समस्या ऑस्टिन भाषाक क्रियात्मक स्वरूप स्पष्ट कएलनि—कहब बहुत बेर करब सेहो अछि। जॉन आर. सर्ल एहि परियोजनाकेँ अधिक व्यवस्थित रूप देबाक प्रयास करैत छथि। हुनकर प्रश्न अछि: भाषिक क्रिया कोन नियमक आधारपर सम्भव होइत अछि? एके वाक्य कखन कथन, आदेश, वचन, अनुरोध, प्रश्न अथवा घोषणा बनैत अछि? वक्ताक अभिप्राय, वाक्यक रूप, सामाजिक परम्परा आ संस्थागत नियमक सम्बन्ध की? ‘की अहाँ खिड़की बन्द कऽ सकैत छी?’ वाक्य व्याकरणिक रूपेँ क्षमता सम्बन्धी प्रश्न अछि, मुदा सामान्य प्रसंगमे ई अनुरोध हो सकैत अछि। एहन परोक्ष भाषिक क्रिया (indirect speech act) देखबैत अछि जे भाषिक अर्थ शब्दार्थ मात्र नहि; वक्ता की करय चाहैत छथि, श्रोता की अनुमान करैत छथि, आ साझा नियम की—ई सभ महत्त्वपूर्ण अछि। सर्ल ऑस्टिनक कथनगत क्रियाकेँ वर्गीकृत करबाक प्रयास करैत छथि। किछु वाक्य जगतक बारेमे दावा करैत अछि; किछु श्रोताकेँ किछु करबाक दिशा दैत अछि; किछु वक्ताकेँ भविष्यक कार्यक प्रति बाँधैत अछि; किछु मानसिक भाव व्यक्त करैत अछि; किछु संस्था-समर्थित घोषणा द्वारा सामाजिक स्थिति बदलैत अछि। एहि सिद्धान्तक विस्तार सामाजिक यथार्थक प्रश्न धरि जाइत अछि। मुद्रा, विवाह, पद, सम्पत्ति, नागरिकता, विश्वविद्यालयीय डिग्री, न्यायिक निर्णय—ई सभ केवल भौतिक वस्तु नहि, नियमबद्ध संस्थागत तथ्य सेहो छथि। सर्ल एहि क्षेत्रमे ‘क केँ ग प्रसंगमे ख मानल जाइत अछि’ प्रकारक स्थिति-कार्य (status function) द्वारा सामाजिक वास्तविकता बुझबाक प्रयास करैत छथि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—भाषिक क्रिया कतेक नियमबद्ध अछि? अभिप्राय कतेक आवश्यक? परोक्ष भाषिक क्रिया कोना बुझल जाइत? संस्थागत तथ्य भाषासँ कोना बनैत? आ भारतीय मीमांसा, न्याय, विधि-वाक्य तथा मिथिलाक सामाजिक–शास्त्रार्थीय परम्परासँ एहि सिद्धान्तक संवाद कोना कएल जाए बिना कृत्रिम ऐतिहासिक समानता बनौने? मूल प्रतिपादन एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे सर्ल भाषिक क्रियाकेँ नियमबद्ध सामाजिक–अभिप्रायात्मक व्यवहार रूपमे व्यवस्थित करैत छथि। वाक्यक अर्थ केवल शब्दार्थ नहि; कथनगत शक्ति, वक्ताक अभिप्राय, सामाजिक नियम आ श्रोता द्वारा पहिचान—ई सभ मिलि भाषिक क्रिया बनबैत अछि। सर्ल भाषिक क्रियाक पाँच प्रमुख प्रकार प्रस्तावित करैत छथि: प्रतिपादक—जगत सम्बन्धी दावा; निर्देशात्मक—श्रोताकेँ किछु करबाक दिशा; प्रतिबद्धकारी—वक्ताकेँ भविष्यक कार्यक प्रति बाँधब; अभिव्यंजक—भाव वा मनोभाव व्यक्त करब; घोषणात्मक—संस्थागत नियमक भीतर स्थिति बदलि देब। एहि वर्गीकरणक उद्देश्य सभ भाषिक व्यवहारकेँ एकदम बन्द पेटीमे राखब नहि, बल्कि कथनगत शक्ति पहिचानबाक विश्लेषणात्मक उपकरण देब अछि। वास्तविक भाषा बहुधा मिश्रित, परोक्ष आ प्रसंगाधारित होइत अछि। समानान्तर दर्शन सर्लसँ नियम, अभिप्राय आ संस्थागत शक्ति सम्बन्धी सूक्ष्मता ग्रहण करैत अछि; मुदा भाषिक संस्थाकेँ नैतिक रूपेँ स्वतः वैध नहि मानैत। जे संस्था मनुष्यक गरिमा, समानता वा अधिकारक विरुद्ध अछि, ओकर घोषणात्मक शक्ति सामाजिक तथ्य बना सकैत अछि, नैतिक न्याय नहि। रंगीन सारिणी — भाषिक क्रियाक पाँच प्रमुख प्रकार प्रमुख तर्क पहिल तर्क—भाषिक क्रिया नियमबद्ध होइत अछि। प्रतिज्ञा, आदेश, प्रश्न अथवा घोषणा मनमाने ध्वनि नहि; समाजमे स्थापित नियम आ अपेक्षा ओकरा पहिचानयोग्य बनबैत अछि। दोसर तर्क—भाषिक क्रिया केवल अभिप्राय नहि। वक्ता मनमे किछु सोचैत छथि, मुदा यदि सार्वजनिक भाषिक संकेत आ नियम अनुपस्थित, श्रोता क्रिया पहिचानि नहि सकत। अतः अभिप्राय आ परम्परा परस्पर जुड़ल छथि। तेसर तर्क—प्रस्ताविक सामग्री आ कथनगत शक्ति अलग कएल जा सकैत अछि। ‘अहाँ काल्हि आएब’ प्रस्ताव प्रश्न, आदेश, भविष्यवाणी वा वचनक रूपमे अलग शक्ति धारण करि सकैत अछि। सामग्री समान, भाषिक क्रिया अलग। चारिम तर्क—परोक्ष भाषिक क्रिया सामान्य भाषाक मूल विशेषता अछि। ‘एतय बहुत गर्मी अछि’ कखनो केवल ताप-वर्णन नहि, खिड़की खोलबाक अनुरोध हो सकैत अछि। श्रोता साझा प्रसंग, सहयोगी अपेक्षा आ वक्ताक उद्देश्यद्वारा परोक्ष शक्ति बुझैत अछि। पाँचम तर्क—सर्ल भाषिक नियममे ‘नियामक’ आ ‘संरचनात्मक’ नियमक भेद करैत छथि। नियामक नियम पहिनेसँ मौजूद गतिविधि नियंत्रित करैत अछि; संरचनात्मक नियम स्वयं गतिविधि बनबैत अछि। शतरंजक नियम बिना शतरंज नहि; ठीक तहिना किछु संस्थागत भाषिक क्रिया नियमद्वारा निर्मित होइत अछि। छठम तर्क—घोषणात्मक भाषिक क्रिया संस्थागत अधिकारपर निर्भर अछि। ‘बैठक समाप्त’ सभ व्यक्ति कहि सकैत अछि, मुदा संस्थागत प्रभाव तखन होयत जखन उचित अध्यक्ष वा अधिकृत व्यक्ति उचित परिस्थिति मे कहत। सातम तर्क—संस्थागत तथ्य सामूहिक मान्यतासँ बनैत अछि। कागजक टुकड़ा मुद्रा, व्यक्ति न्यायाधीश, भवन विश्वविद्यालय, प्रमाणपत्र डिग्री बनैत अछि किएक तँ सामाजिक नियम ओहि वस्तु वा व्यक्तिकेँ विशेष स्थिति-कार्य दैत अछि। आठम तर्क—भाषा एहि संस्थागत यथार्थक निर्माणमे अनिवार्य भूमिका रखैत अछि। जटिल संस्थागत स्थिति एहन नियम माँगैत अछि जे प्रतिनिधित्वित, संप्रेषित आ पुनरावृत्त कएल जा सकय। नवम तर्क—सामाजिक तथ्य प्राकृतिक तथ्यक विरोधी नहि। कागज भौतिक वस्तु रहैत अछि, मुदा संस्थागत रूपेँ मुद्रा सेहो। एके वस्तु भौतिक आ सामाजिक दुनू स्तरपर वास्तविक हो सकैत अछि। दसम तर्क—सर्लक सिद्धान्त अभिप्राय आ नियमपर बल दैत अछि, मुदा सत्ता, इतिहास आ असमानता कतेक पर्याप्त समेटैत अछि—ई प्रश्न खुलल अछि। कौन संस्था नियम बनबैत अछि? ककर अभिप्राय प्रभावी मानल जाइत? ककर घोषणा सामाजिक यथार्थ बदलैत? समानान्तर दर्शन एही प्रश्नकेँ आगे बढ़बैत अछि। पूर्वपक्ष पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे भाषिक क्रियाक पाँच वर्ग अत्यधिक व्यवस्थित अछि; वास्तविक भाषा मिश्रित होइत अछि। क्षमा माँगब भाव-अभिव्यक्ति सेहो, सम्बन्ध सुधारबाक क्रिया सेहो; राजनीतिक घोषणा एक साथि दावा, आदेश आ प्रतिबद्धता हो सकैत अछि। दोसर पूर्वपक्ष अभिप्रायपर केन्द्रित अछि। हम बहुत बेर एहन भाषिक अर्थ बुझैत छी जे वक्ताक स्पष्ट अभिप्रायसँ अधिक सामाजिक रूपेँ निर्धारित होइत अछि। कानूनी दस्तावेजक प्रभाव लेखकक निजी अभिप्रायपर निर्भर नहि रहि सकैत। तेसर पूर्वपक्ष संस्थागत तथ्यपर अछि। यदि सामाजिक संस्था सामूहिक स्वीकारद्वारा बनैत अछि, तँ सत्ता-असमानता, बाध्यता, इतिहास आ प्रतिरोधक भूमिका कतेक समायल? दासता, जातिगत पदानुक्रम अथवा औपनिवेशिक कानून सेहो कभी संस्थागत तथ्य छल; ‘स्वीकृत’ होयब नैतिक वैधता नहि। चारिम पूर्वपक्ष भारतीय दृष्टिसँ अछि। मीमांसा विधि-वाक्य आ कर्तव्य, न्याय वक्ता-विश्वसनीयता, धर्मशास्त्र घोषणा आ अनुष्ठानिक वचन, तथा शास्त्रार्थ प्रतिज्ञा–हेतु–उत्तरक नियम पहिनेसँ विश्लेषित करैत छथि। तखन सर्लक सिद्धान्तकेँ सार्वभौम आरम्भ-बिन्दु मानब अनुचित होयत। उत्तरपक्ष पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—वर्गीकरण पूर्ण प्राकृतिक जाति नहि; विश्लेषणात्मक उपकरण अछि। मिश्रित भाषिक क्रिया स्वीकारलासँ वर्गीकरणक उपयोग समाप्त नहि होइत; ओ प्रमुख दिशा पहिचानबाक साधन रहैत अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—अभिप्राय एकल कसौटी नहि। सर्लक पद्धतिमे नियम, सामाजिक परम्परा आ पहिचान सेहो महत्त्वपूर्ण छथि। समानान्तर दर्शन एहि बिन्दुकेँ संस्थागत इतिहास आ पाठ-व्याख्यासँ अधिक विस्तृत करैत अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—संस्थागत तथ्यक अस्तित्व आ नैतिक वैधता अलग स्तर छथि। ‘फलाँ संस्था वास्तवमे नियम लागू करैत अछि’ तथ्य हो सकैत अछि; ‘ओ संस्था न्यायपूर्ण अछि’ अलग नैतिक प्रश्न। गरिमा-आधारित नैतिकता दोसर प्रश्नक कसौटी दैत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय परम्पराक स्वतन्त्र इतिहास स्वीकारल जाए। मीमांसक विधि-वाक्य, न्यायीय शब्द-प्रमाण, अनुष्ठानिक घोषणा आ आधुनिक भाषिक क्रिया सिद्धान्त एकहि वस्तु नहि; मुदा भाषा द्वारा क्रिया, अधिकार, कर्तव्य आ सामाजिक परिणामक साझा समस्या संवादयोग्य अछि। भारतीय संवाद मीमांसा भाषाकेँ विधि, निषेध आ कर्तव्यक संदर्भमे पढ़ैत अछि। शास्त्रीय वाक्य केवल तथ्य-वर्णन नहि, कर्तव्य-प्रवर्तनक भूमिका रखैत अछि। सर्लक निर्देशात्मक अथवा घोषणात्मक वर्गक संग सीमित समस्या-साम्य हो सकैत अछि, मुदा मीमांसाक धर्मशास्त्रीय ढाँचा भिन्न। न्याय शब्द-प्रमाणमे वक्ताक योग्यता, विश्वासनीयता आ वाक्यबोधक शर्तपर बल दैत अछि। एहि कारण ‘कौन कहि रहल अछि?’, ‘कौन अधिकारसँ?’, ‘कथन ज्ञान देत की नहि?’ प्रश्न सर्लक अभिप्रायात्मक भाषिक क्रियासँ संवाद करैत अछि। भारतीय विधि आ अनुष्ठानिक परम्परामे नामकरण, संकल्प, दान, विवाह, शपथ, दीक्षा, नियुक्ति, राजकीय आदेश जकाँ भाषिक क्रिया सामाजिक स्थिति बदलैत अछि। मुदा एहन उदाहरणसभकेँ आधुनिक भाषिक-क्रिया वर्गीकरण (speech-act taxonomy) क पूर्वरूप घोषित करब ऐतिहासिक रूपेँ अनुचित। भर्तृहरि भाषा आ सामाजिक अर्थक व्यापक दार्शनिक आयाम खोलैत छथि, मुदा सर्लक नियम-आधारित अभिप्रायात्मक सिद्धान्तसँ समान नहि। भारतीय संवादक मुख्य शिक्षा ई कि भाषा ज्ञान देइत अछि, कर्तव्य बनबैत अछि, संस्था सक्रिय करैत अछि, सामाजिक सम्बन्ध बदलैत अछि; मुदा एहि सबक दार्शनिक आधार परम्परा-दर-परम्परा बदलैत अछि। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मिथिलाक समानान्तर दृष्टि भाषिक क्रियाकेँ शास्त्रार्थ, संस्था, सामाजिक अधिकार आ स्थानीय भाषिक व्यवहारक संयुक्त क्षेत्रमे पढ़ैत अछि। प्रतिज्ञा स्थापित करब, पूर्वपक्ष ग्रहण करब, उत्तर देब, निष्कर्ष स्वीकारब—ई बौद्धिक क्रियासभ नियमबद्ध भाषिक कार्य छथि। नव्य-न्याय दाबीक विषय, सीमा आ सम्बन्ध स्पष्ट करैत अछि; सर्ल कथनगत शक्ति, अभिप्राय आ संस्थागत नियम जोड़ैत छथि। समानान्तर पद्धति एहि दुनू आयामकेँ एक साथि उपयोग करि सकैत अछि। मिथिलाक सामाजिक इतिहासमे पंजीकरण, उपाधि, विवाह, पंचायत, राजकीय फरमान, भूमि-अधिकार, शिक्षण-संस्था, साहित्यिक सम्मान, धार्मिक संकल्प आदि भाषिक–संस्थागत क्रियासँ जुड़ल रहल छथि। एहि सभक ऐतिहासिक अध्ययनमे ‘ककर वचन मान्य छल?’ प्रश्न सत्ता-संरचना खोलैत अछि। एहि ठाम गरिमा-आधारित नैतिकता निर्णायक अछि। यदि कोनो संस्थागत नियम जन्म, जाति, लिंग अथवा धर्मक आधारपर भाषिक अधिकार असमान करैत अछि, तँ सामाजिक तथ्य स्वीकारल जा सकैत अछि, नैतिक वैधता नहि। बहुकेन्द्रिक लोकतन्त्र भाषिक क्रियाक अधिकारकेँ विस्तृत करैत अछि—नागरिकक आपत्ति, शिकायत, सहमति, असहमति, सार्वजनिक साक्ष्य आ अपील संस्थागत प्रभाव राखय। केवल उच्च पदाधिकारीक भाषा सामाजिक यथार्थ बदलय, एहन केन्द्रीकरण लोकतान्त्रिक नहि। समानान्तर सूत्र—भाषिक शक्ति के पास अछि, ई पूछू; भाषिक नियम ककरा बाहर करैत अछि, ई पूछू; संस्थागत तथ्य मानू, मुदा ओकर नैतिक समीक्षा नहि छोड़ू। रंगीन प्रक्रिया-चित्र — प्रत्यक्ष सँ परोक्ष भाषिक क्रिया धरि समकालीन प्रयोग कृत्रिम बुद्धिमे संवादी अभिकर्ता (conversational agent) द्वारा ‘हम बुकिंग कऽ देलहुँ’, ‘हम अहाँक आवेदन जमा कऽ देलहुँ’, ‘हम सहमत छी’ जकाँ वाक्य संस्थागत प्रभाव राखि सकैत अछि। प्रश्न अछि—कृत्रिम बुद्धि (AI) क कथन ककर अभिप्राय मानल जाए? संस्था, उपयोगकर्ता, कि प्रणाली? उत्तरदायित्व स्पष्ट रहबाक चाही। डिजिटल मंचपर ‘स्वीकार (accept)’, ‘पुष्टि (confirm)’, ‘सदस्यता (subscribe)’, ‘सूचना (report)’, ‘अवरोध (block)’, ‘हटाउ (delete)’, ‘प्रकाशित करू (publish)’ बटन प्रतीकात्मक भाषिक क्रिया जकाँ कार्य करैत अछि। उपयोगकर्ता एक क्लिकद्वारा सामाजिक वा कानूनी स्थिति बदलि सकैत अछि। कानूनमे अनुबन्ध, शपथ, नियुक्ति, राजीनामा, विवाह-पंजीकरण, न्यायिक आदेश आ विधायी घोषणा सर्लक घोषणात्मक भाषिक क्रिया-विमर्शक प्रत्यक्ष समकालीन क्षेत्र छथि। राजनीतिमे ‘हम आपातकाल घोषित करैत छी’, ‘ई नीति लागू भेल’, ‘फलाँ समूह प्रतिबन्धित’ जकाँ वाक्य राज्यसत्ता द्वारा विशाल सामाजिक परिणाम उत्पन्न करैत अछि। भाषिक क्रिया विश्लेषण एतय सत्ता-समीक्षासँ अलग नहि रहि सकैत। सामाजिक माध्यममे परोक्ष भाषिक क्रिया बहुत सामान्य अछि। विडम्बना, व्यंग्य, संकेत, मीम, कोड-शब्द—ई सभक अर्थ शब्दार्थसँ अधिक समुदाय-विशिष्ट प्रसंग पर निर्भर होइत अछि। कृत्रिम-बुद्धि सामग्री-संयमन (AI moderation) प्रणाली एहि परोक्षता नहि बुझलासँ गलत निर्णय दे सकैत अछि। शिक्षामे ‘अहाँ पास भेलहुँ’, ‘ई उत्तर स्वीकार्य नहि’, ‘अहाँ शोध लेल अनुमोदित छी’ जकाँ कथन शिक्षक वा संस्थाक अधिकारद्वारा छात्रक वास्तविक स्थिति बदलैत अछि। एहि अधिकारक पारदर्शिता आ अपील-व्यवस्था नैतिक रूपेँ आवश्यक अछि। सहमति सम्बन्धी आधुनिक नैतिकतामे केवल उच्चारित ‘हाँ’ पर्याप्त नहि। यदि सूचना-अभाव, दबाव, असमान शक्ति अथवा भ्रम अछि, तँ संस्थागत रूपेँ मान्य कथन नैतिक रूपेँ वैध सहमति नहि हो सकैत। अध्याय-निष्कर्ष सर्ल ऑस्टिनक भाषिक क्रिया-विचारकेँ अधिक व्यवस्थित रूप दैत छथि। प्रस्ताविक सामग्री, कथनगत शक्ति, अभिप्राय, नियम, परोक्षता आ संस्थागत तथ्य भाषा-दर्शनक मुख्य विषय बनैत अछि। भाषिक क्रियाक पाँच प्रकार—प्रतिपादक, निर्देशात्मक, प्रतिबद्धकारी, अभिव्यंजक, घोषणात्मक—वास्तविक भाषिक व्यवहार बुझबाक उपयोगी विश्लेषणात्मक मानचित्र दैत अछि। परोक्ष भाषिक क्रिया देखबैत अछि जे अर्थ शब्दार्थ मात्र नहि; साझा प्रसंग, अभिप्राय, सामाजिक नियम आ श्रोता-अनुमान अनिवार्य अछि। संस्थागत तथ्य भाषा आ सामूहिक मान्यताक शक्ति स्पष्ट करैत अछि, मुदा संस्थागत अस्तित्व नैतिक वैधता नहि। अन्यायपूर्ण संस्था वास्तविक हो सकैत अछि, उचित नहि। भारतीय मीमांसा, न्याय, अनुष्ठानिक वचन आ मिथिलाक शास्त्रार्थीय परम्परासँ संवाद फलदायी अछि; इतिहासक पहचान अथवा पूर्वगामिता-दाबी नहि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—वाक्यक अर्थ बुझबाक लेल केवल ‘की कहल?’ नहि, ‘कहि कऽ की कएल?’, ‘कौन नियमसँ?’, ‘ककर अभिप्रायसँ?’, ‘ककर अधिकारसँ?’, आ ‘ककर ऊपर परिणाम पड़ल?’ सेहो पूछू। अध्याय-ग्रन्थसूची • जॉन आर. सर्ल — ‘भाषिक क्रिया’ (Speech Acts)। • जॉन आर. सर्ल — ‘अभिव्यक्ति आ अर्थ’ (Expression and Meaning)। • जॉन आर. सर्ल — ‘अभिप्रायात्मकता’ (Intentionality)। • जॉन आर. सर्ल — ‘सामाजिक यथार्थक निर्माण’ (The Construction of Social Reality)। • जॉन आर. सर्ल — ‘भाषा-दर्शन’ सम्बन्धी चयनित निबन्ध। • जे. एल. ऑस्टिन — ‘शब्दसँ काम कोना कएल जाइत अछि’ (How to Do Things with Words)। • एच. पी. ग्राइस — वक्ता-अर्थ, अभिप्राय आ संवाद सम्बन्धी चयनित निबन्ध। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • बी. के. मतिलाल — ‘शब्द आ जगत’ (The Word and the World); भाषा आ भारतीय दर्शन सम्बन्धी चयनित अध्ययन। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।