समस्या ‘उत्तर-आधुनिकता’ (postmodernity/postmodernism) शब्द दर्शन, साहित्य, कला, वास्तुकला, इतिहास, समाजशास्त्र, माध्यम-अध्ययन आ राजनीति—सभ क्षेत्रमे अलग अर्थमे प्रयोग होइत अछि। एहि कारण प्रश्न ‘उत्तर-आधुनिकता की अछि?’ क उत्तर एक-पंक्तिक परिभाषासँ नहि देल जा सकैत। एक लोकप्रिय सरलीकरण कहैत अछि—उत्तर-आधुनिकता मानैत अछि जे सत्य नहि अछि, सभ व्याख्या समान अछि, इतिहास कथा मात्र अछि, विज्ञान सत्ता मात्र अछि, परम्परा व्यर्थ अछि, आ नैतिकता मनमाना। ई वर्णन उत्तर-आधुनिक विचारकसभक विविधता आ आन्तरिक मतभेद दुनू नष्ट करैत अछि। उत्तर-आधुनिक प्रश्नक एक महत्त्वपूर्ण स्रोत आधुनिकताक ओ दाबी पर संशय अछि जे विवेक, विज्ञान, प्रगति, राष्ट्र, विकास, क्रान्ति अथवा इतिहासक कोनो एक महाख्यान मानवता केर सर्वमान्य दिशा निर्धारित करि सकैत अछि। दोसरा तरफ, उत्तर-आधुनिक आलोचना स्वयं अति करि सकैत अछि। यदि प्रत्येक महाख्यान संदिग्ध, प्रत्येक सत्य शक्ति-सापेक्ष, प्रत्येक पहचान तरल, प्रत्येक अर्थ अस्थिर—तखन अन्याय, तथ्य, अधिकार, वैज्ञानिक प्रमाण आ ऐतिहासिक दायित्वक कसौटी कोना बनत? उत्तर-आधुनिकता आधुनिकताक पूर्ण अन्त सेहो नहि। आधुनिक विज्ञान, राज्य, बाजार, विश्वविद्यालय, कानून, अधिकार, मीडिया आ तकनीक उत्तर-आधुनिक संस्कृतिक संग एकहि समय सह-अस्तित्व राखैत छथि। अतः ‘आधुनिक’ आ ‘उत्तर-आधुनिक’ केँ क्रमिक कालखंड मात्र नहि, परस्पर तनावपूर्ण प्रवृत्ति रूपमे सेहो पढ़ल जाए। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—उत्तर-आधुनिकता कतेक दार्शनिक स्थिति, कतेक सांस्कृतिक अवस्था, कतेक ऐतिहासिक संवेदना? महाख्यान, बहुलता, विखण्डन, माध्यम, पहचान, उपभोक्ता-संस्कृति, सत्य आ प्रतिनिधित्वक प्रश्न एहि शब्दमे कोना जुड़ैत अछि? मूल प्रतिपादन एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे उत्तर-आधुनिकता एकल सिद्धान्त नहि; आधुनिक सार्वभौमिकता, प्रगति-कथा, केन्द्र, स्थिर पहचान, एकल व्याख्या आ प्रतिनिधित्वक पारदर्शितापर उठल विविध संशयसभक परिवार अछि। ज्याँ-फ्राँस्वा ल्योटार उत्तर-आधुनिक अवस्थाक प्रसिद्ध सूत्र ‘महाख्यानसभपर अविश्वास’ (incredulity toward metanarratives) द्वारा दैत छथि। प्रश्न ई नहि जे सभ कथा झूठ; प्रश्न ई जे एक महान कथा सभ ज्ञान, इतिहास आ मुक्ति केर अंतिम वैधता कोना दावा करैत अछि। बौद्रियार माध्यम, संकेत, उपभोग आ प्रतिरूपक एहन जगतपर प्रश्न उठबैत छथि जतऽ प्रतिनिधित्व (representation) केवल बाहरी वास्तविकताक दर्पण नहि रहि, अनुभव केर संरचना स्वयं बदलि सकैत अछि। देरिदा, फूको, ल्योटार आ बौद्रियारकेँ एकहि ‘उत्तर-आधुनिक सिद्धान्त’क चार लेखक बनाबयब अनुचित। हुनकर प्रश्न, पद्धति आ निष्कर्ष भिन्न छथि; समानता केवल आधुनिक केन्द्र/पूर्णता/सार्वभौमिक कथापर विविध आलोचना धरि सीमित। समानान्तर दर्शन उत्तर-आधुनिक आलोचनासँ बहुलता, केन्द्र-समीक्षा, हाशियाक संवेदनशीलता आ आत्मसमीक्षा ग्रहण करैत अछि; मुदा सत्य-अराजकता, प्रमाण-विहीनता आ गरिमा-विरोधी सापेक्षतावाद अस्वीकारैत अछि। प्रमुख तर्क पहिल तर्क—उत्तर-आधुनिकता आधुनिकताक सरल विरोध नहि। आधुनिकता स्वयं अनेक धारा—वैज्ञानिक विवेक, पूँजीवादी विकास, लोकतान्त्रिक अधिकार, राष्ट्र-राज्य, औद्योगिकीकरण, नौकरशाही, क्रान्तिकारी राजनीति—रखैत अछि; उत्तर-आधुनिक आलोचना अलग-अलग धारा पर अलग प्रश्न उठबैत अछि। दोसर तर्क—महाख्यान (metanarrative) ओ कथा अछि जे इतिहास/ज्ञान/समाजक विविधता केँ एक सर्वव्यापी दिशा अथवा वैधता-सूत्रमे समेटैत अछि। प्रगति, मुक्ति, राष्ट्र, वर्ग-विजय, सभ्यतागत नियति—कखनो एहन रूप ले सकैत अछि। तेसर तर्क—महाख्यानपर अविश्वास = प्रत्येक व्यापक सिद्धान्तक निषेध नहि। जलवायु परिवर्तन, मानवाधिकार, विकास-सूचक, सार्वजनिक स्वास्थ्य जकाँ व्यापक दाबी तथ्य/नैतिक तर्कद्वारा समर्थित हो सकैत अछि। प्रश्न ओकर दायरा, प्रमाण आ संशोध्यता पर अछि। चारिम तर्क—उत्तर-आधुनिक बहुलता केन्द्र/हाशिया भेद खोलैत अछि। जे आवाज मान्यताप्राप्त इतिहास (canonical history), साहित्य (literature), कला (art) वा दर्शन (philosophy) मे अनुपस्थित, ओकरा खोजब जरूरी हो सकैत अछि; मुदा अनुपस्थिति = स्वतः सत्य नहि। पाँचम तर्क—पहिचान स्थिर सार नहि हो सकैत। जाति, वर्ग, लिंग, राष्ट्र, भाषा, पेशा, धर्म आ क्षेत्रक पहिचान इतिहास/संस्था/अभ्यासद्वारा बदलैत अछि; मुदा व्यक्ति केर नैतिक गरिमा एहि परिवर्तनसँ कम/बेसी नहि। छठम तर्क—माध्यम वास्तविकताक तटस्थ खिड़की नहि। समाचार, विज्ञापन, चलचित्र, सामाजिक माध्यम (social media), अन्तरफलक (interface), कलनविधीय क्रमांकन (algorithmic ranking) आ दृश्य-संपादन (visual editing) घटना केर उपलब्धता/महत्त्व बदलि सकैत अछि। सातम तर्क—प्रतिनिधित्वक मध्यस्थता = बाह्य यथार्थक अन्त नहि। फोटो परिवर्तित/हेरफेर (manipulate) हो सकैत अछि; ताहि सँ चित्रित घटना (photographed event) स्वतः असत्य नहि। उलटे उत्पत्ति-पथ (provenance), अधितथ्य (metadata), स्वतंत्र पुष्टि (corroboration) जकाँ प्रमाण अधिक आवश्यक होइत अछि। आठम तर्क—उपभोक्ता-संस्कृति संकेत, शैली, ब्राण्ड (brand), छवि (image) आ जीवन-शैली (lifestyle) द्वारा वस्तुक उपयोग-मूल्य सँ अधिक सामाजिक अर्थ उत्पन्न करि सकैत अछि। उत्तर-आधुनिक आलोचना एहि संकेत-अर्थव्यवस्था (sign economy) पर प्रश्न उठबैत अछि। नवम तर्क—वास्तुकला/कला क्षेत्रमे उत्तर-आधुनिकता एकल शुद्धतावाद (purity), कार्यात्मकतावाद (functionalism) वा उच्च/लोकप्रिय संस्कृति (high/low culture) भेदकेँ तोड़ि उद्धरण-संकेत (citation), विडम्बना (irony), संकरता (hybridity) आ मिश्र-शैली (pastiche) प्रयोग करि सकैत अछि। दार्शनिक उत्तर-आधुनिकता एहि सौन्दर्यशास्त्रीय अर्थक समानार्थी नहि। दसम तर्क—इतिहासलेखन चयनशील अछि: स्रोत, प्रश्न, कालखंड, शब्दावली आ कथात्मक रूप (narrative form) इतिहासकार चुनैत अछि। मुदा चयनशीलता = मनगढ़न्त नहि। स्रोत, तिथि, भौतिक साक्ष्य, स्वतंत्र पुष्टि आ प्रतिप्रमाण (counter-evidence) कथा सीमित करैत अछि। पूर्वपक्ष पूर्वपक्षक पहिल रूप यथार्थवादी अछि—उत्तर-आधुनिकता अनावश्यक संशय उत्पन्न करैत अछि; सत्य, कारण, तथ्य आ वैज्ञानिक ज्ञानक भरोसा कमजोर करैत अछि। दोसर पूर्वपक्ष राजनीतिक अछि—महाख्यान बिना सामूहिक न्याय, समानता, मानवाधिकार, जलवायु नीति वा लोकतान्त्रिक आन्दोलन लेल साझा भाषा कठिन हो सकैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष मार्क्सवादी अछि—संस्कृति, संकेत आ विमर्श (discourse) पर अत्यधिक बल आर्थिक संरचना, वर्ग, श्रम आ भौतिक असमानता (material inequality) केँ गौण करि सकैत अछि। चारिम पूर्वपक्ष पहचान-राजनीतिक अछि—सार्वभौम गरिमा (universal dignity) पर जोर वास्तविक ऐतिहासिक उत्पीड़न (historical oppression) आ समूह-विशिष्ट अन्याय (group-specific injustice) केँ अमूर्त करि सकैत अछि। पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय तुलना सँ अछि—अनेकान्तवाद, शून्यता, माया, नेति-नेति, अपोह वा बहुदर्शन-परम्पराकेँ ‘भारतीय उत्तर-आधुनिकतावाद (Indian postmodernism)’ कहब ऐतिहासिक/दार्शनिक समानीकरण अछि। उत्तरपक्ष पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—उत्तर-आधुनिक प्रश्नक उपयोग सत्य नष्ट करब नहि, सत्य-दाबी केर शर्त अधिक स्पष्ट करब हो। समानान्तर दर्शन यथार्थ, प्रमाण आ त्रुटिसंशोधन पुनःस्थापित करैत अछि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—साझा नैतिक/राजनीतिक सिद्धान्त आवश्यक हो सकैत अछि; मुदा ओकरा आलोचनासँ मुक्त महाख्यान नहि बनाओल जाए। गरिमा, अधिकार, न्याय स्वयं अनुप्रयोग (application), बहिष्कार (exclusion) आ संस्थागत रूप (institutional form) पर समीक्षा स्वीकारय। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—संस्कृति/भाषा/माध्यम आ अर्थव्यवस्था/श्रम/भौतिकता परस्पर सम्बद्ध छथि। संकेत-अर्थव्यवस्था (sign economy) material economy क विकल्प नहि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—समान गरिमा पहिचान-अन्धता (identity-blindness) नहि। समूह-विशिष्ट प्रमाण (group-specific evidence), ऐतिहासिक सुधार (historical repair), प्रतिनिधित्व (representation) आ सुरक्षा (protection) आवश्यक हो सकैत अछि; नैतिक सीमा ई कि व्यक्ति केर मूल्य पहिचानद्वारा तय नहि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय सिद्धान्त अपन दार्शनिक इतिहास/लक्ष्य/तर्कसहित पढ़ल जाए। समस्या-संवाद हो सकैत अछि; ‘पूर्वरूप’ वा ‘समान सिद्धान्त (same doctrine)’ दाबी नहि। भारतीय संवाद जैन अनेकान्तवाद बहुपक्षीय प्रतिपादनक दार्शनिक अनुशासन अछि; ई ‘सभ दृष्टि समान’ नहि। वस्तु अनेक पक्ष रखैत अछि, कथन शर्तबद्ध हो सकैत अछि, मुदा यथार्थवादी आधार समाप्त नहि। मध्यमक शून्यता स्थिर स्वभावक आलोचना अछि; उत्तर-आधुनिक सापेक्षतावाद नहि। शून्यता केँ शून्यवाद (nihilism) अथवा उत्तर-आधुनिकतावाद (postmodernism) कहब बौद्ध मुक्ति-सन्दर्भ आ तर्कीय परियोजना नष्ट करैत अछि। अद्वैतक माया/अनिर्वचनीयता विश्वक ब्रह्म-संबंधी तत्त्वमीमांसक प्रश्न अछि; अनुकरण-संसार (simulation) वा अतियथार्थता (hyperreality) क ऐतिहासिक पूर्वरूप नहि। बौद्ध अपोह शब्दार्थक विशिष्ट सिद्धान्त अछि; विखण्डन/उत्तर-आधुनिक अर्थ-अस्थिरता (deconstruction/postmodern semantic instability) क समानार्थी नहि। न्याय–नव्य-न्याय उत्तर-आधुनिक संशयक सबल प्रतिपक्ष दैत अछि—परिभाषा, प्रमाण, सम्बन्ध, अभाव, अनुमान (inference) आ वस्तुगत यथार्थक स्पष्टता। मीमांसा पाठ/विधि/तात्पर्यक अनुशासित अर्थ-निर्धारण दैत अछि; ‘पाठक अर्थ बनबैत अछि (reader creates meaning)’ प्रकारक असीम खुलापन नहि। भारतीय दर्शनक बहुलता स्वयं प्रमाण अछि जे ‘भारतीय विचार’ एक स्वर नहि। मुदा बहुलता = postmodernism दाबी ऐतिहासिक रूपेँ गलत। भारतीय संवादक निष्कर्ष—उत्तर-आधुनिकताकेँ भारतीय परम्पराक पूर्वनिर्मित उत्तर नहि चाही; समान समस्या पर स्वतंत्र परम्परासभक तुलनात्मक संवाद चाही। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मिथिलाक समानान्तर दृष्टि उत्तर-आधुनिक संशयसँ एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा ग्रहण करैत अछि—‘मिथिला’ स्वयं एकल, शाश्वत, निर्विवाद सार नहि। भूगोल, राज्य, भाषा, स्मृति, पाण्डुलिपि, लोकपरम्परा, नेपाल–भारत सीमा, प्रवास आ आधुनिक संस्था समयक संग अर्थ बदलैत छथि। मुदा एहि ऐतिहासिक बहुलतासँ मिथिला ‘मनमाना निर्माण’ नहि बनि जाइत। स्थल, अभिलेख, भाषा-प्रयोग, राजनीतिक सीमा, पुरातत्त्व, साहित्य आ सामाजिक स्मृति अलग-अलग प्रमाण दैत अछि। ‘मुख्यधारा बनाम समानान्तर’ स्वयं स्थायी तत्त्वमीमांसक द्वैध (metaphysical binary) नहि। जे आज हाशिया, काल्हि केन्द्र बनि सकैत; समानान्तर दृष्टिक निष्ठा स्थायी विपक्ष नहि, सत्य/प्रमाण/गरिमा अछि। मैथिली साहित्यक मान्यताप्राप्त साहित्य-सूची (canon) पुनर्परीक्षण योग्य अछि—स्त्री, लोक, क्षेत्रीय, प्रवासी, डिजिटल, मौखिक आ उपेक्षित लेखनक पुनर्पाठ जरूरी। मुदा कम प्रसिद्ध = अधिक महान, एहन उलटा पदानुक्रम नहि। भाषा-मानक उपयोगी कार्यगत केन्द्र अछि; बहुबोली/बहुल रूप ओकर अस्तित्व नष्ट नहि करैत। मानकीकरण (standardization) पारदर्शी (transparent), संशोध्य (revisable), समावेशी (inclusive) हो। ऐतिहासिक गौरवक महाख्यान—‘हमर परम्परा पहिने सँ सभ जानैत छल’—समानान्तर दर्शन अस्वीकारैत अछि। उपलब्धि प्रमाणसँ स्थापित हो; आधुनिक विचारकक पूर्वरूप बिना ऐतिहासिक प्रमाण नहि बनाओल जाए। समानान्तर इतिहास-दृष्टि चार निष्कर्ष-श्रेणी राखैत अछि—सबल रूपेँ समर्थित, सम्भाव्य, विवादित, अज्ञात। उत्तर-आधुनिक संशय एहि श्रेणीकरण (grading) केँ नष्ट नहि, बल्कि ईमानदार बनबैत अछि। आत्मसमीक्षा—‘समानान्तर दर्शन’ स्वयं भविष्यक आलोचना लेल खुलल अछि। यदि ई नूतन महाख्यान बनि सभ विचारकेँ अपन सात सूत्रमे कैद करय, तखन अपन सातम सिद्धान्त—आत्मसमीक्षा—भंग करत। समकालीन प्रयोग सामाजिक माध्यममे वायरल कथा (viral narrative) शीघ्र ‘सत्य’ जकाँ फैलि सकैत अछि। उत्तर-आधुनिक आलोचना कथात्मक निर्माण (narrative construction) जाँचैत अछि; समानान्तर पद्धति स्रोत (source), उत्पत्ति-पथ (provenance), समय (time), स्वतंत्र पुष्टि (independent corroboration) आ परिवर्तित माध्यम-सामग्री (manipulated media) जाँचैत अछि। कृत्रिम बुद्धि (AI) भाषा-मॉडल अनेक शैली/दृष्टि उत्पन्न करि सकैत अछि; प्रवाहपूर्णता (fluency) सत्य नहि। बहुल उत्तर ज्ञानमीमांसक विविधता (epistemic diversity) दे सकैत अछि, मुदा तथ्यगत सत्यापन (factual verification) अलग अनिवार्य। डीपफेक अतियथार्थता (deepfake hyperreality) क अनुभव दे सकैत अछि—दृश्य उपस्थित अछि, घटना नहि। एतय उत्तर-आधुनिक प्रतिनिधित्व-आलोचना (postmodern representation critique) व्यावहारिक बनैत अछि; कूटलेखीय उत्पत्ति-पथ (cryptographic provenance), स्रोत-प्रमाणीकरण (source authentication) आ न्यायवैज्ञानिक सत्यापन (forensic verification) जरूरी। राजनीतिमे महाख्यान (grand narrative)—राष्ट्रक स्वर्णयुग, अपरिहार्य प्रगति, सभ समस्याक एक कारण—सरल संगठन/सक्रियता (mobilisation) दे सकैत अछि। समानान्तर दृष्टि ऐतिहासिक प्रमाण (historical evidence), बहिष्कृत समूह (excluded groups), कारणगत बहुलता (causal plurality) आ वर्तमान परिणाम (present consequences) जाँचत। ब्रांड/प्रभावक-संस्कृतिमे जीवन-शैली छवि (lifestyle image) वस्तुक उपयोग-मूल्य सँ अधिक पहचान-बोध बेचैत अछि। उपभोक्ता-संस्कृति विश्लेषण आर्थिक मूल्य, श्रम-श्रृंखला आ पर्यावरणीय लागत (environmental cost) केर संग जोड़ल जाए। विश्वविद्यालयमे मान्यताप्राप्त साहित्य-सूचीक विविधीकरण (canon diversification) जरूरी हो सकैत अछि; केवल पहिचान-आधारित कोटा (identity quota) अथवा केवल पुरान प्रतिष्ठा (prestige)—दुनू अपर्याप्त। विद्वत्तापरक गुणवत्ता (scholarly quality), ऐतिहासिक सुधार (historical correction), पहुँच (access), प्रतिनिधित्व (representation) आ प्रमाण (evidence) एकसंग जाँचू। इतिहासलेखनमे डिजिटल archive abundance नूतन समस्या अछि—अधिक डेटा = अधिक सत्य नहि। खोज-कलनविधि (search algorithm), अधितथ्य-गुणवत्ता (metadata quality), डिजिटलीकरण-पूर्वाग्रह (digitization bias) आ अनुपस्थित अभिलेख (missing archives) जाँचल जाए। सार्वजनिक नीति मे ‘प्रमाण-आधारित (evidence-based)’ कहब पर्याप्त नहि; प्रमाण-चयन (evidence selection), मापन-श्रेणी (measurement category), संस्थागत प्रोत्साहन (institutional incentive), प्रभावित जनसमूह (affected population) आ अनिश्चितता (uncertainty) पारदर्शी (transparent) रहय। अध्याय-निष्कर्ष उत्तर-आधुनिकता एकल सिद्धान्त नहि; आधुनिक महाख्यान, केन्द्र, स्थिर पहचान, प्रतिनिधित्वक पारदर्शिता आ सार्वभौमिक वैधतापर विविध आलोचनात्मक प्रवृत्तिसभक परिवार अछि। ल्योटारक महाख्यान-आलोचना, बौद्रियारक प्रतिरूप/माध्यम प्रश्न, देरिदाक विखण्डन आ फूकोक सत्ता–ज्ञान विश्लेषणकेँ एक सिद्धान्त (doctrine) मे समेटब अनुचित। उत्तर-आधुनिकता सत्यक अन्त आवश्यक रूपेँ नहि कहैत; मुदा अति-सापेक्षतावादी पठन ताहि दिशा जा सकैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि अतिकेँ रोकैत अछि। बहुलता महत्त्वपूर्ण; मुदा ‘बहुदृष्टिगत सत्य ≠ मनमाना सत्य।’ इतिहास चयनशील; मुदा मनगढ़न्त नहि। विज्ञान संस्थागत; मुदा प्रयोग-सापेक्ष। पहिचान ऐतिहासिक; मुदा गरिमा मनमाना नहि। समानान्तर दर्शन उत्तर-आधुनिक संशयसँ आत्मसमीक्षा, बहुकेन्द्रिकता आ हाशिया-संवेदना ग्रहण करैत अछि; साथे यथार्थ, प्रमाण, गरिमा आ त्रुटिसंशोधनक कसौटी राखैत अछि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘महाख्यान प्रश्न करू, मुदा तथ्य नहि तोड़ू; बहुलता स्वीकारू, मुदा प्रमाण नहि छोड़ू; पहचान खोलू, मुदा व्यक्ति केर गरिमा नहि; माध्यम जाँचू, मुदा जगत नकारू नहि।’ अध्याय-ग्रन्थसूची • ज्याँ-फ्राँस्वा ल्योटार — ‘उत्तर-आधुनिक अवस्था: ज्ञानपर प्रतिवेदन’ (The Postmodern Condition: A Report on Knowledge)। • ज्याँ बौद्रियार — ‘प्रतिरूप आ अनुकरण’ (Simulacra and Simulation)। • ज्याँ बौद्रियार — ‘उपभोक्ता समाज’ (The Consumer Society)। • जाक देरिदा — ‘लेखन आ भिन्नता’ (Writing and Difference)। • जाक देरिदा — ‘व्याकरणशास्त्र पर’ (Of Grammatology)। • मिशेल फूको — ‘वस्तुसभक क्रम’ (The Order of Things)। • मिशेल फूको — ‘ज्ञानक पुरातत्त्व’ (The Archaeology of Knowledge)। • डेविड हार्वी — ‘उत्तर-आधुनिकताक अवस्था’ (The Condition of Postmodernity)। • फ्रेडरिक जेम्सन — ‘उत्तर-आधुनिकता, अथवा उत्तर-पूँजीवादक सांस्कृतिक तर्क’ (Postmodernism, or, The Cultural Logic of Late Capitalism)। • लिण्डा हट्चियन — ‘उत्तर-आधुनिकताक काव्यशास्त्र’ (A Poetics of Postmodernism)। • क्रिस्टोफर नॉरिस — ‘असमालोचनात्मक सिद्धान्त’ (Uncritical Theory), सापेक्षतावादक आलोचना लेल। • गौतम — न्यायसूत्र। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • नागार्जुन — मूलमध्यमककारिका। • मल्लिषेण — स्याद्वादमञ्जरी। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)।