समस्या भाषा-दर्शनक दीर्घ परम्परामे कथनकेँ मुख्यतः सत्य अथवा असत्य होयबला वाक्य रूपमे देखबाक प्रवृत्ति रहल अछि। मुदा दैनिक जीवनमे हम अनेक बेर एहन वाक्य कहैत छी जकर मुख्य काम जगतक वर्णन करब नहि, बल्कि कोनो सामाजिक काम पूरा करब होइत अछि। ‘हम प्रतिज्ञा करैत छी’, ‘हम अहाँकेँ नियुक्त करैत छी’, ‘बैस जाउ’, ‘हम क्षमा माँगैत छी’, ‘ई बैठक समाप्त भेल’—एहि वाक्यसभक अर्थ केवल तथ्य-वर्णन नहि। जे. एल. ऑस्टिन एहि तथ्यकेँ भाषा-दर्शनक केन्द्रमे आनैत छथि। हुनकर मूल प्रश्न अछि—कहब स्वयं कखन एक क्रिया होइत अछि? कोनो वाक्य उच्चारित करब मात्र ध्वनि उत्पन्न करब नहि; उचित परिस्थिति, अधिकार, अभिप्राय आ सामाजिक नियमक भीतर ओ वचन, आदेश, नामकरण, विवाह, घोषणा, नियुक्ति, क्षमा, चेतावनी वा निर्णय बनि सकैत अछि। एहि दृष्टिसँ सत्य–असत्यक पारम्परिक कसौटी अपूर्ण सिद्ध होइत अछि। ‘हम अहाँकेँ चेतावनी दैत छी’ वाक्यक मुख्य प्रश्न ई नहि जे ओ सत्य अछि की असत्य; प्रश्न ई जे चेतावनी सफलतासँ देल गेल की नहि, वक्ता अधिकृत अछि की नहि, परिस्थिति उचित अछि की नहि, आ श्रोता ओकर भाषिक क्रिया बुझलक की नहि। ऑस्टिन आरम्भमे ‘वर्णनात्मक कथन’ (constative) आ ‘क्रियात्मक कथन’ (performative) बीच भेद करैत छथि, मुदा बादमे स्वयं देखबैत छथि जे ई साफ विभाजन टिकैत नहि। लगभग प्रत्येक सार्थक उच्चारणमे कोनो न कोनो भाषिक क्रिया निहित रहैत अछि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—भाषिक क्रिया की? कथन-कर्म, कथनगत क्रिया आ कथन-प्रभावक भेद कोना बुझी? सफल भाषिक क्रियाक शर्त की? आ भारतीय मीमांसा, न्याय, विधि-वाक्य तथा मिथिलाक सामाजिक–शास्त्रार्थीय व्यवहारसँ एहि सिद्धान्तक संवाद कोना कएल जाए बिना ‘मीमांसा पहिनहि speech-act theory छल’ प्रकारक कृत्रिम दाबी कएने? मूल प्रतिपादन एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे भाषा केवल जगतक चित्र अथवा तथ्य-वर्णनक साधन नहि; भाषा सामाजिक क्रिया करैत अछि। कोनो वाक्य कहब स्वयं एक नियमबद्ध कार्य हो सकैत अछि—प्रतिज्ञा करब, आदेश देब, अनुमति देब, चेतावनी देब, घोषणा करब, नामकरण करब, क्षमा माँगब। ऑस्टिन भाषिक क्रियाकेँ तीन विश्लेषणात्मक स्तरमे देखबैत छथि: कथन-कर्म (locutionary act)—अर्थपूर्ण वाक्य उच्चारित करब; कथनगत क्रिया (illocutionary act)—ओ वाक्य कहि कऽ की कएल गेल, जैँ आदेश, वचन, प्रश्न, चेतावनी; कथन-प्रभाव (perlocutionary act)—ओ वाक्य श्रोता पर की प्रभाव देलक, जैँ डर, प्रेरणा, विश्वास, क्रोध अथवा सहमति। भाषिक क्रियाक सफलता केवल व्याकरणपर निर्भर नहि। सामाजिक संस्था, अधिकार, प्रक्रिया, प्रसंग, अभिप्राय, मान्य परम्परा आ अपेक्षित अगिला क्रिया सेहो आवश्यक हो सकैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि दृष्टिसँ भाषा, संस्था आ सत्ता बीच सम्बन्ध स्पष्ट करैत अछि; मुदा ई सेहो जोड़ैत अछि जे भाषिक क्रिया सफल होयब मात्र ओकर नैतिक वैधता सिद्ध नहि करैत। कोनो आदेश विधिक रूपेँ प्रभावी भऽ सकैत अछि, तथापि अन्यायपूर्ण हो सकैत अछि। रंगीन रूपरेखा — एक वाक्य, तीन क्रियात्मक स्तर प्रमुख तर्क पहिल तर्क—किछु वाक्य कहब स्वयं क्रिया अछि। ‘हम प्रतिज्ञा करैत छी’ उचित परिस्थिति मे केवल प्रतिज्ञाक वर्णन नहि; प्रतिज्ञा करबाक कार्य अछि। एहि कारण क्रियात्मक वाक्यकेँ साधारण सत्य–असत्य कसौटीपर पूर्णतः नहि मापल जा सकैत। दोसर तर्क—क्रियात्मक कथन सफल अथवा विफल हो सकैत अछि। यदि विवाहक घोषणा करयवला व्यक्ति अधिकृत नहि, नियुक्ति गलत प्रक्रियासँ भेल, प्रतिज्ञा छलपूर्वक देल गेल, अथवा नामकरणक परिस्थिति मान्य नहि, तँ भाषिक क्रिया ‘असत्य’ नहि, बल्कि असफल अथवा दोषपूर्ण कहल जाएत। तेसर तर्क—ऑस्टिन ‘सफलताक शर्त’ (felicity conditions) पर बल दैत छथि। उचित व्यक्ति, उचित प्रक्रिया, उचित परिस्थिति, अपेक्षित अभिप्राय, आ आवश्यक पश्चात् आचरण—एहि शर्तसभक बिना भाषिक क्रिया विफल हो सकैत अछि। चारिम तर्क—वर्णनात्मक आ क्रियात्मक वाक्यक प्रारम्भिक भेद अन्ततः अस्थिर अछि। ‘बाहर वर्षा भऽ रहल अछि’ सेहो केवल वर्णन नहि; प्रसंगानुसार सूचना, चेतावनी, सलाह अथवा यात्रा रोकबाक कारण बनि सकैत अछि। पाँचम तर्क—कथनगत शक्ति वाक्यक शब्दार्थसँ पूर्णतः निर्धारित नहि। ‘खिड़की खुलल अछि’ कथन, अनुरोध, शिकायत अथवा संकेत बनि सकैत अछि। प्रसंग, स्वर, साझा ज्ञान आ संस्थागत स्थिति भाषिक क्रियाक प्रकार निर्धारित करैत अछि। छठम तर्क—कथन-प्रभाव भाषिक क्रियासँ अलग अछि। चेतावनी देब एक कथनगत क्रिया अछि; श्रोता डरि जाए अथवा सावधान हो—ई प्रभाव अछि। एके चेतावनी अलग श्रोतापर अलग प्रभाव दे सकैत अछि। सातम तर्क—भाषा सामाजिक संस्थासँ जुड़ल अछि। ‘हम अहाँकेँ दोषी घोषित करैत छी’ केवल उचित न्यायिक सन्दर्भमे वैधानिक प्रभाव रखैत अछि। शब्द अकेला सत्ता नहि; संस्थागत नियम ओकर क्रियात्मक शक्ति बनबैत अछि। आठम तर्क—भाषिक क्रिया सत्ता असमानतासँ प्रभावित होइत अछि। जे व्यक्ति आदेश देबाक अधिकार रखैत अछि, ओकर शब्द संस्थागत परिणाम उत्पन्न करैत अछि; कमजोर व्यक्ति वही शब्द कहितहुँ समान प्रभाव नहि पैदा करि सकैत। नवम तर्क—भाषा-दर्शनक ध्यान ‘वाक्य की प्रतिनिधित्व करैत अछि?’ सँ ‘वाक्य द्वारा की कएल जा रहल अछि?’ दिस बढ़ैत अछि। एहि मोड़सँ कानून, राजनीति, नैतिकता, सामाजिक संस्था आ संचारक अध्ययन भाषा-दर्शनक भीतर प्रवेश करैत अछि। दसम तर्क—भाषिक क्रियाक विश्लेषण तथ्य-विवेकक विकल्प नहि। कोनो व्यक्ति झूठ तथ्य कहि सफलतासँ धमकी दे सकैत अछि; धमकी एक क्रिया रूपमे सफल, तथ्यात्मक सामग्री असत्य हो सकैत अछि। अतः क्रियात्मक सफलता आ सत्य अलग कसौटी छथि। पूर्वपक्ष पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे ‘कहब = करब’ सामान्य तथ्य अछि, दार्शनिक सिद्धान्त नहि। आदेश, वचन, क्षमा आ घोषणा सभकेँ लोक पहिनेसँ बुझैत छल; तखन ऑस्टिनक नवता की? दोसर पूर्वपक्ष कहैत अछि जे कथनगत क्रियाक प्रकार अत्यधिक प्रसंग-निर्भर अछि। एके वाक्य आदेश, सुझाव, व्यंग्य वा शिकायत हो सकैत अछि; तखन सिद्धान्तक स्थिर वर्गीकरण सम्भव की? तेसर पूर्वपक्ष कहैत अछि जे भाषिक क्रिया सिद्धान्त सामाजिक संस्थाक वैधता पर्याप्त रूपेँ प्रश्न नहि करैत। यदि अधिकृत व्यक्ति अन्यायपूर्ण आदेश देत, तखन सिद्धान्त ओकरा ‘सफल’ कहि सकैत अछि—ई नैतिक रूपेँ अपर्याप्त अछि। चारिम पूर्वपक्ष भारतीय दृष्टिसँ अछि। मीमांसा विधि-वाक्य, निषेध, कर्तव्य, आज्ञा आ शास्त्रीय भाषाक क्रियात्मक प्रभाव पर बहुत पहिनेसँ विचार करैत अछि; न्याय वक्ता, शब्द-प्रमाण आ वाक्यबोधक शर्त जाँचैत अछि। तखन पश्चिमी speech-act theory केँ भाषा-कर्मक पहिल दर्शन कहल जाए तऽ इतिहास अधूरा होयत। उत्तरपक्ष पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—ऑस्टिनक मौलिकता एहि दैनिक तथ्यकेँ व्यवस्थित दार्शनिक कसौटी बनबामे अछि। सत्य–असत्यक एकाधिकार तोड़ि भाषा-दर्शनकेँ क्रिया, संस्था आ सफलताक शर्तक दिशा मे पुनर्गठित कएल गेल। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—प्रसंग-निर्भरता कमजोरी नहि, सिद्धान्तक विषय अछि। भाषिक अर्थ स्वयं सामाजिक परिस्थिति, अभिप्राय आ नियमसँ प्रभावित होइत अछि; अतः स्थिर सूची सँ अधिक आवश्यक अछि विश्लेषणक पद्धति। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—क्रियात्मक सफलता नैतिक वैधता नहि। समानान्तर दर्शन ऑस्टिनक विश्लेषणक ऊपर गरिमा-आधारित नैतिकता जोड़ैत अछि: भाषिक क्रिया संस्थागत रूपेँ सफल भऽ सकैत अछि, मुदा अधिकार, न्याय आ समानताक कसौटीपर अस्वीकार्य हो सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय परम्पराक स्वतंत्र इतिहास मान्य अछि। मीमांसाक विधि-वाक्य ऑस्टिनक कथनगत क्रियाक समान नहि; दुनूक दार्शनिक लक्ष्य आ सन्दर्भ भिन्न। तुलना समस्या-संवादक रूपमे हो, पूर्वगामिता-दाबी रूपमे नहि। भारतीय संवाद मीमांसा विधि-वाक्यक प्रश्नकेँ केन्द्रमे रखैत अछि। शास्त्रीय वाक्य केवल जगतक वर्णन नहि, कर्तव्यक निर्देश देइत अछि। एहि कारण भाषा केवल प्रतिनिधित्व नहि, क्रियात्मक–नियामक भूमिका रखैत अछि। ऑस्टिनक संग एतय समस्या-साम्य स्पष्ट अछि, मुदा मीमांसाक धर्म, विधि, अपूर्व आ शास्त्रीय प्रामाण्यक व्यापक संदर्भ अलग। न्याय शब्द-प्रमाणमे वक्ता अथवा प्रमाणिक वक्तव्यक विश्वसनीयता, पद–पदार्थ सम्बन्ध आ वाक्यबोध जाँचैत अछि। भाषिक क्रियाक ‘कौन कहि रहल अछि?’ प्रश्न न्यायीय वक्ता-सन्दर्भसँ संवाद करि सकैत अछि। धर्मशास्त्रीय, विधिक आ सामाजिक परम्परामे घोषणा, शपथ, वचन, दान, संकल्प, नामकरण, विवाह, नियुक्ति जकाँ क्रियासभ भाषिक उच्चारणक संग जुड़ल रहैत अछि। मुदा ई सभ संस्थागत इतिहास अलग-अलग अछि; ऑस्टिनक वर्गीकरणक प्रत्यक्ष उदाहरण कहि देब काल-विस्थापन होयत। बौद्ध आ जैन परम्परामे वाणी, सत्यवचन, संकल्प आ नैतिक भाषिक आचरणक प्रश्न अछि। एतय भाषाक नैतिक परिणाम पर बल अछि, जे ऑस्टिनक संस्थागत सफलताक विश्लेषणकेँ नैतिक विस्तार दे सकैत अछि। भारतीय संवादक निष्कर्ष—भाषा तथ्य बतबैत अछि, कर्तव्य निर्देशित करैत अछि, वचन बनबैत अछि, सम्बन्ध बदलैत अछि, संस्था सक्रिय करैत अछि; मुदा हर परम्परा एहि क्रियात्मकताकेँ अलग तात्त्विक ढाँचामे बुझैत अछि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मिथिलाक शास्त्रार्थ परम्परामे भाषिक क्रिया केवल मत प्रस्तुत करब नहि; पूर्वपक्ष ग्रहण, उत्तरपक्ष देब, प्रतिज्ञा स्थापित करब, आपत्ति स्वीकारब, निष्कर्ष संशोधित करब—ई सभ नियमबद्ध बौद्धिक क्रिया छथि। एहि कारण भाषिक कर्मक अनुशासन दार्शनिक नैतिकता संग जुड़ैत अछि। नव्य-न्यायीय लेखनमे शब्दक सम्बन्ध, विषयता, विशेषणता आ प्रमाणक सूक्ष्मता कथनक ‘की कहल गेल?’ हिस्सा स्पष्ट करैत अछि; ऑस्टिनक दृष्टि ‘कहि कऽ की कएल गेल?’ प्रश्न जोड़ैत अछि। समानान्तर दर्शन दुनू स्तर एक साथि राखैत अछि। मिथिलाक सामाजिक जीवनमे मौखिक वचन, पंचायतक घोषणा, धार्मिक संकल्प, विवाहिक उच्चारण, सार्वजनिक स्वीकृति अथवा अस्वीकृति, साहित्यिक सम्मान, संस्थागत नियुक्ति जकाँ भाषिक क्रियासभ ऐतिहासिक रूपेँ महत्त्वपूर्ण रहल छथि। हुनकर वैधता समय, संस्था आ सामाजिक अधिकारसँ जुड़ल अछि। समानान्तर दृष्टि एतय सत्ता-समीक्षा जोड़ैत अछि। कोन व्यक्ति बोलि सकैत अछि? ककर वचन मान्य? ककर शिकायत सुनल जाइत? ककर प्रतिज्ञा कानूनी वजन रखैत? भाषिक क्रियाक शक्ति सामाजिक पदानुक्रमसँ प्रभावित होइत अछि। एहि कारण भाषिक क्रियाक दर्शन बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्रक संग जुड़ैत अछि। सार्वजनिक संस्थामे भाषिक अधिकार केवल उच्च पदाधिकारीक विशेषाधिकार नहि रहय; नागरिकक प्रश्न, आपत्ति, सहमति, असहमति आ साक्ष्य सेहो संस्थागत रूपेँ प्रभावकारी होयबाक चाही। रंगीन प्रक्रिया-चित्र — कोनो भाषिक क्रिया सफल कखन? समकालीन प्रयोग कानूनमे भाषिक क्रिया प्रत्यक्ष शक्ति रखैत अछि। न्यायाधीशक निर्णय, अनुबन्धक स्वीकृति, शपथ, राजीनामा, नियुक्ति, अनुमति, निषेध—ई सभ शब्द द्वारा संस्थागत स्थिति बदलैत अछि। डिजिटल जगतमे ‘I agree’ क्लिक करब, इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर, ‘accept’ बटन, गोपनीयता-सहमति—ई नव भाषिक/प्रतीकात्मक क्रियासभ छथि। केवल बटन दबाओलासँ वास्तविक सूचित सहमति भेल की नहि—ई नैतिक आ विधिक प्रश्न अलग अछि। कृत्रिम बुद्धि एजेन्टक युगमे प्रश्न उठैत अछि—AI द्वारा भेजल स्वीकृति, बुकिंग, खरीद, अनुबन्ध, ईमेल वा आदेश ककर भाषिक क्रिया मानल जाए? मशीनक क्रिया पीछे उत्तरदायी मानव अथवा संस्था के? भाषिक क्रिया सिद्धान्त एतय उत्तरदायित्वक नूतन समस्या खोलैत अछि। सामाजिक माध्यममे ‘ब्लॉक’, ‘रिपोर्ट’, ‘प्रतिबन्ध’, ‘सत्यापित’, ‘भ्रामक’ जकाँ लेबल स्वयं संस्थागत भाषिक क्रिया बनि सकैत अछि; ई दृश्यता, प्रतिष्ठा आ अधिकार बदलैत अछि। राजनीतिमे घोषणा, वादा, शपथ, नीति-वक्तव्य आ आपातकालीन निर्देश भाषिक क्रिया छथि। हुनकर प्रभाव अधिकार, संवैधानिक प्रक्रिया आ संस्थागत मान्यता पर निर्भर होइत अछि; केवल वक्ताक शब्द पर्याप्त नहि। सहमति सम्बन्धी सामाजिक प्रश्नमे ‘हाँ’ शब्दक अर्थ परिस्थितिसँ अलग नहि। दबाव, असमान शक्ति, सूचना-अभाव अथवा भय स्थितिमे उच्चारण औपचारिक रूपेँ सहमति जकाँ लगि सकैत अछि, मुदा नैतिक रूपेँ वैध सहमति नहि हो सकैत। शिक्षा आ शास्त्रार्थमे शिक्षकक प्रश्न, परीक्षकक घोषणा, विद्यार्थीक प्रतिज्ञा, अकादमिक सम्मान, शोध-स्वीकृति—सभ भाषिक क्रिया संस्थागत भूमिका रखैत अछि। एहि कारण भाषा-दर्शन विश्वविद्यालयीय सत्ता-विन्याससँ सेहो जुड़ैत अछि। अध्याय-निष्कर्ष ऑस्टिन भाषा-दर्शनकेँ सत्य–असत्यक सीमित द्वैतसँ निकालि सामाजिक क्रियाक विस्तृत क्षेत्रमे लैत छथि। कहब केवल वर्णन नहि; उचित परिस्थितिमे कहब स्वयं करब अछि। कथन-कर्म, कथनगत क्रिया आ कथन-प्रभावक भेद एके उच्चारणक अलग आयाम स्पष्ट करैत अछि। सफलताक शर्त देखबैत अछि जे भाषा सामाजिक नियम, अधिकार आ संस्था सँ जुड़ल अछि। वर्णनात्मक–क्रियात्मक प्रारम्भिक भेद अन्ततः सरल नहि रहैत; लगभग प्रत्येक वाक्य किछु न किछु भाषिक काम करैत अछि। मीमांसा, न्याय आ भारतीय विधि-वाक्य परम्परासँ समस्या-संवाद अत्यन्त फलदायी अछि, मुदा ‘मीमांसा = speech-act theory’ प्रकारक ऐतिहासिक समानता अनुचित। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि भाषिक क्रियाक साथ सत्ता, न्याय, गरिमा आ उत्तरदायित्वक प्रश्न जोड़ैत अछि। संस्थागत रूपेँ सफल भाषिक क्रिया नैतिक रूपेँ स्वतः उचित नहि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—शब्द सुनू तँ केवल ‘की कहल?’ नहि पूछू; ‘कहि कऽ की कएल गेल?’, ‘ककर अधिकारसँ?’, ‘ककर ऊपर प्रभाव पड़ल?’, आ ‘ई क्रिया न्यायपूर्ण अछि की नहि?’ सेहो पूछू। अध्याय-ग्रन्थसूची • जे. एल. ऑस्टिन — ‘शब्दसँ काम कोना कएल जाइत अछि’ (How to Do Things with Words)। • जे. एल. ऑस्टिन — ‘दार्शनिक निबन्ध’ (Philosophical Papers)। • जे. एल. ऑस्टिन — ‘सत्य’ (Truth) तथा भाषा-दर्शन सम्बन्धी चयनित निबन्ध। • पी. एफ. स्ट्रॉसन — सन्दर्भ, अभिप्राय आ सामान्य भाषा सम्बन्धी अध्ययन। • जॉन आर. सर्ल — भाषिक क्रिया सम्बन्धी आरम्भिक अध्ययन; अगिला अध्यायमे विस्तृत। • एच. पी. ग्राइस — अर्थ, वक्ता-अभिप्राय आ संवाद सम्बन्धी अध्ययन। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • बी. के. मतिलाल — ‘शब्द आ जगत’ (The Word and the World); भाषा, वचन आ भारतीय दर्शन सम्बन्धी चयनित निबन्ध। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।