वपूर्ण नियम निकलैत अछि—दृढ़ सामान्य अनुभव प्रारम्भिक प्रमाण-मूल्य रखैत अछि, मुदा विरोधी प्रमाण, भ्रम, सामाजिक पक्षपात अथवा वैज्ञानिक निष्कर्ष ओकर संशोधन करि सकैत अछि। मिथिलाक शास्त्रार्थक पद्धति मूरक प्रमाण-भारक प्रश्नकेँ अधिक स्पष्ट बनबैत अछि: जे पक्ष अधिक असामान्य दावा करैत अछि, ओकर प्रमाण-भार प्रायः अधिक होयत। मुदा ‘असामान्य’ मात्र कहि कऽ सत्यक सम्भावना समाप्त नहि कएल जाए। समानान्तर दृष्टिक सूत्र—सामान्य-बोधकेँ सम्मान, अंधस्वीकार नहि; संशयकेँ स्थान, अंधसंशय नहि; प्रत्यक्षकेँ प्रमाण, मुदा परीक्षणसँ बाहर नहि। रंगीन प्रक्रिया-चित्र — सामान्य-बोधक परीक्षण
समकालीन प्रयोग
डिजिटल युगमे ‘देखलहुँ, तेँ सत्य’ प्रकारक सामान्य-बोध पर्याप्त नहि। कृत्रिम छवि, सम्पादित वीडियो, कृत्रिम ध्वनि आ जनरेटिव AI प्रत्यक्ष-जकाँ अनुभव उत्पन्न करि सकैत अछि। मूरक प्रत्यक्षवादक आधुनिक विस्तार स्वतंत्र स्रोत-परीक्षण माँगैत अछि। दूसरी ओर ‘इंटरनेटपर सभ किछु नकली हो सकैत अछि’ प्रकारक कट्टर संशयवाद सेहो अनुपयोगी अछि। विश्वसनीय स्रोत, बहु-स्रोत पुष्टि, मूल दस्तावेज, प्रसंग आ सार्वजनिक सत्यापन द्वारा ज्ञान सम्भव अछि। विज्ञानमे सामान्य-बोध बहुत बेर संशोधित होइत अछि। पृथ्वी स्थिर बुझाइत अछि, मुदा खगोल-विज्ञान गति देखबैत अछि; समय समान प्रवाहित होइत बुझाइत अछि, मुदा आधुनिक भौतिकी अधिक जटिल चित्र दैत अछि। तेँ सामान्य अनुभूति प्रारम्भ-बिन्दु, अन्तिम विज्ञान नहि। सामाजिक न्यायमे सामान्य-बोधक आलोचना विशेष आवश्यक अछि। जे व्यवहार ‘हमर समाजमे सदैव एहेन रहल’ कहि सामान्य मानल जाइत अछि, ओकर नैतिक वैधता स्वतः सिद्ध नहि। तथ्य, गरिमा, समानता आ पीड़ित अनुभवक आधारपर सामाजिक सामान्यताकेँ चुनौती देल जा सकैत अछि। कानूनमे ‘सामान्य समझ’ महत्त्वपूर्ण हो सकैत अछि, मुदा अस्पष्ट शब्दक अर्थ केवल सहज बोधपर छोड़ल जाए तँ असमान निर्णय सम्भव। पाठ, प्रसंग, उद्देश्य, मिसाल आ अधिकारक संरचना जोड़बाक चाही। AI निर्णयमे मूरक प्रमाण-भारक शिक्षा उपयोगी अछि। यदि एल्गोरिदम सामान्य अनुभवक विरुद्ध असामान्य निष्कर्ष देत—जैँ विश्वसनीय व्यक्ति अचानक उच्च जोखिम—तखन प्रणालीपर स्पष्टीकरण आ प्रमाणक भार अधिक होयबाक चाही।
अध्याय-निष्कर्ष
जी. ई. मूरक सामान्य-बुद्धि दर्शन कट्टर संशयवादक विरुद्ध दार्शनिक प्रतिरोध अछि। हुनकर मुख्य शक्ति ई प्रश्न अछि—हम कोन बात अधिक निश्चित रूपेँ जानैत छी: अपन हाथक अस्तित्व, कि एहन दार्शनिक तर्क जे कहैत अछि हमरा अपन हाथक ज्ञान नहि? बाह्य जगतक प्रमाण, सामान्य-बोधक निश्चितता आ नैतिक ‘खुला प्रश्न’—तीनू ठाम मूर अवधारणात्मक अतिरेकक विरुद्ध सावधानी सिखबैत छथि। मुदा सामान्य-बोध अचूक नहि। विज्ञान ओकरा सुधारैत अछि; सामाजिक आलोचना ओकरा चुनौती दैत अछि; भ्रम ओकर सीमा देखबैत अछि। अतः समानान्तर दर्शन मूरकेँ अंध सामान्यतावादमे नहि बदलैत। न्यायीय यथार्थवाद आ मूरक संवाद विशेष फलदायी अछि, किएक तँ दुनू बाह्य जगत आ प्रत्यक्ष ज्ञानक सम्भावना स्वीकारैत छथि। मुदा न्याय अधिक विस्तृत प्रमाण-संरचना दैत अछि, आ भारतीय प्रतिपक्ष एहि यथार्थवादकेँ निरन्तर जाँचैत अछि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—जे सामान्य अछि से स्वतः सत्य नहि; मुदा जे दार्शनिक अछि से स्वतः सामान्य ज्ञानसँ श्रेष्ठ सेहो नहि। दाबी जतेक व्यापक, प्रमाण ओतेक कठोर।
अध्याय-ग्रन्थसूची
• जी. ई. मूर — ‘सामान्य बुद्धिक प्रतिरक्षा’ (A Defence of Common Sense)। • जी. ई. मूर — ‘बाह्य जगतक प्रमाण’ (Proof of an External World)। • जी. ई. मूर — ‘नैतिक सिद्धान्त’ (Principia Ethica)। • जी. ई. मूर — ‘दार्शनिक अध्ययन’ (Philosophical Studies)। • नॉर्मन माल्कम — मूर आ सामान्य-बोध सम्बन्धी चयनित अध्ययन। • अर्नेस्ट सोसा — ज्ञान, यथार्थवाद आ संशयवाद सम्बन्धी अध्ययन। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • उदयनाचार्य — आत्मतत्त्वविवेक। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • बी. के. मतिलाल — ‘ज्ञान आ नैतिकता’ सम्बन्धी चयनित निबन्ध; ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।