समस्या विज्ञान आधुनिक समाजक सबसे शक्तिशाली ज्ञान-प्रणालीसभमे सँ एक अछि। ओकर सफलता औषधि, अभियान्त्रिकी, खगोल, संचार, कृषि, जलवायु-विज्ञान, जैविकी आ गणना-संरचनामे स्पष्ट अछि। तखन उत्तर-आधुनिक/इतिहास-सचेत आलोचना विज्ञानपर प्रश्न किएक उठबैत अछि? प्रश्न विज्ञान ‘सत्य अछि की नहि’ मात्र नहि। प्रश्न अछि—वैज्ञानिक समस्या कोना चुनल जाइत? कौन अवधारणा/मापन उपयोग होइत? कौन संस्था प्रयोगशाला/वित्त/प्रकाशन नियंत्रित करैत? कौन ऐतिहासिक प्रतिमान/अनुशासनात्मक संरचना (paradigm/disciplinary matrix) शोधक दृष्टि व्यवस्थित करैत? आ वैज्ञानिक निष्कर्ष समाजमे कोना वैधता पबैत? थॉमस कुहनक विज्ञान-इतिहास पारम्परिक संचयी चित्रपर प्रश्न उठबैत अछि। सामान्य विज्ञान स्थिर प्रतिमान (paradigm) भीतर पहेली समाधान करैत; संकट/असामान्यता कखनो वैज्ञानिक क्रान्ति उत्पन्न करैत; नूतन प्रतिमान (paradigm) पुरान अवधारणा/मानक सेहो बदलि सकैत अछि। एहि ऐतिहासिक दृष्टिसँ लोकप्रिय अति-निष्कर्ष निकलि सकैत अछि—‘यदि प्रतिमान (paradigm) बदलैत अछि, तऽ विज्ञानमे सत्य नहि’, अथवा ‘वैज्ञानिक तथ्य केवल सामाजिक सहमति’। कुहनक कार्य एहन सरल सामाजिक-निर्धारणवादक समर्थन नहि करैत; वैज्ञानिक विवादमे पहेली-समाधान क्षमता आ अन्तर्विज्ञानिक कारण महत्त्वपूर्ण रहैत अछि। इतिहास सेहो उत्तर-आधुनिक आलोचनाक विषय अछि। इतिहासकार स्रोत चुनैत, प्रश्न बनबैत, कालखंड तय करैत, कथात्मक क्रम बनबैत अछि। मुदा एहि चयनशीलतासँ दस्तावेजक तिथि, युद्ध, बाढ़, मृत्यु, प्रकाशन, जनगणना, स्थल वा भौतिक अवशेष मनमाना नहि बनि जाइत। एहि अध्यायक समस्या ई अछि—विज्ञान/इतिहासक सामाजिकता आ वस्तुनिष्ठता एकसंग कोना बुझल जाए? सिद्धान्त-सापेक्ष निरीक्षण (theory-ladenness), प्रतिमान (paradigm), असमाप्यता (incommensurability), सामाजिक निर्माण (social construction), वस्तुनिष्ठता (objectivity), प्रमाण (evidence) आ ऐतिहासिक कथन (historical narrative) क सीमा की? आ समानान्तर दर्शन उत्तर-आधुनिक आलोचनाकेँ विज्ञान-विरोध वा इतिहास-सापेक्षतावाद बनब सँ कोना रोकैत अछि? मूल प्रतिपादन एहि अध्यायक मूल प्रतिपादन ई अछि जे विज्ञान सामाजिक संस्था सेहो अछि आ यथार्थ-जाँचक विशिष्ट पद्धति सेहो। ओकर सामाजिक इतिहास वैज्ञानिक तथ्यकेँ मनमाना नहि बनबैत; ओकर पद्धतिगत शक्ति सामाजिक आलोचनासँ मुक्त सेहो नहि करैत। वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठता ‘कोनो मनुष्य/संस्था नहि’ एहन शून्य दृष्टिकोण नहि; त्रुटि कम करयवला व्यवस्थित प्रक्रिया—पुनरावृत्ति, मापन, आलोचना, खुलापन, प्रतिप्रमाण, सांख्यिकीय अनुशासन, उपकरणीय जाँच, स्वतंत्र शोध आ संशोधन—द्वारा बनैत अछि। इतिहास प्रमाणाधारित पुनर्निर्माण अछि। स्रोत अपूर्ण/चयनित हो सकैत; इतिहासकार प्रश्न-सापेक्ष हो सकैत; मुदा कालक्रम (chronology), उत्पत्ति-पथ (provenance), भौतिक साक्ष्य (material evidence), पाठ-समीक्षा (textual criticism), स्वतंत्र पुष्टि (corroboration) आ प्रतिप्रमाण (counter-evidence) निष्कर्ष सीमित करैत अछि। कुहनक प्रतिमान (paradigms) विज्ञानक ऐतिहासिक संरचना बुझबैत अछि; फूकोक पुरातत्त्व/वंशावली (archaeology/genealogy) ज्ञानक सम्भावना-शर्त/सत्ता सम्बन्ध जाँचैत अछि; विज्ञान-अध्ययन संस्था/प्रयोगशाला/समुदाय जाँचैत अछि। एहि तीनू सँ ‘प्रमाण अप्रासंगिक’ निष्कर्ष नहि निकलैत। समानान्तर सूत्र—‘विज्ञानक इतिहास लिखू, विज्ञानकेँ इतिहासमे घोलू नहि; संस्थाकेँ जाँचू, प्रयोग छोड़ू नहि; प्रतिमान (paradigm) देखू, यथार्थक प्रतिरोध सेहो देखू; इतिहासक कथा पढ़ू, स्रोतक सीमा राखू।’ प्रमुख तर्क पहिल तर्क—कुहनक सामान्य विज्ञान (normal science) प्रतिमान (paradigm) भीतर पहेली-समाधानक गतिविधि अछि। प्रतिमान समस्या, आदर्श उदाहरण, उपकरण, मानक आ स्वीकार्य समाधानक ढाँचा दैत अछि। दोसर तर्क—प्रतिमानक ऐतिहासिकता विज्ञानक मनमानापन नहि। एक प्रतिमान विसंगति (anomaly) सँ घिरि सकैत; नूतन सिद्धान्त अधिक समस्या हल, अधिक शुद्ध पूर्वानुमान, नूतन घटना व्याख्या वा नूतन शोध खोलि सकैत अछि। तेसर तर्क—सिद्धान्त-सापेक्ष निरीक्षण (theory-ladenness) कहैत अछि जे निरीक्षण अवधारणा/पृष्ठभूमि-सिद्धान्त बिना ‘कच्चा तथ्य’ नहि। मुदा उपकरण-कैलिब्रेशन, अन्ध विश्लेषण (blind analysis), स्वतंत्र प्रयोग आ बहु-पद्धति संगम (cross-method convergence) व्यक्तिगत/सैद्धान्तिक पूर्वाग्रह कम करि सकैत अछि। चारिम तर्क—असमाप्यता (incommensurability)क अर्थ सर्वथा तुलना-असम्भवता नहि। कुहनक विचार समयक संग सूक्ष्म भेल; अलग वैज्ञानिक ढाँचा अवधारणात्मक/मानक कठिनाइ पैदा करि सकैत, मुदा वैज्ञानिक तुलना/परिवर्तन वास्तवमे होइत अछि। पाँचम तर्क—विज्ञानक सामाजिक अध्ययन सही रूपेँ देखबैत अछि जे प्रयोगशाला, उपकरण, वित्त, प्रतिष्ठा, पत्रिका, पेटेण्ट, राज्य, उद्योग, युद्ध आ शिक्षा वैज्ञानिक उत्पादनक इतिहासपर असर डालैत अछि। छठम तर्क—मुदा ‘सामाजिक कारण अछि’ सँ ‘तथ्य सामाजिक बनावट मात्र’ निष्कर्ष नहि निकलैत। उपकरण कोन संस्थान खरीदलक ई सामाजिक तथ्य; उपकरण जे भौतिक परिणाम नापलक, ओकर विश्वसनीयता कैलिब्रेशन/पुनरावृत्ति/स्वतंत्र तुलना सँ जाँचल जाए। सातम तर्क—वस्तुनिष्ठता व्यक्तिगत पक्षपात-शून्यता मात्र नहि। हेलेन लॉन्गिनो (Helen Longino)-जकाँ सामाजिक ज्ञानमीमांसा आलोचनात्मक समुदाय, सार्वजनिक मानक, विविध दृष्टिकोण आ आपत्तिक प्रत्युत्तरक महत्त्व देखबैत अछि। समानान्तर दर्शन एहि प्रक्रियात्मक वस्तुनिष्ठताकेँ बहुप्रमाणीय विवेकवादसँ जोड़ैत अछि। आठम तर्क—पॉपरक खण्डनीयता (falsifiability) विज्ञानक आलोचनात्मकता पर बल दैत अछि; कुहन वास्तविक वैज्ञानिक समुदाय/इतिहासक अधिक जटिल चित्र दैत छथि। दुनूकेँ सरल शत्रु बनब उचित नहि। नवम तर्क—फेयरआबेंड पद्धतिगत बहुलतापर तीक्ष्ण प्रश्न उठबैत छथि; ‘जे किछु चलत (anything goes)’ केँ वैज्ञानिक अराजकता केर साधारण नारा बनाबयब हुनकर ऐतिहासिक/आलोचनात्मक परियोजना घटबैत अछि। दसम तर्क—विज्ञान-अध्ययन (विज्ञान आ प्रौद्योगिकी अध्ययन (science and technology studies)) प्रयोगशाला/वस्तु/नेटवर्क/मानकीकरणक भूमिका जाँचैत अछि। एहि अध्ययनसँ वैज्ञानिक प्रथाक सामाजिक जटिलता स्पष्ट, तथ्यक स्वतः-असत्यता नहि। एगारहम तर्क—इतिहासकारक चयन अपरिहार्य अछि। लाखों स्रोतमे सँ प्रश्न-सापेक्ष सामग्री चुनल जाएत; मुदा चयन-मानक, स्रोत-समीक्षा, प्रतिप्रमाण आ कालक्रम-संगति (chronological fit) सार्वजनिक कएल जा सकैत अछि। बारहम तर्क—इतिहासक कथात्मक रूप (narrative form) घटनाक सम्बन्ध बुझबैत अछि, मुदा कथा-कौशल प्रमाणक स्थान नहि लैत। सुन्दर कथा (narrative) गलत कालक्रम (chronology) वा बनावटी उद्धरण (quotation) केँ सत्य नहि बनबैत। पूर्वपक्ष पूर्वपक्षक पहिल रूप वैज्ञानिक यथार्थवादी अछि—इतिहास/समाज पर अत्यधिक बल विज्ञानक वस्तुगत उपलब्धि कम आँकैत; इलेक्ट्रॉन (electron), विषाणु (virus), ग्रह, जीन (gene) वा विवर्तनिक पट्ट (tectonic plate) सामाजिक कथा नहि। दोसर पूर्वपक्ष सामाजिक निर्माणवादी अछि—वैज्ञानिक तथ्य प्रयोगशाला, उपकरण, संस्था, भाषा आ सहमति बिना उपलब्ध नहि; ‘वस्तुगत यथार्थ’क भाषा एहि निर्मित स्थितिकेँ छिपबैत अछि। तेसर पूर्वपक्ष इतिहास-सापेक्षतावादी अछि—इतिहासकार कथानक बनबैत अछि; अलग कथा समान स्रोतसँ सम्भव; ताहि कारण एक अन्तिम इतिहास (final history) असम्भव। चारिम पूर्वपक्ष राजनीतिक अछि—विज्ञानक नामपर औपनिवेशिकता, नस्ल-वर्गीकरण, लैंगिक पक्षपात, पर्यावरणीय क्षति वा युद्ध-तकनीकक इतिहास अछि; विज्ञानकेँ नैतिक तटस्थता नहि देल जा सकैत। पाँचम पूर्वपक्ष भारतीय तुलना सँ अछि—न्याय प्रमाणशास्त्र, आयुर्वेद, ज्योतिष/खगोल, गणित, शास्त्रीय चिकित्सा वा तर्कपर आधुनिक ‘विज्ञान (science)’ श्रेणी सीधे आरोपित करब काल-विस्थापन हो सकैत अछि। उत्तरपक्ष पहिल पूर्वपक्षक उत्तर—भौतिक सत्ता/वस्तु वास्तविक हो सकैत अछि; वैज्ञानिक अवधारणा/मापन इतिहास बदलि सकैत अछि। यथार्थवाद (realism) आ ऐतिहासिक ज्ञानमीमांसा (historical epistemology) परस्पर-विरोधी नहि। दोसर पूर्वपक्षक उत्तर—ज्ञान-संरचना सामाजिक होयब सम्भव; बाह्य प्रतिरोध सेहो सम्भव। अलग प्रयोगशाला समान परिणाम पबैत, नूतन तकनीक पूर्वानुमान सफल करैत, रोगजनक हस्तक्षेप प्रतिक्रिया दैत—ई सामाजिक सहमतिसँ अधिक नियन्त्रण दैत अछि। तेसर पूर्वपक्षक उत्तर—अन्तिम इतिहास (final history) नहि होयब ‘कोनो ऐतिहासिक सत्य (historical truth) नहि’ नहि। नूतन स्रोतसँ व्याख्या बदलि सकैत; तिथि/घटना/दस्तावेजक प्रमाणित सीमा रहैत अछि। चारिम पूर्वपक्षक उत्तर—विज्ञान नैतिक रूपेँ तटस्थ संस्था नहि। शोध-उद्देश्य, सहमति (consent), हानि (harm), वितरण (distribution), सैन्य उपयोग (military use), पर्यावरण (environment), पहुँच (access) न्याय/गरिमाक प्रश्न छथि; मुदा नैतिक दुरुपयोग वैज्ञानिक तथ्यक स्वतः खण्डन नहि। पाँचम पूर्वपक्षक उत्तर—भारतीय ज्ञान-परम्पराकेँ अपन ऐतिहासिक पद/मानक/उद्देश्यसँ पढ़ू। आधुनिक विज्ञानसँ तुलना समस्या-संवाद (problem-dialogue) रूपमे; ‘प्राचीन विज्ञानमे आधुनिक अमुक विचार पहिनेसँ छल (ancient science already had modern X)’ दाबी केवल प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाणसँ। भारतीय संवाद न्याय दर्शन प्रमाण, संशय, भ्रम, अनुमान, व्याप्ति आ वस्तु-सापेक्ष ज्ञानक विश्लेषण दैत अछि। आधुनिक experimental science केर समानता नहि, मुदा प्रमाण/औचित्य (evidence/justification) सम्बन्धी सबल दार्शनिक संवाद सम्भव। नव्य-न्याय दाबी/सम्बन्ध/अवच्छेदन स्पष्ट करैत अछि; वैज्ञानिक कार्यपरिभाषा (operational definition), मापन-सम्बन्ध (measurement relation) वा कारण-दाबी (causal claim) संग समस्या-संवाद फलदायी, ऐतिहासिक पहचान नहि। बौद्ध प्रमाणपरम्परा प्रत्यक्ष/अवधारणा (perception/concept), अनुमान (inference), अपवर्जन (exclusion) आ ज्ञान-क्रिया (cognition) क सीमा जाँचैत अछि। सिद्धान्त-सापेक्ष निरीक्षण (theory-ladenness) क पूर्वरूप कहब अनुचित; ज्ञानक मध्यस्थता सम्बन्धी स्वतंत्र भारतीय बहस मानू। आयुर्वेदक ऐतिहासिक चिकित्सकीय परम्परा महत्वपूर्ण अछि; आधुनिक नैदानिक प्रभावकारिता (clinical efficacy) दाबी लेल आधुनिक सुरक्षा/प्रयोग/सांख्यिकीय परीक्षण अलग आवश्यक। ऐतिहासिक प्रतिष्ठा = आधुनिक प्रभावकारिता प्रमाण नहि। भारतीय गणित/खगोल परम्पराक उपलब्धि मूल ग्रन्थ, तिथि, गणना आ संचरण (transmission) सँ स्थापित हो; राष्ट्रवादी पूर्वगामितावाद (nationalist precursorism) सँ नहि। मीमांसा शास्त्र/वाक्यक प्रामाण्यक विशिष्ट समस्या उठबैत अछि; वैज्ञानिक निरीक्षण/प्रयोग (observation/experiment) क समानार्थी नहि। तथापि ‘कौन कथन किन शर्तमे ज्ञान देत?’ प्रश्न साझा संवाद-बिन्दु। जैन अनेकान्तवाद बहुदृष्टिगत अनुशासन (multi-perspectival discipline) दैत अछि; वैज्ञानिक बहुलतावाद (scientific pluralism) अथवा उत्तर-आधुनिक सापेक्षतावाद (postmodern relativism) नहि। विभिन्न मॉडल (models) उपयोग हो सकैत अछि, मुदा पूर्वानुमानात्मक/व्याख्यात्मक प्रदर्शन (predictive/explanatory performance) जाँचबाक चाही। भारतीय संवादक निष्कर्ष—‘भारतीय विज्ञान’ अथवा ‘पाश्चात्य विज्ञान’ जकाँ एकरूपी श्रेणी सावधानीसँ उपयोग हो; वास्तविक ग्रन्थ, पद्धति, संस्था, काल आ परिणाम अलग-अलग जाँचल जाए। मिथिलाक समानान्तर दृष्टि मिथिलाक इतिहास/ज्ञानक अध्ययनमे विज्ञान आ इतिहासक संयुक्त अनुशासन आवश्यक—पुरातत्त्व, भूगोल, नदी/बाढ़ डेटा, कृषि-अध्ययन, जनगणना, पाण्डुलिपि, भाषा-विज्ञान, मौखिक इतिहास आ सामाजिक अभिलेख एक-दोसराक पूरक हो सकैत अछि। बाढ़क इतिहास केवल नदीक जलविज्ञान (hydrology) नहि, न केवल लोकस्मृति। वर्षा (rainfall), नदी-प्रवाह (river discharge), तटबन्ध-अभिलेख (embankment records), बस्ती-मानचित्र (settlement maps), फसल-हानि (crop loss), प्रवास (migration), मौखिक साक्ष्य (oral testimony) आ नीति-अभिलेख (policy archive) जोड़ल जाए। पंजी/शाखा-पुस्तक ऐतिहासिक स्रोत छथि; जैविक वंशावली (biological genealogy) अथवा सामाजिक श्रेणीक सम्पूर्ण यथार्थ स्वतः नहि। दस्तावेज-उत्पत्ति (document provenance), तिथि-निर्धारण (dating), अन्तःक्षेप (interpolation), प्रतिलिपि-परम्परा (copying tradition) आ बाह्य पुष्टि (external corroboration) जाँचू। मैथिली भाषाविज्ञानमे पाठ-संग्रह आवृत्ति (corpus frequency) उपयोगी; पाठ-संग्रह (corpus) स्वयं प्रतिनिधिक (representative) अछि की नहि जाँचू—कौन काल, विधा (genre), क्षेत्र (region), लिपि (script), लिंग/सामाजिक समूह (gender/social group), डिजिटल उपलब्धता (digital availability)? मिथिलाक पुरातत्त्व/स्थल-दाबी लेल स्थानीय स्मृति महत्वपूर्ण संकेत, मुदा उत्खनन (excavation), स्तरविज्ञान (stratigraphy), अभिलेख (inscription), सामग्री-तिथि-निर्धारण (material dating) आ तुलनात्मक पुरातत्त्व (comparative archaeology) अलग प्रमाण दैत अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टि विज्ञानकेँ ‘बाहरी आधुनिक कसौटी’ कहि अस्वीकारैत नहि; न विज्ञानक नामपर स्थानीय/मौखिक स्रोत मिटबैत। दाबी-प्रकार अनुसार प्रमाण-भार निर्धारित करैत अछि। गौरव-दाबी—‘मिथिला पहिने सँ आधुनिक विज्ञान/दर्शन खोजि लेने छल’—ऐतिहासिक प्रभाव/समानता बिना नहि। समान समस्या उठल हो सकैत; आधुनिक श्रेणी (category) पश्चदृष्टिगत रूपेँ (retroactively) आरोपित नहि करू। मुख्य सूत्र—‘मिथिलाक स्रोत बहुविध; कसौटी बहुविध, मनमाना नहि। विज्ञानक मापन आ लोकक अनुभव जोड़ू; दुनूक सीमा लिखू।’ समकालीन प्रयोग कृत्रिम बुद्धि (AI) शोधमे मानदण्ड-प्रदर्शन (benchmark performance) वैज्ञानिक उपलब्धि हो सकैत अछि; मुदा मानदण्ड-चयन (benchmark selection), आँकड़ा-दूषण (data contamination), छिपल परीक्षण-रिसाव (hidden test leakage), संगणकीय लाभ (compute advantage), पुनरुत्पादनीयता (reproducibility) आ वास्तविक-जगत सामान्यीकरण (real-world generalization) जाँचल जाए। चिकित्सामे यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण (randomized controlled trial) सबल प्रमाण (evidence) दे सकैत अछि; बाह्य वैधता (external validity), प्रतिकूल प्रभाव (adverse effects), उपसमूह-विविधता (subgroup variation), प्रकाशन-पूर्वाग्रह (publication bias) आ वास्तविक-जगत प्रमाण (real-world evidence) सेहो महत्त्वपूर्ण। जलवायु-विज्ञानमे मॉडल-बहुलता (model plurality) अनिश्चितता/जटिलता प्रतिबिम्बित करि सकैत अछि; अनेक मॉडल (multiple models) = जलवायु परिवर्तन मनमाना (arbitrary) नहि। संगम (convergence), निरीक्षण (observation), तन्त्र (mechanism) आ अनिश्चितता-अन्तराल (uncertainty interval) जाँचू। इतिहासमे डिजिटाइज्ड पाठ-संग्रह (digitized corpus) शोध बढ़बैत अछि; अक्षर-पहिचान त्रुटि (OCR error), डिजिटलीकरण-चयन (digitization selection), अधितथ्य-अन्तराल (metadata gaps) आ अदिजिटाइज्ड अभिलेख-पूर्वाग्रह (non-digitized archives bias) उत्पन्न करि सकैत अछि। सार्वजनिक नीति मे प्रमाण-आधारित नीति (evidence-based policy) लेल मापन-परिभाषा (measurement definition), कारण-पहचान (causal identification), वितरणात्मक प्रभाव (distributional effect), स्थानीय प्रसंग (local context) आ नैतिक सीमा (ethical constraint) स्पष्ट हो। विश्वविद्यालयी शोध-मापदण्ड (research metric) उद्धरण-संख्या/प्रभाव-कारक (citation count/impact factor) उत्पादक परिणाम (productive output) मापि सकैत अछि; पद्धतिगत गुणवत्ता (methodological quality), पुनरावृत्ति (replication), ऋणात्मक परिणाम (negative result), स्थानीय-भाषा विद्वत्ता (local-language scholarship) आ दीर्घकालिक अभिलेख-मूल्य (long-term archive value) अलग। विज्ञान-संचारमे अनिश्चितता (uncertainty) लुकाबयब भरोसा कमजोर करि सकैत अछि; अनिश्चितता बताबयब ‘विज्ञान कमजोर’ नहि, बल्कि भरोसा-स्तरक ईमानदार प्रस्तुति। इतिहास-संचारमे वृत्तचित्र (documentary), संग्रहालय (museum), पाठ्यपुस्तक (textbook) आ कृत्रिम-बुद्धि सार-कथा (AI summary narrative) बनबैत अछि; उद्धरण/उत्पत्ति-पथ (citation/provenance) दृश्य (visible) राखलासँ कथा आ स्रोतक भेद स्पष्ट रहैत अछि। अध्याय-निष्कर्ष विज्ञान सामाजिक संस्था सेहो अछि, यथार्थ-जाँचक शक्तिशाली पद्धति सेहो। एहि दुई स्तरकेँ एक-दोसराक विरुद्ध रखब गलत। कुहन विज्ञानक ऐतिहासिक प्रतिमान/क्रान्ति देखबैत छथि; हुनकर विचार वैज्ञानिक प्रगति वा अन्तर्विज्ञानिक कारणकेँ समाप्त नहि करैत। सिद्धान्त-सापेक्ष निरीक्षण, असमाप्यता, वित्त, प्रतिष्ठा, सामाजिक मूल्य आ अभिलेखीय चयन वस्तुनिष्ठताकेँ कठिन बनबैत अछि; असम्भव नहि। इतिहास चयनशील पुनर्निर्माण अछि; कथात्मक रूप (narrative form) आवश्यक हो सकैत, मुदा कालक्रम (chronology), उत्पत्ति-पथ (provenance), भौतिक साक्ष्य (material evidence) आ स्वतंत्र पुष्टि (corroboration) कथा सीमित करैत अछि। उत्तर-आधुनिक आलोचना विज्ञान/इतिहासकेँ अधिक आत्मसमीक्षात्मक बना सकैत अछि; अति-सापेक्षतावाद ओकर प्रमाण-मूल्य नष्ट करैत। समानान्तर दर्शन पहिल शिक्षा स्वीकारैत, दोसर अति अस्वीकारैत अछि। अध्यायक अन्तिम सूत्र—‘विज्ञानक संस्था जाँचू, प्रयोग बचाउ; इतिहासक कथा जाँचू, स्रोत बचाउ; प्रतिमान पहिचानू, यथार्थक प्रतिरोध नकारू नहि; संशोधन स्वीकारू, मनमानापन नहि।’ अध्याय-ग्रन्थसूची • थॉमस एस. कुहन — ‘वैज्ञानिक क्रान्तिक संरचना’ (The Structure of Scientific Revolutions)। • कार्ल पॉपर — ‘वैज्ञानिक खोजक तर्क’ (The Logic of Scientific Discovery)। • पॉल फेयरआबेंड — ‘पद्धतिक विरुद्ध’ (Against Method)। • इमरे लाकातोश — ‘वैज्ञानिक शोध-कार्यक्रमक पद्धति’ (The Methodology of Scientific Research Programmes)। • इयान हैकिंग — ‘प्रतिनिधित्व आ हस्तक्षेप’ (Representing and Intervening)। • हेलेन ई. लॉन्गिनो — ‘सामाजिक ज्ञान रूपमे विज्ञान’ (Science as Social Knowledge)। • हेलेन ई. लॉन्गिनो — ‘ज्ञानक नियति’ (The Fate of Knowledge)। • ब्रूनो लातूर — ‘क्रियामे विज्ञान’ (Science in Action)। • ब्रूनो लातूर आ स्टीव वुल्गर — ‘प्रयोगशाला-जीवन’ (Laboratory Life)। • एलन सोकल आ ज्याँ ब्रिक्मों — ‘फैशनेबल नॉनसेन्स’ (Fashionable Nonsense), विज्ञान-सापेक्षतावादक आलोचनात्मक संदर्भ लेल। • ज्याँ-फ्राँस्वा ल्योटार — ‘उत्तर-आधुनिक अवस्था’ (The Postmodern Condition)। • मिशेल फूको — ‘ज्ञानक पुरातत्त्व’ (The Archaeology of Knowledge)। • मार्क ब्लोख — ‘इतिहासकारक शिल्प’ (The Historian’s Craft)। • ई. एच. कार — ‘इतिहास की अछि?’ (What Is History?)। • गौतम — न्यायसूत्र। • गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। • दिङ्नाग — प्रमाणसमुच्चय। • धर्मकीर्ति — प्रमाणवार्तिक। • बी. के. मतिलाल — ‘तर्क, भाषा आ यथार्थ’ (Logic, Language and Reality)। • जोनार्डन गणेरी — ‘शास्त्रीय भारतमे दर्शन’ (Philosophy in Classical India)।