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समस्या
संरचनावादक भाषिक आधार बुझबाक लेल फर्डिनाँ द सस्यूरक संकेत-विचार केन्द्रीय अछि। मुदा ‘संकेतक’ आ ‘संकेतित’ शब्द अक्सर एहन सरल सूत्रमे घटा देल जाइत अछि जे मानो संकेतक = ध्वनि, संकेतित = वस्तु। सस्यूरक वास्तविक प्रतिपादन एहि सँ अधिक सूक्ष्म अछि: भाषिक संकेत बाह्य वस्तु आ ध्वनिक प्रतिलिपिक सीधा जोड़ नहि, बल्कि ध्वनि-छवि आ अवधारणात्मक पक्षक संयुक्त इकाई अछि। उदाहरणार्थ ‘गाछ’ शब्दक ध्वनि-संरचना सीधे कोनो एक गाछ-वस्तु नहि होइत; भाषिक समुदायमे ओकरा एक अवधारणात्मक पक्ष संग जोड़ल जाइत अछि। संकेतक आ संकेतित दुनू भाषिक प्रणालीक भीतर काम करैत छथि। एहि कारण भाषिक संकेत वस्तु-नामकरणक सरल सूची मात्र नहि। दोसरो प्रश्न ‘मनमानी’ (arbitrariness) क अछि। यदि संकेतक–संकेतित सम्बन्ध मनमाना अछि, तँ की भाषा पूर्णतः स्वेच्छाचारी अछि? की कोनो शब्द कोनो अर्थ कखनो धारण कऽ सकैत अछि? स्पष्टतः नहि। सामाजिक परम्परा, इतिहास आ प्रणालीगत भेद संकेतककेँ स्थिरता दैत अछि। मनमानीक अर्थ ‘व्यक्तिक इच्छा’ नहि, बल्कि प्राकृतिक अनिवार्यता केर अभाव अछि। तेसर प्रश्न भाषिक मूल्यक अछि। सस्यूर कहैत छथि जे संकेतक अर्थ केवल सकारात्मक सामग्रीसँ नहि, प्रणालीमे अन्य संकेतसभसँ भेद द्वारा सेहो बनैत अछि। ‘भेड़’ शब्दक अर्थ ओकर ध्वनि–अवधारणा मात्र नहि; भाषा विशेषक विभेदात्मक संरचना ओकर मूल्य तय करैत अछि। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—संकेतक, संकेतित, संकेत, मनमानी, मूल्य, भाषा-प्रणाली/वाणी-प्रयोग (langue/parole), समकालिक/कालक्रमिक विश्लेषणक सम्बन्ध कोना बुझी? आ भारतीय शब्दमीमांसा, भर्तृहरि, न्याय, मीमांसा तथा मिथिलाक भाषिक परम्परासँ संवाद कोना कएल जाए बिना ‘भर्तृहरि पहिनहि सस्यूर छलाह’ प्रकारक काल-विस्थापन कएने?
मूल प्रतिपादन
एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे सस्यूर भाषाकेँ संकेतसभक सामाजिक प्रणाली रूपमे बुझैत छथि। संकेतक (signifier) ध्वनिक/रूपात्मक पक्ष अछि; संकेतित (signified) अवधारणात्मक पक्ष; संकेत (sign) एहि दुनूक संयुक्त भाषिक इकाई। बाह्य वस्तु एहि परिभाषाक प्रत्यक्ष घटक नहि, यद्यपि भाषिक प्रयोग अन्ततः जगतसँ सम्बन्ध रखि सकैत अछि। संकेतक–संकेतित सम्बन्ध प्राकृतिक रूपेँ अनिवार्य नहि; सामाजिक रूपेँ स्थापित अछि। एहि कारण ‘मनमानी’ कहब व्यक्तिगत मनमौजीपन नहि, बल्कि एहि बातक संकेत अछि जे ‘गाछ’ ध्वनि-रूपक संग गाछ-अवधारणाक कोनो प्राकृतिक कारणात्मक बन्धन नहि। भाषिक मूल्य भेदात्मक अछि। एक संकेतक मूल्य एहि कारण पबैत अछि जे ओ अन्य संकेतक/संकेतितसँ अलग स्थान रखैत अछि। भाषा वस्तुसभक तैयार सूचीपर लेबल नहि चिपकबैत; ओ विभाजन आ वर्गीकरणक प्रणाली सेहो बनबैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि दृष्टिसँ संबंधात्मक अर्थ-विवेक स्वीकारैत अछि, मुदा भाषा द्वारा जगत पूर्णतः निर्मित होइत अछि—एहन निष्कर्ष नहि निकालैत। संकेत-प्रणाली अर्थक विन्यास करैत अछि; तथ्यात्मक यथार्थ भाषिक मनमानापनसँ स्वतंत्र प्रतिरोध रखैत अछि।
प्रमुख तर्क
पहिल तर्क—भाषिक संकेत द्विपक्षीय अछि। संकेतक आ संकेतित अलग-अलग अस्तित्ववान वस्तु नहि जे बादमे जोड़ल जाए; भाषिक चेतनामे संकेत एहि दुनूक सम्बन्ध रूपमे कार्य करैत अछि। दोसर तर्क—संकेतित बाह्य वस्तु नहि। ‘गाछ’क संकेतित ‘सामने ठाढ़ ई खास गाछ’ नहि, बल्कि भाषिक अवधारणात्मक पक्ष अछि। बाह्य सन्दर्भक प्रश्न सस्यूरक मूल संकेत-विज्ञानात्मक मॉडल (semiological model) सँ अलग स्तर पर उठैत अछि। तेसर तर्क—मनमानी प्राकृतिक बन्धनक निषेध अछि। फ्रेंच, मैथिली, हिन्दी, अंग्रेजी अलग ध्वनि-रूप द्वारा समान/निकट अवधारणा व्यक्त करि सकैत अछि; एहि भिन्नतासँ स्पष्ट होइत अछि जे ध्वनि आ अवधारणाक सम्बन्ध प्राकृतिक रूपेँ पूर्वनिर्धारित नहि। चारिम तर्क—मनमानी पूर्ण स्वतंत्रता नहि। एक व्यक्ति चाहि कऽ आज ‘गाछ’क अर्थ ‘पानी’ नहि बना सकैत, किएक तँ भाषा सामाजिक संस्था अछि। सामुदायिक इतिहास संकेतककेँ स्थिरता आ प्रतिरोध दैत अछि। पाँचम तर्क—भाषिक मूल्य भेदात्मक अछि। शब्दक अर्थक एक हिस्सा एहि पर निर्भर अछि जे भाषा अपन अवधारणात्मक क्षेत्र (conceptual field) कोना विभाजित करैत अछि। अलग भाषा निकट अनुभव क्षेत्रकेँ अलग शब्द-विभाजनसँ व्यवस्थित करि सकैत अछि। छठम तर्क—भाषा-प्रणाली (langue) आ वाणी-प्रयोग (parole)क भेद विश्लेषणक स्तर अलग करैत अछि। भाषा-प्रणाली (langue) सामाजिक नियमक साझा प्रणाली; वाणी-प्रयोग (parole) व्यक्तिगत/विशिष्ट भाषिक उच्चारण। मुदा वास्तविक भाषा-विज्ञानमे दुनूक अन्तर्सम्बन्ध अधिक जटिल अछि। सातम तर्क—समकालिक विश्लेषण (synchronic analysis) एक समयपर प्रणालीक सम्बन्ध जाँचैत अछि; कालक्रमिक विश्लेषण (diachronic analysis) समयक संग परिवर्तन जाँचैत अछि। सस्यूरक संरचनात्मक परियोजना पहिल पक्षक स्वायत्तता पर बल दैत अछि। आठम तर्क—भाषा ‘नामकरण-सूची’ नहि। यदि जगत पहिनेसँ पूर्णतः वर्गीकृत वस्तुसभक सूची होइत आ भाषा केवल नाम जोड़ैत, तँ भाषा-दर-भाषा अर्थ-सीमा (semantic boundaries) एतेक भिन्न किएक होइत? संकेत-प्रणाली अनुभवक वर्गीकरणमे सक्रिय भूमिका रखैत अछि। नवम तर्क—भेदात्मक मूल्यक सिद्धान्त भाषाकेँ सम्बन्धक जाल बनबैत अछि। ‘भाइ’, ‘बहिन’, ‘मामा’, ‘मौसी’ जकाँ नातेदारी-पद केवल व्यक्ति-सन्दर्भ नहि, पूरा संबंध-प्रणालीमे स्थान पबैत छथि। दसम तर्क—सस्यूरक मॉडल सामाजिक अछि, मानसिकतावादी मात्र नहि। संकेतक–संकेतित सम्बन्ध सामूहिक परम्परा सँ स्थापित होइत अछि; भाषा एक साझा संस्था (institution) होइत अछि। एगारहम तर्क—संकेतक/संकेतित (signifier/signified) मॉडल कथ्य आ वस्तु-दुनिया बीच पूर्ण सम्बन्ध समाप्त नहि करैत। सस्यूर भाषिक संकेतक आ अवधारणात्मक संगठन स्पष्ट करैत छथि; तथ्यात्मक सन्दर्भ, सत्य आ प्रयोगगत उपयोग (pragmatic use) लेल अतिरिक्त विश्लेषण चाही। बारहम तर्क—संरचनावादक बादक विकास सस्यूरक ‘भेद’ विचारक विस्तार करैत अछि, मुदा बादक सिद्धान्तकार (theorists) क निष्कर्ष सीधे सस्यूर पर आरोपित करब अनुचित। विशेषतः भिन्नता-स्थगन (différance), विखण्डन (deconstruction), विमर्श–सत्ता (discourse-power) आदि बादक अलग परियोजना छथि।
पूर्वपक्ष
पूर्वपक्षक पहिल रूप कहैत अछि जे संकेतितकेँ अवधारणा बनौने बाह्य जगत बहुत दूर भऽ जाइत अछि। भाषा वास्तविक वस्तु आ तथ्यसँ कोना जुड़ैत अछि—सस्यूरक मॉडल पर्याप्त उत्तर नहि दैत। दोसर पूर्वपक्ष मनमानीपर अछि। ध्वनि-अनुकरण, ध्वन्यात्मक प्रतीकवाद, रूपात्मक प्रेरणा आ ऐतिहासिक सम्बन्ध देखबैत अछि जे सभ संकेत समान रूपेँ मनमाना नहि। तेसर पूर्वपक्ष भाषा-प्रणाली/वाणी-प्रयोग (langue/parole) भेद पर अछि। सामाजिक नियम आ व्यक्तिगत प्रयोग एतेक अलग नहि; बोलयवला लोक नया रूप बनबैत, नियम बदलैत, नवोन्मेष (innovation) सामाजिक प्रणालीक हिस्सा बनैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष इतिहाससँ अछि। समकालिक संरचना पर अत्यधिक बल देलासँ भाषिक परिवर्तन, उपभाषा, सत्ता, औपनिवेशिक प्रभाव, मानकीकरण आ सामाजिक संघर्ष ओझरायल जा सकैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष तुलनात्मक दर्शनसँ अछि। भर्तृहरि, मीमांसा, पाणिनि अथवा अपोहकेँ सस्यूरियन संरचनावाद (Saussurean structuralism) केर पूर्वरूप घोषित करब ऐतिहासिक रूपेँ भ्रामक अछि।
उत्तरपक्ष
पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—सस्यूरक लक्ष्य पूर्ण सन्दर्भ-सिद्धान्त (theory of reference) नहि। संकेतक–संकेतित मॉडल भाषिक संकेत-प्रणाली (sign-system)क एक स्तर स्पष्ट करैत अछि। समानान्तर दर्शन बाह्य सन्दर्भ आ सत्यक प्रश्न फ्रेगे, न्याय, विज्ञान आ प्रमाण-विवेकसँ जोड़ैत अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—मनमानी डिग्रीक प्रश्न हो सकैत अछि। मूल सूत्र ‘प्राकृतिक अनिवार्यता नहि (natural necessity)’ अछि; प्रतिरूपता (iconicity) अथवा आंशिक प्रेरणा (partial motivation) एहि सिद्धान्तक सीमा/संशोधन दिखबैत अछि, पूर्ण खण्डन नहि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—भाषा-प्रणाली/वाणी-प्रयोग (langue/parole) विश्लेषणात्मक भेद (analytic distinction) अछि, तत्त्वमीमांसक दीवार (ontological wall) नहि। वास्तविक भाषा परिवर्तन व्यक्तिगत प्रयोग, समूह-प्रयोग, संस्था आ इतिहासक संयुक्त प्रक्रियासँ होइत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—समकालिक आ कालक्रमिक विश्लेषण पूरक होयबाक चाही। वर्तमान प्रणाली समझू, फेर ओकर ऐतिहासिक निर्माण/परिवर्तन जाँचू। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय परम्परासँ संवाद समस्या-साम्य धरि सीमित रहय। ‘शब्द–अर्थ सम्बन्ध प्राकृतिक की सामाजिक?’, ‘वाक्य/शब्दक इकाई की?’, ‘भेद अर्थ बनबैत अछि की?’—ई साझा प्रश्न हो सकैत अछि; सिद्धान्त समान नहि।
भारतीय संवाद
पाणिनीय परम्परा भाषा रूपक नियमबद्ध उत्पादन देखबैत अछि; सस्यूर सामाजिक संकेत-प्रणालीक सम्बन्धात्मक मूल्य पर बल दैत छथि। दुनूक पद्धति, इकाई, उद्देश्य आ इतिहास अलग—पाणिनि संरचनात्मक भाषावैज्ञानिक (structural linguist) पहिले नहि। भर्तृहरि शब्द–वाक्य, स्फोट आ भाषिक बोधक एकता प्रश्नमे आनैत छथि। सस्यूर संकेतक–संकेतितक द्विपक्षीय संकेत-विचार दैत छथि। ई दुनू समान मॉडल (same model) नहि; भर्तृहरिक भाषाक तत्त्वमीमांसा (metaphysics of language) आ सस्यूरक संकेत-विज्ञान (semiology) अलग परियोजना छथि। न्याय शब्द–पदार्थ सम्बन्ध, जाति–व्यक्ति, शब्दप्रमाण आ वक्ता-विश्वसनीयतासँ अर्थकेँ यथार्थवादी जगतसँ जोड़ैत अछि। सस्यूरक संकेतित अवधारणात्मक मूल्य सँ न्यायीय सन्दर्भात्मक यथार्थवाद (referential realism) स्पष्ट प्रतिपक्ष प्रस्तुत करि सकैत अछि। मीमांसा शब्दशक्ति, वाक्यार्थ, तात्पर्य, आकांक्षा–योग्यता–सन्निधि द्वारा भाषिक अर्थकेँ वाक्य-प्रसंग (sentence-context) मे रखैत अछि। सस्यूरक भाषा-प्रणाली-स्तरीय संरचना (langue-level structure) एहि अधिक प्रयोगगत/व्याख्यात्मक आयाम (pragmatic/hermeneutic dimensions)सभक पूर्ण विकल्प नहि। बौद्ध अपोह वर्गीय अर्थकेँ अन्यक अपवर्जनसँ बुझैत अछि। सस्यूरक भेदात्मक मूल्य (differential value) संग समस्या-साम्य आकर्षक अछि, मुदा अपोह = संरचनात्मक भेद (structural difference) नहि; दार्शनिक आधार आ लक्ष्य भिन्न। भारतीय संवादक निष्कर्ष—भाषा-व्यवस्थाक सम्बन्धात्मकता एक साझा दार्शनिक समस्या हो सकैत अछि; समाधानसभ ऐतिहासिक रूपेँ स्वतंत्र रहैत छथि।
मिथिलाक समानान्तर दृष्टि
मिथिलाक भाषिक विश्लेषण सस्यूरसँ एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा ग्रहण करैत अछि—शब्दक अर्थ केवल कोशीय ‘मतलब’ नहि; प्रणालीमे ओकर भेद, सामाजिक प्रयोग आ अन्य पदसँ सम्बन्ध सेहो जाँचू। मैथिली नातेदारी, कृषि, अनुष्ठान, लोक-संस्कृति, पाण्डित्य, प्रशासन वा आधुनिक डिजिटल जीवनक शब्दावली अर्थ-क्षेत्र (semantic field) बनबैत अछि। एक पद हटि अथवा बदलि गेलासँ पूरा विभेदात्मक क्षेत्रक अर्थ-मानचित्र बदलि सकैत अछि। मानकीकरणक प्रश्नमे भाषा-प्रणाली (langue) जकाँ सामाजिक प्रणाली उपयोगी विश्लेषणात्मक ढाँचा (analytic frame) दे सकैत अछि, मुदा मैथिली वास्तविकता बहुकेन्द्रीय अछि—क्षेत्रीय रूप, भारत–नेपाल, लिपि, प्रवास, वर्ग, शिक्षा, डिजिटल प्रयोग आ साहित्यिक मानक परस्पर प्रभाव करैत छथि। समानान्तर दृष्टि ‘भेद’केँ ‘सत्य मनमाना’ बनबाक लाइसेंस नहि दैत। शब्द-अर्थ सामाजिक प्रणालीमे भेदात्मक हो सकैत अछि; ‘फलाँ घटना भेल की नहि’ तथ्यात्मक प्रश्न प्रमाणसँ तय होयत। इतिहासलेखनमे शब्दक कालगत मूल्य जाँचल जाए। आधुनिक ‘जाति’, ‘राष्ट्र’, ‘भाषा’, ‘समुदाय’, ‘शास्त्र’ जकाँ पदक आजुक अर्थ-सीमा (semantic boundaries) अतीतपर स्वतः लागू नहि। आत्मसमीक्षा—यदि सस्यूरियन मॉडल (Saussurean model) लोकप्रयोग, सामाजिक सत्ता वा बाह्य सन्दर्भ पर्याप्त नहि बुझबैत, तँ मॉडल विस्तृत करू; स्थानीय सामग्रीकेँ सिद्धान्तमे जबरन नहि घुसाउ।
समकालीन प्रयोग
कृत्रिम बुद्धि (AI) भाषा-मॉडल शब्दक अर्थ अनुमानित करबाक लेल विशाल सहप्रयोग-संरचना सीखैत अछि। एहि अर्थमे भेदात्मक सम्बन्ध (differential relation) उपयोगी अछि; मुदा सांख्यिकीय सहप्रयोग (statistical co-occurrence) = सत्य नहि। भाषा-मॉडल संकेत-सम्बन्ध सीखि सकैत अछि, बाह्य जगतक तथ्य सत्यापित अलग काज अछि। खोज-प्रणाली आ अर्थ-समावेशन (semantic embedding) मे शब्दक मूल्य निकट/दूर सदिश-सम्बन्ध (vector relations) द्वारा मॉडल कएल जाइत अछि। ई सस्यूरियन भेद (Saussurean difference) क आधुनिक समानता नहि, मुदा सम्बन्ध-आधारित निरूपण (relation-based representation) क तकनीकी उदाहरण अछि। ब्रान्ड, लोगो, इमोजी (emoji), हैशटैग (hashtag) आ अन्तरफलक-चिह्न (interface icons) सामाजिक संकेतक छथि। हुनकर अर्थ चिह्न (icon) क रूपमात्रसँ नहि, सामूहिक परम्परागत सहमति (convention) आ मंच-प्रसंग (platform context) सँ बनैत अछि। कानूनमे एक शब्दक संस्थागत मूल्य (institutional value) बदलि सकैत अछि। ‘अल्पवयस्क (minor)’, ‘सहमति (consent)’, ‘सार्वजनिक (public)’, ‘सम्पत्ति (property)’ जकाँ पद भाषिक प्रणाली आ विधिक परिभाषामे खास भेदात्मक स्थान रखैत अछि; अनुवाद (translation) मे केवल शब्दकोशीय समतुल्य (dictionary equivalent) पर्याप्त नहि। भाषा-नीतिमे ‘भाषा’ बनाम ‘बोली’क श्रेणी (category) स्वतः प्राकृतिक नहि; सामाजिक–राजनीतिक वर्गीकरण (classification) आ संस्थागत मान्यता (institutional recognition) ओकर मूल्य (value) बदलि सकैत अछि। मुदा भाषावैज्ञानिक तथ्य आ ऐतिहासिक प्रमाण एहि वर्गीकरणक आलोचनात्मक कसौटी बनैत अछि। इतिहास आ साहित्यिक सम्पादनमे पुरातन शब्द (archaic word)क अर्थ आजुक समानार्थी (synonym) सँ तय नहि। समकालीन शब्द-क्षेत्र (contemporary lexical field), पाण्डुलिपि-प्रसंग (manuscript context), विधा (genre), लेखक/वक्ता आ तुलनात्मक प्रयोग (comparative usage) जाँचबाक चाही।
अध्याय-निष्कर्ष
सस्यूर भाषा-दर्शनमे निर्णायक सम्बन्धात्मक मोड़ दैत छथि। संकेतक आ संकेतित मिलि भाषिक संकेत बनैत अछि; हुनकर सम्बन्ध प्राकृतिक अनिवार्यता नहि, सामाजिक रूपेँ स्थापित; भाषिक मूल्य प्रणालीगत भेदसँ बनैत अछि। भाषा-प्रणाली/वाणी-प्रयोग (langue/parole) आ समकालिक/कालक्रमिक (synchronic/diachronic) भेद विश्लेषणक स्तर स्पष्ट करैत अछि, मुदा वास्तविक भाषा-जीवनमे एहि दुनूक पारस्परिकता स्वीकारब आवश्यक अछि। सस्यूरक शक्ति संकेत-प्रणाली आ भेदात्मक मूल्य (differential value) स्पष्ट करबामे अछि; सीमा बाह्य सन्दर्भ, सत्य-शर्त (truth conditions), प्रयोग-विज्ञान (pragmatics), सत्ता (power) आ ऐतिहासिक संघर्ष (historical conflict) पर अपेक्षाकृत कम ध्यानमे अछि। भारतीय पाणिनि, भर्तृहरि, न्याय, मीमांसा आ अपोहक संग समस्या-संवाद फलदायी अछि, मुदा ऐतिहासिक समानता नहि: भर्तृहरि = सस्यूर नहि; अपोह = सस्यूरियन भेद (Saussurean difference) नहि; पाणिनि = संरचनावाद (structuralism) नहि। समानान्तर सूत्र—‘संकेतक सामाजिक अछि, अर्थ सम्बन्धात्मक हो सकैत अछि; मुदा सत्य मनमाना नहि। भाषा अनुभवकेँ वर्गीकृत करैत अछि, जगतकेँ इच्छानुसार बनबैत नहि।’
अध्याय-ग्रन्थसूची
• फर्डिनाँ द सस्यूर — ‘सामान्य भाषाविज्ञानक पाठ्यक्रम’ (Course in General Linguistics)। • फर्डिनाँ द सस्यूर — ‘सामान्य भाषाविज्ञान सम्बन्धी लेखन’ (Writings in General Linguistics)। • जोनाथन कलर — ‘सस्यूर’ (Saussure)। • रॉय हैरिस — सस्यूर, संकेत-विचार आ भाषिक संरचना सम्बन्धी आलोचनात्मक अध्ययन। • पाणिनि — अष्टाध्यायी। • पतञ्जलि — महाभाष्य। • भर्तृहरि — वाक्यपदीय। • गौतम — न्यायसूत्र। • वात्स्यायन — न्यायभाष्य। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • शबरस्वामी — शबरभाष्य। • कुमारिल भट्ट — श्लोकवार्तिक। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • बी. के. मतिलाल — ‘शब्द आ जगत’ (The Word and the World); ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • के. कुञ्जुन्नि राजा — ‘भारतीय अर्थ-सिद्धान्त’ (Indian Theories of Meaning)।